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कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला 

Born: 17 March 1962, Karnal
Died: 1 February 2003 (age 40 years), Texas, United States

सर्वविदित है कि कल्पना चावला भारतीय मूल की एक अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री थीं। कल्पना चावला, एक भारतीय अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री और अन्तरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी और अन्तरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं। कल्पना चावला को किसी भी परिचय की आवश्यकता नहीं है। यह एक ऐसा नाम है, जो सिर्फ भारत देश में ही नहीं अपितु पूरी दुनिया पर अपने नाम का डंका बजा चुका है। यह एक ऐसा नाम है, जो हर लड़की के लिए प्रेरणा रही है, जबकि वह अब इस दुनिया में नहीं हैं।

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला पहली भारतीय महिला अंतरिक्ष यात्री थीं। कल्पना चावला के पास हवाई जहाज और ग्लाइडर रेटिंग के साथ ही उड़ान प्रशिक्षक का लाइसेंस, एकल और बहू इंजन भूमि और सीप्लेन के लिए वाणिज्यिक पायलट का लाइसेंस था। इन्हें एरोबैटिक्स और टेलव्हील हवाई जहाज उड़ाने में मजा आता था। 

कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 को हरियाणा के करनाल में हुआ था उनके पिताजी बनारसी लाल चावला एक व्यवसाई थे और माता संयोगिता साधारण गृहणी थीं। उड़ने का शौक रखने वाली कल्पना चावला बचपन से ही बहुत ही साहसी थी। 13 साल की उम्र में उन्होंने उड़ान सीखने की इच्छा व्यक्त की थी। उनका बचपन अन्य लड़कियों से बिल्कुल अलग था। अन्य लड़कियां जिस उम्र में बार्बी डॉल से खेलने और  सजने सवरने का शौख रखती हैं, उस उमर में कल्पना चावला हवाई जहाजों की स्केचिंग और पेंटिंग बनाती थी। 

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला की प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल में हुई थी आगे की शिक्षा व मानिक अभियांत्रिकी में पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ में हुई। उन्हें 1982 में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि मिली। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए 1982 में चली गई और 1984 में वैमानिक अभियांत्रिकी में विज्ञान स्नातक की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की। 1986 में कल्पना चावला दूसरी विज्ञान में स्नातक की उपाधि पाए और 1988 में कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से वैज्ञानिक अभियंत्रिकी में विद्या वाचस्पति की उपाधि पाई। 

कल्पना चावला मार्च 1995 में नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुई और वह 1997 में अपनी पहली उड़ान के लिए चुनी गई थी उनका पहला अंतरिक्ष मिशन 19 नवंबर 1997 को अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान से शुरू हुआ। कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मे महिला थी और अंतरिक्ष में उड़ान भरने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थी प्रथम व्यक्ति राकेश शर्मा थे जिन्होंने 1984 में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थीं।

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

2000 में कल्पना चावला को sts-107 में अपनी दूसरी उड़ान के लिए कर्मचारी के तौर पर चुना गया। अभियान लगातार पीछे सरकता रहा क्योंकि विभिन्न कार्यों के नियोजित समय में टकराव होता रहा और कुछ तकनीकी समस्याएं भी आईं। 16 जनवरी 2003 को कल्पना चावला ने अंततः कोलंबिया पर चढ़कर sts-107 मिशन का आरंभ किया। उनकी जिम्मेदारियों में शामिल थे स्पेस हैब/बल्ले बल्ले/ फीस्टार लघु गुरुत्व प्रयोग, जिसके लिए कर्मचारी दल ने 80 प्रयोग किए। जिसके जरिए पृथ्वी व अंतरिक्ष विज्ञान उन्नत तकनीक विकास व अंतरिक्ष यात्री स्वास्थ्य व सुरक्षा का अध्ययन हुआ।

कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा हो गई सभी तरह के अनुसंधान तथा विचार विमर्श के उपरांत वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल में अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय जिस तरह की भयंकर घटना घटी अब वह इतिहास बन चुकी है नासा तथा विश्व के लिए यह एक दर्दनाक घटना थी 1 फरवरी 2003 को कोलंबिया अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही टूट कर बिखर गया देखते ही देखते अंतरिक्ष यान और उसमें सवार 7 यात्रियों के अवशेष टैक्सास नामक शहर पर बरसने लगे और सफल कहलाया जानेवाला अभियान दर्दनाक सत्य बन गया यह अंतरिक्ष यात्री तो सितारों की दुनिया में विलीन हो गए, लेकिन उनके अनुसंधान का लाभ पूरे विश्व को अवश्य मिला।

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला कहती थी कि मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूं प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूंगी। अंततः 1 फरवरी 2003 को उनकी यह बात सत्य हो गई।

सरोजिनी नायडू || Sarojini Naidu

सरोजिनी नायडू 

जन्म- 13 फ़रवरी, 1879, हैदराबाद; 
मृत्यु- 2 मार्च, 1949, लखनऊ 

नाइटिंगेल ऑफ इंडिया कहीं जाने वाली सरोजिनी नायडू की आज पुण्य तिथि है।

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद, ब्रिटिश भारत के राज्य में हुआ था। वह एक भारतीय राजनीतिक कार्यकर्ता और कवि थीं। सरोजिनी भारत की स्वतंत्रता के बाद संयुक्त प्रांत की पहली राज्यपाल थीं। उन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली और किसी राज्य की राज्यपाल नियुक्त होने वाली पहली भारतीय महिला थीं ।

सरोजिनी नायडू


सरोजिनी आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक बंगाली ब्राह्मण और हैदराबाद के निज़ाम कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जबकि उनकी मां एक कवियत्री थी, जो कि बांग्ला भाषा में लिखती थी। उनके भाई वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय एक क्रांतिकारी थे, और दूसरे भाई हरिंद्रनाथ एक कवि, नाटककार और एक अभिनेता थे। उनके परिवार को हैदराबाद में बहुत सम्मान प्राप्त था।
सरोजिनी नायडू || Sarojini Naidu

सरोजिनी पढ़ने-लिखने में बेहद होशियार थीं। बहुत कम उम्र में ही उन्हें लेखन में गहरी रुचि हो गई थी। सरोजिनी, जब महज 12 साल की हुईं थीं, तभी उन्होंने फ़ारसी में Mahr Muneer नामक नाटक लिखा था। इसके बाद वे आगे की पढ़ाई करने के लिए वह विदेश चली गई थीं।

जब वे भारत लौटी थीं तो भारत में प्लेग की बीमारी फैली हुई थी। इस दौरान, उन्होंने बीमारी से प्रभावित लोगों के साथ लगन से काम किया। 19 साल की उम्र में सरोजिनी नायडू ने पेशे से डॉक्टर डॉ. गोविंदराजुलु नायडू से शादी की थी। साल 1925 में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व संभालने वाली सरोजिनी नायडू पहली महिला थीं।
सरोजिनी नायडू || Sarojini Naidu
सरोजिनी ने नमक सत्याग्रह में भाग लिया था, जो साल 1930 में अंग्रेजों द्वारा लगाए गए नमक कर के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया एक आंदोलन था। सरोजिनी सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व करने वाली प्रमुख हस्तियों में से एक थीं। इस दौरान उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा बार-बार गिरफ़्तारी का सामना करना पड़ा और यहाँ तक कि उन्हें 21 महीने (1 वर्ष 9 महीने) से अधिक समय जेल में भी बिताना पड़ा। उन्हें 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और आजादी के बाद सरोजिनी नायडू को साल 1947 में पहली महिला राज्यपाल नामित किया गया था। वह दो साल तक इस पद पर रहीं थीं।
सरोजिनी नायडू || Sarojini Naidu
एक कवि के रूप में उनके काम ने उनकी कविता के रंग, कल्पना और गीतात्मक गुणवत्ता के कारण उन्हें महात्मा गांधी द्वारा 'भारत की कोकिला' या 'भारत कोकिला' की उपाधि दी। नायडू की कविताओं में बच्चों की कविताएँ और देशभक्ति, रोमांस और त्रासदी सहित अधिक गंभीर विषयों पर लिखी गई कविताएँ शामिल हैं। 1912 में प्रकाशित, 'इन द बाज़ार्स ऑफ़ हैदराबाद' उनकी सबसे लोकप्रिय कविताओं में से एक है।
सरोजिनी नायडू || Sarojini Naidu
2 मार्च, 1949 को लखनऊ के गवर्नमेंट हाउस में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई।

English Translate

Sarojini Naidu

Born- February 13, 1879, Hyderabad;
Death- March 2, 1949, Lucknow

Today is the death anniversary of Sarojini Naidu, known as the Nightingale of India.

