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मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ...बालक

मानसरोवर-2 ...बालक (Balak)

बालक - मुंशीप्रेमचंद | Balak - Munshi Premchand

गंगू को लोग ब्राह्मण कहते हैं औऱ वह अपने को ब्राह्मण समझता भी हैं। मेरे सईस और खिदमतगार मुझे दूर से सलाम करते हैं। गंगू मुझे कभी सलाम नहीं करता। वह शायद मुझसे पागलपन की आशा करता है। मेरा जूठा गिलास कभी हाथ से नहीं छूता और न मेरी हिम्मत हुई कि उससे पंखा झलने को कहूँ । जब पसीने से तर होता हूँ और वहाँ कोई दूसरा आदमी नहीं होता, तो गंगू आप-ही-आप पंखा उठा लेता है; लेकिन उसकी मुद्रा से यह भाव स्पष्ट प्रकट होता हैं कि मुझ पर कोई एहसान कर रहा है और मैं भी न-जाने क्यों फौरन ही उसके हाथ से पंखा छीन लेता हूँ। उग्र स्वभाव का मनुष्य है। किसी की बात नहीं सह सकता। ऐसे बहुत कम आदमी होंगे, जिनसे उसकी मित्रता हो; पर सईस और खिदमतगार के साथ बैठना शायद वह अपमानजनक समझता है। मैने उसे किसी से मिलते- जुलते नहीं देखा। आश्चर्य है कि उसे भंग-बूटी से प्रेम नहीं, जो इस श्रेणी के मनुष्यों में एक असाधारण गुण है। मैने उसे कभी पूजा-पाठ करते या नदी में स्नान करते नहीं देखा। बिल्कुल निरक्षर है; लेकिन ब्राह्मण है और चाहता है कि दुनिया उसकी प्रतिष्ठा और सेवा करे और क्यों न चाहे? जब पुरुखों की पैदा की हुई सम्पत्ति पर आज भी लोभ जमाये हुए है औऱ उसी शान से, मानो खुद पैदा किये हो, तो वह क्यों उस प्रतिष्ठा औऱ सम्मान को त्याग दे, जो उसके पुरुखाओं ने संचय किया था? यह उसकी बपौती है।

बालक - मुंशीप्रेमचंद | Balak - Munshi Premchand

मेरा स्वभाव कुछ इस तरह का है कि अपने नौकरों से बहुत कम बोलता हूँ । मैं चाहता हूँ, जब तक न बुलाऊँ, कोई मेरे पास न आये। मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि जरा-सी बातों के लिए नौकरों को आबाज देता फिरूँ। मुझे अपने हाथ से सुराही से पानी उँडेल लेना, अपना लैम्प जला लेना, अपने जूते पहन लेगा या आलमारी से कोई किताब निकाल लेना, इससे कहीं ज्यादा सरल मालूम होता हैं कि हींगन औऱ मैकू को पुकारूँ। इससे मुझे अपनी स्वेच्छा और आत्म विश्वास का बोध होता हैं। नौकर मेरे स्वभाव से परिचित हो गये और बिना जरूरत के मेरे पास बहुत कम आते थे। इसलिए एक दिन जब प्रातःकाल गंगू मेरे सामने आकर खड़ा हो गया तो मुझे बहुत बुरा लगा। ये लोग जब आते हैं, तो पेशगी हिसाब में कुछ माँगने के लिए या किसी दूसरे नौकर की शिकायत करने के लिए। मुझे ये दोनों ही बाते अत्यंत अप्रिय हैं। मैं पहली तारीख को हर एक का वेतन चुका देता हूँ और बीच में जब कोई कोई माँगता हैं, तो क्रोध आ जाता हैं; कौन दो-दो, चार-चार रुपये का हिसाब रखता फिरे। फिर जब किसी को महीने-भर की पूरी मजूरी मिल गयी, तो उसे क्या हक हैं कि उसे पन्द्रह दिन में खर्च कर दे और ऋण या पेशगी की शरण ले, और शिकायतों से तो मुझे घृणा हैं। मैं शिकायतों को दुर्बलता का प्रमाण समझता हूँ, या ठुकरसुहाती की क्षुद्र चेष्ठा।


मैंने माथा सिकोड़ कर कहा- क्या बात हैं, मैंने तो तुम्हें बुलाया नहीं?

गंगू के तीखे अभिमानी मुख पर आज कुछ ऐसी नम्रता, कुछ ऐसी याचना, कुछ ऐसा संकोच था कि मैं चकित हो गया। ऐसा जान पड़ा, वह कुछ जवाब देना चाहता हैं; मगर शब्द नहीं मिल रहे हैं।

मैंने जरा नम्र होकर कहा- आखिर क्या बात हैं, कहते क्यों नहीं? तुम जानते हो, मेरे टहलने का समय हैं। मुझे देर हो रही हैं।

गंगू ने निराशा भरे स्वर में कहा- तो आप हवा खाने जायँ, मैं फिर आ जाऊँगा ।

यह अवस्था और भी चिन्ताजनक थी। इस जल्दी में तो वह एक क्षण में अपना वृत्तान्त कह सुनायेगा। वह जानता हैं कि मुझे ज्यादा अवकाश नहीं हैं। दूसरे अवसर पर तो दुष्ट घंटों रोयेगा। मेरे कुछ लिखने-पढ़ने को तो वह शायद कुछ काम समझता हो; लेकिन विचार को, जो मेरे लिए सबसे कठिन साधना हैं, वह मेरे विश्राम का समय समझता है। वह उसी वक्त आकर मेरे सिर पर सवार हो जायगा।

मैंने निर्दयता से उत्तर दिया- क्या कुछ पेशगी माँगने आये हो? मैं पेशगी नहीं देता।

‘जी नहीं सरकार, मैंने तो कभी पेशगी नहीं माँगा।‘

‘तो किसी की शिकायत करना चाहते हो? मुझे शिकायतों से घृणा हैं?‘

‘जी नहीं सरकार, मैंने तो कभी किसी की शिकायत नहीं की?‘

गंगू ने अपना दिल मजबूत किया। उनकी आकृति से स्पष्ट झलक रहा था, मानो वह कोई छलाँग मारने के लिए अपनी सारी शक्तियों को एकत्र कर रहा था और लड़खड़ाती हुई आवाज में बोला- मुझे आप छुट्टी दे दें। मैं आपकी नौकरी अब न कर सकूँगा ।

यह इस तरह का पहला प्रस्ताव था, जो मेरे कानों में पड़ा। मेरे आत्माभिमान को चोट लगी। मैं जब अपने को मनुष्यता का पुतला समझता हूँ, अपने नौकरों को कभी कटु -वचन नहीं कहता, अपने स्वामित्व को यथासाध्य म्यान में रखने की चेष्ठा करता हूँ, तब मैं इस प्रस्ताव पर क्यों न विस्मित हो जाता! कठोर स्वर में बोला- क्यों, क्या शिकायत हैं?

आपने तो हुजूर, जैसा अच्छा स्वभाव पाया है, वैसा क्या कोई पायेगा; लेकिन बात ऐसी आ पड़ी हैं कि अब मैं आपके यहाँ नहीं रह सकता। ऐसा ने हो कि पीछे से कोई बात हो जाय, तो आपकी बदनामी हो। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से आपकी आबरू में बट्टा लगे।

मेरे दिल में उलझन पैदा हुई। जिज्ञासा की अग्नि प्रचंड हो गयी। आत्म-समर्पण के भाव से बरामदे में पड़ी हुई कुर्सी पर बैठकर बोला- तुम तो पहेलियाँ बुझवा रहे हो। साफ-साफ क्यों नही कहते, क्या मामला हैं।

गंगू ने बड़ी नम्रता से कहा- बात यह है कि वह स्त्री, जो अभी विधवा आश्रम से निकाल दी गयी हैं, वह गोमती देवी…

वह चुप हो गया। मैंने अधीर होकर कहा- हाँ, निकाल दी गयी हैं, तो फिर? तुम्हारी नौकरी से उससे क्या सम्बन्ध?

गंगू ने जैसे अपने सिर का भारी बोझ जमीन पर पटक दिया-

‘मैं उससे विवाह करना चाहता हूँ बाबूजी !‘

मैं विस्मय से उसका मुँह ताकने लगा। यह पुराने विचारों का पोंगा ब्राह्मण जिसे नयी सभ्यता की हवा तक न लगी, उस कुलटा से विवाह करने जा रहा हैं, जिसे कोई भला आदमी अपने घर में कदम भी न रखने देगा। गोमती ने इस मुहल्ले के शान्त वातावरण में थोड़ी-सी हलचल पैदा कर दी। कई साल पहले वह विधवाश्रम में आयी थी। तीन बार आश्रम के कर्मचारियों ने उसका विवाह कर दिया, पर हर बार वह महीने-पन्द्रह दिन के बाद भाग आयी थी। यहाँ तक कि आश्रम के मन्त्री ने अब की बार उसे आश्रम से निकाल दिया था। तब से वह इसी मुहल्ले में एक कोठरी लेकर रहती थी और सारे मुहल्ले के शोहदो के लिए मनोरंजन का केन्द्र बनी हुई थी।

मुझे गंगू की सरलता पर क्रोध भी आया और दया भी। इस गधे को सारी दुनिया में कोई स्त्री ही न मिलती थी, जो इससे ब्याह करने जा रहा हैं। जब वह तीन बार पतियों के पास से भाग आयी, तो इसके पास कितने दिन रहेगी? कोई गाँठ का पूरा आदमी होता, तो एक बात भी थी। शायद साल-छः महीने टिक जाती। यह तो निपट आँख का अन्धा हैं। एक सप्ताह भी तो निबाह न होगा।

मैंने चेतावनी के भाव से पूछा- तुम्हें इस स्त्री की जीवन-कथा मालूम हैं?

गंगू ने आँखो-देखी बात की तरह कहा- सब झूठ है सरकार, लोगों ने हकनाहक उसको बदनाम कर दिया हैं।

‘क्या कहते हो, वह तीन बार अपने पतियों के पास से नहीं भाग आयी?‘

‘उन लोगों ने उसे निकाल दिया, तो क्या करती?‘

‘कैसे बुद्धू आदमी हो! कोई इतनी दूर से आकर विवाह करके ले जाता हैं, हजारों रुपये खर्च करता हैं, इसलिए कि औरत को निकाल दें?‘

गंगू ने भावुकता से कहा- जहाँ प्रेम नहीं है हुजूर, वहाँ कोई स्त्री नहीं रह सकती। स्त्री केवल रोटी कपड़ा ही नहीं चाहती, कुछ प्रेम भी चाहती हैं। वे लोग समझते होंगे कि हमने एक विधवा से विवाह करके उसके ऊपर कोई बडा एहसान किया हैं। चाहते होंगे कि तन-मन से वह उसकी हो जाय, लेकिन दूसरे को अपना बनाने के लिए पहले आप उसका बन जाना पड़ता हैं हजूर। यह बात हैं। फिर उसे एक बीमारी भी हैं। उसे कोई भूत लगा हुआ हैं। यह कभी-कभी बक-झक करने लगती हैं और बेहोश हो जाती हैं।

‘और तुम ऐसी स्त्री से विवाह करोगे?‘ – मैने संदिग्ध भाव से सिर हिलाकर कहा- समझ लो, जीवन कड़वा हो जायगा।

गंगू ने शहीदों के -से आवेश से कहा- मैं तो समझता हूँ, मेरी जिन्दगी बन जायगी बाबूजी, आगे भगवान की मर्जी।

मैने जोर देकर पूछा- तो तुमने तय कर लिया हैं?

‘हाँ, हजूर‘

‘तो मैं तुम्हारा इस्तीफा मंजूर करता हूँ।‘

मैं निरर्थक रूढ़ियों औऱ व्यर्थ के बन्धनों का दास नही हूँ ; लेकिन जो आदमी एख दुष्टा से विवाह करे, उसे अपने यहाँ रखना वास्तव में जटिल समस्या थी। आये- दिन टंट-बखड़े होगे, नयी-नयी उलझनें पैदा होगी, कभी पुलिस दौड़ लेकर आयेगी, कभी मुकदमें खड़े होगे। सम्भव हैं, चोरी की वारदातें भी हों। इस दलदल से दूर रहना ही अच्छा। गंगू क्षूधा-पीड़ित प्राणी की भाँति रोटी का टुकड़ा देखकर उसकी ओर लपक रहा हैं। रोटी जूठी हैं, सूखी हैं, खाने योग्य नहीं हैं, इसकी उसे परवाह नहीं; उसको विचार-बुद्धि से काम लेना कठिन था। मैने उसे पृथक कर देने ही में अपनी कुशल समझी।

पाँच महीने गुजर गये। गंगू ने गोमती से विवाह कर लिया था और उसी मुहल्ले में एक खपरैल का मकान लेकर रहता था। वह अब चाट का खोंचा लगाकर गुजर-बसर करता था। मुझे जब कभी बाजार में मिल जाता, तो मैं उसका क्षेम- कुशल पूछता। मुझे उसके जीवन से विशेष अनुराग हो गया था। यह एक सामाजिक प्रश्न की परीक्षा थी- सामाजिक ही नहीं, मनोवैज्ञानिक भी। मैं देखना चाहता था, इसका परिणाम क्या होता हैं। मैं गंगू को सदैव प्रसन्न-मुख देखता। समृद्धि और निश्चिन्तता के मुख ख पर जो एक तेज और स्वभाव में जो एक आत्म-सम्मान पैदा हो जाता हैं, वह झे यहाँ प्रत्यक्ष दिखायी देता था। रुपये बीस आने की रोज बिक्री हो जाती थी। इसमें से लागत निकालकर आठ-दस आने बच जाते थे। यही उसकी जीविका थी; किन्तु इसमें किसी देवता का वरदान था; क्योंकि इस वर्ग के मनुष्यों में जो निर्लज्जता और विपन्नता पायी जाती हैं, इसका वहाँ चिह्न तक न था। उसके मुख पर आत्म-विश्वास और आनन्द की झलक थी, जो चित्त की शान्ति से ही आ सकती हैं।

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र

एक दिन मैंने सुना कि गोमती गंगू के घर से भाग गयी हैं! कह नहीं सकता क्यों! मुझे इस खबर से एक विचित्र आनन्द हुआ। मुझे गंगू के संतुष्ट और सुखी जीवन पर एक प्रकार की ईर्ष्या होती थी। मैं उसके विषय में किसी अनिष्ट की, किसी घातक अनर्थ की, किसी लज्जास्पद घटना की प्रतिक्षा करता था। इस खबर से इस ईर्ष्या को सान्त्वना मिली। आखिर वही बात हुई, जिसका मुझे विश्वास था। आखिर बचा को अपनी अदूरदर्शिता का दंड भोगना पड़ा। अब देखे, बचा कैसे मुँह दिखाते हैं। अब आँखें खुलेगी और मालूम होगा कि लोग, जो उन्हें इस विवाह से रोक रहे थे, उनके कैसे शुभ-चिन्तक थे। उस वक़्त तो ऐसा मालूम होता था, मानो आपको कोई दुर्लभ पदार्थ मिला जा रहा हो। मानो मुक्ति का द्वार खुल गया हैं। लोगों ने कितना कहा कि यह स्त्री विश्वास के योग्य नहीं है, कितनों को दगा गे चुकी हैं, तुम्हारे साथ भी दगा करेगी, लेकिन कानों पर जूँ तक न रेंगी। अब मिले, तो जरा उसके मिजाज पूछूँ । कहूँ – क्यों महाराज, देवीजी का यह वरदान पाकर प्रसन्न हुए या नहीं? तुम तो कहते थे, वह ऐसी हैं और वैसी हैं, लोग केवल दुर्भावना के कारण दोष आरोपित करते हैं। अब बतलाओ, किसकी भूल थी?

उसी दिन संयोगवश गंगू से बाजार में भेट हो गयी। घबराया हुआ था, बदहवास था, बिल्कुल खोया हुआ। मुझे देखते ही उसकी आँखों में आँसू भर आये, लज्जा से नहीं व्यथा से। मेरे पास आकर बोला- बाबूजी, गोमती ने मेरे साथ विश्वासघात किया। मैने कुटिल आनन्द से, लेकिन कृमित्र सहानुभूति दिखाकर कहा- तुमसे तो मैने पहले ही कहा था; लेकिन तुम माने ही नहीं, अब सब्र करो। इसके सिवा और क्या उपाय हैं। रूपये पैसे ले गयी या कुछ छोड़ गयी?

गंगू ने छाती पर हाथ रखा। ऐसा जान पड़ा, मानो मेरे इस प्रश्न ने उसके हृदय को विदीर्ण कर दिया।

‘अरे बाबूजी, ऐसा न कहिए, उसने धेले की भी चीज नहीं छूई । अपना जो कुछ था, वह भी छोड़ गयी। न-जाने मुझमें क्या बुराई देखी। मैं उसके योग्य न था और क्या कहूँ । वह पढ़ी-लिखी थी, मैं करिया अक्षर भैंस बराबर। मेरे साथ इतने दिन रही, यहीं बहुत हैं। कुछ दिन औऱ उसके साथ रह जाता, तो आदमी बन जाता। उसका आपसे कहाँ तक बखान करूँ हजूर। औरों के लिए चाहे जो कुछ रही हो, मेरे लिए तो किसी देवता का आशीर्वाद थी। न-जाने मुझेस क्या खता हो गयी। मगर कसम ले लीजिए, जो उसके मुख पर मैल तक आया हो। मेरी औकात ही क्या हैं बाबूजी ! दस-बराबर आने का मजूर हूँ ; पर इसी में उसके हाथो इतनी बरक्कत थी कि कभी कमी नहीं पड़ी।’

मुझे इन शब्दों से घोर निराशा हुई। मैने समझा था, वह उसकी वेवफाई की कथा कहेगा और मैं उसकी अन्ध-भक्ति पर कुछ सहानुभूति प्रकट करूँगा; मगर उस मूर्ख की आँखें अब तक नहीं खुली। अब भी उसी का मंत्र पढ़ रहा हैं। अवश्य ही इसका चित्त कुछ अव्यवस्थित हैं।

मैने कुटिल परिहास किया- तो तुम्हारे घर से कुछ नहीं ले गयी?

‘कुछ भी नहीं बाबूजी, धेले की भी चीज नहीं।’

‘और तुमसे प्रेम भी बहुत करती थी?’

‘अब आपसे क्या कहूँ बाबूजी, वह प्रेम तो मरते दम तक याद रहेगा।’

‘फिर भी तुम्हें छोड़कर चली गयी?’

‘यहीं तो आश्चर्य हैं बाबूजी !’

‘त्रिया-चरित का नाम कभी सुना हैं?’

‘अरे बाबूजी जी, ऐसा न कहिए। मेरी गर्दन पर कोई छुरी रख दे, तो भी मैं उसका यश ही गाऊँगा ।’

‘तो फिर ढूँढ निकालो!’

‘हाँ, मालिक। जब तक उसे ढूँढ न लाऊँगा, मुझे चैन न आयेगा। मुझे इतना मालूम हो जाय कि वह कहाँ हैं, फिर तो मैं उसे ले ही आऊँगा ; और बाबूजी, मेरा दिल कहता हैं कि वह आयेगी जरूर। देख लीजिएगा। वह मुझसे रूठकर नही गयी; लेकिन दिल नहीं मानता। जाता हूँ, महीने-दो-महीने जंगल, पहाड़ की धूल छानूँगा। जीता रहा तो फिर आपके दर्शन करूँगा।’

यह कह कह वह उन्माद की दशा में एक तरफ चल दिया।

इसके बाद मुझे एक जरूरत से नैनीताल जाना पड़ा। सैर करने के लिए नहीं।

एक महीने बाद लौटा, और अभी कपड़े भी न उतारने पाया था कि देखता हूँ, गंगू एक नवजात शिशु को गोद में लिये खड़ा हैं। शायद कृष्ण को पाकर नन्द भी इतने पुलकित न हुए होंगे। मालूम होता था, उसके रोम-रोम से आनन्द फूटा पड़ता हैं। चेहरे और आँखों से कृतज्ञता और श्रद्धा के राग से निकल रहे थे। कुछ वही भाव था, जो किसी क्षुधा-पीड़ित भिक्षुक के चेहरे पर भरपेट भोजन करने के बाद नजर आता हैं।

मैंने पूछा- कहो महाराज, गोमती देवी का कुछ पता लगा, तुम तो बाहर गये थे?

गंगू ने आपे में न समाते हुए जवाब दिया- हाँ बाबूजी, आपके आशीर्वाद से ढूँढ लाया। लखनऊ के जनाने अस्पताल में मिली। यहाँ एक सहेली से कह गयी थी अगर वह बहुत घबरायें तो बतला देना। मैं सुनते ही लखनऊ भागा औऱ उसे घसीट लाया। घाते में यह बच्चा भी मिल गया

उसने बच्चे को उठाकर मेरी तरफ बढ़ाया। मानो कोई खिलाड़ी तमगा पाकर दिखा रहा हो।

मैने उपहास के भाव से पूछा- अच्छा, यह लड़का भी मिल गया? शायद इसीलिए वह यहाँ से भागी थी। हैं तो तुम्हार ही लड़का?

