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निन्दा तू न गई मन से

निन्दा तू न गई मन से

परनिंदा में जो सुख है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। मन को शांति मिल जाती है। स्त्रियां बहुत होशियार होती हैं। वे इसका पूरा लुत्फ़ उठती हैं। वे इसके आनंद को भली भांति समझती हैं। दिन में दो चार घंटे भी अगर आनन्द पूर्वक न बिताया तो जीवन व्यर्थ सा प्रतीत होता है। 

निन्दा तू न गई मन से

पुरुषों को तो अपने काम से ही फुरसत नहीं मिलती, बेचारे। कभी कभार कोई मौका मिलता भी है तो बोलते हैं कि पहले ही इतने लफ़ड़े हैं, जिंदगी में अब उसके पचड़े में क्यों अपनी नाक घुसेड़ूँ। फिर उनके पास एक गुप्त कार्य भी होता है, ताक झांक करने का, इनसे फुर्सत मिले तब ना।

निंदा की एक बड़ी खूबी है, जितना करो, इसकी इच्छा उतनी ही बढ़ती जाती है। आनन्द भी उतना ही बढ़ता जाता है। इसी आनन्द को हासिल करने के लिए ही तो स्त्रियां निंदा में मशगूल होती हैं।

एक महान हास्य साहित्यकार हुए हैं, नाम सुना होगा आप लोगों ने श्रीमान "हरिशंकर परसाई"। उन्होंने काफी शोध किया है इस विषय पर। उनका कहना है कि निंदा में भरपूर विटामिन और प्रोटीन होते हैं। इससे खून साफ़ होता है और पाचन क्रिया बेहतर होती है। यह बल और स्फूर्ति देती है और पायरिया का शर्तिया इलाज है।

संतों को परनिंदा की मनाही है सो वे स्वनिन्दा से काम चलाते हैं। उन्हीं के लिए गोस्वामी जी ने राह दिखाई है "मो सो कौन कुटिल खल कामी"। यह संत की विनय या आत्मग्लानि नहीं है। टॉनिक है। 

अब यह शोध का विषय हो सकता है कि स्त्रियों ने सन्तों से प्रेरणा ली या सन्तों ने स्त्रियों से।

अब स्त्रियां निन्दा न करें तो क्या करें? पड़ोसन खूबसूरत है, अच्छे वस्त्र पहनती है तो डर तो लगता है ना। करमजली उसके पति को फाँस तो नहीं रही? बदसूरत है, गन्दगी से रहती है तो अपना स्टेटस गड़बड़ाता है। फिर आपकी सोसाइटी में आजू बाजू, ऊपर नीचे न जाने कितनी ही स्त्रियां रहतीं हैं। अब बम्बई वाला कल्चर आ गया है तो लोग बगल वाले को भी नहीं पहचानते। फिर क्या करें वो, मन के गुबार को दीवारों पर या हवा में तो नहीं निकाल सकती ना। वैसे जिनको निंदा के लिए कोई पार्टनर नहीं मिल पाता उन्हें आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हवा से बातें करते हुए देखा है। यूपी बोर्ड से पढ़े हुए बन्धु इस तथ्य से भली भांति परिचित होंगे।

गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" मुझे लगता है कि वे शायद "पर निन्दा कुशल बहुतेरे" लिखना चाहते थे। पर अपनी पत्नी से कौन नहीं डरता। परसाई जी बहुत हिम्मती थे। नर्मदा के जल का कुछ प्रभाव रहा होगा जो इतना कुछ लिख गए (वैसे नर्मदा जल का कुछ प्रभाव तो मुझ पर भी है )

आजकल इंटरनेट का ज़माना है। निन्दा भी मॉडर्न हो गई है। अब वह फेसबुक और वाट्स एप्प पर ज्यादा पाई जाती है। एक झंझट खत्म हुआ। पहले निन्दा चर्चा में मुंह दर्द होता था। अब उससे मुक्ति मिल गई है। कोई आवाज नहीं और कार्य फटाफट हो रहा है। और अब तो अड़ोस पड़ोस में कोई पार्टनर न भी मिला तो कोई गम नहीं। पार्टनर बम्बई या अहमदाबाद से भी ऑप्ट किया जा सकता है।

पर हर जगह कुछ न कुछ रिस्क तो रहता ही है। कल मिसेज सिंह मिसेज तिवारी से शिकायत कर रहीं थीं कि उन्होंने सरोज से चैटिंग में कमीनी कामिनी की पूरी पोल पट्टी खोल दी। पर सरोज तो और भी छिनाल निकली, उसने मेरे पोस्ट सब कामिनी को कॉपी पेस्ट कर दिए। अब मैंने उसकी असलियत सबको न बताई तो कहना।

कबीरदास जी भी कह गए हैं कि "निन्दक नियरे राखिए" यानी कि शादी अवश्य कीजिए। वैसे महान लोगों का अनुभव बताता है कि इसका लाभ भी शुरुआत के वर्षों में नहीं मिलता। चार छह साल बाद ही नियरे रखने का लाभ मिल पाता है।

ये पुराण सतयुग से प्रारम्भ हुआ है और अभी चल रहा है जब कि बाकी पुराणों को लोग पढ़ कर भूल भी गए। अस्तु। 

इति श्रीनिन्दा पुराण 1001 वां अध्याय।

( सभी निंदकों से क्षमा याचना सहित)

मूँगफली खाने के बाद के कुछ तथ्य

मूँगफली खाने के बाद के कुछ तथ्य

सर्दी की दस्तक हो चुकी है। सड़क के किनारे मूंगफली की रेडियां लग चुकी है। वैसे तो मूंगफली हर मौसम में हर महीने में उपलब्ध है, परंतु सर्दियों में गरम गरम मूंगफली खाने का अपना अलग आनंद है। आज आपके इसी आनंद को बढ़ाते हैं और प्रस्तुत करते हैं कुछ तथ्य जो शायद आप लोगों के साथ भी घटित होता होगा।

जब भी हम ये सोंचे कि अब बस करता हूँ तो आख़िरी वाली मूँगफली का कड़वा हुआ स्वाद ५-६ मूँगफली और खाने को मजबूर कर देता है। 

मूँगफली खाने के बाद के कुछ तथ्य

हम कितना भी स्वच्छ भारत अभियान के समर्थक हों, मूँगफली के छिलके इधर उधर फेंकने के अपने अलग मज़े हैं। साथ ही अगर पास ही आग जल रही हो तो छिलके उसमें डालने का अलग ही आनंद है। आग में छिलके जरूर डालिये, पर इधर उधर फेंकने का आनंद ना उठाइये। 

अगर ४-५ लोग एकसाथ मूँगफली खा रहे हैं, तो हमारे खाने की स्पीड सामने वालों के खाने की स्पीड पर बहुत हद तक निर्भर करती है।

जब मूँगफली का स्वाद अपने चरम पर होता है, तो एक मूँगफली के अंदर भरी हुई मिट्टी / रेत या नमक आपकी स्वाद ग्रंथियों की ऐसी की तैसी कर देती हैं।

मूँगफली खाने के बाद के कुछ तथ्य

मूँगफली के साथ मिलने वाली नमक की पुड़िया की भी अपनी ही अहमियत होती है। कुछ जगह मिर्च की चटनी भी मिलती है। छिलके में चटनी लगा के चाटने का आपना ही मज़ा है, इसको बयां कर पाना लगभग असंभव है। 

और आख़िर में कितनी भी खा लो, लगता है कि और ले ली होती तो अच्छा होता।

मूँगफली खाते हुए अगर एक दाना हाथ से छूटकर गिर जाये तो ऐसा फील होता है, जैसे पुरखों की संपत्ति हाथ से निकल गयी है…. उस दाने को ढूंढे बिना दूसरी मुंगफली खाने में मन नही लगता,या यह कहे जब तक ना मिल जाये, आंखे चारो तरफ उसे ही दूंढ रही होती है। 

मूंगफली खाने वाला व्यक्ति अच्छी अच्छी भरी हुई मूंगफली पहले खाता है और छोटी और थोड़ी बहुत जली हुई बाद में खाता है। 

एक तथ्य तो रह ही गया कि जब हम मूंगफली खत्म होने के बाद छिलके हटा रहे होते हैं, तो उसमें कोई मूंगफली का दाना मिल जाता है, तब उसका आनंद असीमित होता है। लगता है जैसे खोया ख़ज़ाना मिल गया हो।

मूँगफली खाने के बाद के कुछ तथ्य

क्या आपके साथ भी ऐसा ही होता है? जरूर बताइये। 
और मूँगफली के साथ पोस्ट का भी आनंद उठाइये। 

चेतावनी: प्लास्टिक बर्तन में गरम खाना ना खायें

चेतावनी: प्लास्टिक बर्तन में गरम खाना ना खायें

एक 36 वर्षीय पुरुष को केन्सर हुआ था, जो लास्ट स्टेज पर था। अपनी अब तक की उम्र में इन्होने ना तो कभी गुटका, ना ही सिगरेट और नही पान व शराब का सेवन किया था, समय पर काम पर जाना, परिवार के साथ खुश रहना, उसका जीवन था, ना कोई  बीमारी थी ना ही कोई चिन्ता।

चेतावनी: प्लास्टिक बर्तन में गरम खाना ना खायें

सिर्फ 2/3 दिन से पेट में दर्द शुरू होने के कारण डॉ. से सम्पर्क कर इलाज शुरू किया, परन्तु कोई फायदा ना होने के कारण बड़े डॉ. से मिले, वहां के डॉ. ने उनकी सभी रिपोर्ट निकलवाई तो पता चला कि पेट के आंतड़ियों में केन्सर हुआ है।

डॉ. द्वारा इलाज की शुरूआत हुई, इलाज दरम्यान पूरी जमा पूंजी के साथ घर -बार बिक गया, परन्तु परिणाम स्वरूप उनकी मौत ही हुई। डॉ. ने परिवार से इनका अग्नि संस्कार ना कर, मानव सेवार्थ बोडी पर रिर्सच करने हेतु हॉस्पीटल में डोनेट करने की सलाह दी, परिवार में आपसी मंथन के बाद बॉडी को हॉस्पीटल में रिर्सच करने हेतु, डोनेट करने का निर्णय लेते हुए बॉडी को हॉस्पीटल में डोनेट की।

रिर्सच के बाद पता चला कि प्लास्टिक में गरम खाना प्लास्टिक की बॉटल में पानी पीने से, उसमें से निकलने वाले केमिकल के कारण इन्हें केन्सर हुआ था, तब डॉ. द्वारा परिवार व साथियों से सम्पर्क कर उनके खान-पान के बारे में जांच की तो इस जांच से पता चला कि उन्हें चाय पीने की आदत थी। वे दिन में पाँच से छ: कप चाय पीते थे। तब यह भी पता चला कि जहाँ से चाय पीते थे वहाँ प्लास्टिक की थैली मे चाय आती थी और प्लास्टिक के कप में चाय दी जाती है।

अक्सर देखा गया है लोग प्लास्टिक की थैलियो में दूकान से गरम चाय गरम सब्जी या अन्य समान मंगवाने है वो ही खा लेते है या पी लेते है वो ही धीरे धीरे आपके शरीर मे केन्सर बनाता है।

चेतावनी: प्लास्टिक बर्तन में गरम खाना ना खायें

तब डॉ. द्वारा उनके साथ काम करने वाले साथियों का भी मेडिकल टेस्ट कराया तो पता चला कि उसके कई साथियों को केन्सर का असर है, तब डॉ. ने उन्हें केन्सर के इलाज की सलाह दी गई।

हम सोचते है कि सरकार इतनी खराब, जो स्वास्थ्य के साथ ही साथ, पर्यावरण के लिए भी खतरनाक ही नही घातक है, उसके निर्माण करने की इजाजत कैसे दे देती है। 

जहर बनाने की इजाजत  के साथ, सरकार प्लास्टिक का उपयोग ना करने के प्रचार पर भी करोडों रू. खर्च कर हमें समझाती है, परन्तु हम भी कहाँ समझते है, हम स्वंय भी तो अपना व अपने चाहने वालों को मौत की ओर ढकेलना का कार्य निर्भीक होकर कर रहे है, ना अपनी और ना ही परिवार की हमें चिन्ता है, बस मौत के गले लगाने के लिए फैशन की अंधी दौड में भाग रहे है।

अत: आप सभी से पुन: नम्र निवेदन करता हूँ कि प्लास्टिक का उपयोग कम से कम करें, जहाँ तक हो सके वहाँ तक प्लास्टिक बर्तन में गरम खाना ना खायें, प्लास्टिक की बॉटल में पानी का उपयोग ना करे विशेषकर से गर्म चाय-कॉफी प्लास्टिक  कप में ना पिये।

चेतावनी: प्लास्टिक बर्तन में गरम खाना ना खायें

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Lessons for a good life

Lessons for a good life

जिंदगी की जद्दोजहत में भागते भागते एक वक्त पर हमें एहसास होता है कि सबके लिए बहुत कर लिया अब कुछ अपने लिए किया जाए.... चंद पंक्तियाँ खुद के लिए 

Rupa Oos ki ek Boond

मेरे माता-पिता, मेरे भाई-बहनों, हमसफ़र , बच्चों और दोस्तों से प्यार करने के बाद, अब मैं खुद से प्यार करने लगा हूं।

After loving my parents, my siblings, my spouse, my children, my friends, now I have started loving myself. 


