Cricket News: Latest Cricket News, Live Scores, Results, Upcoming match Schedules | Times of India

Sportstar - IPL

Showing posts with label इतिहास के पन्नों से. Show all posts
Showing posts with label इतिहास के पन्नों से. Show all posts

कन्नप्पा नयनार

कन्नप्पा नयनार


कन्नप्पा तमिल लोककथाओं में एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं, जिन्हें हिंदू भगवान शिव के प्रति उनकी अटूट भक्ति के लिए जाना जाता है। उनकी कहानी भारत के आंध्र प्रदेश के श्रीकालहस्तीश्वर मंदिर से निकटता से जुड़ी हुई है। किंवदंती के अनुसार, कन्नप्पा नामक एक शिकारी ने अपनी भक्ति के प्रतीक के रूप में शिव लिंगम को अपनी आँख अर्पित की थी। इससे पहले कि वह अपनी दूसरी आँख का बलिदान कर पाता, शिव उसके सामने प्रकट हुए, उसकी गहरी आस्था और समर्पण से प्रभावित हुए।

कन्नप्पा नयनार

एक मशहूर धनुर्धर थिम्मन एक दिन शिकार के लिए गए। जंगल में उन्हें एक मंदिर मिला, जिसमें एक शिवलिंग था। थिम्मन के मन में शिव के लिए एक गहरा प्रेम भर गया और उन्होंने वहां कुछ अर्पण करना चाहा, लेकिन उन्हें समझ नहीं आया कि कैसे और किस विधि ये काम करें। उन्होंने भोलेपन में अपने पास मौजूद मांस लिंग पर अर्पित कर दिया और खुश होकर चले गए कि शिव ने उनका चढ़ावा स्वीकार कर लिया।

उस मंदिर की देखभाल एक ब्राह्मण करता था जो उस मंदिर से कहीं दूर रहता था। हालांकि वह शिव का भक्‍त था लेकिन वह रोजाना इतनी दूर मंदिर तक नहीं आ सकता था इसलिए वह सिर्फ पंद्रह दिनों में एक बार आता था। अगले दिन जब ब्राह्मण वहां पहुंचा, तो लिंग के बगल में मांस पड़ा देखकर वह भौंचक्‍का रह गया। यह सोचते हुए कि यह किसी जानवर का काम होगा,उसने मंदिर की सफाई कर दी,अपनी पूजा की और चला गया।

अगले दिन,थिम्मन और मांस अर्पण करने के लिए लाए। उन्हें किसी पूजा पाठ की जानकारी नहीं थी,इसलिए वह बैठकर शिव से अपने दिल की बात करने लगे। वह मांस चढ़ाने के लिए रोज आने लगे। एक दिन उन्हें लगा कि लिंग की सफाई जरूरी है लेकिन उनके पास पानी लाने के लिए कोई बरतन नहीं था। इसलिए वह झरने तक गए और अपने मुंह में पानी भर कर लाए और वही पानी लिंग पर डाल दिया।

जब ब्राह्मण वापस मंदिर आया तो मंदिर में मांस और लिंग पर थूक देखकर घृणा से भर गया। वह जानता था कि ऐसा कोई जानवर नहीं कर सकता। यह कोई इंसान ही कर सकता था। उसने मंदिर साफ किया, लिंग को शुद्ध करने के लिए मंत्र पढ़े। फिर पूजा पाठ करके चला गया। लेकिन हर बार आने पर उसे लिंग उसी अशुद्ध अवस्था में मिलता।

एक दिन उसने आंसुओं से भरकर शिव से पूछा,“हे देवों के देव,आप अपना इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।” शिव ने जवाब दिया,“जिसे तुम अपमान मानते हो, वह एक दूसरे भक्त का अर्पण है। मैं उसकी भक्ति से बंधा हुआ हूं और वह जो भी अर्पित करता है, उसे स्वीकार करता हूं।

अगर तुम उसकी भक्ति की गहराई देखना चाहते हो,तो पास में कहीं जा कर छिप जाओ और देखो वह आने ही वाला है।” ब्राह्मण एक झाड़ी के पीछे छिप गया। थिम्मन मांस और पानी के साथ आया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि शिव हमेशा की तरह उसका चढ़ावा स्वीकार नहीं कर रहे। वह सोचने लगा कि उसने कौन सा पाप कर दिया है। उसने लिंग को करीब से देखा तो पाया कि लिंग की दाहिनी आंख से कुछ रिस रहा है।

उसने उस आंख में जड़ी-बूटी लगाई ताकि वह ठीक हो सके लेकिन उससे और रक्‍त आने लगा। आखिरकार,उसने अपनी आंख देने का फैसला किया। उसने अपना एक चाकू निकाला, अपनी दाहिनी आंख निकाली और उसे लिंग पर रख दिया। रक्‍त टपकना बंद हो गया और थिम्मन ने राहत की सांस ली। लेकिन तभी उसका ध्यान गया कि लिंग की बाईं आंख से भी रक्‍त निकल रहा है।

उसने तत्काल अपनी दूसरी आंख निकालने के लिए चाकू निकाल लिया,लेकिन फिर उसे लगा कि वह देख नहीं पाएगा कि उस आंख को कहां रखना है। तो उसने लिंग पर अपना पैर रखा और अपनी आंख निकाल ली। उसकी अपार भक्ति को देखते हुए, शिव ने थिम्मन को दर्शन दिए। उसकी आंखों की रोशनी वापस आ गई और वह शिव के आगे दंडवत हो गया। उसे कन्नप्पा नयनार के नाम से जाना गया। कन्ना यानी आंखें अर्पित करने वाला नयनार यानी शिव भक्त।

समुद्र मंथन कहाँ हुआ था...??

समुद्र मंथन कहाँ हुआ था...??

हिंदू धर्म ग्रंथों (भागवत पुराण, महाभारत तथा विष्णु पुराण) के अनुसार सृष्टि की रचना के बाद त्रिदेव अर्थात- भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के निर्देशन में क्षीरसागर को मथा गया था। यह मंथन देवताओं और दानवों द्वारा किया गया था। वासुकी नाग की सहायता से समुद्र मंथन किया गया, जिसके एक छोर पर सभी देवता गण उपस्थित थे तो वहीं दूसरी ओर दानवों थे। इस समुंद्र मंथन के दौरान 14 प्रकार के रत्न उत्पन्न हुए थे। यह समुन्द्र मंथन हुआ कहाँ था?

समुद्र मंथन कहाँ हुआ था...??

यदि स्थूल दृष्टि से देखें तो शायद अरब सागर में कहीं, लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी घटना के सही स्थान का पता करने हेतु उस समय की भौगोलिक स्थिति का पता होना भी जरूरी है। ग्रंथों में गहरे घुसेंगे तो पता चलेगा कि बिहार, बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा आदि समुद्र मंथन के समय जलमग्न थे। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से भी उस समय थे नहीं।

समुद्रमंथन का समय भागीरथी के प्रादुर्भाव से भी बहुत पहले का है। उस समय हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बहुत थोड़ी ही भूमि का निर्माण कर पाई थी। नदियाँ ही भूमि का निर्माण करती हैं। इस राष्ट्र के पिता पर्वत हैं तो माताएँ नदियाँ। अभी भी सबसे प्रसिद्ध डेल्टा सुंदरवन इसी निर्माण का प्रमाण है।

कथा है कि जब समुद्रमंथन की बात उठी तो मंदार पर्वत की मथानी तो बना ली गई। कूर्मावतार ने आधार भी दे दिया, लेकिन मथानी की रस्सी कहाँ से लाएँ। उस समय सर्वसम्मति बनी कि हिमालय की कंदराओं में आराम कर रहे नागराज वासुकि से ही यह काम करवाया जा सकता है। उनसे बड़ी रस्सी जैसी कोई वस्तु तीनों लोक और चौदहों भुवन में नहीं हैं।

अब समस्या थी कि उन्हें लाए कौन? वासुकि जितने बड़े थे उनको लाने की समस्या भी उतनी ही बड़ी थी। फिर क्या था कैलाशपति वासुकि को अपनी कलाई में लपेट कर ले आये। जब मंथन प्रारम्भ हुआ तो नागराज को पीड़ा होने लगी। इधर से देवता खींचें, उधर से असुर खींचें, बीच में मंदराचल चुभे। क्षुब्ध होकर नागराज ने फुफकारना शुरू कर दिया। अब सोचिये कि जिस नाग को एक पर्वत के चारों तरफ लपेट दिया गया, वह कितना बड़ा होगा। नागराज के फुफकारने से समस्त सृष्टि में जहर फैलने लगा। हाहाकार मच गया।

यह देखकर देवता और असुर भाग खड़े हुए। सभी देवता गण परेशान थे कि आखिर इस हलाहल को कौन पियेगा?विष्णु भगवान ने भोले बाबा की तरफ देखा कि बाबा आप ही पी सकते हैं। जो भोले होते हैं, उनके हिस्से ही जहर आता है। खैर भगवान भोले नाथ ने पहले जहर पिया और फिर वासुकि का उपचार किया। तब तक तो धन्वंतरि निकले भी नहीं थे। उनसे भी पुराने वैद्य हैं वैद्यनाथ। धन्वंतरि समुंद्र मंथन से ही प्रकट हुए थे। 

भगवान शिव ने हलाहल पी तो लिया, लेकिन उसका ताप असह्य हो गया। वहीँ एक स्थान देखकर बैठ गए। मंथन शुरू हो गया। मंथन से निकले चन्द्रमा के एक टुकड़े को तोड़ कर निकाला गया और उसे भगवान के सर के ठीक ऊपर स्थापित किया गया। उस टुकड़े से निरंतर शीतल जल महादेव के सिर पर गिरता रहता है।

यह क्षेत्र कहाँ है जहाँ मंथन हुआ था?

बिहार के बाँका जिले में स्थित मंदार पर्वत के आसपास का क्षेत्र ही मंथन का स्थान है। आज भी झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा और बिहार की भूमि में खनिजों का प्रचुर भण्डार है। सबका केंद्र मंदार पर्वत ही है। मंदार में अब भी समुद्र मंथन से निकली निधियाँ छिपी हुई हैं।

भोलेनाथ नागराज को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर बैठे थे, वह स्थान है वासुकीनाथ। जिस स्थान पर नागराज का उपचार करने व विष ग्रहण करने के बाद बैठे थे, वह स्थान है वैद्यनाथ धाम, देवघर में। चाँद का वह टुकड़ा जो उनके सर पर लगाया गया था, आज भी लगा है और उससे निरंतर जल टपकता रहता है। वह टुकड़ा भोलेनाथ के ठीक ऊपर मंदिर के शिखर के नीचे लगा है - चंद्रकांत मणि...

