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करी पत्ते का पानी पीने से सेहत पर असर

करी पत्ते का पानी पीने से सेहत पर पड़ता है कैसा असर

करी पत्ते चबाने के लिए ही काम नहीं आता बल्कि इसका पानी बनाकर भी पिया जा सकता है। आज चर्चा करते हैं सेहत पर करी पत्ते का पानी कैसा प्रभाव डालता है। 

करी पत्ते का पानी पीने से सेहत पर पड़ता है कैसा असर

कैसे बनाकर पिया जाता है करी पत्ते का पानी?

करी पत्ते का पानी बनाने के लिए मुट्ठीभर करी पत्ते लेकर एक गिलास पानी में उबाल लें। इस पानी को हल्का गर्म करके डिटॉक्स वॉटर की तरह पिएं या फिर कप में निकालकर गर्म चाय (Herbal Tea) की तरह इसकी चुस्कियां लें। 

करी पत्ते के पानी के फायदे 

पाचन के लिए बेहतर 

आयुर्वेद में करी पत्ते को पाचन के लिए बेहतर बताया गया है। इसमें कुछ लैक्सेटिव भी पाए जाते हैं जो पेट के लिए अच्छे हैं। खासकर दस्त, गैस और कब्ज (Constipation) के लिए यह पानी बेहद अच्छा है। 

डिटॉक्स के लिए 

शरीर को डिटॉक्स करने के लिए करी पत्ते का पानी पिया जा सकता है। एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरपूर होने के चलते यह शरीर को इंफेक्शन और त्वचा को स्किन सेल्स डैमेज करने वाले फ्री रेडिकल्स से भी बचाता है। 

वजन घटाने के लिए 

करी पत्ते का पानी शरीर से बुरे कॉलेस्ट्रोल को कम करता है, जिससे वजन घटाने में भी मदद मिलती है। करी पत्ते का पानी पीने के अलावा ताजे करी पत्ते सलाद में डालकर भी खा सकते हैं। इसके अलावा थोड़ी बहुत एक्सरसाइज के साथ करी पत्ते का पानी पीना शरीर से एक्स्ट्रा फैट को घटाता है। 

कड़ी पत्ता के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

स्ट्रेस कम करने के लिए 

करी पत्ते के पानी का असर तनाव को कम करने में भी दिखता है। यह पानी नर्व्स को शांत करता है, जिससे स्ट्रेस कंट्रोल होता है। अगर कोई व्यक्ति, जो हर बात पर ही टेंशन लेने लगते हैं तो करी पत्ते के पानी को हर्बल टी की तरह पी सकते हैं। 

कड़ी पत्ता के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

वे मुस्काते फूल, नहीं -महादेवी वर्मा

वे मुस्काते फूल, नहीं

Rupa Oos ki ek Boond
जीतने वाला ही नहीं बल्कि कहां पर हारना है, 
ये जानने वाला भी महान होता है..❤

वे मुस्काते फूल, नहीं

जिनको आता है मुर्झाना,

वे तारों के दीप, नहीं

जिनको भाता है बुझ जाना


वे नीलम के मेघ, नहीं

जिनको है घुल जाने की चाह

वह अनन्त रितुराज,नहीं

जिसने देखी जाने की राह|

वे सूने से नयन,नहीं

जिनमें बनते आँसू मोती,

वह प्राणों की सेज,नही

जिसमें बेसुध पीड़ा सोती;


ऐसा तेरा लोक, वेदना

नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,

जलना जाना नहीं, नहीं

जिसने जाना मिटने का स्वाद !

क्या अमरों का लोक मिलेगा

तेरी करुणा का उपहार?

रहने दो हे देव! अरे

यह मेरा मिटने का अधिकार !

-महादेवी वर्मा

Rupa Oos ki ek Boond
संघर्ष इंसान को मजबूत बनाता है,
फिर चाहे वो कितना भी कमजोर क्यों न हो..❤

चतुर्थतन्त्र - लब्धप्रणाशम्

चतुर्थतन्त्र - लब्धप्रणाशम्

एक बड़ी झील के तट पर सब ऋतुओं में मीठे फल देने वाला जामुन का वृक्ष था। उस वृक्ष पर रक्तमुख नाम का बन्दर रहता था। एक दिन झील से निकलकर एक मगरमच्छ उस वृक्ष के नीचे आ गया। बन्दर ने उसे जामुन के वृक्ष के फल तोड़कर खिलाए। दोनों में मैत्री हो गई। मगरमच्छ जब भी वहाँ आता, बन्दर उसे अतिथि मानकर उसका सत्कार करता था। मगरमच्छ भी जामुन खाकर बन्दर से मीठी-मीठी बातें करता। इसी तरह दोनों की मैत्री गहरी होती गई। मगरमच्छ कुछ जामुनें वहीं खा लेता था, कुछ अपनी पत्नी के लिए अपने साथ घर ले जाता था।

चतुर्थतन्त्र - लब्धप्रणाशम्

एक दिन मगर पत्नी ने पूछा- नाथ! इतने मीठे फल तुम कहाँ से और कैसे ले आते हो? मगर ने उत्तर दिया- झील के किनारे मेरा एक मित्र बन्दर रहता है, वही मुझे ये फल देता है।

मगर पत्नी बोली- जो बन्दर इतने मीठे फल रोज़ खाता है उसका दिल भी कितना मीठा होगा। मैं चाहती हूँ कि तू उसका दिल मुझे ला दे। मैं उसे खाकर सदा के लिए तेरी बन जाऊँगी, और हम दोनों अनन्त काल तक यौवन का सुख भोगेंगे।

मगर ने कहा- ऐसा न कह प्रिए! अब तो वह मेरा धर्म-भाई बन चुका है। अब मैं उसकी हत्या नहीं कर सकता।

मगर-पत्नी-तुमने आज तक मेरी बात का उल्लंघन नहीं किया था। आज यह नई बात कह रहे हो। मुझे सन्देह होता है कि वह बन्दर नहीं बन्दरी होगी; तुम्हारा उससे लगाव हो गया होगा। तभी तुम प्रतिदिन वहाँ

जाते हो। मुझे यह बात पहले मालूम नहीं थी। अब मुझे पता लगा कि तुम किसी और के लिए लम्बे साँस लेते हो, कोई और तुम्हारे दिल की रानी बन चुकी है।

मगरमच्छ ने पत्नी के पैर पकड़ लिए। उसे गोदी में उठा लिया और कहा- मानिनी! मैं तेरा दास हूँ, तू मुझे प्राणों से भी प्रिय है, क्रोध न कर तुझे अप्रसन्न करके मैं जीवित नहीं रहूँगा ।

मगर-पत्नी ने आँखों में आँसू भरकर कहा- धूर्त ! दिल में तो तेरे दूसरी ही बसी हुई है, और मुझे झूठी प्रेमलीला से ठगना चाहता है। तेरे दिल में अब मेरे लिए जगह ही कहाँ है? मुझसे प्रेम होता तो तू मेरे कथन को यों न ठुकरा देता । मैंने भी निश्चय कर लिया है कि जब तक तुम उस बन्दर का दिल लाकर मुझे नहीं खिलाओगे तब तक अनशन करूँगी।

पत्नी के आमरण अनशन की प्रतिज्ञा ने मगरमच्छ को दुविधा में डाल दिया। दूसरे दिन वह बहुत दुःखी दिल से बन्दर के पास गया। बन्दर ने पूछा- मित्र आज हँसकर बात नहीं करते, चेहरा कुम्हलाया है, क्या कारण है इसका ?

मगरमच्छ ने कहा- मित्रवर! आज तेरी भाभी ने मुझे बहुत बुरा-भला कहा। वह कहने लगी कि तुम बड़े निर्मोही हो, अपने मित्र को घर लाकर उसका सत्कार भी नहीं करते; इस कृतघ्नता भी छुटकारा नहीं होगा। के पाप से 'तुम्हारा परलोक में बंदर बड़े ध्यान से मगरमच्छ की बात सुनता रहा।

मगरमच्छ कहता गया-मित्र ! मेरी पत्नी ने आज आग्रह किया है कि मैं उसके देवर को लेकर आऊँ। तुम्हारी भाभी ने तुम्हारे सत्कार के लिए अपने घर को रत्नों की बंदरवार से सजाया है। वह तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। बन्दर ने कहा- मित्रवर! मैं तो जाने को तैयार हूँ किन्तु मैं तो भूमि पर ही चलना जानता हूँ, जल पर नहीं; कैसे जाऊँगा? मगरमच्छ - तुम मेरी पीठ पर चढ़ जाओ, मैं तुम्हें सकुशल घर पहुँचा दूँगा ।

बन्दर मगरमच्छ की पीठ पर चढ़ गया। दोनों जब झील के बीचोंबीच अगाध पानी में पहुँचे तो बन्दर ने कहा- ज़रा धीमे चलो मित्र! मैं तो पानी की लहरों से बिलकुल भीग गया हूँ। मुझे सर्दी लगती है ।

मगरमच्छ ने सोचा- अब यह बन्दर मुझसे बचकर नहीं जा सकता, इसे अपने मन की बात कह देने में कोई हानि नहीं है। मृत्यु से पहले इसे अपने देवता के स्मरण का समय भी मिल जाएगा।

यह सोचकर मगरमच्छ ने अपने दिल का भेद खोल दिया-मित्र, मैं तुझे अपनी पत्नी के आग्रह पर मारने के लिए यहाँ लाया हूँ। अब तेरा आ पहुँचा है। भगवान् का स्मरण कर, तेरे जीवन की घड़ियाँ अधिक नहीं हैं। बन्दर ने कहा- भाई! मैंने तेरे साथ कौन-सी बुराई की है, जिसका बदला तू मेरी मौत से लेना चाहता है? किस अभिप्राय से तुझे मारना चाहता है, बतला तो दे। मगरमच्छ - अभिप्राय तो एक ही है, वह यह कि मेरी पत्नी तेरे मीठे दिल का रसास्वादन करना चाहती है।

