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मोथमैन ( Mothman )

मोथमैन (Mothman )

वेस्ट वर्जिनियन लोककथाओं में, मोथमैन एक मानवीय प्राणी है, जिसे कथित तौर पर 15 नवंबर, 1966 से 15 दिसंबर, 1967 तक प्वाइंट प्लेजेंट क्षेत्र में देखा गया था। पहली अखबार की रिपोर्ट 16 नवंबर, 1966 को प्वाइंट प्लेजेंट रजिस्टर में प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक था " जोड़ों ने मनुष्य के आकार का पक्षी...जीव...कुछ देखा"।प्रेस ने जल्द ही रिपोर्टों को उठाया और कहानी को संयुक्त राज्य भर में फैलाने में मदद की। ऐसा माना जाता है कि किंवदंती का स्रोत प्रवासी रेतीले सारस या बगुलों को देखे जाने से उत्पन्न हुआ है।

मोथमैन ( Mothman )

मोथमैन की एक कलात्मक छाप

इस प्राणी को 1970 में ग्रे बार्कर द्वारा व्यापक दर्शकों के सामने पेश किया गया था और बाद में जॉन कील ने अपनी 1975 की पुस्तक द मोथमैन प्रोफेसीज़ में इसे लोकप्रिय बनाया। बाद में इस किताब पर 2002 में रिचर्ड गेरे अभिनीत फिल्म बनी।

इतिहास

15 नवंबर, 1966 को, प्वाइंट प्लेजेंट के दो युवा जोड़ों - रोजर और लिंडा स्कारबेरी और स्टीव और मैरी मैलेट ने पुलिस को बताया कि उन्होंने एक बड़े काले प्राणी को देखा था, जिसकी आँखें "लाल चमक रही थीं", सड़क के किनारे खड़ा था। स्कारबेरी ने इसे सफेद पंखों वाला लगभग सात फीट "लंबा, पतला, मांसल आदमी" बताया और कहा कि इसकी आंखों के सम्मोहक प्रभाव के कारण वह इसके चेहरे को पहचानने में असमर्थ थी। परेशान होकर, प्रत्यक्षदर्शियों ने तेज गति से गाड़ी चलायी और कहा कि वह जीव चीखने की आवाज करते हुए उनकी कार के पीछे उड़ गया। इसने प्वाइंट प्लेज़ेंट शहर की सीमा तक उनका पीछा किया।

मोथमैन ( Mothman )

स्थानीय समाचार पत्रों की रिपोर्ट के बाद, अगले कुछ दिनों के दौरान, अन्य लोगों ने भी इसी तरह देखे जाने की सूचना दी। इसे देखने वाले दो स्वयंसेवी अग्निशमन कर्मियों ने कहा कि यह "लाल आँखों वाला एक बड़ा पक्षी" था। मेसन काउंटी शेरिफ जॉर्ज जॉनसन ने टिप्पणी की कि उनका मानना ​​है कि ये दृश्य असामान्य रूप से बड़े बगुले के कारण हुए थे, जिसे उन्होंने "शिटेपोक" कहा था। ठेकेदार नेवेल पार्ट्रिज ने जॉनसन को बताया कि जब उसने पास के मैदान में एक प्राणी पर टॉर्च का लक्ष्य रखा, तो उसकी आँखें "साइकिल रिफ्लेक्टर की तरह" चमक उठीं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपने टेलीविज़न सेट से आने वाली भनभनाहट की आवाज़ और अपने जर्मन शेफर्ड कुत्ते के गायब होने के लिए उस प्राणी को जिम्मेदार ठहराया।

वेस्ट वर्जीनिया विश्वविद्यालय में वन्यजीव जीवविज्ञानी रॉबर्ट एल. स्मिथ ने संवाददाताओं से कहा कि विवरण और दृश्य सभी सैंडहिल क्रेन पर फिट बैठते हैं। एक बड़ी अमेरिकी क्रेन लगभग एक आदमी जितनी लंबी होती है, जिसके सात फुट के पंख होते हैं और आंखों के चारों ओर लाल रंग के घेरे होते हैं। हो सकता है कि पक्षी अपने प्रवास मार्ग से भटक गया हो और इसलिए पहले उसे पहचाना नहीं गया क्योंकि वह इस क्षेत्र का मूल निवासी नहीं था।

15 दिसंबर, 1967 को सिल्वर ब्रिज के ढहने और 46 लोगों की मौत के बाद, इस घटना ने किंवदंती को जन्म दिया और मोथमैन को देखे जाने को पुल के ढहने से जोड़ा।

जॉर्जियाई अखबार स्वोबोडनया ग्रुज़िया के अनुसार, रूसी यूएफओलॉजिस्ट का दावा है कि मॉस्को में मोथमैन को देखे जाने से 1999 के रूसी अपार्टमेंट बम विस्फोटों का पूर्वाभास हुआ। 

द मोथमैन प्रोफेसीज़ (2002) एक प्रमुख मोशन पिक्चर है, जो जॉन कील की इसी नाम की 1975 की किताब पर आधारित है।

2016 में, WCHS-TV ने मेसन काउंटी में रूट 2 पर गाड़ी चलाते समय एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा ली गई मोथमैन की कथित तस्वीर प्रकाशित की। विज्ञान लेखक शेरोन ए. हिल ने प्रस्तावित किया कि फोटो में "एक पक्षी, शायद एक उल्लू, एक मेंढक या सांप को ले जाते हुए दिखाया गया है" और लिखा कि "यह संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि यह मोथमैन है जैसा कि किंवदंती में वर्णित है।

English Translate

Mothman

In West Virginian folklore, the Mothman is a humanoid creature who was reportedly seen in the Point Pleasant area from November 15, 1966, to December 15, 1967. The first newspaper report was published in the Point Pleasant Register on November 16, 1966, with the headline "Joints saw man-sized bird...creature...something". The press soon picked up the reports and combined the story Helped spread across the state. The legend is believed to originate from sightings of migratory sand storks or herons.

मोथमैन ( Mothman )

An artistic impression of the Mothman

The creature was introduced to a wider audience by Gray Barker in 1970 and later popularized by John Keel in his 1975 book The Mothman Prophecies. This book was later made into a film in 2002 starring Richard Gere.

History

On November 15, 1966, two young couples from Point Pleasant - Roger and Linda Scarberry and Steve and Mary Mallett - told police that they had seen a large black creature, whose eyes were "glowing red", standing on the side of the road. . Scarberry described it as a "tall, thin, muscular man" about seven feet tall with white wings and said that she was unable to recognize its face due to the hypnotic effect of its eyes. Alarmed, witnesses drove away at high speed and said the creature flew past their car while making a screaming noise. It chased them to the Point Pleasant city limits.

Following local newspaper reports, over the next few days, others reported similar sightings. Two volunteer firefighters who saw it said it was "a large bird with red eyes". Mason County Sheriff George Johnson commented that he believed the sightings were caused by an unusually large heron, which he referred to as a "shitepoke". Contractor Newell Partridge told Johnson that when he aimed a flashlight at a creature in a nearby field, its eyes flashed "like bicycle reflectors." Additionally, he attributed the buzzing noises coming from his television set and the disappearance of his German Shepherd dog to the creature.

Wildlife biologist Robert L. Smith told reporters that the description and scene all fit the sandhill crane. A great American crane is almost as tall as a man, with a seven-foot wingspan and red rings around the eyes. The bird may have strayed from its migration route and was therefore not identified at first because it was not native to the area.

मोथमैन ( Mothman )

Following the collapse of the Silver Bridge on December 15, 1967, killing 46 people, the event gave rise to the legend and linked Mothman sightings to the bridge collapse.

According to the Georgian newspaper Svobodnaya Gruzia, Russian UFOlogists claim Mothman sightings in Moscow foreshadowed the 1999 Russian apartment bombings.

The Mothman Prophecies (2002) is a major motion picture based on the 1975 book of the same name by John Kiel.

In 2016, WCHS-TV published a purported photo of the Mothman taken by an unknown person while driving on Route 2 in Mason County. Science writer Sharon A. Hill proposed that the photo "depicts a bird, probably an owl, carrying a frog or a snake" and wrote that "there is no reason to doubt that this is the Mothman as described in legend.

