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कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

कितना अजीब है ना

आज एक बहुत ही खूबसूरत कविता पढ़ी, साल के दो महीने बिलकुल अलग होते हुए भी कितने समान हैं... कवि की बहुत ही सुंदर प्रस्तुति

कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?
कितना अजीब है ना, 
दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?
जैसे पुरानी यादों और नए वादों का किस्सा...

दोनों काफ़ी नाज़ुक हैं 
दोनो में गहराई है,
दोनों वक़्त के राही हैं, 
दोनों ने ठोकर खायी है...
कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

यूँ तो दोनों का है
वही चेहरा-वही रंग,
उतनी ही तारीखें और 
उतनी ही ठंड...
पर पहचान अलग है दोनों की
अलग है अंदाज़ और 
अलग हैं ढंग...
कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

एक अन्त है, 
एक शुरुआत
जैसे रात से सुबह,
और सुबह से रात...
कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

एक में याद है
दूसरे में आस,
एक को है तजुर्बा, 
दूसरे को विश्वास...
कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

दोनों जुड़े हुए हैं ऐसे
धागे के दो छोर के जैसे,
पर देखो दूर रहकर भी 
साथ निभाते हैं कैसे...

जो दिसंबर छोड़ के जाता है
उसे जनवरी अपनाता है,
और जो जनवरी के वादे हैं
उन्हें दिसम्बर निभाता है...
कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

कैसे जनवरी से 
दिसम्बर के सफर में
११ महीने लग जाते हैं...
लेकिन दिसम्बर से जनवरी बस
१ पल मे पहुंच जाते हैं...
कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

जब ये दूर जाते हैं
तो हाल बदल देते हैं,
और जब पास आते हैं 
तो साल बदल देते हैं...

देखने में ये साल के महज़ 
दो महीने ही तो लगते हैं,
लेकिन... 
सब कुछ बिखेरने और समेटने
का वो कायदा भी रखते हैं...
कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

दोनों ने मिलकर ही तो 
बाकी महीनों को बांध रखा है।
अपनी जुदाई को 
दुनिया के लिए 
एक त्यौहार बना रखा है..
कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?



उम्र की डोर से फिर 
एक मोती झड़ रहा है....
तारीख़ों के जीने से 
दिसम्बर फिर उतर रहा है..
कुछ चेहरे घटे,चंद यादें 
जुड़ी गए वक़्त में....
उम्र का पंछी नित दूर और 
दूर निकल रहा है..
गुनगुनी धूप और ठिठुरी 
रातें जाड़ों की...
गुज़रे लम्हों पर झीना-झीना 
सा इक पर्दा गिर रहा है..
ज़ायका लिया नहीं और
फिसल गई ज़िन्दगी...
वक़्त है कि सब कुछ समेटे
बादल बन उड़ रहा है.. 

फिर एक दिसम्बर गुज़र रहा है..

 *वर्ष का बदलना सभी के लिए शुभदायी फलकारक मंगलमय हो*

कितना अजीब है ना दिसंबर और जनवरी का रिश्ता?

तेनालीराम - शिकारी झाड़ियां | Tenali Raman - Shikari Jhadiya

शिकारी झाड़ियां

महाराज कृष्णदेव राव हर साल ठंड के मौसम में नगर के बाहर डेरा डाला करते थे। इस दौरान महाराज और उनके कुछ दरबारी व सैनिक उनके साथ तंबू लगाकर रहते थे। राज्य के सभी कामकाज को छोड़कर उन दिनों गीत-संगीत की महफिलें सजती और कभी किस्से कहानियों के दौर चला करते थे।

तेनालीराम - शिकारी झाड़ियां | Tenali Raman - Shikari Jhadiya

ऐसी ही एक सुहानी शाम में महाराज के मन में शिकार पर जाने का विचार आया। महाराज ने मंत्रियों से कहकर शिकार की तैयारियां शुरू करवाईं। इसके बाद अगली ही सुबह महाराज अन्य मंत्रियों व कुछ सैनिकों के साथ शिकार के लिए निकलने लगे।

तेनालीराम महाराज के प्रिय थे। अतः महाराज ने तेनालीराम को भी शिकार पर साथ चलने को कहा। महाराज की बात सुनकर एक दरबारी ने कहा - "रहने दीजिए महाराज! तेनालीराम की उम्र हो चली है और अब वह शिकार पर जाएंगे तो जल्दी ही थक जाएंगे।" दरबारी की बात सुनकर सभी हंसने लगे, लेकिन तेनालीराम कुछ नहीं बोले। इतने में महाराज ने तेनालीराम से कहा कि वह दरबारियों की बातों पर ध्यान न दें और उनके साथ शिकार पर चलें।

महाराज के कहने पर तेनालीराम भी एक घोड़े पर सवार होकर काफिले के साथ चल पड़े। कुछ समय बाद महाराज का काफिला जंगल के बीच पहुंच गया। शिकार के लिए नजरें दौड़ाते हुए महाराज को पास ही एक हिरण दिखाई दिया। हिरण पर निशाना साधने के लिए जैसे ही राजा ने तीर कमान पर चढ़ाया हिरण वहां से भागने लगा और महाराज अपने घोड़े पर उसका पीछा करने लगे।

महाराज को हिरण के पीछे जाते देख अन्य दरबारियों के साथ तेनालीराम भी महाराज का पीछा करने लगे। जैसे ही महाराज ने हिरण पर निशाना साधा, वो एक घनी झाड़ियों में जाने लगा। महाराज निशाना लगाने के लिए हिरण के पीछे झाड़ियों में जाने लगे। तभी तेनालीराम ने पीछे से महाराज को रुकने के लिए आवाज दी।

तेनालीराम की आवाज से महाराज का ध्यान भंग हो गया और उनका निशाना चूक गया। हिरण के झाड़ियों में जाते ही महाराज ने पलटकर गुस्से से तेनालीराम को देखा। महाराज ने तेनालीराम को डांटते हुए पूछा कि आखिर उसने उन्हें झाड़ियों में जाने क्यों नहीं दिया। नाराज होते हुए राजा कृष्णदेव ने कहा - "तेनालीराम! आज तुम्हारे चलते हिरण का शिकार नहीं हो पाया।"

महाराज की डांट सुनने पर भी तेनालीराम चुप्पी साधे रहे। महाराज के चुप होने पर तेनालीराम ने एक सैनिक को पेड़ पर चढ़कर झाड़ियों के उस पार देखने को कहा। तेनालीराम के कहने पर सैनिक ने देखा कि वह हिरण जिसका महाराज पीछा कर रहे थे, वो कंटीली झाड़ियों में फंसा हुआ है और बुरी तरह से लहूलुहान है। काफी देर तक प्रयास करने के बाद भी वह हिरण उन कंटीली झाड़ियों से निकल पाया और लड़खड़ाते हुए जंगल की ओर भाग गया।

