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ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए | ख़ुमार बाराबंकवी (Khumar Barabankvi)

ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए

ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए | ख़ुमार बाराबंकवी (Khumar Barabankvi)

"भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए ..❣️"

ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए 

आजा कि ज़हर खाए ज़माने गुज़र गए


ओ जाने वाले आ कि तिरे इंतिज़ार में 

रस्ते को घर बनाए ज़माने गुज़र गए


ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास 

सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए


क्या लाइक़-ए-सितम भी नहीं अब मैं दोस्तो 

पत्थर भी घर में आए ज़माने गुज़र गए


जान-ए-बहार फूल नहीं आदमी हूँ मैं 

आजा कि मुस्कुराए ज़माने गुज़र गए


क्या क्या तवक़्क़ुआत थीं आहों से ऐ 'ख़ुमार'

ये तीर भी चलाए ज़माने गुज़र गए

ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए | ख़ुमार बाराबंकवी (Khumar Barabankvi)

"लम्हों की खताएं,
लफ्जों में क्या बताएं. ..❣️"

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है | निदा फ़ाज़ली (Nida-Fazli)

 नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है 

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है | निदा फ़ाज़ली (Nida-Fazli)
"खुली किताब के सफ़्हे उलटते रहते हैं 
    हवा चले न चले दिन पलटते रहते हैं ..❣️"

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है 

कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है


मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं 

जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है


मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे 

सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है


चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं 

जो मौत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है


हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में 

जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है

नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है | निदा फ़ाज़ली (Nida-Fazli)

"नींद आये तो मिल लू उससे
रु-ब-रु मिलना अब मुमकिन नहीं,
ये नींद भी उनकी तरह ही संगदिल निकली
न ख़ुद आइ न आने दी उसे..❣️"

तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की | गुलज़ार (Gulzar)

तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की

तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की | गुलज़ार (Gulzar)

"बहुत लंबी खामोशी से गुजरा हूं मैं,
 किसी के कुछ कहने के इंतजार में..❣️"

तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की 

क्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई की


नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है 

काल-कुएँ में गूंजती है आवाज़ किसी सौदाई की


सीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चले 

हर साए का पीछा करना आदत है हरजाई की


आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं 

क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की


तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी 

साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता | Wasim Barelvi (वसीम बरेलवी)

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता | Wasim Barelvi (वसीम बरेलवी)

"कोई इशारा, दिलासा, ना कोई वादा मगर,
 जब आई शाम, तेरा इंतजार करने लगे..❣️"

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता 

आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता


तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या 

हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता


प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात 

किस के लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता


घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी 

मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता


वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए 

ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं

-- वसीम बरेलवी

Rupa Oos ki ek Boond

"ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं,
 तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी..❣️"


फ़रह इकबाल की गजल: जरा सी रात ढल जाए तो शायद नींद आ जाए

जरा सी रात ढल जाए तो शायद नींद आ जाए 

फ़रह इकबाल की गजल: जरा सी रात ढल जाए तो शायद नींद आ जाए

"कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को, 
खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए..
❣️

जरा सी रात ढल जाए तो शायद नींद आ जाए 

जरा सा दिल बहल जाए तो शायद नींद आ जाए


अभी तो कर्ब है, बे-चैनियाँ हैं, बे-क़रारी है 

तबीअं'त कुछ सँभल जाए तो शायद नींद आ जाए


हवा के नर्म झोंकों ने जगाया तेरी यादों को 

हवा का रुख बदल जाए तो शायद नींद आ जाए


ये तूफ़ाँ आँसुओं का जो उमड आया है पलकों तक 

किसी सूरत ये टल जाए तो शायद नींद आ जाए


ये हँसता मुस्कुराता क़ाफ़िला जो चाँद तारों का 

'फ़रह' आगे निकल जाए तो शायद नींद आ जाए

Rupa Oos ki ek Boond
         
"बेचैन इस क़दर थी कि सो न सकी रात भर,  
पलकों से लिख रही थी तेरा नाम चांद पर ..❣️