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श्री हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या (Shri Hanuman Garhi Mandir, Ayodhya)

श्री हनुमानगढ़ी मंदिर

अयोध्‍या में 22 जनवरी दिन इतिहास के पन्‍नों पर दर्ज हो गया है। राम मंदिर में 22 जनवरी को रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्‍ठा हुई। अयोध्‍या को मूर्ति और मंदिरों का गढ़ कहा जाता है। यहां एक से बढ़कर एक मूर्तियां और करीब 8000 मठ और मंदिर हैं। इनमें सबसे मशहूर है श्री हनुमान गढ़ी मंदिर (Shri Hanuman Garhi Mandir)


श्री हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या (Shri Hanuman Garhi Mandir, Ayodhya)

अयोध्या की सरयू नदी के दाहिने तट पर ऊंचे टीले पर स्थित है। हनुमानगढ़ी मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तजनों को 76 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यहां बजरंगबली के दर्शन किए बिना रामलला की पूजा अधूरी मानी जाती है। हनुमानगढ़ी भगवान बजरंगबली का घर कहा गया है। जब भगवान राम, हनुमान जी सहित लंका विजय करने के बाद अयोध्या आए थे तब से ही हनुमान जी यहां एक गुफा में रहने लगे थे और रामजन्मभूमि और रामकोट की रक्षा करते थे। 

श्री हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या (Shri Hanuman Garhi Mandir, Ayodhya)

यहां पर लंका से जीत के बाद लाए गए निशान भी रखे गए हैं। हनुमानगढ़ी मंदिर में एक खास‘हनुमान निशान' है, जो करीब 4 मीटर चौड़ा और 8मीटर लंबा ध्वज है। मान्यता है हर पूजा से पहले करीब 200 लोग इसे पकड़कर जन्मभूमि स्थल ले जाते हैं। जहां सबसे पहले इसकी पूजा की जाती है। 

यह मंदिर कई गुप्‍त रहस्‍य लिए बैठा है। आखिर क्‍याें इतनी मान्‍यता है हनुमानगढ़ी की और क्‍या है इस मंदिर का गुप्‍त रहस्‍य? इस मंदिर को लेकर कई कहानियां और मान्यताएं हैं। कहते हैं कि लंका से लौटने के बाद भगवान राम ने अपने प्रिय भक्‍त हनुमान को यह जगह रहने के लिए दी थी। इस लिए इस जगह को हनुमानजी का घर भी कहते हैं। अथर्ववेद के अनुसार, भगवान राम ने हनुमान जी को कहा था कि जब भी कोई अयोध्‍या में मेरे दर्शन करने आएगा, उससे पहले उसे तुम्‍हारे यानी हनुमानजी के दर्शन करने होंगे। इसलिए आज भी लोग रामलला के दर्शन से पहले हनुमानगढ़ी जाते हैं।

300 साल पहले हुई थी मंदिर की स्‍थापना 

प्राचीन सिद्धपीठ हनुमानगढ़ी को अधोध्या का सबसे प्रसिद्ध हनुमान मंदिर माना जाता है। हनुमानगढ़ी मंदिर की स्थापना करीब 300 साल पहले स्वामी अभयराम जी अभयारामदासी के निर्देश में सिराजुद्दौला ने की थी। यह मंदिर अयोध्‍या शहर के बीचों बीच ऊंचे टीले पर स्थित है। इसके दक्षिण में अंगद और सुग्रीव टीली भी बना हुआ है। हनुमानगढ़ी बनवाने के पीछे के रोचक कहानी है। कहते हैं यहां जब नवाब शुजाऊद्दौला के शहजादे गंभीर बीमार हुआ तो चिकित्सकों ने भी हाथ टेक दि थे। नवाब परेशान हो गये तो हिंदू मंत्रियों ने बाबा अभयराम और उन पर हनुमान जी की कृपा के बारे में नवाब को बताया। जब अभयराम ने कुछ मंत्र पढ़कर हनुमानजी के चरणामृत का जल नवाब के बेटे पर छिड़का, तो उसकी सांसे लौट आईं। नवाब ने इसे चमत्कार माना और अभयराम जी से हनुमानगढ़ी बनवाने की बात कही। 

श्री हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या (Shri Hanuman Garhi Mandir, Ayodhya)

आज भी बने हैं हनुमान निशान   

हनुमानगढ़ी में हनुमान जी की प्रतिमा दक्षिणमुखी है। यहां दिखने वाले हनुमान निशान लोगों को आश्चर्यचकित कर देते हैं। यह एक चार मीटर चौड़ा और आठ मीटर लंबा ध्‍वज है, जो लंका से विजय का प्रतीक है। इसके साथ एक गदा और त्रिशूल भी रखा है। कोई भी शुभ कार्य करने से पहले अयोध्‍या में हनुमान निशान ले जाया जाता है। लगभग 20 लोग इस निशान को हनुमानगढ़ी से राम जन्‍म भूमि तक तक ले जाते हैं। पहले इसकी पूजा होती है और फिर किसी कार्य की शुरुआत की जाती है।

गुप्‍त रूप से बजरंग बली देते हैं दर्शन

हनुमानगढ़ी जैसी गुप्‍त पूजा पद्धति बहुत‍ विशेष है। देश में ऐसी पूजा और कहीं नहीं होती। हनुमानगढ़ी में यह परंपरा सर्दियों से चली आ रही है। दरअसल, एक गुप्‍त पूजा होती है। जिसमें पुजारियों के अलावा किसी और को आने की अनमुति नहीं होती। यह पूजा सुबह 3 बजे होती है, जिसमें खुद पवन पुत्र हनुमान पूजा में सम्‍मलित 8 पुजारियों को साक्षात दर्शन देते हैं। यह पूजा करीब डेढ़ घंटे की होती है। सबसे अजीब बात तो यह है कि ये पुजारी न तो इस पूजा के बारे में किसी को कुछ बताते हैं और न ही कभी चर्चा करते हैं। क्‍योंकि उनकी भी एक मर्यादा है। बता दें कि मंदिर के पट सुबह 4 बजे श्रद्धालुओं के लिए खुल जाते हैं, जो रात 10 बजे तक खुले रहते हैं।

श्री हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या (Shri Hanuman Garhi Mandir, Ayodhya)

English Translate

Shri Hanuman Garhi Temple

22 January has been recorded in the pages of history in Ayodhya. The idol of Ramlala was consecrated in the Ram temple on 22 January. Ayodhya is called the fort of statues and temples. There are many statues and about 8000 monasteries and temples here. The most famous among these is Shri Hanuman Garhi Temple.

श्री हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या (Shri Hanuman Garhi Mandir, Ayodhya)

Ayodhya is situated on a high mound on the right bank of the Saryu river. To reach Hanumangarhi temple, devotees have to climb 76 stairs. Here the worship of Ramlala is considered incomplete without seeing Bajrangbali. Hanumangarhi is said to be the home of Lord Bajrangbali. When Lord Ram along with Hanuman ji came to Ayodhya after conquering Lanka, Hanuman ji started living in a cave here and used to protect Ramjanmabhoomi and Ramkot.

श्री हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या (Shri Hanuman Garhi Mandir, Ayodhya)

The souvenirs brought after the victory from Lanka are also kept here. Hanumangarhi temple has a special 'Hanuman Nishan', which is a flag about 4 meters wide and 8 meters long. It is believed that before every puja, about 200 people hold it and take it to the birthplace. Where it is worshiped first.

This temple holds many hidden secrets. After all, why is Hanumangarhi so recognized and what is the secret of this temple? There are many stories and beliefs regarding this temple. It is said that after returning from Lanka, Lord Rama gave this place to his beloved devotee Hanuman to live. That is why this place is also called Hanumanji's house. According to Atharvaveda, Lord Ram had told Hanumanji that whenever anyone comes to Ayodhya to visit him, first he will have to see you i.e. Hanumanji. That is why even today people go to Hanumangarhi before having the darshan of Ramlala.

The temple was established 300 years ago

Ancient Siddhpeeth Hanumangarhi is considered to be the most famous Hanuman temple of Adhodhya. Hanumangarhi Temple was established about 300 years ago by Siraj-ud-Daula under the instructions of Swami Abhayaram Ji Abhayaramadasi. This temple is situated on a high mound in the middle of Ayodhya city. Angad and Sugriva mounds are also built to its south. There is an interesting story behind the construction of Hanumangarhi. It is said that when Nawab Shuja-ud-Daula's prince became seriously ill, even the doctors had given up. When the Nawab got worried, the Hindu ministers told the Nawab about Baba Abhayram and Hanuman ji's blessings on him. When Abhayram recited some mantras and sprinkled Hanumanji's Charanamrit water on the Nawab's son, his breathing came back. The Nawab considered it a miracle and asked Abhayram ji to get Hanumangarhi built.

श्री हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या (Shri Hanuman Garhi Mandir, Ayodhya)

Hanuman marks are still there today

The statue of Hanuman ji in Hanumangarhi faces south. The Hanuman marks seen here surprise people. It is a four meter wide and eight meter long flag, which symbolizes victory over Lanka. A mace and trident are also kept with it. Before doing any auspicious work, Hanuman Nishan is taken to Ayodhya. About 20 people carry this trail from Hanumangarhi to Ram Janmabhoomi. First it is worshiped and then some work is started.