मुझे बस एहसास हुआ कि मैं "एटलस" नहीं हूं। दुनिया मेरे कंधों पर टिकी नहीं है।

I just realized that I am not “Atlas”. The world does not rest on my shoulders. 


मैंने अब सब्जियों और फलों के विक्रेताओं के साथ सौदेबाजी बंद कर दी। आखिरकार, कुछ रुपए अधिक देने से मेरी जेब में कोई छेद नहीं होगा, लेकिन इससे इस गरीब को अपनी बेटी की स्कूल फीस बचाने में मदद मिल सकती है।

I now stopped bargaining with vegetables & fruits vendors. After all, a few Rupees more is not going to burn a hole in my pocket but it might help the poor fellow save for his daughter’s school fees. 


मैं बची चिल्लर का इंतजार किए बिना टैक्सी चालक को भुगतान करता हूं। अतिरिक्त धन उसके चेहरे पर एक मुस्कान ला सकता है। आखिर वह मेरे मुकाबले जीने के लिए बहुत मेहनत कर रहा है। 

I pay the taxi driver without waiting for the change. The extra money might bring a smile on his face. After all he is toiling much harder for a living than me. 


मैंने बुजुर्गों को यह बताना बंद कर दिया कि वे पहले ही कई बार उस कहानी को सुना चुके हैं। आखिर वह कहानी उनकी अतीत की यादें ताज़ा करती है और जिंदगी जीने का होंसला बढाती है। 

I stopped telling the elderly that they've already narrated that story many times. After all, the story makes them walk down the memory lane & relive the past. 


कोई इंसान अगर गलत भी हो तो मैंने उसको सुधारना बंद किया है । आखिर सबको परफेक्ट बनाने का बोझ मुझ पर नहीं है। ऐसे परफेक्शन से शांति अधिक कीमती है।

I have learnt not to correct people even when I know they are wrong. After all, the onus of making everyone perfect is not on me. Peace is more precious than perfection. 


मैं अब सबकी तारीफ बड़ी उदारता से करता हूं। यह न केवल तारीफ प्राप्तकर्ता की मनोदशा को उल्हासित करता है, बल्कि यह मेरी मनोदशा को भी ऊर्जा देता है। 

I give compliments freely & generously. After all it's a mood enhancer not only for the recipient, but also for me.  


अब मैंने अपनी शर्ट पर क्रीज या स्पॉट के बारे में सोचना और परेशान होना बंद कर दिया है। मेरा अब मानना है की दिखावे के अपेक्षा व्यक्तित्व ज्यादा मालूम पड़ता है।

I have learnt not to bother about a crease or a spot on my shirt. After all, personality speaks louder than appearances. 


मैं उन लोगों से दूर ही रहता हूं जो मुझे महत्व नहीं देते। आखिरकार, वे मेरी कीमत नहीं जान सकते, लेकिन मैं वह बखूबी जनता हूँ।

I walk away from people who don't value me. After all, they might not know my worth, but I do. 


मैं तब शांत रहता हूं जब कोई मुझे "चूहे की दौड़" से बाहर निकालने के लिए गंदी राजनीति करता है। आखिरकार, मैं कोई चूहा नहीं हूं और न ही मैं किसी दौड़ में शामिल हूं।

I remain cool when someone plays dirty politics to outrun me in the rat race. After all, I am not a rat & neither am I in any race. 


मैं अपनी भावनाओं से शर्मिंदा ना होना सीख रहा हूं। आखिरकार, यह मेरी भावनाएं ही हैं जो मुझे मानव बनाती हैं।

I am learning not to be embarrassed by my emotions. After all, it's my emotions that make me human. 


मैंने सीखा है कि किसी रिश्ते को तोड़ने की तुलना में अहंकार को छोड़ना बेहतर है। आखिरकार, मेरा अहंकार मुझे सबसे अलग रखेगा जबकि रिश्तों के साथ मैं कभी अकेला नहीं रहूंगा।

I have learnt that it’s better to drop the ego than to break a relationship. After all, my ego will keep me aloof whereas with relationships I will never be alone. 


मैंने प्रत्येक दिन ऐसे जीना सीख लिया है जैसे कि यह आखिरी हो। क्या पता, आज का दिन आखिरी हो। 

I have learnt to live each day as if it's the last. After all, it might be the last. 

Rupa Oos ki ek Boond

*सबसे महत्वपूर्ण*– 

MOST IMPORTANT 

मैं वही काम करता हूं जो मुझे खुश करता है। आखिरकार, मैं अपनी खुशी के लिए जिम्मेदार हूं और मैं उसका हक़दार भी हूँ।

I am doing what makes me happy. After all, I am responsible for my happiness, and I owe it to me. 

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ || Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ

लखनऊ के चारबाग स्टेशन से दिनांक 28 8 2023 को बड़े ही धूमधाम से रेल कोच रेस्टोरेंट का शुभारंभ हुआ।इस रेस्टोरेंट का उद्घाटन वहां पर आए एक यात्री ने किया। 

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ || Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow

जैसा कि हम सभी जानते हैं लखनऊ अपने नजाकत और लजीज व्यंजन के लिए जाना जाता है। और अब यहां लखनऊ का पहला रेल कोच रेस्टोरेंट खुल गया है। इस रेस्टोरेंट में खास बात यह है, कि यहां देशभर के सभी राज्यों के प्रसिद्ध और जायकेदार खान 24 * 7 उपलब्ध रहेगा। दुनिया भर के कोने-कोने के लोग यहां सातों दिन 24 घंटे जायकेदार खाने का लुत्फ उठा सकेंगे।

यह रेस्टोरेंट लगभग 1600 वर्ग फुट में फैला है और चारबाग मेट्रो और रेलवे स्टेशनों के ठीक बीच में बनाया गया है, इस रेस्‍टोरेंट को एक ट्रेन की बोगी में बनाया गया है, लोग रेस्‍टोरेंट पर सीढ़ियों से चढ़कर जाएंगे और ट्रेन के कोच फूड रेस्टोरेंट में बैठकर खिड़कियों से चारबाग रेलवे स्टेशन का नजारा देख सकेंगे। रेस्‍टोरेंट में एक वक्‍त में 50 लोग बैठकर खाना खा सकेंगे। वहीं 30 से ज्यादा लोग बाहर बैठकर खाना खा सकेंगे। नॉदर्न रेलवे ने इस रेस्‍टोरेंट के लिए अपने पुराने और कबाड़ कोच 5 साल के लिए लीज पर दिए हैं। साथ ही इन्‍हें री डिजाइन करने के लिए परमीशन भी दी है।

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ || Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow

English Translate

Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow 

Rail Coach Restaurant was inaugurated with great fanfare on 28 8 2023 from Charbagh station of Lucknow. This restaurant was inaugurated by a passenger who came there.

 As we all know Lucknow is known for its exquisite and delicious food. And now Lucknow's first Rail Coach restaurant has opened here. The special thing in this restaurant is that famous and delicious food from all the states of the country will be available here 24 * 7. People from all corners of the world will be able to enjoy delicious food here 24 hours a day, seven days a week.

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ || Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow

 This restaurant is spread over 1600 square feet and is built right in the middle of Charbagh metro and railway stations, this restaurant is built in a train bogie, people will climb the stairs to the restaurant and sit in the train coach food restaurant Will be able to see the view of Charbagh railway station from the windows. At one time 50 people will be able to sit and eat in the restaurant. At the same time, more than 30 people will be able to sit outside and eat food. Northern Railway has given its old and junk coaches on lease for 5 years for this restaurant. Along with this, permission has also been given to redesign them.

IPL से तो सभी वाकिफ हैं, क्या ILP भी जानते हैं?

IPL से तो सभी वाकिफ हैं, क्या ILP भी जानते हैं?

क्या आप जानते है भारत मे कुछ स्थान ऐसे भी है जहाँ जाने के लिए "स्पेशल_परमिशन" लेने की आवश्यकता होती है जिसको "इनर लाइन परमिट" भी कहा जाता है ?

तो आइए आपको आज अपने ब्लॉग *रूपा ओस की एक बूंद* के माध्यम से साँझा करते है ऐसी ही जगहों (स्थान ) का नाम और क्या होती है "स्पेशल परमिशन (इनर लाइन परमिट)" 

IPL से तो सभी वाकिफ हैं, क्या ILP (इनर लाइन परमिट)भी जानते हैं?

अपना देश भारतबहुत ही अद्भुत है। इसके कदम कदम पर है रोचक जानकारीयाँ। अद्भत प्रतिमाएं, संस्कृति, संस्कार, रीत रिवाज। अगर कहा जाए तो विश्व पटल पर सबसे खूबसूरत देश भारत है। इसके जैसा विश्व में कुछ नहीं। इसी भारत देश में हैं कुछ जगहें (स्थान) जहाँ जाने के लिए जरूरी है "स्पेशल परमिशन"। बैसे तो ये परमिशन भारत के निवासियों के लिए जरूरी नहीं है ये मुख्यता विदेशी सैलानियों के लिए अनिवार्य है, जो विदेशों से आते हैं हमारे भारत के खूबसुरती को देखने। सकूँन की कुछ लम्हें जिंदगी में लुफ्त उठाने के लिए।

*इनर लाइन परमिट* स्पेशल परमिशन का मतलब होता है - "आधिकारिक यात्रा दस्तावेज" जो बाहर देशों से आने वाले यात्रियों के "संरक्षित क्षेत्र" जिनका वर्णन नीचे विस्तार से किया गया है, उन स्थानों के लिए एक नियत समय अवधि के लिए मान्य किया जाता है। मुख्यता आजकल भारत सरकार ये परमिशन सिर्फ कुछ जगहों के लिए देती है, जिनमे *नागालैंड* *मिजोरम* *अरुणाचल* प्रमुख है ।

*नागालैंड कोहिमा* 

कोहिमा पहाड़ो की चोटियों पर बसा हुआ एक खूबसूरत शहर है। बैसे ये नागालैंड की *राजधानी* भी है। इस शहर में अधिकांश नागा जनजाति के लोग रहते हैं। इनकी आदिवासियों वाली रंग बिरंगी जीवन शैली विदेशी पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। इसलिए यहाँ अधिकांश विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा देखने को मिलेगा। यहाँ कोहिमा के संरक्षित स्थानों पर घूमने के लिए *इनर लाइन परमिट* की आवश्यकता पड़ती है। यह विदेशी सैलानियों को जिले के *विदेशी पंजीकरण अधिकारी* से परमिशन लेना अनिवार्य है। उसके पश्चात ही सैलानी यहाँ 24 घण्टे के अंदर आराम से घूम सकते हैं।

अब बात करते है नागालैंड के एक और शहर *दीमापुर* की 

नागालैंड का सबसे बड़ा शहर दीमापुर है। यहाँ यात्रा करना विदेशी पर्यटकों के लिए सबसे दिलचस्प होता है। नागालैंड आ के यहाँ न आये तो बात बही हुई जैसे यार इंदौर आये और पोहा न खाया। धनसिरी के तट पर बसे इस शहर की यूरोप के लोग *ईट सिटी* के नाम से संबोधित करते हैं। 

अब आगे बढ़ते है इस क्रम में हम अपने अन्य स्थान के तरफ ....