यह सुनकर नीति- कुशल बन्दर ने बड़े धीरज से कहा- यदि यही बात थी तो तुमने मुझे वहीं क्यों नहीं कह दिया? दिल तो वहाँ वृक्ष के एक बिल में सदा सुरक्षित पड़ा रहता है; तेरे कहने पर मैं वहीं तुझे अपनी भाभी के लिए भेंट दे देता। अब तो मेरे पास दिल है ही नहीं। भाभी भूखी रह जाएगी। मुझे तू अब दिल के बिना ही लिए जा रहा है।

मगरमच्छ बन्दर की बात सुनकर प्रसन्न हो गया और बोला- यदि ऐसा ही है तो चल, मैं तुझे फिर जामुन के वृक्ष तक पहुँचा देता तू मुझे अपना दिल दे देना; मेरी दुष्ट पत्नी उसे खाकर प्रसन्न हो जाएगी। यह कहकर वह बन्दर को वापस आया ।

बन्दर किनारे पर पहुँचकर जल्दी से वृक्ष पर चढ़ गया। उसे मानो नया जन्म मिला था। नीचे से मगरमच्छ ने कहा- मित्र, अब वह अपना दिल मुझे दे दे। तेरी भाभी प्रतीक्षा कर रहीं होंगी।

बन्दर ने हँसते हुए उत्तर दिया-मूर्ख ! विश्वासघातक! तुझे इतना भी पता नहीं कि किसी के शरीर में दो दिल नहीं होते। कुशल चाहता है तो यहाँ से भाग जा, और आगे कभी यहाँ मत आना । मगरमच्छ बहुत लज्जित होकर सोचने लगा, मैंने अपने दिल का भेद कहकर अच्छा नहीं किया।-फिर से उसका विश्वास पाने के लिए बोला- मित्र! मैंने तो हँसी-हँसी में यह बात कही थी। उसे दिल पर न लाना। अतिथि बनकर हमारे घर पर चल। तेरी भाभी बड़ी उत्कण्ठा से तेरी प्रतीक्षा कर रही है।

बन्दर बोला- दुष्ट! अब मुझे धोखा देने की कोशिश मत कर। मैं तेरे अभिप्राय को जान चुका हूँ। भूखे आदमी का कोई भरोसा नहीं। ओछे लोगों के दिल में दया नहीं होती। एक बार विश्वासघात होने के बाद में अब उसी तरह तेरा विश्वास नहीं करूँगा, जिस तरह गंगदत्त ने नहीं किया। मगरमच्छ ने पूछा- किस तरह?

बन्दर ने तब गंगदत्त की कथा सुनाई:

मेढक-साँप की मित्रता

To be continued...


लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान

लोद्रवा राजस्थान राज्य के जैसलमेर जिला का एक गांव है। लोद्रवा जैसलमेर से 15 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में स्थित है। 

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

 लोदरवा या लोध्रुवा या लोद्रवा भाटी राजपूत साम्राज्य था। प्रारंभिक भाटी शासकों ने आधुनिक समय के अफगानिस्तान में गजनी से लेकर आधुनिक पाकिस्तान में सियालकोट, लाहौर और रावलपिंडी से लेकर आधुनिक भारत में भटिंडा, मुक्तसर और हनुमानगढ़ तक बड़े साम्राज्य पर शासन किया था, लेकिन मध्य एशिया से लगातार आक्रमण के कारण साम्राज्य समय के साथ चरमरा गया।

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

भाटी वंश के रावल देवराज ने आठवीं शताब्दी में लोदूर्वा को राजधानी के रूप में स्थापित किया था। यह शहर थार मरुस्थल से होते हुए एक प्राचीन व्यापार मार्ग पर था, जिससे यहां बार-बार हमले होने लगे और इस शहर को लूट लिया जाता था। गजनी के महमूद ने 1025 ईसवी में शहर की घेरा बंदी की। 1178 में मुहम्मद गोरी द्वारा इसे फिर से तोड़ दिया गया था, जिस कारण इस शहर का परित्याग कर दिया गया। 1156 सी.ई. में रावल जैसल द्वारा जैसलमेर की नई गढ़वाली राजधानी की स्थापना की गई। जैसलमेर 16 किलोमीटर दूर त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित था जहां आज का किला खड़ा है।

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

लोद्रवा एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जो अपने वास्तुशिल्प खंडहरों और आसपास के रेत के टीलों के लिए जाना जाता है। लोद्रवा 23वें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित जैन मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है।इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त हर पत्थर की तराश में स्थापत्य के सौंदर्य को देखा जा सकता है। भवन में पत्थरों की जटिल नक्काशी है, और विशाल भीतरी भाग है जिसे खुशनुमा और आरामदायक समय बिताने के लिए बनाया गया है।पत्थरों को काटकर खूबसूरत जाली का रूप दिया गया है जो हमें आश्चर्य में डाल देता है।मंदिर के गर्भ गृह के छत पर भी बढ़िया कारीगरी की गई है काफी प्राचीन होने के बावजूद समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा है इसलिए यह आज भी बढ़िया स्थिति में है।मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही चौक में 25 फीट ऊंचा भव्य द्वार (तोरण) बना हुआ है इस पर बारीक कारीगरी करके सुंदर आकृतियां उकेरी गई हैं।मूल मंदिर 1178 सीई में नष्ट कर दिया गया था, जब मोहम्मद गोरी ने शहर पर हमला किया था।लेकिन 1615 में सेठ थारू शाह द्वारा 1675 और 1687 में इसे और जोड़ने के साथ पुनर्निर्मित किया गया था।

लोदरवा एक इच्छा पूर्ति करने वाले पेड़ के लिए भी मशहूर है, जिसे कल्पवृक्ष कहा जाता है। कल्प वृक्ष जैन धर्म के अनुयायियों के लिए समृद्धि और शांति का द्योतक है।

इसके अलावा लोद्रवा स्थित काक नदी के किनारे रेत में दबी भगवान शिव की एक अनोखी मूर्ति है, जिसके 4 सिर हैं।

कहा जाता है कि लोद्रवा में राजकुमारी मूमल और अमरकोट के राजकुमार महेंद्र की नाकाम प्रेम की दास्तान ए छुपी हुई हैं, जो पूरे क्षेत्र की लोक कथाओं और लोक गाथाओं में सुनाई जाती है।

English Translate

Lodrava: A Historical Place

Lodrava is a Village in Jaisalmer District of Rajasthan State. Lodrava is located 15 km north west of Jaisalmer.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

 Lodarwa or Lodhruva or Lodrava Bhati was a Rajput kingdom. The early Bhati rulers ruled large empires from Ghazni in modern-day Afghanistan to Sialkot, Lahore and Rawalpindi in modern-day Pakistan to Bhatinda, Muktsar and Hanumangarh in modern-day India, but due to frequent invasions from Central Asia, the empire grew over time. Crashed.

Rawal Devraj of Bhati dynasty established Lodurva as the capital in the eighth century. The city was on an ancient trade route through the Thar Desert, due to which the city was repeatedly attacked and plundered. Mahmud of Ghazni laid siege to the city in 1025 AD. It was again demolished by Muhammad Ghori in 1178, leading to the abandonment of the city. 1156 CE The new Garhwali capital of Jaisalmer was established by Rawal Jaisal in AD. Jaisalmer was located 16 km away on the Trikuta hill where the fort stands today.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

Lodrava is a popular tourist destination, known for its architectural ruins and the surrounding sand dunes. Lodrava is also famous for the Jain temple dedicated to the 23rd Jain Tirthankara Parshvanath. The architectural beauty can be seen in the carvings of every stone used in the construction of this temple. The building has intricate stone carvings, and a spacious interior designed to make for a pleasant and relaxing time. Good workmanship has also been done, despite being quite ancient, this temple has been renovated from time to time, so it is still in good condition. On entering the temple premises, there is a 25 feet high grand gate (pylon) in the square. It has finely crafted beautiful figures. The original temple was destroyed in 1178 CE, when Mohammad Ghori attacked the city. But it was rebuilt in 1615 by Seth Tharu Shah with further additions in 1675 and 1687. went.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

Lodarwa is also famous for a wish fulfilling tree called Kalpavriksha. The Kalpa tree is a symbol of prosperity and peace for the followers of Jainism.

Apart from this, there is a unique idol of Lord Shiva buried in the sand on the banks of Kak river located in Lodrava, which has 4 heads.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

Lodrava is said to have hidden the story of a failed love between Princess Mumal and Prince Mahendra of Amarkot, which is narrated in the folk tales and folk tales of the entire region.

मेरी बालकनी - 2022

गिलहरी  (Squirrels, Gilhari) और मेरी बालकनी

मेरे टेरिस की और मेरे ब्लॉग की गिलहरी आज दो वर्ष की हो गयी।

गिलहरी  (Squirrels, Gilhari) और मेरी बालकनी

आजकल के इस शहरी वातावरण में हम पर्यावरण संरक्षण के लिए चाहे जितनी बातें कर लें, परंतु विकास की अंधी दौड़ में ज्यादातर स्थानों पर सिर्फ ईंट और कंकरीट की इमारतें देखने को मिलती हैं। बचपन से ही मैं प्रकृति के सामीप्य में प्रसन्न महसूस करती हूँ और अपने को खुशकिस्मत समझती हूं कि अब भी हरे - भरे पेड़ - पौधों के बीच अपने सरकारी आवास में रह रही हूं। यहां का परिसर हरे-भरे पेड़ों से आच्छादित है। परिसर में प्रवेश करते ही कुछ अलग एहसास होता है। 

गिलहरी  (Squirrels, Gilhari) और मेरी बालकनी

मेंरी बालकनी से लगा एक इमली का पेड़ मुझे बहुत पसंद है। प्रातः काल जब चिड़ियां मधुर स्वर में चहचहाते हुए जब इसकी डालियों पर फुदकती हैं तो इस नयनाभिराम दृश्य को देखकर मन आह्लादित हो जाता है। इस पेड़ पर हल्के पीले रंग के फूल खिलते हैं । सुबह के समय चिड़ियों के झुंड में जाने कहां से छोटी छोटी लगभग 2 इंच की कुछ चिड़ियां रोज इन फूलों का रस पीने आती हैं और फिर न जाने कहा उड़ जाती हैं। झुंड की कुछ चिड़ियां हैं जो इमली की डाल पर बैठती हैं और भूख तथा प्यास लगने पर मेरी बालकनी में रखे दाने खाती हैं और पानी पीती हैं। मैंने कई बार इस मोहक दृश्य को अपने मोबाइल कैमरे में कैद करने की असफल कोशिश की है। मोबाइल देखते ही ये फुर्र हो जाती हैं।