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

बोरोबुदुर मंदिर

बोरोबुदुर मंदिर (Borobudur Temple) परिसर दुनिया के सबसे महान बौद्ध स्मारकों में से एक है। इंडोनेशिया के जावा में है विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर, करीब 1 हजार साल पहले 49 फीट ऊंची चट्टान पर इसे 8वीं और 9वीं शताब्दी ईस्वी में सियालेंद्र राजवंश के शासनकाल के दौरान बनाया गया था। यह स्मारक इंडोनेशिया के जावा द्वीप के केंद्र में, मध्य जावा के दक्षिणी भाग में केदु घाटी में स्थित है।

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

9 मंजिला है ये बौद्ध मंदिर

इसमें भगवान बुद्ध की 504 मूर्तियां हैं। बोरोबुदुर को एक बड़े स्तूप की तरह बनाया गया है। इसका स्वरूप पिरामिड से प्रेरित है। इसका मूल आधार वर्गाकार है, जिसकी हर भुजा करीब 118 मीटर की है। इसमें नौ मंजिलें हैं। निचली 6 मंजिलें चोकोर और ऊपरी तीन गोलाकार हैं। ऊपरी मंजिल के बीच में एक बड़े स्तूप के चारों ओर घंटी के आकार के 72 छोटे स्तूप हैं। जिनमें नक्काशी किए गए छोटे-छोटे छेद बने हैं। बुद्ध की मूर्तियां इन छोटे-छोटे छेद से बने पॉट के अंदर स्थापित हैं।

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

इसके स्तूप में जावा और उसके पड़ोस के द्वीपों पर शासन करने वाले भारत के राजाओं की वास्तुशिल्पीय परिकल्पना का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलता है। इसके सबसे ऊपरी हिस्से पर घंटे के आकार का विशाल स्तूप है, इसके शिलापट्टों पर बुद्ध की अनेक मूर्तियां बनी हुई हैं। इसका निर्माण 9वीं सदी में शैलेन्द्र राजवंश के कार्यकाल में हुआ। स्मारक में बहुत सारी सीढ़ियां व्यवस्थित रूप से बनी हुई हैं। गलियारों में 1460 शिलाओं पर बुद्ध से जुड़ी कथाओं का वर्णन किया गया है।

सालों तक ज्वालामुखी की राख में दवा रहा था दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

इस मंदिर के बारे में सबसे खास बात यह है कि यह सालों तक ज्वालामुखी की राख और जंगलों के बीच ढका रहा था। इस मंदिर को 1970 के दशक में यूनेस्को की मदद से पुनर्स्थापित किया गया था। इंडोनेशिया में प्राचीन मंदिरों को चण्डी के नाम से पुकारा जाता है, इसलिए बोरोबुदुर मंदिर को भी कई बार चण्डी बोरोबुदुर भी कहा जाता है। इस मंदिर को विश्व का सबसे बड़ा और महानतम बौद्ध मंदिर माना जाता है।

यह मंदिर खोजे जाने के पहले कई वर्षों तक ज्वालामुखी राख के नीचे दबा रहा था। सालों तक राख और जंगल के बीच छिपे हुए इस मंदिर की खोज एक अंग्रेज लेफ्टिनेंट गवर्नर थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स ने सन 1814 में थी। रैफल्स उन दिनों सेमारंग के दौर पर गए हुए थे, तब उन्हें बुमिसेगोरो गांव के पास एक जंगल में एक बड़े स्मारक के बारे में जानकारी मिली। सन 1834 में इस मंदिर को जमीन से बाहर निकाला गया। रैफल्स ने डच इंजिनियर एचसी कॉर्नेलियस को इस मंदिर को जमीन से बाहर निकालने का काम सौंपा था। कॉर्नेलियस के बाद डच प्रशासक हार्टमान ने उनके कार्य को आगे बढ़ाया और साल 1834 में इस मंदिर को पूरी तरह से जमीन से बाहर निकाल लिया गया और साल 1842 में इसके प्रमुख स्तूप को खोजा गया था।

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

पुनर्स्थापित करने में यूनेस्को ने की मदद

मंदिर में कुल 2672 पैनल और बुद्ध की 504 मूर्तियां मौजूद हैं। इस प्रमुख स्तूप की ऊंचाई 115 फीट है। बोरोबुदुर मंदिर के निर्माण में लगभग 20 लाख क्यूबिक फीट ग्रे ज्वालामुखी पत्थर का उपयोग किया गया था। साल 1973 में इस मंदिर के पुनर्स्थापना में यूनेस्को ने मदद की। यूनेस्को ने मंदिर के पुनर्स्थापना में वित्तीय मदद भी की थी, जिसके बाद बोरोबुदुर मंदिर का फिर से पूजा स्थल और तीर्थस्थल के रूप में उपयोग किया जाने लगा।

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

साल में एक बार होती है पूजा 

साल में एक बार मई या जून में पूर्णिमा को इंडोनेशिया के बौद्ध नागरिक यहां पूजा पाठ करते हैं। इस दिन को इंडोनेशिया में बौद्ध धर्मावलंबी गौतम के जन्म, निधन और बुद्ध शाक्यमुनि के रूप में ज्ञान प्राप्त करने के उपलक्ष में वैशाख के तौर पर मनाते हैं। यह दिन इंडोनेशिया में राष्ट्रीय छुट्टी के रूप में मनाया जाता है।

English Translate 

Borobudur Temple

The Borobudur temple complex is one of the greatest Buddhist monuments in the world. The world's largest Buddhist temple is in Java, Indonesia. It was built about 1 thousand years ago on a 49 feet high rock during the reign of the Siyalendra dynasty in the 8th and 9th centuries AD. This monument is located in the Kedu Valley in the southern part of Central Java, in the center of the island of Java, Indonesia.

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

This Buddhist temple is 9 storeys high

It has 504 statues of Lord Buddha. Borobudur is built like a large stupa. Its form is inspired by the pyramid. Its basic base is square, with each side being about 118 meters. It has nine floors. The lower 6 floors are square and the upper three are circular. There are 72 small bell-shaped stupas around a large stupa in the middle of the upper floor. In which small holes are made. The idols of Buddha are installed inside the pot made of these small holes.

Its stupa is an excellent example of the architectural imagination of the Indian kings who ruled Java and its neighboring islands. There is a huge bell-shaped stupa on its topmost part, many statues of Buddha are carved on its stone slabs. It was built in the 9th century during the reign of the Shailendra dynasty. There are many stairs built systematically in the monument. Stories related to Buddha have been described on 1460 stones in the corridors.

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

The world's largest Buddhist temple was buried in volcanic ash for years

The most special thing about this temple is that it was covered in volcanic ash and forests for years. This temple was restored with the help of UNESCO in the 1970s. Ancient temples in Indonesia are called Chandi, so Borobudur temple is also sometimes called Chandi Borobudur. This temple is considered to be the largest and greatest Buddhist temple in the world.

This temple was buried under volcanic ash for many years before it was discovered. This temple, hidden between ash and forest for years, was discovered by an English lieutenant governor Thomas Stamford Raffles in 1814. Raffles was on a tour of Semarang in those days, when he got information about a large monument in a forest near Bumisegoro village. This temple was taken out of the ground in 1834. Raffles had assigned the task of taking this temple out of the ground to Dutch engineer HC Cornelius. After Cornelius, Dutch administrator Hartmann took his work forward and in the year 1834 this temple was completely taken out of the ground and in the year 1842 its main stupa was discovered.

बोरोबुदुर मंदिर || Borobudur Temple || विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

UNESCO helped in restoring it

There are a total of 2672 panels and 504 statues of Buddha in the temple. The height of this main stupa is 115 feet. About 20 lakh cubic feet of grey volcanic stone was used in the construction of Borobudur temple. UNESCO helped in the restoration of this temple in the year 1973. UNESCO also provided financial help in the restoration of the temple, after which Borobudur temple started being used again as a place of worship and pilgrimage.

Worship is done once a year

Once a year on the full moon in May or June, Buddhist citizens of Indonesia worship here. Buddhists in Indonesia celebrate this day as Vaisakha to commemorate Gautam's birth, death and attaining enlightenment as Buddha Shakyamuni. This day is celebrated as a national holiday in Indonesia.

Lessons for a good life

Lessons for a good life

जिंदगी की जद्दोजहत में भागते भागते एक वक्त पर हमें एहसास होता है कि सबके लिए बहुत कर लिया अब कुछ अपने लिए किया जाए.... चंद पंक्तियाँ खुद के लिए 

Rupa Oos ki ek Boond

मेरे माता-पिता, मेरे भाई-बहनों, हमसफ़र , बच्चों और दोस्तों से प्यार करने के बाद, अब मैं खुद से प्यार करने लगा हूं।

After loving my parents, my siblings, my spouse, my children, my friends, now I have started loving myself. 


मुझे बस एहसास हुआ कि मैं "एटलस" नहीं हूं। दुनिया मेरे कंधों पर टिकी नहीं है।

I just realized that I am not “Atlas”. The world does not rest on my shoulders. 


मैंने अब सब्जियों और फलों के विक्रेताओं के साथ सौदेबाजी बंद कर दी। आखिरकार, कुछ रुपए अधिक देने से मेरी जेब में कोई छेद नहीं होगा, लेकिन इससे इस गरीब को अपनी बेटी की स्कूल फीस बचाने में मदद मिल सकती है।

I now stopped bargaining with vegetables & fruits vendors. After all, a few Rupees more is not going to burn a hole in my pocket but it might help the poor fellow save for his daughter’s school fees. 


मैं बची चिल्लर का इंतजार किए बिना टैक्सी चालक को भुगतान करता हूं। अतिरिक्त धन उसके चेहरे पर एक मुस्कान ला सकता है। आखिर वह मेरे मुकाबले जीने के लिए बहुत मेहनत कर रहा है। 

I pay the taxi driver without waiting for the change. The extra money might bring a smile on his face. After all he is toiling much harder for a living than me. 


मैंने बुजुर्गों को यह बताना बंद कर दिया कि वे पहले ही कई बार उस कहानी को सुना चुके हैं। आखिर वह कहानी उनकी अतीत की यादें ताज़ा करती है और जिंदगी जीने का होंसला बढाती है। 

I stopped telling the elderly that they've already narrated that story many times. After all, the story makes them walk down the memory lane & relive the past. 