*अरुणाचल प्रदेश* भारत में अरुणाचल प्रदेश के जीरो वेली को *विश्व विरासत स्थल* *World Heritagi site* में भी स्थान दिया गया है, अरुणाचल में विदेशी पर्यटकों को घूमने के लिए बहुत अधिक स्थान है, जिसमें *जीरो वैली* प्रमुख है यहाँ घूमने के लिए *स्पेशल परमिशन* लेने की आवश्यकता होती है ।

*तवांग* 

तवांग भारत के सबसे बड़े मठों में से एक है। यह 400 वर्ष पुराना मठ तवांग विदेशी पर्यटकों के पसंदीदा जगहों में सुमार है। यहाँ घुमने के लिए भी स्पेशल परमिशन की आवश्यकता होती है। तवांग लगभग 3048 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ कई महत्वपूर्ण खूबसूरत मठ है। तवांग दलाई लामा के जन्म स्थान के रूप में भी बहुत प्रसिद्ध है।

इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए जानते है अन्य स्थानों के बारे मे...

*भालुक्पोंग* अरूणाचल प्रदेश पश्चिम कामेंग जिले में हिमालय की तलहटी पर बसा एक खूबसूरत छोटा सा शहर जो अपनी प्राकृतिक सौन्दर्यता एवम शांत माहौल के लिए प्रसिद्ध है, यह एंगलिंग और राफ्टिंग के लिए सबसे शानदार स्थान जगह है ।

अरुणाचल के बाद अब रुख करते है *मिजोरम* की तरफ जानते हैं। यहाँ किस किस स्थान पर जाने के लिए *लाइन इनर परमिट* की आवश्यकता पड़ती है?

*आइजोल* 

भारत के मिजोरम की राजधानी है "आइजोल"। यहाँ म्यूजियम, हिल स्टेशन और भी शानदार स्थान हैं, जिन्हें देखने दुनिया भर के लोग आते हैं। यह पूर्व ओर दक्षिण में म्यामांर एवम पश्चिम में बांग्लादेश के बीच स्थित होने के कारण भारत का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है।

*लुंगलेई* 

लुंगलेई अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है यह जगह उनके लिए एक आदर्श गतंव्य है, जो शांति सकूँन के लिए अपनी जिंदगी में एक ( ब्रेक ) ठहराव लेना चाहते हैं, जो प्रकृति के सहज सरल बनावट का आनद लेना चाहते हैं, वो मिजोरम के दक्षिणी हिस्से में बसे इस शहर में आते हैं।

English Translate

Everyone is aware of IPL, do they also know ILP?

Do you know that there are some places in India where it is necessary to take "Special _ Permission" to go which is also called "Inner Line Permit"?

IPL से तो सभी वाकिफ हैं, क्या ILP (इनर लाइन परमिट)भी जानते हैं?

So let us share with you today through our blog *Rupa Os ki Ek Boond* the name of such places and what is "Special Permit (Inner Line Permit)"

Our country India is very wonderful. There is interesting information on its every step. Amazing statues, culture, rituals, customs. If told, India is the most beautiful country on the world stage. Nothing like it in the world. There are some places in this country of India where "special permission" is necessary to go. By the way, this permission is not necessary for the residents of India, it is mainly mandatory for foreign tourists, who come from abroad to see the beauty of our India. To enjoy some moments of peace in life.

*Inner Line Permit* Special Permit means - "Official Travel Document" valid for a specified time period for travelers coming from outside countries to places in the "Protected Areas" described in detail below goes. Mainly nowadays the Government of India gives this permission only for some places, in which *Nagaland* *Mizoram* *Arunachal* are prominent.

*Nagaland Kohima*

Kohima is a beautiful city situated on the top of the hills. By the way, it is also the *capital* of Nagaland. Most of the people of Naga tribe live in this city. The colorful lifestyle of their tribals attracts the attention of foreign tourists. That's why the gathering of most of the foreign tourists will be seen here. Here *Inner Line Permit* is required to visit the protected places of Kohima. It is mandatory for foreign tourists to take permission from the Foreigner Registration Officer of the district. Only after that tourists can roam here comfortably within 24 hours.

Now let's talk about another city of Nagaland *Dimapur*

Dimapur is the largest city of Nagaland. Traveling here is most interesting for foreign tourists. After coming to Nagaland, if he did not come here, then the talk flowed as if a friend came to Indore and did not eat Poha. Europeans address this city on the banks of Dhansiri as *Eat City*.

Now moving forward in this sequence we are towards our second place….

* Arunachal Pradesh * Arunachal Pradesh's Zero Valley in India has also been ranked in * World Heritage Site * * World Heritagi site * Arunachal has a lot of places for foreign tourists to visit, in which * Zero Valley * is prominent here * Special permission * is required to roam.

*Tawang*

Tawang is one of the largest monasteries in India. This 400 year old monastery is one of the favorite places of Tawang foreign tourists. Special permission is also required to visit here. Tawang is situated at an altitude of about 3048 meters. There are many important beautiful monasteries here. Tawang is also very famous as the birth place of Dalai Lama.

Moving forward in this order, we know about other places…

*Bhalukpong* A beautiful small town situated on the foothills of the Himalayas in West Kameng district of Arunachal Pradesh, which is famous for its natural beauty and serene environment, it is the most wonderful place for angling and rafting.

After Arunachal, now let's move towards *Mizoram*. To go to which places here, *Line Inner Permit* is required?

*Aizawl*

Aizawl is the capital of Mizoram, India. There are museums, hill stations and other great places here, which people from all over the world come to see. It is a very important place of India due to its location between Myanmar in the east and south and Bangladesh in the west.

IPL से तो सभी वाकिफ हैं, क्या ILP (इनर लाइन परमिट)भी जानते हैं?

*Lunglei*

Lunglei is famous for its natural beauty. This place is an ideal destination for those who want to take a break in their life for peace and relaxation, who want to enjoy the natural simplicity of nature. Settled in part come to this city.

हमारा समाज और नारी स्वतंत्रता

हमारा समाज और नारी स्वतंत्रता

हमारा समाज नारी स्वतंत्रता को लेकर बड़ी बड़ी बातें करता है, परंतु एक कटु सत्य यह है कि जब भी कोई महिला खुले हुए कम आयतन के परिधान में नज़र आती है, तो उसी समाज के 90 प्रतिशत लोग उसकी पोशाक को देखकर आनंदित होते हैं। उस समय वो यह विस्मरण कर देते हैं कि यदि वही पोशाक उनकी मां, बेटी अथवा बहन पहने तो उनकी मनःस्थिति कैसी होगी?

हमारा समाज और नारी स्वतंत्रता

 नारी स्वतंत्रता पर सच्चाई को समझने के लिए एक कहानी है-

एक दिन मोहल्ले में किसी ख़ास अवसर पर महिला सभा का आयोजन किया गया। सभा स्थल पर महिलाओं की संख्या अधिक और पुरुषों की कम थी। मंच पर तकरीबन पच्चीस वर्षीय खुबसूरत युवती आधुनिक वस्त्रों से सुसज्जित, माइक थामें कोस रही थी पुरुष समाज को। वही पुराना आलाप कम और छोटे कपड़ों को जायज और कुछ भी पहनने की स्वतंत्रता का बचाव करते हुए पुरुषों की गन्दी सोंच और खोटी नीयत का दोष बतला रही थी। 

तभी अचानक सभा स्थल से तीस बत्तीस वर्षीय सभ्य, शालीन और आकर्षक से दिखते नवयुवक ने खड़े होकर अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति मांगी। अनुमति स्वीकार कर माइक उसके हाथों मे सौप दिया गया। हाथों में माइक आते ही उसने बोलना शुरु किया - "माताओं, बहनों और भाइयों, मैं आप सबको नहीं जानता और आप सभी मुझे नहीं जानते कि आखिर मैं कैसा इंसान हूं? लेकिन पहनावे और शक्ल सूरत से मैं आपको कैसा लगता हूँ बदमाश या शरीफ? सभास्थल से कई आवाजें गूंज उठीं - पहनावे और बातचीत से तो आप शरीफ लग रहे हो.. शरीफ लग रहे हो.. शरीफ लग रहे हो..

हमारा समाज और नारी स्वतंत्रता

बस यही सुनकर, अचानक ही उसने अजीबोगरीब हरकत कर डाली। एक एक करके उसने मंच पर ही अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। कुछ ही देर में ये देख कर पूरा सभा स्थल आक्रोश से गूंज उठा। "मारो-मारो गुंडा है, बदमाश है, बेशर्म है, शर्म नाम की चीज नहीं है इसमें, मां बहन का लिहाज नहीं है इसको, नीच इंसान है, ये छोड़ना मत इसको।" ये आक्रोशित शोर सुनकर अचानक वो माइक पर गरज उठा - "रुको! पहले मेरी बात सुन लो, फिर मार भी लेना, चाहे तो जिंदा जला भी देना मुझको। 

अभी अभी तो ये बहन जी कम कपड़े, तंग और बदन नुमाया छोटे-छोटे कपड़ों की पक्ष के साथ साथ स्वतंत्रता की दुहाई देकर गुहार लगाकर "नीयत और सोच में खोट" बता रही थी। तब तो आप सभी तालियां बजा-बजाकर सहमति जता रहे थे, फिर मैंने क्या किया है? सिर्फ कपड़ों की स्वतंत्रता ही तो दिखलायी है। 

"नीयत और सोच" की खोट तो नहीं ना और फिर मैंने तो, आप लोगों को मां, बहन और भाई भी कहकर ही संबोधित किया था, फिर मेरे कपड़े उतारना शुरू करते ही आप में से किसी को भी मुझमें "भाई और बेटा" क्यों नहीं नजर आया? मेरी नीयत में आप लोगों को खोट कैसे नजर आ गया? मुझमें, आपको भाई, बेटा या दोस्त क्यों नहीं नजर आया? आप में से तो किसी की "सोच और नीयत" भी खोटी नहीं थी. फिर ऐसा क्यों? "

सभा स्थल पर सन्नाटा छा गया था। किसी के मुंह से कुछ नहीं निकल रहा था। उस व्यक्ति ने बोलना जारी रखा। "सच तो यही है कि झूठ बोलते हैं लोग कि "वेशभूषा" और "पहनावे" से कोई फर्क नहीं पड़ता। हकीकत तो यही है कि मानवीय स्वभाव है कि यदि कोई पुरुष या स्त्री कम वस्त्रों में हों तो मन मे दूषित विचार उत्पन्न हो सकते हैं।हमें अपनी इन्द्रियों को वश में रखने का प्रयत्न करना चाहिए। रूप, रस, शब्द, गन्ध, स्पर्श ये बहुत प्रभावशाली कारक हैं। एक रूपवती स्त्री को देखकर “विस्वामित्र” जैसे आध्यात्मिक ऋषि के मस्तिष्क में विकार पैदा हो गया था, तो आम मनुष्यों के मन मे तो हो ही सकता है।