Bajrang gives darshan secretly

The secret worship method like Hanumangarhi is very special. Such puja is not done anywhere else in the country. This tradition has been going on in Hanumangarhi since winter. Actually, there is a secret worship. In which no one else is allowed to enter except the priests. This puja takes place at 3 am in the morning, in which Pawan's son Hanuman himself gives physical darshan to the 8 priests participating in the puja. This puja lasts for about one and a half hours. The strangest thing is that these priests neither tell anything about this puja to anyone nor discuss it. Because they also have a dignity. Let us tell you that the doors of the temple open for devotees at 4 am in the morning and remain open till 10 pm.

फूलों से रोगों का इलाज

फूलों से रोगों का इलाज

आज हर किसी का मन मोह लेने वाले पुष्प / फूल की चर्चा करेंगे। भारतीय आयुर्वेद (Ayurveda) में विभिन्न प्रकार के फूलों का प्रयोग बहुत पहले से ही होता रहा है। कहते हैं कि कुछ खास प्रकार के फूल बीमारियों को ठीक करने में सक्षम होते हैं। इन फूलों का इस्तेमाल औषधि के रूप में किया जाता है। फूल हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग हैं, जो न केवल हमारे आसपास की सुंदरता को बढ़ाते हैं, बल्कि पोषण और औषधीय उपयोग के लिए भी प्रयोग में लाये जाते हैं। 

गुलब्बास या कृष्ण कली  || Gulabbas or Krishnakali ||

जन्मदिन से लेकर अंत्येष्टि संस्कार तक इनके बिना अधूरे रहते हैं। भावुक और रसिक दोनों के हृदय में आनंद उत्पन्न करने में समर्थ, कामिनी और विरही दोनों के हृदय को अपनी ओर अनुरक्त करते हैं। फूलों के रस से विशेष लेप तैयार किया जा सकता है, जिसको बाह्य रूप से त्वचा पर लगाने से, उसकी सुगंध हृदय तथा नाक तक प्रभाव दिखाकर मन को प्रफुल्लित करती है। सबसे अच्छी बात यह है कि इससे अन्य दुष्प्रभाव नहीं पड़ते।

पुष्पों के औषधीय प्रयोग-

पुष्प शीत-गरमी-वर्षा पूरे वर्ष रंग-बिरंगे, परस्पर प्रतिस्पर्धा करते हुए, विभिन्न आकार-प्रकार में दृष्टिगोचर होते हैं। फूलों को शरीर पर धारण करने से शोभा, कांति, सौंदर्य और श्री की वृद्धि होती है। फूलों की सुगंध रोग नाशक भी है। इनके सुगंधित परमाणु वातावरण में घुलकर नासिका की झिल्ली में पहुँचकर अपनी सुगंध का एहसास कराते हैं, जिससे मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर प्रभाव दिखाकर उत्तेजना-सी अनुभव कराते हैं। जिनका मस्तिष्क, हृदय, आँख, कान, पाचन क्रिया, रति क्रिया पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। थकान को तुरंत दूर करते हैं। इसकी सुगंध से की गयी उपचार-प्रणाली को ‘ऐरोमा थैरेपी’ कहते हैं। पुष्पों के कुछ औषधीय प्रयोग निम्न हैं-

कमल (Lotus or Kamal)

कमल के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

कमल और लक्ष्मी का संबंध अविभाज्य है। कमल सृष्टि की वृद्धि का द्योतक है। इसके पराग से मधुमक्खी शहद तो बनाती ही है, इसके फूलों के गुलकंद का प्रत्येक प्रकार के रोगों में, कब्ज निवारण के लिए उपयोग किया जाता है। फूल के अदंर हरे रंग के दाने-से निकलते हैं जिन्हें भूनकर मखाने बनाये जाते हैं, लेकिन उनको कच्चा छीलकर खाना स्तंभन में उपनयोगी होता है। इसका गुण शीत वीर्य है। इसका प्रयोग सबसे अधिक अंजन की भांति नेत्रों में ज्योति बढ़ाने के लिए, शहद में मिलाकर किया जाता है। इसी कारण आँख को ‘कमल नयन’ भी कहते हैं। पंखुड़ियों को पीसकर उबटन में मिलाकर मलने से चेहरे की सुंदरता बढ़ती है।

कमल के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

 केवड़ा (Kevda)

केवड़ा || Kevda || Kewra || keora

इसकी गंध कस्तूरी-जैसी मादक होती है। इसके पुष्प दुर्गन्धनाशक मदनोन्मादक हैं। इसका तेल उत्तेजक श्वास विकार में लाभकारी है। सिरदर्द और गठिया में इसका इत्र उपयोगी है। इसकी मंजरी का उपयोग पानी में उबालकर कुष्ठ, चेचक, खुजली, हृदय रोगों में स्नान करके किया जा सकता है। इसका अर्क पानी में डालकर पीने से सिरदर्द तथा थकान दूर होती है। बुखार में एक बूँद देने से पसीना बाहर आता है। इत्र की दो बूँद कान में डालने से दर्द ठीक हो जाता है।

केवड़ा के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Gulab : गुलाब-गुलाब के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

आशिक मिजाजी, प्रेम का प्रतीक गुलाब है। इसका गुलकंद रेचक है, जो पेट व आँतों की गरमी शांत कर हृदय को प्रसन्नता प्रदान करता है। गुलाब जल से आँखें धोने से आँखों की लाली, सूजन कम होती है। इसका इत्र कामोत्तेजक है। इसका तेल मस्तिष्क को ठंडा रखता है। गुलाब का अर्क मिठाइयों में प्रयोग किया जाता है। गर्मी में इसका प्रयोग शीतवर्द्धक है।

गुलाब के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

चंपा (Plumeria)

चंपा || Plumeria || Champa ||

इसके फूलों को पीसकर कुष्ठ रोग के घाव में लगाया जा सकता है। इसका अर्क रक्त के कृमि को नष्ट करता है। फूलों को सुखाकर चूर्ण खुजली में उपयोगी है। ज्वरहर, मूत्रल, नेत्र ज्योति वर्द्धक तथा पुरुषों को रतिदायक उत्तेजना प्रदान करता है। कहावत है ‘चंपा एक चमेली सौ’ अर्थात सौ चमेली पुष्पों के बराबर एक चंपा पुष्प होता है।

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सौंफ.. Indian Sweet Fennel.. Saunf.. (शतपुष्पा)-

सौंफ । Indian Sweet Fennel । Saunf

सौंफ के पुष्पों को पानी में डालकर उबालें, साथ में एक बड़ी इलायची तथा कुछ पोदीना के पत्ते भी लें। अच्छा यह रहेगा कि मिट्टी के बर्तन में उबालें। पानी को ठंडा करके दाँत निकलने वाले बच्चे या छोटे बच्चे जो गर्मी से पीड़ित हों, एक-एक चम्मच कई बार दें, तो उनको पेट में पीड़ा इत्यादि शांत होगी तथा दाँत भी ठीक प्रकार निकलेंगे।

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धतूरा

यह मादक तथा विषैला पौधा है, जिनको उन्माद रोग के कारण अनिद्रा रोग हो, उन्हें फूलों को एकत्रित करके बारीक कपड़े में बाँधकर सिरहाने रखने से निद्रा आना शुरू हो जाती है।


गेंदा (Marigold)

गेंदा के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

मलेरिया के मच्छरों का प्रकोप सारे देश में है, लेकिन इनकी खेती यदि गंदे नालों और घर के आसपास की जाए, तो इसकी गंध से मच्छर दूर भागते हैं। यह जंगली फूलों वाला पौधा है, जो आसानी से एक बार बोने पर लग जाता है। लीवर की सूजन, पथरी-नाशक, चर्मरोगों में इसका प्रयोग किया जा सकता है।

गेंदा के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

 बेला (Jasmine)

बेला || jasmine

अत्यधिक सुगंध का गर्मी में अधिकता से फूलने वाला पौधा है, लेकिन आजकल घरों में इसे कम लगाते हैं। गर्मी में इसके हार या पुष्पों को अपने पास रखने से पसीने में गंध नहीं आती है। महिलाएँ इसको केश-सज्जा में बहुत प्रयोग करती हैं। इसकी सुगंध प्रदाह नाशक है। स्त्रियों के गर्भाशय में उत्तेजना को प्रदान करने वाला एकमात्र पुष्प है, रतिदायक है। इसकी कलियाँ चबाने से मासिक खुलकर आता है।

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रात की रानी 

रात की रानी || Night blooming jasmine

इसकी गंध इतनी तीव्र होती है कि पड़ोसियों तक को लुभायमान कर देती है। यह सायं ७ से ११ बजे रात्रि तक खुशबू अधिक देता है। इसके बाद सुप्त हो जाता है। इसकी गंध में मच्छर नहीं आते। इसकी गंध मादकता और निद्रादायक है।

रात की रानी के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

सूरजमुखी (Sunflower)

सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

विटामिन ए/डी होता है। सूर्य की रोशनी न मिलने के कारण होने वाले रोगों को रोकता है। इसकी खेती व्यापारिक स्तर पर लाभकर है। इसका तेल हृदय रोगों में कोलेस्ट्रोल को कम करता है।

सूरजमुखी के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

चमेली

चर्म रोगों की औषधि, पायरिया, दंतशूल, घाव, नेत्ररोगों और फोड़ों-फुंसियों में इसका तेल बनाकर उपयोग किया जाता है। इसका तेल बाजीकरण में मालिश के योग्य है। शरीर में रक्त संचार की मात्रा बढ़ाकर स्फूर्तिदायक बन जाता है। इसके पत्ते चबाने से मुँह के छाले तुरंत दूर होते हैं। इसकी माला रति इच्छा बढ़ाने में सहायक है।

केसर

मन को प्रसन्न करता है। चेहरे को कांतिवान बनाता है। रज दोषों का नाशक, शक्तिवर्द्धक, वमन को रोककर वात, पित्त, कफ (त्रिदोषों का) नाशक है। तंत्रिकाओं में व्याप्त उद्विगन्ता एवं तनाव को केसर शांत रखता है, इसलिए इसे प्रकृति प्रदत्त ‘ट्रैंकुलाइजर’ भी कहा जाता है। यह काम तथा रति में उद्दीपन का कार्य करता है, अतः दूध या पान के साथ सेवन योग्य है।

अशोक (Ashok)

अशोक का पेड़ || Ashok Tree ||

यह मदन वृक्ष भी कहलाता है। इसके फूल, छाल, पत्तियों का स्त्रियों की औषधि में उपयोग किया जा सकता है। अशोक का अर्थ है जिसको पाकर शोक न रहे। छाल का आसव बनाकर पीने से स्त्रियों की अधिकांश बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं।

अशोक के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

पलाश (Butea gum),ढाक

पलाश || Butea gum ||

इसको अप्रतिम सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इसके गुच्छेदार फूल बहुत दूर से ही आकर्षित करते हैं। इसी आकर्षण के कारण वन की ज्योति भी कहते हैं। इसका चूर्ण पेट के किसी भी प्रकार के कृमि का हनन करने में सहायक है। इसके पुष्पों को पानी के साथ पीसकर लुगदी बनाकर पेडू पर रखने से पथरी के कारण दर्द होने या मूत्र न उतरने पर मूत्रल का कार्य करता है।

पलाश के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

गुड़हल (Gudhal)(जवा)

गुड़हल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

गणेश एवं काली देवी का प्रिय है। इसका पूर्ण संबंध गर्भाशय से है। ऋतु काल के बाद यदि फूल को घी में भूनकर महिलाएँ सेवन करें, तो उन्हें ‘गर्भ-निरोध’ हो सकता है। मुँह के छाले दूर हो जाते हैं। इसके फूलों को पीसकर बालों में लेप लगाने से बालों का गंजापन मिटता है। यह उन्माद को दूर करने वाला एकमात्र पुष्प है। शीतवर्द्धक, वाजीकारक, रक्तशोधक, सूजाक रोग में गुलकंद या शरबत बनाकर दिया जा सकता है। शरबत हृदय को फूल की भाँति प्रफुल्लित करने वाला रुचिकर है।

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शंखपुष्पी (विष्णुकांत)

गर्मियों में इसकी उत्पत्ति अधिक होती है। यह घास की तरह है। फूल-पत्ते तथा डंठल तीनों को उखाड़कर पीसकर पानी में मिलाकर छान लें, इसमें शहद या मिश्री मिलाकर पीने से शाम तक मस्तिष्क में ताजगी रहती है। कार्यालयों में बैठकर काम करने पर सुस्ती नहीं आएगी इसका सेवन विद्यार्थियों को अवश्य करना चाहिए।

बबूल (कीकर)

फूलों को पीसकर सिर में लगाने से सिरदर्द गायब हो जाता है। इसका लेप दाद और एग्जिमा पर लगाने से चर्म रोग दूर होता है। इसके अर्क के सेवन से रक्त विकार दूर होते हैं। यह खाँसी और श्वास रोग में लाभकारी है। इसके कुल्ले दंतक्षय को रोकते हैं।

 नीम (Neem)

नीम (Neem)

फूलों को पीसकर लुग्दी बनाकर फोड़े-फुंसी पर रखने से जलन व गर्मी दूर होती है। इनको शरीर पर मलकर स्नान करने से दाद दूर हो जाता है। फूलों को पीसकर पानी में घोलकर छान दें। इसमें शहद मिलाकर पीयें, तो वजन कम होता है तथा रक्त साफ होता है। यह संक्रामक रोगों से रक्षा कारक है।

नीम के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

लौंग (Clove)

लौंग के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

आमाशय और आँतों में रहने वाले उन सूक्ष्म कीटाणुओं को नष्ट करते हैं जिसके कारण मनुष्य का पेट फूलता है। रक्त के श्वेत कणों में वृद्धि करके शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति की वृद्धि करते हैं, शरीर तथा मुँह की दुर्गंध का नाश करती हैं। शरीर के किसी भी हिस्से पर घिसकर लगाने से दर्दनाशक का काम करते हैं। दाढ़ या दंतशूल में मुख में डालकर चूसा जाता है। यज्ञ द्वारा इसका प्रयोग करने से शरीर में अनावश्यक जमा तत्वों को पसीने द्वारा बाहर निकाल देते हैं।

लौंग के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

चांदनी-Crepe Jasmine (जूही)

चांदनी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

फूलों का चूर्ण या गुलकंद अम्लपित्त को नष्ट कर पेट के अल्सर व छाले को दूर करता है। इसके निरंतर सानिध्य में रहने से क्षय रोग नहीं होता।

जूही के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

माधवी

चर्म रोगों के निवारण के लिए इसके चूर्ण का लेप किया जाता है। गठिया रोग में प्रातःकाल फूलों को चबाने से आराम मिलता है। इसके फूल श्वास रोग भी हरते हैं।

कुसुम

इस फूल की कलियाँ मासिक धर्म के बाद खाने से गर्भ निरोध होते देखा गया है।

हरसिंगार (पारिजात)

पारिजात / हरसिंगार / Harsingar/ Parijat

गठिया रोगों का नाशक, इसका लेप चेहरे की कांति को बढ़ाता है। इसकी सुगंध ही रात्रि को मादकता प्रदान करती है।

पारिजात के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

आक

इसका फूल कफ नाशक है। प्रदाह कारक भी है। यदि पीलिया में पान में रखकर एक या दो कली तीन दिन तक दी जाए, तो काफी हद तक आराम होगा।

कदंब

पार्वती एवं कृष्ण प्रिय वृक्ष है। रसिक लोगों का मदन वृक्ष यही कहलाता है। कदंब वृक्ष पुराण वृक्ष है। इसको कल्प वृक्ष की संज्ञा भी प्राप्त है। यह कामोत्तेजक वृक्ष है। गाय की बीमारी में इसकी फूल-पत्ती वाली टहनी लेकर गौशाला में लगा देने से बीमारी दूर होती है। मदिरा या वारुणी बनाने में इसका प्रयोग है। वर्षा ऋतु में पल्लवित होने वाला गोपी प्रिय वृक्ष है जिसकी वृंदावन में बहुतायत है।

कचनार

इसकी कली शरद ऋतु में आती है तथा इसका उपयोग सब्जी व अचार बनाने हेतु होता है। इसकी कलियाँ बार-बार मल त्याग की प्रवृत्ति को रोकती हैं। छाल एवं फूल को जल के साथ मिलाकर पुलटिस तैयार की जाती है, जो जले घाव एवं फोड़े के उपचार में उपयोगी है।

शिरीष

यह जंगली, तेज सुगंध वाला वृक्ष है। इसकी सुगंध जब तेज हवा के साथ आती है, तो आदमी मस्त-सा हो जाता है। खुजली में फूल पीसकर लगाना चाहिए, शिरीष के फूलों के काढ़े से नेत्र धोने से किसी भी प्रकार के विकारों को लाभ मिलेगा।

नागकेशर

यह कौंकण और गोवा में होता है। यह खुजली नाशक है। यह लौंग-जैसी लंबी डंठी में लगा रहता है। इसके (फूलों) का चूर्ण बनाकर मक्खन में साथ या दही के साथ खाने से रक्तार्श में लाभ होता है। इसका चूर्ण गर्भ धारण में भी सहायक है।

मौलसिरी (बकुल)

इसका प्रसिद्ध नाम मौलसिरी है। आदिवासी स्त्रियाँ इसका प्रयोग श्रृंगार में फूलों के आभूषण बनाकर प्रयोग करती हैं। इसके पुष्प तेल में मिलाकर इत्र बनाते हैं। इसके फूलों का चूर्ण बनाकर त्वचा पर लेप करने से त्वचा अधिक कोमल हो जाती है। इसके फूलों का शर्बत स्त्रियों के बाँझपन को दूर कर सकने में समर्थ है।