Sarojini Naidu was born on February 13, 1879 in Hyderabad, state of British India. She was an Indian political activist and poet. Sarojini was the first Governor of the United Provinces after India's independence. He played an important role in the Indian independence movement against the British Raj. She was the first Indian woman to become the President of the Indian National Congress and to be appointed the Governor of a state.
सरोजिनी नायडू || Sarojini Naidu
Sarojini was the eldest of eight siblings. His father Aghornath Chattopadhyay was a Bengali Brahmin and the principal of Nizam College, Hyderabad, while his mother was a poet who wrote in Bengali. His brother Virendranath Chattopadhyay was a revolutionary, and another brother Harindranath was a poet, playwright and an actor. His family was highly respected in Hyderabad.

Sarojini was very intelligent in reading and writing. He became deeply interested in writing at a very early age. When Sarojini was just 12 years old, she wrote a play called Mahr Muneer in Persian. After this she went abroad to pursue further studies.

When she returned to India, plague was widespread in India. During this time, he worked diligently with those affected by the disease. At the age of 19, Sarojini Naidu married Dr. Govindarajulu Naidu, a doctor by profession. Sarojini Naidu was the first woman to assume leadership as the President of the Congress Party in 1925.
सरोजिनी नायडू || Sarojini Naidu
Sarojini participated in the Salt Satyagraha, a movement launched by Mahatma Gandhi in 1930 against the salt tax imposed by the British. Sarojini was one of the key figures who led the Civil Disobedience Movement and Quit India Movement. During this time he faced repeated arrests by the British authorities and even had to spend more than 21 months (1 year 9 months) in jail. She was appointed President of the Indian National Congress in 1925 and after independence, Sarojini Naidu was named the first woman Governor in 1947. She remained on this post for two years.

Her work as a poet earned her the title 'Nightingale of India' or 'Nightingale of India' by Mahatma Gandhi due to the colour, imagination and lyrical quality of her poetry. Naidu's poetry includes children's poems and poems on more serious subjects, including patriotism, romance and tragedy. Published in 1912, 'In the Bazaars of Hyderabad' is one of his most popular poems.
सरोजिनी नायडू || Sarojini Naidu

He died of a heart attack on March 2, 1949 at Government House, Lucknow.


आनंदीबाई जोशी (31 मार्च 1865-01 फ़रवरी 1887)

आनंदीबाई जोशी

Born: 31 March 1865, Kalyan
Died: 01 February 1887 (age 21 years), Pune

आनंदीबाई जोशी (31 मार्च 1865 - 01 फ़रवरी 1887) पहली भारतीय महिला थी, जिन्होंने डॉक्टरी की डिग्री ली थी। 31 मार्च 1865 में जन्मी आनंदीबाई जोशी उस दौर में विदेश जाकर डॉक्टरी की डिग्री हासिल कीं। जिस समय में महिलाओं की प्रारंभिक शिक्षा ही बहुत मुश्किल थी, उस समय में आनंदीबाई डॉक्टर की पढ़ाई कीं और प्रथम भारतीय महिला डॉक्टर बनीं। उनकी यह उपलब्धि उस समय महिलाओं के लिए एक मिसाल थी।

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

आनंदीबाई जोशी का विवाह 9 साल की उम्र में उनसे करीब 20 साल बड़े गोपालराव से कर दी गई। 14 साल की उम्र में वह मां बन गई और उनकी एकमात्र संतान की मृत्यु 10 दिनों बाद ही जरुरी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण हो गई। इस बात से उन्हें बहुत आघात लगा और तभी उन्होंने प्रण लिया कि वह एक दिन डॉक्टर बनेंगी और जरुरी स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराएंगी। इस कार्य में उनके पति गोपाल राव ने भी उनका भरपूर सहयोग दिया और उनका हौसला बढ़ाया।

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

आनंदीबाई जोशी की 21 वर्षीय जीवन यात्रा

आनंदीबाई जोशी का जन्म पुणे के एक जमींदार परिवार में 31 मार्च 1865 को हुआ। बचपन में उनके माता-पिता ने उनका नाम यमुना रखा था। शादी के बाद ससुराल वाले उन्हें आनंदी बुलाने लगे। ब्रिटिश शासकों ने महाराष्ट्र में जमींदारी प्रथा को खत्म कर दिया था, जिसके बाद आनंदी के परिवार की वित्तीय स्थिति खराब हो गई। ऐसे में उनके पिता ने आनंदी की शादी मात्र 9 साल की उम्र में उनसे उम्र में 20 साल बड़े गोपालराव से कर दी, जिनके पहले पत्नी की मौत हो चुकी थी। 14 वर्ष की आयु में मां बनकर बच्चे को खो देने का दर्द आनंदीबाई ने सहा परंतु इसी घटना के बाद उन्होंने डॉक्टर बनने का दृढ़ निश्चय किया। 

1880 में गोपाल राव ने एक मशहूर अमेरिकी मिशनरी को पत्र लिखकर अमेरिका में चिकित्सा की पढ़ाई करने की पूरी जानकारी एकत्र की। उस वक्त पर उनके पति के अलावा घरवाले और समाज उनके इस निर्णय से सहमत नहीं थे। लोगों ने उन पर अवांछित टिप्पणियां की, उनके घर पर पत्थर और गोबर फेंके। यहां तक ​​कि उस डाकघर पर भी हंगामा किया, जहां गोपालराव काम करते थे, लेकिन वह अपने निर्णय पर दृढ़ता के साथ खड़ी रहीं। आनंदीबाई की जिद और पति के साथ ने उनको लक्ष्य तक पहुंचने में मदद की। 

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

परंतु आनंदीबाई के इस कदम के प्रति हिंदू समाज में बहुत विरोध की भावना थी। वे नहीं चाहतें थे कि उनके देश का कोई व्यक्ति विदेश जाकर पढ़े, कुछ इसाई समाज ने उनका समर्थन किया परंतु उनकी इच्छा इनका धर्म परिवर्तित करवाने की थी। अपने फैसले को लेकर हिंदू समाज में विरोध को देखते हुए आनंदीबाई ने श्रीरामपुर कॉलेज में अपना पक्ष अन्य लोगों के समक्ष रखा। उन्होंने कहा - "मैं अमेरिका जा रही हूं, क्योंकि मैं चिकित्सा की पढ़ाई करना चाहती हूं। स्थानीय और यूरोपीय महिलाएं, पुरुष डॉक्टर से आपात स्थिति में भी इलाज कराने में झिझकती हैं। मेरा विनम्र विचार यही है कि मैं भारत में महिला डॉक्टर की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए, खुद को इस क्षेत्र के योग्य बनाकर उनकी सेवा करूं।"

उन्होनें अपने अमेरिका जाने और मेडिकल की डिग्री प्राप्त करने के संकल्प को लोगो के मध्य खुलकर रखा और लोगो को महिला डॉक्टर की जरुरत के बारे में समझाया। अपने इस संबोधन में उन्होंने यह भी पक्ष रखा कि वे और उनका परिवार भविष्य में कभी भी इसाई धर्म स्वीकार नहीं करेगा और वापस आकर भारत में भी महिलाओं के लिए मेडिकल कॉलेज खोलेंगी। 

उनके इस प्रयास से लोग प्रभावित हुए और देश भर से लोग उनके समर्थन में आगे आये। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने सारे गहने बेच दिए। कुछ लोगों ने आनंदीबाई के इस कदम में उनका साथ देते हुए सहायता के लिए 200 रुपये की मदद की। 1883 में पेंसिल्वेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में आनंदी ने दाखिला लिया। उन्होनें मात्र 18 वर्ष की उम्र में मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया और 11 मार्च 1886 में अपनी शिक्षा पूर्ण कर एम डी (डॉक्टर ऑफ़ मेडिसिन) की उपाधि हासिल की। वह पहली भारतीय महिला थीं, जिसे यह उपाधि मिली। उनकी इस सफलता पर क्वीन विक्टोरिया ने भी उन्हें बधाई दी। 

डिग्री पूरी होने के बाद अपने लक्ष्य अनुसार आनंदीबाई भारत वापस आईं और सर्वप्रथम कोल्हापुर में अपनी सेवाएं दी। वहां उन्होंने अल्बर्ट एडवर्ड हॉस्पिटल में महिला विभाग का काम संभाला। यह भारत में महिलाओं के लिए पहला अवसर था, जब उनके इलाज के लिए कोई महिला चिकित्सक उपलब्ध थी, परंतु यहां उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। डाॅक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान वह टीबी की बीमारी की शिकार हो गईं। 26 फरवरी 1887 में महज 22 साल की उम्र में ट्यूबरकुलोसिस की चपेट में आने के कारण आनंदीबाई का निधन हो गया।