दुर्गा शप्तशती के देव्या कवच में श्लोक 38 में भगवती से इन्हीं कारकों से रक्षा करने की प्रार्थना की गई है - 

“रसे_रुपे_च_गन्धे_च_शब्दे_स्पर्शे_च_योगिनी।
सत्त्वं_रजस्तमश्चैव_रक्षेन्नारायणी_सदा।।”

रस, रूप, गंध, शब्द, स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें। 

भारतीय हिन्दु महिलाओं को ,भारतीय संस्कृति के अनुरूप वस्त्रों का चयन करना चाहिए। महिलाओं को यह समझना होगा कि सभ्य, शालीन वस्त्र पहनने से उनकी स्वतंत्रता का हनन नहीं होगा। सोशल मीडिया पर उत्तेजक वस्त्रों में अपनी नुमाइश करती ज्यादातर महिलाओं को यह समझना होगा कि इससे वे समाज में हंसी की पात्र बनती हैं। फैशन के नाम पर "कुछभी" पहनना कहीं से भी उचित नहीं है। 

अब समय सचेत होने का है, आँखे खोलने का है। अपने आप को और अपने समाज को और अधिक सशक्त बनाना है। भारतीय समाज और संस्कृति का आधार नारीशक्ति है। नारी के सम्मान में यदि कमी आयी तो समाज का पतन हो जायेगा, जिसके फलस्वरूप देश का भी पतन निश्चित है।

और धर्म विरोधी, अधर्मी, चांडाल (बॉलीवुड, वामपंथ), दुष्ट प्रकृति के लोग हमारे समाज के आधार को तोड़ने का षड्यंत्र कर रहे हैं, जिसे हमें सफल नहीं होने देना है। हमारे मनीषियों ने सच ही कहा है -

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
      रमन्ते तत्र देवताः।" 

जय माता दी 

चाय पियो कुल्लड़ खाओ || Chai Piyo Kulhad Khao ||

चाय पियो कुल्लड़ खाओ

चाय के शौकीनों के लिए कुल्हड़ में चाय पीना कोई खास बात नही है, पर क्या आपने कभी कुल्हड़ को खाया भी है? है न चौंकाने वाली खबर!!! जी हां ऐसा ही कुछ नजारा देखने को मिला प्रयागराज के किसान मेला में। प्रयागराज के पटेल सेवा संस्थान में 9 दिवसीय किसान मेला चल रहा है। इस किसान मेले में किसानों से संबंधित हर दुकानों की स्टाल लगी है। उन्हीं स्टालों में कुल्हड़ वाली चाय की दुकान लोगों को अपनी ओर खींच रही है। 

चाय पियो कुल्लड़ खाओ || Chai Piyo Kulhad Khao ||

एक तो स्वादिष्ट चाय दूसरे कुल्हड़ खाने की सुविधा, मेले में आने वाले लोगों के लिए उपलब्ध है। उत्तर प्रदेश के देवरिया से आई महिला समूह की महिलाओं ने इस किसान मेले में "चाय पियो कुल्लड़ खाओ" की स्टाल खोली है,जिसमें ऑर्गेनिक चाय के साथ खास तरीके के बने चॉकलेटी स्वाद के कुल्हड़ में ग्राहकों को चाय दिया जा रहा है। चाय तो लोगों को खूब पसंद आ रही है, वहीं इसके कुल्लड़ का स्वाद भी लोगों को खूब भा रहा है।


चाय पियो कुल्लड़ खाओ || Chai Piyo Kulhad Khao ||

कुल्हड़ की ये है खासियत

"चाय पियो कुल्हड़ खाओ" सुनने में बड़ा अजीब सा लग रहा है, पर ये अब बात सच है क्योंकि अब एक ऐसा कुल्लड़ बनाया गया है, जिसमें हम चाय का आनंद ले सकेंगे साथ ही चॉकलेट की तरह उस कुल्हड़ को भी खा सकेंगे, जिससे कि अब इस बात की भी फिक्र नहीं होगी कि चाय बेचने वाले और चाय पीने वाले दोनों लोग कुल्हड़ कहां फेकेने और गंदगी नहीं होने के साथ किसी प्रकार का कोई प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचेगा। दुकादार को ऑर्गेनिक चाय परोसने का ये फायदा है कि चाय की दुकान और आसपास गंदगी नहीं फैलेगी और स्वच्छता का भी ख्याल रखा जा सकेगा। यूँ कह लें कि स्वच्छता और सेहत का ख्याल रखते हुए इस कुल्लड़ को बनाया गया है। यह कुल्हड़ स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा बनाया गया है, जिन्होंने इसे खेतों में उगाए गए मोटे अनाजों को मिलाकर बनाया है।

चाय पियो कुल्लड़ खाओ || Chai Piyo Kulhad Khao ||

इसको बनाते समय मडवा, मक्का, राई जैसे अनाजों का प्रयोग किया गया है। साथ ही इसमें चॉकलेट फ्लेवर को भी मिलाया जाता है, जिससे इसका स्वाद और बढ़िया हो जाता है। फिलहाल यह कुल्हड़ अभी तो थोड़ा महंगा पड़ रहा है, लेकिन जैसे-जैसे मोटे अनाजों का उत्पादन किसान बढ़ाना शुरू करेंगे और यह कुल्हड़ चलन में आ जाएगा तो इसकी लागत कम हो जाएगी।

drink tea eat kulhad

Drinking tea in Kulhad is not a special thing for tea lovers, but have you ever eaten Kulhad? Isn't it shocking news!!! Yes, such a sight was seen in the Kisan Mela of Prayagraj. A 9-day Kisan Mela is going on at Patel Seva Sansthan in Prayagraj. In this farmer's fair, stalls of every shops related to farmers have been set up. The tea shop with Kulhad in the same stalls is attracting people towards itself.

चाय पियो कुल्लड़ खाओ || Chai Piyo Kulhad Khao ||

One, the facility of eating delicious tea and the other Kulhad, is available for the people coming to the fair. A women's group from Deoria, Uttar Pradesh has opened a stall "Chai Pyo Kullad Khao" in this Kisan Mela, in which tea is being served to the customers in specially made chocolate flavored kulhads made with organic tea. People are liking the tea very much, while the taste of its Kullad is also being liked by the people.

This is the specialty of the Kulhad

"Chai peo kulhad khao" sounds very strange to hear, but it is now true because now such a kulhad has been made, in which we will be able to enjoy tea as well as eat that kulhad like chocolate. That now there will be no worry about where both the tea seller and the tea drinker will throw the ax and there will be no pollution and no harm to nature. The advantage of serving organic tea to the shopkeeper is that dirt will not spread in and around the tea shop and cleanliness can also be taken care of. Just say that this Kullad has been made keeping in mind cleanliness and health. This kulhad is made by the women of the self-help group, who have made it by mixing coarse grains grown in the fields.

चाय पियो कुल्लड़ खाओ || Chai Piyo Kulhad Khao ||

Grains like Madwa, Maize, Rye have been used while making this. Along with this, chocolate flavor is also added to it, which makes it taste even better. At present, this kulhad is getting a bit expensive, but as soon as the farmers start increasing the production of coarse grains and this kulhad comes into use, its cost will come down.

सार्वजनिक जीवन में मर्यादा से रहें ..क्यों?

सार्वजनिक जीवन में मर्यादा से रहें ..क्यों?


हमारी भारतीय संस्कृति सदैव हमें मर्यादित और अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देती है। इसी जीवन का परिणाम है कि हमारे यहां "जीवेत शरदः शतम" की अवधारणा की गई है। मनुष्य के शरीर के साथ मन का भी स्वस्थ होना आवश्यक है। बहुत से रोग हमारे मन मे उत्पन्न दूषित विचारों के द्वारा उत्पन्न होते हैं । 

 हमारी पुरातन संस्कृति में वस्त्रों का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। अवसर के अनुरूप,विभिन्न प्रकार के वस्त्र, भारतीय संस्कृति की ही देन है। जिस प्रकार किसी को मनचाही स्पीड में गाड़ी चलाने का अधिकार नहीं है, क्योंकि रोड सार्वजनिक है, ठीक उसी प्रकार किसी भी इंसान को (विशेषकर अगर वो महिला या लड़की है),ऐसे वस्त्र, जो उसके शरीर को बेपर्दा करते हों, उसे पहनने का अधिकार नहीं है। हम जिस समाज मे जीते हैं, उस समाज के नियमों को मानना हमारा धर्म भी है और कर्तव्य भी। सार्वजनिक जीवन में किसी लड़की को ऐसे वस्त्र नहीं पहनने चाहिए जो उसके शरीर को आंशिक रूप से अनावृत करते हों। कोई एकांत रोड में, अकेले स्पीड में गाड़ी चला सकते हैं, घर में या कहीं एकांत जगह में चाहे जैसे कपड़े पहन सकते हैं, कोई समस्या नहीं होगी। मगर सार्वजनिक जीवन में, सार्वजनिक स्थान में, सभी को समाज के नियम मानने हीचाहिए।

जिस प्रकार भोजन जब स्वयं के पेट में जा रहा हो तो केवल स्वयं की रुचि अनुसार बनेगा, लेकिन जब वह भोजन परिवार खायेगा तो सबकी रुचि व मान्यता देखनी पड़ेगी। उसी प्रकार समाज में रहते हुए हमें सभी की रुचियों और भावनाओं का ख्याल भी रखना होगा। लड़कियों का उत्तेजक और भद्दे वस्त्र पहनने का मुद्दा उठाना उतना ही जरूरी है, जितना लड़को का शराब पीकर गाड़ी चलाने का मुद्दा। दोनों ही स्थितियों में एक्सीडेंट की संभावना बनी रहती है। अपनी इच्छा केवल घर की चहारदीवारी में उचित है। घर से बाहर सार्वजनिक जीवन मे कदम रखते ही सामाजिक मर्यादा का, समाज के कानून का पालन सभी को करना चाहिए। 

सार्वजनिक जीवन में मर्यादा से रहें ..क्यों?

घूंघट और बुर्का अगर गलत है, तो उतना ही गलत न्यून और उत्तेजक वस्त्र पहनना भी है। बड़ी उम्र की लड़कियों का बच्चों सी फ़टी निक्कर पहनकर,छोटी टॉप पहनकर फैशन के नाम पर घूमना भारतीय संस्कृति का अंग नहीं है। जीवन भी गिटार या वीणा जैसा वाद्य यंत्र ही है, इसे ज्यादा कसना भी गलत है और ज्यादा ढील देना भी गलत है। आज आधुनिक समाज में सँस्कार की जरूरत स्त्री व पुरुष दोनों को है। गाड़ी के दोनों पहिये में संस्कार की हवा चाहिए, एक भी पंचर हुआ तो जीवन अशांत और बाधित होगा।

कम कपडे पहनना यदि आधुनिक होने की निशानी है, तो सबसे आधुनिक जानवर है, जिनके संस्कृति में कपड़े ही नहीं हैं। अतः हमें जानवर से रेस न करके अपनी सम्रद्ध सभ्यता व संस्कृति को स्वीकार करना चाहिए। कुत्ते को अधिकार है कि वह कहीं भी टांग उठाकर पेशाब कर सकता है,परंतु सभ्य इंसान को यह अधिकार नहीं है। उसे सभ्यता से बन्द टॉयलेट उपयोग करना होगा। इसी तरह पशु को अधिकार है बिना कपड़ों के घूमने का, लेकिन सभ्य इंसान को उचित वस्त्रों का उपयोग सार्वजनिक जीवन में करना ही चाहिए। ऐसे वस्त्र जो हमारी सभ्यता और सस्कृति को पोषित और पल्लवित कर सकें।

सफलता क्या है || What is Success ||

सफलता क्या है

हम अक्सर दैनिक जीवन में सफल असफल व्यक्ति के बारे में सुनते - कहते आपस में बातें करते हैं, परंतु विचार कीजिये वास्तव में सफलता क्या है? या सफल व्यक्ति कौन है ?

