Cricket News: Latest Cricket News, Live Scores, Results, Upcoming match Schedules | Times of India

Sportstar - IPL

Showing posts with label पौराणिक कथा. Show all posts
Showing posts with label पौराणिक कथा. Show all posts

दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों होती है, विष्णु भगवान की क्यों नहीं?

दुर्लभ जानकारी - भगवान राम और माता सीता की पूजा क्यों नही? 

दीपावली आने वाली है। सभी के घरों में दीपावली की तैयारियाँ साफ़ सफाई जोरों पर है। ऐसे में हम हमेशा से पढ़ते चले आ रहे हैं की दीपावली क्यूँ मनाई जाती है? पर इसबार का सवाल थोड़ा अलग है। अधिकतर घरों में बच्चे यह दो प्रश्न अवश्य पूछते हैं जब दीपावली भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास से अयोध्या लौटने की खुशी में मनाई जाती है तो दीपावली पर लक्ष्मी पूजन क्यों होता है? भगवान राम और माता सीता की पूजा क्यों नही? दूसरा यह कि दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों होती है, विष्णु भगवान की क्यों नहीं? लक्ष्मी पूजन का औचित्य क्या है, जबकि दीपावली का उत्सव भगवान राम राम से जुड़ा हुआ है। आज अपने बच्चों को इन प्रश्नों के सही उत्तर बतायें।

दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों होती है, विष्णु भगवान की क्यों नहीं?

दीपावली का उत्सव दो युग, सतयुग और त्रेता युग से जुड़ा हुआ है। सतयुग में समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी उस दिन प्रगट हुई थी इसलिए लक्ष्मीजी का पूजन होता है। भगवान राम भी त्रेता युग में इसी दिन अयोध्या लौटे थे तो अयोध्या वासियों ने घर घर दीपमाला जलाकर उनका स्वागत किया था, इसलिए इसका नाम दीपावली है। अत: इस पर्व के दो नाम है लक्ष्मी पूजन जो सतयुग से जुड़ा है दूसरा दीपावली जो त्रेता युग प्रभु राम और दीपों से जुड़ा है।

लक्ष्मी गणेश का आपस में क्या रिश्ता है? और दीवाली पर इन दोनों की पूजा क्यों होती है?

लक्ष्मी जी सागरमन्थन में मिलीं, भगवान विष्णु ने उनसे विवाह किया और उन्हें सृष्टि की धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया। लक्ष्मी जी ने धन बाँटने के लिए कुबेर को अपने साथ रखा। कुबेर बड़े ही कंजूस थे, वे धन बाँटते ही नहीं थे। वे खुद धन के भंडारी बन कर बैठ गए। माता लक्ष्मी खिन्न हो गईं, उनकी सन्तानों को कृपा नहीं मिल रही थी। उन्होंने अपनी व्यथा भगवान विष्णु को बताई। भगवान विष्णु ने कहा कि तुम कुबेर के स्थान पर किसी अन्य को धन बाँटने का काम सौंप दो। माँ लक्ष्मी बोली कि यक्षों के राजा कुबेर मेरे परम भक्त हैं उन्हें बुरा लगेगा।

दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों होती है, विष्णु भगवान की क्यों नहीं?

तब भगवान विष्णु ने उन्हें गणेश जी की विशाल बुद्धि को प्रयोग करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने गणेश जी को भी कुबेर के साथ बैठा दिया। गणेश जी ठहरे महाबुद्धिमान। वे बोले, माँ! मैं जिसका भी नाम बताऊँगा, उस पर आप कृपा कर देना, कोई किंतु परन्तु नहीं। माँ लक्ष्मी ने हाँ कर दी। अब गणेश जी लोगों के सौभाग्य के विघ्न, रुकावट को दूर कर उनके लिए धनागमन के द्वार खोलने लगे। गणेश जी कुबेर के भंडार का द्वार खोलने वाले बन गए। गणेश जी की भक्तों के प्रति ममता कृपा देख माँ लक्ष्मी ने अपने मानस पुत्र श्रीगणेश को आशीर्वाद दिया कि जहाँ वे अपने पति नारायण के सँग ना हों, वहाँ उनका पुत्रवत गणेश उनके साथ रहें।

दीवाली आती है कार्तिक अमावस्या को, भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में होते हैं, वे जागते हैं ग्यारह दिन बाद देव उठनी एकादशी को। माँ लक्ष्मी को पृथ्वी भ्रमण करने आना होता है, शरद पूर्णिमा से दीवाली के बीच के पन्द्रह दिनों में। इसलिए वे अपने सँग ले आती हैं अपने मानस पुत्र गणेश जी को। इसलिए दीवाली को लक्ष्मी गणेश की पूजा होती है।

दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा क्यों होती है, विष्णु भगवान की क्यों नहीं?

यह विडंबना है कि देश और हिंदु धर्म के सबसे बड़े त्यौहार का पाठ्यक्रम में कोई विस्तृत वर्णन नही है और जो वर्णन है वह अधूरा है। इस लेख को पढ़ कर स्वयं भी लाभान्वित हों और अपनी दूसरों के साथ साझा करना भी ना भूलें। 

दीपावली की अग्रिम शुभकामनायें। 

पांच लाख श्लोकों वाले महाभारत का सार मात्र नौ पंक्तियों में समझें

पांच लाख श्लोकों वाले महाभारत का सार मात्र नौ पंक्तियों में समझें:

चाहे हिंदू हों या किसी अन्य धर्म से,

चाहे महिला हों या पुरुष,

चाहे गरीब हों या अमीर,

चाहे अपने देश में हों या विदेश में, फर्क नहीं पड़ता 

संक्षेप में, हम सब एक इंसान हैं। 

यहाँ महाभारत के पांच लाख श्लोकों को किसी ने बाखूबी 9 लाइनों में व्यक्त किया है और अनमोल "9 मोती" नाम दिया है। वाकई में ये नौ वाक्य महाभारत का सार व्यक्त कर रहें हैं, एक बार अवश्य पढ़ें।  

पांच लाख श्लोकों वाले महाभारत का सार मात्र नौ पंक्तियों में समझें

1. अगर समय रहते अपने बच्चों की अनुचित मांगों और इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखते हैं, तो हम जीवन में असहाय हो जाएंगे... "कौरव"

2. हम चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अगर अधर्म का साथ देंगे, तो हमारी ताकत, हथियार, कौशल और आशीर्वाद सब बेकार हो जाएंगे... "कर्ण"

3. अपने बच्चों को इतना महत्वाकांक्षी न बनाएं कि वे अपने ज्ञान का दुरुपयोग करें और कुल विनाश का कारण बनें... "अश्वत्थामा"

4. कभी भी ऐसे वादे न करें कि आपको अधर्मियों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़े... "भीष्म पितामह"

5. धन, शक्ति, अधिकार का दुरुपयोग और गलत काम करने वालों का समर्थन अंततः पूर्ण विनाश की ओर ले जाता है... "दुर्योधन"

6. सत्ता की बागडोर कभी भी किसी अंधे व्यक्ति को न सौंपें, अर्थात जो स्वार्थ, धन, अभिमान, ज्ञान, आसक्ति या वासना से अंधा हो, क्योंकि यह विनाश की ओर ले जाएगा... "धृतराष्ट्र"

7. यदि ज्ञान के साथ बुद्धि भी हो, तो आप निश्चित रूप से विजयी होंगे... "अर्जुन"

8. छल आपको हर समय सभी मामलों में सफलता नहीं दिलाएगा... "शकुनि"

9. यदि आप नैतिकता, धर्म और कर्तव्य को सफलतापूर्वक बनाए रखते हैं, तो दुनिया की कोई भी शक्ति आपको नुकसान नहीं पहुँचा सकती... "युधिष्ठिर"

यह लेख सभी के लिए लाभदायक है, इसलिए कृपया इसे बिना किसी बदलाव के साझा करें।  "सर्वे भवन्तु सुखिनः - सर्वे सन्तु निरामयाः।" 

मयूर पंख

मयूर पंख

वनवास के दौरान माता सीता जी को प्यास लगी। पानी के लिए श्रीरामजी ने चारों ओर देखा, तो उनको दूर-दूर तक जंगल ही जंगल दिख रहा था।

मयूर पंख

उन्होंने वन देव से प्रार्थना की - "हे वन देवता ! आसपास जहाँ कहीं पानी हो, वहाँ जाने का मार्ग कृपा कर सुझाईये।" 

तभी वहाँ एक मयूर ने आकर श्रीरामजी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर एक जलाशय है। चलिए मैं आपका मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ, किंतु मार्ग में हमारी भूल चूक होने की संभावना है।

श्रीरामजी ने पूछा - वह क्यों ?

तब मयूर ने उत्तर दिया कि - मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप चलते हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ जाऊंगा। उस के सहारे आप‌ जलाशय तक पहुँच ही जाओगे।

यहां पर एक बात ध्यान देने योग्य है कि - मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं। अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध पंखों को बिखेरेगा, तो उसकी मृत्यु हो जाती है और वही हुआ।

अंत में जब मयूर अपनी अंतिम सांस ले रहा होता है, तब उसने मन में ही कहा कि वह कितना भाग्यशाली है, कि जो जगत की प्यास बुझाते हैं, ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरा जीवन धन्य हो गया। अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नहीं रही।

तभी भगवान श्रीराम ने मयूर से कहा कि मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरकर, अपने जीवन का त्यागकर मुझ पर जो ऋणानुबंध चढ़ाया है, मैं उस ऋण को अगले जन्म में जरूर चुकाऊंगा, तुम्हारे पंख अपने सिर पर धारण करके। तत्पश्चात अगले जन्म में श्री कृष्ण अवतार में उन्होंने अपने माथे (मुकुट) पर मयूर पंख को धारण कर वचन अनुसार उस मयूर का ऋण उतारा था। तात्पर्य यही है कि अगर भगवान को ऋण उतारने के लिए पुनः जन्म लेना पड़ता है, तो हम तो मानव हैं। न जाने हम कितने ही " ऋणानुबंध " से बंधे हैं।

उसे उतारने के लिए हमें तो कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे।

अर्थात... 