कोई इंसान अगर गलत भी हो तो मैंने उसको सुधारना बंद किया है । आखिर सबको परफेक्ट बनाने का बोझ मुझ पर नहीं है। ऐसे परफेक्शन से शांति अधिक कीमती है।

I have learnt not to correct people even when I know they are wrong. After all, the onus of making everyone perfect is not on me. Peace is more precious than perfection. 


मैं अब सबकी तारीफ बड़ी उदारता से करता हूं। यह न केवल तारीफ प्राप्तकर्ता की मनोदशा को उल्हासित करता है, बल्कि यह मेरी मनोदशा को भी ऊर्जा देता है। 

I give compliments freely & generously. After all it's a mood enhancer not only for the recipient, but also for me.  


अब मैंने अपनी शर्ट पर क्रीज या स्पॉट के बारे में सोचना और परेशान होना बंद कर दिया है। मेरा अब मानना है की दिखावे के अपेक्षा व्यक्तित्व ज्यादा मालूम पड़ता है।

I have learnt not to bother about a crease or a spot on my shirt. After all, personality speaks louder than appearances. 


मैं उन लोगों से दूर ही रहता हूं जो मुझे महत्व नहीं देते। आखिरकार, वे मेरी कीमत नहीं जान सकते, लेकिन मैं वह बखूबी जनता हूँ।

I walk away from people who don't value me. After all, they might not know my worth, but I do. 


मैं तब शांत रहता हूं जब कोई मुझे "चूहे की दौड़" से बाहर निकालने के लिए गंदी राजनीति करता है। आखिरकार, मैं कोई चूहा नहीं हूं और न ही मैं किसी दौड़ में शामिल हूं।

I remain cool when someone plays dirty politics to outrun me in the rat race. After all, I am not a rat & neither am I in any race. 


मैं अपनी भावनाओं से शर्मिंदा ना होना सीख रहा हूं। आखिरकार, यह मेरी भावनाएं ही हैं जो मुझे मानव बनाती हैं।

I am learning not to be embarrassed by my emotions. After all, it's my emotions that make me human. 


मैंने सीखा है कि किसी रिश्ते को तोड़ने की तुलना में अहंकार को छोड़ना बेहतर है। आखिरकार, मेरा अहंकार मुझे सबसे अलग रखेगा जबकि रिश्तों के साथ मैं कभी अकेला नहीं रहूंगा।

I have learnt that it’s better to drop the ego than to break a relationship. After all, my ego will keep me aloof whereas with relationships I will never be alone. 


मैंने प्रत्येक दिन ऐसे जीना सीख लिया है जैसे कि यह आखिरी हो। क्या पता, आज का दिन आखिरी हो। 

I have learnt to live each day as if it's the last. After all, it might be the last. 

Rupa Oos ki ek Boond

*सबसे महत्वपूर्ण*– 

MOST IMPORTANT 

मैं वही काम करता हूं जो मुझे खुश करता है। आखिरकार, मैं अपनी खुशी के लिए जिम्मेदार हूं और मैं उसका हक़दार भी हूँ।

I am doing what makes me happy. After all, I am responsible for my happiness, and I owe it to me. 

द्रोपदी के एक ही पति थे - युधिष्ठिर

द्रोपदी के एक ही पति थे - युधिष्ठिर

द्रोपदी के एक ही पति थे - युधिष्ठिर

जर्मन के संस्कृत जानकार मैक्स मूलर को जब विलियम हंटर की कमेटी के कहने पर वैदिक धर्म के आर्य ग्रंथों को बिगाड़ने का जिम्मा सौंपा गया तो उसमे मनु स्मृति, रामायण, वेद के साथ साथ महाभारत के चरित्रों को बिगाड़ कर दिखाने का भी काम किया गया। किसी भी प्रकार से प्रेरणादायी पात्र - चरित्रों में विक्षेप करके उसमे झूठ का तड़का लगाकर महानायकों को चरित्रहीन, दुश्चरित्र, अधर्मी सिद्ध करना था, जिससे भारतीय जनमानस के हृदय में अपने ग्रंथो और महान पवित्र चरित्रों के प्रति घृणा और क्रोध का भाव जाग जाय और प्राचीन आर्य संस्कृति सभ्यता को निम्न दृष्टि से देखने लगें और फिर वैदिक धर्म से आस्था और विश्वास समाप्त हो जाय। लेकिन आर्य नागरिको के अथक प्रयास का ही परिणाम है कि मूल महाभारत के अध्ययन बाद सबके सामने द्रोपदी के पाँच पति के दुष्प्रचार का सप्रमाण खण्डन किया जा रहा है। द्रोपदी के पवित्र चरित्र को बिगाड़ने वाले विधर्मी, पापी वो तथाकथित ब्राह्मण, पुजारी, पुरोहित भी हैं जिन्होंने महाभारत ग्रंथ का अध्ययन किये बिना अंग्रेजो के हर दुष्प्रचार और षड्यंत्रकारी चाल, धोखे को स्वीकार कर लिया और धर्म को चोट पहुंचाई।

विवाह_का_विवाद क्यों पैदा हुआ था:--

(१) अर्जुन ने द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। यदि उससे विवाह हो जाता तो कोई परेशानी न होती। वह तो स्वयंवर की घोषणा के अनुरुप ही होता।

(२) परन्तु इस विवाह के लिए कुन्ती कतई तैयार नहीं थी।

(३) अर्जुन ने भी इस विवाह से इन्कार कर दिया था। "बड़े भाई से पहले छोटे का विवाह हो जाए यह तो पाप है। अधर्म है।" (भवान् निवेशय प्रथमं)

मा मा नरेन्द्र त्वमधर्मभाजंकृथा न धर्मोsयमशिष्टः (१९०-८)

(४) कुन्ती मां थी। यदि अर्जुन का विवाह भी हो जाता,भीम का तो पहले ही हिडम्बा से (हिडम्बा की ही चाहना के कारण) हो गया था। तो सारे देश में यह बात स्वतः प्रसिद्ध हो जाती कि निश्चय ही युधिष्ठिर में ऐसा कोई दोष है जिसके कारण उसका विवाह नहीं हो सकता।

(५) आप स्वयं निर्णय करें कुन्ती की इस सोच में क्या भूल है? वह माता है, अपने बच्चों का हित उससे अधिक कौन सोच सकता है? इसलिए माता कुन्ती चाहती थी और सारे पाण्डव भी यही चाहते थे कि विवाह युधिष्ठिर से हो जाए।

🔸प्रश्न:-क्या कोई ऐसा प्रमाण है जिसमें द्रौपदी ने अपने को केवल एक की पत्नी कहा हो या अपने को युधिष्ठिर की पत्नी बताया हो ?

🔸उत्तर:- द्रौपदी को कीचक ने परेशान कर दिया तो दुःखी द्रौपदी भीम के पास आई। उदास थी। भीम ने पूछा सब कुशल तो है? द्रौपदी बोली जिस स्त्री का पति राजा युधिष्ठिर हो वह बिना शोक के रहे, यह कैसे सम्भव है?

आशोच्यत्वं कुतस्यस्य यस्य भर्ता युधिष्ठिरः ।

जानन् सर्वाणि दुःखानि कि मां त्वं परिपृच्छसि ।।-(विराट १८/१)

_द्रौपदी स्वयं को केवल युधिष्ठिर की पत्नि बता रही है।_

🔸 वह भीम से कहती है- जिसके बहुत से भाई, श्वसुर और पुत्र हों,जो इन सबसे घिरी हो तथा सब प्रकार अभ्युदयशील हो, ऐसी स्थिति में मेरे सिवा और दूसरी कौन सी स्त्री दुःख भोगने के लिए विवश हुई होगी-

भ्रातृभिः श्वसुरैः पुत्रैर्बहुभिः परिवारिता ।

एवं सुमुदिता नारी का त्वन्या दुःखिता भवेत् ।।-(२०-१३)

द्रौपदी स्वयं कहती है उसके बहुत से भाई हैं, बहुत से श्वसुर हैं, बहुत से पुत्र भी हैं,फिर भी वह दुःखी है। यदि बहुत से पति होते तो सबसे पहले यही कहती कि जिसके पाँच-पाँच पति हैं, वह मैं दुःखी हूँ,पर होते तब ना।

🔸और जब भीम ने द्रौपदी को,कीचक के किये का फल देने की प्रतिज्ञा कर ली और कीचक को मार-मारकर माँस का लोथड़ा बना दिया तब अन्तिम श्वास लेते कीचक को उसने कहा था, *"जो सैरन्ध्री के लिए कण्टक था,जिसने मेरे भाई की पत्नी का अपहरण करने की चेष्टा की थी, उस दुष्ट कीचक को मारकर आज मैं अनृण हो जाऊंगा और मुझे बड़ी शान्ति मिलेगी।"

अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम् ।

शांति लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रीकण्टकम् ।।-(विराट २२-७९)

इस पर भी कोई भीम को द्रौपदी का पति कहता हो तो क्या करें? मारने वाले की लाठी तो पकड़ी जा सकती है, बोलने वाले की जीभ को कोई कैसे पकड़ सकता है?

🔸द्रौपदी को दांव पर लगाकर हार जाने पर जब दुर्योधन ने उसे सभा में लाने को दूत भेजा तो द्रौपदी ने आने से इंकार कर दिया। उसने कहा जब राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं अपने को दांव पर लगाकर हार चुका था तो वह हारा हुआ मुझे कैसे दांव पर लगा सकता है? महात्मा विदुर ने भी यह सवाल भरी सभा में उठाया। द्रौपदी ने भी सभा में ललकार कर यही प्रश्न पूछा था -क्या राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं को हारकर मुझे दांव पर लगा सकता था? सभा में सन्नाटा छा गया।* किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। तब केवल भीष्म ने उत्तर देने या लीपा-पोती करने का प्रयत्न किया था और कहा था, *"जो मालिक नहीं वह पराया धन दांव पर नहीं लगा सकता परन्तु स्त्री को सदा अपने स्वामी के ही अधीन देखा जा सकता है।"-

अस्वाभ्यशक्तः पणितुं परस्व ।स्त्रियाश्च भर्तुरवशतां समीक्ष्य ।-(२०७-४३)

"ठीक है युधिष्ठिर पहले हारा है पर है तो द्रौपदी का पति और पति सदा पति रहता है, पत्नी का स्वामी रहता है।"

यानि द्रौपदी को युधिष्ठिर द्वारा हारे जाने का दबी जुबान में भीष्म समर्थन कर रहे हैं। यदि द्रौपदी पाँच की पत्नी होती तो वह ,बजाय चुप हो जाने के पूछती,जब मैं पाँच की पत्नी थी तो किसी एक को मुझे हारने का क्या अधिकार था? द्रौपदी न पूछती तो विदुर प्रश्न उठाते कि "पाँच की पत्नि को एक पति दाँव पर कैसे लगा सकता है? यह न्यायविरुद्ध है।"