अमलतास (Amaltash)

अमलतास के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

ग्रीष्म में फूलने वाला गहरे पीले रंग के गुच्छेदार पुष्पों का पेड़ दूर से देखने में ही आँखों को प्रिय लगता है। फूलों का गुलकंद बनाकर खाने से कब्ज दूर होता है। लेकिन अधिक मात्रा में सेवन करने से दस्तावर, जी मिचलाना एवं पेट में ऐंठन उत्पन्न करता है।

अमलतास के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

 अनार (Pomegranate)

अनार (Pomegranate)

शरीर में पित्ती होने पर, अनार के फूलों का रस मिश्री मिलाकर पीना चाहिए। मुँह के छालों में फूल रखकर चूसना चाहिए। आँख आने पर कली का रस आँख में डालना चाहिए।

इन फूलों के पौधों की भीतरी कोशिकाओं में विशेष प्रकार के प्रदव्यी झिल्लियों के आवरण वाले कण कहलाते हैं इन्हें लवक (प्लास्टिड्स) कहते हैं। यह कण जीवित रहते हैं, जब तक फूलों का रंग समाप्त न हो जाए। यह लवक दो प्रकार के होते हैं। इनमें रंगीन लवकों को ‘वर्णी लवक’ कहते हैं। वर्णी लवक ही फूल पौधों को विभिन्न रंग प्रदान करते हैं। वर्णी लवक का आकार निश्चित नहीं होता, बल्कि लवक विभिन्न पौधों में अलग-अलग रचना वाले होते हैं। पौधों में सबसे महत्वपूर्ण लवक है हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट), हरा लवक पौधों में हरा रंग ही नहीं देता, बल्कि पौधों में भोजन का निर्माण भी करता है। हरित लवक कार्बन डाइऑक्साइड, गैस, जल और सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ग्लूकोस-जैसे कार्बोहाइड्रेट पदार्थ का निर्माण करते हैं।

अनार के फूल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

पुष्पों के देवता कामदेव

पुष्प सूर्य से क्रिया करके अपनी रंगीन किरणें हमारी आँखों तक पहुँचाते हैं, जिससे शरीर को ऋणात्मक, घनात्मक तथा कुछ न्यूट्रल प्रकाश की किरणें मिलती हैं, जो शरीर के अंदर पहुँचकर विभिन्न प्रकार के रोगों को रोकने में सहायता प्रदान करती हैं। इस प्रकार हम ‘कलर थैरेपी’ द्वारा-चिकित्सा के लाभ ले सकते हैं। फूलों का चिकित्सा में महत्व के अलावा काफी हद तक उपासना में प्रयोग होता है। अलग-अलग देवताओं के अलग-अलग पुष्प हैं क्योंकि पुष्पों की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग देव वर्ग में बाँटा गया है। उदाहरणार्थ शिव पर केतकी व चंपा, दुर्गा पर आक पुष्प, तगर का पुष्प सूर्य को, धतूरा, नीम, गुड़हल, कचनार, आक पुष्प विष्णु को नहीं चढ़ाये जाते। इस प्रकार तांत्रिक ग्रंथों में देवता और पुष्पों की एक लंबी सूची है। पुष्पों के प्रमुख देवता कामदेव हैं। उपासना के लिए प्रत्येक माह के अलग-अलग पुष्प हैं। दोपहर को स्नान के बाद पुष्प नहीं तोड़े जाते। पुष्पों को तोड़कर मिट्टी के बर्तन में कदापि न रखें, क्योंकि गंध को पृथ्वी तत्व तुरंत ग्रहण कर लेती है। फूलों की चमक या तेल तत्व को धातु (अग्नि तत्व) ग्रहण कर लेती है। प्लास्टिक या बाँस की टोकरी ज्यादा उपयोगी है।

पुष्प धोकर भी नहीं चढ़ाये जाते हैं। ‘सिद्धांत निर्णय सिंधु’ में कहा गया है कि किसी देवता की उपासना में उसके नाम के प्रथम अक्षर से मिलते जुलते पुष्प तथा औषधि का प्रयोग मंत्र तथा देवता की सिद्धि के लिए करना चाहिए। फूलों को पीसकर लेप व गंध बनाकर देवता तथा स्वयं को भी लगाया जाता है। पुष्पों का सार मधु होता है, मधु विद्या से संबंधित उपनिषद बृहदारण्यक है। पुष्पों के पराग को केसर कहते हैं। 

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला 

Born: 17 March 1962, Karnal
Died: 1 February 2003 (age 40 years), Texas, United States

सर्वविदित है कि कल्पना चावला भारतीय मूल की एक अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री थीं। कल्पना चावला, एक भारतीय अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री और अन्तरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी और अन्तरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं। कल्पना चावला को किसी भी परिचय की आवश्यकता नहीं है। यह एक ऐसा नाम है, जो सिर्फ भारत देश में ही नहीं अपितु पूरी दुनिया पर अपने नाम का डंका बजा चुका है। यह एक ऐसा नाम है, जो हर लड़की के लिए प्रेरणा रही है, जबकि वह अब इस दुनिया में नहीं हैं।

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला पहली भारतीय महिला अंतरिक्ष यात्री थीं। कल्पना चावला के पास हवाई जहाज और ग्लाइडर रेटिंग के साथ ही उड़ान प्रशिक्षक का लाइसेंस, एकल और बहू इंजन भूमि और सीप्लेन के लिए वाणिज्यिक पायलट का लाइसेंस था। इन्हें एरोबैटिक्स और टेलव्हील हवाई जहाज उड़ाने में मजा आता था। 

कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 को हरियाणा के करनाल में हुआ था उनके पिताजी बनारसी लाल चावला एक व्यवसाई थे और माता संयोगिता साधारण गृहणी थीं। उड़ने का शौक रखने वाली कल्पना चावला बचपन से ही बहुत ही साहसी थी। 13 साल की उम्र में उन्होंने उड़ान सीखने की इच्छा व्यक्त की थी। उनका बचपन अन्य लड़कियों से बिल्कुल अलग था। अन्य लड़कियां जिस उम्र में बार्बी डॉल से खेलने और  सजने सवरने का शौख रखती हैं, उस उमर में कल्पना चावला हवाई जहाजों की स्केचिंग और पेंटिंग बनाती थी। 

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला की प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल में हुई थी आगे की शिक्षा व मानिक अभियांत्रिकी में पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ में हुई। उन्हें 1982 में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि मिली। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए 1982 में चली गई और 1984 में वैमानिक अभियांत्रिकी में विज्ञान स्नातक की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की। 1986 में कल्पना चावला दूसरी विज्ञान में स्नातक की उपाधि पाए और 1988 में कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से वैज्ञानिक अभियंत्रिकी में विद्या वाचस्पति की उपाधि पाई। 

कल्पना चावला मार्च 1995 में नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुई और वह 1997 में अपनी पहली उड़ान के लिए चुनी गई थी उनका पहला अंतरिक्ष मिशन 19 नवंबर 1997 को अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान से शुरू हुआ। कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मे महिला थी और अंतरिक्ष में उड़ान भरने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थी प्रथम व्यक्ति राकेश शर्मा थे जिन्होंने 1984 में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थीं।

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

2000 में कल्पना चावला को sts-107 में अपनी दूसरी उड़ान के लिए कर्मचारी के तौर पर चुना गया। अभियान लगातार पीछे सरकता रहा क्योंकि विभिन्न कार्यों के नियोजित समय में टकराव होता रहा और कुछ तकनीकी समस्याएं भी आईं। 16 जनवरी 2003 को कल्पना चावला ने अंततः कोलंबिया पर चढ़कर sts-107 मिशन का आरंभ किया। उनकी जिम्मेदारियों में शामिल थे स्पेस हैब/बल्ले बल्ले/ फीस्टार लघु गुरुत्व प्रयोग, जिसके लिए कर्मचारी दल ने 80 प्रयोग किए। जिसके जरिए पृथ्वी व अंतरिक्ष विज्ञान उन्नत तकनीक विकास व अंतरिक्ष यात्री स्वास्थ्य व सुरक्षा का अध्ययन हुआ।

कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा हो गई सभी तरह के अनुसंधान तथा विचार विमर्श के उपरांत वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल में अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय जिस तरह की भयंकर घटना घटी अब वह इतिहास बन चुकी है नासा तथा विश्व के लिए यह एक दर्दनाक घटना थी 1 फरवरी 2003 को कोलंबिया अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही टूट कर बिखर गया देखते ही देखते अंतरिक्ष यान और उसमें सवार 7 यात्रियों के अवशेष टैक्सास नामक शहर पर बरसने लगे और सफल कहलाया जानेवाला अभियान दर्दनाक सत्य बन गया यह अंतरिक्ष यात्री तो सितारों की दुनिया में विलीन हो गए, लेकिन उनके अनुसंधान का लाभ पूरे विश्व को अवश्य मिला।