‘मेरा काहे को हैं बाबूजी, आपका हैं, भगवान का हैं।’

‘तो लखनऊ में पैदा हुआ?’

‘हाँ बाबूजी जी, अभी तो क एक महीने का हैं।’

‘तुम्हारे ब्याह हुए कितने दिन हुए?’

‘यह सातवां महीना चल रहा हैं।’

‘तो शादी के छठे महीने पैदा हुआ?’

‘और क्या बाबूजी ।’

‘फिर भी तुम्हारा लड़का हैं?’

‘हाँ, जी।’

‘कैसी बे-सिर की बात कर रहे हो?’

मालूम नही, वह मेरा आशय समझ रहा था, या बन रहा था। उसी निष्कपट भाव से बोला- मरते-मरते बची, बाबूजी नया जनम हुआ। तीन दिन, तीन रात छटपटाती रही। कुछ न पूछिए।

मैने अब जरा व्यंग्य-भाव से कहा- लेकिन छः महीने में लड़का होते आज ही सुना।

यह चोट निशाने पर जा बैठी।

मुसकराकर बोला- अच्छा, वह बात! मुझे तो उसका ध्यान ही नही आया। इसी भय से तो गोमती भागी थी। मैने कहा- गोमती, अगर तुम्हारा मन मुझसे नहीं मिलता, तो तुम मुझे छोड़ दो। मैं अभी चला जाऊँगा और फिर कभी तुम्हारे पास न आऊँगा । तुमको जब कुछ काम पड़े तो मुझे लिखना, मैं भरसक तुम्हारी मदद करूँगा। मुझे तुमसे कोई मलाल नहीं हैं। मेरे आँखो में तुम अब भी उतनी ही भली हो। अब भी मैं तुम्हें उतना ही चाहता हूँ । नहीं, अब मैं तुम्हें और ज्यादा चाहता हूँ ; लेकिन अगर तुम्हारा मन मुझसे फिर नहीं गया हैं, तो मेरे साथ चलो। गंगू जीते-जी तुमसे बेवफाई नहीं करेगा। मैने तुमसे इसलिए विवाह नहीं किया कि तुम देवी हो; बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हें चाहता था औऱ सोचता था कि तुम भी मुझे चाहती हो। यह बच्चा मेरा बच्चा हैं, मेरा अपना बच्चा हैं। मैने एक बोया हुआ खेत लिया, तो क्या फसल को इसलिए छोड़ दूँगा, कि उसे दूसरे ने बोया था?

यह कहकर उसने जोर से ठट्ठा मारा।

मैं कपड़े उतारना भूल गया। कह नहीं सकता, क्यों मेरी आँखें सजल हो गयीं। न- जाने कौन-सी शक्ति थी, जिसने मेरी मनोगत घृणा को दबाकर मेरे हाथों को बढ़ा दिया। मैंने उस निष्कलंक बालक को गोद में ले लिया और इतने प्यार से उसका चुम्बन लिया कि शायद अपने बच्चों का भी न लिया होगा।

गंगू बोला- बाबूजी, आप बड़े सज्जन हैं। मै गोमती से बार-बार आपका बखान किया करता हूँ। कहता हूँ, चल, एक बार उनके दर्शन कर आ; लेकिन मारे लाज के आती ही नही।

मैं और सज्जन! अपनी सज्जनता का पर्दा आज मेरी आँखों से हटा। मैने भक्ति में डूबे हुए स्वर में कहा- नहीं जी, मेरे-जैसे कलुषित मनुष्य के पास वह क्या आयेगी। चलो, मैं उनके दर्शन करने चलता हूँ । तुम मुझे सज्जन समझते हो? मैं ऊपर से सज्जन हूँ ; पर दिल का कमीना हूँ । असली सज्जनता तुममें है और यह बालक वह फूल हैं, जिससे तुम्हारी सज्जनता की महक निकल रही हैं।

मैं बच्चे को छाती से लगाये हुए गंगू के साथ चला।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ...दूध का दाम

मानसरोवर-2 ...दूध का दाम (Doodh ka Daam)

दूध का दाम - मुंशीप्रेमचंद | Doodh ka Daam - Munshi Premchand

अब बड़े-बड़े शहरों में दाइयाँ, नर्से और लेडी डॉक्टर, सभी पैदा हो गयी हैं; लेकिन देहातों में जच्चेखानों पर अभी तक भंगिनों का ही प्रभुत्व हैं और निकट भविष्य में इसमें तब्दीली होने की आशा नहीं। बाबू महेशनाथ अपने गाँव के जमींदार थे, शिक्षित थे और जच्चेखानों में सुधार की आवश्यकता को मानते थे, लेकिन इसमें जो बाधाएँ थी, उन पर विजय कैसे पाते? कोई नर्स देहात जाने पर राजी न हुई औऱ बहुत कहने-सुनने से राजी भी हुई, तो इतनी लम्बी-चौड़ी फीस माँगी कि बाबू साहब को सिर झुकाकर चले आने के सिवा और कुछ न सूझा। लेडी डॉक्टर के पास जाने की उन्हें हिम्मत पड़ी। उसकी फीस अदा करने के लिए तो शायद बाबू साहब को अपनी आधी जायदाद बेचनी पड़ती; इसलिए जब तीन कन्याओं के बाद वह चौथा लड़का पैदा हुआ, तो फिर वहीं गूदड़ था और वहीं गूदड़ की बहू । बच्चे अक्सर रात ही को पैदा होते हैं। एक दिन आधीरात को चपरासी ने गूदड़ के द‌्वार पर ऐसी हाँक लगायी कि पास-पड़ोस में भी जाग पड़ गयी। लड़की न थी कि मरी आवाज से पुकारता।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ...दूध का दाम

गूदड़ के घर में इस शुभ अवसर के लिए महीनों से तैयारी हो रही थी। भय था तो यही कि फिर बेटी न हो जाय, नहीं तो वहीं बँधा हुआ एक रुपया और एक साड़ी मिलकर रह जायगी। इस विषय में स्त्री-पुरुष में कितने ही बार झगड़ा हो चुका था, शर्त लग चुकी थी। स्त्री कहती थी- अगर अबकी बेटा न हो तो मुँह न दिखाऊँ, हाँ-हाँ, मुँह न दिखाऊँ, सारे लच्छन बेटे के हैं। और गुदड़ कहता था- देख लेना, बेटी होगी और बीच खेत बेटी होगी। बेटा निकले तो मूँछें मुँड़ा लूँ, हाँ-हाँ, मूँछें मुँड़ा लूँ। शायद गूदड़ समझता था कि इस तरह अपनी स्त्री के पुत्र-कामना को बलवान करके वह बेटे की अवार्ड के लिए रास्ता साफ कर रहा हैं।

भूँगी बोली- अब मूँछ मुँड़ा ले दाढ़ीजार! कहती थी, बेटा होगा। सुनता ही न था। अपनी रट लगाये जाता था। मैं आज तेरी मूँछें मूँडूँगी, खूँटी तक तो रखूँगी ही नहीं।

गूदड़ ने कहा- अच्छा मूँड़ लेना भलीमानस! मूँछें क्या फिर न निकलेगी ही नहीं? तीसरे दिन देख लेना, फिर ज्यों-की-त्यों हैं, मगर जो कुछ मिलेगा, उसमें आधा रखा लूँगा, कहे देता हूँ।

भूँगी ने अँगूठा दिखाया और अपने तीन महीने के बालक को गूदड़ के सुपुर्द कर सिपाही के साथ चल खड़ी हुई।

गूदड़ ने पुकारा- अरी! सुन तो, कहाँ भागी जाती हैं? मुझे भी बधाई बजाने जाना पड़ेगा। इसे कौन सँभालेगा?

भूँगी ने दूर ही से कहा- इसे वहीं धरती पर सुला लेना। मैं आके दूध पिला जाऊँगी ।

महेशनाथ के यहाँ अब भूँगी की खूब खातिरदारियाँ होने लगीं। सबेरे हरीरा मिलता, दोपहर को पूरियाँ और हलवा, तीसरे पहर को फिर और रात को फिर और गूदड़ को भी भरपूर परोसा मिलता था। भूँगी अपने बच्चे को दिन-रात में एक-दो बार से ज्यादा न पिला सकती थी। उसके लिए ऊपर के दूध का प्रबन्ध था। भूँगी का दूध बाबूसाहब का भाग्यवान बालक पीता था। और यह सिलसिला बारहवें दिन भी न बन्द हुआ। मालकिन मोटी-ताजी देवी थी; पर अब की कुछ ऐसा संयोग था कि उन्हें दूध हुआ ही नहीं। तीनों लड़कियों की बार इतने इफरात से दूध होता था कि लड़कियों को बदहजमी हो जाती थी। अब की बार एक बूँद नहीं, भूँगी दाई भी थी और दूध-पिलाई भी।

मालकिन कहती- भूँगी, हमारे बच्चे को पाल दे, फिर जब तक तू जिये, बैठी खाती रहना। पाँच बीघे माफी दिलवा दूँगी। नाती-पोते तक चैन करेंगे।

और भूँगी का लाड़ला ऊपर का दूध हजन न कर सकने के कारण बार-बार उलटी करता और दिन-दिन दुबला होता जाता था।

भूँगी कहती- बहुजी, मूँडन में चूड़े लूँगी, कहे देती हूँ।

बहूजी उत्तर देती- हाँ हाँ, चूड़े लेना भाई, धमकाती क्यों हैं? चाँदी के लेगी या सोने के।

‘वाह बहूजी! चाँदी के पहन के किसे मूँह दिखाऊँगी और किसकी हँसी होगी?’

‘अच्छा सोने के लेना भाई, कह तो दिया।’

‘और ब्याह में कंठा लूँगी और चौधरी(गूदड़) के लिए हाथों के तोड़े।’

‘वह भी लेना, भगवान वह दिन तो दिखावे।’

घर की मालकिन के बाद भूँगी का राज्य था। महरियाँ, महराजिन, नौकर-चाकर सब उसका रोब मानते थे। यहाँ तक कि खुद बहूजी भी उससे दब जाती थी। एक बार तो उसने महेशनाथ को भी डाँटा था। हँसकर टाल गये। बात चली थी भंगियों की। महेशनाथ ने कहा था- दुनिया में और चाहे जो कुछ भी हो जाय, भंगी भंगी ही रहेंगे। इन्हें आदमी बनाना कठिन हैं।

इस पर भूँगी ने कहा था- मालिक, भंगी तो बड़ो-बड़ो को आदमी बनाते हैं, उन्हें कोई क्या आदमी बनाये।

यह गुस्ताखी करके किसी दूसरे अवसर पर भला भूँगी के सिर के बाल बच सकते थे? लेकिन आज बाबूसाहब उठाकर हँसे और बोले- भूँगी बात बड़े पते की कहती हैं।

भूँगी का शासनकाल साल-भर से आगे न चल सका। देवताओं ने बालक के भंगिन का दूध पीने पर आपत्ति की, मोटेराम शास्त्री तो प्रायश्चित का प्रस्ताव कर बैठे। दूध तो छुड़ा दिया गया; लेकिन प्रायश्चित की बात हँसी में उड़ गयी महेशनाथ ने फटकारकर कहा- प्रायश्चित की खूब कहीं शास्त्रीजी, कल तक तो उसी भंगिन का दूध पीकर पला, अब उससे छूत घुस गयी। वाह रे आपका धर्म।

शास्त्रीजी शिखा फटकारकर बोले- यह सत्य हैं, वह कल तक भंगिन का रक्त पीकर पला। माँस खाकर पला, यह भी सत्य हैं; लेकिन कल की बात कल थी, आज की बात आज। जगन्नाथपुरी में छूत-अछूत सब एक पंगत में खाते हैं; पर यहाँ तो नहीं खा सकते। बीमारी में तो हम भी कपड़े पहने खा लेते हैं, खिचड़ी तक खा लेते हैं बाबूजी ; लेकिन अच्छे हो जाने पर तो नेम का पालन करना ही पड़ता हैं। आपद्धर्म की बात न्यारी हैं।

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र

‘तो इसका यह अर्थ हैं कि धर्म बदलता रहता हैं- कभी कुछ, कभी कुछ?’

‘और क्या! राजा का धर्म अलग, प्रजा का धर्म अलग, अमीर का धर्म अलग, गरीब का अलग, राजे-महाराजे जो चाहें खायँ, जिसके साथ चाहें खायँ, जिसके साथ चाहें शादी-ब्याह करें, उनके लिए कोई बन्धन नहीं। सर्मथ पुरुष हैं। बन्धन तो मध्यवालो के लिए हैं।‘

प्रायश्चित को न हआ; लेकिन भूँगी को गद्दी से उतरना पड़ा! हाँ, दान-दक्षिणा इतनी मिली कि वह अकेले ले न जा सकी और सोने के चूड़े भी मिले। एक की जगह दो नयी, सुन्दर साड़ियाँ- मामूली नैनसुख की नहीं, जैसी लड़कियों की बार मिली थीं।

इसी साल प्लेग ने जोर बाँधा और गूदड़ पहले ही चपेट मे आ गया। भूँगी अकेली रह गयी; पर गृहस्थी ज्यों-की-त्यों चलती रही। लोग ताक लगाये बैंठे थे कि भूँगी अब गयी। फलाँ भंगी से बातचीत हुई, फलाँ चौधरी आये, लेकिन भूँगी न कहीं आयी, न कहीं गयीं, यहाँ तक कि पाँच साल बीत गये और बालक मंगल, दब दुर्बल और सदा रोगी रहने पर भी, दौड़ने लगा। सुरेश के सामने पिद्दी-सा लगता था।

एक दिन भूँगी महेशनाथ के घर का परनाला साफ कर रही थी। महीनों से गलीज जमा हो रहा था। आँगन में पानी भरा रहने लगा था। परनाले में एक लम्बा मोटा बाँस डालकर जोर से हिला रही थी। पूरा दाहिना हाथ परनाले के अन्दर था कि एकाएक उसने चिल्लाकर हाथ बाहर निकल लिया और उसी वक़्त एक काला साँप परनाले से निकलकर भागा। लोगों ने दौड़कर उसे मार तो डाला; लेकिन भूँगी को न बचा सके। समझे; पानी का साँप हैं, विषैला न होगा, इसलिए पहले कुछ गफलत की गयी। जब विष देह में फैल गया और लहरें आने लगीं, तब पता चला कि वह पानी का साँप नहीं, गेहुँवन था।

मंगल अब अनाथ था। दिन-भर महेशबाबू के द्‌वार पर मँडराया करता। घर में जूठन इतना बचता था कि ऐसे-ऐसे दस बालक पल सकते थे। खाने की कोई कमी न थी। हाँ, उसे बुरा जरूर लगता था, जब उसे मिट्टी के कसोरों में ऊपर से खाना दिया जाता था। सब लोग अच्छे-अच्छे बरतनों मे खाते हैं, उसके लिए मिट्टी के कसोरे!

यों उसे इस भेद भाव का बिल्कुल ज्ञान न होता था; लेकिन गाँव के लड़के चिढ़ा- चिढ़ाकर उसका अपमान करते रहते थे। कोई उसे अपने साथ खेलाता भी न था। यहाँ तक कि जिस टाट पर वह सोता था, वह भी अछूत थी। मकान के सामने एक नीम का पेड़ था। इसी के नीचे मंगल का डेरा था। एक फटा-सा टाट का टुकड़ा, दो मिट्टी के कसोरे और एक धोती, जो सुरेशबाबू की उतारन थी, जाड़ा, गरमी, बरसात हरेक मौसम में वह जगह एक-सी आरामदेह थी और भाग्य का बली मंगल झुलसती हुई लू, गलते हुए जाड़े और मूसलाधार वर्षा में भी जिन्दा और पहले से कहीं स्वस्थ था। बस, उसका कोई अपना था, तो गाँव को एक कुत्ता, जो अपने सहवर्गियों के जुल्म से दख दुखी होकर मंगल की शरण आ पड़ा था। दोनों एक ही खाना खाते, एक ही टाट पर सोते, तबीअत भी दोनों की एक-सी थी और दोनों एक दूसरे के स्वभाव को जान गये थे। कभी आपस में झगड़ा न होता।

गाँव के धर्मात्मा लोग बाबूसाहब की इस उदारता पर आश्चर्य करते। ठीक द्‌वार के सामने- पचास हाथ भी न होगा – मंगल का पड़ा रहना उन्हें सोलहों आने धर्म-विरुद्ध जान पड़ता। छिः ! यहीं हाल रहा, तो थोड़े ही दिनों में धर्म का अन्त ही समझों। भंगी को भी भगवान ने ही रचना हैं, यह हम भी जानते हैं। उसके साथ हमें किसी तरह का अन्याय न करना चाहिए, यह किसे नही मालूम ? भगवान का तो नाम ही पतित-पावन हैं; लेकिन समाज की मर्यादा भी कोई वस्तु हैं! उस द्‌वार पर जाते हुए संकोच होता हैं। गाँव का मालिक हैं, जाना तो पड़ता ही हैं; लेकिन बस यहीं समझ लो कि घृणा होती हैं।

मंगल और टामी में गहरी बनती हैं। मंगल कहता – देखों भाई टामी, जरा और खिसककर सोओ। आखिर मैं कहा लेटूँ ? सारा टाट तो तुमने घेर लिया।

टामी कूँ-कूँ करता, दुम हिलाता और खिसक जाने के बदले और ऊपर चढ़ आता एवं मंगल का मुँह चाटने लगता।

शाम को वह एक बार रोज अपना घर देखने और थोड़ी देर रोने जाता। पहले साल फूस का छप्पर गिर पड़ा, दूसरे साल एक दीवार गिरी और अब केवल आधी- आधी दीवारें खड़ी थी, जिनका ऊपर का भाग नोकदार हो गया था। यही उसके स्नेह की सम्पत्ति मिली। वही स्मृति, वही आकर्षण, वही प्यार उसे एक बार उस उजड़ में खिच ले जाती थी और टामी सदैव उसके साथ होता था। मंगल नोकदार दीवार पर बैठ जाता और जीवन के बीते और आनेवाले स्वप्न देखने लगता और बार-बार उछल कर उसकी गोद में बैठने की असफल चेष्ठा करता।

एक दिन कई लड़के खेल रहे थे। मंगल भी पहुँच कर दूर खड़ा हो गया। या तो सुरेश को उस पर दया आयी, या खेलनेवालों की जोड़ी पूरी न पड़ती थी, कह नहीं सकते। जो कुछ भी हो, तजवीज की कि आज मंगल को भी खेल में शरीक कर लिया जाय। यहाँ कौन देखने आता हैं। क्यों रे मंगल, खेलेगा।

मंगल बोला- ना भैया, कहीं मालिक देख ले, तो मेरी चमड़ी उधेड़ दी जाय। तुम्हें म्हें क्या, तुम तो अलग हो जाओगे।

सुरेश ने कहा- तो यहाँ कौन आता हैं देखने बे? चल, हम लोग सवार-सवार खेलेगे। तू घोड़ा बनेगा, हम लोग तेरे ऊपर सवारी करके दौड़ायेंगे?

मंगल ने शंका की- मैं बराबर घोड़ा ही रहूँगी, कि सवारी भी करूँगा? यह बता दो।

यह प्रश्न टेढ़ा था। किसी ने इस पर विचार न किया था। सुरेश ने एक क्षण विचार करके कहा- तुझे कौन अपनी पीठ पर बिठायेगा, सोच? आखिर तू भंगी हैं कि नहीं?

मंगल भी कड़ा हो गया। बोला- मैं कब कहता हूँ कि मैं भंगी नहीं हूँ, लेकिन तुम्हें मेरी ही माँ ने अपना दूध पिलाकर पाला हैं। जब तब मुझे भी सवारी करने को न मिलेगी, मैं घोड़ा न बनूँगा। तुम लोग बड़े चघड़ हो। आप तो मजे से सवारी करोगे और मैं घोड़ा ही बना रहूँ ।

सुरेश ने डाँट कर कहा, तुझे घोड़ा बनना पड़ेगा और मंगल को पकड़ने दौड़ा। मंगल भागा। सुरेश ने दौड़ाया। मंगल ने कदम और तेज किया। सुरेश ने भी जोर लगाया; मगर वह बहुत खा-खाकर थुल-थुल हो गया था और दौड़ने में उसकी साँस फूलने लगी।

आखिर उसने रूक कर कहा- आकर घोड़ा बनो मंगल, नहीं तो कभी पा जाऊँगा, तो बुरी तरह पीटूँगा।

‘तुम्हें भी घोड़ा बनना पड़ेगा।’

‘अच्छा हम भी बन जायँगे।’

‘तुम पीछे से निकल जाओगे। पहले तुम घोड़ा बन जाओ। मैं सवारी कर लूँ, फिर मैं बनूँगा।’

सुरेश ने सचमुच चकमा देना चाहा था। मंगल का यह मुतालबा सुनकर साथियों से बोला- देखते हो इसकी बदमाशी, भंगी हैं न!