पेड़ से उतरकर सैनिक ने महाराज को पूरी आंखों देखी सुनाई। सैनिक की बात सुनकर महाराज को बड़ी हैरानी हुई। उन्होंने तेनालीराम को पास बुलाया और उससे पूछा कि क्या उसे पहले से पता था कि वहां कंटीली झाड़ियां हैं। महाराज की बात सुनकर तेनालीराम ने कहा - "महाराज! जंगल में कई ऐसी झाड़ियां होती हैं, जो व्यक्ति को लहूलुहान करके अधमरा छोड़ सकती हैं । मुझे शक था कि आगे ऐसी ही ‘शिकारी झाड़ियां’ हो सकती हैं।"

तेनालीराम की बात सुनकर महाराज उसकी सूझबूझ के एक बार फिर कायल हो गए। महाराज ने अन्य दरबारियों की ओर देखते हुए कहा कि तुम लोग नहीं चाहते थे कि तेनालीराम शिकार पर आए, लेकिन आज उसके ही कारण मेरी जान बची है। महाराज ने तेनालीराम की पीठ थपथपाते हुए कहा कि तुम्हारी बुद्धि और सूझबूझ का कोई मुकाबला नहीं है।

English Translate

hunter bushes

Maharaj Krishnadeva Rao used to camp outside the city every year during the cold season. During this time the Maharaj and some of his courtiers and soldiers lived with him in tents. Leaving all the affairs of the state, in those days, songs and music festivals used to be decorated and sometimes stories used to go round.

तेनालीराम - शिकारी झाड़ियां | Tenali Raman - Shikari Jhadiya

On one such pleasant evening the idea of ​​going hunting came in the mind of Maharaj. Maharaj started the preparations for the hunt by asking the ministers. After this, the very next morning Maharaj started going out for hunting along with other ministers and some soldiers.

He was dear to Tenaliram Maharaj. Therefore, the Maharaja asked Tenaliram to accompany him on the hunt. Listening to Maharaj, a courtier said - "Let it be, Maharaj! Tenaliram's age has come and now he will be tired soon if he goes on a hunt." Everyone started laughing after listening to the courtier, but Tenaliram did not say anything. In this, the Maharaja asked Tenaliram to ignore the words of the courtiers and go hunting with them.

At the behest of the Maharaj, Tenaliram also rode on a horse and left with the convoy. After some time Maharaj's convoy reached the middle of the forest. While looking for prey, Maharaj saw a deer nearby. As soon as the king mounted the arrow to target the deer, the deer started running from there and the king started following him on his horse.

Seeing Maharaj going after the deer, Tenaliram along with other courtiers also started following Maharaj. As soon as Maharaj targeted the deer, he started going into a thick bush. Maharaj started going after the deer in the bushes to target. Then Tenaliram gave a voice to Maharaj to stop from behind.

Maharaj's attention was distracted by Tenaliram's voice and he missed his target. As soon as the deer entered the bushes, Maharaj turned and looked at Tenaliram with anger. Maharaj scolded Tenaliram and asked why he did not let him go into the bushes. Angry, King Krishnadeva said - "Tenaliram! Today due to you the deer could not be hunted."

Even after listening to Maharaj's scolding, Tenaliram remained silent. When Maharaj was silent, Tenaliram asked a soldier to climb a tree and look across the bushes. At the behest of Tenaliram, the soldier saw that the deer that Maharaj was chasing was trapped in the thorn bushes and was bleeding badly. Even after trying for a long time, the deer was able to get out of those thorn bushes and staggered and ran towards the forest.

Descending from the tree, the soldier heard the Maharaj with full eyes. Maharaj was very surprised to hear about the soldier. He called Tenaliram nearby and asked him if he already knew that there were thorn bushes there. Listening to Maharaj, Tenaliram said - "Your Majesty! There are many such bushes in the forest, which can leave a person half-dead by bleeding. I doubted that there might be more such 'hunting bushes' in the future."

After listening to Tenaliram, Maharaj was once again convinced of his wisdom. Looking at the other courtiers, Maharaj said that you did not want Tenaliram to come on a hunt, but today my life is saved because of him. The Maharaj patted Tenali Ram on the back and said that there is no match for your intelligence and understanding.

बेरोजगारी / Berozgari / Unemployment

बेरोजगारी (Unemployment)

आज हिंदुस्तान को आजाद हुए लगभग 73 साल हो चुके हैं, परंतु आज भी हिंदुस्तान आर्थिक रूप से पूर्णतः मजबूत नहीं हो पाया है। इसके विभिन्न कारण हैं और जिसकी वजह से आज हिंदुस्तान का लगभग 40% युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। अगर हम कुछ राजनीतिक बात करें (वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए) तो न जाति ना धर्म ना मंदिर ना मस्जिद कोई भी चीज हमारे देश की प्रमुख समस्या नहीं है। परंतु बहुत से लोग जाति धर्म मजहब में फँस कर रह गए हैं। इस से ऊपर उठकर कोई नहीं सोचना चाहता है। हमारे देश की तीन विकट एवं प्रमुख समस्याएं हैं। पहला स्वास्थ्य, दूसरा शिक्षा और तीसरा बेरोजगारी। 

बेरोजगारी (Unemployment)

इन तीनों ही समस्याओं पर ना कोई चर्चा करना चाहता है और ना ही कोई इन तीनों समस्याओं को समाप्त करना चाहता है। चाहे वह वर्तमान सरकार हो या इससे पहले की सरकार हो या आने वाली सरकार हो। आज का हमारा मुद्दा बेरोजगारी है। आज रोजगार ना होने के कारण करोड़ों युवा बी टेक, एमबीबीएस, एमबीए, एम कॉम, बीए, बीकॉम आदि करके रोड पर खाली घूम रहे हैं। आज हमारे समाज में किसी नेता या मंत्री का बेटा या बेटी के साथ किसी प्रकार की दुर्घटना घट जाए तो वह न्यूज़ की हेड लाइन बन कर कई दिनों तक हमारे घरों में चलते हैं, परंतु बेरोजगारी के कारण कई युवा अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं, इस बात को कोई न्यूज़, कोई मीडिया नहीं चलाता है, ना दिखाता है।

बेरोज़गारी (Unemployment) या बेकारी किसी काम करने के लिए योग्य व उपलब्ध व्यक्ति की वह अवस्था होती है जिसमें उसकी न तो किसी कम्पनी या संस्थान के साथ और न ही अपने ही किसी व्यवसाय में नियुक्ति होती है। किसी देश, राज्य या अन्य क्षेत्र में पूरे श्रम करने वाले लोगों की आबादी में बेरोज़गारों का प्रतिशत उस स्थान का बेरोज़गारी दर (unemployment rate) कहलाता है। अगर वह लोग जो बालक, वृद्ध, रोगी या अन्य किसी अवस्था के कारण अनियोज्य (unemployable)- यानि रोज़गार के लिए अयोग्य - हों काम न करें तो उन्हें बेरोज़गार की श्रेणी में नहीं गिना जाता है और न ही उनकों बेरोज़गारी दर में सम्मिलित करा जाता है।

बेरोजगारी (Unemployment)

कौन होता है बेरोजगार?