गिलहरी  (Squirrels, Gilhari) और मेरी बालकनी

इसी इमली के पेड़ पर कुछ गिलहरियों का भी डेरा है, जिनकी चर्चा करते यह तीसरा साल है। ये गिलहरियां भी पूरे दिन इमली की एक डाल से दूसरी, दूसरी से तीसरी डाल पर फुदकती रहती हैं। वैसे तो समयाभाव के कारण सप्ताह के छः दिन मैं सिर्फ दाना -पानी डाल कर कार्यालय चली जाती हूं, परंतु रविवार के दिन का कुछ वक्त मेरा इनकी प्यारी- प्यारी हरकतें देखने में जरूर व्यतीत होता। इन चिड़ियों और गिलहरियों का इमली के पेड़ पर अटखेलियां करते देखकर मुझे अपने बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं। 

गिलहरी  (Squirrels, Gilhari) और मेरी बालकनी

बचपन में पूजा के फूल के लिए कभी कनेर की पेड़ पर तो कभी किसी की बाउंड्री पर चढ़ा करते थे और इससे पहले कि कोई हमारी चोरी पकड़े, दो चार फूल तोड़ के भाग जाया करते थे। एक बार चोरी करते पकड़े गए और चोरी की सजा भी इतनी मजेदार मिली कि पूछिये मत। अपने मोहल्ले के सुखपाल चाचा की 4 फिट ऊंची बाउंड्री पर दबे कदमों से चढ़कर मैं विनम्रता से झुकी कनेर की डालियों को प्रणाम करके फूल तोड़ने लगी। फूल तोड़कर जैसे ही मैं नीचे उतरी कि सामने से छड़ी लिए सुखपाल चाचा को खड़ा पाया। मुझे लगा कि आज मेरी पीठ चाचा जी के कोपभाजन का शिकार बनेगी लेकिन, मुस्कुराते हुए चाचा जी बोले:

फूल चुरा कर भाग रही थी। इसकी सजा तो तुझे मिलेगी। चल अब फिर से दीवाल पर चढ़ और वो ऊपर वाली डाली के फूल तोड़ और देख दाहिने तरफ की दो चार डालियों से भी तोड़ ले।"

इस तरह सारे फूल तुड़वा कर चाचा जीने ने,दो- चार फूल रहम कर मुझे दे दिया और बाकी खुद रख लिया। 

वे लोग, वह दौर ही कुछ और था, जब चोरी की सजा भी अच्छी ही हुआ करती थी । अब तो शायद इज्जत की ही वाट लग जाए। वैसे बड़े होने के बाद ऐसी चोरियों का मजा भी नहीं ले सकते। 

खैर छोड़िए ,इस इमली के पेड़ ने कहां से हमें बचपन की मधुर यादों में लौटा दिया। 

आप भी शायद इसे पढ़कर कुछ देर ही सही, अपना बचपन फिर से जी लें।

मेरी बालकनी - 2020

मेरी बालकनी - 2021

भारत देश के बाहर दिवाली का त्यौहार

भारत देश के बाहर दिवाली का त्यौहार 

दीवाली हर्षोल्लास के साथ मना ली गयी है। अभी सब लोग उसकी सुखद यादों को सहेजने में लगे हैं। दीवाली विश्व के कई देशों में मनाई जाती है।दुनिया के इन देशों में भारत की तरह ही मनाई जाती है दीपावली।

भारत देश के बाहर दिवाली का त्यौहार

  भारत में दीपावली का महत्व किसी से छुपा नहीं है। साल के इस सबसे बड़े त्योहार में लोग शोर-शराबे, आतिशबाजी, लाइटिंग और गाजे-बाजे के साथ अंधियारी रात में उजियारा भर देते हैं। इस साल दिवाली की रौनक तो आपको पूरे देश में भी देखने को मिल गयी होगी। यही कारण है कि हर परिवार की अपनी अलग मीठी यादें दिवाली से जुड़ी जाती हैं। इस दिन मिठाइयों का लेन-देन हमारे रिश्तों में और भी मिठास भर देता है। ऐसी यादों के बीच अपनापन लगने लगता है। इन सभी बातों से स्पष्ट है कि दीपावली भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाने वाला त्योहार है।

अभी तक हम सभी ये बात सुनते और समझते आए हैं लेकिन क्या आपने कभी ये सुना है कि भारत की ही तरह दुनिया में और भी देश हैं जहां दीपावली पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है ? जी हां, आज हम उन्हीं देशों के बारे में जानेंगे। दुनिया के 7 देश ऐसे हैं जहां भारत की तरह ही दीपावली मनाई जाती है। यह सेलिब्रेशन देखकर किसी भी भारतीय को लगेगा कि वह अपने ही देश यानी भारत में दिवाली सेलिब्रेट कर रहा है। चलिए जानते हैं इन देशों के बारे में....

दिवाली की यह रौनक सिर्फ भारतीय सभ्यता का हिस्सा नहीं है बल्कि ऐसे कई देश हैं जहां दिवाली उसी धूमधाम से मनाई जाती है जिस तरह से भारत में मनाई जाती है।

1. नेपाल

भारत से नजदीकियां होने और अलग-अलग प्रांत के लोग होने के कारण दिवाली नेपाल में भी काफी अच्छी तरह से मनाई जाती है। हालांकि, यहां इसे ‘तिहार’ नाम से जाना जाता है। इस त्योहार को मनाने का तरीका लगभग एक ही जैसा है और नेपाल में ये दूसरा सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है।

2. इंडोनेशिया

इंडोनेशिया में भी भारत की तरह ही मंदिर भी हैं और वहां पांडवों के नाम पर ‘पंडावा बीच’ भी बनाया गया है। वैसे इंडोनेशिया में टूरिस्ट प्लेस बाली में अधिकतर हिंदू ही रहते हैं। यहां भी दिवाली पर पब्लिक हॉलिडे मनाया जाता है और लोग एक दूसरे के साथ त्योहार मनाते हैं।

3. मॉरीशस

मॉरीशस में करीब आधी आबादी हिंदुओं की है और यहां भी दिवाली की रौनक देखते ही बनती है। दिवाली पर इतनी तरह की सजावट होती है कि लोग इसे देखकर खुश हो जाते हैं। घरों में दिए जलाना, पटाखे फोड़ना, खुशियां मनाना मॉरीशस में भी बहुत अच्छा माना जाता है।

4. फिजी

फिजी में स्थानीय हिंदू जनसंख्या तो नहीं है, लेकिन वहां भारी मात्रा में हिंदू रहते हैं जिसके कारण वहां पर दिवाली को पब्लिक हॉलिडे मनाया जाता है और इस दिन दिये जलाना, त्योहार मनाना, गिफ्ट्स का आदान-प्रदान करना भी अच्छा माना जाता है।

5. श्रीलंका

दिवाली श्रीलंका में भी बहुत ही खूबसूरत तरीके से मनाई जाती है और यहां पर इस त्योहार की धूम देखते ही बनती है। इस त्योहार पर कई तरह की खुशियां मनाई जाती हैं और दिए जलाने की प्रथा यहां पर भी है। यहां पर दिवाली का त्योहार बुरी आत्माओं से रक्षा के लिए मनाया जाता है।

6. मलेशिया

मलेशिया में इस त्योहार का रूप रंग थोड़ा अलग होता है। मलेशिया में त्योहार को ‘हरी दिवाली’ कहा जाता है और यहां पर भारत की तुलना में अलग तरीके से त्योहार मनाया जाता है। यहां पर तेल से स्नान कर लोग मंदिर जाते हैं। यहां पर पटाखों की बिक्री बैन है और सिर्फ त्योहार को मिठाई, दिया और शुभ समाचारों के साथ मनाया जाता है।

7. सिंगापुर

सिंगापुर में दिवाली के समय बहुत खूबसूरती देखने को मिलेगी। इस दौरान अलग-अलग जगहों पर सजावट मिलेगी और साथ ही यहां पर कई जगहों पर रंगारंग महोत्सव भी होते हैं। सिंगापुर की दिवाली भी देखने लायक होती है।

गोवर्धन पूजा - 2022 || Gowardhan Puja - 2022 ||

गोवर्धन पूजा (Gowardhan Puja)

गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। सामान्यतया यह पर्व दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता है। इस वार दीपावली के अगले दिन सूर्य ग्रहण के कारण यह पर्व 26 अक्टूबर को मनाया जायेगा।

गोवर्धन पूजा - 2022 || Gowardhan Puja - 2022 ||

इस दिन गोवर्धन पर्वत, श्री कृष्ण और गाय की पूजा की जाती है। इसी दिन अन्नकूट का पर्व भी मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा का हिन्दू धर्म में बेहद ही खास महत्व है। यह हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार हैजिसे लोग असीम श्रद्धा और विश्वास के भाव से मनाते हैं। इस दिन पूरे विधि-विधान से लोग गोवर्धन पूजा करते हैं। इस त्योहार को दिवाली के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा पर मनाते हैं। उत्तर प्रदेश में इस पर्व को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है।. मान्यता है कि श्री कृष्ण भगवान ने देवराज इंद्र के अंहकार का नाश करने के लिए गोकुल निवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया था। मुख्य रूप से सुबह के समय ही गोवर्धन पूजा की जाती है। इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत की रचना की जाती है। उसे पुष्प आदि से सजाते हैं। सुबह समय न मिल पाए तो लोग शाम में भी यह पूजा कर सकते हैं। यह पूजा भगवान श्री कृष्ण और प्रकृति को समर्पित है।.