स्पष्ट है द्रौपदी ने या विदुर ने यह प्रश्न उठाया ही नहीं। यदि द्रौपदी पाँचों की पत्नी होती तो यह प्रश्न निश्चय ही उठाती।_

इसीलिए भीष्म ने कहा कि द्रौपदी को युधिष्ठिर ने हारा है। युधिष्ठिर इसका पति है। चाहे पहले स्वयं अपने को ही हारा हो, पर है तो इसका स्वामी ही। और नियम बता दिया - जो जिसका स्वामी है वही उसे किसी को दे सकता है,जिसका स्वामी नहीं उसे नहीं दे सकता।

🔸 द्रौपदी कहती है- "कौरवो ! मैं धर्मराज युधिष्ठिर की धर्मपत्नि हूं।तथा उनके ही समान वर्ण वाली हू।आप बतावें मैं दासी हूँ या अदासी?आप जैसा कहेंगे,मैं वैसा करुंगी।"-

तमिमांधर्मराजस्य भार्यां सदृशवर्णनाम् ।

ब्रूत दासीमदासीम् वा तत् करिष्यामि कौरवैः ।।-(६९-११-९०७)

द्रौपदी अपने को युधिष्ठिर की पत्नी बता रही है।

🔸पाण्डव वनवास में थे दुर्योधन की बहन का पति सिंधुराज जयद्रथ उस वन में आ गया। उसने द्रौपदी को देखकर पूछा -तुम कुशल तो हो?द्रौपदी बोली सकुशल हूं।मेरे पति कुरु कुल-रत्न कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर भी सकुशल हैं।मैं और उनके चारों भाई तथा अन्य जिन लोगों के विषय में आप पूछना चाह रहे हैं, वे सब भी कुशल से हैं। राजकुमार ! यह पग धोने का जल है। इसे ग्रहण करो।यह आसन है, यहाँ विराजिए।-

कौरव्यः कुशली राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः

अहं च भ्राताश्चास्य यांश्चा न्यान् परिपृच्छसि ।-(१२-२६७-१६९४)

द्रौपदी भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव को अपना पति नहीं बताती,उन्हें पति का भाई बताती है।

और आगे चलकर तो यह एकदम स्पष्ट ही कर देती है। जब युधिष्ठिर की तरफ इशारा करके वह जयद्रथ को बताती है---

एतं कुरुश्रेष्ठतमम् वदन्ति युधिष्ठिरं धर्मसुतं पतिं मे ।-(२७०-७-१७०१)

"कुरू कुल के इन श्रेष्ठतम पुरुष को ही ,धर्मनन्दन युधिष्ठिर कहते हैं। ये मेरे पति हैं।"

क्या अब भी सन्देह की गुंजाइश है कि द्रौपदी का पति कौन था?

🔸कृष्ण संधि कराने गए थे। दुर्योधन को धिक्कारते हुए कहने लगे"-- दुर्योधन! तेरे सिवाय और ऐसा अधम कौन है जो बड़े भाई की पत्नी को सभा में लाकर उसके साथ वैसा अनुचित बर्ताव करे जैसा तूने किया। -

कश्चान्यो भ्रातृभार्यां वै विप्रकर्तुं तथार्हति ।

आनीय च सभां व्यक्तं यथोक्ता द्रौपदीम् त्वया ।।-(२८-८-२३८२)

कृष्ण भी द्रौपदी को दुर्योधन के बड़े भाई की पत्नी मानते हैं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पांडे की जयंती आज || Mangal Pandey Birth Anniversary : 19 जुलाई ||

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पांडे की जयंती आज

मंगल पांडे, यह नाम किसी भी पहचान का मोहताज नहीं, देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत मंगल पांडे ने की थी। मंगल पांडे ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पहली गोली चलाई थी। मंगल पांडे ने देश में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की जो चिंगारी जलाई थी, वह कहीं ज्वाला का रूप ना ले ले इस डर से अंग्रेज प्रशासन ने उन्हें फांसी की सजा तय दिन से 10 दिन पहले ही दे दी थी।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पांडे की जयंती आज || Mangal Pandey Birth Anniversary : 19 जुलाई ||

आज मंगल पांडे जी की जन्म तिथि पर जानते हैं, अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता का बिगुल बजाने वाले मंगल पांडे की वीर गाथा। 

देश के पहले स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। वह सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार से थे। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे और मां का नाम अभय रानी पांडे था। उनका उनका बचपन आम बच्चों की तरह ही बीता। 1849 में मात्र 22 वर्ष की उम्र में वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में बंगाल नेटिव इन्फेंट्री (BNI) बटालियन की 34वीं रेजीमेंट में पैदल सेना के सिपाही के रूप में भर्ती किए गए। इस रेजीमेंट में ज्यादातर ब्राह्मणों को ही भर्ती किया जाता था।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पांडे की जयंती आज || Mangal Pandey Birth Anniversary : 19 जुलाई ||

1850 में सिपाहियों के लिए नई इनफील्ड राइफल लाई गई। इन नई इनफील्ड राइफलों के कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी मिली होती थी। इस कारतूसों को उपयोग करने से पहले  मुंह से काटना पड़ता था। ऐसे में यह बात हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिमों की धार्मिक भावनाओं के साथ भी खिलवाड़ था। 

मंगल पांडे ने इस बात का विरोध किया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 29 मार्च 1957 को मंगल पांडे ने विद्रोह कर कारतूस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया, जिसके चलते उन्हें सेना से निकाल दिया गया। पांडे ने विद्रोह करते हुए कई सिपाहियों को साथ ले लिया और अंग्रेज अफसर हेअरसेय पर हमला बोल दिया। उन्होंने 'मारो फिरंगी को' का नारा दिया था। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उनका कोर्ट मार्शल हुआ। मुकदमे के दौरान उन्होंने अंग्रेज अफसरों के खिलाफ विद्रोह की बात स्वीकार ली और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। तय किया गया कि उन्हें 18 अप्रैल को फांसी दी जाएगी, लेकिन अंग्रेजों को डर था कि पांडे द्वारा फूंका गया बिगुल जल्द ही आग की तरह पूरे हिंदुस्तान में फैल जाएगा। भारी विद्रोह के अंदेशे के भयवश तय दिन से 10 दिन पहले ही मंगल पांडे को 8 अप्रैल को ही फांसी दे दी थी। 

English Translate

Today is the birth anniversary of Mangal Pandey, the forerunner of the Indian freedom struggle

Mangal Pandey, this name does not need any recognition, every child of the country knows that Mangal Pandey started the country's first freedom struggle. Mangal Pandey is such a freedom fighter, who fired the first shot against the British Government. Fearing that the spark of rebellion against the British that Mangal Pandey had lit in the country might turn into a flame, the British administration had given him the death sentence 10 days before the scheduled day.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पांडे की जयंती आज || Mangal Pandey Birth Anniversary : 19 जुलाई ||
Today, on the birth date of Mangal Pandey, we know the heroic story of Mangal Pandey, who played the bugle of freedom against the British.
The country's first freedom fighter Mangal Pandey was born on 19 July 1827 in Nagwa village of Ballia district of Uttar Pradesh. He belonged to Saryuparin Brahmin family. His father's name was Diwakar Pandey and mother's name was Abhay Rani Pandey. His childhood was spent like ordinary children. In 1849, at the age of 22, he joined the British East India Company's army as an infantry soldier in the 34th Regiment of the Bengal Native Infantry (BNI) Battalion. Mostly Brahmins were recruited in this regiment.
In 1850 a new Enfield rifle was introduced for the sepoys. The cartridges of these new Enfield rifles were mixed with cow and pig fat. These cartridges had to be cut from the mouth before use. In such a situation, this thing was playing with the religious sentiments of Hindus as well as Muslims.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पांडे की जयंती आज || Mangal Pandey Birth Anniversary : 19 जुलाई ||
Mangal Pandey opposed this and opened a front against the British rule. On 29 March 1957, Mangal Pandey rebelled and refused to use cartridges, due to which he was expelled from the army. Pandey revolted and took many soldiers with him and attacked the British officer Hearsey. He gave the slogan 'Maro Firangi Ko'. He was later arrested and court martialled. During the trial, he confessed to mutiny against the British officers and was sentenced to death. It was decided that he would be hanged on 18 April, but the British feared that the bugle blown by Pandey would soon spread like a fire across India. Mangal Pandey was hanged on 8th April itself, 10 days before the scheduled day due to the apprehension of heavy rebellion.

मलौट किला, होशियारपुर (पंजाब) (होशियारपुर का अज्ञात स्थान)

मलौट किला, होशियारपुर (पंजाब)

मलौट किला, होशियारपुर (पंजाब), इस किले का इतिहास 537 वर्ष से अधिक पुराना है। हालांकि इसके विषय में बहुत जानकारी उपलब्ध नहीं है। "इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया", 1908 तथा बाबरनामा से ली गयी कुछ जानकारियाँ सोशल साइट्स पर उपलब्ध हैं। किसी जमाने में जहाँ एशिया की सबसे बड़ी लायब्रेरी हुआ करती थी, होशियारपुर के जंगलों में बसा वह गांव जहाँ मलोट का किला है, वर्तमान में अपनी हालात पर आंसू बहा रहा है और जमीन में दफन होने की कगार पर पहुंच चुका है। 

जानते हैं इस किले के इतिहास जुड़ी कुछ बातें। 

मलौट किला, होशियारपुर (पंजाब) (होशियारपुर का अज्ञात स्थान)

यह किला होशियारपुर से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर कंडी में बसा गांव मलोट है, जो इतिहास के पन्नों में मौजूद तो है, पर अब धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका है। यह किला बहलोल लोधी के समय में बनाया गया था, जो अब जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है। 1500 इस्वी के करीब लाहौर के सुल्तान बहलोल शाह लोधी ने यहाँ एक बेहतरीन किला बनवाया था, जिसमें एशिया की सबसे बड़ी लायब्रेरी हुआ करती थी। अक्सर बहलोल शाह लोधी इस इलाके में जंगल होने के कारण शिकार खेलने के लिए अपने साथियो के साथ आ कर कई कई दिनों तक रहता था।

मलौट किला, होशियारपुर (पंजाब) (होशियारपुर का अज्ञात स्थान)