सरकार किसे बेरोजगार मानती है? यह हर राज्य सरकार के नियमों पर निर्भर करता है। कौन बेरोजगार है, इसका अंदाजा सरकारों की ओर से बेरोजगारी भत्ता दिए जाने वाली शर्तों के आधार पर तय किया जा सकता है, जो अलग अलग होते हैं। जिन लोगों को सरकार बेरोजगारी भत्ता देती हैं, तो माना जा सकता है कि वो अभी बेरोजगार हैं। वैसे सामान्य तौर पर माना जाता है कि जिन लोगों के पास अभी संगठित और असंगठित क्षेत्र में कोई काम नहीं है और वो पिछले 6 महीने से काम की तलाश कर रहे हैं और फिर भी उन्हें काम नहीं मिला है, तो उन्हें बेरोजगार की श्रेणी में गिना जाता है। 

देश में बेरोजगारी की कई सारी वजह हैं, जिसका उल्लेख किसी एक लेख में नहीं किया जा सकता है। इनमें से एक है - देश की आर्थिक नीति। देश के धीमे आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप लोगों को रोजगार के कम अवसर प्राप्त होते हैं, जिससे बेरोजगारी बढ़ती है। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में जुड़ा हुआ है। मौसमी व्यवसाय होने के कारण यह केवल वर्ष के एक निश्चित समय के लिए काम का अवसर प्रदान करता है। देश में औद्योगिक क्षेत्र की वृद्धि बहुत धीमी है।

बेरोजगारी (Unemployment)

कितनी तरह की होती है बेरोजगारी?

बेरोजगारी भी सिर्फ एक तरह की नहीं होती है और इन बेरोजगारी के कारणों की वजह से उन्हें कई प्रकारों में बांटा गया है। 

चक्रीय बेरोजगारी- चक्रीय या मांग में कमी के कारण बेरोजगारी तब होती है, जब अर्थव्यवस्था को कम श्रम शक्ति की आवश्यकता होती है। इस वक्त लोगों के पास रोजगार कम हो जाता है और बेरोजगारों की संख्या में इजाफा हो जाता है और ऐसी बेरोजगारी ही चक्रीय बेरोजगारी होती है। 

मौसम बेरोजगारी - यह बेरोजगारी एक साल में किसी विशेष समय में होती है तो इसे मौसमी बेरोजगारी कहते हैं. ऐसी बेरोजगारी कृषि, पर्यटक, होटल आदि के सेक्टर शामिल हैं। 

सरंचनात्मक बेरोजगारी - सरंचनात्मक बेरोजगारी उस समय होती है, जबकि किसी व्यक्ति की योग्यता उसके कार्य की आवश्यकता के लिए पर्याप्त नहीं होती। यह मांग के स्वरूप में दीर्घकालीन परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है और अर्थव्यवस्था की मौलिक सरंचना को परिवर्तित कर देती है, इस बेरोजगारी पर नियंत्रण करना आवश्यक होता है। 

संघर्षात्मक बेरोजगारी - संघर्षात्मक बेरोजगारी उस समय होती है, जब कोई व्यक्ति एक रोजगार को छोड़कर दूसरे रोजगार की तलाश में होता है। इसके अलग अलग कारण हो सकते हैं, जैसे- अच्छे रोजगार की तलाश, वर्तमान रोजगार से निकाले जाने पर, अपनी इच्छा से वर्तमान रोजगार छोड़ने पर. ऐसे में दूसरे रोजगार को प्राप्त करने में व्यक्ति को कुछ समय लग जाता है। 

अपने समाज से बेरोजगारी को दूर करने के लिए सभी को कुछ जिम्मेदारी पूर्ण कदम उठाने होंगे

बेरोजगारी (Unemployment)

लघु और कुटीर उद्योगों का विकास - 

ये उद्योग ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्थापित हैं तथा अंशकालीन रोजगार प्रदान करते हैं।

जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण - 

जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करना चाहिये। इससे श्रमिकों की पूर्ति दर में कमी आएगी। रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ यह भी अति आवश्यक है। 

व्यावसायिक शिक्षा-

देश की शिक्षा पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता है। हमें शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना है। हाईस्कूल पास करने के बाद छात्रों की रुचि के अनुसार व्यावसायिक शिक्षा चुनने के लिए जोर देना चाहिए। इससे शिक्षा प्राप्त करने के बाद के व्यवसाय से जुड़ सकेंगे और देश में बेरोजगारी की समस्या हल हो सकेगी।

विनियोग में वृद्धि -  

सार्वजनिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूंजी का विनियोग कर बेरोजगारी दूर की जा सकती है। निजी क्षेत्र में बड़े उद्योगों को प्रोत्साहन देना चाहिए, जो कि श्रम प्रधान हों। इससे लोगों को रोजगार मिलेगा। बड़े-बड़े उद्योगों में पूंजी गहन तकनीक पर नियंत्रण रखना चाहिये, क्योंकि इनमें बड़ी-बड़ी मशीनों का उपयोग किया जाता है और मानव श्रम कम लगता है। इससे बेरोजगारी बढ़ती है।
बेरोजगारी (Unemployment)

सहायक उद्योगों का विकास- 

ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के सहायक उद्योग जैसे-दुग्ध व्यवसाय, मछली पालन, मुर्गीपालन, बागवानी, फूलों की खेती, व्यापक स्तर पर औषधीय पौधों की खेती आदि का विकास करना चाहिये। 

एक जिम्मेदार नागरिक होने के कारण हम सभी देशवासियों का कर्तव्य है कि जो गंभीर विषय है - बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य इन पर चर्चा करें और कोशिश करें कि अपने स्तर पर अपने समाज से समस्याओं को दूर करने का प्रयास करें। जो लोग किसी उच्च पद पर बैठे हुए हैं, उनका भी यह कर्तव्य है कि जितना हो सके लोगों को इसके प्रति जागरूक करें। 

English Translate

Unemployment

Today it has been almost 73 years since India got independence, but even today India has not been completely strong economically. There are various reasons for this and due to which about 40% of the youth of India are facing unemployment today. If we talk something political (given the current circumstances) then neither caste nor religion nor temple nor mosque is the main problem of our country. But many people are stuck in caste religion religion. No one wants to think above this. There are three serious and major problems of our country. First health, second education and third unemployment.

बेरोजगारी (Unemployment)

No one wants to discuss these three problems, nor does anyone want to end these three problems. Whether it is the present government or the previous government or the coming government. Our issue today is unemployment. Today, due to lack of employment, crores of youth are roaming empty on the road doing B Tech, MBBS, MBA, M Com, BA, BCom etc. Today, in our society, if any kind of accident happens with the son or daughter of a leader or minister, he becomes the headline of the news and walks in our homes for many days, but due to unemployment, many youths end their lives. No news, no media runs or shows this thing.