आनंदीबाई के जीवन पर आधारित किताबें 

इनकी मृत्यु के तुरंत बाद अमेरिका के राइटर कैरलाइन वेल्स हेअले डाल ने इनके जीवन पर एक किताब लिखी और इनके जीवन और उपलब्धियों से अन्य लोगों को परिचित करवाया। 

इसके बाद मराठी लेखक डॉ अंजली कीर्तने ने डॉ आनंदिबाई जोशी के जीवन पर रिसर्च की और डॉ  आनंदीबाई जोशी काल अणि कर्तुत्व (डॉ आनंदीबाई जोशी, उनके समय और उपलब्धियां) नामक एक मराठी पुस्तक लिखी।  इस पुस्तक में डॉ आनंदिबाई जोशी की दुर्लभ तस्वीरों को शामिल किया गया। 

English Translate 

Anandibai Joshi

Anandibai Joshi was the first Indian woman to obtain a doctorate degree. Born on March 31, 1865, Anandibai Joshi went abroad to obtain a doctorate degree. At a time when women's primary education was very difficult, Anandibai studied for a doctor and became the first Indian woman doctor. Her achievement was an example for women at that time.

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

Anandibai Joshi was married at the age of 9 to Gopalrao, about 20 years older than her. She became a mother at the age of 14 and her only child died after 10 days due to lack of necessary health facilities. She was very shocked by this and only then she took a vow that she would one day become a doctor and provide necessary health facilities. In this work, her husband Gopal Rao also gave her full support and encouraged her.

Anandibai Joshi's 21 year life journey

Anandibai Joshi was born on 31 March 1865 in a zamindar family in Pune. In childhood, her parents named her Yamuna. After marriage, the in-laws started calling her Anandi. The British rulers had abolished the zamindari system in Maharashtra, after which the financial condition of Anandi's family worsened. In such a situation, her father got Anandi married at the age of 9 only to Gopalrao, 20 years older than her, whose first wife had died. Anandibai suffered the pain of losing her child as a mother at the age of 14, but after this incident, she determined to become a doctor.

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

In 1880, Gopal Rao wrote a letter to a famous American missionary and collected complete information about studying medicine in America. At that time, apart from her husband, the family members and the society did not agree with her decision. People made unwanted comments on him, threw stones and cow dung at his house. There was even a ruckus at the post office where Gopalrao worked, but she stood firm on her decision. Anandibai's persistence and her husband's support helped her reach her goal.

But there was a lot of opposition in the Hindu society towards this step of Anandibai. They did not want any person from their country to study abroad, some Christian community supported them but their wish was to convert them. Seeing the opposition in the Hindu society regarding her decision, Anandibai presented her side in front of others in Shrirampur College. She said - "I am going to America because I want to study medicine. Local and European women are hesitant to seek treatment from male doctors even in emergencies. My humble opinion is that I am happy to see the growing number of female doctors in India. Looking at the needs, make myself fit for this area and serve them."

He openly kept his resolution to go to America and get a medical degree among the people and explained to the people about the need of female doctors. In this address, she also stated that she and her family will never accept Christianity in future and will come back and open a medical college for women in India as well.

People were impressed by his effort and people from all over the country came forward in his support. For this work, he sold all his jewelry. Some people supported Anandibai in this step and helped her with 200 rupees. In 1883, Anandi enrolled in the Women's Medical College of Pennsylvania. He enrolled in the Medical College at the age of just 18 and completed his education on 11 March 1886 and obtained the title of MD (Doctor of Medicine). She was the first Indian woman to receive this title. Queen Victoria also congratulated him on his success.

After completing her degree, Anandibai came back to India according to her goal and first served in Kolhapur. There she took charge of the Women's Department at Albert Edward Hospital. This was the first opportunity for women in India, when a female doctor was available for their treatment, but here their health continued to deteriorate. During the practice of medicine, she became a victim of TB disease. Anandibai died on 26 February 1887 at the age of just 22 due to tuberculosis.

Books based on the life of Anandibai

Soon after his death, American writer Caroline Wells Healey Dahl wrote a book on his life and introduced others to his life and achievements.

After this Marathi writer Dr. Anjali Kirtane researched the life of Dr. Anandibai Joshi and wrote a Marathi book titled Dr. Anandibai Joshi Kaal Ani Kartutva (Dr. Anandibai Joshi, her times and achievements). Rare photographs of Dr. Anandibai Joshi were included in this book.


ऋतु करिधाल श्रीवास्तव || Ritu Karidhal Srivastava

ऋतु करिधाल

ऋतु करिधाल श्रीवास्तव (Ritu Karidhal Srivastava) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ काम करने वाली एक भारतीय वैज्ञानिक हैं। वह भारत के मंगल कक्षीय मिशन, मंगलयान के उप-संचालन निदेशक थीं। उन्हें भारत की "रॉकेट वुमन" के रूप में जाना जाता है। वह लखनऊ में पैदा हुई थी और एक एयरोस्पेस इंजीनियर थी। उन्होंने पहले भी कई अन्य इसरो प्रोजेक्ट्स के लिए काम किया है और इनमें से कुछ के लिए ऑपरेशन डायरेक्टर के रूप में काम किया है।

ऋतु करिधाल श्रीवास्तव || Ritu Karidhal Srivastava

चांद की सतह पर चंद्रयान-3 की लैंडिंग होते ही उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के राजाजीपुरम ई-ब्लॉक में पटाखों की गूंज सुनाई देने लगी। छोटे-छोटे बच्चे ‘चंदा मामा अब दूर नहीं’ गाते हुए रॉकेट वुमेन ऋतु करिधाल के घर के बाहर नाचने लगे। इस बीच ऋतु करिधाल की भाभी विनुशी घर से बाहर निकलीं तो सभी ने उन्हें बधाई दी। उनकी आंखें खुशियों से नम थीं। उन्होंने कहा कि यह एक ऐतिहासिक पल है। मेरे पास तो बोलने के लिए शब्द नहीं हैं।

'रॉकेट वुमन' ऋतु करिधाल श्रीवास्तव कर रही थीं चंद्रयान मिशन-3 को लीड ..

ऋतु करिधाल श्रीवास्तव हैं चंद्रयान मिशन-3 की डायरेक्टर - चन्द्रयान पर पूरे देश की निगाहें लगी हुई थीं। इसमें ‘रॉकेट वुमन’ नाम से चर्चित स्पेस साइंटिस्ट ऋतु करिधाल श्रीवास्तव फ्रंट से लीड कर रही थीं। लखनऊ की ऋतु विज्ञान की दुनिया में भारतीय स्त्रियों की बढ़ती धमक की मिसाल हैं। मंगलयान मिशन में अपनी कुशलता दिखा चुकीं ऋतु ने चन्द्रयान के साथ कामयाबी की एक और ऊंची भरीं। 

प्रारंभिक जीवन और परिवार..

करिधाल का जन्म लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वह एक मध्यम वर्गीय कायस्थ परिवार में पली-बढ़ी, जिसने शिक्षा पर बहुत जोर दिया। उनके दो भाई और दो बहनें हैं। उनके पिता रक्षा सेवाओं में थे। कोचिंग संस्थानों और ट्यूशनों के संसाधनों की अनुपलब्धता और असफलताओं ने उन्हें सफल होने के लिए प्रेरणा दी। वह जानती थी कि उसकी दिलचस्पी अंतरिक्ष विज्ञान में थी। रात के आकाश पर घंटों तक टकटकी लगाए और बाहरी स्थान के बारे में सोचते हुए, वह चंद्रमा के बारे में सोचती थी, जैसे कि वह अपना आकार कैसे बदलता है; सितारों का अध्ययन किया और जानना चाहा कि अंधेरे स्थान के पीछे क्या है। अपनी किशोरावस्था में, उन्होंने किसी भी अंतरिक्ष से संबंधित गतिविधि के बारे में समाचार पत्रों की कटिंग एकत्र करना शुरू कर दिया और इसरो और नासा की गतिविधियों पर नज़र रखनी शुरू कर दी।

ऋतु करिधाल श्रीवास्तव || Ritu Karidhal Srivastava

करिधाल ने लखनऊ विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने ग्रेजुएट एप्टीट्यूड टेस्ट इन इंजीनियरिंग (गेट) परीक्षा उत्तीर्ण की, और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में अपनी स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने के लिए भारतीय विज्ञान संस्थान (आई आई ऐस सी) में प्रवेश लिया।

इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु के इंडियन साइंस इंस्टीट्यूट का रुख किया। जहां अंतरिक्ष विज्ञान में उन्होंने महारथ हासिल की। ऋतु की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें ISRO में नौकरी मिल गई। इस युवा साइंटिस्ट ने इसके बाद कई उपलब्धियां हासिल की और 2007 में उन्हें यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड भी मिला। 

ऋतु करिधाल श्रीवास्तव || Ritu Karidhal Srivastava

काफी कम उम्र में ही उनकी काबिलियत और उपलब्धियों ने उन्हें एक बड़ी साइंटिस्ट बना दिया। इसके बाद देश के तमाम बड़े अंतरिक्ष मिशनों में उनकी अहम भूमिका रही। इसीलिए उन्हें भारत की रॉकेट वुमन भी कहा जाता है। 

Ritu Karidhal

Ritu Karidhal Srivastava is an Indian scientist working with the Indian Space Research Organization (ISRO). She was the Deputy Operations Director of India's Mars Orbiter Mission, Mangalyaan. She is known as the "Rocket Woman" of India. She was born in Lucknow and was an aerospace engineer. He has worked for many other ISRO projects in the past as well and served as the Director of Operations for some of these.

ऋतु करिधाल श्रीवास्तव || Ritu Karidhal Srivastava

As soon as the landing of Chandrayaan-3 on the surface of the moon, the echo of firecrackers was heard in the Rajajipuram E-block of Lucknow, the capital of Uttar Pradesh. Small children started dancing outside the house of Rocket Woman Ritu Karidhal singing 'Chanda mama ab door nahi'. Meanwhile, Ritu Karidhal's sister-in-law Vinushi came out of the house and everyone congratulated her. His eyes were moist with happiness. He said that this is a historic moment. I don't have words to speak.

'Rocket Woman' Ritu Karidhal Srivastava was leading Chandrayaan Mission-3 ..

Ritu Karidhal Srivastava is the director of Chandrayaan Mission-3 - The eyes of the whole country were on Chandrayaan. In this, space scientist Ritu Karidhal Srivastava, known as 'Rocket Woman', was leading from the front. The weather of Lucknow is an example of the growing threat of Indian women in the world of science. Ritu, who has shown her skills in the Mangalyaan mission, achieved another high of success with Chandrayaan.

Early life and family

Karidhal was born in Lucknow, Uttar Pradesh. She grew up in a middle-class Kayastha family that placed great emphasis on education. He has two brothers and two sisters. His father was in the defense services. The unavailability of resources and failures of coaching institutes and tuitions gave him the motivation to succeed. She knew that he was interested in space science. Gazing for hours at the night sky and thinking about outer space, she used to think about the moon, like how it changes its shape; He studied the stars and wanted to know what was behind the dark spot. In his teens, he started collecting newspaper cuttings about any space related activity and started tracking the activities of ISRO and NASA.

Karidhal completed his graduation in Physics from Lucknow University. He cleared the Graduate Aptitude Test in Engineering (GATE) exam, and joined the Indian Institute of Science (IISc) to pursue his master's degree in aerospace engineering.

ऋतु करिधाल श्रीवास्तव || Ritu Karidhal Srivastava

After this he turned to the Indian Science Institute of Bangalore. Where he mastered in space science. Seeing Ritu's talent, she got a job in ISRO. This young scientist achieved many achievements after this and in 2007 he also received the Young Scientist Award.

His ability and achievements at a very young age made him a great scientist. After this, he played an important role in all the big space missions of the country. That is why she is also called the Rocket Woman of India.

अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)

अहिल्याबाई होलकर 


अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
(31 मई 1725 - 13 अगस्त 1795), 
मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध महारानी 
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar) मराठा साम्राज्य की महारानी प्रसिद्ध सूबेदार मल्हार राव होलकर के पुत्र खांडेराव होलकर की धर्मपत्नी थी। इनका जन्म 31 मई 1725 में ग्राम चौड़ी जामखेड़ अहमदनगर महाराष्ट्र में हुआ था। इन्होंने महेश्वर को अपनी राजधानी बना कर शासन किया। इनकी मृत्यु 13 अगस्त 1795 में 70 वर्ष की आयु में हुई थी।
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)

शासन अवधि

अहिल्याबाई होलकर जी ने सन 1767 से 1795 तक 28 वर्षों से अधिक एक छत्र शासन किया। अहिल्याबाई होलकर जी ने सनातन धर्म संस्कृति को बढ़ाते हुए अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भी सारे भारत में अलग अलग जगह कई तीर्थ स्थलों पर मंदिर बनवाये, काशी विश्वनाथ मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की। मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति की, जिससे सारे जगत में सनातन धर्म का प्रचार प्रसार व्याकप रूप से बना रहे एवम सभी की धर्म के प्रति आस्था गहरी होती रहे। इसी क्रम में जनमानस की सेवा का भाव लिए जनमानस जनता के लिए घाट कुआँ बावड़ियों का निर्माण करवाया। जगह जगह पर व्यापक रूप से भूखों के लिए अन्यक्षेत्र खोले, जिससे गरीब निर्धनों को भूखे पेट सोने की आवश्यकता न पड़े। ऐसी थी महारानी अहिल्याबाई होलकर जी। 
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)

महारानी अहिल्याबाई होलकर जी के जीवन का छोटा सा परिचय 

महारानी अहिल्याबाई होलकर जी का जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ था, जो महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में है। महारानी जी का विवाह लगभग 10 वर्ष की आयु में खांडेराव जी से हुआ था, जो कि बहुत ही चंचल एवम उग्र स्वभाव के थे। महारानी अहिल्याबाई होलकर जी सिर्फ 29 वर्ष की थी, जब उनके पति का लोकगमन हुआ। उसके पश्चात बयालीस-तैंतालीस वर्ष की आयु में पुत्र मालेराव का देहान्त हो गया। जब अहिल्याबाई की आयु बासठ वर्ष के लगभग थी, दौहित्र नत्थू चल बसा। चार वर्ष पीछे दामाद यशवन्तराव फणसे न रहे और इनकी पुत्री मुक्ताबाई सती हो गई।
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
दूर के सम्बन्धी तुकोजीराव के पुत्र मल्हारराव पर उनका स्नेह था। महारानी सोचती थीं कि आगे चलकर यही शासन, व्यवस्था , न्याय की डोर सँभालेगा पर वह अन्त-अन्त तक उन्हें दुःख देता रहा। महारानी अहिल्याबाई होलकर आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती थी। महारानी सदैव उसी परंपरा का निर्वहन करती रही, जिसमें उनके समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री थे और उनके पीछे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हुई। महारानी होलकर जी को अपने जीवनकाल में ही भारत भर की जनता इनके कार्यों, इनकी शासन व्यवस्था से इतनी प्रभावित थी कि इन्हें ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी। 

अहिल्याबाई होलकर जी का देश मे विशेष स्थान

अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
भारत में महारानी अहिल्‍याबाई होल्‍कर जी का नाम बहुत ही सम्‍मान के साथ लिया जाता है। महारानी जी के  बारे में अलग अलग राज्‍यों की पाठ्य पुस्‍तकों में अध्‍याय मौजूद हैं। चुकी महारानी अहिल्याबाई होलकर जी एक ऐसी महारानी थी, जो सदैव मानव सेवा, धर्म, सनातन संस्कृति परंपरा का निर्वहन करती थी। इसलिये भारत सरकार तथा विभिन्‍न राज्‍यों की सरकारों ने उनकी प्रतिमाएँ बनवायी हैं और उनके नाम से कई कल्‍याणकारी योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इसी तरह एक योजना उत्तराखंड सरकार की ओर से भी चलाई जा रही है, जो अहिल्‍याबाई होल्‍कर को पूर्णं सम्‍मान देती है। इस योजना का नाम अहिल्‍याबाई होल्‍कर भेड़ बकरी विकास योजना है।
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
अहिल्‍याबाई होल्‍कर भेड़ बकरी पालन योजना के तहत उत्तराखणवड के बेरोजगार, बीपीएल राशनकार्ड धारकों, महिलाओं व आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को बकरी पालन यूनिट के निर्माण के लिये भारी अनुदान राशि प्रदान की जाती है। लगभग 1,00,000 रूपये की इस युनिट के निर्मांण के लिये सरकार की ओर से 91,770 रूपये सरकारी सहायता रूप में अहिल्‍याबाई होलकर के लाभार्थी को प्राप्‍त होते हैं।

