Cricket News: Latest Cricket News, Live Scores, Results, Upcoming match Schedules | Times of India

Sportstar - IPL

Showing posts with label Important Dates. Show all posts
Showing posts with label Important Dates. Show all posts

छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

छत्रपति शिवाजी महाराज

जन्म: 19 फरवरी 1630, शिवनेरी किला, अहमदनगर सल्तनत (वर्तमान महाराष्ट्र, भारत)
मृत्यु:  3 अप्रैल 1680 (आयु 50 वर्ष), रायगढ़ किला, महाड, मराठा साम्राज्य (वर्तमान महाराष्ट्र, भारत)

जब भारत के वीर सपूतों की गाथा सुनाई जाती है, तो उसमें एक नाम श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का होता है। बहुत से लोग इन्हें हिंदू हृदय सम्राट भी कहते हैं, तो कुछ लोग इन्हें मराठा का गौरव कहते हैं। शिवाजी को हिंदुओं का नायक भी माना जाता है शिवाजी महाराज एक बहादुर बुद्धिमान और निडर शासक थे। वर्ष 1674 में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और उन्हें छत्रपति का खिताब मिला।

छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

छत्रपति शिवाजी भारत के एक महान राजा और कुशल रणनीतिकार तथा मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे, जिनका जन्म 19 फरवरी 1630 में मराठा परिवार में हुआ। उनका पूरा नाम शिवाजी भोंसले था। शिवाजी के पिता जी का नाम शाहजी और माता जीजाबाई थीं। उनका जन्म पुणे के पास स्थित शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। 

उनका बचपन उनकी माता जीजाबाई के मार्गदर्शन में बीता। माता जीजाबाई धार्मिक स्वभाव वाली होते हुए भी गुण-स्वभाव और व्यवहार में वीरांगना नारी थीं। इसी कारण उन्होंने बालक शिवा का पालन-पोषण रामायण, महाभारत तथा अन्य भारतीय वीरात्माओं की उज्ज्वल कहानियां सुना और शिक्षा देकर किया था। दादा कोणदेव के संरक्षण में उन्हें सभी तरह की सामयिक युद्ध आदि विधाओं में भी निपुण बनाया था। धर्म, संस्कृति और राजनीति की भी उचित शिक्षा दिलवाई थी। उस युग में परम संत रामदेव के संपर्क में आने से शिवाजी पूर्णतया राष्ट्रप्रेमी, कर्त्तव्यपरायण एवं कर्मठ योद्धा बन गए। 

छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन 14 मई 1640 में सइबाई निंबालकर के साथ पुना के लाल महल में हुआ था। शिवाजी ने कुल 8 विवाह किए थे। वैवाहिक राजनीति के जरिए उन्होंने सभी मराठा सरदारों को एक छत्र के नीचे लाने में सफलता प्राप्त की।

शिवाजी की पत्नियाँ:

सईबाई निंबालकर – (सम्भाजी, रानूबाई, सखूबाई, अंबिकाबाई)
सोयराबाई मोहिते– (राजाराम, दीपाबाई )
सकवरबाई गायकवाड – (कमलाबाई)
सगुणाबाई शिर्के – (राजकुवरबाई)
पुतलाबाई पालकर
काशीबाई जाधव
लक्ष्मीबाई विचारे
गुंवांताबाई इंगले

शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज की शिक्षा मिली थी। जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की तरह उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को छुड़वा लिया। इससे उनके चरित्र में एक उदार अवयव ऩजर आता है। उसेक बाद उन्होंने पिता की हत्या नहीं करवाई जैसा कि अन्य सम्राट किया करते थे। शाहजी राजे के मरने के बाद ही उन्होंने अपना राज्याभिषेक करवाया हालांकि वो उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे। उनके नेतृत्व को सब लोग स्वीकार करते थे यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी।

वह एक अच्छे सेनानायक के साथ एक अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। कई जगहों पर उन्होंने सीधे युद्ध लड़ने की बजाय कूटनीति से काम लिया था। लेकिन यही उनकी कूटनीति थी, जो हर बार बड़े से बड़े शत्रु को मात देने में उनका साथ देती रही।

शिवाजी महाराज की "गनिमी कावा" नामक कूटनीति, जिसमें शत्रु पर अचानक आक्रमण करके उसे हराया जाता है, विलोभनियता से और आदरसहित याद किया जाता है। एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। जिसे “शिवराई” कहते थे, और यह सिक्का संस्कृत भाषा में था।

छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। 50 वर्ष की आयु में 3 अप्रैल 1680 को लंबी बीमारी के बाद रायगढ़ में शिवाजी का निधन हो गया था। कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि उनकी मृत्यु स्वाभाविक थी, लेकिन कई पुस्तकों में इतिहासकार लिखते हैं कि उन्हें एक साजिश के तहत जहर दिया गया था। 

English Translate

Chhatrapati Shivaji Maharaj

Born 19 February 1630, Shivneri Fort, Ahmadnagar Sultanate (present-day Maharashtra, India)
Died 3 April 1680 (aged 50), Raigad Fort, Mahad, Maratha Empire (present-day Maharashtra, India)

When the saga of the brave sons of India is narrated, one of the names in it is that of Shrimant Chhatrapati Shivaji Maharaj. Many people also call him Hindu Hriday Samrat, while some people call him the pride of Maratha. Shivaji is also considered a hero of the Hindus. Shivaji Maharaj was a brave, intelligent and fearless ruler. Shivaji Maharaj was coronated in the year 1674 and he got the title of Chhatrapati.

छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

Chhatrapati Shivaji was a great king and skilled strategist of India and the founder of the Maratha Empire, who was born on 19 February 1630 in a Maratha family. His full name was Shivaji Bhonsle. Shivaji's father's name was Shahaji and mother's name was Jijabai. He was born in Shivneri fort near Pune.

His childhood was spent under the guidance of his mother Jijau. Mata Jijabai, despite being religious in nature, was a brave woman in her qualities and behavior. For this reason, he brought up the child Shiva by listening to and teaching the bright stories of Ramayana, Mahabharata and other Indian heroes. Under the protection of Dada Kondev, he was also made proficient in all types of contemporary warfare etc. Proper education of religion, culture and politics was also given. Shivaji became a complete patriot, dutiful and diligent warrior after coming in contact with Param Sant Ramdev in that era.

Chhatrapati Shivaji Maharaj was married on 14 May 1640 with Saibai Nimbalkar at the Lal Mahal in Pune. Shivaji did a total of 8 marriages. Through matrimonial politics, he succeeded in bringing all the Maratha chieftains under one umbrella.

Shivaji's Wives:

Saibai Nimbalkar – (Sambhaji, Ranubai, Sakhubai, Ambikabai)
Soyrabai Mohite – (Rajaram, Deepabai)
Sakvarbai Gaikwad – (Kamalabai)
Sagunabai Shirke – (Rajkuvarbai)
Putlabai Palkar
Kashibai Jadhav
Laxmibai Vichare
Gunwantabai Ingle

Shivaji Maharaj got the education of Swaraj from his father. When the Sultan of Bijapur took Shahaji Raje prisoner, then like an ideal son, he made a treaty with the Shah of Bijapur and got Shahaji Raje released. This shows a liberal element in his character. After that he did not get his father killed as other emperors used to do. He got his coronation done only after the death of Shahaji Raje, although by that time he had become independent from his father and became the ruler of a large empire. Everyone accepted his leadership, that is why there was no major incident like internal rebellion during his reign.

He was a good military leader as well as a good diplomat. In many places, instead of fighting a direct war, he used diplomacy. But it was his diplomacy, which helped him to defeat the biggest enemy every time.

छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

Shivaji Maharaj's diplomacy called "Ganimi Kava", in which the enemy is defeated by a sudden attack, is remembered fondly and with respect. Like an independent ruler, he got his name coined. Which was called "Shivrai", and this coin was in Sanskrit language.

There is a difference of opinion among historians regarding the death of Chhatrapati Shivaji Maharaj. Shivaji died at Raigarh on 3 April 1680 at the age of 50 after a long illness. Some historians believe that his death was natural, but historians in many books write that he was poisoned as part of a conspiracy.

75वां गणतंत्र दिवस || 75nd Republic Day || 26 जनवरी

75वां गणतंत्र दिवस

आप सभी को 75वें गणतंत्र दिवस की बधाई।

75वां गणतंत्र दिवस  || 75nd Republic Day || 26 जनवरी

भारत 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ था और 26 जनवरी 1950 को हमारे देश के संविधान को आत्मसात किया गया, जिसके तहत भारत देश को एक लोकतांत्रिक, संप्रभु और गणतंत्र देश घोषित किया गया। इसलिए हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

75वां गणतंत्र दिवस  || 75nd Republic Day || 26 जनवरी

देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 26 जनवरी 1950 को 21 तोपों की सलामी के साथ ध्वजारोहण कर भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया था। इसके बाद से हर साल इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस दिन देशभर में राष्ट्रीय अवकाश रहता है।

भारत राज्‍यों का एक संघ है। ये संसदीय प्रणाली की सरकार वाला गणराज्‍य है। ये गणराज्‍य भारत के संविधान के अनुसार शासित है, जिसे संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को ग्रहण किया था और ये 26 जनवरी 1950 से प्रभाव में आया।

75वां गणतंत्र दिवस  || 75nd Republic Day || 26 जनवरी

देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस समारोह में हिस्सा लेते हैं और राष्ट्रीय ध्वज भी वही फहराते हैं। संबंधित राज्यों के राज्यपाल राज्य की राजधानियों में।