गोवर्धन पूजा वाले दिन

गोवर्धन पूजा - 2022 || Gowardhan Puja - 2022 ||

गोवर्धन पूजा वाले दिन गोबर से घर के आंगन में गोवर्धन बनाकर उसे फूलों से सजाया जाता है। वहां दीप, जल, नैवेद्य, धूप, अगरबत्ती, फल, फूल आदि अर्पित किया जाता है। गोवर्धन जी की आकृति गोबर से एक लेटे हुए पुरुष के रूप में बनाई जाती है तथा बीच में दीपक रखा जाता है.।पूजा के दौरान इसी दीपक में बताशे, दही, दूध, गंगाजल, शहद आदि डाला जाता है.।प्रसाद के तौर पर इन्हीं चीजों को सभी में बांट दिया जाता है। पूजा संपन्न होने के बाद लोग गोवर्धन जी की सात बार परिक्रमा करते हैं।. परिक्रमा करते समय लोटे से पानी भी गिराया जाता है और जौ बोया जाता है.। मान्यता है कि जो भी गोवर्धन पूजा पूरे श्रद्धा भाव से करता है, उसके घर में सुख-संपदा, धन, संतान की प्राप्ति होती है।

दीपावली-2022 || Dipawali - 2022

 दीपावली

शरद पूर्णिमा के साथ पवित्र कार्तिक मास शुरू हो गया। इसी के साथ सुबह गुलाबी ठंडक और शामें और अधिक सुहानी होने लगीं। इस बार फिलहाल कोरोना का खौफ भी न के बराबर है। हां, डेंगू है,मौसम जनित बीमारियां भी हैं लेकिन आने वाले त्योहार का संभावित उल्लास लोगों में छाया है।

दीपावली-2022 || Dipawali - 2022

जी हां दीपोत्सव दीवाली की आप सभी को बहुत बधाई एवं शुभकामना।

दीपावली का संस्कृत अर्थ है दीपावलिः = दीप + अवलिः = दीपकों की पंक्ति, या पंक्ति में रखे हुए दीपक। यह शरद ऋतु में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन सनातन त्यौहार है। यह कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है और भारत के सबसे बड़े और सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। आध्यात्मिक रूप से यह 'अन्धकार पर प्रकाश की विजय' को दर्शाता है।

दीपावली-2022 || Dipawali - 2022

दिया जलना, घर की सजावट, खरीददारी, आतिशबाज़ी, पूजा, उपहार, दावत और मिठाइयाँ इस त्योहार के प्रमुख आकर्षण हैं। यह पंच दिवसीय त्योहार है। त्योहार का आरंभ धनतेरस से होता है, उसके बाद नरक चौदस फिर दीपावली और फिर प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा के बाद अंतिम दिन भैया दूज के साथ इस त्योहार का समापन होता है। दीपावली के दिन बंगाल में काली पूजा की धूम रहती है।

दीपावली-2022 || Dipawali - 2022

भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात (हे भगवान!) मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाइए। यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं तथा सिख समुदाय इसे बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है।

माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा भगवान राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात घर लौटे थे। अयोध्यावासियों का हृदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से प्रफुल्लित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए थे। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। सनातन का मूल सिद्धांत है कि सत्य की सदा जीत होती है तथा झूठ का नाश होता है। दीपावली यही चरितार्थ करती है। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ-सुथरा कर सजाते हैं। बाजारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाजार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

दीपावली-2022 || Dipawali - 2022

आइए, प्रकाश पर्व की इस पावन वेला में हम सब भी खुशी खुशी, हर्ष उल्लास और उत्साह के साथ दीपावली मनाएं।

शुभ दीपावली

स्वार्थ सिद्धि परम लक्ष्य : पंचतंत्र || Swarth Siddhi Param lakshy : Panchtantra ||

स्वार्थ सिद्धि परम लक्ष्य

अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः ।
स्वार्थमभ्युद्धरेप्राः स्वार्थभ्रंशो हि मूर्खता

बुद्धिमानी इसी में है कि स्वार्थ-सिद्धि के लिए मानापमान की चिन्ता छोड़ी जाए।

स्वार्थ सिद्धि परम लक्ष्य : पंचतंत्र || Swarth Siddhi Param lakshy : Panchtantra ||

वरुण पर्वत के पास एक जंगल में मन्दविष नाम का बूढ़ा साँप रहता था। उसे बहुत दिनों से कुछ खाने को नहीं मिला था। बहुत भागदौड़ किए बिना खाने का उसने यह उपाय किया कि वह एक तालाब के पास चला गया। उसमें सैकड़ों मेंढक रहते थे। तालाब के किनारे जाकर वह बहुत उदास और विरक्त-सा मुख बनाकर बैठ गया। कुछ देर बाद एक मेढक ने तालाब से निकलकर पूछा-मामा ! क्या बात है, आज कुछ खाते-पीते नहीं हो? इतने उदास क्यों हो? साँप ने उत्तर दिया-मित्र ! मेरे उदास होने का विशेष कारण है। मेरे यहाँ आने का भी वही कारण है। मेंढक ने जब कारण पूछा तो सौंप ने झूठमूठ यह कहानी बना ली।

वह बोला- बात यह है कि आज सुबह मैं एक मेढक को मारने के लिए जब आगे बढ़ा तो मेढ़क वहाँ से उछलकर कुछ ब्राह्मणों के बीच में चला गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे वहाँ गया। वहाँ जाकर ब्राह्मण-पुत्र का पैर मेरे शरीर पर पड़ गया। तब मैंने उसे डस लिया। वह ब्राह्मण-पुत्र वहीं मर गया। उसके पिता ब्राह्मण ने मुझे क्रोध से जलते हुए यह शाप दिया कि तुझे मेढकों का वाहन बनकर उनकी सैर करानी होगी। तेरी सेवा से प्रसन्न होकर जो कुछ वे तुझे देंगे, वही तेरा आहार होगा। स्वतन्त्र रूप से तू कुछ भी नहीं खा सकेगा। यहाँ पर मैं तुम्हारा वाहन बनकर ही आया हूँ। उस मेढक ने यह बात अपने साथी मेढकों को भी कह दी। सब मेढक बड़े खुश हुए। उन्होंने इसका वृत्तान्त अपने राजा जलपाद को भी सुनाया। जलपाद ने अपने मन्त्रियों से सलाह करके यह निश्चय किया कि साँप का वाहक बनाकर उसकी सेवा से लाभ उठाया जाए। जलपाद के साथ सभी मेढक साँप की पीठ पर सवार हो गए। जिनको उसकी पीठ पर स्थान नहीं मिला उन्होंने साँप के पीछे गाड़ी लगाकर उसकी सवार की।

साँप पहले तो बड़ी तेज़ी से दौड़ा, बाद में उसकी चाल धीमी पड़ गई। जलपाद के पूछने पर उसने इसका कारण यह बतलाया- आज भोजन न मिलने से मेरी शक्ति क्षीण हो गई है, कदम नहीं उठते। यह सुनकर जलपाद ने उसे छोटे-छोटे मेदकों को खाने की आज्ञा दे दी। साँप ने कहा- मेढक महाराज! आपकी सेवा से आए पुरस्कार को भोगकर ही मेरी तृप्ति होगी, यही ब्राह्मण का अभिशाप है। इसलिए आपकी आज्ञा से मैं बहुत उपकृत हुआ हूँ। जलपाद साँप की बात से बहुत प्रसन्न हुआ।

थोड़ी देर बाद एक और काला सौंप उधर से गुज़रा। उसने मेढकों को साँप की सवारी करते देखा तो आश्चर्य में डूब गया। आश्चर्यान्वित होकर वह मन्दविष से बोला- भाई! जो हमारा भोजन है, उसे ही तुम पीठ पर सवारी करा रहे हो! यह तो स्वभाव-विरुद्ध बात है-मन्दविष ने उत्तर दिया-मित्र! यह बात मैं भी जानता हूँ, किन्तु समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मन्दविष ने अनुकूल अवसर पाकर धीरे-धीरे सब मेढकों को खा लिया। मेढकों का वंशनाश ही हो गया।

वायसराय मेघवर्ण ने स्थिरजीवी को धन्यवाद देते हुए कहा-मित्र, आप बड़े पुरुषार्थी और दूरदर्शी हैं। एक कार्य को प्रारम्भ करके उसे अन्त तक निभाने की आपकी क्षमता अनुपम है। संसार में कई तरह के लोग हैं। नीचतम प्रवृत्ति के वे हैं जो विघ्नभय से किसी कार्य का आरम्भ नहीं करते, मध्यम वे हैं जो विघ्नभय से हर काम को बीच में छोड़ देते हैं, किन्तु उत्कृष्ट वही है जो सैकड़ों विघ्नों के होते हुए भी आरम्भ किए गए काम को बीच में नहीं छोड़ते। आपने मेरे शत्रुओं का समूल नाश करके उत्तम कार्य किया है।

स्थिरजीवी ने उत्तर दिया- महाराज मैंने अपना धर्म पालन किया। दैव ने आपका साथ दिया। पुरुषार्थ बहुत बड़ी वस्तु है, किन्तु दैव अनुकूल न हो तो पुरुषार्थ भी फलित नहीं होता। आपको अपना राज्य मिल गया । किन्तु स्मरण रखिए राज्य क्षणस्थाई होते हैं। बड़े-बड़े विशाल राज्य क्षणों में बनते और मिटते रहते हैं। शाम के रंगीन बादलों की तरह उनकी आभा भी क्षणजीवी होती है। इसलिए राज्य के मद में आकर अन्याय नहीं करना, और न्याय से प्रजा का पालन करना। राजा प्रजा का स्वामी नहीं, सेवक होता है। इसके बाद स्थिरजीवी की सहायता से मेघवर्ण बहुत वर्षों तक सूखपूर्वक राज्य करता रहा।

॥ तृतीय तन्त्र समाप्त ॥

चतुर्थ तंत्र : लब्धप्रणाशं 

To be continued ...