तीनों ने मंगल को घेर लिया और जबरदस्ती घोड़ा बना दिया। सुरेश ने चटपट उसकी पीठ पर आसन जमा दिया और टिकटिक करके बोला- चल घोड़े, चल!

मंगल कुछ देर तर तो चला, लेकिन बोझ से उसकी कमर टूटी जाती थी। उसने धीरे से पीठ सिकोड़ी और सुरेश की रान के नीचे से सरक गया। सुरेश महोदय लद से गिर पड़े और भोंपू बजाने लगे।

माँ ने सुना, सुरेश कहीं रो रहा हैं। सुरेश कहीं रोये, तो उनके तेज कानों में जरूर भनक पड़ जाती थी और उसका रोना भी बिल्कुल निराला होता था, जैसे छोटी लाइन के इंजन की आवाज।

महरी से बोली- देख तो, सुरेश कहीं रो रहा हैं, पूछ तो किसने मारा हैं।

इतने में सुरेश खुद आँख मलता हुआ आया। उसे जब रोने का अवसर मिलता था, तो माँ के पास फरियाद लेकर जरूर आता था। माँ मिठाई या मेवे देकर आँसू पोंछ देती थी। आप थे तो आठ साल के, मगर थे बिल्कुल गावदी। हद से ज्यादा प्यार ने उसकी बुद्धि के साथ वहीं किया, जो हद से ज्यादा भोजन ने उसकी देह के साथ।

माँ ने पूछा- क्यो रोता हैं, किसने मारा?

सुरेश ने रोकर कहा- मंगल ने छू दिया।

माँ को विश्वास न आया। मंगल इतना निरीह थी कि उससे किसी तरह की शरारत की शंका न थी; लेकिन सुरेश कसमें खाने लगा, तो विश्वास करना लाजिम हो गया। मंगल को बुलाकर डाँटा- क्यों रे मंगल, अब तुझे बदमाशी सूझने लगी। मैने तुझसे कहा था, सुरेश को कभी मत छूना, याद हैं कि नहीं, बोल।

मंगल ने दबी आवाज से कहा- याद क्यों नहीं हैं।

‘तो फिर तूने उसे क्यों छुआ?’

‘मैने नहीं छुआ।’

‘तून नहीं छुआ, तो वह रोता क्यो था?’

‘गिर पड़े, इससे रोने लगे।’

चोरी और सीनाजोरी। देवीजी दाँत पीसकर रह गयी। मारती, तो उसी दम स्नान करना पड़ता। छड़ी तो हाथ में लेनी ही पड़ती और छूत का विद्‌युत-प्रवाह इस छड़ी के रास्ते उनकी देह में पैवस्त हो जाता, इसलिए जहाँ तक गालियाँ दे सकी, दी और हुक्म दिया कि अभी-अभी यहाँ से निकल जा। फिर जो इस द्‌वार पर तेरी सूरत नजर आयी, तो खून ही पी जाऊँगी । मुफ्त को रोटियाँ खा-खाकर शरारत सूझती हैं; आदि।

मंगल में गैरत तो क्या थी, हाँ, डर था। चुपके से अपने सकोरे उठाये, टाट का टुकड़ा बगल में दबाया, धोती कन्धे पर रखी और रोता हुआ वहाँ से चल पड़ा। अब वह यहाँ कभी न आयेगा। यही तो होगा कि भूखों मर जायगा। क्या हरत हैं? इस तरह जीने से फायदा ही क्या? गाँ में उसके लिए और कहाँ ठिकाना था? भंगी को कौन पनाह देता? उसी खंडहर की ओर चला, जहाँ भले दिनों की स्मृतियाँ उसके आँसू पोंछ सकती थी और खूब फूट-फूटकर रोया।

उसी क्षण टामी भी उसे ढूँढता हुआ पहुँचा और दोनों फिर अपनी व्यथा भूल गये।

लेकिन ज्यों-ज्यों दिन का प्रकाश क्षीण होता जाता था, मंगल की ग्लानि भी क्षीण होती जाती थी। बचपन को बेचैन करने वाली भूख देह का रक्त पी-पीकर और भी बलवान होती जाती थी। आँखे बार-बार कसोंरों की ओर उठ जाती। कहाँ अब तक सुरेश की जूठी मिठाईयाँ मिल गयी होती। यहाँ क्या धूल फाँके ?

उसने टामी से सलाह की- खाओगे क्या टामी? मैं तो भूखा लेट रहूँगा।

टामी ने कूँ-कूँ करके शायद कहा- इस तरह अपमान तो जिन्दगी भर सहना हैं। यों हिम्मत हारोगे, तो कैसे काम चलेगा? मुझे देखो न, कभी किसी ने डंडा मारा, चिल्ला उठा, फिर जरा देर बाद दुम हिलाता हुआ उसके पास जा पहुँचा। हम-तुम दोनो इसीलिए बने हैं भाई!

मंगल ने कहा- तो तुम जाओ, जो कुछ मिले खा लो, मेरी परवाह न करो।

टामी ने अपनी श्वास-भाषा में कहा- अकेला नहीं जाता, तुम्हें साथ लेकर चलूँगा।

‘मैं नहीं जाता।’

‘तो मैं भी नहीं जाता।’

‘भूखों मर जाओगे।’

‘तो क्या तुम जीते रहोगे?’

‘मेरा कौन बैठा हैं, जो रोयगा ’

‘यहाँ भी वही हाल हैं भाई, क्वार में जिस कुतिया से प्रेम किया था, उसने बेवफाई की और अब कल्लू के साथ हैं। खैरियत यही हुई कि अपने बच्चे लेती गयी, नहीं तो मेरी जान गाढ़े में पड़ जाती। पाँच-पाँच बच्चों को कौन पालता?’

एक क्षण के बाद भूख ने एक दूसरी युक्ति सोच निकाली।

‘मालकिन हमें खोज रहीं होगी, क्या टामी?’

‘और क्या? बाबूजी और सुरेश खा चुके होगे। कहार ने उनकी थाली से जूठन निकाल लिया होगा और हमे पुकार रहा होगा।’

‘बाबूजी और सुरेश की थालियों में घी खूब रहता हैं और वह मीठी-मीठी चीज- हाँ मलाई।’

‘सब-का-सब घूरे पर डाल दिया जायगा।’

‘देखे, हमें खोजने कोई आता हैं?’

खोजने कौन आयेगा; क्या कोई पुरोहित हो? एक बार ‘मंगल-मंगल‘ होगा और बस, थाली परनाले में उँडेल दी जायेगी।

‘अच्छा, तो चलो चले। मगर मै छिपा रहूँगा, अगर किसी ने मेरा नाम लेकर न पुकारा ; तो मैं लौट आऊँगा । यह समझ लो।’

दोनो वहाँ से निकले और आकर महेशनाथ के द्‌वार पर अँधेरे में दबकर खड़े हो गये; मगर टामी को सब्र कहाँ? वह धीरे से अन्दर घुस गया। देखा, महेशनाथ और सुरेश थाली पर बैठ गये। बरोठे में धीरे से बैठ गया, मगर डर रहा था कि कोई डंडा न मार दे।

नौकर में बातचीत हो रही था। एक ने कहा- आज मँगलवा नहीं दिखायी देता। मालकिन मे डाँटा, इससे भागा हैं साइत।

दूसरे ने जवाब दिया- अच्छा हुआ, निकाल दिया गया। सबेरे-सबेरे भंगी का मुँह देखना पड़ता था।

मंगल और अँधेरे में खिसक गया। आशा गहरे जल में डूब गयी।

महेशनाथ थाली से उठ गये। नौकर हाथ धुला रहा था। अब हुक्का पीयेंगे और सोयेंगे। सुरेश अपनी माँ के पास बैठा कोई कहानी सुनता-सुनता सो जायगा! गरीब मंगल की किसे चिन्ता? इतनी देर हो गयी, किसी ने भूल से भी न पुकारा।

कुछ देर तक वह निराश-सा खड़ा रहा, फिर एक लम्बी साँस खींचकर जाना ही चाहता था कि कहार पत्तल में थाली की जूठन ले जाता नजर आया।

मंगल अँधेरे से निकलकर प्रकाश में आ गया। अब मन को कैसे रोके ?

कहार ने कहा- अरे, तू यहाँ था? हमने समझा कि कहीं चला गया। ले, खा ले; मै फेंकने जा रहा था।

मंगल ने दीनता से कहा- मैं तो बड़ी देर से यहाँ खड़ा था।

‘तो बोला क्यो नहीं?’

‘मारे डर के।’

‘अच्छा, ले खा ले।’

उसने पत्तल को ऊपर उठाकर मंगल के फैले हुए हाथों में डाल दिया। मंगल ने उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा, जिसमें दीन कृतज्ञता भरी हुई थी।

टामी भी अन्दर से निकल आया था। दोनों वहीं नीम के नीचे पत्तल में खाने लगे।

मंगल ने एक हाथ से टामी का सिर सहलाकर कहा- देखा, पेट की आग ऐसी होती हैं! यह लात की मारी रोटियाँ भी न मिलती, तो क्या करते?

टामी ने दुम हिला दी।

‘सुरेश को अम्माँ ने पाला था।’

टामी ने फिर दुम हिलायी।

‘लोग कहते हैं, दूध का दाम कोई नहीं चुका सकता और मुझे दूध का यह दाम मिल रहा हैं।’

टामी ने फिर दुम हिलायी।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ... बासी भात में खुदा का साझा

 मानसरोवर-2 ...बासी भात में खुदा का साझा (Basi Bhat me Khuda ka Sajha)

बासी भात में खुदा का साझा - मुंशीप्रेमचंद | Basi Bhat me Khuda ka Sajha - Munshi Premchand

शाम को जब दीनानाथ ने घर आकर गौरी से कहा कि मुझे एक कार्यालय में पचास रुपये की नौकरी मिल गई हैं, तो गौरी खिल उठी। देवताओं में उसकी आस्था और भी मुझे ढृढ़ हो गयी। इधर एक साल से बुरा हाल था। न कोई रोजी न रोजगार। घर में जो थोड़े-बहुत गहने थे, वह बिक चुके थे। मकान का किराया सिर पर चढ़ा हुआ था। जिन मित्रों से कर्ज मिल सकता था, सबसे ले चुके थे। साल-भर का बच्चा दूध के लिए बिलख रहा था। एक वक़्त का भोजन मिलता, तो दूसरे जून की चिन्ता होती। तकाजों के मारे बेचारे दीनानाथ को घर से निकलना मुश्किल था। घर से बाहर निकला नहीं, कि चारों ओर से चिथाड़ मच जाती- वाह बाबूजी वाह! दो दिन का वादा करके ले गये थे और आज दो महीने से सूरत नहीं दिखायी! भाई साहब, यह तो अच्छी बात नहीं, आपको अपनी जरूरत का ख्याल हैं, मगर दूसरों की जरूरत का जरा भी ख्याल नहीं? इसी से कहा हैं, दुश्मन को चाहे कर्ज दे दो, दोस्त को कभी न दो। दीनानाथ को ये वाक्य तीरो-से लगते थे और उसका जी चाहता था कि जीवन का अन्त कर डाले. मगर बेजबान स्त्री और अबोध बच्चे का मुँह देखकर कलेजा थाम के रह जाते। बारे, आज भगवान् ने उस पर दया की और संकट के दिन कट गये।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ... बासी भात में खुदा का साझा

गौरी नें प्रसन्नमुख होकर कहा- मैं कहती थी कि नहीं, ईश्वर सबकी सुधि लेते हैं और कभी-कभी हमारी भी सुधि लेंगे, मगर तुमको विश्वास ही न आया । बोलो, अब तो ईश्वर की दयालुता के कायल हुए?

दीनानाथ ने हठधर्मी करते हुए कहा- यह मेरी दौड़-धूप का नतीजा हैं, ईश्वर की क्या दयालुता? ईश्वर को तो तब जानता, जब कहीं से छप्पर फाड़ कर भेज देते।

लेकिन मुँह से चाहे कुछ करे, ईश्वर के प्रति उसके मन में श्रद्धा उदय हो गये थी।

दीनानाथ का स्वामी बड़ा ही रूखा आदमी था और काम में बड़ा चुस्त। उसकी उम्र पचास के लगभग थी और स्वास्थ्य भी अच्छा न था, फिर भी वह कार्यालय में सबसे ज्यादा काम करता। मजाल न थी कि कोई आदमी एक मिनट की देर करे, या एक मिनट भी समय से पहले चला जाय। बीच में 15 मिनट की छुट्टी मिलती थी, उसमें जिसका जी चाहे पान खा ले, या सिगरेट पी ले या जलपान कर ले। इसके अलावा एक मिनट का अवकाश न मिलता था। वेतन पहली तारीख को मिल जाता था। उत्सवों में भी दफ्तर बन्द रहता था और नियत समय के बाद कभी काम न लिया जाता था। सभी कर्मचारियों को बोनस मिलता था और प्राविडेन्ट फंड की भी सुविधा थी। फिर भी कोई आदमी खुश न था। काम या समय की पाबन्दी की किसी को शिकायत न थी। शिकायत थी केवल स्वामी के शुष्क व्यवहार की । कितना ही जी लगाकर काम करो, कितना ही प्राण दे दो, पर उसके बदले धन्यवाद का एक शब्द भी न मिलता था।

कर्मचारियों में और कोई सन्तुष्ट हो या न हो, दीनानाथ को स्वामी से कोई शिकायत न थी। वह घुड़कियाँ और फटकार पाकर भी शायद उतने ही परिश्रम से काम करता था। साल-भर में उसने कर्ज चुका दिये और कुछ संचय भी कर लिया। वह उन लोगों में था, जो थोड़े में भी संतुष्ट रह सकते हैं- अगर नियमित रूप से मिलता जाय। एक रुपया भी किसी खास काम में खर्च करना पड़ता, तो दम्पत्ति में घंटों सलाह होती औऱ बड़े झाँव-झाँव के बाद मंजूरी री मिलती थी। बिल गौरी की तरफ से पेश होती, तो दीनानाथ विरोध में खड़ा होता। दीनानाथ की तरफ से पेश होता, तो गौरी उसकी कड़ी आलोचना करती। बिल को पास करा लेना प्रस्तावक की जोरदार वकालत पर मुनसहर था। सर्टिफाई करने वाली कोई तीसरी शक्ति वहाँ न थी।

और दीनानाथ अब पक्का आस्तिक हो गया था। ईश्वर की दया या न्याय में अब उसे कोई शंका न थी। नित्य संध्या करता और नियमित रूप से गीता का पाठ करता। एक दिन उसके एक नास्तिक मित्र ने जब ईश्वर की निन्दा की, तो उसने कहा- भाई, इसका तो आज तक निश्चय नहीं हो सका ईश्वर हैं या नहीं। दोनो पक्षों के पास इस्पात की-सी दलीले मौजूद हैं; लेकिन मेरे विचार में नास्तिक रहने से आस्तिक रहना कही अच्छा हैं। अगर ईश्वर की सत्ता हैं, तब तो नास्तिकों को नरक के सिवा कहीं ठिकाना नहीं। आस्तिक के दोनों हाथों में लड‌्डू हैं। ईश्वर है तो पूछना ही क्या, नहीं है, तब भी क्या बिगड़ता हैं। दो-चार मिनट का समय ही तो जाता हैं।

नास्तिक मित्र इस दोरुखी बात पर मुँह बिचकाकर चल दिये।

एक दिन जब दीनानाथ शाम को दफ्तर से चलने लगा, तो स्वामी ने उसे अपने कमरे में बुला भेजा और बड़ी खातिर से उसे कुर्सी पर बैठाकर बोला- तुम्हें यहाँ काम करते कितने दिन हुए ? साल-भर तो हुआ ही होगा?

दीनानाथ ने नम्रता से कहा- जी हाँ, तेरहवाँ महीना चल रहा हैं।

‘आराम से बैठो, इस वक़्त घर जाकर जलपान करते हो?’

‘जी नहीं, मैं जलपान का आदी नही।’

‘पान-वान तो खाते ही होगे? जवान आदमी होकर अभी से इतना संयम।’

यह कहकर उसने उसने घंटी बजायी और अर्दली से पान और कुछ मिठाइयाँ लाने को कहा

दीनानाथ को शंका हो रही थी- आज इतनी खातिरदारी क्यों हो रही हैं। कहाँ तो सलाम भी नहीं लेते थे, कहाँ आज मिठाई और पान सभी कुछ मँगाया जा रहा हैं! मालूम होता हैं मेरे काम से खुश हो गये हैं। इस खयाल से उसे कुछ आत्मविश्वास हुआ और ईश्वर की याद आ गयी। अवश्य परमात्मा सर्वदर्शी और न्यायकारी हैं; नहीं तो मुझे कौन पूछता?

अर्दली मिठाई और पान लाया। दीनानाथ आग्रह से विवश होकर मिठाई खाने लगा।

स्वामी ने मुसकराते हुए कहा- तुमने मुझे बहुत रूखा पाया होगा। बात यह हैं कि हमारे यहाँ अभी तक लोगों को अपनी जिम्मेदारी का इतना कम ज्ञान हैं कि अफसर जरा भी नर्म पड़ जाय और काम खराब होने लगता हैं। कुछ ऐसे भाग्यशाली हैं, जो नौकरों से हेल-मेल भी रखते हैं, उनसे हँसते- बोलते भी हैं, फिर भी नौकर नहीं बिगड़ते, बल्कि और भी दिल लगाकर काम करते हैं। मुझमें वह कला नहीं हैं, इसलिए मैं अपने आदमियों से कुछ अलग-अलग रहना ही अच्छा समझता हूँ और अब तक मुझे इस नीति से कोई हानि भी नहीं हुई; लेकिन मैं आदमियों का रंग-ढंग देखता हूँ और सब को परखता रहा हूँ । मैने तुम्हारे विषय में जो मत स्थिर किया हैं; वह यह हैं कि तुम वफादार हो और मैं तुम्हारे ऊपर विश्वास कर सकता हूँ, जहाँ तुम्हें खुद बहुत कम काम करना पड़ेगा। केवल निगरानी करनी पड़ेगी। तुम्हारे वेतन में पचास रुपये की और तरक्की हो जायगी। मुझे विश्वास हैं, तुमने अब तक जितनी तनदेही से काम किया हैं, उससे भी ज्यादा तनदेही से आगे करोगे।

दीनानाथ की आँखों में आँसू भर आये और कंठ की मिठाई कुछ नमकीन हो गयी। जी में आया, स्वामी के चरणों पर सिर दें और कहे- आपकी सेवा के लिए मेरी जान हाजिर हैं। आपने मेरा जो सम्मान बढ़ाया हैं, मैं उसे निभाने में कोई कसर न उठा रखूँगा; लेकिन स्वर काँप रहा था और वह केवल कृतज्ञता-भरी आँखों से देखकर रह गया।

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र

सेठजी ने एक मोटा-सा लेजर निकालते हुए कहा- मैं एक ऐसे काम में तुम्हारी मदद चाहता हूँ, जिस पर इस कार्यालय का सारा भविष्य टिका हुआ हैं। इतने आदमियों में मैने केवल तुम्हीं को विश्वास-योग्य समझा हैं। और मुझे आशा हैं कि तुम मुझे निराश न करोगे। यह पिछले साल का लेजर है और इसमें कुछ ऐसी रकमें दर्ज हो गयी हैं; जिनके अनुसार कम्पनी को कई हजार का लाभ होता हैं, लेकिन तुम जानते हो, हम कई महीनों से घाटे पर काम कर रहे हैं। जिस क्लर्क ने यह लेजर लिखा था, उसकी लिखावट तुम्हारी लिखावट से बिल्कुल मिलती हैं। अगर दोनों लिखावटें आमने-सामने रख दी जायँ, तो किसी विशेषज्ञ को भी उसमें भेद करना कठिन हो जायगा। मैं चाहता हूँ, तुम लेजर में एक पृष्ठ फिर से लिख कर जोड़ दो और उसी नम्बर का पृष्ठ उसमें से निकाल दो। मैने पृष्ठ का नम्बर छपवा लिया हैं; एक दफतरी भी ठीक कर लिया हैं, जो रात भर में लेजर की जिल्दबन्दी कर देगा। किसी को पता तक न चलेगा। जरूरत सिर्फ यह हैं कि तुम अपनी कलम से उस पृष्ठ की नकल कर दो।

दीनानाथ ने शंका की- जब उस पृष्ठ की नकल ही करनी हैं, तो उसे निकालने की क्या जरूरत हैं?