जो भी भला हम कर सकते हैं, इसी जन्म में हमें करना है।

मयूर पंख

जय श्री कृष्ण 🙏

कैसे उत्पत्ति हुई नागों की

कैसे उत्पत्ति हुई नागों की

पुराणों के अनुसार सभी नागों की उत्पत्ति ऋषि कश्यप की पत्नि कद्रू की कोख से हुई है, कद्रू ने हजारों पुत्रों को जन्म दिया था जिसमें प्रमुख नाम अनंत(शेष), वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख, पिंगला और कुलिक थे।

कैसे उत्पत्ति हुई नागों की

कद्रू दक्ष प्रजापति की कन्या थीं,

अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कार्कोटक और पिंगला- उक्त पांच नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था, यह सभी कश्यप वंशी थे एवम इन्ही से नागवंश चला।

पुराणों के शोधानुसार नाग वंशावलियों में ‘शेष नाग’ को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेष नाग को ही ‘अनंत’ नाम से भी जाना जाता है इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए फिर तक्षक और पिंगला, वासुकी ने भगवान शिव की सेवा में नियुक्ति होना स्वीकार किया।

वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से ‘तक्षक’ कुल चलाया था।उक्त तीनों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं। शेषनाग (अनंत) को भगवान विष्णु की सेवा का अवसर मिला।

एक पुराणिक लेख अनुसार ये मूलत: कश्मीर के थे कश्मीर का ‘अनंतनाग’ इलाका इनका गढ़ माना जाता था, कांगड़ा,कुल्लू व कश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नाग ( सर्प ) ब्राह्मणों की एक जाति आज भी मौजूद है। महाभारत काल में पूरे भारत वर्ष में नागा जातियों के समूह फैले हुए थे विशेष तौर पर कैलाश पर्वत से सटे हुए इलाकों से असम, मणिपुर, नागालैंड तक इनका प्रभुत्व था, ये लोग सर्प पूजक होने के कारण नागवंशी कहलाए,कुछ विद्वान मानते हैं कि शक या नाग जाति हिमालय के उस पार की थी, अब तक तिब्बती भी अपनी भाषा को ‘नागभाषा’ कहते हैं।

उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादी नाम से नागों के वंश हुआ करते थे। भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था। अथर्ववेद में कुछ नागों के नामों का उल्लेख मिलता है ये नाग हैं श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित कोबरा (पृश्चि), काला फणियर (करैत), घास के रंग का (उपतृण्य), पीला (ब्रम), असिता रंगरहित (अलीक), दासी, दुहित,असति,तगात,अमोक और तवस्तु आदि।

‘नागा आदिवासी’ का संबंध भी नागों से ही माना गया है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी नल और नाग वंश तथा कवर्धा के फणि-नाग वंशियों का उल्लेख मिलता है। पुराणों में मध्यप्रदेश के विदिशा पर शासन करने वाले नाग वंशीय राजाओं में शेष, भोगिन,सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि आदि का उल्लेख मिलता है।

पुराणों अनुसार एक समय ऐसा था जबकि नागा समुदाय पूरे भारत (पाक-बांग्लादेश सहित) के शासक थे, उस दौरान उन्होंने भारत के बाहर भी कई स्थानों अपनी विजय पताकाएं फहराई थीं तक्षक, तनक और तुश्त नागाओं के राजवंशों की लम्बी परंपरा रही है, इन नाग वंशियों में ब्राह्मण,क्षत्रिय आदि सभी समुदाय और प्रांत के लोग थे।

नागवंशियों ने भारत के कई हिस्सों पर राज किया था इसी कारण भारत के कई शहर और गांव ‘नाग’ शब्द पर आधारित हैं मान्यता है कि महाराष्ट्र का नागपुर शहर सर्वप्रथम नागवंशियों ने ही बसाया था। वहां की नदी का नाम नाग नदी भी नागवंशियों के कारण ही पड़ा, नागपुर के पास ही प्राचीन नागरधन नामक एक महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक नगर है। महार जाति के आधार पर ही महाराष्ट्र से महाराष्ट्र हो गया महार जाति भी नागवंशियों की ही एक जाति थी। इसके अलावा हिंदीभाषी राज्यों में ‘नागदाह’ नामक कई शहर और गांव मिल जाएंगे उक्त स्थान से भी नागों के संबंध में कई किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं, नगा या नागालैंड को क्यों नहीं नागों या नागवंशियों की भूमि माना जा सकता है।

🚩हर हर महादेव🚩

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना

क्या है इसके पीछे का रहस्य..?

जब भी हम किसी शिव मंदिर जाते हैं, तो अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग शिवलिंग के सामने बैठे नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं। ये एक परंपरा बन गई है। इस परंपरा के पीछे की वजह एक मान्यता है। आज हम इसी बारे में चर्चा करेंगे। 

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

इसलिए नंदी के कान में कहते हैं मनोकामना

मान्यता है जहां भी शिव मंदिर होता है, वहां नंदी की स्थापना भी जरूर की जाती है, क्योंकि नंदी भगवान शिव के परम भक्त हैं। जब भी कोई व्यक्ति शिव मंदिर में आता है, तो वह नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहता है। इसके पीछे मान्यता है कि भगवान शिव तपस्वी हैं और वे हमेशा समाधि में रहते हैं। ऐसे में उनकी समाधि और तपस्या में कोई विघ्न ना आए। इसलिए नंदी ही हमारी मनोकामना शिवजी तक पहुंचाते हैं। इसी मान्यता के चलते नंदी को लोग अपनी मनोकामना कहते हैं।

शिव के ही अवतार हैं नंदी

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

शिलाद नाम के एक मुनि थे, जो ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने उनसे संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद मुनि ने संतान भगवान शिव की प्रसन्न कर अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र मांगा। भगवान शिव ने शिलाद मुनि को ये वरदान दे दिया। एक दिन जब शिलाद मुनि भूमि जोत रहे थे, उन्हें एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। एक दिन मित्रा और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम आए। उन्होंने बताया कि नंदी अल्पायु हैं। यह सुनकर नंदी महादेव की आराधना करने लगे। प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और कहा कि तुम मेरे ही अंश हो, इसलिए तुम्हें मृत्यु से भय कैसे हो सकता है? ऐसा कहकर भगवान शिव ने नंदी का अपना गणाध्यक्ष भी बनाया।

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

ॐ नमः शिवाय 🙏🔱
हर हर महादेव 🙏🔱

रुद्रावतार श्री हनुमान जी

रुद्रावतार श्री हनुमान जी

संसार के सर्वत्र देवस्थानों में हम आञ्जनेय महावली रामभक्त श्री हनुमान जी की आराधन, पूजन एवं वंदन करते चले आ रहे हैं। सभी वर्ण, आश्रम एवं सम्प्रदाय के लोग पवनसुत हनुमान जी के जयघोष में आनंदित हो जाते हैं। विभिन्न प्रकार की कामनाओं की पूर्णता के लिए विशिष्ट पद्धति का अवलम्बन कर महावीर हनुमान जी की उपासना विद्वज्जनों में प्रचलित है। हनुमान जी ही भगवान शिव के पूर्ण रूप हैं और वस्तुतः त्रिदेवों का एक संयुक्त रूप हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएँ प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से असुरों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है।

रुद्रावतार श्री हनुमान जी

स्वयं ब्रम्हा स्वयं विष्णु साक्षाद्वेदो महेश्वरः अर्थात वह जो भगवान ब्रह्मा हैं, वह जो भगवान विष्णु हैं और वह जो स्वयं भगवान महेश्वर हैं। 

पुराणों एवं ऐतिहासिक ग्रन्थों में हनुमान जी की उत्पत्ति तथा चरित्र के विषय में वर्णन विभिन्न प्रकार से उपलब्ध होता है। श्री हनुमानजी शंकर- सुवन, केशरी नन्दन और पवनसुत आदि विभिन्न नामों से वर्णित होते हैं। सन्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी हनुमान चालीसा में 'शंकर सुवन केशरी नन्दन' तथा 'अंजनि-पुत्र पवन सुत नामा' के रूप में स्पष्ट रूप से शंकर- सुबन, केशरी नन्दन एवं पवन सुत नामों से स्तुति करते हैं।

वायुपुराण के आधार पर हनुमान जी भगवान् शिव स्वरूप हैं। 

‘आश्विनस्यासिते पक्षे स्वात्यां भौमे चतुर्दशी ।
मेष लग्नेऽब्जनी गर्भात् स्वयं जातो हरः शिवः ।।’

अगस्त्य संहिता में

‘ऊर्जे कृष्णचतुर्दश्यां भौमे स्वात्यां कपीश्वरः ।
मेषलग्नेऽब्जनी गर्भात् प्रादुर्भूतः स्वयं शिवः ।।’

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, भौमवार, स्वाती नक्षत्र मेपलग्न में अञ्जनी के गर्भ से स्वयं भगवान् शिव के प्रकट होने के कारण श्री हनुमान् जी को रुद्रावतार माना गया है। 

'रुद्रावतार संसार दुःख भारापहारक !, 
लोटला गुलपातेन मातीन् निपातय ।' 

उपरोक्त से रुद्रावतार की स्पष्टता प्रकट होती है।

प्राणवायु के रूप में राम-भक्त हनुमान का शास्त्रीय प्रमाण विभिन्न पुराणों और अन्य शास्त्रों से प्राप्त किया जा सकता है।

गरुड़ पुराण 3.16.68 

अतो रोचनानमासौ मरुदंशः 
प्रकीर्तितः रामावतार हनुमानरामकार्यार्थसाधकः | 
स एव भीमसेनस्तु जातो भूमियाम् महाबलः ||

जब भगवान राम पृथ्वी पर अवतरित हुए, तो राम की सहायता करने के लिए वायु ने हनुमान के रूप में जन्म लिया। 

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मुख्य प्राणवायु के सभी अवतार श्रीहरि की सेवा और भक्ति का प्रसार करने के लिए ही साकार होते हैं। हनुमान के रूप में, वायु ने माँ जानकी की खोज में परम भगवान राम की सहायता की।

श्री हनुमान दशोत्तर शतनामस्तोत्रम् में भी कहा गया है~

रामावतारजाताय हनुमद्रुपिणे नमः। 
वासुदेवस्य भक्ताय भीमसेनाय ते नमः ॥
दिव्यरूपाय शान्ताय नमस्ते यतिरूपिणे अज्ञानतिमिरार्काय व्यासशिष्याय ते नमः॥

अर्थ -

जब भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया; उनकी सेवा के लिए वायु ने हनुमान के रूप में अवतार लिया। द्वापर युग में, वायु ने भगवान वासुदेव (कृष्ण) की सेवा के लिए भीमसेन के रूप में अवतार लिया।

ततश्च समये तस्माद्धनुमानिति नामभाक्र:। 
शम्भुर्जज्ञे कपित्नुर्महबलपराक्रमः॥

शिव के अंश से उत्पन्न बुद्धिमान वानर सुग्रीव का मंत्री बन गया और उसने हर तरह से उसके लिए लाभकारी कार्य किया।

-शतरुद्र-संहिता, शिवपुराण

तारासरोपनिषत् से आगे, शुक्ल यजुर्वेद से जुड़ा एक पाठ –

ॐ यो ह वै श्रीपरमात्मा नारायणः स भगवानमकरवाच्यः
शिवस्वरूपो हनुमानभूर्भुवः सुवस्तस्मै वै नमोनमः ।।

ॐ. वह जो श्री-परमात्मा, नारायण और (अक्षर) 'म' द्वारा वर्णित भगवान हैं, शिव हैं, जो हनुमान और भू:, भुव: और सुव: के रूप में हैं ; उनको नमस्कार!