Unemployment or unemployment is the condition of a person capable and available to do any work in which he is neither employed with any company or institution nor in any business of his own. The percentage of unemployed people in a country, state or other region in the total labor population is called the unemployment rate of that place. If those people who are unemployable - that is, unemployable - because of child, old, sick or any other condition, do not work, then they are not counted as unemployed nor are they included in the unemployment rate. Is.

Who is unemployed?

Who is considered unemployed by the government? It depends on the rules of every state government. Who is unemployed, it can be decided on the basis of the conditions given by the governments for unemployment allowance, which are different. Those people to whom the government gives unemployment allowance, then it can be assumed that they are still unemployed. By the way, it is generally believed that people who do not have any work in the organized and unorganized sector and are looking for work for the last 6 months and still they have not found work, then they are counted as unemployed. goes.

There are many reasons for unemployment in the country, which cannot be mentioned in a single article. One of these is the economic policy of the country. As a result of the slow economic development of the country, people get less employment opportunities, which increases unemployment. Major part of the country's population is engaged in agriculture. Being a seasonal business, it provides work opportunity only for a certain time of the year. The growth of the industrial sector in the country is very slow.

बेरोजगारी (Unemployment)

What are the types of unemployment?

Unemployment is also not just one type and due to the reasons of these unemployment, they are divided into many types.

Cyclical unemployment- 

Cyclical or lack of demand-caused unemployment occurs when the economy requires less labor force. At this time the employment of the people decreases and the number of unemployed increases and such unemployment is called cyclical unemployment.

Seasonal unemployment - 

If this unemployment occurs at a particular time in a year, then it is called seasonal unemployment. Such unemployment includes sectors of agriculture, tourism, hotels, etc.

Structural Unemployment - 

Structural unemployment occurs when a person's ability is not sufficient to meet his/her job requirement. It arises due to long-term change in the nature of demand and changes the basic structure of the economy, it is necessary to control this unemployment.

Conflict unemployment - 

Conflict unemployment occurs when a person is leaving one job and looking for another job. There can be different reasons for this, such as looking for a good job, being fired from the current employment, leaving the current employment at will. In such a situation, it takes some time for a person to get another job.

To remove unemployment from our society, everyone has to take some responsible steps.

बेरोजगारी (Unemployment)

Development of small and cottage industries

These industries are established in rural and urban areas and provide part time employment.

Population growth control

Population growth should be controlled. This will reduce the supply rate of workers. Along with increasing employment opportunities, this is also very important.

Vocational Education-

There is a need to change the education system of the country. We have to make education job oriented. After passing high school, emphasis should be given to choose vocational education according to the interest of the students. With this, they will be able to join the business after getting education and the problem of unemployment in the country will be solved.

Increase in investment

Unemployment can be removed by investing capital on a large scale in the public sector. Large industries in the private sector should be encouraged, which are labor intensive. This will give employment to the people. Capital intensive technology should be controlled in big industries, because they use big machines and human labor is less. This increases unemployment.

Development of ancillary industries

In rural areas, allied industries of agriculture such as dairy business, fisheries, poultry, horticulture, floriculture, cultivation of medicinal plants on a large scale, etc. should be developed.

Being a responsible citizen, it is the duty of all the countrymen to discuss the serious issue – unemployment, education, health and try to remove the problems from our society at our level. It is also the duty of those who are sitting in a high position to make people aware of it as much as possible.

बेरोजगारी (Unemployment)

चिदंबरम का नटराज मंदिर / Nataraja Temple of Chidambaram

चिदंबरम का नटराज मंदिर

शिव के आनंद तांडव का स्थल

 चेन्नई से दक्षिण की ओर लगभग 240 किलोमीटर तथा पुदुचेरी से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित चिदंबरम नगर में अनेक बड़े छोटे अप्रतिम मंदिर हैं। सुप्रसिद्ध नटराज मंदिर चिदंबरम में ही है, जिसे चिदंबरम मंदिर भी कहते हैं। यह मंदिर 40 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। मंदिर परिसर प्राकारों अथवा प्रांगण की 5 परतों से घिरा है, जिसमें सबसे भीतरी प्राकार में गर्भगृह है।मंदिर पूरी तरह से द्रविड़ वास्तुकला से बना है किंतु गर्भगृह स्पष्टत: केरल अथवा मलाबारी शैली का है।

एकलौता ऐसा मंदिर, जहां होती है भगवान शिव के नटराज रूप की पूजा

इतिहास एवं किंवदंतियां

तिल्लई नटराज मंदिर से संबंधित सभी ऐतिहासिक संदर्भ यह दर्शाते हैं कि कम से कम छठवीं शताब्दी से यह मंदिर व्यवहार में है। संगम साहित्य से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंदिर के पुनरुद्धार में प्रमुख वास्तु विद के रूप में विडुवेलविडुगु पेरुंटक्कन का योगदान है जो कि पारंपरिक विश्वकर्मा समुदाय के वंशज है।  अप्पर एवं सम्बन्द की कविताओं में भी चिदंबरम के नृत्य मुद्रा में विराजमान भगवान का उल्लेख है। 10 वीं सदी के आसपास चिदंबरम चोल वंश की राजधानी थी तथा नटराज उनके कुलदेवता थे।कालांतर में उन्होंने अपनी राजधानी तंजावुर में स्थानांतरित कर दी थी।

एकलौता ऐसा मंदिर, जहां होती है भगवान शिव के नटराज रूप की पूजा

दक्षिण भारत के पल्लव, पांड्,य चोल,चेर एवं विजयनगर जैसे अनेक राजवंशों ने अपनी कालावधी में इस मंदिर के रखरखाव एवं विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्रत्येक राजवंश की शैली के चिन्ह मंदिर के विभिन्न भागों में देखा जा सकता है।

यहां मंदिर की स्थापना से कई वर्ष पूर्व यह भूभाग एक विशाल वन्य प्रदेश था। तिल्लई मैंनग्रोव के नाम से इस वन का नाम तिल्लई वन पड़ा।इस वन में ऋषियों का वास था, जो सदा विभिन्न अनुष्ठानों का आयोजन करते रहते थे। समयोपरांत उन्हें ऐसा भ्रम होने लगा था कि शक्तिशाली मंत्र द्वारा वे भगवान शिव को भी नियंत्रित कर सकते हैं। फलत: भगवान शिव ने उन्हें यथार्थ से अवगत कराने का निश्चय किया।एक दिन उन्होंने एक भिक्षु का रूप धारण किया तथा मोहिनी रूप में भगवान विष्णु को साथ लेकर उन ऋषियोंयों से भेंट करने यहां आए। भगवान शिव का सुंदर स्वरूप देख ऋषि पत्नियां उन पर मुग्ध हो गईं। इससे कुपित होकर ऋषियों ने शिव पर सर्पों का बर्षाव किया। भगवान शिव ने उन सर्पों को आदर पूर्वक स्वीकारा तथा उन्हें आभूषण के रूप में अपने शरीर पर धारण किया। उन्होंने शिव पर बाघ को छोड़ा भगवान शिव ने बाघ को मुक्ति प्रदान की तथा बाघ चर्म को अपनी कटि पर धारण कर लिया। यह देख ऋषियों ने अपनी समस्त आध्यात्मिक शक्तियां एकत्रित की तथा  मुयालकन असुर का आह्वाहन किया, जो पुर्ण अज्ञानता एवं अभिमान का प्रतीक था। भगवान शिव ने मुयालकन पर खड़े होकर उसे गति हीन कर दिया तत्पश्चात वे आनंद तांडव नृत्य करने लगे तथा अपना वास्तविक रूप ऋषियों के समक्ष प्रकट किया। ऋषियों को अपनी अज्ञानता का पूर्ण आभास हुआ तथा वे भगवान शिव के समक्ष नतमस्तक हो गए।