सेठजी हँसे- तो क्या तुम समझते हो, उस पृष्ठ की हूबहू नकल करनी होगी। मैं कुछ रकमों में परिवर्तन कर दूँगा। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैं केवल कार्यालय की भलाई के खयाल से यह कार्यवाई कर रहा हूँ । अगर रद्दोबदल न किया गया, तो कार्यालय के एक सौ आदमियों की जीविका में बाधा पड़ जायगी। इसमें कुछ सोच-विचार करने की जरूरत नहीं। केवल आध घंटे का काम हैं। तुम बहुत तेज लिखते हो।

कठिन समस्या थी। स्पष्ट थी कि उससे जाल बनाने को कहा जा रहा हैं। उसके पास इस रहस्य के पता लगाने का कोई साधन न था कि सेठजी जो कुछ कह रहे हैं, वह स्वार्थवश होकर या कार्यालय की रक्षा के लिए; लेकिन किसी दशा में भी हैं यह जाल, घोर जाल। क्या वह अपनी आत्मा की हत्या करेगा? नहीं; किसी तरह नहीं।

उसने डरते-डरते कहा- मुझे आप क्षमा करें, मैं यह काम न कर सकूँगा।

सेठजी ने उसी अविचलित मुसकान के साथ पूछा- क्यों?

‘इसलिए कि यह सरासर जाल हैं।’

‘जाल किसे कहते हैं?’

‘किसी हिसाब में उलटफेर करना जाल हैं।’

‘लेकिन उस उलटफेर से एक सौ आदमियों की जीविका बनी रहे, तो इस दशा में भी वह जाल हैं? कम्पनी की असली हालत कुछ और हैं, कागजी हालत कुछ और; अगर यह तब्दीली न की गयी, तो तुरन्त कई हजार रुपये नफे के देने पड़ जायेगे और नतीजा यह होगा कि कम्पनी का दिवाला हो जायगा। और सारे आदमियों को घर बैठना पड़ेगा। मैं नहीं चाहता कि थोड़े से मालदार हिस्सेदारों के लिए इतने गरीबों का खून किया जाय। परोपकार के लिए कुछ जाल भी करना पड़े, तो वह आत्मा की हत्या नही हैं।’

दीनानाथ को कोई जवाब न सूझा। अगर सेठजी का कहना सच हैं और इस जाल से सौ आदमियों को रोजी बनी रहे तो वास्तव में वह जाल नहीं, कठोर कर्त्तव्य हैं; अगर आत्मा की हत्या होती भी हो, तो सौ आदमियों की रक्षा के लिए उसकी परवाह न करनी चाहिए, लेकिन नैतिक समाधान हो जाने पर अपनी रक्षा का विचार आया। बोला- लेकिन कहीं मुआमला खुल गया, तो मिट जाऊँगा । चौदह साल के लिए काले पानी भेज दिया जाऊँगा ।

सेठ ने जोर से कहकहा मारा – अगर मुआमला खुल गया, तो तुम न फँसोंगे, मैं फँसूगा। तुम साफ इनकार कर सकते हो।

‘लिखावट तो पकड़ी जायगी?‘

‘पता ही कैसे चलेगा कि कौन पृष्ठ बदला गया, लिखावट तो एक-सी हैं।’

दीनानाथ परास्त हो गया। उसी वक़्त उस पृष्ठ की नकल करने लगा।

फिर भी दीनानाथ के मन में चोर पैदा हुआ था। गौरी से इस विषय में वह एक शब्द भी न कह सका।

एक महीनें के बाद उसकी तरक्की हुई। सौ रुपये मिलने लगे। दो सौ बोनस के भी मिले।

यह सब कुछ था, घर में खुशहाली के चिह्न नजर आने लगे; लेकिन दीनानाथ का अपराधी मन एक बोझ से दबा रहता था। जिन दलीलों से सेठजी ने उसकी जबान बन्द कर दी, उस दलीलों से गौरी को सन्तुष्ट कर सकने का उसे विश्वास न था।

उसकी ईश्वर-निष्ठा उसे सदैव डराती रहती थी। इस अपराध का कोई भयंकर दंड अवश्य मिलेगा। किसी प्रायश्चित, किसी अनुष्ठान से उसे रोकना असम्भव हैं। अभी न मिले; साल-दो-साल में मिले, दस-पाँच साल न मिले; पर जितनी देर से मिलेगा, उतना ही भयंकर होगा, मूलधन ब्याज के साथ बढ़ता जायेगा। वह अक्सर फछताता, मैं क्यों सेठजी के प्रलोभन में आ गया। कार्यालय टूटता या रहता, मेरी बला से; आदमियों की रोजी जाती या रहती, मेरी बला से; मुझे तो यह प्राण-पीड़ा न होती, लेकिन अब तो जो कुछ होना था हो चुका और दंड अवश्य मिलेगा। इस शंका ने उसके जीवन का उत्साह, आनन्द और माधुर्य सब कुछ हर लिया।

मलेरिया फैला हुआ था। बच्चे को ज्वर आया। दीनानाथ के प्राण नहीं में समा गये। दंड का विधान आ पहुँचा। कहाँ जाय, क्या करे, जैसे बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। गौरी ने कहा- जाकर कोई दवा लाओ, या किसी डॉक्टर को दिखा दो, तीन दिन तो हो गये।

दीनानाथ ने चिन्तित मन से कहा- हाँ, जाता हूँ लेकिन मुझे बड़ा भय लग रहा हैं।

‘भय की कौन-सी बात हैं, बेबात की बात मुँह से निकालते हो। आजकल किसे ज्वर नहीं आती?’

‘ईश्वर इतना निर्दयी क्यों हैं?’

‘ईश्वर निर्दयी हैं पापियों के लिए। हमने किसका क्या हर लिया हैं?’

‘ईश्वर पापियों को कभी क्षमा नहीं करता।’

‘पापियों को दंड न मिले, तो संसार में अनर्थ हो जाय।’

‘लेकिन आदमी ऐसे काम भी तो करता हैं, तो एक दृष्टि से पाप हो सकते हैं, दूसरी दृष्टि से पुण्य।’

‘मैं नहीं समझी।’

‘मान लो, मेरे झूठ बोलने से किसी की जान बचती हो, तो क्या वह पाप हैं?’

‘मैं तो समझती हूँ, ऐसा झूठ पुण्य हैं।’

‘तो जिस पाप से मनुष्य का कल्याण हो, वह पुण्य हैं?’

‘और क्या’

दीनानाथ की अमंगल की शंका थोड़ी देर के लिए दूर हो गयी। डॉक्टर को बुला लाया, इलाज शुरू किया, बालक एक सप्ताह में चंगा हो गया।

मगर थो़ड़े दिन बाद वह खुद बीमार पड़ा। वह अवश्य ही ईश्वरीय दंड हैं और वह बच नहीं सकता। साधारण मलेरिया ज्वर था; पर दीनानाथ की दंड-कल्पना ने उसे सन्निपात का रूप दे दिया। ज्वर में, नशे की हालत की तरह यों ही कल्पनाशक्ति तीव्र हो जाती हैं। पहले केवल मनोगत शंका थी, वह भीषण सत्य बन गयी। कल्पना ने यमदूत रच डाले, उनके भाले औऱ गदाएँ रच डाली। नरक का अग्निकुंड दहका दिया। डॉक्टर की एक घूँट दवा हजार मन की गदा के आवाज और आग के उबलते हुए समुद्र के दाह पर क्या असर करती? दीनानाथ मिथ्यावादी न था। पुराणों की रहस्यमय कल्पनाओं में उसे विश्वास न था। नहीं, वह बुद्धिवादी था और ईश्वर में भी तभी उसे विश्वास आया, जब उसकी तर्कबुद्धि कायल हो गयी। लेकिन ईश्वर के साथ उसकी दया उसकी दया भी आयी, उसका दंड भी आया। दया ने उसे रोजी दी, मान लिया। ईश्वर की दया न होती, तो शायद वह भूखों मर जाता, लेकिन भूखों मरना अग्निकुड में ढकेल दिये जाने से कहीं सरल था, खेल था। दंड-भावना जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार से ऐसी बद्धमूल हो गया थी, मानो उसकी बुद्धि का, उसकी आत्मा का, एक अंग हो गयी हो। उसका तर्कवाद और बुद्धिवाद इन मन्वन्तरों के जमे हुए संस्कार पर समुद्र की ऊँची लहरों की भाँति आता था, पर एक क्षण में उन्हें जल-मग्न करके फिर लौट जाता था और वह पर्वत ज्यों-का-त्यों खड़ा रह जाता था।

जिन्दगी बाकी थी, बच गया। ताकत आते ही दफ्तर जाने लगा। एक दिन गौरी बोली- जिन दिनों तुम बीमार थे औऱ एक दिन तुम्हारी हालत बहुत नाजुक हो गयी थी, तो मैने भगवान से कहा था कि वह अच्छे हो जायँगे, तो पचास ब्राह्मणों को भोजन कराऊँगी । दूसरे दिन से तुम्हारी हालत सुधरने लगी। ईश्वर ने मेरी विनती सुन ली। उसकी दया न हो जाती, तो मुझे कहीं माँगे भीख न मिलती। आज बाजार से सामान ले आओ, तो मनौती पूरी कर दूँ। पचास ब्राह्मण नेवेत जायँगे, तो सौ अवश्य आयेंगे। पचास कँगले समझ लो और मित्रों में बीस-पचीस निकल ही आयेंगे। दो सौ आदमियों का डौल हैं। मैं सामग्रियों की सूची लिखे देती हूँ।

दीनानाथ ने माथा सिकोड़कर कहा- तुम समझती हो, मैं भगवान की दया से अच्छा हुआ?

‘और कैसे अच्छे हुए?’

‘अच्छा हुआ इसलिए कि जिन्दगी बाकी थी।’

‘ऐसी बातें न करो। मनौती पूरी करनी होगी।’

‘कभी नहीं। मैं भगवान को दयालु नहीं समझता।’

‘और क्या भगवान निर्दयी हैं?’

‘उनसे बड़ा निर्दयी कोई संसार में न होगा। जो अपने रचे हुए खिलौनों को उनकी भूलों और बेवकूफियों की सजा अग्निकुंड में ढकेलकर दे, वह भगवान दयालु नहीं हो सकता। भगवान जितना दयालु हैं, उससे असंख्य गुना निर्दयी हैं। और ऐसे भगवान की कल्पना से मुझे घृणा होती हैं। प्रेम सबसे बड़ी शक्ति कही गयी हैं। विचारवानों ने प्रेम को ही जीवन की और संसार की सबसे बड़ी विभूति मानी हैं। व्यवहारों में न सही, आदर्श में प्रेम ही हमारे जीवन का सत्य हैं, मगर तुम्हारा ईश्वर दंड-भय से सृष्टि का संचालन करता हैं। फिर उसमें और मनुष्य मं क्या फर्क हुआ? ऐसे ईश्वर की उपासना मैं नही करना चाहता, नहीं कर सकता। जो मोटे हैं, उनके लिए ईश्वर दयालु होगा, क्योंकि वे दुनिया को लूटते हैं। हम जैसो को तो ईश्वर की दया कहीं नजर नहीं आती। हाँ, भय पग-पग पर खड़ा घूरा करता हैं। यह मत करो, ईश्वर दंड देना! वह मत करो, ईश्वर दंड देगा। प्रेम से शासन करना मानवता हैं, आतंक से शासन करना बर्बरता हैं। आतंकवादी ईश्वर से तो ईश्वर का न रहना ही अच्छा हैं। उसे हृदय से निकाल कर मैं उसकी दया और दंड दोनों से मुक्त हो जाना चाहता हूँ। एक कठोर दंड बरसों के प्रेम को मिट्टी में मिला देता हैं। मै तुम्हारे ऊपर बराबर जान देता रहता हूँ ; लेकिन किसी दिन डंडा लेकर पीट चलूँ, तो तुम मेरी सूरत न देखोगी। ऐसे आतंकमय, दंडमय जीवन के लिए मैं ईश्वर का एहसास नहीं लेना चाहता। बासी बात में खुदा के साझे के जरूरत नहीं हैं। अगर तुमने ओज-भोज पर जोर दिया, तो मैं जहर खा लूँगा।’

गौरी उसके मुँह की और भयातुर नेत्रों से ताकती रह गयी।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ...कुत्सा (Kutsa)

मानसरोवर-2 ...कुत्सा (Kutsa)

कुत्सा - मुंशीप्रेमचंद | Kutsa by Munshi Premchand

अपने घर में आदमी बादशाह को भी गाली देता हैं। एक दिन मैं अपने दो-तीन मित्रों के साथ बैठा हुआ एक राष्ट्रीय संस्था के व्यक्तियों की आलोचना कर रहा था। हमारे विचार में राष्ट्रीय कार्यकर्त्ताओं को स्वार्थ और लोभ से ऊपर रहना चाहिए। ऊँचा और पवित्र आदर्श सामने रख कर ही राष्ट्र की सच्ची सेवा की जा सकती हैं। कई व्यक्तियों के आचरण ने हमें क्षुब्ध कर दिया था और हम इस समय बैठे अपने दिल का गुबार निकाल रहे थे! सम्भव था, उस परिस्थिति में पड़कर हम और भी गिर जाते; लेकिन उस वक़्त तो हम विचारक के स्थान पर बैठे हुए थे और विचारक उदार बनने लगे, तो न्याय कौन करे? विचारक को यह भूल जाने में विलम्ब नहीं होता कि उसमें भी कमजोरियाँ हैं। उसमें और अभियुक्त में केवल इतनी ही अन्तर हैं कि या तो विचारक महाशय उस परिस्थिति में पड़े नहीं, या पड़कर भी अपनी चतुराई से बेदाग निकल गये।

कुत्सा - मुंशीप्रेमचंद | Kutsa by Munshi Premchand

पद्मादेवी ने कहा- महाशय ‘क’ काम तो बड़े उत्साह से करते हैं; लेकिन अगर हिसाब देखा जाय, तो उनके जिम्मे एक हजार से कम न निकलेगा।

उर्मिलादेवी ने कहा- खैर ‘क’ को तो क्षमा किया जा सकता हैं। उसके बाल-बच्चे हैं, आखिर उनका पालन-पोषण कैसे से करे? जब वह चौबीसों घंटे सेवा-कार्य में लगा रहता हैं, तो उसे कुछ-न-कुछ तो मिलना ही चाहिए। उस योग्यता का आदमी 500/ वेतन पर भी न मिलता। अगर इस साल-भर में उसने एक हजार खर्च कर डाला, तो बहुत नहीं हैं। महाशय ‘ख’ तो बिल्कुल निहंग हैं। ‘जोरू न जाँता अल्लाह मियाँ से नाता’; पर उनके जिम्मे भी एक हजार से कम न होंगे। किसी को क्या अधिकार हैं कि वह गरीबों का धन मोटर की सवारी और यार-दोस्तों की दावत में उड़ा दे?

श्यामादेवी उद्दंड होकर बोली- महाशय ‘ग’ को इसका जवाब देना पड़ेगा, भाई साहब! यों बचकर नहीं निकल सकते। हम लोग भिक्षा माँग-माँग कर पैसे लाते हैं; इसीलिए कि यार-दोस्तों की दावतें हों. शराबे उडायी जायँ और मुजरे देखे जायँ? रोज सिनेमा की सैर होती हैं। गरीबों का धन यों उड़ाने के लिए नहीं हैं। यहाँ पाई-पाई का लेखा समझना पड़ेगी। मै भरी सभा में रगेंदूँगी। उन्हें जहाँ पाँच सौ वेतन मिलता हो, वहाँ चले जायँ। राष्ट्र के सेवक बहुतेरे निकल आवेंगे।

मैं भी एक बार इसी संस्था का मन्त्री रह चुका हूँ । मुझे गर्व हैं कि मेरे ऊपर कभी किसी ने इस तरह का आक्षेप नहीं किया; पर न-जाने क्यों लोग मेरे मन्त्रित्व से सन्तुष्ट नहीं थे। लोगो का ख्याल था कि मैं बहुत कम समय देता हूँ, और मेरे समय में संस्था ने कोई गौरव बढ़ानेवाला काम नहीं किया; इसलिए मैने रूठकर इस्तीफा दे दिया था। मै उसी पद से बेलौस रहकर भी निकाला गया। महाशय ‘ग’ हजारों हड़प करके भी उसी पद पर जमें हुए हैं। क्या यह मेंरे उनसे कुनह रखने की काफी वजह न थी? मैं चतुर खिलाड़ी की भाँति खुद को कुछ न कहना चाहता था, किन्तु परदे की आड़ से रस्सी खींचता रहता था।

मैने रद्दा जमाया- देवीजी, आप अन्याय कर रही हैं। महाशय ‘ग’ से ज्यादा दिलेर और …

उर्मिला ने मेरी बात को काटकर कहा- मैं ऐसे आदमी की दिलेरी नहीं कहती जो छिपकर जनता के रुपये से शराब पियें। जिन शराब की दूकानों पर हम धरना देने जाते थे, उन्हीं दूकानों से उनके लिए शराब आती थी। इससे बढ़कर बेवफाई और क्या हो सकती हैं? ऐसे आदमी को देशद्रोही कहती हूँ ।

मैने और खींची- लेकिन यह तो तुम भी मानती हो कि क्या महाशय ‘ग’ केवल अपने प्रभाव से हजारों रुपयें चन्दा वसूल कर लाते हैं। विलायती कपड़े को रोकने का उन्हें जिनता श्रेय दिया जाय, थोड़ा हैं।

उर्मिला देवी कब माननेवाली थी। बोली- उन्हें चन्दे इस संस्था के नाम पर मिलते हैं, व्यक्तिगत रूप से एक धेला भी लावें तो कहूँ । रहा विलायती कपड़ा। जनता नामों को पूजती हैं औऱ महाशय की तारीफें हो रही हैं; पर सच पूछिए तो यह श्रेय हमें मिलना चाहिए। वह तो कभी किसी दूकान पर गये ही नही। आज सारे शहर में इस बात की चर्चा हो रही हैं। जहाँ चन्दा माँगने जाओ, वहीं लोग यही आक्षेप करने लगते हैं। किस-किसका मुँह बन्द कीजिएगा? आप बनते तो है जाति के सेवक; मगर आचरण ऐसा कि शोहदों का भी न होगा। देश का उद्धार ऐसे विलासियों के हाथों नहीं हो सकता। उसके लिए त्याग होना चाहिए।

यहीं आलोचनाएँ हो रही थी कि एक दूसरी देवी आयीं, भगवती! बेचारी चन्दा माँगने आयी थी। थकी-माँदी चली आ रही थी। यहाँ जो पंचायत देवी, तो रम गयी। उनके साथ उनकी बालिका भी थी। कोई दस साल उम्र होगी, इन कामों में बराबर माँ के साथ रहती थी। उसे जोर की भूख लगी हुई थी। घर की कुंजी भगवती देवी के पास थी। पतिदेव दफ्तर से आ गये होगे। घर का खुलना भी जरूरी था, इसलिए मैंन बालिका को उसके घर पहुँचाने की सेवा स्वीकार की

कुछ दूर चलकर बालिका न कहा- आपको मालूम हैं, महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं?

मैं इस आक्षेप का समर्थन न कर सका। भोली-भाली बालिका के हृदय में कटुता, द्वेष और प्रपंच का विष बोना मेरी ईर्ष्यालु प्रक प्रकृति को भी रुचिकर न जान पड़ा। जहाँ कोमलता और सारल्य, विश्वास और माधुर्य का राज्य होना चाहिए, वहाँ कुत्सा और क्षुद्रता का मर्यादित होना कौन पसन्द करेगा? देवता के गले में काँटों की माला कौन पहनायेगा?

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र

मैने पूछा- तुमसे किसने कहा कि महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं?

‘वाह पीते ही हैं, आप क्या जानें?’

‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ?’

‘सारे शहर के लोग कह रहे हैं!’

‘शहर वाले झूठ बोल रहे हैं।’

बालिका ने मेरी ओर अविश्वास की आँखों से देखा, शायद वह समझी, मैं भी महाशय ‘ग’ के ही भाई-बन्दों में हूँ ।

‘आप कह सकते हैं, महाशय ‘ग’ शराब नहीं पीते?’

‘हाँ, वह कभी शराब नहीं पीते।’

‘और महाशय ‘क’ ने जनता के रुपये भी नहीं उड़ाये?’

‘यह भी असत्य हैं।’

‘और महाशय ‘ख’ मोटर पर हवा खाने नही जाते?’