धनतेरस (Dhanteras) 2022

धनतेरस (Dhanteras)

आप सब को धनतेरस पर्व की बधाई।

धनतेरस (Dhanteras) 2022

पवित्र कार्तिक माह में मौसम की अनुकूलता रहती है। इस मास में त्योहारों की भी धूम रहती है। इस माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस के पर्व मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन समुद्र-मंन्थन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार ने धनतेरस पर्व को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। धनतेरस के संबंध में एक अन्य कथा यह भी है कि

भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये। तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

धनतेरस (Dhanteras) 2022

  कहा जाता है कि जब भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि चूँकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। कुछ स्थानों पर इस अवसर पर लोग धनियाँ के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।

धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की भी परंपरा इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है। चंद्रमा मन का कारक है अतः मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। सन्तोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास सन्तोष है वह स्वस्थ है, सुखी है, और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं। उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। प्रायः लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी, गणेश पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं। 

धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोककथा है। कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहाँ किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।

धनतेरस (Dhanteras) 2022

विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुँचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा। परन्तु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे, उसी समय उनमें से एक ने यम देवता से विनती की- हे यमराज! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यम देवता बोले, हे दूत! अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है, इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं, सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीपमाला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।

एक बार पुनः धनतेरस पर्व की बधाइयां।

आप सब स्वस्थ रहें, आनंद से रहें।

झाड़ू को लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

झाड़ू को लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

झाड़ू को लक्ष्मी जी इसलिए कहते हैं क्योंकि झाड़ू को लक्ष्मी का वरदान मिला हुआ है। झाड़ू का स्थान हमारे घर में बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वह हमारे घर में बहुत अधिक महत्व रखती है। आज यहाँ इसी विषय पर चर्चा करेंगे। 

झाड़ू को लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

अगर कोई व्यक्ति घर से बाहर जा रहा होता है, तो उसके बाद में झाड़ू नहीं लगानी चाहिए। झाड़ू को घर में छुपा कर रखना चाहिए, इधर उधर कहीं भी नहीं रखनी चाहिए, किसी भी बाहर वाले व्यक्ति को आने पर झाड़ू नहीं देखनी चाहिए।

झाड़ू के कभी भी पैर नहीं लगाने चाहिए और सबको सीधा खड़ा नहीं रखना चाहिए, झाड़ू में मां लक्ष्मी का वास होता है। अगर गलती से कभी पैर लग भी जाए तो उसको प्रणाम करना चाहिए।

झाड़ू का हमें आदर करना चाहिए, ज्यादा पुरानी टूटी-फूटी झाड़ू का इस्तेमाल घर में नहीं करना चाहिए। 

नई झाड़ू का इस्तेमाल हमें शनिवार को ही करना चाहिए, और उसे छुपा कर रखनी चाहिए। घर के मुख्य द्वार ,छत पर बिल्कुल भी नहीं रखनी चाहिए ।

झाड़ू को कभी भी किचन में नहीं रखना चाहिए। घर में दरिद्रता आती है।

सूर्यास्त के बाद कभी भी झाड़ू पोछा नहीं करना चाहिए, झाडू पर कभी भी गलती से भी पैर नहीं रखना चाहिए क्योंकि झाड़ू में लक्ष्मी मां का वास होता है। वह मां लक्ष्मी को अति प्रिय है और उनके एक हाथ में झाड़ू रहती है।

झाड़ू को लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

झाड़ू को कभी भी गीली नहीं रखनी चाहिए, झाड़ू से कभी भी किसी व्यक्ति या जानवर को नहीं मारना चाहिए, नए घर में अगर प्रवेश कर रहे हैं तो नई झाड़ू जरूर खरीदना चाहिए ।

झाड़ू से कभी भी झुठन साफ नहीं करनी चाहिए, ना ही झाड़ू को कभी उलगना चाहिए, अमावस्या या शनिवार को पुरानी झाड़ू टूटी- फूटी झाड़ू को घर से बाहर फेंकना चाहिए।

गुरुवार या शुक्रवार को कभी भी झाड़ू को नहीं फेकनी चाहिए ,या घर से बाहर नहीं निकालनी चाहिए। 

आज यह पोस्ट डालते हुए ऐसा लग रहा है मानो सारी बातें जानी सुनी हैं, परन्तु इन बातों को हम भूलते जा रहे हैं। यहाँ तक कि जो लोग इन बातों को मानते हैं, हम उन्हें ही दकियानूसी ख्यालात के कहते हैं। यहाँ पर हम इस बात को भूल जाते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जो भी नियम व्यवस्था बनाई है वो सभी नियम और व्यवस्थाएं प्रत्य या परोक्छ रूप से हमें फायदा ही पहुंचाते हैं। 

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta ||अध्याय तीन ~ कर्मयोग || अनुच्छेद 25- 35||

 श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय तीन ~ कर्मयोग ||

अथ तृतीयोऽध्यायः ~ कर्मयोग

अध्यायतीन के अनुच्छेद 25- 35

सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

अध्याय तीन के अनुच्छेद 25- 35 में अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा का वर्णन है। 

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्‌ ॥

भावार्थ :

हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे॥25॥

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्‌ ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्‌ ॥

भावार्थ : 

परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए॥26॥

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

भावार्थ : 

वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है॥27॥

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥

भावार्थ : 

परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता। ॥28॥

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌ ॥

भावार्थ : 

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे॥29॥

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥

भावार्थ : 

मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर॥30॥

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः ॥

भावार्थ : 

जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं॥31॥

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌ ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥

भावार्थ : 

परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ॥32॥

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥

भावार्थ : 

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान्‌ भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा॥33॥

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥

भावार्थ : 

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान्‌ शत्रु हैं॥34॥

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

भावार्थ : 

अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है॥35॥

बिच्छू के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Scorpio ||

बिच्छू (Scorpio)

बिच्छू का वैज्ञानिक नाम (Scorpio) है। यह आठ पैरों वाला आर्थोपोडा जीव है, जैसे मकड़ी, दीमक, घुन आदि। बिच्छू का डंक खतरनाक और जानलेवा सिद्ध हो सकता है, फिर भी इसका जहर करोड़ों में बिकता है। बिच्छू पराबैंगनी प्रकाश में चमकता है। 

बिच्छू के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Scorpio ||

जानते हैं ऐसे ही रोचक तथ्य बिच्छू के बारे में

  1. पूरे विश्व में बच्चों की लगभग 2000 प्रजातियां पाई जाती हैं। 
  2. बिच्छू को विश्व में पाए जाने वाले प्राचीनतम जीवो में से एक माना जाता है।
  3. बिच्छू कीट (insects) नहीं होते हैं, ये एक अलग तरह के आर्थोपोड्स होते हैं, जिनके 8 पैर होते हैं, जबकि एक वयस्क कीट के 6 पैर होते हैं।
  4. खत्म गेम बिच्छू का और लंबा होता है, इसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है - शिरोवक्ष और उदर। इसके शिरोवक्ष में चार जोड़े पैर और अन्य उपांग होते हैं। बिच्छू के निचले सिरे पर एक डंक होता है जो विश्व ग्रंथि से जुड़ा हुआ रहता है। इसका शरीर काइटिंग के वाह्य कंकाल से ढका रहता है। इसके सिर पर दो आंखें होती हैं इसकी दो से 5 जोड़ी आंखें सिर के सामने के किनारों पर होती हैं।बिच्छू के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Scorpio ||
  5. बिच्छू अंटार्कटिका और न्यूजीलैंड को छोड़कर  लगभग सभी महाद्वीपों में पाए जाते हैं।
  6. प्रजाति के अनुसार बिच्छू के आकार में भिन्नता देखने को मिलती है। अधिकांश बिच्छू 4 से 12 सेंटीमीटर लंबे होते हैं। हालांकि 1 मीटर से अधिक लंबाई के बिच्छू अस्तित्व में रहे हैं,और वर्तमान में भी कुछ बिच्छू की प्रजातियां 12 सेंटीमीटर से अधिक लंबी होती हैं।
  7. नर बिच्छू की तुलना में मादा बिच्छू अधिक लंबे समय तक जीवित रहते हैैं। ‌पाले गए बिच्छू भी जंगली बिच्छू की तुलना में अधिक जीते हैं।
  8. सबसे लंबा जीवन काल वर्षा वनों और पश्चिमी अफ्रीका के सवाना में पाए जाने वाले emperor Scorpion स्कॉर्पियन का होता है जो 6 हे 8 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं।
  9. बिच्छू सभी प्रकार के तापमान और परिस्थितियों में रह सकते हैं, इसलिए ये रेगिस्तानों से लेकर वर्षावनों तक, समुद्री तटों से लेकर पर्वतों तक ग्रामीण क्षेत्रों में घरों की दीवारों और दरारों से लेकर शहरी क्षेत्रों के घरों तक में पाए जाते हैं।बिच्छू के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Scorpio ||
  10. जीवाश्म रिकार्ड की मानें तो बिच्छू की धरती पर उत्पत्ति डायनासोर से कहीं पहले हो चुकी थी। जीवाश्म रिकार्ड के अनुसार प्राचीन बिच्छू शुष्क भूमि पर विचरण करने वाला पहले जीव में से एक था जो लगभग 420 मिलियन वर्ष पूर्व सिलोरियन काल के दौरान पाए जाते थे, जबकि सबसे पहले ज्ञात डायनासोर 240 मिलियन वर्ष पूर्व विकसित हुए थे। आधुनिक मानव 200000 साल पूर्व विकसित हुए।
  11. वर्तमान में दुनिया की सबसे बड़ी बिच्छू प्रजाति एशिया का विशाल वन बिच्छू है जो 9 इंच (23सेमी) की लंबाई तक बढ़ता है और इसका वजन 2औंस (56 ग्राम) तक हो सकता है।
  12. दुनिया का सबसे घातक बिच्छू इंडियन रेट स्कॉर्पियन है। इस बिच्छू का डंक इतना घातक होता है कि डंक मारे जाने पर उल्टी, त्वचा का रंग बदलना, सांस लेने में परेशानी, फेफड़ों में पानी भर जाना और हृदय की समस्या उत्पन्न हो जाती है। यदि समय पर इलाज ना मिले तो मौत भी हो सकती है। यह बिच्छू भारत, पूर्वी पाकिस्तान, पूर्वी नेपाल और श्रीलंका में पाया जाता है।
  13. ब्राजीलियन पीला बिच्छू भी बहुत खतरनाक होते हैं। इसका एक डंक भी भयंकर दर्द उत्पन्न करता है, और फेफड़ों में सूजन तक आ जाती है।
  14. क्यूबा में पाए जाने वाले नीले रंग के बिच्छू का जहर दुनिया का सबसे महंगा जहर है। इसकी कीमत ₹750000000 प्रति लीटर है। इस जहर में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिनका उपचार पेन किलर के रूप में किया जाता है।गठिया रोग में भी यह कारगर सिद्ध होता है और कैंसर एक्टिव सेल्स को बनने से रोकने में भी लाभकारी होता है।बिच्छू के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Scorpio ||
  15. बिच्छू रात्रि चर होते हैं। यह दिन के समय किसी चट्टान, पत्थर के नीचे या पेड़ों की छाल अथवा घरों की दीवारों में छुपे रहते हैं, और रात होते ही बाहर निकलते हैं।
  16. बिच्छू के भागने की रफ्तार 19 किलोमीटर प्रति घंटे होती है।
  17. बिच्छू का मुख्य आहार मकड़ी और कीट है। बड़े बिच्छू छोटी छिपकली और चूहे भी खा लेते हैं। बिच्छू अपने शिकार का सिर्फ तरल ही चूसते हैं।
  18. जब तक बिच्छू को छेड़ा ना जाए वह नहीं मारते हैं अधिकांश बिच्छू का जहर मनुष्यों के लिए घातक नहीं होता है फिर भी चिकित्सक को दिखाना आवश्यक है। दुनिया में 25 ही प्रजातियों के बिच्छू का जहर मनुष्य के लिए घातक सिद्ध होता है।
  19. आज से लगभग 450 वर्ष पूर्व पाये जाने वाले समुद्री बिच्छुओं (sea scorpions) की एक प्रजाति ऐसी थी, जिसकी लंबाई 3 फीट (1 मीटर से भी अधिक) हुआ करती थी। 
  20. मादा बिच्छू एक बार में 100 बच्चों को जन्म दे सकती है। 
  21. जन्म के समय बिच्छू के बच्चों की बाहरी शेल (exoskeleton) बहुत नरम होती है और ये सफ़ेद रंग के होते हैं। 
  22. जन्म के तुरंत बाद बिच्छू के बच्चे अपनी माँ की पीठ पर चढ़ जाते हैं. ये अपनी माँ की पीठ पर तब तक रहते हैं, जब तक बाह्य त्वचा (exoskeleton) पूरी तरह से कठोर नहीं हो जाती और इनके पंजे (princer) व डंक पूरी तरह विकसित नहीं हो जाते। 
  23. यह अवधि 10 से 25 दिनों तक की होती है। कुछ बच्चे 2 वर्ष तक अपनी माँ की पीठ पर लदे रहते हैं। माँ अपने बच्चों की रक्षा करती है और शिकार कर उनके लिए भोजन का प्रबंध करती है। 
  24. कई प्रजातियों में बिच्छू के बच्चे माँ की पीठ की पौष्टिक जर्दी की थैली को अवशोषित करते हैं। 
  25. दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जहाँ बिच्छुओं को खाया जाता है, जिसमें पश्चिम अफ्रीका और पूर्वी एशिया के देश शामिल हैं। म्यांमार में बिच्छुओं को चाव से खाया जाता है। चीन के शेडोंग में बिच्छुओं को तलकर, भूनकर, यहाँ तक कि कच्चा और जीवित भी खाया जाता है। आमतौर पर इसे डंक के साथ खाया जाता है, क्योंकि आग में पकाने पर इसके डंक का जहर निष्प्रभावी हो जाता है। थाईलैंड में तला हुए बिच्छू एक स्ट्रीट फूड है।
  26. बिच्छू के 3.7 लीटर जहर की कीमत 266 करोड़ होती है जो काजल पृथ्वी पर पाया जाने वाला सबसे महंगा लिक्विड है।
  27. अगर बिच्छू पर थोड़ी शराब गिरा दी जाए तो यह तुरंत पागल होकर खुद को ही काट लेता है और मर जाता है।
  28. बिच्छू को अकेला रहना पसंद होता है यह जीव अकेले ही जीवन यापन करते हैं।
  29. बिच्छू साल भर तक बिना भोजन किए जीवित रह सकते हैं।
  30. बिच्छू एक रात्रि 4:00 प्राणी होते हैं या दन के समय चट्टानों मैं छुप जाते हैं और रात होते ही अपने शिकार की तलाश में निकल पड़ते हैं। 
बिच्छू के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Scorpio ||
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Scorpion