सफलता क्या है

सफलता क्या है?

4 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपने कपड़ों को गीला नहीं करते।

8 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपने घर वापिस आने का रास्ता जानते हैं।

12 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपने अच्छे मित्र बना सकते हैं।

18 वर्ष की आयु में मदिरा और सिगरेट से दूर रह पाना सफलता है।

25 वर्ष की आयु तक रोजगार सृजन अथवा नौकरी पाना सफलता है।

28 वर्ष की आयु में एक पारिवारिक व्यक्ति बन जाना सफलता है।

35 वर्ष की आयु में आपने कुछ जमापूंजी बनाना सीख लिया ये सफलता है।

45 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपना युवावस्था बरकरार रख पाते हैं।

55 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में सक्षम हैं।

65 वर्ष की आयु में सफलता है निरोगी रहना।

70 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप आत्मनिर्भर हैं किसी पर बोझ नहीं।

75 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आप अपने पुराने मित्रों से सम्बन्ध स्थापित रखे हुए हैं।

80 वर्ष की आयु में सफलता यह है कि आपको अपने घर वापस आने का रास्ता पता है।

और 85 वर्ष की आयु में फिर सफलता ये है कि आप अपने कपड़ों को गीला नहीं करते।

अंततः यही तो जीवन चक्र है, जो घूम फिर कर वापस वहीं आ जाता है। जहाँ वह आरम्भ हुआ था और यही जीवन का परम सत्य है।


What is Success

We often hear and talk among ourselves about successful unsuccessful person in daily life, but think what is success really? Or who is a successful person?
सफलता क्या है

What is success?

Success at age 4 is that you don't wet your clothes.

Success at the age of 8 is that you know your way back home.

The key to success at age 12 is that you can make good friends.

Being able to stay away from alcohol and cigarettes at the age of 18 is a success.

Employment generation or getting a job till the age of 25 is a success.

Being a family man at the age of 28 is success.

At the age of 35, you have learned to make some savings, this is success.

Success at 45 is that you retain your youth.

Success at the age of 55 is that you are able to fulfill your responsibilities.

Success at the age of 65 is to remain healthy.

Success at the age of 70 is that you are self-reliant and not a burden on anyone.

Success at the age of 75 is that you keep in touch with your old friends.

Success at the age of 80 is that you know your way back home.

And at the age of 85, success is again that you don't wet your clothes.

After all, this is the cycle of life, which goes around and comes back there. Where it started and this is the ultimate truth of life.

हमारी संस्कृति और सोशल मिडिया

हमारी संस्कृति और सोशल मिडिया

आज के इस आधुनिक युग के भागदौड़ भरी जिंदगी और सोशल मिडिया ने लोगों को लोगों से दूर कर दिया है, जिसका सीधा प्रभाव मनुष्य के विचारों पर पड़ने एवं दिखने लगा है। 

हमारी संस्कृति और सोशल मिडिया

जब हम अपने बुजुर्गों के साथ बैठते हैं, तो अक्सर उनके अनुभव तथा अन्य लोगों की कार्यशैली की विशेषताएं आदि सुनने को मिलते हैं, जो आज हमारे जमाने से बिल्कुल विपरित हैं। उनके  गुज़रे समय से हमें सुन कर महसूस होता है कहाँ आज हम अपनों को छोड़ कर अपने मित्रों को सिर्फ मतलब के समय याद करते हुए आज सिर्फ उंगलियों से चलने वाले आधुनिक मशीनों पर निर्भर हो गए हैं। दोस्तों  के नाम पर सिर्फ़ socail media के जुड़े हुए लोग हैं। हमारे पास प्यार के जगह सिर्फ दिखावे से भरे लोग हैं, इस छोटे से मोबाइल आईपैड और लैपटॉप में सिर्फ नम्बर ईमेल व्हाट्सएप बन कर। परन्तु वास्तव में बिना पैसे के लालच के सहयोग करने वाला हमारे पास  कोई  नहीं है।  

जानते हैं, ऐसा क्यों है? कभी विचार किया ये सब क्यों और कैसे बदला?

पहले भी लोग अपनी आजीविका के लिए कार्य किया करते थे, व्यस्त रहा करते थे, पर अपनी दैनिक दिनचर्या में अपनों के लिए, अपने परिजनों के लिए, मित्रोंं  के लिए समय अवश्य निकालते थे।  हर परिवार में एक समय का भोजन अवश्य साथ किया करते थे।

हमारी संस्कृति और सोशल मिडिया

वजह सिर्फ इतनी सी हुआ करती थी कि, परिवार के लोग आपस मे कुछ पल अपने अपने विचार, अपनी समस्या, अपनी खुशी एक दूसरे से सांझा कर सकें। लोग सुबह घूमने टहलने जाते थे जिससे मित्रों से मिल सकें, उनके जीवन में होने वाले सुख दुख के भागी बन सकें। धन - दौलत से नहीं कम से कम उसको अपना समय अपना साथ देकर सहयोग प्रदान कर सके और देखिए अपने घर के बुजुर्गों को आज भी उनके पास आपके मोबाइल में आने वाले अनुभव समस्याओं के समाधान से ज्यादा कारगर उपाय उनके पास उपलब्ध हैं। ज्ञान का भंडार है उनके पास। जहाँ एक दादी माँ के पास घरेलू उपचार की विधियां हैं, वहीं दादा जी के पास जीवन के उतार चढ़ाव में संयमित हो कर जीने की कला है। आज भी उनके पास आपसे ज्यादा मित्र हैं, जो इस उम्र में भी एक दूसरे को हौसला प्रदान करते हैं और आपके पास क्या है? सोचिएगा एक मिनिट का समय निकाल कर जरूर इस बात को ?

इंटरनेट पर हम सिर्फ समस्याओं के समाधान ढूढ पाएंगे, नए नए व्यापार के तरीके खोज पाएंगे, अपनी आमदनी बढ़ाने के प्रयोग जान पाएंगे, लोगों से सिर्फ सोशल मीडिया पर अत्यधिक जुड़ पाएंगे, पर मन का संतोष नहीं पा पाएंगे। कोई सुख दुख में दोस्त करीब नहीं खड़ा कर पाएंगे। सबसे बड़ी उलझन आज के जीवन की पहले की तरह अब बच्चों में संस्कार नहीं दे पाएंगे क्योंकि जब आपके पास स्वयं अपने ही लिए समय नहीं, अपने विचारों के लिए समय नहीं तो कैसे आप इस आधुनिकता के बढ़ते वातावरण में अपने परिबार अपने बच्चो के साथ अपने जीवन के अनुभव सांझा करँगे। वक्त है रोक लो अपने कदमों को इस भगदौड़ भरी जिंदगी में। भाग कर बहुत आगे निकलने से पहले एक बार ये अवश्य सोंचे कि कामयावी पर कोई जश्न मनाने वाला साथ न हो तो किस काम की कामयाबी क्योंकि जिस तरह हम व्यस्त होंगे हमसे जुड़े लोग हमारे दोस्त भी उसी तरह स्वयम ही स्वयम में व्यस्त हो जाएंगे। 

विचारणीय है कि श्रद्धा हो या आरोही हो या कोई सपना ये क्यों अपनी दिशा अपने संस्कृति संस्कार से विमुख हो रही हैं? क्यों किसी और पर अंधविश्वास कर रही हैं? क्यों किसी के छल को अपना भविष्य मान रही है?

सोशल मिडिया का समाज पर प्रभाव

हमारी संस्कृति और सोशल मिडिया

अब यहाँ इस लेख से तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं है कि आधुनिकता के इस दौर में हम हम पीछे रह जाएं। जहां, सोशल मीडिया मानव जीवन का एक अभिन्न अंग बन चूका है, स्थिति यह हो गई है कि सोशल मीडिया के बगैर कोई अपने दिनचर्या की कल्पना भी नहीं कर सकता। सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि वह किसी भी समाज की दशा को सुधार भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। वहां, यह उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है कि वह सोशल मीडिया का उपयोग किस तरह कर रहा है। यदि कुछ जानने और सीखने के उद्देश्य से इसका उपयोग किया जाए, तो एक उच्च और आदर्श जीवन की कल्पना की जा सकती है। परंतु वहीं अगर केवल मनोरंजन और टाइम पास करने के लिए इसका उपयोग किया जाए, तो हम अपने कीमती समय को गंवा बैठेंगे और कुछ भी नहीं सीख पाएंगे।

Motivational Training Under Mission Karmayogi (Lucknow)

Motivational Training Under Mission Karmayogi

आज चर्चा करते हैं "भारत संचार निगम लिमिटेड" में होने वाले मोटिवेशनल ट्रेनिंग की। जो लोग मुझसे जुड़े हुए हैं उनको यह पता है कि मैं बीएसएनल में कार्यरत हूं और कुछ लोग जो सोशल साइट्स से इस ब्लॉग से जुड़े हैं शायद उनको भी इस बात की जानकारी होगी। 

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आज की पोस्ट सिर्फ बीएसएनल तक ही सीमित नहीं है, अपितु यह प्रधानमंत्री की योजना "मिशन कर्म योगी" के तहत संचालित की जाने वाली "मोटिवेशनल ट्रेनिंग" के अंतर्गत सभी सिविल सेवा के अधिकारियों की कार्य क्षमता बढ़ाने और कार्यप्रणाली में सुधार करने के लिए आरंभ की गई है। आज कल के तनाव के दौर में सरकार द्वारा शुरू की गई यह योजना सभी सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए संजीवनी बूटी के समान है, जो उनके आत्मविश्वास को ऊंचा उठाने में सहायक सिद्ध होगी। 

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कोविड महामारी के बाद सामान्य जन मानस के लिए परिस्थितियां उतनी अनुकूल नहीं रह गई हैं। इंसान एक अनजान से भय के साए में जी रहा है। इन परिस्थितियों में कुछ ऐसे प्रशिक्षण की महती आवश्यकता महसूस की जा रही थी, जो व्यक्ति को मानसिक रूप से सुदृढ़ कर सके और उसका मोरल भी उठा सके। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री द्वारा "मिशन कर्मयोगी" योजना शुरू की गई। बीएसएनएल में भी इसके तहत मिलने वाले प्रशिक्षण के सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं।

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"मिशन कर्मयोगी" योजना क्या है?