‘मोटर पर हवा खाना अपराध नहीं हैं।’

‘अपराध नहीं हैं, राजाओं के लिए, रईसों के लिए, अफसरों के लिए, जो जनता का खून चूसते हैं, देश-भक्ति का दम भरनेवालों के लिए यह बहुत बड़ा अपराध हैं।’

‘लेकिन यह तो सोचो, इन लोगों को कितना दौड़ना पड़ता हैं। पैदल कहाँ तक दौड़े?’

‘पैरगाड़ी पर तो चल सकते हैं। यह कुछ बात नहीं हैं। ये लोग शान दिखाना चाहते हैं, जिससे लोग समझे कि यह भी बहुत बड़े आदमी हैं। हमारी संस्था गरीबों की संस्था हैं। यहाँ मोटर पर उसी वक़्त बैठना चाहिए, जब और किसी तरह काम ही न चल सके औऱ शराबियों के लिए तो यहाँ स्थान ही न होना हिए। आप तो चन्दे माँगने जाते नहीं। हमें कितना लज्जित होना पड़ता हैं, आपको क्या मालूम।’

मैने गम्भीर होकर कहा- तुम्हें लोगों से कह देना चाहिए, यह सरासर गलत हैं। हम और तुम इस संस्था के शुभचिन्तक हैं। हमें अपने कार्यकर्त्ताओं का अपमान करना उचित नहीं हैं। मैं यह नही कहता कि क, ख, ग में बुराईयाँ नहीं हैं। संसार में ऐसा कौन हैं, जिसमें बुराईयाँ न हो, लेकिन बुराईयों के मुकाबले में उनमें गुण कितने हैं, यह तो देखो। हम सभी स्वार्थ पर जान देते हैं- मकान बनाते हैं, जायदाद खरीदते हैं। और कुछ नही, तो आराम से घर में सोते हैं। ये बेचारे चौबीसों घंटे देश-हित की फिक्र में डूबे रहते हैं। तीनों ही साल-साल भर की सजा काटकर, कई महीने हुए, लौटे हैं। तीनों ही के उद्योग से अस्पताल और पुस्तकायल खुले खुले। इन्हीं वीरों ने आन्दोलन करके किसानों का लगान कम कराया। अगर इन्हें शराब पीना और धन कमाना होता, तो इस क्षेत्र में आते हीं क्यो?

बालिका ने विचारपूर्ण दृष्टि से मुझे देखा। फिर बोली- यह बतलाइए, महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं या नहीं?

मैने निश्चयपूर्वक कहा- नहीं। जो यह कहता हैं, वह झूठ बोलता हैं।

भगवती देवी का मकान आ गया। बालिका चली गयी। मैं आज झूठ बोलकर जितना प्रसन्न था, उतना कभी सच बोलकर भी न हुआ था। मैने बालिका के निर्मल हृदय को कुत्सा के पंक में गिरने से बचा लिया था!

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ....न्याय (Nyay)

मानसरोवर-2 ....न्याय (Nyay)

न्याय - मुंशी प्रेमचंद | Nyay by Munshi Premchand

हजरत मुहम्मद को इलहाम हुए थोड़े ही दिन हुए थे। दस-पाँच पड़ोसियों तथा निकट सम्बन्धियों के सिवा और कोई उनके दीन पर ईमान न लाया था, यहाँ तक कि उनकी लड़की जैनब और दामाद अबुलआस भी जिनका विवाह इलहाम के पहले ही हो चुका था, अभी दीक्षित न हुए थे। जैनब कई बार अपने मायके गयी थी और अपने पूज्य पिता की ज्ञानमय वाणी सुन चुकी थी। वह दिल से इस्लाम पर ईमान ला चुकी थी; लेकिन अबुलआस धार्मिक मनोवृत्ति का आदमी न था। वह कुशल व्यापारी था। मक्के के खजूर, मेवे आदि लेकर बन्दरगाहों को चालान किया करता था। बहुत ही ईमानदार, लेन-देन का खरा, मेहनती आदमी था, जिसे इहलोक से इतनी फुरसत न थी कि परलोक की फिक्र करे।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ....न्याय (Nyay)

जैनब के सामने कठिन समस्या थी। आत्मा धर्म की ओर थी, हृदय पति की ओर। न धर्म को छोड़ सकती थी; न पति को। उसके घर के सभी आदमी मूर्तिपूजक थे। इस नये सम्प्रदाय से सारे नगर में हलचल मची हुई थी। जैनब सबसे अपनी लगन को छिपाती, यहाँ तक कि पति से भी न कह सकती थी। वे धार्मिक सहिष्णुता के दिन न थे, बात-बात पर खून की नदी बह जाती थी, खानदान-के -खानदान मिट जाते थे। उन दिनों अरब की वीरता पारस्परिक कलहों में प्रकट होती थी। राजनैतिक संगठन का जमाना न था। खून का बदला खून, धन-हानि का बदला खून, अपमान का बदला खून- मानव-रक्त ही से सभी झगडों का निपटारा होता था। ऐसी अवस्था में अपने धर्मानुराग को प्रकट करना अबुलआास के शक्तिशाली परिवार और मुहम्मद तथा इनके इने-गिने अनुयायियों में देवासुरों का संग्राम छेड़ना था। उधर प्रेम का बन्धन पैरो को जकड़े हुए था। नये धर्म में दीक्षित होना अपने प्राणप्रिय पति से सदा के लिए बिछुड जाना था। कुरैश-जाति के ऐसे लोग मिश्रित विवाहों को परिवार के लिए कलंक समझते थे। माया और धर्म की दुविधा में पड़ी हुई जैनब कुढ़ती रहती थी।

धर्म का अनुराग एक दुर्बल वस्तु हैं; किन्तु जब उसका वेग होता है; तो हृदय के रोके नहीं रुकता। दोपहर का समय था, धूप इतनी तेज थी कि उसकी ओर ताकते आँखों से चिनगारियाँ निकलती थी। हजरत मुहम्मद चिन्ता में डूबे हुए बैठे हैं। निराशा चारों ओर अन्धकार के रूप में दिखायी देती थी। खुजैदा भी सिर झुकाये पास ही बैठी हई एक फटा कुरता सी रही थी। धन-सम्पत्ति सब कुछ इस लगन की भेंट हो चुकी थी। शत्रुओं का दुराग्रह दिनोंदिन बढ़ता जाता था। उसके मतानुयायियों को भाँति-भाँति की यन्त्रणाएं दी जा रही थी। स्वयं हजरत का घर से निकलना मुश्किल था। यह खौफ होता था कि कहीं लोग उनपर ईट- पत्थर न फेंकने लगें। खबर आती थी, आज फलाँ मुस्लिम का घर लुट गया, आज फलाँ को लोगों ने आहत किया। हजरत ये खबरे सुन कर विकल हो जाते थे और बार-बार खुदा से धैर्य और क्षमा की याचना करते थे।

हजरत ने फरमाया- मुझे ये लोग अब यहाँ न रहने देंगे। मैं खुद सब कुछ झेल सकता हूँ, लेकिन अपने दोस्तों की तकलीफें नहीं देखी जाती।

खुजैदा- हमारे चले जाने से इन बेचारों की और भी कोई शरण न रहेगी। अभी कम-से-कम तुम्हारे पास आकर रो तो लेते हैं। मुसीबत में रोने का सहारा ही बहुत होता हैं।

हजरत- तो मैं अकेले थोडे ही जाना चाहता हूँ । मैं सब दोस्तों को साथ लेकर जाने का इरादा रखता हूँ । अभी हम लोग यहाँ बिखरे हुए हैं; कोई किसी की मदद को नहीं पहुँच सकता। हम सब एक ही जगह एक कुटुम्ब की तरह रहेंगे, तो किसी को हमारे ऊपर हमला करने का साहस न होगा। हम अपनी मिली हुई शक्ति से बालू को ढेर तो हो ही सकते हैं, जिसपर चढने का किसी को हिम्मत न होगी।

सहजा जैनब घर में दाखिल हई। उसके साथ न कोई आदमी था, न आदमजात। मालूम होता था, कहीं से भागी चली आ रही हैं। खुजैदा ने उसे गले लगाकर पूछा- क्या हुआ जैनब, खैरियत तो हैं?

जैनब ने अपने अन्तर-संग्राम की कथा कह सुनायी और पिता से दीक्षा की याचना की।

हजरत मुहम्मद आँखों में आँसू भरकर बोले- बेटी, मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की और कोई बात नहीं हो सकती; लेकिन जानता हूँ, तुम्हारा क्या हाल होगा।

जैनब- या हजरत! खुदा की राह में सब कुछ त्याग देने का निश्चय कर लिया हैं। दुनिया के लिए अपना नजात को नहीं खोना चाहती।

हजरत- जैनब, खुदा की राहों में काँटे हैं।

जैनब- अब्बाजान, लगन को काँटों की परवा नहीं होती!

हजरत- ससुराल से नाता टूट जायेगा।

जैनब- खुदा से नाता जुड़ जायेगा?

हजरत- और अबुलआस?

जैनब की आँखों में आँसू डबडबा आये। क्षीण स्वर में बोली- अब्बाजान, उन्होंने इतने दिनों मुझे बाँध रखा था, नहीं तो मैं कब की आपकी शरण आ चुकी होती। मैं जानती हूँ उनसे जुदा होकर मैं जिन्दा न रहूँगी और शायद उनसे भी मेरा वियोग न सहा जाय; पर मुझे विश्वास हैं कि वह किसी-न-किसी दिन खुदा पर ईमान लायेंगे और फिर मुझे उनकी सेवा का अवसर मिलेगा।

हजरत- बेटी, अबुलआस ईमानदार हैं, दयाशील हैं, सदवक्ता हैं, किन्तु अहंकार शायद अन्त तक उसे ईश्वर से विमुख रखे। वह तकदीर को नहीं मानता। रूह को नहीं मानता, स्वर्ग और नरक को नहीं मानता। कहता हैं, खुदा की जरूरत ही क्या हैं? हम उससे क्यों डरें? विवेक और बुद्धि की हिदायत हमारे लिए काफी हैं। ऐसा आदमी खुदा पर ईमान नहीं ला सकता। कुफ्र को तोड़ना आसान हैं; लेकिन वह जब दर्शन की सूरत पकड़ लेता हैं, तो उस पर किसी का जोर नहीं चलता।

जैनब ने ढृढ होकर कहा- या हजरत, आत्मा का उपकार जिसमें हो, मुझे वही चाहिए। मैं किसी इन्सान को अपने और खुदा के बीच में न आने दूँगी।

हजरत ने कहा- खुदा तुझ पर दया करे बेटी! तेरी बातों ने दिल खुश कर दिया।

यह कहकर उन्होंने जैनब को गले लगा लिया।

दूसरे दिन जैनब को यथाविधि आम मस्जिद में कलमा पढ़ाया गया।

कुरेशियों ने जब यह खबर पायी, तो जल उठे। गजब खुदा का। इस्लाम ने तो बड़े-बड़े घरों पर भी हाथ साफ करना शुरू किया ! अगर यही हाल रहा, तो धीरे- धीरे उसकी शक्ति इतनी बढ़ जायगी कि हमारे लिए उसका सामना करना कठिन हो जायगा। अबुलआस के घर पर एक बड़ी मजलिस हुई।

अबूसिफियान ने जो इस्लाम के दुश्मनों में सबसे प्रतिष्ठित मनुष्य था, अबुलआस से कहा- तुम्हें अपनी बीवी को तलाक देना पड़ेगा।

अबुलआस ने कहा- हरगिज नहीं।

अबूसिफियन- तो क्या तुम भी मुसलमान हो जाओगे।

अबुलआस – हरगिज नहीं।

अबूसिफियन – तो उसे मुहम्मद ही के घर रहना पड़ेगा।

अबुलआस – हरगिज नहीं। आप लोग मुझे आज्ञा दीजिये कि उसे अपने घर लाऊँ।

अबूसिफियन – हरगिज नहीं।

अबुलआस – क्या यह नहीं हो सकता कि वह मेरे घर में रहकर अपने इच्छानुसार खुदा की बन्दगी करे?

अबूसिफियन – हरगिज नहीं।

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र

अबुलआस – मेरी कौम मेरे साथ इतनी सहानुभूति भी न करेगी? तो फिर आप लोग मुझे समाज से पतित कर दीजिए। मुझे पतित होना मंजूर हैं। आप लोग और जो सजा चाहें दे, वह सब मंजूर हैं। मगर मैं अपनी बीवी को नहीं छोड़ सकता। मैं किसी की धार्मिक स्वाधीनता का अपहरण नहीं करना चाहता और वह भी अपनी बीवी की।

अबूसिफियन – कुरैश में क्या और लड़कियाँ नहीं हैं?

अबुलआस – जैनब की-सी कोई नहीं।

अबूसिफियन – हम ऐसी लड़कियाँ बता सकते हैं, जो चाँद को लज्जित कर दें।

अबुलआस – मैं सौन्दर्य का उपासक नहीं।

अबूसिफियन – ऐसी लड़कियाँ दे सकता हूँ, जो गृह-प्रबन्ध में निपुण हों, बातें ऐसी करें कि मुँह से फूल झंडे, खाना ऐसा पकायें कि बीमार को भी रुचिकर हो, सीने-पिरोने में इतनी कुशल कि पुराने कपड़े को नया कर दें।

अबुलआस – मैं इन गुणों में से किसी गुण का भी उपासक नहीं। मैं प्रेम और केवल प्रेम का उपासक हूँ और मुझे विश्वास हैं कि जैनब का-सा प्रेम मुझे सारी दुनिया में कहीं नहीं मिल सकता।

अबूसिफियन – प्रेम होता, तो तुम्हें छोड़कर यह बेवफाई करती?

अबुलआस – मैं नहीं चाहता कि मेरे लिए वह अपने आत्म-स्वातंत्र्य त्याग करे।

अबूसिफियन – इसका आशय यह है कि तुम समाज में समाज के विरोधी बनकर रहना चाहते हो। आँखो की कसम! समाज तुम्हें अपने ऊपर यह अत्याचार न करने देना! मैं कहे देता हूँ इसके लिए तुम रोओगे।

अबूसिफियान और उनकी टोली के लोग तो धमकियाँ देकर उधर गये, इधर अबुलआस ने लकड़ी सँभाली और हजरत मुहम्मद के घर जा पहुँचे। शाम हो गयी थी। हजरत दरवाजे पर अपनी मुरीदों के साथ मगरिब की नमाज पढ़ रहे थे। अब अबुलआस ने उन्हें सलाम किया औऱ जब तक नमाज होती रही, गौर से देखते रहे। जमाअत का एक साथ उठना-बैठना और झुकना देखकर उनके मन में श्रद्धा की तरंगें उठने लगी। उन्हें मालूम न होता था कि मैं क्या कर रहा हूँ ; पर अज्ञात भाव से वह जमाअत के साथ बैठते, झुकते और खड़े हो जाते थे। वहाँ एक-एक परमाणु इस समय ईश्वरमय हो रहा था। एक क्षण के लिए अबुलआस भी उसी अन्तर-प्रवाह में बह गये।

जब नमाज खतम हुई और लोग सिधारे, अबुलआस में हजरत के पास जाकर सलाम किया और कहा- मैं जैनब को विदा कराने आया हूँ ।

हजरत ने विस्मित होकर पूछा- तुम्हें मालूम नहीं कि वह खुदा और उसके रसूल पर ईमान ला चुकी हैं?

अबुलआस – जी हाँ, मालूम हैं।

हजरत- इस्लाम ऐसे सम्बन्धों का निषेध करता हैं, यह भी तुम्हें मालूम हैं?

अबुलआस – क्या इसका मतलब यह हैं कि जैनब ने मुझे तलाक दे दिया?

हजरत- अगर यही मतलब हो तो!

अबुलआस – तो कुछ नही। जैनब का अपने खुदा और रसूल की बन्दगी मुबारक हो। मैं एक बार उससे मिलकर घर चला जाऊँगा और फिर आपको अपनी सूरत न दिखाऊँगा; लेकिन उस दशा में अगर कुरैशी-जाति आपसे लड़ने को तैयार हो जाय, तो उसका इलजाम मुझ पर न होगा।

हजरत- कुरैश से इस वक़्त नहीं लडना चाहता।

अबुलआस – तो जैनब को मेरे साथ जाने दीजिए। उस हालत में कुरैश के क्रोध का भाजन मैं होऊँगा। आप और आपके मुरीदों पर कोई आफत नहीं होगी।

हजरत- तुम दबाव में आकर जैनब को खुदा की तरफ से फेरने का यत्न तो न करोगे?

अबुलआस – मैं किसी के धर्म में बाधा डालना सर्वथा अमानुषीय समझता हूँ ।

हजरत- तुम्हें लोग जैनब को तलाक देने पर तो मजबूर न करेंगे?

अबुलआस – मैं जैनब को तलाक देने के पहले जिन्दगी को तलाक दे दूँगा।

हजरत को अबुलआस की बातो से इतमीनान हो गया। वह आस की इज्जत करते थे। आस को हरम में जैनब से मिलने का मौका दिया।

अबुलआस ने पूछा- जैनब, मैं तुम्हें अपने साथ ले चलने आया हूँ ; धर्म के बदलने से कहीं मन तो नही बदल गया?

जैनब रोती हुई उनके पैरो पर गिर पड़ी और बोली- या मेरे आका! धर्म बार-बार मिलता हैं, हृदय केवल एक बार। मैं आपकी हूँ, चाहे जहाँ रहूँ, लेकिन समाज मुझे आपकी सेवा में रहने देगा?

अबुलआस - यदि समाज न रहने देगा, तो मै समाज से निकल जाऊँगा। दुनिया में आराम से जीवन व्यतीत करने के लिए बहुत से स्थान हैं। रहा मैं, तुम जानती हो, मैं धार्मिक स्वाधीनता का पक्षपाती हूँ । मैं तुम्हारे धार्मिक विषयों में कभी हस्तक्षेप न करूँगा।

जैनब चली, जो खुदैजा ने रोते हुए उसे यमन के लालों का एक बहुमूल्य हार विदाई में दिया।

इस्लाम पर विधर्मियों के अत्याचार दिनोंदिन बढ़ने लगे। अवहेलना की दशा से निकलकर उसने भय के क्षेत्र में प्रवेश किया । शत्रुओं ने उसे समूल नाश करने की आयोजना करनी शुरू की। दूर-दूर के कबीलों से मदद माँगी जाने लगी। इस्लाम में इतनी शक्ति न थी कि शस्त्र-बल से विरोधियों को दबा सके। हजरत मुहम्मद ने मक्का छोड़कर कहीं और चले जाने का निश्चिय किया। मक्के में मुस्लिमों के घर सारे शहर में बिखरे हुए थे। एक की मदद को दूसरे मुसलमान न पहुँच सकते थे! हजरत किसी ऐसा जगह आबाद होना चाहते थे, जहाँ सब मिले हुए रहें और शत्रुओं को संगठित शक्ति का प्रतिकार कर सकें। भक्तजन उनके साथ हुए और एक दिन मुस्लिमों ने मक्के से मदीने को प्रस्थान किया। यही हिजरत थी।

मदीने पहुँचकर मुसलमानों में एक नयी शक्ति, नयी स्फूर्ति का उदय हुआ। वे निश्शंक होकर अपने धर्म का पालन करने लगे। अब पड़ोसियों से दबने और छिपने की जरूरत न थी।

आत्मविश्वास बढा। इधर भी विधर्मियों का स्वागत करने की तैयारियाँ होने लगीं। दोनो पक्ष सेना इकट्ठी करने लगे। विधर्मियों ने संकल्प किया कि संसार से इस्लाम का नाम ही मिटा देंगे। इस्लाम ने भी उनके दाँत खट्टे करने का निश्चय किया।

एक दिन अबुलआस ने आकर पत्नी से कहा- जैनब, हमारे नेताओं ने इस्लाम पर जिहाद करने की घोषणा कर दी हैं।

जैनब ने घबरा कर कहा- अब तो वे लोग यहाँ से चले गये! फिर इस जिहाद की क्या जरूरत?

अबुलआस – मक्के चले गये, अरब से तो नहीं चले गये! उन लोगों की ज्यातियाँ बढ़ती जा रही हैं। जिहाद के सिवा और कोई उपाय नहीं हैं! जिहाद मे मेरा शरीक होना जरूरी हैं।

जैनब- अगर तुम्हारा दिल तुम्हें मजबूर करता हैं, तो शौक से जाओ मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी।

अबुलआस - मेरे साथ?