उसी समय पर बाबर ने एक शक्तिशाली फौज तैयार कर छोटी-छोटी रियासतों को लूटना और कब्जा करना शुरू कर दिया था। सन् 1520 के आस-पास बाबर अपनी फौज को लेकर गांव मलोट में बने इस किले को लूट की नियत से ढूंढ रहा था। मगर जंगल में किला होने के कारण उसे काफी कठनाईयों का सामना करना पड़ रहा था। इसीलिए उसने अपनी फौज के साथ ज़िला होशियारपुर के गांव हरयाणा के नजदीक गांव टक्की में डेरा डाला। वहीँ यहाँ पर पानी की कमी के चलते बाबर ने एक कुएं का निर्माण भी करवाया। 

मलौट किला, होशियारपुर (पंजाब) (होशियारपुर का अज्ञात स्थान)

1525-1530 के दौरान बाबर, दौलत खान लोदी और गोरी खान से आगे निकलने के लिए अनिच्छुक था, जो आतंक से घिरे हुए थे और खुद को होशियारपुर जिले में हरियाना के पास मलोट के किले में बंद किये थे। बाबर ने काहनुवान के सामने ब्यास नदी को पार किया और शिवालिक पहाड़ियों की घाटी के मुहाने पर पड़ाव डाला, जिसमें मलौत का किला है। बाबर ने किले पर कब्जा कर लिया और दौलत खान को बंदी बना लिया। बाबर ने दिल्ली के रास्ते बजवारा, रूपनगर, सरहिंद और सुनाम के रास्ते मार्च किया।

मलौट किला, होशियारपुर (पंजाब) (होशियारपुर का अज्ञात स्थान)

मलोट किले की बहुमूल्य पुस्तकें, बाबर ने किले पर कब्जा करने के बाद हमायूँ और कामरान को सौंप दिया था, उस समय शेर शाह सूर के शासनकाल में हामिद खान कक्कड़ मलोट के किले का प्रभारी था।

English Translate

Malout Fort, Hoshiarpur (Punjab)

Malout Fort, Hoshiarpur (Punjab), The history of this fort is more than 537 years old. Although there is not much information available about it. Some information taken from "Imperial Gazetteer of India", 1908 and Baburnama is available on social sites. Once home to Asia's largest library, the village situated in the forests of Hoshiarpur where the Malot fort is situated, is currently shedding tears for its condition and is on the verge of being buried in the ground.

Know some things related to the history of this fort.

This fort is only 20 kilometers away from Hoshiarpur, situated in Kandi village Malot, which is present in the pages of history, but now it has gradually reached the verge of extinction. This fort was built during the time of Bahlol Lodhi, which is now in a dilapidated condition. Around 1500 AD, Bahalol Shah Lodhi, the Sultan of Lahore, had built an excellent fort here, which used to have Asia's largest library. Often Bahlol Shah Lodhi used to stay in this area for many days with his companions to play hunting because of the forest.

At the same time, Babur had prepared a powerful army and started looting and capturing small princely states. Around the year 1520, Babur was looking for this fort built in village Malot with the intention of plundering it. But due to being a fort in the forest, he was facing a lot of difficulties. That's why he along with his army camped in village Takki near Haryana village of district Hoshiarpur. At the same time, due to lack of water here, Babar also got a well constructed.

During 1525–1530 Babur was reluctant to overrun Daulat Khan Lodi and Ghori Khan, who were terror-stricken and shut themselves up in the fort of Malot near Haryana in the Hoshiarpur district. Babur crossed the Beas river opposite Kahnuwan and encamped at the mouth of the valley of the Shivalik hills, which contains the fort of Malout. Babur captured the fort and made Daulat Khan a prisoner. Babur marched through Delhi via Bajwara, Rupnagar, Sirhind and Sunam.

The valuable books of Malot Fort, Babur handed over to Humayun and Kamran after capturing the fort, Hamid Khan Kakkar was in charge of the fort of Malot during the reign of Sher Shah Sur.

बीकानेर की विरांगना राजरानी किरण देवी

बीकानेर की विरांगना राजरानी किरण देवी

यूं तो राजपूत कूल का जब जिक्र होता है, तो गौरवशाली इतिहास नज़रों में यकायक अपनी छवि स्वयम बना लेता है। राजपूतों के शौर्य और बलिदानों की अमर गाथाओं से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं, परंतु आज हम बात करने जा रहे हैं, बीकानेर की विरांगना राजरानी किरण देवी की। 

बीकानेर की विरांगना राजरानी किरण देवी

भारतीय नारी की सहन क्षमता उसके दृढ़ संकल्प विश्वास से दुनिया में सभी भली भाती बाकिफ हैं। अपने सतीत्व एवं पतिव्रता धर्म के मार्ग पर चलते हुए उसकी रक्षा करना ही भारतीय नारी की पहचान है। उनके जीवन का आदर्श है। उनके सतीत्व से कितने बड़े बड़े साम्राज्य तिनके की तरह बिखर गए, ऐसी थी राजरानी किरण देवी, जिनकी लोक गाथा को इतिहासकारों ने अपने अपने हिसाब से वर्णित किये हैं। 

सर्वप्रथम जान लेते हैं कौन हैं राजरानी किरण देवी

राजरानी किरण देवी मेवाड़ सूर्य महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह की कन्या थीं, जिनका विवाह बीकानेर नरेश के भाई महाराज पृथ्वी सिंह से हुआ था। ये वही किरण देवी हैं, जिनकी कविता ने राणा प्रताप में पुन: राजपूतानों का जोश ला दिया था और फिर उनहोंने किसी भी हालत में अकबर से संधि की बातचीत स्वीकार नहीं की थी।

आप सभी बेहतर जानते हैं अकबर और राणा प्रताप की हट तथा राणा प्रताप का मातृभूमि प्रेम। एक समय अकबर जहाँ अपनी कूटनीति छल कपट से सारे राज्यों पर अधिकार जमाता रहा था, बड़े-बड़े राजपूत-घरानों ने अपनी सांस्कृतिक परम्परा और मान-सम्मान की उपेक्षा करना आरंभ कर दिया था, मेवाड़ छोडकर अन्य राजपूत रियासतों ने अकबर का लोहा मान लिया था, वहीँ पृथ्वीराज अपनी इस वीर रानी के साथ दिल्ली में ही रहते थे। किरण देवी परम सुन्दरी और सुशीला थीं। अकबर उसे अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता था। अकबर शक्तिशाली सम्राट अवश्य था, किंतु कुछ गलत आदतें उसके हृदय में रात-दिन धधका करती थी। वहीँ दिल्ली के शक्तिशाली सम्राट की अभिलाषाओं की पूर्ति के लिये काफी शक्ति और साधन सम्पन्नता की आवश्यकता थी।

सभी जानते है अपनी गलत इच्छाओं की तृप्ति करने के लिये ही अकबर हर साल दिल्ली में ‘नौरोज’ का मेला लगवाता था, जिसमें राजपूतों की तथा दिल्ली की अन्य स्त्रियाँ  मेले के बाजार में आया करती थीं। जहाँ से अपहरण कर स्त्रियों को अकबर के आरामगाह में छोड़ा जाता था। इस मेले में पुरुषों को जाने की आज्ञा नहीं दी जाती थी। अकबर स्त्री के वेश में इस मेले में घुमा करता था। जिन सुन्दरी पर अकबर मुग्ध हो जाता था, उसी स्त्री को उठवा लिया जाता था और अकबर के महल में ले  था।

इन्हीं सब के बीच अकबर की आँखे बहुत दिनों से किरण देवी पर लगी हुई थी, परन्तु वो इस बात को भूल बैठा था कि ये उसी सिसोदिया राजघराने की सिंहनी है, जिस घराने के पुत्र राणा से जीतने का कोई स्वप्न में भी न सोंच सका था। वो रानी किरण देवी की वीरता से अनजान था। यही उसकी जीवन की बड़ी भूल साबित हुई। वह नहीं जानता था कि भारतीय नारियों ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिये अपने प्राणों तक की चिंता नहीं की और आग में जल-जलकर खुद को बलिदान कर दिया है। महारानी पद्मिनी की चिता की जलती राख का दर्शन उसकी पापी आँखों ने नहीं किया था। एक रोज जब मेले में मीना बाजार की सजावट देखने रानी किरण देवी आयीं तो अकबर के आदमियों ने अकबर के संकेत से राजरानी किरण देवी को धोखे से उठाकर महल पर पहुँचा दिया, जहाँ अकबर ने उसे घेर लिया और नाना प्रकार के प्रलोभन दिये। 

किरण देवी की तेजस्विता की प्रखर किरणों से अकबर की इच्छाएं भभकती जा रही थी और जैसे ही अकबर ने उस राजपूत रमणिका को स्पर्श करने के लिये अपने हाथ बढ़ाये, उसी पल ही उस रणचण्डी ने कमर से तेज कटार निकाली और शुंभ-निशुम्भ की तरह उसे धरती पर पटककर छाती पर पैर रखकर कहा – ‘नीच! नराधम! भारत का सम्राट होते हुए भी तूने इतना बड़ा पाप करने की कुचेष्टा की। भगवान ने सती साध्वियों की रक्षा के लिये तुझे बादशाह बनाया है और तू उनपर जोर जबरदस्ती करता है। दुष्ट! अधम! तू बादशाह नहीं, नीच है, पिचाश है; तुझे पता नहीं कि मैं किस कुल की कन्या हूँ। सारा भारत तेरे पाँवों पर सिर झुकाता है, परंतु मेवाड़ का सिसोदिया-वंश का अभी भी सिर ऊँचा खड़ा है। 

मैं उसी पवित्र राजवंश की कन्या हूँ। मेरी धमनियों में बप्पा रावल और साँगा का रक्त है। मेरे अंग-अंग में पावन क्षत्रिय वीरांगनाओं के चरित्र की पवित्रता है। तू बचना चाहता है, तो मन में सच्चा पश्चाताप करके अपनी माता की शपथ खाकर प्रतिज्ञा कर कि अब से ‘नौरोजी’ का मेला नहीं होगा और किसी भी नारी पर तू अपनी गन्दी दृष्टी नहीं डालेगा। नहीं तो, आज इसी तेज धार कटार से तेरा काम तमाम करती हूँ।

बीकानेर की विरांगना राजरानी किरण देवी

अकबर के शरीर का खून सूख गया। उसके दोनों हाथ थरथर काँपने लगे उसने करुण स्वर में बड़ा पश्चात्ताप करते हुए हाथ जोडकर कहा, ‘माँ ! क्षमा कर दो, मेरे प्राण तुम्हारे हाथों में है, पुत्र प्राणों की भीख चाहता है। उसने प्रण किया कि अब नौरोज का मेला और मीना बाजार नहीं सजेगा। यह अकबर के चरित्र के बड़े कलंक हैं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।