2 सितंबर 2020 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुई कैबिनेट की बैठक में "मिशन कर्म योगी योजना" को मंजूरी दी गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का कौशल विकास बढ़ाना है, जिससे इनकी कार्य क्षमता बढ़े और कार्यप्रणाली में सुधार हो। अर्थात हम यह कह सकते हैं कि इस योजना का मुख्य लक्ष्य भविष्य के लिए भारतीय सिविल सर्वेंट, जो कि सरकारी कर्मचारी हैं, उनको ज्यादा से ज्यादा सक्रिय, रचनात्मक और व्यवसायिक बनाया जाए।

"मिशन कर्म योगी योजना" का बजट

मिशन कर्म योगी योजना के तहत करीब 40 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने की योजना है। इस योजना के लिए सरकार की ओर से 5 वर्षों की समय अवधि में 510.86 करोड़ रुपए पर का बजट सुनिश्चित किया गया है।

इसी योजना के तहत बीएसएनएल कर्मियों को ट्रेनिंग दी जा रही है। योजना का सही प्रकार से संचालन करने के लिए "सेंटम लर्निंग (CENTUM Learning)" संस्था ने मिशन कर्मयोगी के तहत कुछ अधिकारियों को प्रशिक्षित किया। अब ये प्रशिक्षित अधिकारी अलग - अलग जगहों पर प्रशिक्षण दे रहे हैं। 

Motivational Training Under Mission Karmayogi (Lucknow)

इसके तहत लखनऊ में मोहम्मद अरशद अंसारी सर तथा विजय गुप्ता सर के सानिध्य में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। दोनों ही सर बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। इनके प्रशिक्षण के दौरान प्रतिदिन 9 घंटे बड़ी ही सहजता से गुजर जाते हैं। बहुत ही आसानी से कुछ स्लाइड, प्रेजेंटेशन, कहानी, पजल्स और शॉर्ट वीडियो क्लिप के माध्यम से हमें रिफ्रेश किया जाता है और नई ऊर्जा, रचनात्मकता तथा क्रियाशीलता के साथ अपने व्यावसायिक क्षेत्र में किस तरह से सीमित संसाधनों में भी बिना स्ट्रेस लिए अपने काम को सुचारू रूप से करना है, सिखाया जा रहा है। 

यदि कोई सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी बिना स्ट्रेस के अपना काम करता है, तो वह अपनी कार्य क्षमता बढ़ा सकता है, जिससे उसके विभाग और देश की भी उत्तरोत्तर प्रगति होगी। इसके साथ ही वह कर्मचारी अथवा अधिकारी मानसिक रूप से ज्यादा मजबूत होगा। वह ज्यादा प्रसन्न रहेगा, जिससे वह और उसका परिवार ज्यादा बेहतर जीवन शैली अपना सकेंगे।

उम्मीद है कि माननीय प्रधानमंत्री जी की यह बेहद महत्वाकांक्षी योजना सफल हो तथा देश की उन्नति और तरक्की में हम भी अपना योगदान दे सकें।

केला और नारियल पूजा पाठ में खास स्थान क्यों रखते है?

केला और नारियल पूजा पाठ में खास स्थान क्यों रखते है?

सभी धर्मों की अपनी अलग अलग पूजा पद्दतियाँ होती हैं। हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा होती है तो इस्लाम धर्म को मानने वाले नमाज पढ़ते हैं। सिख धर्म में गुरु ग्रन्थ साहेब की पूजा होती है तो ईसाई धर्म को मानने वाले जिसेस क्राइस्ट की पूजा करते हैं। सब धर्मों का सार एक है, सिर्फ पद्धतियां अलग अलग हैं। 

केला और नारियल पूजा पाठ में खास स्थान क्यों रखते है?

हिन्दू पूजा पद्दति में भगवान को पुष्प अर्पण करने, जल अर्पण करने तथा भोग लगाने का विधान है। कुछ जगहों पर तो घरों में जो जो व्यंजन या पकवान बनते हैं वो सभी भगवान् को भोग लगाया जाता है। यहाँ आज भगवान को अर्पण होने वाले फल की चर्चा करते हैं। वैसे तो भगवान को सारे फल अर्पण किये जाते हैं, परंतु उसमें भी केला और नारियल विशेष महत्व रखते हैं। ऐसा क्या अंतर है केला, नारियल और बाकि फलों में? 

केला और नारियल पूजा पाठ में खास स्थान क्यों रखते है?

नारियल और केला ही दो ऐसे फल हैं जिन्हें “पवित्र फल” माना जाता है। नारियल और केला ये दो ही ऐसे फल हैं, जो किसी के जूठे बीज से उत्पन्न नहीं होते, मतलब अगर हमें आम का पेड़ लगाना है, तो हम आम को खाते हैं और उसके बीज या गुठली को जमीन में गाड़ते हैं, तो वह पौधे के रूप में उगता है, या फिर ऐसे ही गुठली निकाल के लगा दें तो भी वह उस पेड़ का बीज (जूठा या अंग) ही हुआ, लेकिन केले का या नारियल का पेड़ लगाने को केवल जमीन से निकला हुआ पौधा (ओधी) ही लगाते हैं, जो की खुद में ही पूर्ण है, न किसी का बीज न हिस्सा, न झूठा, तर्क यह है कि अन्य सभी फल दागी फल (आंशिक रूप से खाए गए फल) हैं। केला व नारियल के बचे हुए हिस्से को फेंकने से इसके पेड़ नहीं उगते हैं और न ही किसी चिड़िये की बीट से। 

यदि हम केला खाकर उसका छिलका फेंक दें, तो उसमें से कुछ भी नहीं निकलेगा। केले के पेड़ को उसके बीज लगाकर या केले के प्रकंद लगाकर ही उगाया जा सकता है। इसी प्रकार नारियल के साथ भी, यदि नारियल खाते हैं और उसका बाहरी आवरण फेंकते हैं, तो उसमें से कुछ भी नहीं निकलेगा। एक नारियल का पेड़ उगाने के लिए पूरे नारियल को भूसी के साथ बोना होता है।

दूसरी ओर अन्य फलों के खाए हिस्से को फेकने या चिड़िये की बीट से भी उसके पौधे उग आते हैं। इसलिए इन फलों को शुद्ध या पवित्र नहीं माना जाता है। दूसरी ओर केला व नारियल को पवित्र फल माना गया है और भगवान के भोग के लिए सबसे उचित माना गया है। इसलिए भगवान को सम्पूर्ण फल अर्पित किया जाता है। 

बांस की लकड़ी हिन्दू नहीं जलाते, आखिर क्यों ?

बांस की लकड़ी हिन्दू नहीं जलाते, आखिर क्यों ?

आज थोड़ी चर्चा धर्म की करते हैं। वैसे आपलोगों के मन में भी कभी न कभी ये विचार तो आया होगा कि क्यों बांस की लकड़ी हिन्दू नहीं जलाते ?

बांस की लकड़ी हिन्दू नहीं जलाते, आखिर क्यों ?

                   हम अक्सर शुभ (हवन अथवा पूजन) और अशुभ (दाह संस्कार) कार्यों के लिए विभिन्न प्रकार के लकड़ियों को जलाने में प्रयोग करते है लेकिन क्या आपने कभी किसी कार्य के लिए बांस की लकड़ी को जलता हुआ देखा है। नहीं ना…? 

                  भारतीय संस्कृति, परंपरा और धार्मिक परम्पराओं के अनुसार, हमारे शास्त्रों में बांस की लकड़ी को जलाना वर्जित माना गया है। यहां तक की हम अर्थी के लिए बांस की लकड़ी का उपयोग तो करते है, लेकिन उसे चिता में जलाते नहीं। हिन्दू धर्मानुसार "बांस जलाने से पितृ दोष लगता है" ..... 

                  वहीं जन्म के समय जो "नाल" माता और शिशु को जोड़ के रखती है, उसे भी बांस के वृक्षों के बीच में ही गाड़ते हैं, ताकि वंश सदैव बढ़ता रहे। क्या इसका कोई वैज्ञानिक कारण है…? 

चलिए आज जानते हैं कि धर्म और विज्ञान से जुड़े इस मसले में विज्ञान क्या कहता है ?

                  बांस में लेड व हेवी मेटल प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। लेड जलने पर लेड ऑक्साइड बनाता है जो कि एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है। हेवी मेटल भी जलने पर 'ऑक्साइड्स' बनाते हैं। लेकिन जिस बांस की लकड़ी को जलाना शास्त्रों में वर्जित है, यहां तक कि चिता में भी नहीं जला सकते, उस बांस की लकड़ी को हमलोग रोज़ अगरबत्ती में जलाते हैं।

बांस की लकड़ी हिन्दू नहीं जलाते, आखिर क्यों ?

                  अगरबत्ती के जलने से उतपन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए 'थैलेट' नाम के विशिष्ट केमिकल का प्रयोग किया जाता है। यह एक थैलिक एसिड का ईस्टर होता है, जो कि श्वांस के साथ शरीर में प्रवेश करता है, इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध 'न्यूरोटॉक्सिक एवं हेप्टोटोक्सिक' को भी स्वांस के साथ शरीर में पहुंचाती है। इसकी लेश मात्र उपस्थिति कैन्सर अथवा मष्तिष्क आघात का कारण बन सकती है। 

                   'हेप्टोटॉक्सिक' की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता सब जगह धूप ही लिखा है। हर स्थान पर धूप-दीप-नैवेद्य का ही वर्णन है।

                  अगरबत्ती भारतवर्ष में बहुत बाद में आया। जहाँ तक हो सके बांस की लकड़ी को जलाने से बचे। पूजा पद्दतियों में धूप और कपूर का उपयोग किया जा सकता है। 

                    शायद इन्हीं नुकसान से बचने के लिए इसे धर्म से जोड़ दिया गया होगा। क्यूंकि हमारे पूर्वज बहुत चालाक थे। उन्हें पता था कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण लोगों को भले समझ आये न आये परन्तु धार्मिक दृष्टिकोण अवश्य समझ आएगा और लोग इसकी अनुपालना करेंगे। 

                    

झाड़ू को लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

झाड़ू को लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

झाड़ू को लक्ष्मी जी इसलिए कहते हैं क्योंकि झाड़ू को लक्ष्मी का वरदान मिला हुआ है। झाड़ू का स्थान हमारे घर में बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वह हमारे घर में बहुत अधिक महत्व रखती है। आज यहाँ इसी विषय पर चर्चा करेंगे। 

झाड़ू को लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

अगर कोई व्यक्ति घर से बाहर जा रहा होता है, तो उसके बाद में झाड़ू नहीं लगानी चाहिए। झाड़ू को घर में छुपा कर रखना चाहिए, इधर उधर कहीं भी नहीं रखनी चाहिए, किसी भी बाहर वाले व्यक्ति को आने पर झाड़ू नहीं देखनी चाहिए।

झाड़ू के कभी भी पैर नहीं लगाने चाहिए और सबको सीधा खड़ा नहीं रखना चाहिए, झाड़ू में मां लक्ष्मी का वास होता है। अगर गलती से कभी पैर लग भी जाए तो उसको प्रणाम करना चाहिए।

झाड़ू का हमें आदर करना चाहिए, ज्यादा पुरानी टूटी-फूटी झाड़ू का इस्तेमाल घर में नहीं करना चाहिए। 

नई झाड़ू का इस्तेमाल हमें शनिवार को ही करना चाहिए, और उसे छुपा कर रखनी चाहिए। घर के मुख्य द्वार ,छत पर बिल्कुल भी नहीं रखनी चाहिए ।

झाड़ू को कभी भी किचन में नहीं रखना चाहिए। घर में दरिद्रता आती है।

सूर्यास्त के बाद कभी भी झाड़ू पोछा नहीं करना चाहिए, झाडू पर कभी भी गलती से भी पैर नहीं रखना चाहिए क्योंकि झाड़ू में लक्ष्मी मां का वास होता है। वह मां लक्ष्मी को अति प्रिय है और उनके एक हाथ में झाड़ू रहती है।

झाड़ू को लक्ष्मी क्यों कहा जाता है?