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला कहती थी कि मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूं प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूंगी। अंततः 1 फरवरी 2003 को उनकी यह बात सत्य हो गई।

पिता पुत्र के प्यार का अंतर : उपदेशात्मक कहानियां

पिता पुत्र के प्यार का अंतर

पापा पापा मुझे चोट लग गई खून आ रहा है, 5 साल के बच्चे के मुँह से सुनना था कि पापा सब कुछ छोड़ छाड़ कर गोदी में उठाकर एक किलोमीटर की दूरी पर क्लिनिक तक भाग-भाग कर ही पहुँच गए। दुकान कैश काउंटर सब नौकर के भरोसे छोड़ आये। सीधा डाक्टर के केबिन में दाखिल होते हुए।

पिता पुत्र के प्यार का अंतर : उपदेशात्मक कहानियां

डॉक्टर को बोले, देखिये डॉक्टर साहब मेरे बेटे को क्या हो गया है? डॉक्टर साहब ने देखते हुए कहा, अरे भाई साहब घबराने की कोई बात नहीं है मामूली चोट है। ड्रेसिंग कर दी है, जल्दी ठीक हो जायेगी। डॉक्टर साहब कुछ पेन किलर लिख देते तो दर्द कम हो जाता। अच्छी से अच्छी दवाईया लिख देते ताकि जल्दी ठीक हो जाये, घाव जल्दी भर जाये। 

डाक्टर-अरे भाई साहब क्यों इतने परेशान हो रहे हो कुछ नहीं हुआ है, हल्की चोट है, 3-4 दिन में ठीक हो जायेगा। बच्चे को लेकर लौटे तो नौकर बोला सेठ जी, आपका ब्रांडेड महंगा शर्ट खराब हो गया, खून लग गया अब ये दाग नहीं निकलेंगे। कोई नहीं ऐसे शर्ट बहुत आएंगे जायेंगे मेरे बेटे का खून बह गया वो चिंता खाये जा रही है। कमजोर नहीं हो जाये, तू जा एक काम कर, थोड़े सूखे मेवे फ्रूट ले आ, इसे खिलाना पड़ेगा और मैं इसको लेकर घर चलता हूँ।

40 साल बाद

दुकान शोरूम में तब्दील हो गई थी। भाई साहब का बेटा व्यापार बखूबी संभाल रहा था। भाई साहब रिटायर्ड हो चुके हैं, घर पर ही रहते थे। तभी घर से बेटे की बीवी का फोन आता है। ये आपके पापा पलंग से गिर गए हैं, सर पर से काफी खून आ रहा है। 

लड़का - अरे यार ये पापा भी न इनको बोला है जमीन पर सो जाया करो पर मानते हीे नही पलंग पर ही सोते है। अरे रामू काका जाओ तो घर पर, पापा को डॉक्टर अंकल के पास ले कर आओ। मैं आता हूँ सीधा हॉस्पिटल। बूढ़े हो चुके रामू काका धीरे चल कर घर जाते हैं। तब तक सेठजी का काफी खून बह चुका था। बहु मुँह चढ़ा कर बोली ले जाओ जल्दी, पूरा महंगा कालीन खराब हो गया है। 

काका जैसे तैसे जल्दी से रिक्शा में सेठजी को डाल कर क्लीनिक ले गए। बेटा अब तक नही पंहुचा था। काका ने फोन किया तो बोला अरे यार वो कार की चाबी नहीं मिल रही थी अभी मिली है। थोड़े कस्टमर भी हैं, आप लेकर बैठो मैं आता हूँ। 

जो दूरी 40 साल पहले एक बाप ने बेटे के सर पर खून देखकर बेटे को गोदी में उठा कर भाग कर 10 मिनिट में तय कर ली थी, उतनी दूरी बेटा 1 घन्टे में कार से भी तय नहीं कर पाया था। डाक्टर ने जैसे ही भाई साहब को देखा, उनको अंदर ले जाकर इलाज चालू किया। तब तक बेटा भी पहुँच गया। 

 डॉक्टर अंकल बोले, बेटे खून बहुत बह गया है एडमिट करना पड़ेगा। बेटा - अरे कुछ नहीं डाक्टर साहब आप ड्रेसिंग कर दो 2-4 दिन में ठीक हो जायेगा। डाक्टर अंकल बोले ठीक है, कुछ दवाईयाँ लिख देता हूँ थोड़ी महंगी है, लेकिन आराम जल्दी हो जायेगा। 

लड़का - अरे डॉक्टर अंकल चलेगा 4-5 दिन ज्यादा लगेंगे तो अब इतनी महंगी दवाइयों की क्या जरूरत? चलो मुझे निकलना पड़ेगा शोरूम पर कोई नहीं है। ये सुनते ही डॉक्टर अंकल के सब्र का बांध टूट गया और 40 साल पहले की उसे पूरी घटना सुनाई। 

उसे अहसास करवाया की वो तुमसे कितना स्नेह करते हैं और तुम? 

माँ बाप अकेलेपन का जीवन जी रहे हैं और बच्चे कामयाबी और दौलत की चकाचौंध में खो कर सब कुछ भूलते जा रहे हैं। 

महाराष्ट्र का राज्य पशु "विशालकाय गिलहरी" || State Animal of Maharashtra "Giant Squirrel"

महाराष्ट्र का राज्य पशु "विशालकाय गिलहरी"

स्थानीय नाम: शेखरू (मराठी), केन्जिरी (कूर्गी) वैज्ञानिक नाम: राटुफा इंडिका

महाराष्ट्र का राज्य पशु "विशालकाय गिलहरी" || State Animal of Maharashtra "Giant Squirrel"

मालाबार विशालकाय गिलहरीजिसे भारतीय विशालकाय गिलहरी (Indian Giant squirrel) के नाम से भी जाना जाता है, महाराष्ट्र का राज्य पशु है। भारतीय विशाल गिलहरी की आदतों और आवास में मिश्रित पर्णपाती और नम सदाबहार वन, साथ ही उष्णकटिबंधीय और वर्षावन शामिल हैं। 

महाराष्ट्र के राज्य पशु आर्बरियल हैं, वे दिन और रात के दौरान अपना अधिकांश समय पेड़ों पर बिताते हैं। भारतीय विशाल गिलहरी का वजन 1.5 से 2.5 किलोग्राम के बीच होता है। सिर से शरीर तक की लंबाई लगभग 25 सेमी से 45 सेमी होती है। पूंछ की लंबाई 20 सेमी से 40 सेमी के बीच होती है। शरीर का रंग गहरे लाल से भूरे तक होता है, पेट पर सफेद रोएँ होते हैं। अगले पैर और निचले हिस्से आम तौर पर क्रीम या गंदे सफेद होते हैं।

महाराष्ट्र का राज्य पशु "विशालकाय गिलहरी" || State Animal of Maharashtra "Giant Squirrel"

एक भारतीय विशालकाय गिलहरी के कान गोल और छोटे होते हैं। गाल, छाती, जांघिया क्रीम, सफेद या नारंगी हैं। आँखें या तो चमकीली गहरी भूरी या हल्की भूरी हैं, जबकि होंठ और नाक गुलाबी हैं। उनके मुंह के आसपास और नाक के पीछे बहुत लंबे बाल होते हैं। उनकी एक शक्तिशाली, लंबी पूंछ होती है और सिरे पर रंग मलाईदार सफेद से लेकर हल्के भूरे रंग तक होता है। प्रजनन के मौसम के दौरान, नर सक्रिय रूप से मादाओं के लिए प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हैं, और जोड़े लंबे समय तक एक साथ रह सकते हैं। वे स्वाभाविक रूप से शर्मीले और सावधान होते हैं। 

विशालकाय गिलहरी सर्वाहारी होते हैं। फूल, फल, अंडे, कीड़े, पत्तियां और यहां तक कि छाल भी खाते हैं। वे 6 मीटर या उससे अधिक दूरी तक छलांग लगाकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक छलांग लगा सकते थे। इसके मुख्य शिकारी, शिकारी पक्षी और तेंदुआ हैं। पुणे में भीमाशकर वन्यजीव अभयारण्य इस प्रजाति की अच्छी आबादी के लिए जाना जाता है।

महाराष्ट्र का राज्य पशु "विशालकाय गिलहरी" || State Animal of Maharashtra "Giant Squirrel"