भारत के राष्ट्रपति नई दिल्ली में होने वाली भव्य परेड की सलामी लेते हैं। वो भारतीय सशस्त्र बलों के कमांडर-इन-चीफ़ भी होते हैं। इस परेड में भारतीय सेना अपने नए लिए टैंकों, मिसाइलों, रडार आदि का प्रदर्शन भी करती हैं।

गणतंत्र दिवस समारोह का अंत बीटिंग रिट्रीट के आयोजन के बाद होता है। यह आयोजन रायसीना हिल्स पर राष्ट्रपति भवन के सामने किया जाता है, जिसके चीफ़ गेस्‍ट राष्‍ट्र‍पति होते हैं। बीटिंग रिट्रीट का आयोजन गणतंत्र दिवस समारोह के तीसरे दिन यानी 29 जनवरी की शाम को किया जाता है। बीटिंग रिट्रीट में थल सेना, वायु सेना और नौसेना के बैंड पारंपरिक धुन बजाते हुए मार्च करते हैं। भारत में हर साल 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर बहादुर बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार दिए जाते हैं। इन पुरस्कारों की शुरुआत 1957 से हुई थी। इनमें पुरस्कार के रूप में एक पदक, प्रमाण पत्र और नकद राशि दी जाती है। सभी बच्चों को स्कूल की पढ़ाई पूरी करने तक वित्तीय सहायता भी दी जाती है।

75वां गणतंत्र दिवस  || 75nd Republic Day || 26 जनवरी

गणतंत्र दिवस का एक मुख्य आकर्षण इसकी परेड है। गणतंत्र दिवस परेड राष्ट्रपति भवन से शुरू होती है और इंडिया गेट पर ख़त्म होती है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस || Neta ji Subhas Chandra Bose

नेताजी सुभाषचंद्र बोस 

Born: 23 January 1897, Cuttack
Died: 18 August 1945, Taipei City, Taipei, Taiwan

आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 128वीं जयंती है। 23 जनवरी 1897 का दिन विश्व इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। इस दिन स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक सुभाष चंद्र बोस का जन्म कटक के प्रसिद्ध वकील जानकीनाथ तथा प्रभावती देवी के यहां हुआ था। 
https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2024/01/neta-ji-subhas-chandra-bose.html
बहुत मुश्किल है कोई यूँ वतन की जान हो जाये ,
तुम्हें फैला दिया जाये तो हिन्दुस्तान हो जाये ..
Love this Smile❤❤🇮🇳🇮🇳🙏🙏

नेताजी सुभास चंद्र बोस भारत के महान क्रन्तिकारी थे। उन्होंने भारत की आजादी के लिए कई आंदोलनों में भाग लिया और साथ ही आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। भारत के महान क्रांतिकारी, विभिन्न आंदोलनों के अगुआकार नेताजी की उपाधि प्राप्त करने वाले सुभाष चंद्र बोस को सम्मान और उनके पराक्रम को सराहने के लिए प्रतिवर्ष 23 जनवरी को सुभाष चंद्र बोस जयंती के रूप में मनाया जाता है। 

नेताजी ने भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया और युवाओं में आजादी के लिए लड़ने का जज्बा पैदा किया। नेताजी ने आजादी के लिए "जय हिन्द", "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा", "चलो दिल्ली" जैसे नारे दिए जिन्होंने युवाओं में आजादी के लिए प्रेरणा का काम किया। आजादी के लिए उनके द्वारा किये गए संघर्ष को नमन करने के लिए उनकी जयंती को प्रतिवर्ष मनाया जाता जाता है।

2021 से पराक्रम दिवस के रूप में हुई शुरुआत
पहले इस दिन को सुभाष चंद्र जयंती के नाम से मनाया जाता था, लेकिन वर्ष 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिन को नेताजी के योगदान को देखते हुए पराक्रम दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इसके बाद से प्रतिवर्ष नेताजी की जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी की जयंती पर  श्रद्धा-सुमन के साथ श्री गोपालप्रसाद व्यास जी द्वारा रचित कविता -

https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2024/01/neta-ji-subhas-chandra-bose.html

"है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।।
अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।
लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।।

https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2024/01/neta-ji-subhas-chandra-bose.html

यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर कहानी है।
जो रक्त कणों से लिखी गई,जिसकी जयहिन्द निशानी है।।
प्यारा सुभाष, नेता सुभाष, भारत भू का उजियारा था ।
पैदा होते ही गणिकों ने जिसका भविष्य लिख डाला था।।

https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2024/01/neta-ji-subhas-chandra-bose.html

यह वीर चक्रवर्ती होगा , या त्यागी होगा सन्यासी।
जिसके गौरव को याद रखेंगे, युग-युग तक भारतवासी।।
सो वही वीर नौकरशाही ने,पकड़ जेल में डाला था ।
पर क्रुद्ध केहरी कभी नहीं फंदे में टिकने वाला था।।

https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2024/01/neta-ji-subhas-chandra-bose.html