The scientific name of Scorpion is (Scorpio). It is an eight-legged arthropod organism, such as spiders, termites, mites, etc. The sting of a scorpion can prove to be dangerous and deadly, yet its venom is sold in crores. Scorpions glow in ultraviolet light.

Know such interesting facts about scorpions

  1. There are about 2000 species of babies found all over the world.
  2. Scorpion is considered to be one of the oldest animals found in the world.
  3. Scorpions are not insects, they are a different type of arthropods, which have 8 legs, while an adult insect has 6 legs.
  4. The finish game is that of the scorpion and is longer, it can be divided into two parts - the head and the abdomen. Its head has four pairs of legs and other appendages. There is a sting at the lower end of the scorpion which remains attached to the world gland. Its body is covered by the outer skeleton of the kite. It has two eyes on its head, its two to 5 pairs of eyes are on the front sides of the head.
  5. Scorpions are found on almost all continents except Antarctica and New Zealand.
  6. There is a variation in the size of the scorpion according to the species. Most scorpions are 4 to 12 centimeters long. Although scorpions of more than 1 meter in length have existed, some scorpion species are still more than 12 centimeters long.
  7. Female scorpions live longer than male scorpions. Raised scorpions also live longer than wild scorpions.
  8. The longest life span is that of the emperor Scorpion, found in the rain forests and savannas of West Africa, which can live up to 6 to 8 years.
  9. Scorpions can live in all kinds of temperatures and conditions, so they are found in everything from deserts to rainforests, from sea coasts to mountains, from the walls and cracks of homes in rural areas to homes in urban areas.
  10. If the fossil record is to be believed, the scorpion originated on Earth much before the dinosaurs. According to the fossil record, the ancient scorpion was one of the first to roam dry land during the Silurian period, about 420 million years ago, while the earliest known dinosaurs evolved about 240 million years ago. Modern humans evolved 200,000 years ago.
  11. Currently the largest scorpion species in the world is the Asiatic giant forest scorpion which grows to a length of 9 inches (23 cm) and can weigh up to 2 oz (56 g).
  12. The world's deadliest scorpion is the Indian Rat Scorpion. The sting of this scorpion is so deadly that if stung, vomiting, skin color change, difficulty in breathing, watery lungs and heart problems arise. If treatment is not given on time, death can also occur. This scorpion is found in India, East Pakistan, Eastern Nepal and Sri Lanka.
  13. Brazilian yellow scorpions are also very dangerous. Its sting also causes severe pain, and swelling comes to the lungs.
  14. The venom of a blue scorpion found in Cuba is the most expensive venom in the world. Its price is ₹ 750000000 per liter. Some such elements are found in this poison, which are treated as pain killers. It also proves effective in arthritis and is also beneficial in preventing the formation of cancer active cells.
  15. Scorpions are nocturnal. They hide under a rock, stone or in the bark of trees or walls of houses during the day, and come out at night.
  16. The speed of the scorpion's escape is 19 kilometers per hour.
  17. The main diet of scorpions is spiders and insects. Big scorpions also eat small lizards and rats. Scorpions suck only the liquid of their prey.
  18. Most scorpion venom is not fatal to humans, yet it is necessary to see a doctor. The venom of only 25 species of scorpion in the world proves fatal for humans.
  19. There was a species of sea scorpions found about 450 years ago, whose length used to be more than 3 feet (more than 1 meter).
  20. A female scorpion can give birth to up to 100 babies at a time.
  21. At birth, the exoskeleton of scorpion chicks is very soft and they are white in colour.
  22. Immediately after birth, scorpion cubs climb on their mother's back. They stay on their mother's back until the exoskeleton is completely hardened and their claws (princer) and sting are fully developed.
  23. This period ranges from 10 to 25 days. Some babies are carried on their mother's back for up to 2 years. The mother protects her young and provides food for them by hunting.
  24. In many species, scorpions feed on the nutritious yolk sac of the mother's back.
  25. There are many countries in the world where scorpions are eaten, including countries in West Africa and East Asia. Scorpions are eaten with gusto in Myanmar. In Shandong, China, scorpions are fried, roasted, even eaten raw and alive. It is usually eaten with a sting, as the venom of its sting is neutralized when cooked in a fire. Fried scorpions are a street food in Thailand.
  26. The cost of 3.7 liters of scorpion poison is 266 crores, which is the most expensive liquid found on earth.
  27. If a little alcohol is spilled on the scorpion, it immediately goes mad and bites itself and dies.
  28. Scorpions like to be alone, these creatures live alone.
  29. Scorpions can live up to a year without food.
  30. Scorpions are 4:00 a night creatures or hide in rocks during the day and go out in search of their prey as soon as night falls.

महाकाल लोक || Mahakal Lok ||

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

उज्जैन, कालों के काल महाकाल की नगरी  महाकाल लोक (Mahakal Lok) के लिए चर्चा में है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 11 अक्टूबर को महाकाल की नगरी उज्जैन में महाकाल लोक (Mahakal Lok) का लोकार्पण किया। प्रधानमंत्री ने 16 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण कर महाकाल लोक का औपचारिक लोकार्पण किया।

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

आइए जानते हैं महाकाल लोक क्या है?