जय श्री राम 🚩
जय बजरंगबली 🚩

महामृत्युञ्जय मंत्र की रचना कैसे हुई?

महामृत्युञ्जय मंत्र की रचना कैसे हुई?

शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे। विधाता ने उन्हें संतान योग नहीं दिया था। मृकण्ड ने सोचा कि महादेव संसार के सारे विधान बदल सकते हैं। इसलिए क्यों न भोलेनाथ को प्रसन्नकर यह विधान बदलवाया जाए।

महामृत्युञ्जय मंत्र की रचना कैसे हुई?

मृकण्ड ने घोर तप किया। भोलेनाथ मृकण्ड के तप का कारण जानते थे। इसलिए उन्होंने शीघ्र दर्शन न दिया, लेकिन भक्त की भक्ति के आगे भोले को झुकना पड़ा। महादेव प्रसन्न हुए और उन्होंने ऋषि को कहा कि मैं विधान को बदलकर तुम्हें पुत्र का वरदान दे रहा हूं, लेकिन इस वरदान के साथ हर्ष के साथ विषाद भी होगा। 

भोलेनाथ के वरदान से मृकण्ड को पुत्र हुआ, जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा। ज्योतिषियों ने मृकण्ड को बताया कि यह विलक्ष्ण बालक अल्पायु है। इसकी उम्र केवल 12 वर्ष है। ऋषि का हर्ष विषाद में बदल गया। मृकण्ड ने अपनी पत्नी को आश्वत किया, जिस ईश्वर की कृपा से संतान हुई है, वही भोले इसकी रक्षा करेंगे। भाग्य को बदल देना उनके लिए सरल कार्य है। 

मार्कण्डेय बड़े होने लगे तो पिता ने उन्हें शिवमंत्र की दीक्षा दी। मार्कण्डेय की माता बालक के उम्र बढ़ने से चिंतित रहती थी। उन्होंने मार्कण्डेय को अल्पायु होने की बात बता दी। मार्कण्डेय ने निश्चय किया कि माता-पिता के सुख के लिए उसी सदाशिव भगवान से दीर्घायु होने का वरदान लेंगे, जिन्होंने जीवन दिया है। बारह वर्ष पूरे होने को आए थे। मार्कण्डेय ने शिवजी की आराधना के लिए महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और शिव मंदिर में बैठकर इसका अखंड जाप करने लगे। 

महामृत्युञ्जय मंत्र की रचना कैसे हुई?

“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”

समय पूरा होने पर यमदूत उन्हें लेने आए। यमदूतों ने देखा कि बालक महाकाल की आराधना कर रहा है, तो उन्होंने थोड़ी देर प्रतीक्षा की। मार्केण्डेय ने अखंड जप का संकल्प लिया था। यमदूतों का मार्केण्डेय को छूने का साहस न हुआ और लौट गए। उन्होंने यमराज को बताया कि वे बालक तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाए। 

इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड के पुत्र को मैं स्वयं लेकर आऊंगा। यमराज मार्कण्डेय के पास पहुंच गए।बालक मार्कण्डेय ने यमराज को देखा तो जोर-जोर से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग से लिपट गया। यमराज ने बालक को शिवलिंग से खींचकर ले जाने की चेष्टा की तभी जोरदार हुंकार से मंदिर कांपने लगा। एक प्रचण्ड प्रकाश से यमराज की आंखें चुंधिया गईं। 

महामृत्युञ्जय मंत्र की रचना कैसे हुई?

शिवलिंग से स्वयं महाकाल प्रकट हो गए। उन्होंने हाथों में त्रिशूल लेकर यमराज को सावधान किया और पूछा तुमने मेरी साधना में लीन भक्त को खींचने का साहस कैसे किया? यमराज महाकाल के प्रचंड रूप से कांपने लगे। उन्होंने कहा- प्रभु मैं आप का सेवक हूं। आपने ही जीवों से प्राण हरने का निष्ठुर कार्य मुझे सौंपा है। 

भगवान चंद्रशेखर का क्रोध कुछ शांत हुआ तो बोले- "मैं अपने भक्त की स्तुति से प्रसन्न हूं और मैंने इसे दीर्घायु होने का वरदान दिया है। तुम इसे नहीं ले जा सकते।"

यम ने कहा- प्रभु आपकी आज्ञा सर्वोपरि है। मैं आपके भक्त मार्कण्डेय द्वारा रचित महामृत्युंजय का पाठ करने वाले को त्रास नहीं दूंगा। 

महाकाल की कृपा से मार्केण्डेय दीर्घायु हो गए। उनके द्वारा रचित महामृत्युंजय मंत्र काल को भी परास्त करता है। सोमवार को महामृत्युंजय का पाठ करने से शिवजी की कृपा होती है और कई असाध्य रोगों, मानसिक वेदना से राहत मिलती है।

जय श्री महाकालेश्वर नमः 🙏🔱🌹🚩

उर्मिला का बलिदान

उर्मिला का बलिदान 

रामायण का नाम आते ही भगवान श्री राम और माता सीता का दृश्य हमारी नजरों के सामने घूम जाता है। इसके आगे हम सभी को रामायण के मुख्य किरदार के नाम याद आते हैं, जैसे- लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान, बाली, सुग्रीव, कौशल्या, सुमित्रा, कैकई, मंदोदरी, यहां तक कि सबरी परंतु शायद ही कोई उर्मिला के बारे में ज्यादा जानता होगा। उर्मिला ने जो बलिदान दिया शायद ही ऐसा कोई स्त्री कर पाए।

उर्मिला का बलिदान

उर्मिला माँ सीता की छोटी बहन और प्रभु राम के छोटे भाई लक्ष्मण की पत्नी थीं। उन्हें माँ सीता को समर्पित बताया गया है, क्योंकि लक्ष्मण राम को समर्पित थे। जब लक्ष्मण वनवास में भगवान्रा श्री राम और माता सीता के साथ जाने को तैयार हुए, तो उर्मिला भी उनके साथ जाने के लिए तैयार थी, लेकिन वह हिचकिचाए और उन्हें अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल के लिए अयोध्या में ही रहने के लिए कहा। 

किवदंतियों के अनुसार वनवास के इन चौदह वर्षों के दौरान लक्ष्मण, राम और सीता माता की रक्षा करने के लिए कभी नहीं सोए। वनवास की पहली रात में, जब राम और सीता सो रहे थे, तब लक्ष्मण ने निंद्रा देवी से अनुरोध किया कि वे उन्हें नींद की आवश्यकता न होने का वरदान दें। देवी ने उससे कहा कि वह उसकी इच्छा पूरी कर सकती हैं, लेकिन कोई और उनकी जगह सो जाना होगा। लक्ष्मण को आश्चर्य हुआ कि क्या उनकी जगह उनकी पत्नी सो सकती है। यह सुनकर निद्रा ने उर्मिला से इस सम्बन्ध में पूछा, तो उर्मिला ने सहर्ष यह कार्य स्वीकार कर लिया। उर्मिला इस अद्वितीय त्याग के लिए उल्लेखनीय हैं, जिसे उर्मिला निद्रा कहा जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार, यह कहा जाता है कि जब लक्ष्मण उर्मिला को अपने वनवास में राम के साथ जाने के अपने फैसले की सूचना देने आए थे, तो उन्होंने रानी के रूप में कपड़े पहने थे। लक्ष्मण उससे क्रोधित हो गए और उसकी तुलना कैकेयी से की। लक्ष्मण ने कहा तुम माता कैकई से भी बदतर हो, तुम्हें अपने पति के साथ से ज्यादा महल का ऐशो-आराम पसंद है। मैं तुम्हें अब अपनी पत्नी स्वीकार नहीं करता और हमारा ये पवित्र बंधन टूट गया है। उर्मिला नहीं चाहती थी कि भाई-भाभी की सेवा करते हुए कभी भी लक्ष्मण को उनकी याद आए। इसलिए उर्मिला ने ये सब किया ताकि लक्ष्मण को उनसे नफरत हो जाए और वो अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर सकें। 

देवी उर्मिला त्याग और समर्पण की अतुलनीय प्रतिमूर्ति थीं। 

श्रीरामचरितमानस के चमत्कार

श्रीरामचरितमानस के चमत्कार

रामचरितमानस अवधी भाषा में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा १६वीं सदी में रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसकी रचना में २ वर्ष ७ माह २६ दिन का समय लगा था और उन्होंने इसे संवत् १६३३ (१५७६ ईस्वी) के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम विवाह के दिन पूर्ण किया था। इस ग्रन्थ को अवधी साहित्य (हिंदी साहित्य) की एक महान कृति माना जाता है। इसे सामान्यतः 'तुलसी रामायण' या 'तुलसीकृत रामायण' भी कहा जाता है। रामचरितमानस भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान रखता है। रामचरितमानस की लोकप्रियता अद्वितीय है। उत्तर भारत में 'रामायण' के रूप में बहुत से लोगों द्वारा प्रतिदिन पढ़ा जाता है। शरद नवरात्रि में इसके सुन्दर काण्ड का पाठ पूरे नौ दिन किया जाता है। मंगलवार और शनिवार को इसके सुन्दरकाण्ड का पाठ किया जाता है। 

श्रीरामचरितमानस के चमत्कार

  1. जिस घर में 1 माह में मात्र पूर्णिमा को प्रति माह रामायण का पाठ होता है उस घर में अकाल मृत्यु नहीं होती है।
  2. जिस घर में श्री रामचरितमानस रखी होती है वहां कभी भूत, पिशाच, प्रेतों का वास नहीं होता है।
  3. जिस घर में रामायण के पास शाम के समय दीपक जलाया जाता है उस घर में अन्न की कमी कभी नहीं होती है।
  4. जिस घर में श्री रामचरितमानस के पास सुबह शाम दीपक प्रतिदिन जलाया जाता है उस घर में आरोग्य बढ़ता है। बीमारियां कम होती हैं।
  5. जिस घर में यदि श्री रामचरितमानस की शाम के समय दीपक जलाकर श्री रामचरितमानस की आरती प्रतिदिन होती है उस घर पर श्रीराम जी की कृपा सदैव रहती है और घर में शांति का वातावरण रहता है। प्रभु की कृपा रहती है।
  6. जिस घर में प्रति सप्ताह रामायण का पाठ होता है उस घर पर श्रीराम जी व माता सीता जी की कृपा सदैव रहती है। उस घर में बच्चों की वृद्धि होती है।
  7. जिस घर में प्रतिदिन रामायण का पाठ होता है। उस घर पर भगवान शिव, श्रीराम जी, सीता जी, श्री हनुमानजी, शनिदेव, नव ग्रह, 33 कोटि देवी देवताओं की सदैव कृपा रहती है।
  8. उस घर से दरिद्रता भाग जाती है, उस परिवार का यश बढ़ने लगता है, उस घर पर साक्षात माँ लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती है। बच्चों को कभी भय नहीे लगता है। भूत, प्रेत, पिशाच वहां प्रवेश नहीं कर सकते हैं । वह घर सुख, शान्ति, समृद्धि, धन, अन्न, संतान, मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदारों आदि से परिपूर्ण होता है।
  9. रामायण की एक एक चौपाई लाखों मंत्रो के बराबर है और हर चौपाई कुछ न कुछ देने वाली है। हर भारतीय के घर में रामायण होनी चाहिये।
श्रीरामचरितमानस के चमत्कार