श्रोत - विकिपीडिआ 

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

आनंदीबाई जोशी

Born: 31 March 1865, Kalyan
Died: 26 February 1887 (age 21 years), Pune

आनंदीबाई जोशी (31 मार्च 1865-01 फ़रवरी 1887) पहली भारतीय महिला थी, जिन्होंने डॉक्टरी की डिग्री ली थी। 31 मार्च 1865 में जन्मी आनंदीबाई जोशी उस दौर में विदेश जाकर डॉक्टरी की डिग्री हासिल कीं। जिस समय में महिलाओं की प्रारंभिक शिक्षा ही बहुत मुश्किल थी, उस समय में आनंदीबाई डॉक्टर की पढ़ाई कीं और प्रथम भारतीय महिला डॉक्टर बनीं। उनकी यह उपलब्धि उस समय महिलाओं के लिए एक मिसाल थी।

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

आनंदीबाई जोशी का विवाह 9 साल की उम्र में उनसे करीब 20 साल बड़े गोपालराव से कर दी गई। 14 साल की उम्र में वह मां बन गई और उनकी एकमात्र संतान की मृत्यु 10 दिनों बाद ही जरुरी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण हो गई। इस बात से उन्हें बहुत आघात लगा और तभी उन्होंने प्रण लिया कि वह एक दिन डॉक्टर बनेंगी और जरुरी स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराएंगी। इस कार्य में उनके पति गोपाल राव ने भी उनका भरपूर सहयोग दिया और उनका हौसला बढ़ाया।

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

आनंदीबाई जोशी की 21 वर्षीय जीवन यात्रा

आनंदीबाई जोशी का जन्म पुणे के एक जमींदार परिवार में 31 मार्च 1865 को हुआ। बचपन में उनके माता-पिता ने उनका नाम यमुना रखा था। शादी के बाद ससुराल वाले उन्हें आनंदी बुलाने लगे। ब्रिटिश शासकों ने महाराष्ट्र में जमींदारी प्रथा को खत्म कर दिया था, जिसके बाद आनंदी के परिवार की वित्तीय स्थिति खराब हो गई। ऐसे में उनके पिता ने आनंदी की शादी मात्र 9 साल की उम्र में उनसे उम्र में 20 साल बड़े गोपालराव से कर दी, जिनके पहले पत्नी की मौत हो चुकी थी। 14 वर्ष की आयु में मां बनकर बच्चे को खो देने का दर्द आनंदीबाई ने सहा परंतु इसी घटना के बाद उन्होंने डॉक्टर बनने का दृढ़ निश्चय किया। 

1880 में गोपाल राव ने एक मशहूर अमेरिकी मिशनरी को पत्र लिखकर अमेरिका में चिकित्सा की पढ़ाई करने की पूरी जानकारी एकत्र की। उस वक्त पर उनके पति के अलावा घरवाले और समाज उनके इस निर्णय से सहमत नहीं थे। लोगों ने उन पर अवांछित टिप्पणियां की, उनके घर पर पत्थर और गोबर फेंके। यहां तक ​​कि उस डाकघर पर भी हंगामा किया, जहां गोपालराव काम करते थे, लेकिन वह अपने निर्णय पर दृढ़ता के साथ खड़ी रहीं। आनंदीबाई की जिद और पति के साथ ने उनको लक्ष्य तक पहुंचने में मदद की। 

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

परंतु आनंदीबाई के इस कदम के प्रति हिंदू समाज में बहुत विरोध की भावना थी। वे नहीं चाहतें थे कि उनके देश का कोई व्यक्ति विदेश जाकर पढ़े, कुछ इसाई समाज ने उनका समर्थन किया परंतु उनकी इच्छा इनका धर्म परिवर्तित करवाने की थी। अपने फैसले को लेकर हिंदू समाज में विरोध को देखते हुए आनंदीबाई ने श्रीरामपुर कॉलेज में अपना पक्ष अन्य लोगों के समक्ष रखा। उन्होंने कहा - "मैं अमेरिका जा रही हूं, क्योंकि मैं चिकित्सा की पढ़ाई करना चाहती हूं। स्थानीय और यूरोपीय महिलाएं, पुरुष डॉक्टर से आपात स्थिति में भी इलाज कराने में झिझकती हैं। मेरा विनम्र विचार यही है कि मैं भारत में महिला डॉक्टर की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए, खुद को इस क्षेत्र के योग्य बनाकर उनकी सेवा करूं।"

उन्होनें अपने अमेरिका जाने और मेडिकल की डिग्री प्राप्त करने के संकल्प को लोगो के मध्य खुलकर रखा और लोगो को महिला डॉक्टर की जरुरत के बारे में समझाया। अपने इस संबोधन में उन्होंने यह भी पक्ष रखा कि वे और उनका परिवार भविष्य में कभी भी इसाई धर्म स्वीकार नहीं करेगा और वापस आकर भारत में भी महिलाओं के लिए मेडिकल कॉलेज खोलेंगी। 

उनके इस प्रयास से लोग प्रभावित हुए और देश भर से लोग उनके समर्थन में आगे आये। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने सारे गहने बेच दिए। कुछ लोगों ने आनंदीबाई के इस कदम में उनका साथ देते हुए सहायता के लिए 200 रुपये की मदद की। 1883 में पेंसिल्वेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में आनंदी ने दाखिला लिया। उन्होनें मात्र 18 वर्ष की उम्र में मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया और 11 मार्च 1886 में अपनी शिक्षा पूर्ण कर एम डी (डॉक्टर ऑफ़ मेडिसिन) की उपाधि हासिल की। वह पहली भारतीय महिला थीं, जिसे यह उपाधि मिली। उनकी इस सफलता पर क्वीन विक्टोरिया ने भी उन्हें बधाई दी। 

डिग्री पूरी होने के बाद अपने लक्ष्य अनुसार आनंदीबाई भारत वापस आईं और सर्वप्रथम कोल्हापुर में अपनी सेवाएं दी। वहां उन्होंने अल्बर्ट एडवर्ड हॉस्पिटल में महिला विभाग का काम संभाला। यह भारत में महिलाओं के लिए पहला अवसर था, जब उनके इलाज के लिए कोई महिला चिकित्सक उपलब्ध थी, परंतु यहां उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। डाॅक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान वह टीबी की बीमारी की शिकार हो गईं। 26 फरवरी 1887 में महज 22 साल की उम्र में ट्यूबरकुलोसिस की चपेट में आने के कारण आनंदीबाई का निधन हो गया।

आनंदीबाई के जीवन पर आधारित किताबें 

इनकी मृत्यु के तुरंत बाद अमेरिका के राइटर कैरलाइन वेल्स हेअले डाल ने इनके जीवन पर एक किताब लिखी और इनके जीवन और उपलब्धियों से अन्य लोगों को परिचित करवाया। 

इसके बाद मराठी लेखक डॉ अंजली कीर्तने ने डॉ आनंदिबाई जोशी के जीवन पर रिसर्च की और डॉ  आनंदीबाई जोशी काल अणि कर्तुत्व (डॉ आनंदीबाई जोशी, उनके समय और उपलब्धियां) नामक एक मराठी पुस्तक लिखी।  इस पुस्तक में डॉ आनंदिबाई जोशी की दुर्लभ तस्वीरों को शामिल किया गया। 

English Translate 

Anandibai Joshi

Anandibai Joshi was the first Indian woman to obtain a doctorate degree. Born on March 31, 1865, Anandibai Joshi went abroad to obtain a doctorate degree. At a time when women's primary education was very difficult, Anandibai studied for a doctor and became the first Indian woman doctor. Her achievement was an example for women at that time.

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

Anandibai Joshi was married at the age of 9 to Gopalrao, about 20 years older than her. She became a mother at the age of 14 and her only child died after 10 days due to lack of necessary health facilities. She was very shocked by this and only then she took a vow that she would one day become a doctor and provide necessary health facilities. In this work, her husband Gopal Rao also gave her full support and encouraged her.

Anandibai Joshi's 21 year life journey

Anandibai Joshi was born on 31 March 1865 in a zamindar family in Pune. In childhood, her parents named her Yamuna. After marriage, the in-laws started calling her Anandi. The British rulers had abolished the zamindari system in Maharashtra, after which the financial condition of Anandi's family worsened. In such a situation, her father got Anandi married at the age of 9 only to Gopalrao, 20 years older than her, whose first wife had died. Anandibai suffered the pain of losing her child as a mother at the age of 14, but after this incident, she determined to become a doctor.