बाँधे जाते इंसान,कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।
काया ज़रूर बाँधी जाती,बाँधे न इरादे जाते हैं।।
वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था,जो मौका पाकर निकल गया।
वह पारा था अंग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल गया।।

https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2024/01/neta-ji-subhas-chandra-bose.html

जिस तरह धूर्त दुर्योधन से,बचकर यदुनन्दन आए थे।
जिस तरह शिवाजी ने मुग़लों के,पहरेदार छकाए थे ।।
बस उसी तरह यह तोड़ पींजरा , तोते-सा बेदाग़ गया।
जनवरी माह सन् इकतालिस,मच गया शोर वह भाग गया।।

https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2024/01/neta-ji-subhas-chandra-bose.html

वे कहाँ गए, वे कहाँ रहे,ये धूमिल अभी कहानी है।
हमने तो उसकी नयी कथा,आज़ाद फ़ौज से जानी है।।"

Army Day (सेना दिवस)

सेना दिवस

इस बार 15 जनवरी, 2024 को भारत अपना 76वां सेना दिवस मनाने जा रहा है। भारतीय सेना दिवस, थल सेना द्वारा हर साल 15 जनवरी को मनाया जाता है। क्योंकि 15 जनवरी के दिन फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा ने सेना प्रमुख के रूप में पदभार ग्रहण किया था एवं वह स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेना अध्यक्ष थे। 

Army Day (सेना दिवस)

सेना दिवस के अवसर पर पूरा देश थल सेना की वीरता, अदम्य साहस और शौर्य की कुर्बानी की दास्ताँ को बयान करता है। जगह-जगह कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दिल्ली में सेना मुख्यालय के साथ-साथ देश के कोने-कोने में शक्ति प्रदर्शन के साथ ही भारतीय सेना की मुख्य उपलब्धियों पर कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

Army Day (सेना दिवस)

15 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है सेना दिवस

15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश भर में व्याप्त दंगे-फसादों तथा शरणार्थियों के आवागमन के कारण उथल-पुथल का माहौल था। इस कारण कई प्रशासनिक समस्याएं पैदा होने लगी और फिर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेना को आगे आना पड़ा। इसके पश्चात एक विशेष सेना कमांड का गठन किया गया, ताकि विभाजन के दौरान शांति-व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके, परन्तु भारतीय सेना के अध्यक्ष तब भी ब्रिटिश मूल के ही हुआ करते थे। 15 जनवरी 1949 को फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेना प्रमुख बने थे। उस समय भारतीय सेना में लगभग 2 लाख सैनिक थे। उनसे पहले यह पद कमांडर जनरल रॉय फ्रांसिस बुचर के पास था। उसके बाद से ही प्रत्येक वर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस मनाया जाता है। के. एम. करिअप्पा पहले ऐसे अधिकारी थे, जिन्हें फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई थी। के एम करियप्पा का पूरा नाम कोडंडेरा मडप्पा करियप्पा था। उन्होंने साल 1947 में भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना का नेतृत्व किया था।

Army Day (सेना दिवस)

आजादी के बाद भारतीय सेना ने कई युद्ध लड़े हैं। इसके अलावा देश में अतंकवाद को जड़ से खत्म करने के लिए भी भारतीय सेना ने कई बड़े अभियानों को चलाया है। ऐसे में भारतीय सेना दिवस देश की स्वतंत्रता और अखंडता की सुरक्षा के लिए वीर सैनिकों की कुर्बानियों को याद करने का दिन है।

English Translate

Army Day

This time on January 15, 2024, India is going to celebrate its 76th Army Day. Indian Army Day is celebrated by the Army every year on 15 January. Because on 15 January Field Marshal K. M. Cariappa assumed charge as the Army Chief and was the first Indian Army Chief of independent India. On the occasion of Army Day, the whole country tells the story of bravery, indomitable courage and sacrifice of bravery of the Army. Programs are organized at various places. Along with the show of strength, programs are organized at the Army Headquarters in Delhi as well as in every corner of the country on the main achievements of the Indian Army.
Army Day (सेना दिवस)
Why is Army Day celebrated only on 15 January?
When India became independent on 15 August 1947, there was an atmosphere of turmoil due to riots and movement of refugees across the country. Due to this, many administrative problems started arising and then the army had to come forward to control the situation. After this, a special army command was formed to ensure peace and order during partition, but even then the Chief of the Indian Army was of British origin. On 15 January 1949, Field Marshal KM Cariappa became the first Indian Army Chief of independent India. At that time there were about 2 lakh soldiers in the Indian Army. Before him, this post was held by Commander General Roy Francis Butcher. Since then, Army Day is celebrated every year on 15 January. Of. M. Cariappa was the first officer to be given the title of Field Marshal. KM Cariappa's full name was Kodandera Madappa Cariappa. He led the Indian Army in the Indo-Pak war in 1947.
Army Day (सेना दिवस)
After independence, the Indian Army has fought many wars. Apart from this, the Indian Army has also launched many major operations to root out terrorism in the country. In such a situation, Indian Army Day is a day to remember the sacrifices of the brave soldiers to protect the independence and integrity of the country.