हर भारतीय के घर में रामायण होनी चाहिए। पारिवारिक प्रबंधन हमें रामायण सिखाती है रामायण हमें संसार में जीना सिखाती है।

ब्रह्मचारी होने के बाद भी हनुमान जी को 3 विवाह करने पड़े थे

 ब्रह्मचारी होने के बाद भी हनुमान जी को 3 विवाह करने पड़े थे

थोड़ा अजीब लगता है कि क्या सच में ऐसा हुआ था? पौराणिक कथाओं के अनुसार उनके 3 विवाह हुए थे। 

ब्रह्मचारी होने के बाद भी हनुमान जी को 3 विवाह करने पड़े थे

इनमें से एक कथा के प्रमाण के तौर पर तेलंगाना के एक मंदिर में हनुमान जी की उनकी पत्‍नी के साथ मूर्ति भी है आज हम इन तीनों कथाओं के बारे में जानते हैं कि किन कारणों के चलते हनुमान जी को ये विवाह करने पड़े थे !

ब्रह्मचारी होने के बाद भी हनुमान जी को 3 विवाह करने पड़े थे

सूर्यदेव पुत्री सुर्वचला से विवाह

रुद्रावतार भगवान हनुमान ने सूर्य देवता को अपना गुरु बनाया था और उन्होंने सूर्य देव से 9 विद्याओं में पारंगत होने का निश्चय किया था। सूर्यदेव चाहते थे कि वो हनुमान को 9 विद्याओं का ज्ञान दें। इनमें से 5 विद्याएँ तो हनुमान जी ने सीख ली थीं। बाकी की 4 विद्याओं के लिए उनका विवाहित होना अनिवार्य था। ऐसी स्थिति को देखते हुए सूर्यदेव ने अपनी पुत्री सुर्वचला का विवाह हनुमान जी के साथ संपन्न करा दिया। लेकिन विवाह के बाद सुर्वचला सदा के लिए तपस्या में लीन हो गईं। इसके साथ ही हनुमान जी भी अपनी बाकी चार विद्याओं के ज्ञान को प्राप्त करने में लग गए। इस प्रकार विवाहित होने के बाद भी भगवान हनुमान का ब्रह्मचर्य व्रत नहीं टूटा।

रावण पुत्री अनंगकुसुमा से विवाह

रावण पुत्री अनंगकुसुमा से विवाह पउमचरित के एक प्रसंग अनुसार रावण और वरूण देव के बीच युद्ध के समय वरूण देव की ओर से वानरराज हनुमान रावण से लड़े और उसके सभी पुत्रों को बंधक बना लिया। ऐसी मान्यता है कि युद्ध में हार के बाद रावण ने अपनी पुत्री अनंगकुसुमा का विवाह हनुमान जी से कर दिया था। इस प्रसंग का उल्लेख पउम चरित शास्त्र में मिलता है। 

वरुण देव की पुत्री सत्यवती से विवाह 

जब वरुण देव और रावण के बीच युद्ध हो रहा था तब हनुमान जी वरुण देव की तरफ से लड़ते हुए वरुण देव को विजय दिलाई थी. वरुण देव ने इस विजय से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह हनुमान जी से कर दिया था। 

ब्रह्मचारी होने के बाद भी हनुमान जी को 3 विवाह करने पड़े थे

शास्त्रों में भले ही हनुमानजी के इन विवाहों का उल्लेख होता है, लेकिन ये तीनों विवाह विशेष परिस्थितियों में हुए। यह भी कहा जाता है कि हनुमानजी ने कभी भी अपनी पत्नियों के साथ वैवाहिक संबंधों का निर्वाह नहीं किया। वह आजीवन ब्रह्मचारी ही रहे। 

मीराबाई || MeeraBai ||

 मीराबाई

मीराबाई भक्तिकाल की एक ऐसी संत हैं, जिनका सब कुछ कृष्ण के लिए समर्पित था। यहां तक कि कृष्ण को ही वह अपना पति मान बैठी थीं। भक्ति की ऐसी चरम अवस्था कम ही देखने को मिलती है। मीराबाई के बालमन में कृष्ण की ऐसी छवि बसी थी कि किशोरावस्था से लेकर मृत्यु तक उन्होंने कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना। जोधपुर के राठौड़ रतनसिंह जी की इकलौती पुत्री मीराबाई का जन्म सोलहवीं शताब्दी में हुआ था। बचपन से ही वह कृष्ण-भक्ति में रम गई थीं।

मीराबाई || MeeraBai ||

मीराबाई के बचपन में हुई एक घटना की वजह से उनका कृष्ण-प्रेम अपनी चरम अवस्था तक पहुंचा। एक दिन उनके पड़ोस में किसी बड़े आदमी के यहां बारात आई। सभी औरतें छत पर खड़ी होकर बारात देख रही थीं। मीरा भी बारात देखने लगीं। बारात को देख मीरा ने अपनी माता से पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है? इस पर उनकी माता ने कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा कर के कह दिया कि यही तुम्हारे दूल्हा हैं। बस यह बात मीरा के बालमन में एक गांठ की तरह बंध गई।

बाद में मीराबाई की शादी महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज, जो आगे चलकर महाराणा कुंभा कहलाए, से कर दी गई।

इस शादी के लिए पहले तो मीराबाई ने मना कर दिया, लेकिन जोर देने पर वह फूट-फूट कर रोने लगीं। शादी के बाद विदाई के समय वे कृष्ण की वही मूर्ति अपने साथ ले गईं, जिसे उनकी माता ने उनका दूल्हा बताया था।

ससुराल में अपने घरेलू कामकाज निबटाने के बाद मीरा रोज कृष्ण के मंदिर चली जातीं और कृष्ण की पूजा करतीं, उनकी मूर्ति के सामने गातीं और नृत्य करतीं। उनके ससुराल वाले तुलजा भवानी यानी दुर्गा को कुल-देवी मानते थे। जब मीरा ने कुल-देवी की पूजा करने से इनकार कर दिया तो परिवार वालों ने उनकी श्रद्धा-भक्ति को मंजूरी नहीं दी।

मीराबाई || MeeraBai ||

 मीराबाई की ननद उदाबाई ने उन्हें बदनाम करने के लिए उनके खिलाफ एक साजिश रची। उसने राणा से कहा कि मीरा का किसी के साथ गुप्त प्रेम है और उसने मीरा को मंदिर में अपने प्रेमी से बात करते देखा है।

देखा कि मीरा अकेले ही कृष्ण की मूर्ति के सामने परम आनंद की अवस्था में बैठी मूर्ति से बातें कर रही थीं और मस्ती में गा रही थीं। राणा मीरा पर चिल्लाया – ’मीरा, तुम जिस प्रेमी से अभी बातें कर रही हो, उसे मेरे सामने लाओ।’ मीरा ने जवाब दिया – ‘वह सामने बैठा है – मेरा स्वामी – नैनचोर, जिसने मेरा दिल चुराया है, और वह समाधि में चली गईं। इस घटना से राणा कुंभा का दिल टूट गया, लेकिन फिर भी उसने एक अच्छे पति की भूमिका निभाई और मरते दम तक मीरा का साथ दिया।

हालांकि मीरा को राजगद्दी की कोई चाह नहीं थी, फिर भी राणा के संबंधी मीरा को कई तरीकों से सताने लगे। कृष्ण के प्रति मीरा का प्रेम शुरुआत में बेहद निजी था, लेकिन बाद में कभी-कभी मीरा के मन में प्रेमानंद इतना उमड़ पड़ता था कि वह आम लोगों के सामने और धार्मिक उत्सवों में नाचने-गाने लगती थीं। 

मीराबाई || MeeraBai ||

वे रात में चुपचाप चित्तौड़ के किले से निकल जाती थीं और नगर में चल रहे सत्संग में हिस्सा लेती थीं। मीरा का देवर विक्रमादित्य, जो चित्तौड़गढ़ का नया राजा बना, बहुत कठोर था। मीरा की भक्ति, उनका आम लोगों के साथ घुलना-मिलना और नारी-मर्यादा के प्रति उनकी लापरवाही का उसने कड़ा विरोध किया। उसने मीरा को मारने की कई बार कोशिश की।

यहां तक कि एक बार उसने मीरा के पास फूलों की टोकरी में एक जहरीला सांप रखकर भेजा और मीरा को संदेश भिजवाया कि टोकरी में फूलों के हार हैं। ध्यान से उठने के बाद जब मीरा ने टोकरी खोली तो उसमें से फूलों के हार के साथ कृष्ण की एक सुंदर मूर्ति निकली। राणा का तैयार किया हुआ कांटो का बिस्तर भी मीरा के लिए फूलों का सेज बन गया जब मीरा उस पर सोने चलीं।

जब यातनाएं बरदाश्त से बाहर हो गईं, तो उन्होंने चित्तौड़ छोड़ दिया। वे पहले मेड़ता गईं, लेकिन जब उन्हें वहां भी संतोश नहीं मिला तो कुछ समय के बाद उन्होने कृश्ण-भक्ति के केंद्र वृंदावन का रुख कर लिया। मीरा मानती थीं कि वह गोपी ललिता ही हैं, जिन्होने फिर से जन्म लिया है। ललिता कृष्ण के प्रेम में दीवानी थीं।

 खैर, मीरा ने अपनी तीर्थयात्रा जारी रखी, वे एक गांव से दूसरे गांव नाचती-गाती पूरे उत्तर भारत में घूमती रहीं। माना जाता है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम कुछ साल गुजरात के द्वारका में गुजारे। ऐसा कहा जाता है कि दर्शकों की पूरी भीड़ के सामने मीरा द्वारकाधीश की मूर्ति में समा गईं।