आनंदीबाई जोशी || Anandibai Joshi ||

In 1880, Gopal Rao wrote a letter to a famous American missionary and collected complete information about studying medicine in America. At that time, apart from her husband, the family members and the society did not agree with her decision. People made unwanted comments on him, threw stones and cow dung at his house. There was even a ruckus at the post office where Gopalrao worked, but she stood firm on her decision. Anandibai's persistence and her husband's support helped her reach her goal.

But there was a lot of opposition in the Hindu society towards this step of Anandibai. They did not want any person from their country to study abroad, some Christian community supported them but their wish was to convert them. Seeing the opposition in the Hindu society regarding her decision, Anandibai presented her side in front of others in Shrirampur College. She said - "I am going to America because I want to study medicine. Local and European women are hesitant to seek treatment from male doctors even in emergencies. My humble opinion is that I am happy to see the growing number of female doctors in India. Looking at the needs, make myself fit for this area and serve them."

He openly kept his resolution to go to America and get a medical degree among the people and explained to the people about the need of female doctors. In this address, she also stated that she and her family will never accept Christianity in future and will come back and open a medical college for women in India as well.

People were impressed by his effort and people from all over the country came forward in his support. For this work, he sold all his jewelry. Some people supported Anandibai in this step and helped her with 200 rupees. In 1883, Anandi enrolled in the Women's Medical College of Pennsylvania. He enrolled in the Medical College at the age of just 18 and completed his education on 11 March 1886 and obtained the title of MD (Doctor of Medicine). She was the first Indian woman to receive this title. Queen Victoria also congratulated him on his success.

After completing her degree, Anandibai came back to India according to her goal and first served in Kolhapur. There she took charge of the Women's Department at Albert Edward Hospital. This was the first opportunity for women in India, when a female doctor was available for their treatment, but here their health continued to deteriorate. During the practice of medicine, she became a victim of TB disease. Anandibai died on 26 February 1887 at the age of just 22 due to tuberculosis.

Books based on the life of Anandibai

Soon after his death, American writer Caroline Wells Healey Dahl wrote a book on his life and introduced others to his life and achievements.

After this Marathi writer Dr. Anjali Kirtane researched the life of Dr. Anandibai Joshi and wrote a Marathi book titled Dr. Anandibai Joshi Kaal Ani Kartutva (Dr. Anandibai Joshi, her times and achievements). Rare photographs of Dr. Anandibai Joshi were included in this book.

महादेवी वर्मा || Mahadevi Verma ||

महादेवी वर्मा

देखने में जितनी ही सादा सरल व्यक्तित्व, उतनी ही उच्च प्रतिभा। महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma), यह नाम किसी भी परिचय का मोहताज नहीं। छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हिंदी भाषा की महान कवयित्री, महादेवी वर्मा जिन्हें हिंदी की सबसे सशक्त कवयित्रीयों में से एक होने के गौरव प्राप्त है। आधुनिक हिंदी की सबसे सशक्त कवयित्री होने के कारण उन्हें "आधुनिक मीराबाई" के नाम से भी जाना जाता है।

महादेवी वर्मा || Mahadevi Verma ||
महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1906 को फर्रुखाबाद में हुआ था। 80 साल की उम्र में उनकी मृत्यु 11 सितंबर 1987 में प्रयागराज में हुई। महादेवी वर्मा जी का जन्म उस समय हुआ था जब भारत गुलामी के दौर से गुजर रहा था और महादेवी वर्मा एक ऐसी कवयित्री थीं, जिन्होंने भारत की गुलामी और आजदी दोनों ही देखी, जिसकी छाप उनके साहित्य में नजर आती है। ना केवल उनका काव्य अपितु उनके समाज सुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना से ओतप्रोत रचनाएं भी महादेवी वर्मा ने लिखे हैं।

महादेवी वर्मा का जीवन परिचय

महादेवी वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में 26 मार्च 1906 को हुआ था। उनके परिवार में लगभग 200 वर्षों या 7 पीढ़ियों के बाद पुत्री का जन्म हुआ था। इस कारण जब यह पैदा हुईं तब इनके बाबा बांके बिहारी जी खुशी से झूम उठे और इन्हें घर की देवी मानते हुए इनका नाम महादेवी रख दिया। 

महादेवी वर्मा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मिशन स्कूल इंदौर से की और उन्होंने चित्रकला, संस्कृत और अंग्रेजी की पढ़ाई घर पर अध्यापकों द्वारा पूरी की। 1916 में उनके बाबा श्री बांके बिहारी जी ने इनका विवाह बरेली के नवाबगंज कस्बे के एक निवासी श्री स्वरूप नारायण वर्मा से कर दी। विवाह के कारण इनकी शिक्षा कुछ दिन तक स्थगित रही, परंतु विवाह उपरांत महादेवी जी ने 1919 में क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद में प्रवेश लिया और कॉलेज के छात्रावास में रहने लगीं। वह पढ़ाई में बहुत ही तेज थी, इसीलिए उन्होंने 1921 में आठवीं कक्षा में प्रांत भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया था और यहीं से उनके काव्य जीवन की शुरुआत भी हुई। 

7 वर्ष की अवस्था में ही इन्होंने कविता लिखना प्रारंभ कर दिया था। 1925 में जब तक उन्होंने हाईस्कूल पास की तब तक वह बहुत ही सफल कवयित्री के रूप में प्रसिद्ध हो चुकी थीं। 1932 में इन्होंने प्रयागराज विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर किया और इनकी दो कविता संग्रह रश्मि और विहार इस समय तक प्रकाशित हो चुकी थीं। 
महादेवी वर्मा || Mahadevi Verma ||

वैवाहिक जीवन

सन् 1916 में उनके बाबा श्री बाँके विहारी ने इनका विवाह बरेली के पास नबाव गंज कस्बे के निवासी श्री स्वरूप नारायण वर्मा से कर दिया, जो उस समय दसवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। श्री वर्मा इण्टर करके लखनऊ मेडिकल कॉलेज में बोर्डिंग हाउस में रहने लगे। महादेवी जी उस समय क्रास्थवेट कॉलेज इलाहाबाद के छात्रावास में थीं। श्रीमती महादेवी वर्मा को विवाहित जीवन से विरक्ति थी। कारण कुछ भी रहा हो पर श्री स्वरूप नारायण वर्मा से कोई वैमनस्य नहीं था। सामान्य स्त्री-पुरुष के रूप में उनके सम्बन्ध मधुर ही रहे। दोनों में कभी-कभी पत्राचार भी होता था। यदा-कदा श्री वर्मा इलाहाबाद में उनसे मिलने भी आते थे। श्री वर्मा ने महादेवी जी के कहने पर भी दूसरा विवाह नहीं किया। महादेवी जी का जीवन तो एक संन्यासिनी का जीवन था। उन्होंने जीवन भर श्वेत वस्त्र पहना, तख्त पर सोईं और कभी शीशा नहीं देखा। सन् 1966 में पति की मृत्यु के बाद वे स्थायी रूप से इलाहाबाद में रहने लगीं। 

उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद नगर में बिताया। 11 सितम्बर 1987 को इलाहाबाद में रात 9 बजकर 30 मिनट पर उनका देहांत हो गया।

महादेवी वर्मा को मिली प्रमुख पुरस्कार और सम्मान

  1. महादेवी वर्मा को 1943 में मंगलाप्रसाद पारितोषिक भारत भारती के लिए मिला।
  2. महादेवी वर्मा को 1952 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लिए मनोनीत भी किया गया।
  3. 1956 में भारत सरकार ने साहित्य की सेवा के लिए इन्हें पद्म भूषण भी दिया।
  4. महादेवी वर्मा को मरणोपरांत 1988 में पद्म विभूषण पुरस्कार दिया गया।
  5. महादेवी वर्मा को 1969 में विक्रम विश्वविद्यालय, 1977 में कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल, 1980 में दिल्ली विश्वविद्यालय तथा 1984 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने इनको डी.लिट (डॉक्टर ऑफ लेटर्स) की उपाधि दी।
  6. महादेवी जी को 1934 में नीरजा के लिए सक्सेरिया पुरस्कार दिया गया।
  7. 1942 में स्मृति की रेखाएं के लिए द्विवेदी पदक दिया गया।
  8. यामा के लिए महादेवी वर्मा को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।
EnglishTranslate 

mahadevi Verma

The simpler the personality, the higher the talent. Mahadevi Verma, this name does not need any introduction. Mahadevi Verma, one of the four major pillars of the Chhayavadi era, the great poetess of Hindi language, who has the distinction of being one of the most powerful poetesses of Hindi. Being the most powerful poetess of modern Hindi, she is also known as "modern Mirabai".
  महादेवी वर्मा || Mahadevi Verma ||
Mahadevi Verma was born on 26 March 1906 in Farrukhabad. He died at the age of 80 on 11 September 1987 in Prayagraj. Mahadevi Verma ji was born at a time when India was going through a period of slavery and Mahadevi Verma was such a poetess who saw both India's slavery and freedom, whose impression is visible in her literature. Mahadevi Verma has written not only his poetry but also his works of social reform and compositions full of consciousness towards women.