तभी से भगवान शिव यहां नटराज रूप में पूजे जाने लगे

एक अन्य किवदंती के अनुसार पतंजलि जो कृत काल में हिमालय में साधना कर रहे थे वे एक अन्य संत व्यघ्रपथर या पुलिकालमुनी  के साथ खिलाई वन में घूमते हैं और शिवलिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा करते हैं, वह भगवान जिनकी आज थिरुमला धनेश्वर के रूप में पूजा की जाती है।पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि भगवान शिव ने इन दोनों ऋषियों के लिए अपने शाश्वत आनंद के नृत्य (आनंद तांडव) का प्रदर्शन नटराज के रूप में तमिल माह थाई (जनवरी-फरवरी) में पूसम नक्षत्र के दिन किया।

व्यघ्रपथर/पुलकामुनि  व्याघ्र / पुलि का अर्थ है "बाघ" और पथ / काल का अर्थ है "चरण" - यह इस कहानी की ओर संकेत करता है कि किस प्रकार वह संत इसलिए बाघ के सामान दृष्टि और पंजे प्राप्त कर सके जिससे कि वह भोर होने के काफी पूर्व ही वृक्षों पर चढ़ सकें और मधुमक्खियों द्वारा पुष्पों को छुए जाने से पहले ही देवता के लिए पुष्प तोड़ कर ला सकें)।

चिदंबरम का नटराज मंदिर / Nataraja Temple of Chidambaram

चिदंबरम के नटराज मंदिर का महत्त्व

स्वर्ण छत युक्त चिदंबरम मंदिर का पवित्र गर्भगृह है और यहां तीन स्वरूपों में देवता विराजते हैं-

रूप" - भगवान नटराज के रूप में उपस्थित मानवरूपी देवता, जिन्हें सकल थिरुमेनी कहा जाता है।

"अर्ध-रूप" - चन्द्रमौलेस्वरर के स्फटिक लिंग के रूप में अर्ध मानवरूपी देवता, जिन्हें सकल निष्कला थिरुमेनी कहा जाता है।

 "आकाररहित" - चिदंबरा रहस्यम में एक स्थान के रूप में, पवित्र गर्भ गृह के अन्दर एक खाली स्थान, जिसे निष्कला थिरुमेनी कहते हैं। यहां 51 स्वर्ण बिल्व पत्रों से बना एक हार है जिसकी पूजा की जाती है।ऐसी मान्यता है कि यहां शिव एवं पार्वती का वास है किंतु वे मानवीय नेत्रों के समक्ष अदृश्य रहते हैं। इस स्थान को सदैव लाल व काले वस्त्र के आवरण से ढक कर रखा जाता है ।यह आवरण माया का प्रतिनिधित्व करता है। यह आवरण केवल विशेष पूजा अर्चना के समय ही खोला जाता है तब इन उस स्वर्ण बिल्व पत्रों को देखा जा सकता है । यह इस मंदिर को अद्वितीय बनाता है।

चिदंबरम पंचभूत स्थलों में से एक है जहां भगवान की पूजा उनके आकाश अवतार के रूप में होती है ।

नटराज मंदिर की वास्तुकला 

गोपुरम

मंदिर में कुल 9 द्वार हैं जिनमें से चार ऊंचे गोपुरम बने हुए हैं प्रत्येक गोपुरम में पूर्व दक्षिण पश्चिम और उत्तर की ओर 7 स्तर हैं पूर्वी गोपुरम में भारतीय नृत्य शैली भरतनाट्यम की संपूर्ण 108 मुद्राएं अंकित हैं।

गोपुरम को बारीक नक्काशी से सजाया है

5 सभाएं

यह 5 सभाएं या मंच या हॉल हैं-

  • चित सभई, पवित्र गर्भगृह है जहां भगवान नटराज और उनकी सहचरी देवी शिवाग्मासुंदरी रहती हैं।
  • कनक सभई, यह चितसभई के ठीक सामने हैं, जहां से दैनिक संस्कार संपादित किए जाते हैं।
  • नृत्य सभई या नाट्य सभई, यह मंदिर ध्वजा के खंभे के दक्षिण की ओर है जहां मान्यता के अनुसार भगवान ने देवी काली के साथ नृत्य किया था।
  • राजा सभई या 1000 स्तंभों वाला हाल जो हजारों खंभों से युक्त कमल या सहस्त्रराम नामक यौगिक चक्र का प्रतीक है (जो योग में सर के प्रमुख बिंदु पर स्थित एक 'चक्र' होता है और यही वह स्थान होता है जहां आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है। इस चक्र को 1000 पंखुरियों वाले कमल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि सहस्र चक्र पर ध्यान लगाने से परमसत्ता से मिलन की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है और यह यौगिक क्रियाओं का सर्वोच्च बिंदु माना जाता है)।

मंदिर की कलाकारी का महत्व

मंदिर का खाका और वास्तुकला दार्शनिक अर्थों से परिपूर्ण है-

5 में से 3 पंचभूतस्थल मंदिर जो कि काल हस्ती कांचीपुरम और चिदंबरम में है वह सभी ठीक 79' 43" के पूर्वीय देशांतर पर एक सीध में हैं-जो वास्तव में प्रौद्योगिकी, ज्योतिषीय और भौगोलिक दृष्टि से एक चमत्कार है। अन्य दो मंदिरों में से तिरुवनाइकवल इस पवित्र अक्ष पर दक्षिण की ओर 3 अंश पर और उत्तरी छोर के पश्चिम से 1अंश पर स्थित है, जबकि तिरुवन्नामलाई लगभग बीच में है।