मीराबाई || MeeraBai ||

“इंसान आमतौर पर शरीर, मन और बहुत सारी भावनाओं से बना है। यही वजह है कि ज्यादातर लोग अपने शरीर, मन और भावनाओं को समर्पित किए बिना किसी चीज के प्रति खुद को समर्पित नहीं कर सकते। विवाह का मतलब यही है कि आप एक इंसान के लिए अपनी हर चीज समर्पित कर दें, अपना शरीर, अपना मन और अपनी भावनाएं। आज भी कई इसाई संप्रदायों में नन बनने की दीक्षा पाने के लिए, लड़कियां पहले जीसस के साथ विवाह करती हैं।

 कुछ लोगों के लिए यह समर्पण, शरीर, मन और भावनाओं के परे, एक ऐसे धरातल पर पहुंच गया, जो बिलकुल अलग था, जहां यह उनके लिए परम सत्य बन गया था। ऐसे लोगों में से एक मीराबाई थीं, जो कृष्ण को अपना पति मानती थीं।

जीव गोसांई वृंदावन में वैष्णव-संप्रदाय के मुखिया थे। मीरा जीव गोसांई के दर्शन करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने मीरा से मिलने से मना कर दिया। उन्होंने मीरा को संदेशा भिजवाया कि वह किसी औरत को अपने सामने आने की इजाजत नहीं देंगे। मीराबाई ने इसके जवाब में अपना संदेश भिजवाया कि ‘वृंदावन में हर कोई औरत है। अगर यहां कोई पुरुष है तो केवल गिरिधर गोपाल। 

आज मुझे पता चला कि वृंदावन में कृष्ण के अलावा कोई और पुरुष भी है।’  इस जबाब से जीव गोसाईं बहुत शर्मिंदा हुए। वह फौरन मीरा से मिलने गए और उन्हें भरपूर सम्मान दिया।

मीराबाई || MeeraBai ||

मीरा ने गुरु के बारे में कहा है कि बिना गुरु धारण किए भक्ति नहीं होती। भक्तिपूर्ण इंसान ही प्रभु प्राप्ति का भेद बता सकता है। वही सच्चा गुरु है। स्वयं मीरा के पद से पता चलता है कि उनके गुरु रैदास थे।

नहिं मैं पीहर सासरे, नहिं पियाजी री साथ

मीरा ने गोबिन्द मिल्या जी, गुरु मिलिया रैदास

 मीरा ने अनेक पदों व गीतों की रचना की। उनके पदों में उच्च आध्यात्मिक अनुभव हैं। उनमें दिए गए संदेश और अन्य संतों की शिक्षाओं में समानता नजर आती है। उनके पद उनकी आध्यात्मिक उंचाई के अनुभवों का आईना है। 

मीरा ने अन्य संतों की तरह कई भाषाओं का प्रयोग किया है, जैसे – हिंदी, गुजराती, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, अरबी, फारसी, मारवाड़ी, संस्कृत, मैथिली और पंजाबी।

मीराबाई || MeeraBai ||

मीरा के पदों में भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति के साथ-साथ प्रेम की ओजस्वी प्रवाह-धारा और प्रीतम से वियोग की पीड़ा का मर्मभेदी वर्णन मिलता है। प्रेम की साक्षात् मूर्ति मीरा के बराबर शायद ही कोई कवि हो।

 मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई।

जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।

छांड़ि दई कुल की कानि कहा करै कोई।

संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई।

अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।

दधि मथि घृत काढ़ि लियौ डारि दई छोई।

भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई।

दासी मीरा लाल गिरिधर तारो अब मोई।

 पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो।

बस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा कर अपनायो।

जनम जनम की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो।

खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो।

सत की नाव खेवहिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस पायो..!!

महाभारत में वर्णित ये पैंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

महाभारत में वर्णित ये पैंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

महाभारत भारत का धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ है। यह हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है। इस ग्रन्थ को हिन्दू धर्म में पंचम वेद माना जाता है। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ भगवद्गीता सन्निहित है। इसी महाभारत में वर्णित पैंतीस नगर हैं, जो आज भी मौजूद हैं। महाभारतकाल में भारत देश कई बड़े जनपदों में बंटा हुआ था। जानते हैं महाभारत में वर्णित 35 नगर कौन कौन से हैं ? 

महाभारत में वर्णित ये पैंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

1. गांधार

आज के कंधार को कभी गांधार के रूप में जाना जाता था। यह देश पाकिस्तान के रावलपिन्डी से लेकर सुदूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी वहां के राजा सुबल की पुत्री थीं। गांधारी के भाई शकुनी दुर्योधन के मामा थे।

2. तक्षशिला

तक्षशिला गांधार देश की राजधानी थी। इसे वर्तमान में रावलपिन्डी कहा जाता है। तक्षशिला को ज्ञान और शिक्षा की नगरी भी कहा गया है।

3. केकय प्रदेश 

जम्मू-कश्मीर के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में केकय प्रदेश के रूप में है। केकय प्रदेश के राजा जयसेन का विवाह वसुदेव की बहन राधादेवी के साथ हुआ था। उनका पुत्र विन्द जरासंध, दुर्योधन का मित्र था। महाभारत के युद्ध में विन्द ने कौरवों का साथ दिया था।

4. मद्र देश

केकय प्रदेश से ही सटा हुआ मद्र देश का आशय जम्मू-कश्मीर से ही है। एतरेय ब्राह्मण के अनुसार हिमालय के नजदीक होने की वजह से मद्र देश को उत्तर कुरू भी कहा जाता था। महाभारत काल में मद्र देश के राजा शल्य थे, जिनकी बहन माद्री का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था। नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र थे।

5. उज्जनक

आज के नैनीताल का जिक्र महाभारत में उज्जनक के रूप में किया गया है। गुरु द्रोणचार्य यहां पांडवों और कौरवों की अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देते थे। कुन्ती पुत्र भीम ने गुरु द्रोण के आदेश पर यहां एक शिवलिंग की स्थापना की थी। यही वजह है कि इस क्षेत्र को भीमशंकर के नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव का एक विशाल मंदिर है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह शिवलिंग 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है।

6. शिवि देश

महाभारत काल में दक्षिण पंजाब को शिवि देश कहा जाता था। महाभारत में महाराज उशीनर का जिक्र है, जिनके पौत्र शैव्य थे। शैव्य की पुत्री देविका का विवाह युधिष्ठिर से हुआ था। शैव्य एक महान धनुर्धारी थे और उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों का साथ दिया था।

7. वाणगंगा

कुरुक्षेत्र से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वाणगंगा। कहा जाता है कि महाभारत की भीषण लड़ाई में घायल पितामह भीष्म को यहां सर-सैय्या पर लिटाया गया था। कथा के मुताबिक, भीष्ण ने प्यास लगने पर जब पानी की मांग की तो अर्जुन ने अपने वाणों से धरती पर प्रहार किया और गंगा की धारा फूट पड़ी। यही वजह है कि इस स्थान को वाणगंगा कहा जाता है।

8. कुरुक्षेत्र

हरियाणा के अम्बाला इलाके को कुरुक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यहां महाभारत की प्रसिद्ध लड़ाई हुई थी। यही नहीं, आदिकाल में ब्रह्माजी ने यहां यज्ञ का आयोजन किया था। इस स्थान पर एक ब्रह्म सरोवर या ब्रह्मकुंड भी है। श्रीमद् भागवत में लिखा हुआ है कि महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने यदुवंश के अन्य सदस्यों के साथ इस सरोवर में स्नान किया था।

9. हस्तिनापुर

महाभारत में उल्लिखित हस्तिनापुर का इलाका मेरठ के आसपास है। यह स्थान चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी थी। सही मायने में महाभारत युद्ध की पटकथा यहीं लिखी गई थी। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने हस्तिनापुर को अपने राज्य की राजधानी बनाया।

10. वर्नावत

यह स्थान भी उत्तर प्रदेश के मेरठ के नजदीक ही माना जाता है। वर्णावत में पांडवों को छल से मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह का निर्माण करवाया था। यह स्थान गंगा नदी के किनारे है। महाभारत की कथा के मुताबिक, इस ऐतिहासिक युद्ध को टालने के लिए पांडवों ने जिन पांच गांवों की मांग रखी थी, उनमें एक वर्णावत भी था। आज भी यहां एक छोटा सा गांव है, जिसका नाम वर्णावा है।

11. पांचाल प्रदेश

हिमालय की तराई का इलाका पांचाल प्रदेश के रूप में उल्लिखित है। पांचाल के राजा द्रुपद थे, जिनकी पुत्री द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। द्रौपदी को पांचाली के नाम से भी जाना जाता है।

12. इन्द्रप्रस्थ

मौजूदा समय में दक्षिण दिल्ली के इस इलाके का वर्णन महाभारत में इन्द्रप्रस्थ के रूप में है। कथा के मुताबिक, इस स्थान पर एक वियावान जंगल था, जिसका नाम खांडव-वन था। पांडवों ने विश्वकर्मा की मदद से यहां अपनी राजधानी बनाई थी। इन्द्रप्रस्थ नामक छोटा सा कस्बा आज भी मौजूद है।

13. वृन्दावन

यह स्थान मथुरा से करीब 10 किलोमीटर दूर है। वृन्दावन को भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं के लिए जाना जाता है। यहां का बांके-बिहारी मंदिर प्रसिद्ध है।

14. गोकुल

यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह स्थान भी मथुरा से करीब 8 किलोमीटर दूर है। कंस से रक्षा के लिए कृष्ण के पिता वसुदेव ने उन्हें अपने मित्र नंदराय के घर गोकुल में छोड़ दिया था। कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम गोकुल में साथ-साथ पले-बढ़े थे।

15. बरसाना

यह स्थान भी उत्तर प्रदेश में है। यहां की चार पहाड़ियां के बारे में कहा जाता है कि ये ब्रह्मा के चार मुख हैं।

महाभारत में वर्णित ये पैंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

16. मथुरा

यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह प्रसिद्ध शहर हिन्दू धर्म के लिए अनुयायियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। यहां राजा कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यहीं पर श्रीकृष्ण ने बाद में कंस की हत्या की थी। बाद में कृष्ण के पौत्र वृजनाथ को मथुरा की राजगद्दी दी गई।

17. अंग देश

वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के इलाके का उल्लेख महाभारत में अंगदेश के रूप में है। दुर्योधन ने कर्ण को इस देश का राजा घोषित किया था। मान्यताओं के मुताबिक, जरासंध ने अंग देश दुर्योधन को उपहारस्वरूप भेंट किया था। इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है।

18. कौशाम्बी

कौशाम्बी वत्स देश की राजधानी थी। वर्तमान में इलाहाबाद के नजदीक इस नगर के लोगों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था। बाद में कुरुवंशियों ने कौशाम्बी पर अपना अधिकार कर लिया। परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया।