Biography of Mahadevi Verma

Mahadevi Verma was born on 26 March 1906 in Farrukhabad, Uttar Pradesh. A daughter was born in their family after about 200 years or 7 generations. Because of this, when she was born, her Baba Banke Bihari ji was overjoyed and considering her as the goddess of the house, named her Mahadevi.

Mahadevi Verma did her early education from the Mission School, Indore and completed her painting, Sanskrit and English studies at home from teachers. In 1916, her Baba Shri Banke Bihari ji got her married to Shri Swaroop Narayan Verma, a resident of Nawabganj town of Bareilly. Due to marriage, her education was postponed for a few days, but after marriage, Mahadevi ji took admission in Crosthwaite College, Allahabad in 1919 and started living in the hostel of the college. She was very bright in studies, that's why in 1921, she got the first position in the eighth grade across the province and from here her poetic life also started.
महादेवी वर्मा || Mahadevi Verma ||
At the age of 7, he started writing poetry. By the time she graduated high school in 1925, she had become a very successful poet. In 1932, he did his post graduation from Prayagraj University and his two poetry collections Rashmi and Vihar had been published by this time.

married life

In 1916, her father Mr. Banke Vihari got her married to Mr. Swaroop Narayan Verma, a resident of Nabavganj town near Bareilly, who was then a student of class X. Mr. Verma started living in the boarding house in Lucknow Medical College after entering. Mahadevi ji was at that time in the hostel of Crasthwaite College, Allahabad. Mrs. Mahadevi Verma was disenchanted with married life. Whatever may have been the reason, but there was no enmity with Shri Swaroop Narayan Verma. As a normal man and woman, their relationship remained sweet. Sometimes there was also correspondence between the two. Occasionally Mr. Verma used to come to meet him in Allahabad. Mr. Verma did not remarry even on the advice of Mahadevi ji. Mahadevi ji's life was the life of a sannyasini. He wore white clothes throughout his life, slept on a cot and never saw a mirror. After the death of her husband in 1966, she started living permanently in Allahabad.

He spent most of his life in Allahabad city of Uttar Pradesh. He died on September 11, 1987 in Allahabad at 9.30 pm.
महादेवी वर्मा || Mahadevi Verma ||

Mahadevi Verma received major awards and honors

  1. Mahadevi Varma received the Mangalaprasad Award in 1943 for Bharat Bharati.
  2. Mahadevi Verma was also nominated to the Uttar Pradesh Legislative Council in 1952.
  3. In 1956, the Government of India also gave him the Padma Bhushan for his service to literature.
  4. Mahadevi Verma was posthumously awarded the Padma Vibhushan in 1988.
  5. Vikram University in 1969, Kumaun University, Nainital in 1977, Delhi University in 1980 and Banaras Hindu University, Varanasi in 1984 conferred D.Lit (Doctor of Letters) on Mahadevi Verma.
  6. Mahadevi ji was given the Sakseria Award in 1934 for Neerja.
  7. In 1942, the Dwivedi Medal was given for the lines of memory.
  8. Jnanpith Award was given to Mahadevi Verma for Yama.

कल्पना चावला || Kalpana Chawla

कल्पना चावला

सर्वविदित है कि कल्पना चावला भारतीय मूल की एक अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री थीं। कल्पना चावला को किसी भी परिचय की आवश्यकता नहीं है। यह एक ऐसा नाम है, जो सिर्फ भारत देश में ही नहीं अपितु पूरी दुनिया पर अपने नाम का डंका बजा चुका है। यह एक ऐसा नाम है जो हर लड़की के लिए प्रेरणा रही है, जबकि वह अब इस दुनिया में नहीं हैं।

कल्पना चावला

कल्पना चावला पहली भारतीय महिला अंतरिक्ष यात्री थीं। कल्पना चावला के पास हवाई जहाज और ग्लाइडर रेटिंग के साथ ही उड़ान प्रशिक्षक का लाइसेंस, एकल और बहू इंजन भूमि और सीप्लेन के लिए वाणिज्यिक पायलट का लाइसेंस था। इन्हें एरोबैटिक्स और टेलव्हील हवाई जहाज उड़ाने में मजा आता था। 

कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 को हरियाणा के करनाल में हुआ था उनके पिताजी बनारसी लाल चावला एक व्यवसाई थे और माता संयोगिता साधारण गृहणी थीं। उड़ने का शौक रखने वाली कल्पना चावला बचपन से ही बहुत ही साहसी थी। 13 साल की उम्र में उन्होंने उड़ान सीखने की इच्छा व्यक्त की थी। उनका बचपन अन्य लड़कियों से बिल्कुल अलग था। अन्य लड़कियां जिस उम्र में बार्बी डॉल से खेलने और  सजने सवरने का शौख रखती हैं, उस उमर में कल्पना चावला हवाई जहाजों की स्केचिंग और पेंटिंग बनाती थी। 

कल्पना चावला की प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल में हुई थी आगे की शिक्षा व मानिक अभियांत्रिकी में पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ में हुई। उन्हें 1982 में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि मिली। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए 1982 में चली गई और 1984 में वैमानिक अभियांत्रिकी में विज्ञान स्नातक की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की। 1986 में कल्पना चावला दूसरी विज्ञान में स्नातक की उपाधि पाए और 1988 में कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से वैज्ञानिक अभियंत्रिकी में विद्या वाचस्पति की उपाधि पाई। 

कल्पना चावला मार्च 1995 में नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुई और वह 1997 में अपनी पहली उड़ान के लिए चुनी गई थी उनका पहला अंतरिक्ष मिशन 19 नवंबर 1997 को अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान से शुरू हुआ। कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मे महिला थी और अंतरिक्ष में उड़ान भरने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थी प्रथम व्यक्ति राकेश शर्मा थे जिन्होंने 1984 में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थीं।

2000 में कल्पना चावला को sts-107 में अपनी दूसरी उड़ान के लिए कर्मचारी के तौर पर चुना गया। अभियान लगातार पीछे सरकता रहा क्योंकि विभिन्न कार्यों के नियोजित समय में टकराव होता रहा और कुछ तकनीकी समस्याएं भी आईं। 16 जनवरी 2003 को कल्पना चावला ने अंततः कोलंबिया पर चढ़कर sts-107 मिशन का आरंभ किया। उनकी जिम्मेदारियों में शामिल थे स्पेस हैब/बल्ले बल्ले/ फीस्टार लघु गुरुत्व प्रयोग, जिसके लिए कर्मचारी दल ने 80 प्रयोग किए। जिसके जरिए पृथ्वी व अंतरिक्ष विज्ञान उन्नत तकनीक विकास व अंतरिक्ष यात्री स्वास्थ्य व सुरक्षा का अध्ययन हुआ।

कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा हो गई सभी तरह के अनुसंधान तथा विचार विमर्श के उपरांत वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल में अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय जिस तरह की भयंकर घटना घटी अब वह इतिहास बन चुकी है नासा तथा विश्व के लिए यह एक दर्दनाक घटना थी 1 फरवरी 2003 को कोलंबिया अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते ही टूट कर बिखर गया देखते ही देखते अंतरिक्ष यान और उसमें सवार 7 यात्रियों के अवशेष टैक्सास नामक शहर पर बरसने लगे और सफल कहलाया जानेवाला अभियान दर्दनाक सत्य बन गया यह अंतरिक्ष यात्री तो सितारों की दुनिया में विलीन हो गए, लेकिन उनके अनुसंधान का लाभ पूरे विश्व को अवश्य मिला।

कल्पना चावला कहती थी कि मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूं प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूंगी। अंततः 1 फरवरी 2003 को उनकी यह बात सत्य हो गई।

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897)

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव में हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था।

सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई का विवाह बहुत ही छोटी उम्र में महज नौ साल पर वर्ष 1940 में ज्योतिराव फुले से हो गया। शादी के बाद वह जल्द ही अपने पति के साथ पुणे आ गईं। विवाह के समय वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं। लेकिन पढ़ाई में उनका मन बहुत लगता था। उनके पढ़ने और सीखने की लगन से प्रभावित होकर उनके पति ने उन्हें आगे पढ़ना और लिखना सिखाया। सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षक बनने का प्रशिक्षण लिया और एक योग्य शिक्षिका बनीं।