किरण देवी सतीत्व की प्रखर किरण थीं, जिसके आलोक ने सारे देश को पतिव्रत्य की आभा से जगमगा दिया। शत शत नमन है ऐसी विरंगना के श्री चरणों में जिन्होने इतने बड़े सम्राट बादशाह अकबर को भी अपनी जान की भीख मांगने एवं अपने चरणों पर झुकने को मजबूर कर दिया ।

कुछ इतिहासकरों का मत है कि किरण देवी का नाम जयावती (या जोशीबाई) था। नाम कुछ भी हो, काम से ही लोगों की प्रसिद्धि होती है एवम राजरानी किरण देवी ने दिखा दिया कि नारी सिर्फ कहलाने को अबला होती है। नारी से बलवान कोई राजा महाराजा सम्राट बादशाह कोई नहीं। नारी कभी माँ, बहन, बेटी हर रूप में वंदनीय है। 

कैसे मिला भीम को दस हजार हाथियों का बल

कैसे मिला भीम को दस हजार हाथियों का बल

महाभारत तो हर हिंदुस्तानी ने देखी होगी और महाभारत कथा से सभी अवगत हैं। महाभारत में कई योद्धा बहुत ही शक्तिशाली थे, परंतु उनमें से पांडु पुत्र भीम के लिए यह कहा जाता है कि भीम के अंदर 10000 हाथियों का बल था। साधारण  मनुष्य से दिखने वाले भीम के अंदर 10000 हाथियों का बल कहां से आया? इस रहस्य के बारे में शायद कम लोगों को ही पता होगा। तो चलिए आज जानते हैं इस रहस्य के बारे में। 

कैसे मिला भीम को दस हजार हाथियों का बल

जैसा कि सर्व विदित है कि भीम के पिता का नाम पांडु और माता का नाम कुंती था। उनके बड़े भाई धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव थे। महाभारत के अनुसार जब पांडवों का जन्म हुआ, उसके कुछ दिन बाद पांडु का निधन हो गया। उस समय पांडु अपनी पत्नी कुंती और माद्री के साथ वन में रहते थे।

पाण्डु की मृत्यु के पश्चात पांडव हस्तिनापुर आ गए, जहां उनके वैदिक संस्कार सम्पन्न हुए। पाण्डव तथा कौरव साथ ही खेलने लगे। दौडऩे में, निशाना लगाने तथा कुश्ती आदि सभी खेलों में भीम सभी धृतराष्ट्र पुत्रों को हरा देते थे। इससे दुर्योधन के मन में भीमसेन के प्रति दुर्भावना पैदा हो गई। भीमसेन को मार डालने के उद्देश्य से दुर्योधन ने एक बार खेलने के लिए गंगा तट पर शिविर लगवाया। उस स्थान का नाम रखा उदकक्रीडन। 

कैसे मिला भीम को दस हजार हाथियों का बल

दुर्योधन ने पाण्डवों को भी वहां बुलाया और मौका पाकर दुर्योधन ने भीम के भोजन में विष मिला दिया। विष के असर से भीम अचेत हो गए। अचेत अवस्था में दुर्योधन ने दु:शासन के साथ मिलकर भीम को गंगा में डाल दिया। भीम इसी अवस्था में नागलोक पहुंच गए जहां सांपों ने भीम को खूब डंसा जिसके प्रभाव से विष का असर कम हो गया। 

जब भीम को होश आया तो वे सर्पों को मारने लगे। सभी सर्प डरकर नागराज वासुकि के पास गए और पूरी बात बताई, तब वासुकि स्वयं भीमसेन के पास गए। उनके साथ आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया। आर्यक नाग भीम के नाना का नाना थे। वह भीम से बड़े प्रेम से मिले। तब आर्यक ने वासुकि से कहा कि भीम को उन कुण्डों का रस पीने की आज्ञा दी जाए जिनमें हजारों हाथियों का बल है। वासुकि ने इसकी स्वीकृति दे दी। 

कैसे मिला भीम को दस हजार हाथियों का बल

तब भीम आठ कुण्ड पीकर एक दिव्य शय्या पर सो गए और आठवें दिन रस पच जाने पर जागे। तब नागों ने भीम को गंगा के बाहर छोड़ दिया। भीम के सकुशल देखकर जहां माता कुंती और उनके भाइयों को संतोष हुआ वहीं दुर्योधन और दु:शासन तिलमिला उठे। 

हस्तिनापुर पहुंचने के बाद भीन ने माता कुंती और अपने भाइयों को दुर्योधन द्वारा देकर गंगा में फेंकने और विष और नागों द्वारा उन्हें हजार हाथियों के बल की बात बताई। तब युधिष्ठिर ने भीम से कहा कि वो यह बात किसी को भी न बताएं और पांडवों ने इसे गुप्त ही रखा।

English Translate

How did Bhima get the strength of ten thousand elephants

Every Indian must have seen the Mahabharata and everyone is aware of the Mahabharata story. Many warriors were very powerful in Mahabharata, but among them it is said for Pandu's son Bhima that Bhima had the strength of 10000 elephants. Where did the strength of 10,000 elephants come from inside Bhima who is visible to an ordinary man? Perhaps only a few people would know about this secret. So let's know about this secret today.

As is well known that Bhima's father's name was Pandu and mother's name was Kunti. His elder brothers were Dharmaraja Yudhishthira, Arjuna, Nakula and Sahadeva. According to the Mahabharata, when the Pandavas were born, Pandu died a few days later. At that time Pandu lived in the forest with his wife Kunti and Madri.

After the death of Pandu, the Pandavas came to Hastinapur, where their Vedic rites were performed. Pandavas and Kauravas started playing together. Bhima used to defeat all the sons of Dhritarashtra in running, shooting and wrestling etc. Due to this Duryodhana's mind developed a grudge against Bhimsen. With the aim of killing Bhimsen, Duryodhana once set up a camp on the banks of the Ganges to play. That place was named Udakridan.

Duryodhana also called the Pandavas there and taking the opportunity, Duryodhana mixed poison in Bhima's food. Bhim became unconscious due to the effect of poison. In an unconscious state, Duryodhana, along with Dushasana, threw Bhima into the Ganges. Bhima reached Naglok in this condition where snakes stung Bhima a lot, due to which the effect of poison reduced.

When Bhima regained consciousness, he started killing snakes. All the snakes went to Nagraj Vasuki in fear and told the whole thing, then Vasuki himself went to Bhimsen. Aryak Nag recognized Bhima with him. Aryak Nag was the maternal grandfather of Bhima. He met Bhima with great love. Then Aryak told Vasuki that Bhima should be allowed to drink the juice of those pools which have the strength of thousands of elephants. Vasuki approved it.

Then Bhima slept on a divine bed after drinking eight pots and woke up on the eighth day after the juice was digested. Then the serpents left Bhima outside the Ganges. Where mother Kunti and her brothers were satisfied on seeing Bhima safely, Duryodhana and Dushasan were shocked.

After reaching Hastinapur, Bhin told mother Kunti and her brothers about throwing them in the Ganges by Duryodhana and the strength of a thousand elephants by poison and snakes. Then Yudhishthira told Bhima not to tell this thing to anyone and the Pandavas kept it a secret.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान

लोद्रवा राजस्थान राज्य के जैसलमेर जिला का एक गांव है। लोद्रवा जैसलमेर से 15 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में स्थित है। 

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

 लोदरवा या लोध्रुवा या लोद्रवा भाटी राजपूत साम्राज्य था। प्रारंभिक भाटी शासकों ने आधुनिक समय के अफगानिस्तान में गजनी से लेकर आधुनिक पाकिस्तान में सियालकोट, लाहौर और रावलपिंडी से लेकर आधुनिक भारत में भटिंडा, मुक्तसर और हनुमानगढ़ तक बड़े साम्राज्य पर शासन किया था, लेकिन मध्य एशिया से लगातार आक्रमण के कारण साम्राज्य समय के साथ चरमरा गया।

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

भाटी वंश के रावल देवराज ने आठवीं शताब्दी में लोदूर्वा को राजधानी के रूप में स्थापित किया था। यह शहर थार मरुस्थल से होते हुए एक प्राचीन व्यापार मार्ग पर था, जिससे यहां बार-बार हमले होने लगे और इस शहर को लूट लिया जाता था। गजनी के महमूद ने 1025 ईसवी में शहर की घेरा बंदी की। 1178 में मुहम्मद गोरी द्वारा इसे फिर से तोड़ दिया गया था, जिस कारण इस शहर का परित्याग कर दिया गया। 1156 सी.ई. में रावल जैसल द्वारा जैसलमेर की नई गढ़वाली राजधानी की स्थापना की गई। जैसलमेर 16 किलोमीटर दूर त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित था जहां आज का किला खड़ा है।

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

लोद्रवा एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जो अपने वास्तुशिल्प खंडहरों और आसपास के रेत के टीलों के लिए जाना जाता है। लोद्रवा 23वें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित जैन मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है।इस मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त हर पत्थर की तराश में स्थापत्य के सौंदर्य को देखा जा सकता है। भवन में पत्थरों की जटिल नक्काशी है, और विशाल भीतरी भाग है जिसे खुशनुमा और आरामदायक समय बिताने के लिए बनाया गया है।पत्थरों को काटकर खूबसूरत जाली का रूप दिया गया है जो हमें आश्चर्य में डाल देता है।मंदिर के गर्भ गृह के छत पर भी बढ़िया कारीगरी की गई है काफी प्राचीन होने के बावजूद समय-समय पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा है इसलिए यह आज भी बढ़िया स्थिति में है।मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही चौक में 25 फीट ऊंचा भव्य द्वार (तोरण) बना हुआ है इस पर बारीक कारीगरी करके सुंदर आकृतियां उकेरी गई हैं।मूल मंदिर 1178 सीई में नष्ट कर दिया गया था, जब मोहम्मद गोरी ने शहर पर हमला किया था।लेकिन 1615 में सेठ थारू शाह द्वारा 1675 और 1687 में इसे और जोड़ने के साथ पुनर्निर्मित किया गया था।

लोदरवा एक इच्छा पूर्ति करने वाले पेड़ के लिए भी मशहूर है, जिसे कल्पवृक्ष कहा जाता है। कल्प वृक्ष जैन धर्म के अनुयायियों के लिए समृद्धि और शांति का द्योतक है।

इसके अलावा लोद्रवा स्थित काक नदी के किनारे रेत में दबी भगवान शिव की एक अनोखी मूर्ति है, जिसके 4 सिर हैं।

कहा जाता है कि लोद्रवा में राजकुमारी मूमल और अमरकोट के राजकुमार महेंद्र की नाकाम प्रेम की दास्तान ए छुपी हुई हैं, जो पूरे क्षेत्र की लोक कथाओं और लोक गाथाओं में सुनाई जाती है।

English Translate

Lodrava: A Historical Place

Lodrava is a Village in Jaisalmer District of Rajasthan State. Lodrava is located 15 km north west of Jaisalmer.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

 Lodarwa or Lodhruva or Lodrava Bhati was a Rajput kingdom. The early Bhati rulers ruled large empires from Ghazni in modern-day Afghanistan to Sialkot, Lahore and Rawalpindi in modern-day Pakistan to Bhatinda, Muktsar and Hanumangarh in modern-day India, but due to frequent invasions from Central Asia, the empire grew over time. Crashed.