19. काशी

महाभारत काल में काशी को शिक्षा का गढ़ माना जाता था। महाभारत की कथा के मुताबिक, पितामह भीष्म काशी नरेश की पुत्रियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका को जीत कर ले गए थे ताकि उनका विवाह विचित्रवीर्य से कर सकें। अम्बा के प्रेम संबंध राजा शल्य के साथ थे, इसलिए उसने विचित्रवीर्य से विवाह से इन्कार कर दिया। अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ कर दिया गया। विचित्रवीर्य के अम्बा और अम्बालिका से दो पुत्र धृतराष्ट्र और पान्डु हुए। बाद में धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाए और पान्डु के पांडव।

20. एकचक्रनगरी

वर्तमान कालखंड में बिहार का आरा जिला महाभारत काल में एकचक्रनगरी के रूप में जाना जाता था। लाक्षागृह की साजिश से बचने के बाद पांडव काफी समय तक एकचक्रनगरी में रहे थे। इस स्थान पर भीम ने बकासुर नामक एक राक्षक का अन्त किया था। महाभारत युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया था, उस समय बकासुर के पुत्र भीषक ने उनका घोड़ा पकड कर रख लिया था। बाद में वह अर्जुन के हाथों मारा गया।

21. मगध

दक्षिण बिहार में मौजूद मगध जरासंध की राजधानी थी। जरासंध की दो पुत्रियां अस्ती और प्राप्ति का विवाह कंस से हुआ था। जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तब वह अनायास ही जरासंध के दुश्मन बन बैठे। जरासंध ने मथुरा पर कई बार हमला किया। बाद में एक मल्लयुद्ध के दौरान भीम ने जरासंध का अंत किया। महाभारत के युद्ध में मगध की जनता ने पांडवों का समर्थन किया था।

22. पुन्डरू देश

मौजूदा समय में बिहार के इस स्थान पर राजा पोन्ड्रक का राज था। पोन्ड्रक जरासंध का मित्र था और उसे लगता था कि वह कृष्ण है। उसने न केवल कृष्ण का वेश धारण किया था, बल्कि उसे वासुदेव और पुरुषोत्तम कहलवाना पसन्द था। द्रौपदी के स्वयंवर में वह भी मौजूद था। कृष्ण से उसकी दुश्मनी जगजाहिर थी। द्वारका पर एक हमले के दौरान वह भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया।

23. प्रागज्योतिषपुर

गुवाहाटी का उल्लेख महाभारत में प्रागज्योतिषपुर के रूप में किया गया है। महाभारत काल में यहां नरकासुर का राज था, जिसने 16 हजार लड़कियों को बन्दी बना रखा था। बाद में श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया और सभी 16 हजार लड़कियों को वहां से छुड़ाकर द्वारका लाए। उन्होंने सभी से विवाह किया। मान्यता है कि यहां के प्रसिद्ध कामख्या देवी मंदिर को नरकासुर ने बनवाया था।

24. कामख्या

गुवाहाटी से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कामख्या एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। भागवत पुराण के मुताबिक, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर बदहवाश इधर-उधर भाग रहे थे, तभी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के कई टुकड़े कर दिए। इसका आशय यह था कि भगवान शिव को सती के मृत शरीर के भार से मुक्ति मिल जाए। सती के अंगों के 51 टुकड़े जगह-जगह गिरे और बाद में ये स्थान शक्तिपीठ बने। कामख्या भी उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है।

25. मणिपुर

नगालैन्ड, असम, मिजोरम और वर्मा से घिरा हुआ मणिपुर महाभारत काल से भी पुराना है। मणिपुर के राजा चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। इस विवाह से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम था बभ्रुवाहन। राजा चित्रवाहन की मृत्यु के बाद बभ्रुवाहन को यहां का राजपाट दिया गया। बभ्रुवाहन ने युधिष्ठिर द्वारा आयोजित किए गए राजसूय यज्ञ में भाग लिया था।

26. सिन्धु देश

सिन्धु देश का तात्पर्य प्राचीन सिन्धु सभ्यता से है। यह स्थान न केवल अपनी कला और साहित्य के लिए विख्यात था, बल्कि वाणिज्य और व्यापार में भी यह अग्रणी था। यहां के राजा जयद्रथ का विवाह धृतराष्ट्र की पुत्री दुःश्शाला के साथ हुआ था। महाभारत के युद्ध में जयद्रथ ने कौरवों का साथ दिया था और चक्रव्युह के दौरान अभिमन्यू की मौत में उसकी बड़ी भूमिका थी।

27. मत्स्य देश

राजस्थान के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में मत्स्य देश के रूप में है। इसकी राजधानी थी विराटनगरी। अज्ञातवास के दौरान पांडव वेश बदल कर राजा विराट के सेवक बन कर रहे थे। यहां राजा विराट के सेनापति और साले कीचक ने द्रौपदी पर बुरी नजर डाली थी। बाद में भीम ने उसकी हत्या कर दी। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यू का विवाह राजा विराट की पुत्री उत्तरा के साथ हुआ था।

28. मुचकुन्द तीर्थ

यह स्थान धौलपुर, राजस्थान में है। मथुरा पर जीत हासिल करने के बाद कालयावन ने भगवान श्रीकृष्ण का पीछा किया तो उन्होंने खुद को एक गुफा में छुपा लिया। उस गुफा में मुचकुन्द सो रहे थे, उन पर कृष्ण ने अपना पीताम्बर डाल दिया। कृष्ण का पीछा करते हुए कालयावन भी उसी गुफा में आ पहुंचा। मुचकुन्द को कृष्ण समझकर उसने उन्हें जगा दिया। जैसे ही मुचकुन्द ने आंख खोला तो कालयावन जलकर भस्म हो गया। मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब पांडव हिमालय की तरफ चले गए और कृष्ण गोलोक निवासी हो गए, तब कलयुग ने पहली बार यहां अपने पग रखे थे।

29. पाटन

महाभारत की कथा के मुताबिक, गुजरात का पाटन द्वापर युग में एक प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र था। पाटन के नजदीक ही भीम ने हिडिम्ब नामक राक्षस का संहार किया था और उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया। हिडिम्बा ने बाद में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम था घटोत्कच्छ। घटोत्कच्छ और उनके पुत्र बर्बरीक की कहानी महाभारत में विस्तार से दी गई है।

30. द्वारका

माना जाता है कि गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित यह स्थान कालान्तर में समुन्दर में समा गया। कथाओं के मुताबिक, जरासंध के बार-बार के हमलों से यदुवंशियों को बचाने के लिए कृष्ण मथुरा से अपनी राजधानी स्थानांतरित कर द्वारका ले गए।

31. प्रभाष

गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण का निवास-स्थान रहा है। महाभारत कथा के मुताबिक, यहां भगवान श्रीकृष्ण पैर के अंगूठे में तीर लगने की वजह से घायल हो गए थे। उनके गोलोकवासी होने के बाद द्वारका नगरी समुन्दर में डूब गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि समुन्दर के सतह पर द्वारका नगरी के अवेशष मिले हैं।

32. अवन्तिका

मध्यप्रदेश के उज्जैन का उल्लेख महाभारत में अवन्तिका के रूप में मिलता है। यहां ऋषि सांदपनी का आश्रम था। अवन्तिका को देश के सात प्रमुख पवित्र नगरों में एक माना जाता है। यहां भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में एक महाकाल लिंग स्थापित है।

33. चेदी

वर्तमान में ग्वालियर क्षेत्र को महाभारत काल में चेदी देश के रूप में जाना जाता था। गंगा व नर्मदा के मध्य स्थित चेदी महाभारत काल के संपन्न नगरों में एक था। इस राज्य पर श्रीकृष्ण के फुफेरे भाई शिशुपाल का राज था। शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, लेकिन श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचा लिया। इस घटना की वजह से शिशुपाल और श्रीकृष्ण के बीच संबंध खराब हो गए। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय चेदी नरेश शिशुपाल को भी आमंत्रित किया गया था। शिशुपाल ने यहां कृष्ण को बुरा-भला कहा, तो कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया। महाभरत की कथा के मुताबिक, दुश्मनी की बात सामने आने पर श्रीकृष्ण की बुआ उनसे शिशुपाल को अभयदान देने की गुजारिश की थी। इस पर श्रीकृष्ण ने बुआ से कहा था कि वह शिशुपाल के 100 अपराधों को माफ कर दें, लेकिन 101वीं गलती पर माफ नहीं करेंगे।

34. सोणितपुर

मध्यप्रदेश के इटारसी को महाभारत काल में सोणितपुर के नाम से जाना जाता था। सोणितपुर पर वाणासुर का राज था। वाणासुर की पुत्री उषा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ सम्पन्न हुआ था। यह स्थान हिन्दुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ है।

35. विदर्भ

महाभारतकाल में विदर्भ क्षेत्र पर जरासंध के मित्र राजा भीष्मक का शासन था। रुक्मिणी भीष्मक की पुत्री थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचाया था। यही वजह थी कि भीष्मक उन्हें अपना शत्रु मानने लगे। जब पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ किया था, तब भीष्मक ने उनका घोड़ा रोक लिया था। सहदेव ने भीष्मक को युद्ध में हरा दिया।

अपने भारतीय धर्म ग्रंथों के ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों को पढ़ें और ज्यादा से ज्यादा प्रचारित प्रसारित करें ताकि वर्तमान और भावी पीढ़ी भी अपने गौरवमई इतिहास से अवगत हो।

शिवदर्शन || Shiv Darshan ||

शिवदर्शन 

निराकार ब्रह्म शिव से इस सृष्टि की रचना हुई और प्रथम पंचतत्व के देवता गणपति , विष्णु , सूर्य , शक्ति और रुद्रदेव की उपासना शुरू हुई। भगवान शिव तथा उनके अवतारों को मानने वालों को शैव कहते हैं। शैव में शाक्त, नाथ, दसनामी, नाग आदि उप संप्रदाय हैं।

शिवदर्शन || Shiv Darshan ||

महाभारत में माहेश्वरों (शैव) के चार सम्प्रदाय बतलाए गए हैं: 
(i) शैव 
(ii) पाशुपत 
(iii) कालदमन 
(iv) कापालिक। 

शैवमत का मूलरूप ॠग्वेद में रुद्र की आराधना में हैं।12 रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए। शिव-मन्दिरों में शिव को योगमुद्रा में दर्शाया जाता है।