झाड़ू को कभी भी गीली नहीं रखनी चाहिए, झाड़ू से कभी भी किसी व्यक्ति या जानवर को नहीं मारना चाहिए, नए घर में अगर प्रवेश कर रहे हैं तो नई झाड़ू जरूर खरीदना चाहिए ।

झाड़ू से कभी भी झुठन साफ नहीं करनी चाहिए, ना ही झाड़ू को कभी उलगना चाहिए, अमावस्या या शनिवार को पुरानी झाड़ू टूटी- फूटी झाड़ू को घर से बाहर फेंकना चाहिए।

गुरुवार या शुक्रवार को कभी भी झाड़ू को नहीं फेकनी चाहिए ,या घर से बाहर नहीं निकालनी चाहिए। 

आज यह पोस्ट डालते हुए ऐसा लग रहा है मानो सारी बातें जानी सुनी हैं, परन्तु इन बातों को हम भूलते जा रहे हैं। यहाँ तक कि जो लोग इन बातों को मानते हैं, हम उन्हें ही दकियानूसी ख्यालात के कहते हैं। यहाँ पर हम इस बात को भूल जाते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जो भी नियम व्यवस्था बनाई है वो सभी नियम और व्यवस्थाएं प्रत्य या परोक्छ रूप से हमें फायदा ही पहुंचाते हैं। 

श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना

श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना  

क्या कभी आपलोगों के मन में ये सवाल आया कि भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना ? कुरुक्षेत्र के अलावा भी मैदान थे जहाँ महाभारत का युद्ध हो सकता था, परन्तु श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र को ही चुना। इसके पीछे एक बहुत अद्भुत कथा है। 

गीता का उपदेश श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुरूक्षेत्र में ही दिया था, जहां महाभारत का युद्ध भी हुआ। आज जानते हैं कि महाभारत का युद्ध कुरूक्षेत्र में ही क्यों हुआ? धर्म से जुड़े बहुत लोग इससे वाकिफ होंगे तो कुछ लोग अनजान भी होंगे। 

श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना

कौरवों के छल के बाद जब पांडवों ने अपना वनवास और अज्ञातवास पूर्ण कर लिया तब भी दुर्योधन उन्हें इन्द्रप्रस्थ लौटाने को तैयार ना हुआ।

क्रूरता और द्वेष से संस्कारित भूमि चाहते थे श्री कृष्ण

वे ये भी जानते थे कि संधि करने के उनके सारे प्रयत्न विफल होंगे। तो अब जब युद्ध की ठन ही गयी तो उन्होंने बहुत सावधानीपूर्वक युद्धभूमि की खोज आरम्भ की। श्रीकृष्ण को इस बात का भय था कि चूँकि दोनों ओर सम्बन्धी ही युद्ध कर रहे हैं, इसीलिए कही ऐसा ना हो कि युद्ध आरम्भ होने के बाद एक दूसरे को आमने सामने देख कर कौरव और पांडव संधि कर लें और इस महायुद्ध का आयोजन विफल हो जाये। 

श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना

यही कारण था कि वो युद्ध के लिए एक ऐसी भूमि की खोज कर रहे थे जिसका इतिहास अत्यंत भयावह और कठोर रहा हो। ऐसा इस लिए कि वे जानते थे कि इस युद्ध में भाई भाई से, पिता पुत्र से और गुरु शिष्य से युद्ध करने वाले हैं और इसी लिए उनके मन में एक दूसरे के प्रति कठोरता का भाव शिखर पर रहना चाहिए। यही सोच कर उन्होंने अपने गप्तचरों को चारों दिशाओं में भेजा ताकि वो ऐसी भूमि का पता लगा सकें जो सर्वाधिक भयावह एवं कठोर हो। वापस आकर उनके गुप्तचरों ने अपनी-अपनी दिशा के सर्वाधिक भयावह अनुभव उन्हें बताये किन्तु जो गुप्तचर उत्तर दिशा की ओर गया था उसने वासुदेव से कहा कि उसने कुछ ऐसा देखा है जिससे उसे ये विश्वास है कि समस्त संसार में उससे अधिक भयावह भूमि और कोई नहीं है। 

श्रीकृष्ण ने आश्चर्य से उससे पूछा कि उसने ऐसा क्या देख लिया जिससे वो ऐसी बात कर रहा है?

कुरूक्षेत्र ऐसी जगह मिली जहां छोटी बात पर भाई ने भाई की हत्या कर दी 

तब उस गुप्तचर ने श्रीकृष्ण को बताया - "हे माधव! मैं कठोर भूमि की खोज में कुरुक्षेत्र तक जा पहुँचा। वहां मैंने देखा कि दो भाई साथ मिलकर खेती कर रहे थे। 

श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना

तभी वर्षा होने लगी और बड़े भाई ने अपने छोटे भाई से कहा कि वो तुरंत एक मेड़ बनाये ताकि पानी उनके खेतों में घुसने से रुक सके। इसपर छोटे भाई ने कहा कि मैं आपका दास नहीं हूँ। आप स्वयं मेंड़ बना लें। ये सुनकर बड़े भाई को इतना क्रोध आया कि उसने अपने खड्ग से अपने छोटे भाई की हत्या कर दी और उसके शव को कुचलते हुए मेंड़ के स्थान पर लगा दिया जिससे जल का प्रवाह रुक गया।"ये सुनकर श्रीकृष्ण भी हतप्रभ रह गए। ऐसी भूमि जहाँ भाई-भाई की हत्या इस नृशंशता से कर दे, वही भूमि उन्हें युद्ध के लिए उचित जान पड़ी। वे ये भी जानते थे कि कुरुक्षेत्र की भूमि पर ही कभी भगवान परशुराम ने २१ बार क्षत्रियों को मार कर उनके रक्त से ५ सरोवर बना दिए थे। कदाचित उसी भीषण हिंसा के प्रभाव से आज भी वहां का वातावरण ऐसा था जहाँ मित्रता और संधि पनप नहीं सकती थी। यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने उसी कुरुक्षेत्र की भूमि को महाभारत के युद्ध के लिए चुना। 

उसी भूमि के प्रभाव से संधि के कई अवसर होते हुए भी वो महायुद्ध रुका नहीं और लाखों लोगों की बलि के साथ ही समाप्त हुआ। 

कुरुक्षेत्र की भूमि पर प्राण त्यागने वाला  स्वर्गलोक जायेगा 

महापुराण महाभारत ग्रंथ के अनुसार कुरु ने जिस क्षेत्र को बार-बार जोता था, उसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। कहते हैं कि जब कुरु इस क्षेत्र की जुताई कर रहे थे तब इन्द्र ने उनसे जाकर इसका कारण पूछा। कुरु ने कहा कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर मारा जाए, वह पुण्य लोक में जाए, ऐसी मेरी इच्छा है। इन्द्र उनकी बात को हंसी में उड़ाते हुए स्वर्गलोक चले गए।

श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही क्यों चुना

ऐसा अनेक बार हुआ। इन्द्र ने अन्य देवताओं को भी ये बात बताई। देवताओं ने इन्द्र से कहा कि यदि संभव हो तो कुरु को अपने पक्ष में कर लो। तब इन्द्र ने कुरु के पास जाकर कहा कि कोई भी पशु, पक्षी या मनुष्य निराहार रहकर या युद्ध करके इस स्थान पर मारा जायेगा तो वह स्वर्ग का भागी होगा। ये बात भीष्म, कृष्ण आदि सभी जानते थे, इसलिए महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया।। इसलिए भी वो स्थान श्रीकृष्ण ने चुना क्योंकि वे चाहते थे कि युद्ध मे मारे जाने वाले सभी योद्धाओं को स्वर्ग प्राप्त हो।

उम्मीद है ब्लॉग के सभी पाठकों को पोस्ट पसंद आएगी। 

#जय श्री कृष्णा 

भारतीय राजनीति और धर्म

भारतीय राजनीति और धर्म 

भारत को हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है। अक्सर कहा जाता है, कि भारत में धर्मनिरपेक्षवाद का भविष्य अंधकार में है। यह एक विवादास्पद विषय है, किंतु पक्ष में जो तर्क दिया जाता है, कि भारत में धर्मनिरपेक्ष समाज के निर्माण में धर्म सबसे बड़ी बाधा है, तो यह पूर्णतः सत्य भले ही न हो,परन्तु थोड़ा सत्य तो है ही। 

भारतीय राजनीति और धर्म

हमारे देश भारत में हर व्यक्ति कहीं ना कहीं (प्रत्यक्ष या परोक्ष) इस राजनीतिक कड़ी से जुड़ा हुआ है। लोग कहते हैं कि राजनीति बहुत ही गंदी चीज होती है, लेकिन मौका आने पर हर व्यक्ति राजनीति से जुड़ना चाहता है। किसी ने खूब कहा है कि राजनीतिक वह गंधैली तकिया है या चादर है, जिसमें से बदबू तो बहुत आती है, लेकिन मौका आने पर हर कोई उस चादर को ओढ़ना चाहता है। आज के समय में राजनीति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीति का स्तर काफी निम्न दर्जे का हो गया है। आज की राजनीति भी जाति और धर्म प्रधान हो गयी है। राजनीति में धर्म होना चाहिए परंतु धर्म की राजनीति कभी नहीं होनी चाहिए। आए दिन देखा जाता है कि सांप्रदायिक दंगे फैल रहे हैं। दोनों गुट आपस में लड़ रहे हैं। जान माल का नुकसान हो रहा है। सरकारी संपत्ति का नुकसान होता है कुछ ऊपर बैठे राजनेता अपने निजी हित के लिए अपने आंखों को बंद किए हुए बैठे रहते हैं, जो समय रहते उचित कार्यवाही करके रोका जा सकता है उसे रोकने का प्रयास नहीं करते हैं। 

वैसे तो धर्म और राजनीति को हमेशा एक दूसरे से अलग माना जाता रहा हैं। मगर आज के समय में ये एक दूसरे को इस प्रकार प्रभावित करते हैं, जिससे एक दूसरे का पूरक कहा जाना, गलत नहीं होगा। 

राजनितिक संस्थाएं लोगों में विश्वास तथा उनका प्रतिनिधित्व दर्शाने के लिए धर्म तथा धर्म से जुडी संस्थाओं का सहारा लेती हैं। दूसरी तरफ आज हर धर्म की अपनी संस्थाएं जो प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष तौर पर राजनितिक दलों को अपना समर्थन देती हैं, तथा लोगो से अपील भी करती हैं। 

भारतीय राजनीति और धर्म

यही वजह हैं कि भारत जैसे देश में लोग धर्म प्रिय हैं। इसी कारण हर तरह के चुनावों में धर्म के नाम पर वोट भी मांगे जाते हैं। वहीं अमेरिका जैसे पश्चिम देशों की राजनीति में धर्म का राजनीति पर ना के बराबर प्रभाव पड़ता है। 

भारत हमेशा से सहिष्णुता का पुजारी रहा हैं, कई विदेशी जातियों ने यहाँ आक्रमण किया तथा यही पर रच बस गये। जब भारत का संविधान बना तो इसे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में मान्यता दी गईं। मगर बहुत से सता स्वार्थी धूर्त राजनेता, जो अंग्रेजों के संभवतः चापलूसी करने वालों की सन्तान ही रहे होंगे, जो इस तथ्य से भली भांति वाकिफ थे, कि भारत में राजनीति को धर्म से अलग नहीं रखा जा सकता। 

हमारा धर्म चुनना हमारी स्वतंत्रता हैं, इसका मतलब यह नहीं कि हम हर बात को धर्म के नजरिये से ही देखें। अब वक्त आ चूका हैं धर्म व राजनीति में साठ गाठ करने वालों की दुकाने बंद होनी ही चाहिए। क्योंकि धर्म व्यक्ति की आस्था, परम्परा व इतिहास हैं, इसे व्यक्ति तक ही रहने दिया जाए, न कि विवाद के साथ राजनेताओं के पक्ष-विपक्ष का मुद्दा। 

यह कहा जा सकता है, कि हम भारतीय हैं।  हमें इस बात पर गर्व है क्योंकि यहां विभिन्न धर्मों एवं जातियों के लोग रहते हैं। इसीलिए भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है, जिससे कि धर्म को राजनीति से हटाया जाए किंतु धर्म का प्रभाव व्यवहारिक रूप से भारतीय जनता के मन मस्तिष्क से नहीं मिट पाया है। 