जैनब- हाँ, वहाँ आहत मुसलमानो की सेवा-सुश्रुषा करूँगी।

अबुलआस - शौक से चलो।

घोर संग्राम हुआ। दोनो दलवालों ने खूब दिल के अरमान निकाले। भाई-भाई से, बाप बेटे से लड़ा। सिद्ध हो गया कि मजहब का बन्धन रक्त और वीर्य के बन्धन से सुढृढ हैं।

दोनो दलवाले वीर थे! अन्तर यह था कि मुसलमानों में नया धर्मानुराग था, मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग की आशा थी। दिलों में वह अटल विश्वास था, जो नवजात संप्रदायों का लक्षण हैं। विधर्मियों में ‘बलिदान’ का यह भाव लुप्त था।

कई दिनों तक लड़ाई होती रही। मुसलमानो की संख्या बहुत कम थी, पर अन्त मे उनके धर्मोत्साह मे मैदान मार लिया। विधर्मियों में कितने मारे गये, कितने ही घायल हुए और कितने ही कैद कर लिये गये। अबुलआस भी इन्हीं कैदियों में थे।

जैनब ने ज्योंही सुना कि अबुलआास पकड़ लिये गये, उसने तुरन्त हजरत मुहम्मद की सेवा में मुक्ति-धन भेजा। यह वही बहुमूल्य हार था, जो खुजैदा ने उसे दिया था। जैनब अपने पूज्य पिता को उस धर्म-संकट में एक क्षण के लिये भी न डालना चाहती थी, जो मुक्ति-धन के अभाव की दिशा में उनपर पड़ता, किन्तु अबुलआस को इच्छा होते हुए भी पक्षपात भय से न छोड़ सके।

सब कैदी हजरत के सामने पेश किये गये। कितने ही तो ईमान लाये, कितनों के घरों से मुक्ति-धन आ चुका था, वे मुक्त कर दिये गये। हजरत ने अबुलआस को देखा, सबसे अलग सिर झुकाये खड़े हैं। मुख पर लज्जा का भाव झलक रहा हैं।

हजरत ने कहा- अबुलआस, खुदा ने इस्माल की हिदायत की, वरना उसे यह विजय न प्राप्त होती।

अबुलआस- अगर आपके कथनानुसार संसार में एक खुदा हैं, तो वह अपने एक बन्दे को दूसरे का गला काटने में मदद नहीं दे सकता। मुसलमानों की विजय उनके रणोंत्साह से हुई।

एक सहाबी ने पूछा- तुम्हारा फिदिया (मुक्ति धन) कहाँ हैं?

हजरत ने फरमाया- अबुलआास का हार निहायत बेशकीमती हैं, इनके बारे में आप क्या फैसला करते हैं? आपको मालूम हैं, यह मेरे दामाद हैं?

अबूबकर- आज तुम्हारे घर में जैनब हैं, जिन पर ऐसे सैकड़ो हार कुर्बान किये जा सकते हैं।

अबुलआस- तो आपका मतलब यह है कि जैनब मेरी फिदिया हो?

जैद- बेशक हमारा मतलब हैं।

अबुलआस- उससे तो कहीं बेहतर था कि आप मुझे कत्ल कर देते।

अबूबकर- हम रसूल के दामाद का कत्ल नही करेंगे, चाहे वह विधर्मी ही क्यों न हो। तुम्हारी यहाँ उतनी ही खातिर होगी, जितनी हम कर सकते हैं।

अबुलआस के सामने विषम समस्या थी। इधर यहाँ की मेहमानी में अपमान था, उधर जैनब के वियोग की दारुण वेदना था। उन्होंने निश्चय किया कि यह वेदना सहुँगा, किन्तु अपमान न सहूँगा। प्रेम, आत्मा की गौरव पर बलिदान कर दूँगा। बोले- मुझे आपका फैसला मंजूर हैं। जैनब मेरी फिदिया होगी।

मदीने में रसूल की बेटी की जितनी इज्जत होनी चाहिए, उतनी होती थी। सुख था, ऐश्वर्य था, धर्म था; पर प्रेम न था। अबुलआस के वियोग में रोया करती थी।

तीन वर्ष तीन युगों की भाँति बीते। अबुलआस के दर्शन न हुए।

उधर अबुलआस पर उसकी बिरादरी का दबाव पड़ रहा था कि विवाह कर लो; पर जैनब की मधुर स्मृतियाँ ही उसके प्रणय वंचित हृदय को तसकीन देने मे काफी थी, वह उत्तरोत्तर उत्साह के साथ अपने व्यवसाय में तल्लीन हो गया। महीनों घर न आता। धनोपार्जन ही अब उसके जीवन का मुख्य आधार था! लोगों को आश्चर्य होता था कि अब यह धन के पीछे क्यों प्राण दे रहा हैं। निराशा और चिन्ता बहुधा शराब के नशे से शान्त होती हैं; प्रेम उन्माद से। अबुलआस को धनोन्माद हो गया था। धन के आवरण में ढका हुआ यह प्रेम का नैराश्य था; माया के परदे में छिपा हुआ प्रेम-वैराग्य।

एक बार वह मक्के से माल लादकर ईराक की तरफ चला। काफिले में और भी कितने ही सौदागर थे। रक्षकों का एक दल भी साथ था। मुसलमानों के कई काफिले विधर्मियों के हाथों लुट चुके थे। उन्हें ज्योहि इस काफिले की खबर मिली, जैद ने कुछ चुने हुए आदमियों के साथ उनपर धावा कर दिया। काफिले के रक्षक लड़े और मारे गये। काफिले वाले भाग निकले। अतुल धन मुसलमानो के हाथ लगा। अबुलआस फिर कैद हो गये।

दूसरे दिन हजरत मुहम्मद के सामने अबुलआस की पेशी हुई। हजरत ने एक बार उसकी करुण-दृष्टि डाली और सिर झुका लिया। साहिबियों ने कहा- या हजरत, अबुलआस के बारे में आप क्या फैसला करते हैं?

मुहम्मद – इसके बारे में फैसला करना तुम्हारा काम हैं। यह मेरा दामाद हैं। सम्भव हैं कि मैं पक्षपात का दोषी हो जाऊँ!

यह कहकर वह मकान में चले गये। जैनब रोकर पैरो पर गिर पड़ी और बोली – अब्बाजान, आपने औरों को आजाद कर दिया। अबूलआस क्या उन सबसे गया बीता हैं?

हजरत- नहीं जैनब, न्याय के पद पर बैठने वाले आदमी को पक्षपात और द्वेष से मुक्त होना चाहिए। यद्यपि यह नीति मैने ही बनायी हैं। तो भी अब उसका स्वामी नहीं, दास हूँ। मुझे अबुलआस से प्रेम हैं। मैं न्याय को प्रेमकलंकित नहीं कर सकता।

सहाबी हजरत की इस नीति-भक्त पर मुग्ध हो गये। अबुलआस को सब माल- असबाब के साथ मुक्त कर दिया।

अबुलआस पर हजरत की न्याय-परायणता का गहरा असर पड़ा। मक्के आकर उन्होंने अपना हिसाब-किताब साफ किया, लोगो का माल लौटाया, कर्ज अदा किया और घर-बार त्याग तक हजरत मुहम्मद की सेवा में पहुँच गये। जैनब की मुराद पूरी हुई।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ...उन्माद

मानसरोवर-2 ...उन्माद

उन्माद - मुंशी प्रेमचंद | Unmaad by Munshi Premchand

मनहर ने अनुरक्त होकर कहा- वह सब तुम्हारी कुर्बानियों का फल हैं वागी। नहीं तो आज मैं किसी अँधेरी गली में, किसी अँधेरे मकान के अन्दर जिन्दगी के दिन काटता होता। तुम्हारी सेवा और उपकार हमेशा याद रहेंगे, तुमने मेरा जीवन सुधार दिया- मुझे आदमी बना दिया।

बागेश्वरी ने सिर झुकाये हुए नम्रता से उत्तर दिया- यह तुम्हारी सज्जनता ही मानूँ, मैं बेचारी भला जिन्दगी क्या सुधारूँगी? हाँ तुम्हारे साथ मैं भी एक दिन आदमी बन जाऊँगी। तुमने परिश्रम किया, उसका पुरस्कार पाया। जो अपनी मदद आप करते हैं, उनकी मदद परमात्मा भी करते हैं, अगर मुझ-जैसी गँवारिन किसी और के पाले पड़ती, तो अब तक न-जाने क्या गत होती।
उन्माद - मुंशी प्रेमचंद | Unmaad by Munshi Premchand

मनहर मानो इस बहस में अपना पक्ष-समर्थन करने के लिए कमर बाँधता हुआ बोला- तुम जैसी गँवारिन पर मैं एक लाख सजी हुई गुड़ियों और रंगीन तितलियों को न्योछावर कर सकता हूँ। तुमने मेहनत करने का वह अवसर और अवकाश दिया, जिनके बिना कोई सफल हो ही नहीं सकता। अगर तुमने अपनी अन्य विलास-प्रिय, रंगीन-मिजाज बहनों की तरह मुझे अपने तकाजों से दबा रखा होता, तो मुझे उन्नति करने का अवसर कहाँ मिलता? तुमने मुझे वह निश्चिन्तता प्रदान की, जो स्कूल के दिनों में भी न मिली थी। अपने और सहकारियों को देखता हूँ, जो मुझे उन पर दया आती हैं। किसी का खर्च पूरा नहीं पड़ता। आधा महीना भी नहीं जाने पाया और हाथ खाली हो जाता हैं। कोई दोस्तों से उधार माँगता हैं, कोई घर वालों के खत लिखता हैं। कोई गहनों की फिक्र में मरा जाता हैं, कोई कपड़ो की। कभी नौकर की टोह में हैरान, कभी वैद्य की टोह में परेशान! किसी को शान्ति नहीं। आये दिन स्त्री-पुरुष में जूते चलते हैं। अपना-जैसा भाग्यवान तो मुझे कोई दीख नहीं पड़ता। मुझे घर के सारे आनन्द प्राप्त हैं और जिम्मेदारी एक भी नहीं। तुमने ही मेरे हौसलों को उभारा, मुझे उत्तेजना दी। जब कभी मेरा उत्साह टूटने लगता था, तो तुम मुझे तसल्ली देती थी। मुझे मालूम ही नही हुआ कि तुम घर का प्रबन्ध कैसे करती हो? तुमने मोटे-से-मोटा काम अपने हाथों से किया, जिसमें मुझे पुस्तकों के लिए रुपये की कमी न हो। तुम्हीं मेरी देवी हो और तुम्हारी बदौलत ही आज मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ हैं। मैं तुम्हारी इन सेवाओं की स्मृति को हृदय में सुरक्षित रखूँगा। वागी, एक दिन वह आयेगा, जब तुम अपने त्याग और तप का आनन्द उठाओगी।

वागेश्वरी ने गदगद होकर कहा- तुम्हारे ये शब्द मेरे लिए सबसे बडे पुरस्कार हैं मानू ! मैं और किसी पुरस्कार की भूखी नहीं। मैंने जो कुछ तुम्हारी थोड़ी-बहुत सेवा की, उसका इतना यश मुझे मिलेगा; मुझे तो आशा भी न थी।

मनहरनाथ का हृदय इस समय उदार भावों से उमड़ा हुआ था। वह जों बहुत ही अल्पभाषी, कुछ रूखा आदमी था और शायद वागेश्वरी के मन मे उनकी शुष्कता पर दुःख भी हुआ हो; पर इस समय सफलता के नशे ने उसकी वाणी में पर-से लगा दिये थे। बोला- जिस समय मेरे विवाह की बातचीत हो रही थी, मैं बहुत शंकित था। समझ गया कि मुझे जो कुछ होना था, हो चुका । अब मुझे सारी उम्र देवीजी की नाजबरदारी में गुजरेगी। बड़े-बड़े अंगरेज विद्वानो की पुस्तकें पढ़ने से मुझे भी विवाह से घृणा हो गयी थी। मैं इसे उम्र कैद समझने लगा था, जो आत्मा और बुद्धि की उन्नति का द्वार बन्द कर देती हैं। मगर दो ही चार मास के बाद मुझे अपनी भूल मालूम हुई। मुझे मालूम हुआ कि सुभार्या स्वर्ग की सबसे विभूति हैं, जो मनुष्य को उज्जवल और पूर्ण बना देती हैं, जो आत्मोन्नति का मूल-मन्त्र हैं। मुझे मालूम हुआ कि विवाह का उद्देश्य भोग नहीं, आत्मा का विकास हैं।

वागेश्वरी यह नम्रता और सहन न कर सकी। वह किसी बात के बहाने से उठ कर चली गयी।

मनहर और वागेश्वरी का विवाह हुए तीन साल गुजरे थे। मनहर उस समय एक दफतर में क्लर्क था। सामान्य युवकों की भाँति उसे भी जासूसी उपन्यासों से बहुत प्रेम था। धीरे-धीरे उसे जासूसी का शौक हआ। इस विषय में उसने बहुत-सा साहित्य जमा किया और बड़े मनोयोग से उनका अध्ययन किया। इसके बाद उसने उस विषय पर स्वयं एक किताब लिखी। रचना में उसने ऐसी विलक्षण विवेचना-शक्ति का परिचय दिया, शैली भी इतनी रोचक थी, कि जनता ने उसे हाथों-हाथ लिया। इस विषय पर वह सर्वोत्तम ग्रंथ था।

देश में धूम मच गयी। यहाँ तक कि इटली और जर्मनी-जैसे देशों से उसके पास प्रशंसा-पत्र आये और इस विषय की पत्रिकाओं में अच्छी-अच्छी आलोचनाएँ निकलीं। अन्त में सरकार ने भी अपनी गुणग्राहकता का परिचय दिया- उसे इंगलैंड जाकर इस कला का अभ्यास करने के लिए वृत्ति प्रदान की। और यह सब कुछ वागेश्वरी की सत्प्रेरणा का शुभ-फल था।

मनहर की इच्छा थी कि वागेश्वरी भी साथ चले; पर वागेश्वरी उनके पाँव की बेड़ी न बनना चाहती थी। उसने घर रहकर सास-ससुर की सेवा करना ही उचित समझा।

2

मनहर के लिए इंगलैंड एक दूसरी ही दुनिया थी, जहाँ उन्नति के मुख्य साधनों में एक रूपवती पत्नी का होना भी था। अगर पत्नी रूपवती हैं, चपल हैं, चतुर हैं, अब वह उन्नति के शिखर पर पहुँच सकता हैं। मनोयोग और तपस्या के बूते पर नहीं, पत्नी के प्रभाव और आकर्षण के तेज पर। उस संसार में रूप और लावण्य-व्रत के बंधनों से मुक्त, एक अबाध सम्पत्ति थी! जिसने किसी रमणी को प्राप्त कर लिया; उसकी मानो तकदीर खुल गयी। यदि कोई सुन्दरी तुम्हारी सहधर्मिणी नहीं हैं, तो तुम्हारा सारा उद्योग, सारी कार्यपटुता निष्फल हैं, कोई तुम्हारा पुरसाँहल न होगा; अतएव वहाँ लोग रूप को व्यापारिक दृष्टि से देखते थे।

साल ही भर के अंग्रेजी-समाज के संसर्ग ने मनहर की मनोवृत्तियों में क्रांति पैदा कर दी। उसके मिजाज में संसारिकता का इतना प्राधान्य हो गया कि कोमल भावों के लिए वहाँ स्थान ही न रहा। वागेश्वरी उसके विद्याभ्यास में सहायक होती थी; पर उसे अधिकार और पद की ऊँचाईयों पर न पहुँता सकती थी। उसके त्याग और सेवा का महत्त्व भी अब मनहर की निगाहों में कम होता जा रहा था। वागेश्वरी अब उसे व्यर्थ-सी वस्तु मालूम होती थी, क्योंकि उसकी भौतिक दृष्टि में हर एक वस्तु का मूल्य उससे होने वाले लाभ पर ही अवलंबित था। अपना पूर्व-जीवन अब उसे हास्यपद जान पड़ता था। चंचल, हँसमुख, विनोदिनी अंग्रेज-युवतियों के सामने वागेश्वरी एक हलकी, तुच्छ-सी जान पड़ती थी- इस विद्युत-प्रकाश में वह दीपक अब मलिन पड़ गया था। यहाँ तक कि शनैःशनै उसका मलिन प्रकाश भी लुप्त हो गया।

मनहर ने अपने भविष्य का निश्चय कर लिया। यह भी एक रमणी की रूप नौका द‌्वार ही अपने लक्य पर पह पहुँचेगा। इसके सिवा और कोई उपाय न था।

रात के नौ बजे थे। मनहर लंदन के एक फैशनेबुल रेस्ट्राँ में बना-ठना बैठा था। उसका रंग-रूप और ठाट-बाट देखकर सहसा यह कोई नहीं कह सकता था कि अंग्रेज नहीं हैं। लंदन में भी उसके सौभाग्य ने उसका साथ दिया था। उसने चोरी के कई गहरे मुआमलों का पता लगा दिया था, इसलिए धन और यश दोंनो ही मिल रहा था। वह अब यहाँ के भारतीय समाज का एक प्रमुख अंग बन गया था, जिसके आतिथ्य औऱ सौजन्य की सभी सराहना करते थे। उसका लबोलहजा भी अंग्रेजो से मिलता-जुलता था। उसके सामने मेज की दूसरी ओर एक रमणी बैठी हुई उसकी बातें बड़े ध्यान से सुन रही थी। उसके अंग-अंग से यौवन टपका पड़ता था। भारत के अदभूत वृत्तांत सुन-सुनकर उसकी आँखे खुशी से चमक रही थीं। मनहर चिड़िया के सामने दाने बिखेर रहा था।

मनहर – विचित्र देश हैं जेनी, अत्यन्त विचित्र। पाँच-पाँच साल के दूल्हे तुम्हें भारत के सिवा और कहीं देखने को न मिलेंगे। लाल रंग का कामदार कपड़े, सिर पर चमकता हुआ लम्बा टोप, चेहरे पर फूलों का झालरदार बुर्का, घोड़े पर सवार चले जा रहे हैं। दो आदमी दोनो तरफ से छतरियाँ लगाये हुए हैं। हाथों में मेंहदी लगी हुई?

जेनी- मेंहदी क्यों लगाते हैं?

मनहर- जिसमें हाथ लाल हो जायँ। पैरों में भी रंग भरा जाता हैं। उँगलियों के नाखून लाल रंग दिये जाते हैं। वह दृश्य देखते ही बनता हैं।

जेनी- यह तो दिल में सनसनी पैदा करने वाला दृश्य होगा। दुलहिन भी इसी तरह सजायी जाती होगी?

मनहर- इससे कई गुना अधिक। सिर से पाँव तक सोने-चाँदी के जेवरों से लदी हुई। ऐसा कोई अंग नहीं जिसमें दो-दो, चार-चार गहने न हों।

जेनी- तुम्हारी शादी भी उसी तरह हुई होगी। तुम्हें तो बड़ा आनन्द आया होगा?

मनहर- हाँ, वही आनन्द आया था, जो तुम्हें मेरी-गो राउंडर पर चढ़ने में आता हैं। अच्छी-अच्छी चीजें खाने को मिलती हैं; अच्छे-अच्छे कपड़े मिलते हैं। खूब नाच- तमाशे देखता था और शहनाइयों का गाना सुनता था। मजा तो तब आता है, जब दुलहिन अपने घर से विदा होती हैं। सारे घर में कुहराम मच जाता हैं। दुलहिन हर एक से लिपट-लिपट कर रोती हैं; जैसे मातम कर रही हैं।

जेनी- दुलहिन रोती क्यों हैं?

मनहर- रोने का रिवाज चला आता हैं। हाँलाकि सभी जानते हैं कि वह हमेशा के लिए नहीं जा रहीं हैं, फिर भी सारा घर इस तरह फूट-फूटकर रोता हैं, मानो कालेपानी भेजी जा रही हैं।

जेनी- मैं तो इस तमाशे पर खूब हँसूँ ।

मनहर- हँसने की बात ही हैं।

जेनी- तुम्हारी बीबी भी रोयी होगी?

3

मनहर- अजी, कुछ न पूछो, पछाड़े खा रही थी, मानो मैं उसका गला घोट दूँगा। मेरी पालकी से निकलकर भागी जाती थी; पर मैने जोर से पकड़ कर अपनी बगल में बैठा लिया। तब मुझे दाँत काटने लगी।

मिस जेनी ने जोर से कहकहा मारा औऱ हँसी के साथ लोट गयी। बोली- हॉरिबिल! हॉरिबिल! क्या अब भी दाँत काटती हैं?

मनहर- वह अब इस संसार में नही हैं, जेनी! मैं उससे खूब काम लेता था। मैं सोता था, तो वह मेरे बदन में चम्पी लगाती थी, मेरे सिर पर तेल डालती थी, पंखा झलती थी।

जेनी- मुझे तो विश्वास नही आता। बिल्कुल मूर्ख थी!

मनहर- कुछ न पूछो। दिन को किसी के सामने मुझसे बोलती भी न थी; मगर मैं उसका पीछा करता रहता था।

जेनी- ओ! नॉटी बॉय! तुम बड़े शरीर हो; थीं तो रूपवती?