  • इसके 9 द्वार मनुष्य के शरीर के 9 विवरों  की ओर संकेत करते हैं।
  • चितसभई पवित्र गर्भगृह हृदय का प्रतीक है(जिस प्रकार हृदय शरीर की बाईं ओर होता है ठीक उसी प्रकार चिदंबरम में गर्भगृह भी कुछ बाएं तरफ स्थित है) जहां पर पांच सीढ़ियों द्वारा पहुंचा जाता है, इन्हें पंचाटचारा पदी कहते हैं- पंच अर्थात 5 अक्षर शाश्वत शब्दांश- "शि वा य ना मा"
  • पवित्र गर्भगृह 28 स्तंभों द्वारा खड़ा है जो 28 आगम या भगवान शिव की पूजा के लिए निर्धारित नीतियों के प्रतीक हैं ।
  •  छत पर 64 आड़ी कास्ठ निर्मित धरन हैं जो 64 कलाओं का प्रतीक हैं।
  •  छत का निर्माण 21600 स्वर्ण टाइलों के द्वारा किया गया है जिन पर शब्द "शिवायनाम" लिखा है, यह संख्या 1 दिन में एक व्यक्ति द्वारा ली गई सांसो की संख्या को व्यक्त करती है।
  • यह स्वर्ण टाइलें लकड़ी की छत पर 72000 स्वर्ण कीलों की सहायता से लगाई गईं हैं, जो मनुष्य शरीर में उपस्थित नाड़ियों की संख्या का प्रतीक है। 
  • छत के ऊपर 9 पवित्र कलश (तांबे से निर्मित) स्थापित किए गए हैं जो नौ शक्तियों के प्रतीक हैं।
  • 8 मंडप में 6 खंबे हैं जो छह शास्त्रों के प्रतीक हैं।
  • अर्थ मंडप के बगल वाले मंडप में 18 खंबे हैं जो अठारह पुराणों के प्रतीक हैं।
  • चित सभा के छात्र 4 खंभों की सहायता से खड़ी है जो चार वेदों के प्रतीक हैं।

चिदंबरम, यह शब्द चित एवं अंबर इन दो शब्दों के संयोजन से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है चेतना का अकाश। मंदिर के गर्भ गृह के भीतर यह दोनों तत्व प्रदर्शित होते हैं।

चिदंबरम का नटराज मंदिर / Nataraja Temple of Chidambaram

मंदिर का रथ

चिदंबरम मंदिर का रथ संभवत संपूर्ण तमिलनाडु में किसी मंदिर के रथ का सबसे सुंदर उदाहरण है।यह रथ,जिस पर भगवान नटराज वर्ष में दो बार बैठते हैं, त्योहारों के दौरान असम के भक्तों द्वारा खींची जाती है।

नटराज मंदिर का कार्यभार दीक्षितर समुदाय संभालता है।एक दीक्षितर ब्राह्मण को विवाह उपरांत अपने परिवार से अर्चक की उपाधि विरासत में प्राप्त होती है।यद्यपि ऐसी मान्यता है कि इन ब्राह्मणों को स्वयं पतंजलि कैलाश पर्वत से यहां लेकर आए थे तथापि यह केरल के नंबूदिरि से अधिक संबंध रखते प्रतीत होते हैं।

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Nataraja Temple of Chidambaram

Site of Shiva's Ananda Tandava

 Located about 240 km south of Chennai and about 60 km from Puducherry, there are many big and small temples in Chidambaram Nagar. The famous Nataraja temple is located in Chidambaram itself, also known as Chidambaram temple. This temple is spread over an area of ​​40 acres. The temple complex is surrounded by five layers of prakaras or courtyards, with the innermost being the sanctum sanctorum. The temple is entirely made of Dravidian architecture but the sanctum sanctorum is clearly of Kerala or Malabari style.

चिदंबरम का नटराज मंदिर / Nataraja Temple of Chidambaram

History and legends

All historical references relating to the Tillai Nataraja temple indicate that the temple has been in practice since at least the 6th century. According to the information obtained from the Sangam literature, Viduvelvidugu Peruntakkan, who is a descendant of the traditional Vishwakarma community, has contributed as a major architectural scholar in the restoration of the temple. In the poems of Appar and Sambandh, there is a mention of God seated in the dancing posture of Chidambaram. Around the 10th century, Chidambaram was the capital of the Chola dynasty and Nataraja was their deity. Later they shifted their capital to Thanjavur.

Many dynasties like Pallavas, Pandavas, Ya Cholas, Cheras and Vijayanagaras of South India have contributed significantly in the maintenance and expansion of this temple during their period. Signs of the style of each dynasty can be seen in different parts of the temple.

Many years before the establishment of the temple here, this land was a vast forest area. This forest was named Tillai forest after the name of Tillai Mangrove. This forest was inhabited by sages, who were always conducting various rituals. Over time, he started having such an illusion that he could even control Lord Shiva by the powerful mantra. As a result, Lord Shiva decided to make them aware of the reality. One day he took the form of a monk and came here to meet those sages, taking Lord Vishnu in the form of Mohini. Seeing the beautiful form of Lord Shiva, the sage wives were infatuated with him. Enraged by this, the sages rained snakes on Shiva. Lord Shiva respectfully accepted those snakes and wore them as ornaments on his body. He left the tiger on Shiva, Lord Shiva liberated the tiger and wore the tiger skin on his neck. Seeing this, the sages gathered all their spiritual powers and invoked the asura, who was a symbol of complete ignorance and pride. Lord Shiva made him motionless by standing on Muyalkan, after which he started performing the infinite Tandava dance and revealed his true form to the sages. The sages became fully aware of their ignorance and bowed down to Lord Shiva.

Since then Lord Shiva started being worshiped here in the form of Nataraja.

चिदंबरम का नटराज मंदिर / Nataraja Temple of Chidambaram

According to another legend, Patanjali, who was meditating in the Himalayas during the Krita period, wandered in the Khilai forest with another saint, Vyaghrapathar or Pulikalamuni, and worshiped Lord Shiva in the form of a Shivalinga, the Lord who is today known as Thirumala Dhaneshwar. According to mythology, it is believed that Lord Shiva performed his dance of eternal bliss (Ananda Tandava) for these two sages in the form of Nataraja in the Tamil month of Thai (January-February) of the Poosam constellation. day done.

Vyaghrapathar/Pulkamuni Vyaghra/Puli means "tiger" and path/kaal means "step" - this alludes to the story of how the saint was able to achieve the vision and claws of a tiger so that he could see the dawn. climb trees long before they happen and pluck flowers for the deity before the bees touch the flowers).

Significance of Nataraja Temple of Chidambaram

The sanctum sanctorum of the Chidambaram temple with golden roof is and the deity resides here in three forms-

Roop" - the anthropomorphic deity present in the form of Lord Nataraja, who is called Sakal Thirumeni.

"Ardha-roop" - the half-human deity in the form of a crystal linga of Chandramouleshwarar, who is called Sakal Nishkala Thirumeni.

 "Shapeless" - as a space in the Chidambara Rahasyam, an empty space inside the sacred sanctum, called Nishkala Thirumeni. There is a necklace made of 51 golden bilva leaves which is worshipped. It is believed that Shiva and Parvati reside here but they remain invisible before human eyes. This place is always kept covered with red and black cloth. This cover represents Maya. This cover is opened only at the time of special worship, then these golden bilva leaves can be seen. This makes this temple unique.

Chidambaram is one of the Panchabhuta sites where the Lord is worshiped in the form of His sky incarnation.

चिदंबरम का नटराज मंदिर / Nataraja Temple of Chidambaram

Nataraja Temple Architecture

gopuram

The temple has a total of 9 gates, out of which four high gopurams are made, each gopuram has 7 levels towards east, southwest and north, the eastern gopuram has 108 mudras of Bharatanatyam, the Indian dance form.