प्राचीन शिक्षा व्यवस्था Vs आधुनिक शिक्षा व्यवस्था

प्राचीन शिक्षा व्यवस्था Vs आधुनिक शिक्षा व्यवस्था 

शिक्षा किसी भी मनुष्य के जीवन की वह सबसे अनमोल वस्तु होती है, जिसे अन्य व्यक्ति उससे छीन नहीं सकता है, ना ही उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त कर सकता है और ना ही उसे खरीद सकता है। इस धरती पर शिक्षा के सिवा ज्ञान के सिवा अन्य सभी चीजें खरीदी व बेची जा सकती हैं। इसी से हम लोग अनुभव कर सकते हैं कि एक मनुष्य के जीवन में शिक्षा का क्या महत्व है।

प्राचीन शिक्षा व्यवस्था Vs आधुनिक शिक्षा व्यवस्था

प्राचीन काल में लोग शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने घर से सालों साल दूर ऋषि मुनियों के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। फिर धीरे-धीरे समाज का विकास होने लगा। आश्रम के बाद गुरुकुल का चलन इस समाज में देखा जाने लगा आज। 2022 में भी हमारे देश में गुरुकुल अस्तित्व में है। आज भी बच्चे अपने घर परिवार से दूर गुरुकुल में पूर्ण शिष्टाचार के साथ सादा जीवन व्यतीत करते हुए शिक्षा ग्रहण करते हैं। गुरुकुल के पहनावे रहन - सहन को देखकर आज सभी लोगों को ऐसा प्रतीत होगा कि ना जाने यह बच्चे किस दुनिया में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं होता है कि वह बच्चे जो गुरुकुल में पढ़ रहे हैं, जो गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, आज के आधुनिक स्कूलों की तुलना में कहीं पीछे हैं। 

प्राचीन काल में शिक्षा व्यवस्था 

जबकि हमारी प्राचीन भारतीय शिक्षा में शुल्क प्रदान करने का कोई निश्चित नियम नहीं था प्रायर शिक्षा निशुल्क होती थी शिक्षा प्रदान करना विद्वानों एवं आचार्य का पुनीत कर्तव्य माना जाता था जो लोग शुल्क पाने की लालसा से शिक्षा प्रदान करते थे समाज में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता था कालिदास ने ऐसे विद्वान को ज्ञान का व्यवसाय कहां है इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता था कि निर्धन का बालक शिक्षा प्राप्त करने से वंचित न रह जाए तथापि शिक्षा का कर्तव्य था कि वह ज्ञानदाता आचार्य को कुछ न कुछ धन दक्षिणा के रूप में अवश्य प्रदान करें ऐसी व्यवस्था इसलिए की गई ताकि आचार्य के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न ना हो सके धनी व्यक्ति अपने बालकों के प्रवेश के समय ही गुरु को संपूर्ण धनराशि प्रदान कर देते थे जातक कथाओं में कुछ बातों का उल्लेख मिलता है जिसमें की श्रेष्ठी पुत्र तथा राजकुमार तक्षशिला में शिक्षा के लिए प्रवेश के समय ही संपूर्ण शिक्षण शुल्क दे देते थे महाभारत से पता चलता है कि भीष्म ने गुरु द्रोणाचार्य को कौरव राजकुमारों की शिक्षा के निमित्त प्रारंभ में ही शुल्क प्रदान कर दिया था यदि कोई व्यक्ति समर्थ होते हुए भी आचार्य को शुल्क प्रदान नहीं करता था तो समाज में उसकी निंदा की जाती थी जिन छात्रों के अभिभावक निर्धन थे वे स्वयं गुरु की सेवा द्वारा शुल्क की क्षतिपूर्ति करते थे अध्ययन समाप्ति के बाद ऐसे विद्यार्थी भिक्षा मांगकर गुरु दक्षिणा चुकाते थे ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जहां आचार्यों ने दक्षिणा लेने से इनकार कर दिया कर दिया। कभी-कभी गुरु शिष्य की सेवा से प्रसन्न होकर उसे यह दक्षिणा मांग लेते थे।

प्राचीन शिक्षा व्यवस्था Vs आधुनिक शिक्षा व्यवस्था

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था 

प्राचीन काल में शिक्षा को दान के रूप में देखा जाता था। यह दान कब व्यापार में परिवर्तित हो गया, यह बता पाना बहुत ही मुश्किल है। आज शिक्षा के नाम पर सिर्फ और सिर्फ व्यापार होता है। आज शिक्षा के नाम पर धन और संपत्ति का दोहन होता है। कहने के लिए तो हमारा समाज समानता को मान्यता देता है, परंतु प्राथमिक विद्यालय से लेकर के माध्यमिक विद्यालय तक हर जगह असमानता है और यह असमानता हमारे समाज में किस प्रकार से पनप रहा है, इसका वर्णन कर पाना अत्यंत ही कठिन है। यदि कोई गरीब का बच्चा है, तो उस  विद्यालय में पढ़ने जाएगा, जहां पर नाही कोई बिल्डिंग है, ना बैठने की कोई व्यवस्था है, ना ही कोई संसाधन है।  इसके अलावा इस प्रकार के विद्यालयों में अध्यापक भी अपनी मनमानी अनुसार आते जाते हैं। वहीं दूसरी ओर यदि कोई व्यापारी, अधिकारी या नेता या कोई अन्य पैसे वाले का बच्चा है, वह किसी सीबीएससी कान्वेंट स्कूल में पढेगा, जहां पर बड़ी बड़ी बिल्डिंग है, हर आधुनिक साजो सामान, शिक्षा प्रदान करने के लिए अति योग्य अध्यापक रखे जाते हैं। इससे भी मजे की बात तो यह है कि मां-बाप का मन इन सब चीजों से भी नहीं भरता है, तो वह अपने बच्चों को स्कूल के अतिरिक्त और विद्वान बनाने के लिए और ज्ञानवान बनाने के लिए ट्यूशन लगवाते हैं। यह ट्यूशन शब्द इतना भयावह है कि जो मां - बाप अपने बच्चों को अतिरिक्त शिक्षा नहीं दिला सकते हैं, उनको ऐसा प्रतीत होता है की यदि उन्होंने अपने बच्चों को ट्यूशन नहीं कराया तो कहीं उनका बच्चा पीछे न छूट जाए। ऐसी मानसिकता लेकर के आज हमारे समाज के मां-बाप सुबह से लेकर शाम तक परिश्रम करते हैं। 


युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति' || Increasing 'drug trend' among youth ||

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'

हमारा यह समाज आज बहुत ही तेजी से आधुनिक होता जा रहा है। दिन प्रतिदिन हमें नई- नई खोजें देखने को मिलती हैं। हमारा हिंदुस्तान युवाओं से भरा एक देश है। इन सबके बीच एक चिंता का विषय भी है, हमारे समाज के अधिकतर युवा पीढ़ी किसी ना किसी नशे की लत की आदी होती जा रही है, जो हमारी युवाओं के लिए आने वाले समय में बहुत ही घातक सिद्ध हो सकता है। 

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||

आज हर वर्ग का व्यक्ति हर वर्ग का युवा चाहे वह स्कूल में हो, कॉलेज में हो या किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहा हो, किसी ना किसी नशे की लत उसको लगी हुई है। नशा एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जो हमारे युवा पीढ़ी को दिन प्रतिदिन बर्बादी की खाई में ढकेलता जा रहा है, जिसके कारण मनुष्य बहुत सी बीमारियों से ग्रसित होता जा रहा है और मनुष्य की आयु दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। 

नशे की ओर आकर्षित होने के बहुत से कारण हैं, जिनमें मूल कारण कहीं ना कहीं पारिवारिक व्यस्तता भी है। मां- बाप अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने एवं हर आधुनिक वस्तु अपने संतान को देना चाहते हैं। इसी कारण कई घरों में कई परिवारों में मां-बाप दोनों किसी का किसी प्रकार के काम में सम्मिलित होते हैं, जिसके कारण उनका पूरा ध्यान अपने बच्चों पर नहीं रहता। यही वजह है कि बच्चे गलत संगति में फंसकर इन नशे की वस्तुओं का उपयोग करने लगते हैं। हर मां बाप का कर्तव्य है कि अपने बच्चे की दिनचर्या पर पूर्ण ध्यान रखें। 

युवा वर्ग में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति वास्तव में चिंताजनक है। युवा उचित मार्गदर्शन के अभाव में नशा करते हैं। किशोरावस्था के बालकों पर खास ध्यान देना बहुत ही जरुरी है। उनकी संगत पर निगाह रखी जाए। संगत ठीक हो तो बच्चे नशे के जाल से बच जाते हैं।

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||

युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति के और भी अनेक कारण हैं। नशे की उपलब्धता एवं पहुंच आसान होने से भी नशे की प्रवृत्ति बढ़ी है। संयुक्त परिवार का विघटन होने से भी युवाओं को अधिक स्वतंत्रता मिली है। मीडिया ने भी नशे के कारोबार को प्रचारित किया है। वर्तमान में बढ़ती बेरोजगारी में मानसिक अवसाद दूर करने के लिए भी युवा नशे का सहारा लेते हैं। अत: इन सब पर ध्यान देकर हमें समस्या का निराकरण करना होगा।

बेरोजगारी, आधुनिक दिखने का भ्रम, प्रेम में हताशा, सद् शिक्षा का अभाव, भ्रामक विचारधाराओं में उलझना, सामाजिक एवं पारिवारिक अनुशासन के प्रति विद्रोह की भावना, हाईप्रोफाइल जीवनशैली की लालसा जैसे अनेक कारण अवसाद की वजह हैं। इससे युवाओं में नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। युवा अपनी क्षमता को पहचानें, दूसरों से अपनी तुलना ना करें। नशे में खो जाना कायरता है। खेलों से जुड़ें। परोपकार के काम करें। इसी से अच्छे समाज का निर्माण होगा।

युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए सरकार को नशे से संबंधित सामानों पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाना चाहिए। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया व सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए और युवाओं में जो नशे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, उसे पूर्णत: खत्म करने का प्रयास करना चाहिए।

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Increasing 'drug trend' among youth

Today our society is becoming very modern very fast. Every day we get to see new discoveries. Our India is a country full of youth. In the midst of all this, there is also a matter of concern, most of the young generation of our society is becoming addicted to some kind of drug addiction, which can prove to be very fatal for our youth in the coming times.

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||

Today, the youth of every class, whether it is in school, college or working in a multinational company, is addicted to some kind of drug addiction. Drug addiction is such a food item, which is pushing our young generation into the abyss of waste day by day, due to which man is suffering from many diseases and man's life is decreasing day by day.

There are many reasons for being attracted towards drugs, in which the root cause is also family busyness somewhere. Parents want to give good education to their children and give every modern thing to their children. For this reason, in many homes, in many families, both parents are involved in some kind of work, due to which their full attention is not given to their children. This is the reason why children get trapped in the wrong company and start using these intoxicants. It is the duty of every parent to take full care of their child's routine.

The increasing trend of drug addiction among the youth is really worrying. Youth indulge in drugs due to lack of proper guidance. It is very important to pay special attention to the children of adolescence. Keep an eye on their company. If the company is right, then the children are saved from the trap of intoxication.

There are many other reasons for the increasing trend of drug addiction among the youth. Due to the availability and ease of access to drugs, the tendency of drug addiction has also increased. The dissolution of the joint family has also given more freedom to the youth. The media has also publicized the drug business. In the current rising unemployment, youth also resort to drugs to overcome mental depression. So by paying attention to all these, we have to solve the problem.

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||

Unemployment, illusion of modern appearance, frustration in love, lack of good education, entanglement in deceptive ideologies, feeling of rebellion against social and family discipline, craving for high profile lifestyle are the reasons for depression. Due to this, the tendency of drug addiction is increasing among the youth. Know your potential, don't compare yourself to others. Getting drunk is cowardice. Join the Games. Do charity work. This will create a good society.

In order to stop the increasing trend of drug addiction among the youth, the government should completely ban the drug related goods. Awareness campaign should be conducted with the help of social media, print media and social organizations and efforts should be made to eliminate the drug addiction which is increasing in the youth.

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||