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897) || Savitribai Jyotirao Phule (3 January 1831 – 10 March 1897)

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव में हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था।

सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई का विवाह बहुत ही छोटी उम्र में महज नौ साल पर वर्ष 1940 में ज्योतिराव फुले से हो गया। शादी के बाद वह जल्द ही अपने पति के साथ पुणे आ गईं। विवाह के समय वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं। लेकिन पढ़ाई में उनका मन बहुत लगता था। उनके पढ़ने और सीखने की लगन से प्रभावित होकर उनके पति ने उन्हें आगे पढ़ना और लिखना सिखाया। सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षक बनने का प्रशिक्षण लिया और एक योग्य शिक्षिका बनीं।

इन्हें भारत में पहली नारीवादी, एक अग्रणी शिक्षिका और एक जाति-विरोधी भेदभाव कार्यकर्ता के रूप में गिना जाता है। ये भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवियत्री थीं। इन्होंने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्री अधिकारों एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है। 1852 में उन्होंने बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की।
सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897)

सावित्रीबाई फुले  ने अपना जीवन एक लक्ष्य महिलाओं के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया था। इस राह में उन्हें बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जब वे स्कूल जाती थीं, तो विरोधी लोग उनपर पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। आज से 191 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था, तब उन्होंने खुद पढाई की और अन्य महिलाओं को भी शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। 

सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फेंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं।

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897)

सावित्रीबाई ने 19वीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया। उनकी जिंदगी से जुडी एक घटना ये भी थी कि उन्होंने आत्महत्या करने जाती हुई एक महिला काशीबाई की अपने घर में डिलीवरी करवा कर उसके बच्चे यशवंत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया। दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर उन्होंने उसे डॉक्टर बनाया।

इन्हीं सब सेवा कार्य में रमी 10 मार्च 1897 को एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत लग गया और इसी कारण से उनका निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीजों की सेवा करती थीं। 

English Translate

Savitribai Jyotirao Phule

Savitribai Phule was born on January 3, 1831 in Naigaon, Maharashtra. His father's name was Khandoji Nevse and mother's name was Lakshmi. Savitribai Phule was married to Jyotiba Phule in 1840.
Savitribai Jyotirao Phule (3 January 1831 – 10 March 1897)
Savitribai got married to Jyotirao Phule at a very young age of just nine years in 1940. After marriage, she soon came to Pune with her husband. She was not educated at the time of marriage. But he was very interested in studies. Impressed by her passion for reading and learning, her husband further taught her to read and write. Savitribai trained as a teacher in Ahmednagar and Pune and became a qualified teacher.

She is considered the first feminist in India, a pioneering teacher and an anti-caste discrimination activist. She was India's first female teacher, social reformer and Marathi poet. Along with her husband Jyotirao Govindrao Phule, she did remarkable work in the field of women's rights and education. He is considered the pioneer of modern Marathi poetry. In 1852 she established a school for girls.
Savitribai Jyotirao Phule (3 January 1831 – 10 March 1897)
Savitribai Phule had dedicated her life to one goal, the upliftment of women. He had to face many difficulties in this path. When she went to school, opponents used to throw stones at her. Used to throw dirt on them. 191 years ago, when opening a school for girls was considered a sin, she studied herself and took the initiative to educate other women as well.

Savitribai is the great heroine of the entire country. He worked for every community and religion. When Savitribai used to go to teach girls, people used to throw dirt, mud, dung and even feces on her on the way. Savitribai used to carry a saree in her bag and after reaching school, she would change the soiled saree. She inspires very well to continue on her path.

Savitribai worked together with her husband against evils like untouchability, sati, child marriage and widow remarriage in the 19th century. Another incident related to his life was that he got a woman, Kashibai, who was about to commit suicide, delivered in his house and adopted her child Yashwant as his adopted son. After raising his adopted son Yashwant Rao, he made him a doctor.

While engaged in all these service activities, on March 10, 1897, while serving a child affected by plague, he also got infected and due to this, he died. Savitribai used to serve plague patients during the plague epidemic.