इन्हें भारत में पहली नारीवादी, एक अग्रणी शिक्षिका और एक जाति-विरोधी भेदभाव कार्यकर्ता के रूप में गिना जाता है। ये भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवियत्री थीं। इन्होंने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्री अधिकारों एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है। 1852 में उन्होंने बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की।
सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897)

सावित्रीबाई फुले  ने अपना जीवन एक लक्ष्य महिलाओं के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया था। इस राह में उन्हें बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जब वे स्कूल जाती थीं, तो विरोधी लोग उनपर पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। आज से 191 साल पहले बालिकाओं के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था, तब उन्होंने खुद पढाई की और अन्य महिलाओं को भी शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। 

सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फेंका करते थे। सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं।

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897)

सावित्रीबाई ने 19वीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया। उनकी जिंदगी से जुडी एक घटना ये भी थी कि उन्होंने आत्महत्या करने जाती हुई एक महिला काशीबाई की अपने घर में डिलीवरी करवा कर उसके बच्चे यशवंत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया। दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर उन्होंने उसे डॉक्टर बनाया।

इन्हीं सब सेवा कार्य में रमी 10 मार्च 1897 को एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण इनको भी छूत लग गया और इसी कारण से उनका निधन हो गया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीजों की सेवा करती थीं। 


कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

- बलिदान दिवस 21 फरवरी, 1826

उत्तर भारत में जो स्थान स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का है, कर्नाटक में वही स्थान कित्तूर की रानी चेन्नम्मा का है। चेन्नम्मा ने लक्ष्मीबाई से पहले ही अंग्रेज़ों की सत्ता को सशस्त्र चुनौती दी थी और अंग्रेज़ों की सेना को उनके सामने दो बार मुँह की खानी पड़ी थी।

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

चेन्नम्मा का अर्थ होता है सुंदर कन्या। इस सुंदर बालिका का जन्म 1778 ई. में दक्षिण के काकातीय राजवंश में हुआ था। पिता धूलप्पा और माता पद्मावती ने उसका पालन-पोषण राजकुल के पुत्रों की भाँति किया। उसे संस्कृत भाषा, कन्नड़ भाषा, मराठी भाषा और उर्दू भाषा के साथ-साथ घुड़सवारी, अस्त्र शस्त्र चलाने और युद्ध-कला की भी शिक्षा दी गई।

चेन्नमा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज के साथ हुआ। कित्तूर उन दिनों मैसूर के उत्तर में एक छोटा स्वतंत्र राज्य था। परन्तु यह बड़ा संपन्न था। यहाँ हीरे-जवाहरात के बाज़ार लगा करते थे और दूर-दूर के व्यापारी आया करते थे। चेन्नम्मा ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर उसकी जल्दी मृत्यु हो गई। कुछ दिन बाद राजा मल्लसर्ज भी चल बसे। तब उनकी बड़ी रानी रुद्रम्मा का पुत्र शिवलिंग रुद्रसर्ज गद्दी पर बैठा और चेन्नम्मा के सहयोग से राजकाज चलाने लगा। शिवलिंग के भी कोई संतान नहीं थी। इसलिए उसने अपने एक संबंधी गुरुलिंग को गोद लिया और वसीयत लिख दी कि राज्य का काम चेन्नम्मा देखेगी। शिवलिंग रुद्रसर्ज की भी जल्दी मृत्यु हो गई।

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

कित्तूर पर हमला

अंग्रेज़ों की नजर इस छोटे परन्तु संपन्न राज्य कित्तूर पर बहुत दिन से लगी थी। अवसर मिलते ही उन्होंने गोद लिए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और वे राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे। आधा राज्य देने का लालच देकर उन्होंने राज्य के कुछ देशद्रोहियों को भी अपनी ओर मिला लिया। पर रानी चेन्नम्मा ने स्पष्ट उत्तर दिया कि उत्तराधिकारी का मामला हमारा अपना मामला है, अंग्रेज़ों का इससे कोई लेना-देना नहीं। साथ ही उसने अपनी जनता से कहा कि जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूँद है, कित्तूर को कोई नहीं ले सकता।

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

रानी का उत्तर पाकर धारवाड़ के कलेक्टर थैकरे ने 500 सिपाहियों के साथ कित्तूर का किला घेर लिया। 23 सितंबर, 1824 का दिन था। किले के फाटक बंद थे। थैकरे ने दस मिनट के अंदर आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी। इतने में अकस्मात क़िले के फाटक खुले और दो हज़ार देशभक्तों की अपनी सेना के साथ रानी चेन्नम्मा मर्दाने वेश में अंग्रेज़ों की सेना पर टूट पड़ी। थैकरे भाग गया। दो देशद्रोही को रानी चेन्नम्मा ने तलवार के घाट उतार दिया। अंग्रेजों ने मद्रास और मुंबई से कुमुक मंगा कर 3 दिसंबर, 1824 को फिर कित्तूर का किला घेर डाला। परन्तु उन्हें कित्तूर के देशभक्तों के सामने फिर पीछे हटना पड़ा। दो दिन बाद वे फिर शक्तिसंचय करके आ धमके। छोटे से राज्य के लोग काफ़ी बलिदान कर चुके थे।

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

चेन्नम्मा के नेतृत्व में उन्होंने विदेशियों का फिर सामना किया, पर इस बार वे टिक नहीं सके। रानी चेन्नम्मा को अंग्रेज़ों ने बंदी बनाकर जेल में डाल दिया। उनके अनेक सहयोगियों को फाँसी दे दी। कित्तूर की मनमानी लूट हुई।

21 फरवरी, 1829 ई. को जेल के अंदर ही इस वीरांगना रानी चेन्नम्मा का देहांत हो गया। 

English Translate

Rani Chennamma (Kittur)

- Sacrifice Day February 21, 1826

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

The place in North India which belongs to Rani Lakshmibai of Jhansi in the context of freedom struggle, in Karnataka the same place belongs to Rani Chennamma of Kittur. Chennamma had challenged the British authority even before Lakshmibai and the British army had to face her twice.

Chennamma means beautiful girl. This beautiful girl was born in 1778 AD in the Kakatiya dynasty of the South. Father Dhulappa and mother Padmavati raised him like the sons of Rajkul. He was taught Sanskrit language, Kannada language, Marathi language and Urdu language as well as horse riding, weapon handling and martial arts.

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

Chennama was married to King Mallasarja of Kittur. Kittur was a small independent kingdom to the north of Mysore in those days. But it was very rich. Here diamond and jewels markets used to be set up and merchants from far and wide used to come. Chennamma gave birth to a son, but he died early. After a few days, King Mallasarj also passed away. Then his elder queen Rudramma's son Shivalinga Rudrasarja sat on the throne and started running the kingdom with the help of Chennamma. Shivling also did not have any children. So he adopted one of his relatives Gurulinga and wrote a will that Chennamma would look after the affairs of the kingdom. Shivling Rudrasarj also died early.

attack on kittur

The eyes of the British were on this small but prosperous state of Kittur for a long time. As soon as he got the opportunity, he refused to accept the adopted son as heir and started planning to annex the state. By giving the lure of giving half the state, he also got some of the traitors of the state in his side. But Rani Chennamma categorically replied that the matter of successor is our own matter, the British have nothing to do with it. At the same time, he told his people that as long as there is a drop of blood in your queen's veins, no one can take Kittur.

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

After receiving the reply of the queen, Thakre, the collector of Dharwad, surrounded the fort of Kittur with 500 soldiers. September 23, 1824 was the day. The gates of the fort were closed. Thakre warned to surrender within ten minutes. Suddenly, the gates of the fort opened and Rani Chennamma with her army of two thousand patriots, in a manly garb, broke down on the British army. Thacker fled. Two traitors were killed by the sword by Rani Chennamma. The British again besieged the fort of Kittur on December 3, 1824, by importing kumuk from Madras and Mumbai. But he had to retreat again in front of the patriots of Kittur. After two days, he came again after accumulating power. The people of the small kingdom had sacrificed a lot.

Under the leadership of Chennamma, he again faced the foreigners, but this time he could not survive. Rani Chennamma was imprisoned by the British and imprisoned. Many of his associates were hanged. Kittur was looted arbitrarily.

कित्तूर की रानी चेन्नमा/Rani Chennamma (Kittur)

On February 21, 1829 AD, this heroic queen Rani Chennamma died inside the jail.