भगवान शिव की पूजा करने वालों को शैव और शिव से संबंधित धर्म को शैवधर्म कहा जाता है। शिवलिंग उपासना का प्रारंभिक पुरातात्विक साक्ष्य हड़प्पा संस्कृति के अवशेषों से मिलता है। ऋग्वेद में शिव के लिए रुद्र नामक देवता का उल्लेख है। अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पशुपति और भूपति कहा जाता है। लिंगपूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मत्स्यपुराण में मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व से भी लिंग पूजा का वर्णन मिलता है।

शिवदर्शन || Shiv Darshan ||

वामन पुराण में शैव संप्रदाय की संख्या चार बताई गई है:

(i) पाशुपत
(ii) काल्पलिक
(iii) कालमुख
(iv) लिंगायत

          पाशुपत संप्रदाय शैवों का सबसे प्राचीन संप्रदाय है। इसके संस्थापक लवकुलीश थे, जिन्‍हें भगवान शिव के 18 अवतारों में से एक माना जाता है।पाशुपत संप्रदाय के अनुयायियों को पंचार्थिक कहा गया, इस मत का सैद्धांतिक ग्रंथ पाशुपत सूत्र है।

          कापालिक संप्रदाय के ईष्ट देव भैरव थे, इस सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र 'शैल' नामक स्थान था। कालमुख संप्रदाय के अनुयायिओं को शिव पुराण में महाव्रतधर कहा जाता है। इस संप्रदाय के लोग नर-कपाल में ही भोजन, जल और सुरापान करते थे और शरीर पर चिता की भस्म मलते थे।

          लिंगायत समुदाय दक्षिण में काफी प्रचलित था। इन्हें जंगम भी कहा जाता है, इस संप्रदाय के लोग शिव लिंग की उपासना करते थे। बसव पुराण में लिंगायत समुदाय के प्रवर्तक वल्लभ प्रभु और उनके शिष्य बासव को बताया गया है, इस संप्रदाय को वीरशिव संप्रदाय भी कहा जाता था दसवीं शताब्दी में मत्स्येंद्रनाथ ने नाथ संप्रदाय की स्थापना की, इस संप्रदाय का व्यापक प्रचार प्रसार बाबा गोरखनाथ के समय में हुआ। दक्षिण भारत में शैवधर्म चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव और चोलों के समय लोकप्रिय रहा।

          नायनारों संतों की संख्या 63 बताई गई है जिनमें उप्पार, तिरूज्ञान, संबंदर और सुंदर मूर्ति के नाम उल्लेखनीय है।पल्लवकाल में शैव धर्म का प्रचार प्रसार नायनारों ने किया।ऐलेरा के कैलाश मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया।चोल शालक राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर शैव मंदिर का निर्माण करवाया था। भारशिव नागवंशी शासकों की मुद्राओं पर शिव और नन्दी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है।

          शिवदर्शन || Shiv Darshan ||

          शिव पुराण में शिव के दशावतारों के अलावा अन्य का वर्णन मिलता है। ये दसों अवतार तंत्रशास्त्र से संबंधित हैं:

          (i) महाकाल 
          (ii) तारा 
          (iii) भुवनेश 
          (iv) षोडश 
          (v) भैरव 
          (vi) छिन्नमस्तक गिरिजा 
          (vii) धूम्रवान 
          (viii) बगलामुखी 
          (ix) मातंग 
          (x) कमल। (दशमहाविद्या)

          शिव के अन्य ग्यारह अवतार हैं:

          (i) कपाली 
          (ii) पिंगल 
          (iii) भीम 
          (iv) विरुपाक्ष 
          (v) विलोहित 
          (vi) शास्ता 
          (vii) अजपाद 
          (viii) आपिर्बुध्य 
          (ix) शम्भ 
          (x) चण्ड 
          (xi) भव

          शैव ग्रंथ इस प्रकार हैं:

          (i) श्‍वेताश्वतरा उपनिषद 
          (ii) शिव पुराण 
          (iii) आगम ग्रंथ 
          (iv) तिरुमुराई

          शैव तीर्थ इस प्रकार हैं:

          (i) बनारस 
          (ii) केदारनाथ 
          (iii) सोमनाथ 
          (iv) रामेश्वरम 
          (v) चिदम्बरम 
          (vi) अमरनाथ 
          (vii) कैलाश मानसरोवर

          शैव सम्‍प्रदाय के संस्‍कार इस प्रकार हैं:

          (i) शैव संप्रदाय के लोग एकेश्वरवादी होते हैं।
          (ii) इसके संन्यासी जटा रखते हैं।
          (iii) इसमें सिर तो मुंडाते हैं, लेकिन चोटी नहीं रखते।
          (iv) इनके अनुष्ठान रात्रि में होते हैं।
          (v) इनके अपने तांत्रिक मंत्र होते हैं।
          (vi) यह निर्वस्त्र भी रहते हैं, भगवा वस्त्र भी पहनते हैं और हाथ में कमंडल, चिमटा रखकर धूनी भी रमाते हैं।
          (vii) शैव चंद्र पर आधारित व्रत उपवास करते हैं।
          (viii) शैव संप्रदाय में समाधि देने की परंपरा है।
          (ix) शैव मंदिर को शिवालय कहते हैं जहां सिर्फ शिवलिंग होता है।
          (x) यह भभूति तीलक आड़ा लगाते हैं।

          शैव साधुओं को नाथ, अघोरी, अवधूत, बाबा, औघड़, योगी, सिद्ध कहा जाता है।

          बजरंगबलीजी की दिव्य उधारी

          बजरंगबली की दिव्य उधारी

          क्या आप जानते हैं प्रभु श्री राम जी के ऊपर दिव्य रूप से श्री महावीर बजरंगबली का कर्ज है... कैसे है? आज इस ब्लॉग (#RupaOosKiekBoond) में चर्चा करते हैं बजरंगबली जी की दिव्य उधारी के विषय में।  

          बजरंगबलीजी की दिव्य उधारी

          रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीवजी सब को अयोध्या से विदा किया तो सब ने सोचा हनुमानजी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया, अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से। 

          अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए? तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं। माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गए और धीरज बंधवाया कि... 

          कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
          कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
          निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
          तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥

          मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए। आप किसी और से बुलवा लो। अब बारी आई लक्ष्मण जी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मैं तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था। 

          प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
          आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।

          ये जो खड़ा है ना, वो हनुमानजी का लक्ष्मण है। मैं कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमानजी अयोध्या से चले जाएं?

          बजरंगबलीजी की दिव्य उधारी

          अब बारी आई भरत जी की, अरे भरत जी तो इतना रोए कि रामजी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पर, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो और दूसरी बात ये कि मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमानजी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...


          बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।
          अधम कवन जग मोहि समाना॥
          रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।
          सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

          मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमानजी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ आप किसी और से यह बात कहलवा लो।

          अब बचा कौन..?

          सिर्फ शत्रुघ्न भैया जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े, मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो और वो भी हनुमानजी को अयोध्या से निकालने के लिए, जिन्होंने मातासीता, लक्षमण भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो। किसी अच्छेकाम के लिए कहते तो बोल भी देता मैं, परन्तु ये तो बिल्कुल भी न बोलूं।

          अब बचे तो प्रभु श्री राम। मातासीता ने कहा प्रभु आप तीनों लोकों के स्वामी हैं और देखती हूं आप हनुमानजी से सकुचाते हैं आपखुद भी कहते हो कि..

          प्रति उपकार करौं का तोरा।
          सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

          आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु! राघवजी ने कहा देवी कर्जदार जो हूं, हनुमान जी का इसलिए तो 

          सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥ 

          देवी सीते! हनुमानजी का कर्जा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ्य राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है। क्योंकि कर्जा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न। यदि सुनना चाहती हो तो सुनो हनुमानजी का कर्जा कैसे उतारा जा सकता है? पहले हनुमान विवाह करें,

          लंकेश हरें इनकी जब नारी।
          मुदरी लै रघुनाथ चलै, निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।
          अयि कहें,सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।
          तब रघुनाथ चुकायि सकें,ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी॥

          देवी! इतना आसान नहीं है हनुमान का कर्जा चुकाना मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि..

          "सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"

          मैंने बहुत सोच विचार कर था लेकिन यदि आप कहती हो, तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमानजी भी कुछ मांग लें। 

          बजरंगबलीजी की दिव्य उधारी

          दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए, सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमानजी क्या मांगेंगे, और रामजी क्या देंगे?

          रामजी ने हनुमान जी से कहा - सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमश लंका और किष्कन्धा का राजपद, अंगद को युवराज पद, तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ?

          हनुमानजी बोले - प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमानजी का कर्जा चुकता हुआ।

          हनुमानजी ने कहा - प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमें राजमद की शंका हो। फिर राम जी ने हनुमान जी से कहा तो फिर आप को कौन सा पद चाहिए?

          हनुमानजी ने रामजी के दोनों चरण पकड़ लिए 

          "तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना"

          तो फिर यदि मै दो पद मांगू तो?

          सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमानजी भी ठीक ही कह रहे हैं। रामजी ने कहा - ठीक है, मांग लो। हनुमान जी ने कहा - प्रभु! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।

          हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।
          नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।

          जानकी जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राघवजी बोले, लो उतर गया हनुमानजी का कर्जा। 

          और अभी तक जिसको बोलना था, सब बोल चुके हैं, अब जो मैं बोलता हूं उसे सब सुनो, रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले... 