मनहर- हाँ, उसका मुँह तुम्हारे तलवों जैसा था।?

जेनी- नॉनसेंस! तुम ऐसी औरत के पीछे कभी न दौड़ते।

मनहर- उस वक़्त मैं भी मूर्ख था, जेनी।

जेनी- ऐसी मूर्ख लड़की से तुमने विवाह क्यों किया?

मनहर- विवाह न करता तो माँ-बाप जहर खा लेते।

जेनी- वह तुम्हें प्यार कैसे करने लगी?

मनहर- और करती क्या? मेरे सिवा दूसरा थी ही कौन ? घर से बाहर न निकलने पाती थी, मगर प्यार हममें से किसी को न था। वह मेरी आत्मा और हृदय को सन्तुष्ट न कर सकती थी, जेनी! मुझे उन दिनों की याद आती हैं, तो ऐसा मालूम होता हैं कि कोई भयंकर स्वप्न था। उफ! अगर वह स्त्री आज जीवित होती, तो मैं किसी अँधेरे दफतर में बैठा कलम घिसता होता। इस देश में आकर मुझे ययार्थ ज्ञान हुआ कि संसार में स्त्री का क्या स्थान हैं, उसका क्या दायित्व हैं और जीवन उसके कारण कितना आनन्दप्रद हो जाता हैं। और जिस दिन तुम्हारे दर्शन हुए, वह तो मेरी जिन्दगी का सबसे मुबारक दिन था। याद हैं तुम्हें वह दिन? तुम्हारी वह सूरत मेरी आँखों में अब भी फिर रही हैं।
सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र
जेनी- अब मै चली जाऊँगी। तुम मेरी खुशामद करने लगे।

भारत के मजदूरदल सचिव थे लार्ड बारबर, और उनके प्राईवेट सेक्रेटरी थे मि. कावर्ड। लार्ड बारबर भारत के सच्चे मित्र समझे जाते थे। जब कंजरवेटिव और लिबरल दलों का अधिकार था, तो लार्ड बारबर भारत की बड़ी जोरो से बकालत करते थे। वह इन मन्त्रियों पर ऐसे-ऐसे कटाक्ष करते थे कि उन बेचारों को कोई जवाब न सूझता। एक बार वह हिन्दुस्तान आये थे और यहाँ की कॉग्रेस में शरीक भी हुए थे। उस समय उनकी उदार वक्तृताओ ने समस्त देश में आशा और उत्साह की एक लहर दौड़ा दी थी। कॉग्रेस के जलसे के बाद वह जिस शहर में गये, जनता ने उनके रास्ते में आँखें बिछायी, उनकी गाड़ियाँ खींची, उनपर फूल बरसाये। चारों ओर से यही आवाज आती थी- यह हैं भारत का उद्धार करने वाला। लोगो को विश्वास हो गया कि भारत के सौभाग्य से अगर कभी लार्ड बारबर को अधिकार प्राप्त हुआ, तो वह दिन भारत के इतिहास में मुबारक होगा।

लेकिन अधिकार पाते ही लार्ड बारबर में एक विचित्र परिवर्तन हो गया। उनके सारे सदभाव, उनकी उदारता, न्यायपरायणता, सहानुभूति ये सभी अधिकार के भँवर में पड़ गये। और अब लार्ड बारबर और उनके पूर्वाधिकार के व्यवहार में लेशमात्र भी अन्तर न था। वह भी वही कर रहे थे, जो उनके पहले के लोग कर चुके थे। वही दमन था, वही जातिगत अभिमान, वही कट्टरता, वही संकीर्णता। देवता के अधिकार के सिहासन पर पाँव रखते ही अपना देवत्व खो बैठा था। अपने दो साल के अधिकार-काम में उन्होंने सैकड़ो ही अफसर नियुक्त किये थे; पर उनमें एक भी हिन्दुस्तानी न था। भारतवासी निराश हो-होकर उन्हें ‘डाइहार्ड‘, ‘धन का उपासक‘ और ‘साम्राज्यवाद का पुजारी‘ कहने लगे थे। यह खुला हुआ रहस्य था कि जो कुछ करते थे मि. कावर्ड करते थे। हक यह था कि लार्ड बारबर की नीयत के इतने शेर थे, जितने दिल के कमजोर । हालाँकि परिणाम दोनो दशाओं में एक-सा था।

यह मि. कावर्ड एक ही महापुरुष थे। उनकी उम्र चालीस से अधिक गुजर चुकी थी; पर अभी तक विवाह न किया था। शायद उनका ख्याल था कि राजनीति के क्षेत्र में रहकर वैवाहिक जीवन का आनन्द नहीं उठा सकते । वास्तव में नवीनता के मधुप थे। उन्हें नित्य नये विनोद और आकर्षण, नित्य नये विलास और उल्लास की टोह रहती थी। दूसरों के लगाये हुए बाग की सैर करके चित्त को प्रसन्न कर लेना इससे कहीं सरल था कि अपना बाग आप लगायें और उसकी रक्षा और सजावट में अपना सिर खपायें। उनको व्यावहारिक और व्यापारिक दृष्टि में यह लटका उससें कही आसान था।

4

दोपहर का समय था। मि. कावर्ड नाश्ता करके सिंगार पी रहे थे कि मिस जेनी रोज के आने की खबर हुई। उन्होंने तुरन्त आईने के सामने खड़े होकर अपनी सूरत देखी, बिखरे हुए बालों को सँवारा, बहुमूल्य इत्र मला और मुख से स्वागत की सहास छवि दरशाते हुए कमरे से निकलकर मिस रोज से हाथ मिलाया।

जेनी ने कमरे में कदम रखते ही कहा- अब मैं समझ गयी कि क्यों कोई सुन्दरी तुम्हारी बात नहीं पूछती। आप अपने वादों को पूरा करना नहीं जानते।

मि. कावर्ड ने जेनी के लिए एक कुर्सी खीचते हुए कहा- मुझे बहुत खेद हैं मिस रोज, कि मैं कल अपना वादा पूरा न कर सका। प्राइवेट सेक्रेटरियों का जीवन कुत्तों के जीवन से भी हेय हैं। बार-बार चाहता था कि दफतर से उठूँ ; पर एक-न- एक कॉल ऐसा आ जाता था कि फिर रुक जाना पड़ता था। मै तुमसे क्षमा माँगता हूँ ।

जेनी- मै तुम्हे तलाश करती रही। जब तुम न मिले, तो मेरा जी खट्टा हो गया। मैं और किसी के साथ नहीं नाची! अगर तुम्हें नही जाना था, तो मुझे निमन्त्रण पत्र क्यों दिलाया था।

कावर्ड ने जेनी को सिगार भेंट करते हुए कहा- तुम मुझे लज्जित कर रही हो, जैनी! मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की और क्या बात हो सकती थी कि तुम्हारे साथ नाचता? एक पुराना बैचलर होने पर भी मैं उस आनन्द की कल्पना कर सकता हूँ । बस, समझ लो कि तड़प-तड़प कर रह जाता था।

जेनी ने कठोर मुस्कान के साथ कहा- तुम इसी योग्य हो कि बैचलर बने रहो। यही तुम्हारी सजा हैं।

कावर्ड ने अनुरक्त होकर उत्तर दिया- तुम बड़ी कठोर हो, जेनी! तुम्हीं क्या रमणियाँ सभी कठोर होती हैं। मैं कितनी परवशता दिखाऊँ, तुम्हें विश्वास न आयेगा। मुझे यह अरमान ही रह गया कि कोई सुन्दरी मेरे अनुराग और लगन का आदर करती।

जेनी- तुमसे अनुराग हो भी तो? रमणियाँ ऐसे बहानेबाजों को मुँह नहीं लगाती।

कावर्ड- फिर बहानेबाज कहा – मजबूर क्यों नहीं कहती?

जेनी- मैं किसी की मजबूरी को नहीं मानती। मेरे लिए यह हर्ष और गौरव की बात नहीं हो सकती, कि आपको जब अपने सरकारी, अर्ध-सरकारी और गैर- सरकारी कामों से अवकाश मिले, तो आप मेरा मन रखने के लिए एक क्षण के लिए अपने कोमल चरणों को कष्ट न दे। मैं दफ्तर और काम के हीले नहीं सुनना चाहती। इसी कारण तुम अब तक झींख रहे हो।

कावर्ड ने गम्भीर भाव से कहा- तुम मेरे साथ अन्याय कर रही हो, जेनी! मेरे अविवाहित रहने का क्या कारण हैं, यह कल तक मुझे खुद न मालूम था। कल आप-ही-आप मालूम हो गया।

जेनी ने उसका परिहास करते हुए कहा- अच्छा! तो यह रहस्य आपके मालूम हो गया? तब तो आप सचमुच आत्मदर्शी हैं। जरा मैं भी सुनूँ, क्या कारण था?

कावर्ड ने उत्साह के साथ कहा- अब तक कोई सुन्दरी न मिली थी, जो मुझे उन्मत्त कर सकती।

जेनी ने कठोर परिहास के साथ कहा- मेरा ख्याल था कि दुनिया में ऐसी औरत पैदा ही नहीं हुई, जो तुम्हें उन्मत्त कर सकती। तुम उन्मत्त बनाना चाहते हो, उन्मत्त बनना नहीं चाहते।

कावर्ड़- तुम बड़ा अत्याचार करती हो, जेनी।

जेनी- अपने उन्माद का प्रमाण देना चाहते हो

कावर्ड- हृदय से, जेनी! मै इस अवसर की ताक में बैठा हूँ।

उसी जिन शाम को जेनी ने मनहर से कहा- तुम्हारे सौभाग्य पर बधाई! तुम्हें वह जगह मिल गयी।

मनहर ने उछलकर बोला- सच! सेक्रेटरी से कोई बातचीत हुई थी?

जेनी- सेक्रेटरी से कुछ कहने की जरूरत ही न पड़ी। सब कुछ कावर्ड के हाथ में हैं। मैने उसी को चंग पर चढ़ाया। लगा मुझे इश्क जताने। पचास साल की तो उम्र है, चाँद के बाल झड़ गये, गालों में झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, पर अभी तक आपको इश्क का खब्त हैं। आप अपने को एक ही रसिया समझते हैं। उसके बूढ़े चोचले बहुत बुरे मालूम होते थे; मगर तुम्हारे लिए सब कुछ सहना पड़ा । खैर मेहनत सफल हो गयी हैं। कल तुम्हें परवाना मिल जायगा। अब सफर की तैयारी करनी चाहिए।

मनहर ने गदगद् होकर कहा- तुमने मुझ पर बड़ा एहसान किया हैं, जेनी!

मनहर को गुप्तचर विभाग में ऊँचा पद मिला। देश के राष्ट्रीय पत्रों में उसकी तारीफों के पुल बाँधे, उसकी तसवीर छापी और राष्ट्र की ओर से उसे बधाई दी। वह पहला भारतीय था, जिसे वह ऊँचा पद प्रदान किया गया था। ब्रिटिश सरकार ने सिद्ध कर दिया था कि उसकी न्याय-बुद्धि जातीय अभिमान और द्वेष से उच्चतर हैं।

मनहर और जेनी का विवाह इंगलैंड में ही हो गया। हनीमून का महीना फ्रांस में गुजरा। वहाँ से दोनो हिन्दुस्तान आये। मनहर का दफ्तर बम्बई में था। यहीं दोनो एक होटल में रहने लगे। मनहर को गुप्त अभियोग की खोज के लिए अक्सर दौरे करने पड़ते थे। कभी काश्मीर, कभी मद्रास, कभी रंगून । जेनी इन यात्राओं में बराबर उसके साथ रहती। नित्य नये दृश्य थे, नये विनोद, नये उल्लास। उसकी नवीनता-प्रिय प्रकृति के लिए आनन्द का इससे अच्छा और क्या सामान हो सकता था?

5

मनहर का रहन-सहन तो अंग्रेजी था ही, घरवालों से भी सम्बन्ध विच्छेद हो गया था। वागेश्वरी के पत्रो का उत्तर देना तो दूर रहा, उन्हें खोलकर पढ़ता भी न था।

भारत में उसे हमेशा यह शंका बनी रहती थी कि कहीं घरवालों को उसका पता न चल जाय। जेनी से वह अपनी यथार्थ स्थिति को छिपाये रखना चाहता था। उसने घरवालों को आने की सूचना तक न दी। यहाँ तक की वह हिन्दुस्तानियों से बहुत कम ही मिलता था। उसके मित्र अधिकांश पुलिस और फौज के अफसर थे। वहीं उसके मेहमान होते। वाकचतुर जेनी सम्मोहन कला में सिद्धहस्त थी। पुरुषों के प्रेम से खेलना उसकी सबसे अमोदमय क्रीड़ा थी। जलाती थी, रिझाती भी थी, और मनहर भी उसकी कपट-लीला का शिकार बनता रहता था। उसे हमेशा भूल-भुलैया में रखती, कभी इतना निकट कि छाती पर सवार, कभी इतना दूर कि योजन का अन्तर – कभी निष्ठुर और कभी कठोर, कभी प्रेम-विह्वल और व्यग्र। एक रहस्य था, जिसे वह कभी समझता था और कभी हैरान रह जाता था।

इस तरह दो वर्ष बीत गये और मनहर तथा जेनी कोण की दो भुजाओं की भाँति एक दूसरे से दूर होते गये। मनहर इस भावना को हृदय से न निकाल सकता था कि जेनी का मेरे प्रति एक विशेष कर्त्तव्य हैं। यह चाहे उसकी संकीर्णता हो या कुल-मर्यादा का असर कि वह जेनी को पाबन्द देखना चाहता था। उसकी स्वच्छन्द वृत्ति उसे लज्जास्पद मालूम होती थी। वह भूल जाता था कि जेनी से उसके सम्पर्क का आरम्भ ही स्वार्थ पर अवलम्बित था। शायद उसने समझा था कि समय के साथ जेनी को अपने कर्त्तव्य का ज्ञान हो जायगा; हालाँकि उसे मालूम होना चाहिए था कि टेढी बुनियाद पर बना हुआ भवन जल्द या देर में अवश्य भूमिस्थ होकर रहेगा। और ऊँचाई के साथ इसकी शंका और भी बढती जाती थी। इसके विपरीत जेनी का व्यवहार बिल्कुल परिस्थिति के अनुकूल था। उसने मनहर को विनोदमय तथा विलासमय जीवन का एक साधन समझा था और उसी विचार पर वह अब तक स्थिर थी। इस व्यक्ति को वह मन में पति का स्थान न दे सकती थी, पाषाण-प्रतिमा को अपना देवता न बना सकती थी। पत्नी बनना उसके जीवन का स्वप्न न था, इसलिए वह मनहर के प्रति अपने किसी कर्त्तव्य को स्वीकार न करती थी। अगर मनहर अपनी गाढी कमाई उसके चरणों पर अर्पित करता था, तो उस पर कोई एहसान न करता था। मनहर उसका बनाया हुआ पुतला, उसी का लगाया हुआ वृक्ष था। उसकी छाया और फल को भोग करना वह अपना अधिकार समझती थी।

मनोमालिन्य बढ़ता गया। आखिर मनहर ने उसके साथ दावतों और जलसों में जाना छोड़ दिया; पर जेनी पूर्ववत् सैर करने जाती, मित्रों से मिलती, दावतें करती और दावतों में शरीक होती। मनहर के साथ न जाने से लेशमात्र भी दुःख या निराशा न होती थी; बल्कि वह शायद उसकी उदासीनता पर और भी प्रसन्न होती। मनहर इस मानसिक व्यथा को शराब के नशे मे डूबोने का उद्योग करता। पीना तो उसने इंगलैंड में ही शुरू कर दिया था, पर अब उसकी मात्रा बहुत बढ़ गयी थी। वहाँ स्फूर्ति और आनन्द के लिए पीता था, यहाँ स्फूर्ति और आनन्द को मिटाने के लिए। वह दिन-दिन दुर्बल होता जाता था। वह जानता था, शराब मुझे पिये जा रही हैं; पर उसके जीवन का यही एक अवलम्ब रह गया था।

गर्मियों के दिन थे। मनहर एक मुआमले की जाँच करने के लिए लखनऊ में डेरा डाले हुए था। मुआमला संगीन था। उसे सिर उठाने की फुरसत न मिलती थी। स्वास्थ्य भी कुछ खराब हो चला था, मगर जेनी अपने सैर-सपाटें मे मग्न थी। आखिर एक दिन उसने कहा, मैं नैनीताल जा रही हूँ। यहाँ की गर्मी मुझसे सही नहीं जाती।

मनहर ने लाल-लाल आँखे निकाल कर कहा- नैनीताल में क्या काम हैं?

वह आज अपना अधिकार दिखाने पर तुल गया। जेनी भी उसके अधिकार की उपेक्षा पर तुली हुई थी। बोली- यहाँ कोई सोसाइटी नहीं। सारा लखनऊ पहाड़ो पर चला गया हैं।

मनहर ने जैसे म्यान से तलवार निकलकर कर कहा- जब तक मैं यहाँ हूँ, तुम्हें कहीं जाने का अधिकार नहीं हैं। तुम्हारी शादी मेरे साथ हुई हैं, सोसाइटी के साथ नहीं। फिर तुम साफ देख रही हो कि मैं बीमार हूँ, तिस पर भी तुम अपनी विलास प्रवृत्ति को रोक नहीं सकती। मुझे तुमसे ऐसी आशा न थी, जेनी! मैं तुमको शरीफ समझता था। मुझे स्वप्न में भी यह गुमान न था कि तुम मेरे साथ ऐसी बेवफाई करोगी।

जेनी ने अविचलित भाव से कहा- तो क्या तुम समझते थे, मैं भी तुम्हारी हिन्दुस्तानी स्त्री की तरह तुम्हारी लौड़ी बन कर रहूँगी और तुम्हारे सहलाऊँगी ? मैं तुम्हे इतना नादान नहीं समझती। अगर तुम्हें हमारी अंग्रेजी सभ्यता का इतनी मोटी-सी बात मालूम नहीं, तो अब मालूम कर लो कि अंग्रेज स्त्री अपनी रुचि के सिवा और किसी की पाबन्द नहीं। तुमने मुझसे विवाह किया था कि मेरी सहायता से तुम्हें सम्मान और पद प्राप्त हो। सभी पुरुष ऐसा करते हैं और तुमने भी वही किया। मैं इसके लिए तुम्हें बुरा नहीं कहती लेकिन जब तुम्हारा उद्देश्य पूरा हो गया, जिसके लिए तुमने मुझसे विवाह किया था, तो तुम मुझसे अधिक आशा क्यों रखते हो? तुम हिन्दुस्तानी हो, अंगरेज नहीं हो सकते। मैं अंगरेज हूँ और हिन्दुस्तानी नहीं हो सकती; इसलिए हम में से किसी को यह अधिकार नहीं हैं कि वह दूसरे को अपनी मर्जी का गुलाम बनाने की चेष्ठा करे।

मनहर हतबुद्धि-सा बैठा सुनता रहा। एक-एक शब्द विष की घूँट की भाँति उसके कंठ के नीचे उतर रहा था। कितना कठोर सत्य था। पद-लालसा के उस प्रचंड आवेग में, विलास तृष्णा के उस अदम्य प्रवाह में वह भूल गया था कि जीवन में कोई ऐसा तत्व भी हैं, जिसके सामने पद और विलास काँच के खिलौनों से अधिक मूल्य नहीं रखते । यह विस्मृत सत्य इस समय अपने दारुण-विलाप से उसकी मदमग्न चेतना को तड़पाने लगा।

शाम को जेनी नैनीताल चली गयी। मनहर ने उसकी ओर आँख उठाकर भी न देखा।

6

तीन दिन तक मनहर घर से न निकला। जीवन के पाँच-छः वर्षो में उसने जितने रत्न संचित किये थे, जिसपर वह गर्व करता था; जिन्हें पाकर वह अपने को धन्य मानता था, अब परीक्षा की कसौटी पर आकर नकली पत्थर सिद्ध हो रहे थे। उसकी अपमानित, ग्लानित, पराजित आत्मा एकान्त-रोदन के सिवा और कोई त्राण न पाती थी। अपनी टूटी हुई झोपड़ी को छोड़कर वह जिस-जिस सुनहले कलशवाले भवन की ओर लपका था, वह मरीचिका-मात्र थी और अब उसे फिर उसी टूटी झोपड़ी की याद आयी, जहाँ शान्ति, प्रेम और आशीर्वाद की सुधा पी थी। यह सारा आडम्बर उसे काट खाने लगा। उस सरल शीतल स्नेह के सामने ये सारी विभूतियाँ तुच्छ-सी जँचने लगी। तीसरे दिन वह भीषण संकल्प करके उठा और दो पत्र लिखे। एक तो अपने पद से इस्तीफा था, दस दूसरा जेनी से अन्तिम विदा की सूचना। इस्तीफे में उसने लिखा- मेरा स्वास्थ्य नष्ट हो गया हैं और मै इस भार को नहीं सँभाल सकता। जेनी के पत्र में उसने लिखा- हम और तुम दोनों ने भूल की और हमें जल्द-से-जल्द उस भूल का सुधार लेना चाहिए। मैं तुम्हें सारे बन्धनों से मुक्त करता हूँ । तुम भी मुझे मुक्त कर दो। मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं हैं। अपराध न तुम्हारा हैं, न मेरा। समझ का फेर तुम्हें भी था और मुझे भी। मैंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया हैं औऱ अब तुम्हारा मुझ पर कोई एहसान नहीं रहा। मेरे पास जो कुछ हैं, वह तुम्हारा हैं, वह सब मैं छोड़े जा रहा हूँ । मैं तो निमित्त-मात्र था, स्वामिनी तुम थी। उस सभ्यता को दूर से ही सलाम हैं, जो विनोद और विलास के सामने किसी बन्धन को स्वीकार नहीं करती।