Rawal Devraj of Bhati dynasty established Lodurva as the capital in the eighth century. The city was on an ancient trade route through the Thar Desert, due to which the city was repeatedly attacked and plundered. Mahmud of Ghazni laid siege to the city in 1025 AD. It was again demolished by Muhammad Ghori in 1178, leading to the abandonment of the city. 1156 CE The new Garhwali capital of Jaisalmer was established by Rawal Jaisal in AD. Jaisalmer was located 16 km away on the Trikuta hill where the fort stands today.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

Lodrava is a popular tourist destination, known for its architectural ruins and the surrounding sand dunes. Lodrava is also famous for the Jain temple dedicated to the 23rd Jain Tirthankara Parshvanath. The architectural beauty can be seen in the carvings of every stone used in the construction of this temple. The building has intricate stone carvings, and a spacious interior designed to make for a pleasant and relaxing time. Good workmanship has also been done, despite being quite ancient, this temple has been renovated from time to time, so it is still in good condition. On entering the temple premises, there is a 25 feet high grand gate (pylon) in the square. It has finely crafted beautiful figures. The original temple was destroyed in 1178 CE, when Mohammad Ghori attacked the city. But it was rebuilt in 1615 by Seth Tharu Shah with further additions in 1675 and 1687. went.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

Lodarwa is also famous for a wish fulfilling tree called Kalpavriksha. The Kalpa tree is a symbol of prosperity and peace for the followers of Jainism.

Apart from this, there is a unique idol of Lord Shiva buried in the sand on the banks of Kak river located in Lodrava, which has 4 heads.

लोद्रवा: एक ऐतिहासिक स्थान || Lodrava: A Historical Place ||

Lodrava is said to have hidden the story of a failed love between Princess Mumal and Prince Mahendra of Amarkot, which is narrated in the folk tales and folk tales of the entire region.

दुर्गावती देवी या दुर्गा भाभी

दुर्गावती देवी या  दुर्गा भाभी

आज एक ऐसी विदुषी महिला के बारे में बात करेंगे, जिन्हें इतिहास के पन्नों में उचित स्थान ना मिल सका, जिन्होंने आजाद भारत के लिए सीखा था बम बनाना और जिनसे अंग्रेज भी खाते थे खौफ, यह दुर्गा भाभी हैं, वही दुर्गा भाभी जिन्होंने साण्डर्स वध के बाद राजगुरू और भगतसिंह को लाहौर से अंग्रेजों की नाक के नीचे से निकालकर कोलकत्ता ले गयीं। इनके पति क्रन्तिकारी भगवती चरण वोहरा थे। ये भी कहा जाता है कि चंद्रशेखर आजाद के पास आखिरी वक्त में जो माउजर था, वो भी दुर्गा भाभी ने ही उनको दिया था। 

क्रांतिकारी वीरांगना जो अंग्रेजों के लिए वाकई बन जाती थीं रणचंडी

कौन थीं दुर्गा भाभी

दुर्गा भाभी का असली नाम दुर्गावती देवी था। इनका जन्म 7 अक्टूबर 1907 को उत्तर प्रदेश के शहजादपुर गांव में हुआ था। दुर्गावती भारत की आजादी और ब्रिटिश सरकार को देश से बाहर खदेड़ने के लिए सशस्त्र क्रांति में सक्रिय भागीदार थीं। जब वह भगत सिंह और उनके दल में शामिल हुईं तो उन्हें आजादी के लिए लड़ने का मौका भी मिल गया।

दुर्गावती देवी का विवाह 11 साल की उम्र में ही हो गया था। उनके पति का नाम भगवती चरण वोहरा था, जो कि हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे। इस एसोसिएशन के अन्य सदस्य उन्हें दुर्गा भाभी कहते थे। इसीलिए वह इसी नाम से प्रसिद्ध हो गईं। 16 नंवबर 1926 को लाहौर में करतार सिंह सराभी की शहादत की 11वीं वर्षगांठ मनाने को लेकर दुर्गा भाभी चर्चा में आईं थीं।
भारत की आयरन लेडी 'दुर्गा भाभी', जिनका नाम सुनते ही अंग्रेजों के निकल जाते थे पसीने

दुर्गा भाभी का आजादी की लड़ाई में योगदान

दुर्गा भाभी को भारत की 'आयरन लेडी' भी कहा जाता है। बहुत ही कम लोगों को ये बात पता होगी कि जिस पिस्तौल से चंद्र शेखर आजाद ने खुद को गोली मारकर बलिदान दिया था, वह पिस्तौल दुर्गा भाभी ने ही आजाद को दी थी। इतना ही नहीं दुर्गा भाभी एक बार भगत सिंह के साथ उनकी पत्नी बन कर अंग्रेजो से बचाने के लिए उनके प्लान का हिस्सा बनी थीं। लाला लाजपत राय की मौत के बाद भगत सिंह ने साॅन्डर्स की हत्या की योजना बनाई थी। तब साॅन्डर्स और स्काॅर्ट से बदला लेने के लिए आतुर दुर्गा भाभी ने ही भगत सिंह और उनके साथियों को टीका लगाकर रवाना किया था। इस हत्या के बाद अंग्रेज उनके पीछे पड़ गए थे। दुर्गा भाभी ने उन्हें बचाने के लिए भगत सिंह के साथ भेष बदलकर शहर छोड़ दिया था। इतना ही नहीं सन् 1929 में जब भगत सिंह ने विधानसभा में बम फेंकने के बाद आत्मसमर्पण किया था उसके बाद दुर्गा भाभी ने लॉर्ड हैली की हत्या करने का प्रयास किया था। हालांकि वह बच गया था। दुर्गा भाभी ने भगत सिंह और उनके साथियों की जमानत के लिए एक बार अपने गहने तक बेच दिए थे।
जंग-ए-आजादी में कूदकर अंग्रेजों को थर्राने वाली क्रांतिकारी महिला, भगत सिंह की नकली पत्नी बन अंग्रेजों से बचाया

दुर्गा भाभी भारत की आजादी के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजो से लड़ने वालों में महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का भी विशेष महत्व है। झांसी की रानी, अहिल्या बाई और कई दमदार व्यक्तित्व की महिलाओं की जाबांजी का भारतीय इतिहास गवाह है। इन महिलाओं में एक नाम और भी शामिल हैं, वह हैं दुर्गावती देवी का।

दुर्गा भाभी भले ही भगत सिंह, सुख देव और राजगुरू की तरह फांसी पर न चढ़ी हों लेकिन कंधें से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ती रहीं। स्वतंत्रता सेनानियों के हर आक्रमक योजना का हिस्सा बनी। दुर्गा भाभी बम बनाती थीं तो अंग्रेजो से लोहा लेने जा रहे देश के सपूतों को टीका लगाकर विजय पथ पर भी भेजती थीं। 
दुर्गा भाभी, जिन्होंने आजाद भारत के लिए सीखा था बम बनाना, अंग्रेज भी खाते थे खौफ

दुर्गा भाभी का व्यक्तिगत जीवन (source Wikipedia)

दुर्गा भाभी का जन्म सात अक्टूबर 1907 को शहजादपुर ग्राम अब कौशाम्बी जिला में पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ। इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजिर थे और इनके बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन जिला में थानेदार के पद पर तैनात थे। इनके दादा पं॰ शिवशंकर शहजादपुर में जमींदार थे जिन्होंने बचपन से ही दुर्गा भाभी के सभी बातों को पूर्ण करते थे।
दुर्गा भाभी : जिन्होंने भगत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेज़ो को चटाई थी धूल!
दस वर्ष की अल्प आयु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊंचे पद पर तैनात थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें राय साहब का खिताब दिया था। भगवती चरण बोहरा राय साहब का पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे। वे क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे। वर्ष 1920 में पिता जी की मृत्यु के पश्चात भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्‍‌नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया। सन् 1923 में भगवती चरण वोहरा ने नेशनल कालेज बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की और दुर्गा भाभी ने प्रभाकर की डिग्री हासिल की। दुर्गा भाभी का मायका व ससुराल दोनों पक्ष संपन्न था। ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को 40 हजार व पिता बांके बिहारी ने पांच हजार रुपये संकट के दिनों में काम आने के लिए दिए थे लेकिन इस दंपती ने इन पैसों का उपयोग क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आजाद कराने में उपयोग किया। मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। सैकड़ों नौजवानों ने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों का बलिदान वेदी पर चढ़ाने की शपथ ली। भगत सिंह व भगवती चरण वोहरा सहित सदस्यों ने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण करते समय वोहरा जी शहीद हो गए। उनके शहीद होने के बावजूद दुर्गा भाभी साथी क्रांतिकारियों के साथ सक्रिय रहीं।
दुर्गा भाभी के बारे में जानिए जिन्होंने चंद्रशेखर आजाद तक पहुंचाई थी चर्चित बमतुल बुखारा पिस्तौल
9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चला दी थी जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज पुलिस इनके पीछे पड़ गई। मुंबई के एक फ्लैट से दुर्गा भाभी व साथी यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी। उस समय भी दुर्गा भाभी उनके साथ ही थीं। उन्होंने पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर व कानपुर में ली थी।

भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जब केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने जाने लगे तो दुर्गा भाभी व सुशीला मोहन ने अपनी बांहें काट कर अपने रक्त से दोनों लोगों को तिलक लगाकर विदा किया था। असेंबली में बम फेंकने के बाद इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा फांसी दे दी गई।