महाकाल के आंगन को 856 करोड़ रुपए की लागत से 2 चरणों मेंविकसित किया गया है। इस कॉरिडोर पर चलते हुए भक्त महाकाल मंदिर के गर्भगृह तक पहुंचेंगे। जहां कॉरिडोर पर चलते हुए उन्हें बाबा महाकाल के अद्भुत रूपों के दर्शन तो होंगे ही साथ ही शिव महिमा और शिव-पार्वती विवाह की भी गाथा देखने-सुनने को मिलेगी। 

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

महाकाल लोक के बनने के बाद यह एकमात्र ऐसा मंदिर बन गया है, जहां श्रद्धालु दर्शन के साथ शिव से जुड़ी हर कहानी जान सकते हैं। इसे बनाते समय पर्यावरण का भी विशेष ध्यान रखा गया है। हैदराबाद से विशेष पौधे मंगाए गए। इसके अलावा शमी, बेलपत्र, नीम, पीपल, रुद्राक्ष और वटवृक्ष भी रोपे गए हैं। विकसित एरिया महाकाल वन का हिस्सा है। यही कारण है कि इसे इसी अनुसार डिजाइन किया गया है।

जानते हैं इसकी कल्पना और इसे साकार रूप देने की कहानी

उज्जैन में करीब 47 हेक्टेयर में विकसित हुए महाकाल लोक की कल्पना स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के आने के साथ ही हो गयी थी। स्मार्ट सिटी में उज्जैन का नाम शामिल होते ही सबसे पहले 2.8 हेक्टेयर में फैले महाकाल के आंगन को सजाने के साथ ही विस्तार का सुझाव आया। महाकालेश्वर मंदिर में बढ़ती भीड़ को देखते हुए राज्य सरकार ने 5 साल पहले इसकी सैद्धांतिक सहमति दी थी। उस समय ये योजना 300 करोड़ रुपए की थी।

बड़े मंथन के बाद महाकाल परिसर के साथ रूद्रसागर तालाब को सजाने का प्लान तैयार हुआ। तय हुआ कि दो अलग-अलग चरणों में विस्तार किया जाएगा। 2017 से 2018 में प्रोजेक्ट के लिए 870 करोड़ रुपए का बजट मंजूर किया गया। इसके बाद यहां मूर्तियां, म्यूरल के साथ परिसर को सजाने का काम शुरू हुआ। इसके लिए खासतौर पर राजस्थान का बंसी पहाड़पुर पत्थर मंगाया गया।

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

चुनौतियां कम नहीं थीं। 800 घर हटाए के बाद यह काम आगे बढ़ पाया। महाकाल लोक की कल्पना को साकार करना चुनौतियों से भरा था। उज्जैन कलेक्टर आशीष सिंह बताते हैं- सबसे बड़ी चुनौती 800 घरों और उनमें रहने वाले परिवारों को शिफ्ट करना था। यहां स्कूल भी थे। बच्चों की पढ़ाई का नुकसान भी नहीं होने देना था। मंथन के बाद सभी बच्चों को 2 स्कूलों में शिफ्ट किया गया। हर दिन नई चुनौती होती थी, कई सामुदायिक मुद्दे थे, जिनका भी समाधान करना था। दूसरी चुनौती थी - रूद्रसागर की सफाई।

रूद्रसागर तालाब को साफ-सुथरा बनाने के लिए 40 लोगों ने डेढ़ महीने जलकुंभी हटाने के लिए दिन-रात एक किया। तालाब में आसपास के सीवरेज का गंदा पानी गिरता था। कलेक्टर आशीष सिंह ने बताया- तालाब के कायाकल्प के लिए सबसे पहली परेशानी इसमें मिल रहे गंदे नाले ही थे। 12 हजारा घरों का सीवरेज रूद्रसागर में गिरता था। 

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

रूद्रसागर में गिरने वाले नालों का पानी रोका गया तब चुनौती आई कि इसमें सालभर पानी कैसे रहे? रूद्रसागर, नालों और बारिश के पानी से ही भरता था। ये पानी भी गर्मी में सूख जाता है। उज्जैन वासियो ने बताया कि इसके लिए योजना के तहत शिप्रा नदी से रूद्रसागर को जोड़ा गया। इसके लिए बीच में एक पम्पिंग स्टेशन बनाया है। 9 महीने की मेहनत के बाद रूद्रसागर निखर गया।

महाकाल लोक में 384 मीटर लंबी म्यूरल्स वॉल बनाई गई है। इस पर शिव की 25 कथाओं को 52 म्यूरल्स में प्रदर्शित किया गया है, इन कथाओं में अधिकांश शिव पुराण, श्रीमद् भागवत, देवी भागवत और अन्य ग्रंथों से लिया गया है। म्यूरल्स वॉल बनाना मुश्किल था। इसके लिए पौराणिक शास्त्रों को खंगालना, कथाएं तय करना, उन कथाओं को मंदिर समिति, पुजारी-पुरोहित, सांस्कृतिक समिति से स्वीकृत कराना धैर्य का काम था। इससे भी मुश्किल था, उन्हें बनाने के लिए कलाकारों का चयन। इन्हें बनाने में 10 महीने का वक्त लगा।

अब देखते हैं महाकाल लोक की बनावट 

यहाँ आने वाली भीड़ को ध्यान में रखकर महाकाल लोक की संरचना की गयी है। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के बढ़ावे को ध्यान में रखकर प्रोजेक्ट तैयार किया गया। भक्तों की संख्या को ध्यान में रखा गया। सरकार कुछ ऐसा बनाना चाहटी थी कि जो भी भक्त दर्शन करने आए, एक-दो दिन यहां रुके। ऐसा होने से शहर में टूरिज्म को बढ़ावा मिलने के साथ ही रोजगार के साधन भी बढ़ेंगे।

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

अगले 50 साल की प्लानिंग

आने वाले सालों में यह देश का सबसे सुव्यवस्थित मंदिर होगा। यहां दर्शन व्यवस्था अगले 50 साल को ध्यान में रखकर बनाई गई है। उद्घाटन के बाद श्रद्धालुओं को सबसे बड़ी सुविधा बिना भीड़ के और कम समय में दर्शन की व्यवस्था मिलेगी। रात में सोने की तरह दमकने वाले महाकाल लोक में सुंदरता के साथ आम श्रद्धालुओं को शिवरात्रि, नागपंचमी और सिंहस्थ जैसे त्योहार के लिए दर्शन की ऐसी बेहतर व्यवस्था बनाई जा रही है, जो देश के किसी मंदिर में नहीं है। किसी भी त्योहार पर न तो महाकाल पहुंचने वाले वाहनों को शहर से दूर रोका जाएगा और न ही कई किमी पैदल चलना होगा। श्रद्धालुओं को पार्किंग से लेकर महाकाल दर्शन तक पहुंचने में सिर्फ 20 मिनट लगेंगे। एक घंटे में 30 हजार लोग दर्शन कर सकेंगे। व्यवस्था ऐसी होगी कि एक दिन में 10 लाख श्रद्धालु भी पहुंच जाएं, तो उन्हें दर्शन कराए जा सकते हैं। (यह चरण एक की व्यवस्था)

योजना में सिंहस्थ का भी रखा ध्यान 

दूसरे चरण में सिंहस्थ को ध्यान में रखकर योजना बनाई गयी है। सिंहस्थ के दौरान इंदौर, रतलाम, देवास, मक्सी जैसे किसी भी शहर से उज्जैन आने पर सिंहस्थ मेले के डेढ़ किलो मीटर नजदीक गाड़ियां पार्क हो सकेंगी। लोगों को मेला क्षेत्र में पहुंचने के लिए न तो कई किमी पैदल चलना होगा और न ही किसी पास की जरूरत होगी। इस डेढ़ किमी क्षेत्र में भी तिरुपति की तरह बैटरी वाली सरकारी गाड़ियां चलेंगी।

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

30 सितंबर 2023 तक महाकाल आने वाले श्रद्धालुओं के लिए 2500 गाड़ियों की पार्किंग तैयार हो जाएगी। वहीं, सिंहस्थ को लेकर 7 हजार गाड़ियों की स्थाई पार्किंग व्यवस्था नदी के किनारे ही बनाई जा रही है। इसके लिए क्षिप्रा किनारे कॉरिडोर बनाने की योजना पर काम शुरू हो गया है।

सुविधा और विस्तार

महाकाल लोक में प्रवेश करते ही शांति के साथ भक्ति का माहौल मिलेगा। यहां मिड-वे जोन के तहत पूजन सामग्री की शॉप, फूड जोन, रेस्टोरेंट की सुविधा मिलेगी। थीम पार्क के तहत महाकाल की कथाओं से युक्त म्यूरल वॉल, सप्तसागर के लिए डेक एरिया और डेक के नीचे शॉपिंग क्षेत्र और बैठने की व्यवस्था भी है। त्रिवेणी संग्रहालय के पास कार, बस और दोपहिया वाहन की पार्किंग बनाई गई है। इसमें 600 से अधिक गाड़ियां पार्क की जा सकेंगी। इसी क्षेत्र में धर्मशाला व अन्नक्षेत्र भी बनने शुरू हो चुके हैं।

रामघाट की ओर जाने वाले पैदल मार्ग का कायाकल्प, फेरी व ठेले वालों के लिए अलग से व्यवस्था है। वास्तुकलात्मक तत्वों के प्रयोग द्वारा गलियों का सौन्दर्यीकरण, रामघाट पर सिंहस्थ थीम आधारित डायनामिक लेजर शो किया गया है। छोटा रूद्रसागर लेक फ्रंट विकास योजना में लैंड स्केपिंग समेत मनोरंजन केंद्र, वैदिक वाटिका, योग केंद्र, मंत्र ध्वनि स्थल व पार्किंग का विकास हो रहा है।

ऐसा है शिव का अलौकिक संसार

महाकाल लोक को चारों ओर से खुला बनाया जा गया है जिसके चार द्वार हैं- पिनाकी, शंख, नंदी और नीलकंठ। दूसरे फेज में एक या दो मुख्य द्वार और बनाए गए इन चारों गेट से आप महाकाल लोक कैम्पस में प्रवेश कर सकते हैं। चारधाम रोड से पिनाकी द्वार मिलेगा। नीलकंठ द्वार बेगमबाग, शंख द्वार गणेश मंदिर के ठीक सामने और नंदी द्वार के लिए त्रिवेणी संग्रहालय के पास से रास्ता है।

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

महाकाल लोक का मुख्य द्वार नंदी है। यहां पहले पार्किंग है। कुछ आगे गणेश भगवान की बड़ी प्रतिमा है, सामने नंदी द्वार है। नंदी द्वार में प्रवेश करते ही ठीक सामने 108 स्तंभ हैं। इन स्तंभों पर भगवान शिव के नटराज स्वरूप की अलग-अलग मुद्राओं को उकेरा गया है। सीधे हाथ पर 25 फीट ऊंची दीवार पर शिव गाथा उकेरी गई है। उल्टे हाथ पर कमल सरोवर है। यहां महाकाल की प्रतिमा विराजित की गई है। भगवान शंकर यहां निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हुए नजर आ रहे हैं। इनके सामने 4 शेर बनाए गए हैं। इसी ओर रूद्रसागर भी है।