उसने खुद जाकर दोनो पत्रों की रजिस्ट्री करायी और उत्तर का इन्तजार किया बिना ही वहाँ से चलने को तैयार हो गया।

जेनी ने जब मनहर का पत्र पाकर पढ़ा, तो मुस्कायी। उसे मनहर की इच्छा पर शासन का ऐसा अभ्यास पड़ गया था कि इस पत्र से उसे जरा भी घबराहट न हुई। उसे विश्वास था कि दो-चार दिन चिकनी-चुपड़ी बातें करके वह उसे फिर वशीभूत कर लेगी। अगर मनहर की इच्छा केवल धमकी देनी न होती, उसके दिल पर चोट लगी होती, तो वह अब तक यहाँ न होता। कब का यह स्थान छोड़ चुका होता। उसका यहाँ रहना ही बता रहा हैं कि वह केवल बन्दरघुड़की दे रहा हैं।

जेनी ने स्थिरचित होकर कपड़े बदले औऱ तब इस तरह मनहर के कमरे में आयी, मानो कोई अभिनय करने स्टेज पर आयी हो।

मनहर उसे देखते ही जोर से ठट्ठा मार कर हँसा। जेनी सहम कर पीछे हट गयी। इस हँसी कमें क्रोध या प्रतिकार न था। उसमें उन्माद भरा हुआ था। मनहर के सामने मेज पर बोतल और गिलास रखा हुआ था। एक दिन में उसने न-जाने कितनी शराब पी ली थी। उसकी आँखों में जैसे रक्त उबला पड़ता था।

जेनी ने समीप जाकर उसके कन्धे पर हाथ रखा और बोली- क्या रात-भर पीते ही रहोगे? चलों आराम से लेटो, रात ज्यादा हो गयी हैं। घंटो से बैठी तुम्हारा इन्तजार कर रही हूँ। तुम इतने निष्ठुर ते कभी न थे।

मनहर खोया हुआ-सा बोला- तुम कब आ गयी वागी? देखो, मैं कब से तुम्हे पुकार रहा हूँ। चलो, आज सैर कर आयें। उसी नदी के किनारे तुम अपना वही प्यारा गीत सुनाना, जिसे सुनकर मैं पागल हो जाता हूँ। क्या कहती हो, मैं बेमुरौवत हूँ ? यह तुम्हारा अन्याय है, वागी! मैं कसम खाकर कहता हूँ, ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरा, जब तुम्हारी याद ने मुझे रुलाया हो।

जेनी ने उसका कन्धा हिलाकर कहा- तुम यह क्या ऊल-जुलूल बक रहे हो? वागी यहाँ कहाँ हैं?

मनहर ने उसकी ओर अपरिचित भाव से देखकर कुछ कहा, फिर जोर से हँसकर बोला- मैं यह न मानूँगा, वागी! तुम्हें मेरे साथ चलना होगा। वहाँ मैं लिए फूलों की एक माला बनाऊँगा…।

जेनी ने समझा, यह शराब बहुत पी गये हैं। बक-झक कर रहे हैं। इनसे इस वक़्त कुछ बाते करना व्यर्थ हैं। चुपके से कमरे से बाहर चली गयी। उसे जरा-सी शंका हुई थी। यहाँ उसका मूलोच्छेद हो गया। जिस आदमी का अपनी वाणी पर अधिकार नहीं, वह इच्छा पर क्या अधिकार रख सकता हैं?

उस घड़ी से मनहर घर वालों की रट-सी लग गयी। कभी वागेश्वरी को पुकारता, कभी अम्माँ को, कभी दादा को। उसका आत्मा अतीत मे विचरती रहती, उस अतीत में जब जेनी ने काली छाया की भाँति प्रवेश न किया था और वागेश्वरी अपने सरल व्रत से उसके जीवन में प्रकाश फैलाती रहती थी।

दूसरे दिन जेनी ने जाकर कहा- तुम इतनी शराब क्यो पीते हो? देखते नहीं, तुम्हारी क्या दशा हो रही हैं?

मनहर ने उसकी ओर आश्चर्य से देखकर कहा- तुम कौन हो?

जेनी- क्यों मुझे नहीं पहचानते हो ?इतनी जल्दी भूल गये?

मनहर- मैने तुम्हें कभी नही देखा! मैं तुम्हें नहीं पहचानता।

जेनी ने और अधिक बातचीत न थी। उसने मनहर के कमरे से शराब की बोतलें उठवा ली और नौकरों की ताकीद कर दी कि उसे एक घूँट भी शराब न दी जाय। उसे अब कुछ-कुछ सन्देह होने लगा था, क्योंकि मनहर की दशा उससे कहीं शंकाजनक थी, जितनी वह समझती थी। मनहर का जीवित और स्वस्थ रहना उसके आवश्यक था। इसी घोड़े पर बैठकर वह शिकार खेलती थी। घोड़े के बगैर शिकार का आनन्द कहाँ?

मगर एक सप्ताह हो जाने पर भी मनहर की मानसिक दशा में कोई अन्तर न हुआ। न मित्रों को पहचानता था, न नौकरों को। पिछले तीन बरसों का जीवन एक स्वप्न की भाँति मिट गया था।

7

सातवें दिन जेनी सिविल सर्जन को लेकर आयी, तो मनहर का कहीं पता न था।

पाँच साल के बाद वागेश्वरी का लुटा हुआ सुहाग फिर चेता। माँ-बाप पुत्र के वियोग में रो-रोकर अंधे हो चुके थे। वागेश्वरी निराशा में भी आस बाँधे बैठी हुई थी। उसका मायका सम्पन्न था। बार-बार बुलावे आते, बाप आया, भाई आया, पर धैर्य और व्रत की देवी घर से न टली।

जब मनहर भारत आया, तो वागेश्वरी ने सुना कि वह विलायत से एक मेम लाया हैं। फिर भी उसे आशा थी कि वह आयेगा; लेकिन उसकी आशा पूरी न हुई। फिर उसने सुना, वह ईसाई हो गया है आचार-विचार त्याग दिया हैं, तब उसने माथा ठोक लिया।

घर की अवस्था दिन-दिन बिगड़ने लगी। वर्षा बन्द हो गयी और सागर सूखने लगा। घर बिका, कुछ जमीन थी, वह बिकी, फिर गहनों की बारी आयी, यहाँ तक कि अब केवल आकाशी वृत्ति थी। कभी चूल्हा जल गया, कभी ठंड़ा पडा रहा।

एक दिन संध्या समय वह कुएँ पर पानी भरने गयी थी कि एक थका हुआ जीर्ण, विपत्ति का मारा जैसा आदमी आकर कुएँ की जगत पर बैठ गया। वागेश्वरी ने देखा, तो मनहर! उसने तुरन्त घूँघट बढ़ा लिया। आँखो पर विश्वास न हुआ, फिर भी आनन्द और विस्मय से हृदय में फुरेरियाँ उड़ने लगी। रस्सी और कलसा कुएँ पर छोड़कर लपकी हुई घर आयी और सास से बोली- अम्माँजी, जरा कुएँ पर जाकर देखों, कौन आया हैं। सास ने कहा- तू पानी लाने गयी थी, या तमाशा देखने? घर में एक बूँद पानी नही हैं। कौन आया है कुएँ पर?

‘चलकर, देख लो न!’

‘कोई सिपाही-प्यादा होगा। अब उसके सिवा और कौन आनेवाला हैं। कोई महाजन तो नही हैं?’

‘नहीं अम्माँ, तुम चली क्यों नहीं चलती?’

बूढ़ी माता भाँति-भाँति की शंकाएँ करती हुई कुएँ पर पहुँची, तो मनहर दौड़कर उनके पैरों से लिपट गया। माता ने उसे छाती से लगाकर कहा- तुम्हारी यह दशा हैं मानू? क्या बीमार हैं? असबाब कहाँ हैं?

मनहर ने कहा- पहले कुछ खाने को दो, अम्माँ! बहुत भूखा हूँ। मैं बड़ी दूर से पैदल चला आ रहा हूँ।

गाँव में खबर फैल गयी कि मनहर आया हैं। लोग उसे देखने दौड़े। किस ठाट से आया हैं? बड़े ऊँचे पद पर हैं, हजारों रुपये पाता हैं। अब उसके ठाट का क्या पूछना! मेम भी साथ आयी हैं या नही?

मगर जब आकर देखा, तो आफत का मारा आदमी, फटेहाल, कपड़े तार-तार, बाल बढ़े हुए, जैसे जेल से आया हो।

प्रश्नों की बौछार होने लगी- हमने तो सुना था, तुम किसी ऊँचे पद पर हो।

मनहर ने जैसे किसी भूली बात को याद करने का विफल प्रयास करके कहा- मैं! मै तो किसी ओहदे पर नहीं!

‘वाह! तुम विलायत से मेम नही लाये थे?’

मनहर ने चकित होकर कहा- विलायत। विलायत कौन गया था?

‘अरे! भंग तो नही खा गये हो। तुम विलायत नही गये थे?’

मनहर मूढ़ों की भाँति हँसा- मैं विलायत करने क्या जाता?

‘अजी, तुमको वजीफा नहीं मिला था? यहाँ से तुम विलायत गये थे। तुम्हारे पत्र बराबर आते थे। अब तुम कहते हो, विलायत गयी ही नही। होश में हो, या हम लोगों को उल्लू बना रहा हो?’

मनहर ने उन लोगों की ओर आँखे फाड़कर देखा और बोला- मैं तो कहीं नहीं गया था। आप लोग जाने क्या कह रहे हैं।

अब इसमे सन्देह की गुंजाइश न रही कि वह अपने होश-हवास में नहीं है। उसे विलायत जाने के पहले की सारी बाते याद थीं। गाँव और घर के हरेक आदमी को पहचानता था, सबसे नम्रता और प्रेम से बाते करता था; लेकिन जब इंगलैंड, अंगरेज-बीवी और ऊँचे पद का जिक्र आता तो भौचक्का होकर ताकने लगता। वागेश्वरी को अब उसके प्रेम मे अस्वाभाविक अनुराग दीखता था, जो बनावटी मालूम होता था। वह चाहती थी कि उसके व्यवहार और आचरण में पहले की-सी बेतकल्लुफी हो। वह प्रेम का स्वाँग नहीं, प्रेम चाहती थी। दस ही पाँच दिनों में उसे ज्ञान हो गया कि इस विशेष अनुराग का कारण बनावट या दिखावा नहीं, वरन कोई मानसिक विकार हैं। मनहर ने माँ-बाप के इतना अदब पहले कभी न किया था। उसे अब मोटे-से-मोटा काम करने में संकोच न था। वह, जो बाजार से साग-भाजी लाने में अपना अनादर समझता था, अब कुएँ से पानी खींचता, लकड़ियाँ फाड़ता और घर में झाडूँ लगाता था और अपने ही घर में ही नहीं, सारे मुहल्ले में उसकी सेवा और नम्रता का चर्चा होती थी।

एक बार मुहल्ले में चोरी हुई। पुलिस ने बहुत दौड़-धूप की; पर चोरों का पता न चला। मनहर ने चोर का पता ही नही लगा दिया; बल्कि माल भी बरामद करा दिया। इससे आसपास के गाँवों और मुहल्लों में उसका यश फैल गया। कोई चोरी हो जाती थी तो लोग उसके पास दौड़े आते और अधिकांश उद्योग सफल भी होते थे। इस तरह उसकी जीविका की एक व्यवस्था हो गयी। वह अब वागेश्वरी का गुलाम था। उसी की दिलजोई और सेवा में उसके दिन कटते थे। अगर उसमें विकार या बीमारी का कोई लक्षण था, तो इतना ही। यही सनक उसे सवार हो गयी थी।

वागेश्वरी को उसकी दशा पर दुःख होता था; पर उसकी यह बीमारी उस स्वास्थ्य से अधिक उसे प्रिय थी, जब वह उसकी बात भी न पूछता था।

छः महीनों को बाद एक दिन जेनी मनहर का पता लगाती हुई आ पहुँची। हाथ में जो कुछ था, वह सब उड़ा चुकने के बाद अब उसे किसी आश्रय की खोज थी। उसके चाहने वालों मे कोई ऐसा न था, जो उसकी आर्थिक सहायता करता। शायद अब जेनी को कुछ ग्लानि भी होती थी। वह अपने किये पर लज्जित थी।

द्वार पर हार्न की आवाज सुनकर मनहर बाहर निकला और इस प्रकार जेनी को देखने लगा, मानो उसे कभी देखा ही नही।

8
जेनी ने मोटर से उतर कर उससे हाथ मिलाया और अपनी बीती सुनाने लगी- तुम इस तरह मुझसे छिपकर क्यो चले आये? और फिर आकर एक पत्र भी नहीं लिखा। आखिर, मैने तुम्हारे साथ क्या बुराई की थी! फिर मुझमें कोई बुराई देखी थी, तो तुम्हें चाहिए था कि मुझे सावधान कर देते। छिपकर चले आने से क्या फायदा हुआ? ऐसी अच्छी जगह मिल गयी थी, वह भी हाथ से निकल गयी।

मनहर काठ के उल्लू की भाँति खड़ा रहा।

जेनी ने फिर कहा- तुम्हारे चले आने के बाद मेरे ऊपर जो संकट आये, वह सुनाऊँ, तो तुम घबरा जाओगे। मैं इसी चिन्ता और दुःख से बीमार हो गयी। तुम्हारे बगैर मेरी जीवन निरर्थक हो गया हैं। तुम्हारा चित्र देखकर मन को ढाढस देती थी। तुम्हारे पत्रों को आदि से अन्त तक पढ़ना मेरे लिए सबसे मनोरंजक विषय था। तुम मेरे साथ चलो, मैंने एक डॉक्टर से बातचीत की हैं, वह मस्तिष्क के विकारों का डॉक्टर हैं। मुझ आशा है, उसके उपचार से तुम्हें लाभ होगा।

मनहर चुपचाप विरक्त-भाव से खड़ा रहा, मानो वह न कुछ देख रहा हैं, न सुन रहा हैं।

सहसा वागेश्वरी निकल आयी। जेनी को देखते ही वह ताड़ गयी कि यही मेरी यूरोपियन सौत हैं। वह उसे बड़े आदर-सत्कार के साथ भीतर ले गयी। मनहर भी उनके पीछे-पीछे चला गया।

जेनी ने टूटी खाट पर बैठते हुए कहा- इन्होंने मेरा जिक्र तो तुमसे किया ही होगी। मेरी इनसे लंदन में शादी हुई हैं।

वागेश्वरी बोली- यह तो मैं आपको देखते ही समझ गयी थी।

जेनी- इन्होने कभी मेरा जिक्र नहीं किया?

वागेश्वरी बोली- कभी नहीं। इन्हें तो कुछ याद नहीं। आपको को यहाँ आने में बड़ा कष्ट हुआ होगा?

जेनी- महीनो के बाद तब इनके घर का पता चला। वहाँ से बिना कुछ कहे-सुने चल दिये

‘आपको कुछ मालूम हैं, इन्हें क्या शिकायत हैं?’

‘शराब बहुत पीने लगे थे। आपने किसी डॉक्टर को नहीं दिखाया?‘

‘हमने तो किसी को नहीं दिखाया‘

जेनी ने तिरस्कार करके कहा- क्यों? क्या आप इन्हें हमेशा बीनार रखना चाहती हैं?

वागेश्वरी ने बेपरवाही से जवाब दिया- मेरे लिए तो इनका बीमार रहना इनके स्वस्थ रहने से कहीं अच्छा हैं। तब वह अपना आत्मा को भूल गये थे, अब उसे पा गये।

फिर उसने निर्दय कटाक्ष करके कहा- मेरे विचार से तो वह तब बीमार थे, अब स्वस्थ हैं।

जेनी ने चिढकर कहा- नॉनसेंस! इनकी किसी विशेषज्ञ से चिकित्सा करानी होगी। यह जासूसी में बड़े कुशल हैं। इनके सभी अफसर इनसे प्रसन्न हैं। यह चाहें तो अब भी इन्हें वह जगह मिल सकती हैं। अपने विभाग में ऊँचे-से-ऊँचे पद तक पहुँच सकते हैं। मुझे विश्वास हैं कि इनका रोग असाध्य नहीं हैं; हाँ, विचित्र अवश्य हैं। आप क्या इनकी बहन हैं?

वागेश्वरी ने मुसकरा कर कहा- आफ तो गाली दे रही हैं। यह मेरे स्वामी हैं।

जेनी पर जैसे मानो व्रजपात-सा हुआ। उसके मुख पर से नम्रता गया और मन में छिपा हुआ क्रोध जैसे दाँत पीसने लगा। उसकी गरदन की नसें तन गयी, दोनो मुट्ठियाँ बँध गयी। उन्मत्त होकर बोली- बड़ा दगाबाज आदमी हैं। इसने मुझे बड़ा धोखा दिया। मुझसे इसने कहा था, मेरी स्त्री मर गयी हैं। कितना बड़ी घूर्त हैं। यह पागल नही हैं। इसने पागलपन का स्वाँग भरा हैं। मैं अदालत से इसकी सजा कराऊँगी।

क्रोधावेश के कारण वह काँप उठी। फिर रोती हुई बोली- इस दगाबाजी का मैं इसे मजा चखाऊँगी। आह! इसने मेरा घोर अपमान किया हैं ! ऐसा विश्वासघात करनेवाले को जो दंड दिया जाय, वह थोडा हैं! इसने कैसी मीठी-मीठी बाते करके मुझे फाँसा। मैंने ही इसे जगह दिलायी, मेरे ही प्रयत्नों से यह बड़ा आदमी बना। इसके लिए मैने अपना घर छोड़ा, अपना देश छो़ड़ा औऱ इसने मेरे साथ कपट किया।

जेनी सिर पर हाथ रखकर बैठ गयी। फिर तैश में उठी और मनहर के पास जाकर उसको अपनी ओर खीचती हुई बोली- मैं तुम्हे खराब करके छोडूँगी। तूने मुझे समझा क्या हैं…

मनहर इस तरह शान्त भाव से खड़ा रहा, मानो कोई प्रयोजन नही हैं।

फिर वह सिहनी की भाँति मनहर पर टूट पड़ी और उसे जमीन पर गिराकर उसकी छाती पर चढ़ बैठी। वागेश्वरी ने उसका हाथ पकड़कर अलग कर दिया और बोली- तुम ऐसी डायन न होती, तो उनकी यह दशा क्यों होती?

जेनी ने तैश में आकर जेब से पिस्तौल निकाली और वागेश्वरी की तरफ बढ़ी। सहसा मनहर तडपकर उठा, उसके हाथ से भरा हुआ पिस्तौल छीनकर फेक दिया और वागेश्वरी के सामने खड़ा हो गया। फिर ऐसा मुँह बना लिया, मानो कुछ हुआ ही नही।

उसी वक़्त मनहर की माता दोपहरी की नींद सोकर उठीं और जेनी को देखकर वागेश्वरी की ओर प्रश्न की आँखों से ताका।

वागेश्वरी ने उपहास के भाव से कहा- यह आपकी बहु हैं।

बुढिया तिनककर बोली- कैसी मेरी बहू? यह मेरी बहू बनने जोग है बँदरिया? लड़के पर न जाने क्या कर-करा दिया, अब छाती पर मूँग दलने आयी हैं?

जेनी एक क्षण तक खून-भरी आँखों से मनहर की ओर देखती रही । फिर बिजली की भाँति कौधकर उसने आँगन में पड़ा हुआ पिस्तौल उठा लिया और वागेश्वरी पर छोड़ना चाहती थी कि मनहर सामने आ गया। उसके हाथ से पिस्तौल छील लिया और अपनी छाती में गोली मार ली।