5 meetings

These are 5 meetings or forums or halls-

  • Chit Sabhai is the sacred sanctum where Lord Nataraja and his consort Devi Shivagmasundari reside.
  • Kanaka Sabhai, it is right in front of Chitsabhai, from where the daily rituals are performed.
  • Nritya Sabhai or Natya Sabhai, this temple is on the south side of the Dhwaja pillar where the god is believed to have danced with Goddess Kali.
  • Raja Sabhai or the Hall of 1000 Pillars which symbolizes the thousands of pillared lotus or the compound chakra called Sahastraram (which in yoga is a 'chakra' located at the principal point of the head and is the place where the soul meets the Supreme Soul) This chakra is presented in the form of a lotus with 1000 petals. It is said that by meditating on the Sahasrara Chakra one can attain the state of union with the Supreme Being and is considered the highest point of yogic actions) .

importance of temple art

The design and architecture of the temple is full of philosophical meanings.

3 of the 5 Panchabhootasthala temples at Kala Hasti Kanchipuram and Chidambaram are all aligned exactly at 79' 43" East Longitude - a truly technological, astrological and geographical miracle. Out of the other two temples, Thiruvanaikaval is located on this sacred axis at 3 degrees to the south and 1 degree to the west of the northern end, while Tiruvannamalai is almost in the middle.

  • Its 9 gates point to the 9 holes of the human body.
  • Chitasbhai sacred sanctum is the symbol of the heart (just as the heart is on the left side of the body, in the same way the sanctum sanctorum in Chidambaram is also located on the left side) where it is reached by five steps, these are called Panchatachara padi - Pancha means 5 letters eternal Syllable- "shi vay na ma"
  • The sacred sanctum sanctorum is erected by 28 pillars which symbolize the 28 agamas or policies prescribed for the worship of Lord Shiva.
  •  There are 64 horizontal wooden beams on the roof, which are symbols of 64 arts.
  •  The roof is made of 21600 gold tiles with the word "Shivayanaam" written on it, the number representing the number of breaths a person takes in a day.
  • These golden tiles are fixed on the wooden ceiling with the help of 72000 golden nails, which symbolize the number of nadis present in the human body.
  • There are 9 sacred Kalash (made of copper) installed on top of the roof which symbolizes the nine powers.
  • There are 6 pillars in the 8 mandapas which symbolize the six scriptures.
  • The mandapa next to the Arth Mandap has 18 pillars which are symbols of the eighteen Puranas.
  • The students of the Chit Sabha are standing with the help of 4 pillars which symbolize the four Vedas.
  • Chidambaram, this word is made from the combination of these two words Chit and Amber. It literally means the sky of consciousness. Both these elements are displayed inside the sanctum sanctorum of the temple.
चिदंबरम का नटराज मंदिर / Nataraja Temple of Chidambaram

temple chariot

The chariot of the Chidambaram temple is probably the most beautiful example of a temple chariot in the whole of Tamil Nadu. This chariot, on which Lord Nataraja sits twice a year, is pulled by devotees of Assam during festivals.

The Nataraja temple is managed by the Dikshitar community. A Dikshitar Brahmin inherits the title of Archaka from his family after marriage. Although it is believed that these Brahmins were brought here by Patanjali himself from Mount Kailash, it is from Namboodiri in Kerala. seem to be more related.

सत्यानाशी /argemone mexicana / Mexican prickly poppy

सत्यानाशी (Mexican prickly poppy)

सत्यानाशी नाम आप लोगों को अजीब लग रहा होगा। साधारण तौर पर इसे भटकटैया के नाम से जाना जाता है।  भटकटैया पौधे से भला कौन परिचित नहीं होगा? सड़क मार्गों के किनारे, अनुपयोगी पड़ी जमीन पर या फिर कहीं भी थोड़े मिट्टी पर यह पौधा आसानी से नजर आता है। इस पौधे के नाम पर आप सभी बिल्कुल मत जाइएगा यह अपने नाम के विपरीत बहुत ही उपयोगी और गुणी पौधा है। बल्कि हम यह कह सकते हैं कि यह रोगों का सत्यानाश करने वाला पौधा है। सत्यानाशी का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है।

सत्यानाशी /argemone mexicana  / Mexican prickly poppy

सत्यानाशी क्या है?

सत्यानाशी पूरे भारतवर्ष में 1500 मीटर की ऊंचाई तक पाई जाती है। यह प्राकृतिक रूप से मैदानी भागों में, नदी एवं सड़कों के किनारे पर तथा वन्य क्षेत्रों में पाई जाती है। यह वनस्पति मूलतः मेक्सिको से भारत आई, परंतु भारत में अब यह सब जगह खरपतवार के रूप में उत्पन्न होती है। यह एक ऐसी वनस्पति है, जिसके पूरे पौधों पर कांटे होते हैं। इसका फल चौकोर होता है। इसमें राई के समान छोटे-छोटे श्यामले रंग के बीच भरे रहते हैं। इन बीजों को जलते हुए कोयले पर डालने से भड़ भड़ बोलते हैं। उत्तर प्रदेश में इसे भड़भाड़ भी कहते हैं। सत्यानाशी के किसी भी भाग को तोड़ने से सोने जैसा पीला दूध निकलता है। इसलिए इसको स्वर्ण क्षीरी भी कहते हैं। लेकिन आयुर्वेद के अनुसार सत्यानाशी स्वर्ण क्षीरी से पूर्णतः भिन्न है। यह वनस्पति कश्मीर तथा उत्तराखंड में 3900 मीटर की ऊंचाई पर प्राप्त होता है।

सत्यानाशी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

जानते हैं सत्यानाशी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

कितना भी पुराना घाव, खुजली, कुष्ठ रोग आदि हो, सत्यानाशी के प्रयोग से इन रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। आयुर्वेदिक किताबों में भी बताया गया है कि सत्यानाशी कफ पित्त दोष को खत्म करती है। इसके दूध, पत्ते के रस तथा बीज के तेल घाव और कुष्ठ रोगों में लाभदायक होते हैं। इसकी जड़ का लेप करने से सूजन ठीक होता है।  सत्यानाशी का प्रयोग बुखार, नींद ना आने की परेशानी, पेशाब से संबंधित विकार, पेट की गड़बड़ी आदि रोगों में भी किया जाता है। इसके बीज जहरीले होते हैं। कभी-कभी सरसों में इसे मिला देने से उसके तेल का उपयोग करने वालों की मृत्यु भी हो जाती है। इसके बीज मिली हुई सरसों के तेल के प्रयोग करने वालो को पेट की झिल्ली ( पेरिटोनियम ) में पानी भरने का एक रोग एपिडेमिक ड्रॉप्सी भी हो जाता है।

रतौंधी की समस्या

सत्यानाशी पंचांग से दूध निकाल लें। 1 बूंद पीले दूध में तीन बूंद घी मिलाकर आंखों में काजल की तरह लगाने से मोतियाबिंद और रतौंधी में लाभ होता है।