श्रीनिवास रामानुजन् ( Srinivas Ramanujan )

श्रीनिवास रामानुजन् (Srinivas Ramanujan)

श्रीनिवास रामानुजन् ( Srinivas Ramanujan)(जन्म: 22 दिसम्बर 1887, मृत्यु: 20 अप्रैल 1920) एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। जिनका जन्म 22 दिसम्बर 1887 को भारत के दक्षिणी भूभाग में स्थित कोयम्बटूर के ईरोड नामके गांव में हुआ था। वह पारम्परिक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। इनकी माता का नाम कोमलताम्मल और इनके पिता का नाम श्रीनिवास अय्यंगर था। इनका बचपन मुख्यतः कुंभकोणम में बीता था, जो कि अपने प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है।
श्रीनिवास रामानुजन् ( Srinivas Ramanujan )

बचपन में रामानुजन का बौद्धिक विकास सामान्य बालकों जैसा नहीं था। वह तीन वर्ष की आयु तक बोलना भी नहीं सीख पाए थे। लोगों को यह संदेह हो चला था कि कहीं रामानुजन गूंगे तो नहीं हैं। 

प्रारंभिक शिक्षा में इनका कभी भी मन नहीं लगा। बाद में 10 वर्ष की आयु में प्राइमरी परीक्षा में रामानुजन पूरे जिले में सबसे अधिक अंक प्राप्त किए। उन्हें प्रश्न पूछना बहुत ज्यादा पसंद था। उनके प्रश्न अध्यापकों को कभी-कभी बहुत अटपटे लगते थे। जैसे कि संसार में पहला पुरुष कौन था? पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी होती है? 

रामानुजन बहुत शांत स्वभाव के थे। उनका व्यवहार बहुत ही मधुर था। उनका सामान्य से अधिक स्थूल शरीर और जिज्ञासा से भरी आंखें इन्हें एक अलग पहचान देती थी। रामानुजन के सहपाठियों के अनुसार इनका व्यवहार इतना सौम्य था कि कोई भी उनसे नाराज हो ही नहीं सकता था।
श्रीनिवास रामानुजन् ( Srinivas Ramanujan )

प्रारम्भ से ही रामानुजन का गणित के प्रति रुझान बहुत ज्यादा था। एक बार इनके विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने यह भी कहा था कि विद्यालय में होने वाली परीक्षाओं के मापदंड रामानुजन के लिए लागू नहीं होते हैं। हाई स्कूल की परीक्षा में इन्हें गणित और अंग्रेजी में अच्छे अंक लाने के कारण सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और आगे कॉलेज की शिक्षा के लिए प्रवेश भी मिला। रामानुजन का गणित के प्रति प्रेम इतना प्रगाढ़ हो गया था कि वह दूसरे विषयों पर बिल्कुल भी ध्यान ही नहीं देते थे। यहां तक कि वह इतिहास और जीव विज्ञान की कक्षा में भी गणित के प्रश्नों को हल किया करते थे। नतीजा यह हुआ कि रामानुजन 11वीं की कक्षा में गणित छोड़कर बाकी सभी विषयों में फेल हो गए और उनको छात्रवृत्ति मिलनी बंद हो गई। 

घर की आर्थिक स्थिति खराब और ऊपर से छात्रवृत्ति भी नहीं मिल रही थी, जिसकी वजह से रामानुजन को बहुत ही कठिन समय का सामना करना पड़ा। घर की स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने गणित के कुछ ट्यूशन और खाते- बही खाते का काम करना प्रारंभ कर दिया। कुछ समय पश्चात 1907 में रामानुजन ने फिर से 12वीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी और फिर से फेल हो गए और इसी के साथ उनके पारंपरिक शिक्षा की इतिश्री हो गई।          
      
रामानुजन ने वर्ष 1918 में 31 साल की उम्र में गणित के 120 सूत्र लिखे और अपनी शोध को अंग्रेजी प्रोफ़ेसर जी.एच. हार्डी के पास भेजे। हार्डी ने उस शोध को पढ़ा और उन शोध पत्रों से वे अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्हें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (cambridge university) आने का न्योता दिया। फिर अक्टूबर 1918 में रामानुजन को ट्रिनिटी कॉलेज की सदस्यता प्रदान की गयी। ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय थे। 
श्रीनिवास रामानुजन् ( Srinivas Ramanujan )

26 अप्रैल 1920 को मात्र 33 वर्ष की आयु में TB(Tuberculosis) बीमारी के कारण रामानुजन ने अपने जीवन की अंतिम सांस ली। श्रीनिवास जी को खोना सम्पूर्ण विश्व के लिए अपूर्णीय क्षति थी। रामानुजन ने अपने 33 वर्ष के जीवन में 3884 समीकरण बनाये, जिनमें से कई तो आज भी अनसुलझी हैं। गणित में 1729 को रामानुजन नंबर से जाना जाता हैं। भारत के तमिलनाडु राज्य में रामानुजन के जन्मदिन को IT दिवस और भारत में NATIONAL MATHEMATICS DAY रूप में बनाया जाता हैं। श्रीनिवास रामानुजन को “MAN WHO KNEW INFINITY” कहा जाता हैं। 2014 में इनके जीवन में तमिल फिल्म “रामानुजन का जीवन” बनाई गयी थी। 2015 में इन पर एक और फिल्म आई जिसका नाम “THE MAN WHO KNEW INFINTY ” था। 