पिनाकी द्वार भी रुद्र सागर के किनारे से ही है। पिनाकी द्वार से घुसते ही नवग्रह के साथ गजानन और कार्तिकेय के दर्शन होंगे। त्रिपुरासुर वध की गाथा भी देखने-सुनने को मिलेगी। यहां छोटे से पार्क में त्रिशूल के साथ रुद्राक्ष, डमरू और ओम की आकृति उकेरी गई है। भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर के वध के समय धनुष उठाया था। ये धनुष पिनाक के नाम से जाना जाता है। द्वार के शिखर पर धनुष की आकृति भी बनी है।

आगे महाकाल पथ में 25 दीवारों पर करीब 52 और सप्तऋषि पर 28 म्यूरल बनाए गए हैं। सबसे बड़ा म्यूरल रूद्रसागर के सामने है। पूरे कैम्पस में कुल 81 म्यूरल बने हैं।

महाकाल लोक (Mahakal Lok)

शिव का गुणगान करेंगी प्रतिमाएं

भक्तों को यहां नीलकंठ महादेव, सती के शव के साथ शिव, त्रिवेणी प्लाजा पर शिव, शक्ति और श्रीकृष्ण की प्रतिमाएं, कैलाश पर शिव, यम संवार, गजासुर संहार, आदि योगी शिव, योगेश्वर अवतार, कैलाश पर रावण की प्रतिमाएं शिव की महिमा का गुणगान करती मिलेंगी।

18 फीट की 8 प्रतिमाएं: नटराज, गणेश, कार्तिकेय, दत्तात्रेय अवतार, पंचमुखी हनुमान, चंद्रशेखर महादेव की कहानी, शिव और सती और समुद्र मंथन दृश्य। 15 फीट ऊंची 23 प्रतिमाएं: शिव नृत्य, 11 रुद्र, महेश्वर अवतार, अघोर अवतार, काल भैरव, शरभ अवतार, खंडोबा अवतार, वीरभद्र द्वारा दक्ष वध, शिव बरात, मणिभद्र, गणेश व कार्तिकेय के साथ पार्वती, सूर्य, कपालमोचक शिव। 11 फीट की 17 प्रतिमाएं: प्रवेश द्वार पर गणेश, अर्धनारीश्वर, अष्ट भैरव, ऋषि भारद्वाज, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, कश्यप और जमदग्नी। 10 फीट की 8 प्रतिमाएं: लेटे हुए गणेश, हनुमान शिव अवतार, सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती, लकुलेश, पार्वती के साथ खेलते गणेश। 9 फीट की 19 प्रतिमाएं: यक्ष, यक्षिणी, सिंह, बटुक भैरव, सती, पार्वती, ऋषि भृंगी, विष्णु, नंदीकेश्वर, शिवभक्त रावण, श्रीराम, परशुराम, अर्जुन, सती, ऋषि शुक्राचार्य, शनिदेव और ऋषि दधिचि। 

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पोस्ट थोड़ी लम्बी हो गयी, पर उम्मीद है ब्लॉग के सभी पाठक महाकाल लोक (Mahakal Lok) से पूर्णतया अवगत हुए। 

जय बाबा महाकाल

मौसमी || मौसंबी || Mosambi || Sweet Lime ||

मौसमी

आज चर्चा करते हैं विटामिन सी से भरपूर मौसमी फल की। स्वाद के साथ-साथ गुणों का खजाना छुपा हुआ है इस फल में। मौसम को मीठा नींबू भी कहा जाता है। इसमें अनेक तरह के विटामिंस, कैल्शियम, प्रोटीन, फाइबर, आयरन, पोटेशियम, फास्फोरस भरपूर मात्रा में होते हैं। साधारणतया बाजार में आते जाते मौसमी फल को देखकर उसका जूस तो हम पी लेते हैं, पर इसके फायदों से वाकिफ नहीं होते। आज हम यहां मौसमी के फायदे और नुकसान की चर्चा करेंगे।

मौसमी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

मौसमी क्या है?

मौसमी एक फल है, जिसका पेड़ 6 मीटर ऊंचा और चारों तरफ फैला हुआ होता है। यह कांटों से युक्त और हमेशा हरा भरा रहने वाला पेड़ है। मौसमी का फल कच्ची अवस्था में हरे रंग का तथा पकने पर सुनहरा या नारंगी रंग का हो जाता है। फल के अंदर चिकने सफेद रंग के नुकीले बीज होते हैं। मौसमी का रस शारीरिक शक्ति और भूख को बढ़ाता है। 

जानते हैं मौसमी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

मौसमी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

मौसमी का वैज्ञानिक नाम सिट्रस साइनेन्सिस है। यह नींबू की प्रजाति का फल है, लेकिन नींबू की अपेक्षा कई गुना अधिक फायदेमंद है। इसका फल करीब 1 महीने तक बिना बिगड़े सुरक्षित रह सकता है। इसमें विटामिन ए, विटामिन सी, कैलशियम, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, पोटैशियम आदि प्रचुर मात्रा में पाया जाता है तथा यह एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी बैक्टीरियल, एंटी फंगल, एंटी ट्यूमर, anti-diabetic, एंटीअल्सर जैसे कई गुणों से परिपूर्ण हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह वात, पित्त, दोष तीनों दोषों में फायदेमंद है। मौसमी का रस शरीर में जल की कमी को पूरा करने के साथ ही कई तरह के रोगों के लिए भी फायदेमंद होता है। 

मौसमी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

दांत दर्द में

मौसमी के फल के छिलके को पीसकर पेस्ट बना कर दांत में जहां भी दर्द हो रहा है, वहां पर लगाने से दर्द में आराम मिलता है। 

सांस का रोग

40 से 50 मिलीलीटर मौसमी के रस में 1 ग्राम कालीमिर्च पाउडर तथा चुटकी भर सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से सांस की बीमारी दमा रोग में फायदा मिलता है।

हैजा की बीमारी

दूषित पानी पीने और भोजन करने से हैजा की बीमारी हो जाती है। यह बीमारी आंत में संक्रमण होने से होती है।  मौसमी का रस हैजा को ठीक करने में सहायक होता है। 50 से 100 मिलीग्राम मौसमी फल के रस के सेवन से पित्त की समस्या, उल्टी - दस्त ठीक होते हैं।

अधिक प्यास लगने की बीमारी

कई लोगों को बहुत अधिक प्यास लगने की शिकायत होती है। इसके लिए मौसमी फल के छिलके को सुखाकर चूर्ण बनाकर सेवन करने से प्यास लगने की समस्या कम होती है।

दस्त लगने पर

50 से 100 मिलीलीटर मौसमी के रस में सौंफ का चूर्ण और मिश्री मिलाकर सेवन करने से दस्त और बुखार में आराम मिलता है। दस्त होने पर शरीर में जल की कमी को मौसमी का जूस पूरा करने में सहायता करता है।

मूत्र रोग में

50 से 100 मिलीलीटर मौसमी फल के रस का सेवन करने से पेशाब में जलन, दर्द, रुक - रुक कर पेशाब आने की समस्या आदि में लाभ होता है।

मौसमी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

मुहांसों की समस्या

मौसमी फल के छिलके को छाया में सुखा लें। इसे पीसकर मुल्तानी मिट्टी, हल्दी चूर्ण तथा एक दो बूंद नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से झाइयां और मुंहासे दूर होते हैं तथा चेहरे की कांति बढ़ती है।

बालों की समस्या

साधारणतया कमजोर पाचन तंत्र की वजह से बालों के गिरने की समस्या आती है या फिर यह समस्या आनुवंशिक होती है। अगर यह समस्या पाचन तंत्र की कमजोरी से है तो मौसमी का सेवन फायदेमंद हो सकता है। मौसमी का सेवन करने से पाचन तंत्र मजबूत होता है तथा साथ ही बालों को झड़ने से रोकता है। मौसमी में मौजूद विटामिंस और पोषक तत्व बालों को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक होते हैं।

मौसमी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

स्वस्थ त्वचा के लिए 

मौसमी में अम्ल रस की प्रधानता होती है। यह पित्त दोष को सामान्य रखता है तथा त्वचा को प्राकृतिक तरीके से निखारता है और त्वचा संबंधित रोगों को दूर रखता है।

वजन कम करने में

मौसमी के जूस से पाचन तंत्र बेहतर होता है जिसके कारण शरीर का मेटाबॉलिज्म अच्छा रहता है इसी वजह से यह वजन कम करने में सहायक होता है। 

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने में 

मौसम्बी के जूस के नियमित सेवन से शरीर का ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, जिससे हृदय सही तरीके से कार्य करता है। परिणामस्वरूप हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है। 

मौसमी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

मौसमी के नुकसान

  • नींबू पानी का अत्यधिक सेवन सीने में जलन पैदा कर सकता है।
  • नींबू का अत्यधिक सेवन दांत खट्टे कर सकता है तथा दांत के बाहरी परत को हानि पहुंचा सकता है। अतः नींबू का सेवन सही मात्रा में करना चाहिए।
  • संवेदनशील त्वचा पर नींबू का सीधा प्रयोग से रैशेज या एलर्जी की समस्या हो सकती है।

मौसमी के पौष्टिक तत्व (Nutritional value of Sweet Lemon)

मौसमी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

मौसंबी के नुकसान (Side Effects of Mosambi)

अति सर्वत्र वर्जयेत !! हर चीज की अति नुकसानदायक होती है। कुछ ऐसा ही मौसंबी के साथ भी है। इसका अधिक सेवन हानिकारक हो सकता है।
  • अगर किसी को सिट्रस एसिड से एलर्जी है, तो मौसंबी का सेवन नुकसानदायक हो सकता है। 
  • चेहरे या शरीर पर मौसम्बी का रस लगाकर धूप में निकलने से सूरज की हानिकारक पराबैंगनी किरणें त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए सावधानी के तौर पर त्वचा पर मौसम्बी लगाने के बाद भी धूप में निकलने से बचना चाहिए।