वितरण: भारतीय विशाल गिलहरी भारत के लिए स्थानिक है और दक्षिणी और मध्य भारत (पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट और सतपुड़ा पर्वतमाला के कुछ हिस्सों) में अलग-अलग हिस्सों में पाई जाती है। प्रकृति में वृक्षीय, ये गिलहरियाँ शुष्क और नम पर्णपाती, अर्ध-सदाबहार और सदाबहार जंगलों में ऊपरी छतरियों में निवास करती हैं। इसके बड़े, शक्तिशाली पंजे इसे पेड़ों की छाल और शाखाओं को पकड़ने में मदद करते हैं। वे ऊँचे, प्रचुर शाखाओं वाले पेड़ों पर कई ग्लोब-आकार के घोंसले बनाते हैं और शायद ही कभी ऊँचे जंगल की छतरी से नीचे उतरते हैं। गिलहरी तीखी आवाजें निकालती है और ऊंची आवाज वाली अलार्म कॉल करती है जो उन जंगलों में गूंजती है, जहां यह पाई जाती है। 

संरक्षण: निवास स्थान का विनाश, निवास स्थान में परिवर्तन जैसे विखंडन, सड़कों और बिजली लाइनों का निर्माण, और वनों की कटाई भारतीय विशाल गिलहरी आबादी के लिए एक महत्वपूर्ण खतरा है। ZSI के एक अध्ययन से यह भी पता चला है कि अवैध शिकार, विशेष रूप से पूर्वी घाट में, जहां नई मानव बस्तियां बनाई गई हैं, भी इस प्रजाति के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर रहा है।

महाराष्ट्र का राज्य पशु "विशालकाय गिलहरी" || State Animal of Maharashtra "Giant Squirrel"

भारतीय विशाल गिलहरी बीज फैलाव में मदद करके जंगलों की पारिस्थितिक प्रणाली को संतुलित करने में एक आवश्यक भूमिका निभाती है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से देशी वन्यजीव आबादी का समर्थन होता है और मानव-वन्यजीव संघर्ष कम होता है। गिलहरी भी एक संकेतक प्रजाति है और इसकी उपस्थिति एक स्वस्थ जंगल का संकेत देती है। भारतीय विशालकाय गिलहरी को IUCN की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में "सबसे कम चिंताजनक" के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। यह भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची II और CITES के परिशिष्ट II में भी सूचीबद्ध है।

आप सभी ने छोटे आकार की गिलहरी को उसके भूरे रंग के शरीर और धारियों के साथ कई बार देखा होगा, लेकिन, कभी मालाबार विशालकाय गिलहरी (Malabar Giant squirrel) को देखने का मौका शायद ही कुछ लोगों को मिला होगा। यहाँ एक वीडियो है जो आपको हैरान कर देगा। आईएएस अधिकारी सुप्रिया साहू (IAS officer Supriya Sahu ) ने ट्विटर पर मालाबार की विशालकाय गिलहरी का एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें वो एक झटके में छलांग लगाते और पेड़ों पर चढ़ते हुए दिखाई दे रही है। फुटेज को तमिलनाडु (Tamil Nadu) के कुन्नूर में रिकॉर्ड किया गया था। 

IAS officer Supriya Sahu ) ने ट्विटर पर मालाबार की विशालकाय गिलहरी का एक वीडियो देखने के लिए इस लाइन पर  करें 

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State Animal of Maharashtra "Giant Squirrel"

Local names: Shekru (Marathi), Kenjiri (Coorgi)
Scientific Name: Ratufa Indica

The Malabar giant squirrel, also known as the Indian giant squirrel, is the state animal of Maharashtra. The habits and habitat of the Indian giant squirrel include mixed deciduous and moist evergreen forests, as well as tropical and rainforests.

महाराष्ट्र का राज्य पशु "विशालकाय गिलहरी" || State Animal of Maharashtra "Giant Squirrel"

The state animals of Maharashtra are arboreal, they spend most of their time in trees during the day and night. The Indian giant squirrel weighs between 1.5 to 2.5 kg. The length from head to body is approximately 25 cm to 45 cm. The length of the tail ranges from 20 cm to 40 cm. The body color ranges from dark red to brown, with white fur on the abdomen. The forelegs and lower parts are generally cream or off-white.

The ears of an Indian giant squirrel are round and small. Cheeks, chest, underparts are cream, white or orange. The eyes are either bright dark brown or light brown, while the lips and nose are pink. They have very long hair around their mouth and behind their nose. They have a powerful, long tail and the color ranges from creamy white to light brown at the tip. During the breeding season, males actively engage in competition for females, and pairs may remain together for long periods. They are naturally shy and cautious.

महाराष्ट्र का राज्य पशु "विशालकाय गिलहरी" || State Animal of Maharashtra "Giant Squirrel"

Giant squirrels are omnivores. Eat flowers, fruits, eggs, insects, leaves and even bark. They could jump from one tree to another by jumping distances of 6 meters or more. Its main predators are birds of prey and leopard. Bhimashkar Wildlife Sanctuary in Pune is known to have a good population of this species.

Distribution: The Indian giant squirrel is endemic to India and is found in isolated parts of southern and central India (Western Ghats and parts of the Eastern Ghats and Satpura ranges). Arboreal in nature, these squirrels inhabit the upper canopy in dry and moist deciduous, semi-evergreen and evergreen forests. Its large, powerful claws help it grip the bark and branches of trees. They build numerous globe-shaped nests in tall, abundantly branched trees and rarely descend below the high forest canopy. The squirrel makes shrill calls and high-pitched alarm calls that echo throughout the forests where it is found.

Conservation: Habitat destruction, habitat alteration such as fragmentation, construction of roads and power lines, and deforestation pose a significant threat to the Indian giant squirrel population. A ZSI study also revealed that poaching, especially in the Eastern Ghats, where new human settlements have been built, is also posing a serious threat to this species.

The Indian giant squirrel plays an essential role in balancing the ecological system of forests by helping in seed dispersal, thereby indirectly supporting native wildlife populations and reducing human-wildlife conflict. The squirrel is also an indicator species and its presence indicates a healthy forest. The Indian giant squirrel is listed as "Least Concern" on the IUCN Red List of Threatened Species. It is also listed in Schedule II of the Indian Wildlife (Protection) Act, 1972 and Appendix II of CITES.

भारतीय राज्य के राजकीय पशुओं की सूची || List of State Animals of India ||

भारतीय राज्य के राजकीय पक्षियों की सूची |(List of State Birds of India)


मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand)

रामचरितमानस के सभी अध्याय (कांड) की संक्षिप्त जानकारी के बाद आज से गुरुवार के ब्लॉग में मुंशी प्रेमचंद जी की कहानियों का संग्रह हर हफ्ते प्रस्तुत करने का प्रयास है। आज शुरुआत मुंशी प्रेमचंद जी की जीवनी से करते हैं।

प्रेमचंद (Premchand )

उपनाम :'प्रेमचंद'
मूल नाम :धनपत राय श्रीवास्तव
जन्म :31 जुलाई 1880 | लमही, उत्तर प्रदेश
निधन :8 अक्तूबर 1936 | बनारस, उत्तर प्रदेश        

धनपत राय श्रीवास्तव, जो प्रेमचंद नाम से जाने जाते हैं, वो हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को लमही (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। मुंशी जी के पिता मुंशी अजायबराय डाकखाने में क्लर्क थे और माता का नाम आनन्दी देवी था। प्रेमचंद को मानशिक झटके बचपन से ही मिलने शुरू हो गये थे, उनकी 6 वर्ष की अवस्था में माता जी का स्वर्गवास हो गया। मात्र पंद्रह वर्ष की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया और सोलह वर्ष के होने पर उनके पिता का भी देहांत हो गया था। 

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand)

मुंशी प्रेमचंद का साहित्य उनके बचपन पर आधारित था क्योंकि उन्होंने "सौतेली माँ का व्यवहार, बाल विवाह, किसानों और क्लर्कों का दुखी जीवन और धार्मिक कर्मकांड के साथ साथ पंडे-पुरोहितों का कर्मकांड अपनी किशोरावस्था में ही देख लिया था। यही अनुभव आगे चलकर उनके लेखन का विषय बन गया। 

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand)

सन 1898 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए थे। इसके बाद उन्होंने पढाई जारी रखते हुए 1910 में दर्शन, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, और इतिहास लेकर इंटरमीडिएट पास की और 1919 में फ़ारसी, इतिहास और अंग्रेज़ी विषयों से बी. ए. किया और बाद में शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए थे। उन्होंने गाँधी जी के आवाहन पर 1921 ई. में असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए इंस्पेक्टर के पद से त्याग पत्र दे दिया था। इसके बाद लेखन को अपना व्यवसाय बना लिया था। 

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand)