श्रीनिवास रामानुजन के बारे में रोचक तथ्य | Interesting facts about Srinivasa Ramanujan 
उनकी जीवन कहानी भी उनकी ही तरह रोचक है:
श्रीनिवास रामानुजन् ( Srinivas Ramanujan )
  • महान गणितज्ञ Srinivasa Ramanujan को man Who Knew Infinity कहा जाता है, क्योंकि इनके गणित में दिए योगदान में सबसे ज्यादा सूत्र Infinity सीरीज के थे।
  • क्या आप जानते है, श्रीनिवास रामानुजन जैसे गणितज्ञ कभी स्कूल जाना नही चाहते थे।
  • श्रीनिवास रामानुजन् अपने गणित के पेपर को आधे से कम समय में हल कर लेते थे।
  • इन्होंने 11 वर्ष की उम्र में ही college के लेवल की गणित सिख ली थी। और 13 वर्ष की उम्र आते आते ये अपनी थ्योरम बनाने लग गए थे।
  • गणित में अपनी योग्यता के कारण रामानुजन को कॉलेज से स्कॉलरशिप मिली लेकिन उनका ध्यान हमेशा गणित में रहता। इस कारण वो और विषयो में फेल हो गए और उनकी scholership छीन ली गई।
  • Srinivasa Ramanujan की कहानी में मोड़ जब आया जब वो 22 साल के थे और उनकी शादी 10 साल की जानकी नाम की लड़की से कर दी गई और उनको Hydrocele Testing नाम की एक अंडकोष की बीमारी हो गई। लेकिन रामानुजन के परिवार के पास पैसे ना होने के कारण डॉक्टरों ने उनका इलाज फ्री किया और वो बच गए।
  • श्रीनिवास रामानुजन् एक बार खुदकुशी करने वाले थे, लेकिन समय पर इंग्लैंड पुलिस पहुंच गई और उन्हें जेल ले ही जाने वाले थे कि प्रोफेसर होली ने उनके बारे में पुलिस को बोला की FRS के सदस्य है और कुछ दिन बाद वैज्ञानिक रामानुजन सच में FRS के सदस्य बन गए।     

विश्व पशु कल्याण दिवस 2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022

आज विश्व पशु कल्याण दिवस (World Animal Welfare Day) है। हम सभी इस बात से अवगत हैं कि हर पशु किसी न किसी रूप में हमारे लिए सहायक होते हैं। प्रकृति की संरचना ही कुछ इस प्रकार की गई है कि इसमें हर पशु की या यूँ कहे हर प्राणी, जीव - जंतु, पशु पक्षी की अपनी अलग महत्ता होती है। पशु प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक होते हैं, जो पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण में अहम भूमिका निभाते हैं। पशु प्रकृति के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखते हैं। यही वजह है कि प्रत्येक वर्ष 4 अक्टूबर को विश्व पशु कल्याण दिवस (World Animal Welfare Day) मनाया जाता है।

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

विश्व पशु कल्याण दिवस का आयोजन पहली बार सन 1931 को परिस्थिति विज्ञान शास्त्रियों के सम्मेलन में इटली के फ्लोरेंस शहर में शुरू किया गया था। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य था, विलुप्त हो रहे प्राणियों की रक्षा करना और उन्हें संरक्षण प्रदान करना तथा साथ ही जानवरों पर हो रहे क्रूरता और अत्याचारों को रोकना।

अधिकांशत यह देखा गया है कि आवारा जानवरों के प्रति हमारा व्यवहार बहुत ही घृणित तथा अमानवीय होता है। किसी प्राकृतिक आपदा के समय भी हम इन जानवरों के प्रति दया भाव और प्रेम का व्यवहार प्रगट नहीं करते तथा उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक नहीं होते। हम सिर्फ उन पशुओं के प्रति संवेदनशील होते हैं या प्रेम प्रकट करते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से हमें लाभ पहुंचाते हैं अथवा जिन्हें हम अपने शौक के लिए पालते हैं। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य ही पशु कल्याण मानकों में सुधार लाना और व्यक्तियों के समूह और संगठन का समर्थन प्राप्त करना तथा जानवरों के प्रति प्रेम और स्नेह प्रकट करना है ताकि उनके जीवन को सुरक्षित एवं बेहतर बनाया जा सके। 

विश्व पशु संरक्षण दिवस का इतिहास

Assisi के Francis ने अपने चारों ओर जानवरों की दुर्दशा को अपनी आँखों से देखा था और वे उनके दर्द को ठीक करना चाहते थे।

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

24 मार्च, 1925 को, मूल रूप से विश्व पशु दिवस का आयोजन हेनरिक ज़िमरमैन (1887-1942) नामक एक जर्मन द्वारा किया गया था,जो न केवल एक लेखक थे, बल्कि उन्होने एक द्वि-मासिक पत्रिका भी प्रकाशित की थी, जिसका नाम Mensch und Hund (Man And Dog) था, इसे उन्होंने इस पत्रिका को पशु कल्याण पर अपने विचारों को बढ़ावा देने के लिए एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया और विश्व पशु दिवस समिति की स्थापना के लिए इसका इस्तेमाल किया।