साथी क्रांतिकारियों के शहीद हो जाने के बाद दुर्गा भाभी एकदम अकेली पड़ गई। वह अपने पांच वर्षीय पुत्र शचींद्र को शिक्षा दिलाने की व्यवस्था करने के उद्देश्य से वह साहस कर दिल्ली चली गई। जहां पर पुलिस उन्हें बराबर परेशान करती रहीं। दुर्गा भाभी उसके बाद दिल्ली से लाहौर चली गई, जहां पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन वर्ष तक नजरबंद रखा। फरारी, गिरफ्तारी व रिहाई का यह सिलसिला 1931 से 1935 तक चलता रहा। अंत में लाहौर से जिलाबदर किए जाने के बाद 1935 में गाजियाबाद में प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी करने लगी और कुछ समय बाद पुन: दिल्ली चली गई और कांग्रेस में काम करने लगीं। कांग्रेस का जीवन रास न आने के कारण उन्होंने 1937 में छोड़ दिया। 1939 में इन्होंने मद्रास जाकर मारिया मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया तथा 1940 में लखनऊ में कैंट रोड के (नजीराबाद) एक निजी मकान में सिर्फ पांच बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला। आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है।

आज आज़ादी के इतने सालों के बाद भी न तो इस विरांगना को इतिहास के पन्नों में वो जगह ही मिली जिसकी वो हकदार थीं और न ही वो किसी को याद रहीं। 14अक्टूबर 1999 में वो इस दुनिया से गुमनाम ही विदा हो गयीं। एक स्मारक का नाम तक उनके नाम पर नहीं है ना ही कहीं कोई मूर्ति है। 

ऐसी वीरांगना को शत शत नमन

हाजीपुर, बिहार का दिल || Haipur, Heart of Bihar ||

हाजीपुर, एक ऐतिहासिक शहर

आज का हाजीपुर शहर महाजनपद काल में गाँव मात्र होने के बावजूद महत्त्वपूर्ण था। गंगा तट पर स्थित बस्ती का पुराना नाम उच्चकला था। मध्यकाल में बंगाल के गवर्नर‍ हाजी इलियास शाह के 13 वर्षों के शासनकाल में यह कस्बाई का रूप लेने लगा। ऐसा माना जाता है कि गंडक तट पर विकसित हुए शहर का वर्तमान नाम उसी शासक के नाम पर पड़ा है। 

हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||

गंगा और गंडक नदी के तट पर बसे इस शहर का धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व है। हिन्दू पुराणों में गज (हाथी) और ग्राह (मगरमच्छ) की लड़ाई में प्रभु विष्णु के स्वयं यहाँ आकर गज को बचाने और ग्राह को शापमुक्त करने का वर्णन है। कौनहारा घाट के पास कार्तिक पूर्णिमा को यहाँ प्रतिवर्ष मेला लगता है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी के उत्तरी और मध्य भारत में विकसित हुए 16 महाजनपदों में वैशाली का स्थान अति महत्त्वपूर्ण था। 

हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||

नेपाल की तराई से गंगा के बीच फैली भूमि पर वज्जिसंघ द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरुआत की गयी थी। वज्जिकुल में जन्में भगवान महावीर की जन्म स्थली शहर से ३५ किलोमीटर दूर कुंडलपुर (वैशाली) में है। महात्मा बुद्ध का इस धरती पर तीन बार आगमन हुआ था। भगवान बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनंद की पवित्र अस्थियाँ इस शहर (पुराना नाम- उच्चकला) में जमींदोज है।

हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||

गंगा और गंडक के पवित्र संगम स्थल की महिमा भागवत पुराण में वर्णित है। गज-ग्राह की लडाई में स्वयं श्रीहरि विष्णु ने यहाँ आकर अपने भक्त गजराज को जीवनदान और शापग्रस्त ग्राह को मुक्ति दी थी। इस संग्राम में कौन हारा? ऐसी चर्चा सुनते सुनाते इस स्थान का नाम 'कौनहारा (कोनहारा)' पड़ गया। बनारस के प्रसिद्ध मनिकर्णिका घाट की तरह यहाँ भी श्मशान की अग्नि हमेशा प्रज्वलित रह्ती है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर शरीर की अंत्येष्टि क्रिया मोक्षप्रदायनी है।

जधुआ रोड़ पर स्थित पातालेश्वर मंदिर हाजीपुर शहर के चकित कर देने वाले चमत्कारों में से एक है तथा यह देवों के देव भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर प्राचीन काल से है। ऐसा विश्वास है कि किसी समय भगवान शिव यहाँ प्रकट हुए थे तथा उन्होंने हमेशा के लिए इस स्थान पर ही एक लिंग के रूप में रहने का निश्चय किया।

हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||

एक नेपाली सेनाधिकारी मातबर सिंह थापा द्वारा १८वीं सदी में पैगोडा शैली में निर्मित शिवमंदिर कौनहारा घाट के समीप है। यह अद्वितीय मंदिर नेपाली वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। काष्ट फलकों पर बने प्रणय दृश्य का अधिकांश भाग अब नष्टप्राय है या चोरी हो गया है। कला प्रेमियों के अलावे शिव भक्तों के बीच इस मंदिर की बड़ी प्रतिष्ठा है। काष्ठ पर उत्कीर्ण मिथुन के भित्ति चित्र के लिए यह विश्व का इकलौता पुरातात्विक धरोहर है। दुर्भाग्यवश, देखरेख एवं रखरखाव के अभाव में अद्भुत कलाकृतियों को दीमक अपना ग्रास बना रहा है।

शहर के 5 सिनेमा हॉल मनोरंजन के सबसे बड़े साधन हैं। नेशनल सिनेमा (राजेन्द्र चौक) शहर का सबसे पुराना हॉल है, जो १९४० के दशक में बना था। हिन्दी और भोजपुरी फिल्मों के अलावे कभी-कभी हॉलीवुड फिल्मों का हिन्दी रुपान्तरण सिनेमा में दिखाये जाते हैं। लोग क्रिकेट और फुटबॉल के शौकीन हैं। स्थानीय अक्षयवट राय स्टेडियम टूर्नामेंट का मुख्य केन्द्र है। टाऊन हॉल में होनेवाले नाटक के मंचन अथवा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम कुछ लोगों के उच्चस्तरीय मनोरंजन का साधन है। हाजीपुर में सिनेमाघरों की संख्या 5 हैं .

हाजीपुर के विषय में कही- सुनी कहानियां

कहा जाता है कि शहर के उत्तर में ‘अनवार खाँ’ की सराय थी, जहाँ आज हाजीपुर रेलवे स्टेशन है, (आज भी अनवारपुर नाम से एक मोहल्ला है, जिसे आम बोलचाल में अनवरपुर कहते हैं )। हाजीपुर की बनी ‘हाथी दाँत की चटाई और काँच की चूड़ियाँ प्रसिद्ध थी। जो अब लुप्त प्रायः हो चली है हाजीपुर में दो मोहल्ले चूड़ियों के थे। एक मस्जिद के पास ‘चूड़ीहाड़ा मोहल्ला’ और दूसरा मवेशी अस्पताल के पास पश्चिम की तरफ ‘जौहरी मौहल्ला’ था। ऐसा कहा जाता है कि हाजीपुर की मिट्टी की सुराही भी प्रसिद्ध थी। जिसकी मिट्टी साल भर में तैयार की जाती थी।

हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||

हाजीपुर अमीरों या रईसों का भी गढ़ हुआ करता था। उसी में एक रईस ‘शेख़ साहब’ भी थे जिनकी पालकी सोलह कहारों की हुआ करती थी। हाजीपुर के रईसों के कहानियों में एक कहानी यह भी है। एक कश्मीरी व्यापारी केसर के बोरों से लदे हुए दस ऊँट लेकर कश्मीर से चला और दिल ही दिल में यह ठान लिया कि यह सारा केसर किसी एक ही रईस को देंगे और कीमत में सिर्फ एक सन ई0 का रुपया लेंगे। व्यापारी कश्मीर से पटना पहुँच गया मगर दोनों शर्तों पर कोई खरीदार नहीं मिला। आख़िरकार हाजीपुर के एक रईस ‘मीर साहब’ ने उस व्यापारी के शर्तो के अनुसार सारा केसर खरीद लिया और बन रहे मकान की नींव में सारा केसर डाल दिया। इससे हाजीपुर की सम्पन्नता का अन्दाजा सहज की लगाया जा सकता है।

संगी जामा मस्जिद

गंडक नदी के तट पर स्थित एक ऐतिहासिक मस्जिद है, चुँकी यह मस्जिद पुरी तरह से पत्थर से बना हुआ है इस लिए इसे पत्थर मस्जिद के नाम से भी जाना जाता है।

हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||

वैशाली महोत्सव

विश्व की प्रथम गणतंत्र, महात्मा बुद्ध एवं भगवान महावीर की धरती वैशाली की अपनी ऐतिहासिक पहचान रही है। वैशाली एक महान बौद्ध तीर्थ है और भगवान महावीर के जन्मस्थान भी है। ऐसा कहा जाता है कि बुद्ध ने तीन बार इस जगह का दौरा किया और यहां काफी समय बिताया। बुद्ध ने वैशाली में अपना आखिरी प्रवचन भी दिया और यहां अपने निर्वाण की घोषणा की। उनकी मृत्यु के बाद, वैशाली ने दूसरी बौद्ध परिषद भी आयोजित की।

हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||

प्रतिवर्ष वैशाली महोत्सव का आयोजन भगवान महावीर के जन्म दिवस पर मनाया जाता है। इस राजकीय उत्सव में देश भर के संगीत और कला प्रेमी भाग लेते है। “वैशाली महोत्सव” के दौरान आप अशोक स्तम्भ, अभिषेक पुष्करिणी, विश्व शांति स्तूप, मीरा साहब की मज़ार भी घूम सकते हैं इसके अलावा चौथी शताब्दी में गुप्त वंश द्वारा निर्मित,कम्मन छपरा स्थित शिव को समर्पित ‘चौहूमुखी महादेव मन्दिर’ के दर्शन का आनन्द भी ले सकते हैं।

हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||

विशिष्ट प्रकार के केले 

हाजीपुर अपने विशिष्ट प्रकार के केलों के लिये भी जाना जाता है। ‘मालभोग’ और ‘चीनिया’ केलों का क्या ही कहना, स्वाद लेना है तो हाजीपुर पधारिए I राजेन्द्र चौक स्थित वर्षों पुरानी ‘पातालेश्वर मिष्ठान भण्डार’ के काजू बर्फी की बात ही अलग है।

हाजीपुर में क्या प्रसिद्ध है?

हाजीपुर आकर्षण
पातालेश्वर मंदिर
महात्मा गांधी सेतु
बटेश्वरनाथ मंदिर
हेलाबाज़ार में स्थित श्री महाप्रभुजी की बैठकजी
नेपाली मंदिर
हाजीपुर, बिहार का दिल  || Haipur, Heart of Bihar ||