          "हे भरत! कपि से उऋण हम नाही"

          हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म लेे लें, हनुमानजी से उऋण नहीं हो सकते। 

          🚩 जय श्री हनुमान जी महाराज की जय

          शिवपुराण || भगवान शिव ने क्यों लिया अर्धनारीश्वर अवतार ||

          भगवान शिव ने क्यों लिया अर्धनारीश्वर अवतार

          जैसा कि सभी जानते हैं देवा दी देव महादेव की अर्धनारीश्वर के रूप में भी आराधना की जाती है। उनका एक नाम "अर्धनारीश्वर" भी है। आज के इस पोस्ट में भगवान् महादेव के अर्धनारीश्वर रूप की चर्चा करते हैं।  

          भगवान शिव ने क्यों लिया अर्धनारीश्वर अवतार

          भगवान् शिवजी की पूजा युगों से हो रही है, यानी जब से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है, लेकिन इस बात को बहुत कम लोग ही जानते हैं कि शिवजी का एक और रूप है जो है अर्धनारीश्वर! दरअसल शिवजी ने यह रूप अपनी मर्जी से धारण किया था, शिवजी इस रूप के जरिये लोगों को संदेश देना चाहते थे कि स्त्री और पुरुष समान है, सज्जनों! आज हम जानने की कोशिश करते हैं, आखिर किस वजह से भगवान् शिवजी को यह रूप धारण करना पड़ा था।

          अर्धनारीश्वर अवतार में हम देखते हैं कि भगवान् शंकरजी का आधा शरीर स्त्री का तथा आधा शरीर पुरुष का है, यह अवतार महिला व पुरुष दोनों की समानता का संदेश देता है, समाज, परिवार तथा मानश जीवन में जितना महत्व पुरुष का है उतना ही स्त्री का भी है, एक दूसरे के बिना इनका जीवन अधूरा है, यह दोनों एक दूसरे को पूरक हैं।

          भगवान शिव ने क्यों लिया अर्धनारीश्वर अवतार

          शिवपुराण के अनुसार सृष्टि में प्रजा की वृद्धि न होने पर ब्रह्माजी के मन में कई सवाल उठने लगे, तब उन्होंने मैथुनी सृष्टि उत्पन्न करने का संकल्प किया, लेकिन तब तक शिवजी से नारियों का कुल उत्पन्न नहीं हुआ था, तब ब्रह्माजी ने शक्ति के साथ शिव को संतुष्ट करने के लिए तपस्या की. ब्रह्माजी की तपस्या से परमात्मा शिवजी संतुष्ट हो अर्धनारीश्वर का रूप धारण कर उनके समीप गये तथा अपने शरीर में स्थित देवी शक्ति के अंश को पृथक कर दिया।

          उसके बाद ब्रह्माजी ने उनकी उपासना की, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शक्ति ने अपनी भृकुटि के मध्य से अपने ही समान कांति वाली एक अन्य शक्ति की सृष्टि की जिसने दक्ष के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया, दोस्तों, आपने कई बार ये सच सुना होगा कि भगवान की महिमा अपने भक्तो से ही है, भगवान स्वयं से अधिक उनके परम भक्तो का गुणगान करने से अत्यधिक प्रसन्न होते है।

          भगवान शिव ने क्यों लिया अर्धनारीश्वर अवतार

          ऐसे ही एक परम भक्त की कहानी आज हम आपको बताते है- जिनकी महिमा हालाँकि उतनी नही फैली जितनी की होनी चाहिए क्योंकि उनकी भक्ति में थोड़ी सी कमी रह गई थी जो बाद में उन्हें चुकानी भी पड़ी, “शीश गंग अर्धंग पार्वती सदा बिराजत कैलाशी नंदी भृंगी नृत्य करत है” शिवजी की स्तुति में आये इस भृंगी नाम को आप सब ने जरुर सुना होगा, पौराणिक कथाओं के अनुसार ये एक ऋषि थे जो महादेव के परम भक्त थे, किन्तु इनकी भक्ति कुछ ज्यादा ही कट्टर किस्म की थी।

          कट्टर से तात्पर्य है कि ये भगवान् शिवजी की तो आराधना करते थे, किन्तु बाकि भक्तो की भांति माता पार्वती को नहीं पूजते थे, हालांकि उनकी भक्ति पवित्र और अदम्य थी, लेकिन वो माता पार्वती जी को हमेशा ही शिवजी से अलग समझते थे, या फिर ऐसा भी कह सकते है कि वो माता को कुछ समझते ही नही थे, वैसे ये कोई उनका घमंड नही अपितु शिवजी और केवल शिवजी में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिवजी के आलावा कुछ और नजर ही नही आता था।

          भगवान शिव ने क्यों लिया अर्धनारीश्वर अवतार

          एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान् शिवजी की परिक्रमा करने गये लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे, ऋषि के इस कृत्य पर माता पार्वतीजी ने ऐतराज प्रकट किया और कहा कि हम दो जिस्म एक जान है, तुम ऐसा नही कर सकते, पर शिव भक्ति की कट्टरता देखिये भृंगी ऋषि ने पार्वतीजी को अनसुना कर दिया और भगवान् शिवजी की परिक्रमा लगाने बढे, किन्तु ऐसा देखकर माता पार्वती शिव से सट कर बैठ गई।

          इस किस्से में और नया मोड़ तब आता है जब भृंगी ने सर्प का रूप धारण किया और दोनों के बीच से होते हुए शिवजी की परिक्रमा देनी चाही, तब भगवान् शिवजी ने माता पार्वती का साथ दिया और संसार में महादेव के अर्धनारीश्वर रूप का जन्म हुआ, अब भृंगी ऋषि क्या करते किन्तु गुस्से में आकर उन्होंने चूहे का रूप धारण किया और शिवजी और पार्वतीजी को बीच से कुतरने लगे।

          ऋषि के इस कृत्य पर आदिशक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी ऋषि को श्राप दिया कि जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है, वो तत्काल प्रभाव से तुम्हारी देह छोड़ देगा, हमारी तंत्र साधना कहती है कि मनुष्य को अपने शरीर में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की देन होती है, जबकि खून और मांस माता की देन होते है श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया।

          भृंगी निढाल होकर जमीन पर गिर पड़े और वो खड़े भी होने की भी क्षमता खो चुके थे, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वतीजी से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी, हालाँकि तब पार्वतीजी ने द्रवित होकर श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया।

          भगवान शिव ने क्यों लिया अर्धनारीश्वर अवतार

          भृंगी निढाल होकर जमीन पर गिर पड़े और वो खड़े भी होने की भी क्षमता खो चुके थे, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वतीजी से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी, हालाँकि तब पार्वतीजी ने द्रवित होकर अपना श्राप वापस लेना चाहा,किन्तु अपराध बोध से भृंगी ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

          ऋषि को खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके,शास्त्र कहते हैं कि भक्तभृंगी के कारण ऐसे हुआ था महादेवजी के अर्धनारीश्वर रूप का उदय ,अर्धनारीश्वर स्वरूप का जो मनुष्य भक्तिपूर्वक ध्यान करता है, वह संसार में सन्मानित होता है, दीर्घायु होता है, अनंत काल तक वह सौभाग्य प्राप्त होता है, एवम् समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती है।

          हर हर महादेव 🚩🚩

          जब सती अनुसूया के तप से त्रिदेव बन गए शिशु

          जब सती अनुसूया के तप से त्रिदेव बन गए शिशु..!

          सती अनुसुइया महर्षि अत्रि की पत्नी थीं। अत्रि ऋषि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और सप्तऋषियों में से एक थे। अनुसुइया का स्थान भारतवर्ष की सती-साध्वी नारियों में बहुत ऊँचा है। इनका जन्म अत्यन्त उच्च कुल में हुआ था। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि को इन्होंने पति के रूप में प्राप्त किया था। अत्रि मुनि की पत्नी जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थीं। इन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सेवा करके उन्हें प्रसन्न किया और ये त्रिदेव क्रमश: सोम, दत्तात्रेय और दुर्वासा के नाम से उनके पुत्र बने। अनुसुइया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी।

          जब सती अनुसूया के तप से त्रिदेव बन गए शिशु..!

          इस प्रसंग को पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इस तरह प्रस्तुत किया है-

          अनुसुइया के पद गहि सीता । मिली बहोरि सुशील विनीता।।
          ऋषि पत्नी मन सुख अधिकाई। आशीष देई निकट बैठाई।।
          दिव्य वसन भूषण पहिराये। जे नित नूतन अमल सुहाये।।

           इसी आश्रम में सतीअनुसुइया ने उनके पातिव्रत्य धर्म की परीक्षा लेने आये ब्रह्मा.विष्णु.महेश को शिशु बना दिया था। चलिए जानते हैं क्या है माता अनसुइया द्वारा त्रिदेवों के शिशु बनाने की पौराणिक कथा। 

          एक बार नारदजी ने मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां पार्वती को अपने सतीत्व और पवित्रता की चर्चा करते देखा।

          जब सती अनुसूया के तप से त्रिदेव बन गए शिशु..!

          नारद जी उनके पास पहुंचे और उन्हें अत्रि महामुनि की पत्नी अनुसूया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में बताया कि उनके समान पवित्र और पतिव्रता तीनों लोकों में नहीं है।ईर्ष्यावश तीनों ने सती अनसूया के पातिव्रत्य को खंडित के लिए अपने पतियों से ज़िद की। 

          इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सती अनसूया के सतित्व और ब्रह्मशक्ति को परखने हेतु जब अत्रि ऋषि आश्रम से कहीं बाहर गए थे तब यतियों का भेष धारण कर आश्रम में पहुंचे तथा भिक्षा मांगने लगे, सती अनुसूया ने जब त्रिमूर्तियों का खाना देना चाहा तब वे एक स्वर में बोले, हे साध्वी,हमारा एक नियम है कि जब तुम निर्वस्त्र होकर भोजन परोसोगी, तभी हम भोजन करेंगे।अपने पातिव्रत्य पर आंच आता देख उन्होंने ऋषि अत्रि का स्मरण किया व दिव्य शक्ति से जाना कि वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं,, मुस्कुराते हुए माता अनुसूया बोली 'जैसी आपकी इच्छा'.... तीनों यतियों पर जल छिड़क कर उन्हें तीन प्यारे शिशुओं के रूप में बदल दिया। सुंदर शिशु देख कर माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व भाव उमड़ पड़ा। शिशुओं को स्तनपान कराया, दूध-भात खिलाया, गोद में सुलाया। तीनों गहरी नींद में सो गए, तभी नारद जी लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे। नारद ने विनयपूर्वक अनसूया से कहा, माते, यह अपने पतियों को ढूंढ रही थी। कृपया इन्हें सौंप दीजिए।

          जब सती अनुसूया के तप से त्रिदेव बन गए शिशु..!

          अनसूया ने तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा, ‘माताओं, झूलों में सोने वाले शिशु अगर आपके पति हैं तो इन्हें आप ले जा सकती हैं ! तीनों देवियों ने माता अनुसूया से क्षमा याचना की और बताया कि उन्होंने ही परीक्षा लेने के लिए अपने पतियों को बाध्य किया था, माता अनसूया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया। तीनों देव सती अनसूया से प्रसन्न हो बोले, देवी ? वरदान मांगो। त्रिदेव की बात सुन अनसूया बोलीः- “प्रभु ! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए। कालान्तर में मतांतर से ब्रह्मा के अंश से चंद्र, विष्णु के अंश से दत्त तथा शिव के अंश से दुर्वासा का जन्म माता अनसूया के गर्भ से हुआ।

          सती अनसुइया से जुड़ा एक प्रसंग यह भी है :-

          जब सती अनुसूया के तप से त्रिदेव बन गए शिशु

          कहा यह जाता है कि अत्रि मुनि गंगा स्नान के लिए प्रतिदिन प्रयागराज जाते थे। यह देख कर अनुसुइया ने एक बार ध्यानस्थ होकर कहा कि अगर मेरे तपोबल में शक्ति है तो गंगा को यहां हमारे आश्रम के पहाड़ से निकलना होगा। कहते हैं कि उनके तप के प्रभाव से पहाड़ से निकले स्रोत ने नदी का रूप ले लिया जो मंदिकनी या पयस्वनी कहलायी।