24 मार्च 1925 को, उनकी समिति ने विश्व पशु कल्याण दिवस का आयोजन किया, उन्होंने उस समय के पशु कल्याण मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए बर्लिन, जर्मनी के स्पोर्ट्स पैलेस (Sports Palace of Berlin, Germany)  में इसका आयोजन किया और लगभग 5,000 लोगों ने इस पहले कार्यक्रम में हिस्सा लिया और यह कार्यक्रम सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी (Francis of Assisi) के पर्व के साथ रेखित किया गया था जो 4 अक्टूबर का दिन था।

अगले कुछ वर्षों में, यह कार्यक्रम हर साल आयोजित किया गया और 1929 में, यह 4 अक्टूबर को आयोजित किया गया। अंततः मई 1931 में फ्लोरेंस इटली में अंतर्राष्ट्रीय पशु संरक्षण कांग्रेस (International Animal Protection Congress) द्वारा 4 अक्टूबर को विश्व पशु दिवस मनाने का संकल्प अपनाया गया था।

World Animal Welfare Day 2022: थीम (Theme)

इस साल विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 का थीम "रिकवरिंग की स्पेसीज फॉर इकोसिस्टम रेस्टोरेशन" है।

पिछले वर्ष विश्व पशु कल्याण दिवस 2021 का थीम "Forests and Livelihoods : Sustaining People and Planet"  था।

पशु कल्याण के लिए समय-समय पर अनेक नियम और कानून भी बनाए गए हैं। परंतु इन नियमों और कानूनों की सार्थकता तभी है जब मनुष्य खुद जागरूक हों और इन पशुओं के प्रति संवेदनशील हो, जो अपना दर्द तक भी बयां नहीं कर सकते। 

अंतर राष्ट्रीय पशु दिवस की अवधारणा यह है कि प्रत्येक जानवर एक अनोखा संवेदनात्मक प्राणी है और वह संवेदना और सामाजिक न्याय पाने के योग्य भी है।

English Translate

world animal welfare day 2022

Today is World Animal Welfare Day. We all are aware that every animal is helpful to us in some way or the other. Nature itself has been structured in such a way that every animal or rather every animal, animal, animal bird has its own importance. Animals are one of the most important parts of nature, which play an important role in environmental protection and human welfare. Animals keep nature's ecosystem balanced. This is the reason why World Animal Welfare Day is celebrated every year on 4 October.

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

World Animal Welfare Day was first started in 1931 in the city of Florence, Italy at a conference of ecologists. The main purpose of celebrating this day was to protect and provide protection to the extinct animals as well as to stop cruelty and atrocities on animals.

Mostly it has been seen that our behavior towards stray animals is very disgusting and inhuman. Even during any natural calamity, we do not show kindness and love towards these animals and are not aware of their safety. We are sensitive or show love only to those animals which directly benefit us or which we keep for our hobby. The main purpose of celebrating this day is to improve the animal welfare standards and to get the support of group and organization of individuals and to show love and affection towards animals so that their life can be made safer and better.

History of World Animal Protection Day

Francis of Assisi had seen with his own eyes the plight of the animals around him and wanted to heal their pain.

On March 24, 1925, World Animal Day was originally organized by a German named Heinrich Zimmermann (1887–1942), who was not only a writer, but also published a bi-monthly magazine named Mensch und Hund (Man And Dog), he used this magazine as a medium to promote his views on animal welfare and to establish the World Animal Day Committee.

On 24 March 1925, his committee organized World Animal Welfare Day, he organized it at the Sports Palace of Berlin, Germany, to raise awareness of animal welfare issues of the time, and around 5,000 people took part in this first event and the event was marked with the Feast of St. Francis of Assisi which was the 4th of October.

Over the next few years, the event was held every year and in 1929, it was held on 4 October. Finally, in May 1931, the International Animal Protection Congress in Florence, Italy adopted a resolution to celebrate 4 October as World Animal Day.

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

World Animal Welfare Day 2022: Theme

This year the theme of World Animal Welfare Day 2022 is "Recovering Key Species for Ecosystem Restoration".

Last year the theme of World Animal Welfare Day 2021 was "Forests and Livelihoods: Sustaining People and Planet".

Many rules and regulations have also been made from time to time for animal welfare. But these rules and laws have meaning only when humans themselves are aware and sensitive to these animals, which cannot even express their pain.

The concept of International Animal Day is that each animal is a unique sentient being and is also worthy of compassion and social justice.


औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

Navdurga

9. सिद्धिदात्री (शतावरी) : -

मां का नवा रूप सिद्धिदात्री का है, जिसे नारायणी शतावरी कहते हैं। बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है। शतावरी का नियम पूर्वक सेवन करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर होते हैं।

सिद्धिदात्री (शतावरी)

इस नवरात्रि आपसब को समृद्धि एवं आरोग्य की शुभकामनाओं सहित