प्रेमचंद, 1933 में फिल्म नगरी मुंबई भी गये थे जहाँ मोहनलाल भवनानी के ‘सिनेटोन’ कंपनी में कहानी लेखक के रूप में काम करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, लेकिन यह काम रास नहीं आया और दो महीने का वेतन छोड़कर बनारस लौट आए। उनका स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ता गया और लम्बी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को हिंदी साहित्य का यह सूर्य हमेशा के लिए अस्त हो गया। 

साहित्यिक सफ़र

प्रेमचंद ने अपना साहित्यिक सफ़र एक उपन्यासकार और आलोचक की हैसियत से शुरू किया था। उनका पहला उपन्यास 1901  में प्रकाशित हुआ और दूसरा 1904 में। वह तब उर्दू में लिखते थे और उनका नाम था नवाब राय। उन्होंने 1907  से कहानियाँ लिखना भी शुरू कर दिया था। वे आरंभिक कहानियाँ उस ज़माने की मशहूर पत्रिका ‘ज़माना’ में प्रकाशित हुईं। उनका पहला कहानी-संग्रह ‘ सोज़े वतन’  तब प्रकाशित हुआ जब प्रथम विश्वयुद्ध की तैयारियाँ ज़ोरों पर थी। इस संग्रह को अँग्रेज़ शासक द्वारा ख़तरे के रूप में देखा गया और लेखक को इसकी पाँच सौ प्रतियों को आग लगा देने के लिए मजबूर किया गया। यहीं से फिर प्रेमचंद ने नवाबराय नाम छोड़कर प्रेमचंद नाम से लिखना शुरू किया। उन्हें यह नाम उर्दू लेखक और संपादक दयानारायण निगम ने दिया था। युद्धकाल में ही उन्होंने अपना पहला महान उपन्यास ‘सेवा सदन’ लिखा और युद्ध की समाप्ति पर ‘प्रेमाश्रम’ भी पूरा कर लिया था। हिंदी में जब 'सेवासदन' प्रकाशित हुआ तो हिंदी संसार में धूम मच गई। ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ को इतनी तारीफ़ उर्दू में नहीं मिली थी। इसी क्रम में प्रेमचंद ने रंगभूमि उपन्यास की रचना पहले हिंदी में की, फिर उसे उर्दू में प्रकाशित करवाया।

प्रेमचंद ने जी कुछ लिखा वो हिंदी साहित्य में स्वर्ण अक्षरों में हमेशा के लिए अंकित हो गया है। मानसरोवर (कथा संग्रह) प्रेमचंद द्वारा लिखी गई कहानियों का संकलन है। उनके निधनोपरांत मानसरोवर नाम से ८ खण्डों में प्रकाशित इस संकलन में उनकी दो सौ से भी अधिक कहानियों को शामिल किया गया है।

मानसरोवर उपन्यास

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र || Complete Mansarovar Stories Munshi Premchand

मानसरोवर, भाग-1

  1. अलगोझा
  2.  ईदगाह
  3.  माँ
  4. बेटों वाली विधवा
  5.  बड़े भाई साहब
  6.  शांति
  7.  नशा
  8.  स्वामिनी
  9. ठाकुर का कुआँ
  10. घर जमाई
  11. पूस की रात
  12. झांकि
  13. गुल्ली डंडा
  14. ज्योति
  15. दिल की रानी
  16. धिक्कार
  17. कायर
  18. शिकार
  19. सुभागी
  20. अनुभव
  21. लांछन
  22. आखिरी हिला
  23. तावान
  24. घासवाली
  25. गिला
  26. रसिक संपादक
  27. मनोवृत्ति

मानसरोवर, भाग-2 

  1. कुसुम
  2. खुदाई फौजदार
  3. वेश्या
  4. चमत्कार
  5. मोटर के छींटे
  6. कैदी
  7. मिस पद्मा
  8. विद्रोही
  9. उन्माद
  10. न्याय
  11. कुत्सा
  12. दो बैलों की कथा
  13. रियासत का दीवाऩ़
  14. मुफ्त का यश
  15. १५ बासी भात में खुदा का साझा
  16. दूध का दाम
  17. बालक
  18. जीवन का शाप
  19. डामुल का कैदी
  20. नेऊर
  21. गृह-नीति
  22. कानूनी कुमार
  23. लॉटरी
  24. जादू
  25. नया विवाह
  26. शूद्रा

मानसरोवर, भाग- 3

  1. विश्वास
  2. नरक का मार्ग
  3. स्त्री और पुरूष
  4. उद्धार
  5. निर्वासन
  6. नैराश्य लीला
  7. कौशल
  8. स्वर्ग की देवी
  9. आधार
  10. एक आँच की कसर
  11. माता का हृदय
  12. परीक्षा
  13. तेंतर
  14. नैराश्य
  15. दण्ड
  16. धिक्कार
  17. लैला
  18. मुक्तिधन
  19. दीक्षा
  20. क्षमा
  21. मनुष्य का परम धर्म
  22. गुरु-मंत्र
  23. सौभाग्य के कोड़े
  24. विचित्र होली
  25. मुक्ति-मार्ग
  26. डिक्री के रुपये
  27. शतरंज के खिलाड़ी
  28. वज्रपात
  29. सत्याग्रह
  30. भाड़े का टट्टू
  31. बाबा जी का भोग
  32. विनोद

मानसरोवर, भाग - 4

  1. प्रेरणा
  2. सद्गति
  3. तगादा
  4. दो कब्रें
  5. ढपोरसंख
  6. डिमॉन्सट्रेशन
  7. दारोगा जी
  8. अभिलाषा
  9. खुचड़
  10. आगा-पीछा
  11. प्रेम का उदय
  12. सती
  13. मृतक-भोज
  14. भूत
  15. सवा सेर गेहूँ
  16. सभ्यता का रहस्य
  17. समस्या
  18. दो सखियाँ
  19. मांगे की घड़ी
  20. स्मृति का पुजारी

मानसरोवर, भाग - 5

  1. मंदिर
  2. निमंत्रण
  3. रामलीला
  4. कामना-तरु
  5. हिंसा परमो धर्म:
  6. बहिष्कार
  7. चोरी
  8. लांछन
  9. सती
  10. कज़ाकी
  11. आँसुओं की होली
  12. अग्नि-समाधि
  13. सुजान भगत
  14. पिसनहारी का कुआं
  15. सोहाग का शव
  16. आत्म-संगीत
  17. एक्ट्रेस
  18. ईश्वरीय न्याय
  19. ममता
  20. मंत्र
  21. प्रायश्चित
  22. कप्तान साहब
  23. इस्तीफ़ा

मानसरोवर, भाग - 6

  1. यह मेरी मातृभूमि है
  2. राजा हरदौल
  3. त्यागी का प्रेम
  4. रानी सारन्धा
  5. शाप
  6. मर्यादा की वेदी
  7. मृत्यु के पीछे
  8. पाप का अग्निकुंड
  9. आभूषण
  10. जुगनू की चमक
  11. गृह दाह
  12. धोखा
  13. लाग-डाट
  14. अमावस्या की रात
  15. चकमा
  16. पछतावा
  17. आप-बीती
  18. राज्य-भक्त
  19. अधिकार-चिन्ता
  20. दुराशा (प्रहसन)

मानसरोवर, भाग - 7

  1. जेल
  2. पत्नी से पति
  3. शराब की दुकान
  4. जुलूस
  5. मैकू
  6. समर-यात्रा
  7. शांति
  8. बैंक का दिवाला
  9. आत्माराम
  10. दुर्गा का मंदिर
  11. बड़े घर की बेटी
  12. पंच परमेश्वर
  13. शंखनाद
  14. ज़िहाद
  15. फ़ातिहा
  16. वैर का अंत
  17. दो भाई
  18. महातीर्थ
  19. विस्मृति
  20. प्रारब्ध
  21. सुहाग की साड़ी
  22. लोकमत का सम्मान
  23. नागपूजा

मानसरोवर, भाग - 8

  1. खून सफेद
  2. गरीब की हाय
  3. बेटी का धन
  4. धर्मसंकट
  5. सेवा-मार्ग
  6. शिकारी राजकुमार
  7. बलिदान
  8. बोध
  9. सच्चाई का उपहार
  10. ज्वालामुखी
  11. पशु से मनुष्य
  12. मूठ
  13. ब्रह्म का स्वांग
  14. विमाता
  15. बूढ़ी काकी
  16. हार की जीत
  17. दफ्तरी
  18. विध्वंस
  19. स्वत्व-रक्षा
  20. पूर्व संस्कार
  21. दुस्साहस
  22. बौड़म
  23. गुप्त धन
  24. आदर्श विरोध
  25. समस्या
  26. अनिष्ट शंका
  27. सौत
  28. सज्जनता का दंड
  29. नमक का दरोगा
  30. उपदेश
  31. परीक्षा
अब हर गुरुवार उपन्यास सम्राट कलम के जादूगर मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का आनंद उठायें 😊