सफेद दाग की समस्या

सत्यानाशी के फूल को पीसकर अथवा सत्यानाशी दूध का लेप करने से सफेद दाग में लाभ होता है।

सांसों के रोग और खांसी में

  • सत्यानाशी का पीला दूध (चार से पांच बूंद) बतासे में डालकर खाने से लाभ होता है। 
  • 500 मिलीग्राम से 1 ग्राम तक सत्यानाशी जड़ के चूर्ण को गर्म जल या गर्म दूध के साथ सुबह-शाम पिलाने से कफ बाहर निकल जाता है। इससे सांसों के रोग और खांसी में लाभ होता है।

पेट के दर्द में

सत्यानाशी के 3 से 5 मिलीलीटर पीले दूध को 10 ग्राम घी के साथ मिलाकर पिलाने से पेट का दर्द ठीक होता है।

पीलिया रोग में

10 मिलीलीटर गिलोय के रस में सत्यानाशी तेल की 8 से 10 बूंद डालकर सुबह-शाम पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता है।

मूत्र विकार में

पेशाब में जलन हो तो सत्यानाशी के 20 ग्राम पंचांग को 200 मिलीलीटर पानी में भिगो लें। इसका काढ़ा बनाकर 10 से 20 मिलीलीटर मात्रा में पीने से मूत्र विकारों में लाभ होता है।

सत्यानाशी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

कुष्ठ रोग में

कुष्ठ रोग और रक्तपित्त (नाक, कान अंगों से खून बहने की समस्या) में सत्यानाशी के बीजों के तेल से शरीर पर मालिश करने से लाभ होता है। इसके साथ ही 5 से 10 मिलीलीटर पत्ते के रस में 250 मिलीलीटर दूध मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से लाभ होता है।

त्वचा रोग में

  • सत्यानाशी पंचांग के जड़ में थोड़ा नमक डालकर लंबे समय तक सेवन करने से त्वचा के विकारों में लाभ होता है।  प्रतिदिन 5 से 10 मिलीलीटर रस का सेवन लाभकारी होता है।
  • सत्यानाशी में एंटीफंगल गुण पाया जाता है। इसलिए यह दाद की समस्या में फायदेमंद होता है। एंटी फंगल गुण होने के कारण यह दाद के लक्षणों को कम कर के दाद को फैलने से रोकता है। इसके लिए सत्यानाशी की पत्तियों का रस या तेल को दाद वाली जगह पर लगाएं।

घाव सुखाने के लिए

  • सत्यानाशी के दूध को घाव पर लगाने से पुराने और बिगड़े हुए घाव भी ठीक होते हैं।
  • सत्यानाशी रस को घाव पर लगाने से घाव ठीक होता है।
  • सत्यानाशी के दूध को लगाने से कुष्ठ तथा फ़ोड़ा ठीक होता है।
  • सत्यानाशी के पंचांग को पीसकर पुराने घाव एवं खुजली पर लगाने से लाभ होता है।
  • छाले, फोड़े, फुंसी, खुजली, जलन आदि रोगों पर सत्यानाशी पंचांग का रस या पीला दूध लगाने से लाभ होता है।

दर्द से राहत

सत्यानाशी तेल की 10 बूंदों को 1 ग्राम सोंठ के साथ मिलाकर सेवन करने से शरीर के सभी अंगों के दर्द ठीक हो जाते हैं।

सत्यानाशी के नुकसान (Side Effects of Satyanashi)

सत्यानाशी का उपयोग करते समय सावधानियां बरतनी बहुत जरूरी है।

  • सत्यानाशी के बीजों का केवल शरीर के बाहरी अंगों पर ही प्रयोग करना चाहिए .क्योंकि यह अत्यधिक विषैले होते हैं।
  • इसके बीज की मिलावट सरसों के तेल में करते हैं, जिसके प्रयोग से मृत्यु तक हो सकती है।

अतः सत्यानाशी का प्रयोग करते समय विशेष सावधानी बरतें।

सत्यानाशी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

विभिन्न भाषाओं में सत्यानाशी के नाम (Satyanashi in Other Languages)

Hindi –         सत्यानाशी, उजर कांटा, सियाल कांटा
English –     प्रिकली पॉपी, (Prickly poppy), मैक्सिकन पॉपी (Mexican poppy), Yellow thistle (येलो थिसल)
Sanskrit –     कटुपर्णी
Oriya –         कांटा–कुशम (Kanta-kusham)
Urdu –         बरमदंडी (Baramdandi)
Kannada –   अरसिन-उन्मत्ता (Arasina-unmatta)
Gujarati –     दारूडी (Darudi)
Tamil –         पोन्नुम्मटाई (Ponnummattai), कुडियोट्टि (Kudiyotti), कुरुक्कुमचेडि (Kurukkum-chedi)
Telugu –       पिची कुसामा चेट्टु (Pichy kusama chettu)
Bengali –     स्वर्णक्षीरी (Swarnakhiri), शियाल कांटा (Shial-kanta), बड़ो सियाल कांटा (Baro shialkanta)
Nepali –       सत्यानाशी (Satyanashi)
Punjabi –     कण्डियारी (Kandiari), स्यालकांटा (Sialkanta), भटमिल (Bhatmil), सत्यनाशा (Satyanasa), भेरबण्ड (Bherband), भटकटेता (bhatkateta), भटकटैया (Bhatkateya)
Marathi –     कांटेधोत्रा (Kantedhotra), दारुरी (Daruri), फिरंगिधोत्रा (Firangidhotra)
Malayalam – पोन्नुम्मत्तुम् (Ponnunmattum)
Arabic –     बागेल (Bagel)
सत्यानाशी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण


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Satanashi (Mexican prickly poppy)

The name Satyanashi must be sounding strange to you. It is commonly known as Bhattaiya. Who would not be familiar with the wandering plant? This plant is easily visible on the side of roadways, on unusable land or anywhere on little soil. You all will not go by the name of this plant, it is a very useful and virtuous plant contrary to its name. Rather we can say that it is a plant that destroys diseases. Satyanashi is used as a medicine.

What is truthfulness?

Satyanashi is found all over India up to an altitude of 1500 meters. It is found naturally in the plains, along the banks of rivers and roads and in forested areas. This plant originally came to India from Mexico, but now it is grown everywhere in India as a weed. It is a plant that has thorns all over the plant. Its fruit is square. In it, small brownish colors like mustard are filled in between. Throwing these seeds on the burning coal speaks loudly. In Uttar Pradesh it is also called Bhadbhad. By breaking any part of Satyanashi, yellow milk like gold comes out. That's why it is also called Swarna Ksheeri. But according to Ayurveda, Satyanashi is completely different from Swarna Ksheeri. This vegetation is found in Kashmir and Uttarakhand at an altitude of 3900 meters.
सत्यानाशी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

Know about the advantages, disadvantages, uses and medicinal properties of Satyanashi.

No matter how old the wound, itching, leprosy etc., these diseases can be got rid of by the use of Satyanashi. It is also told in Ayurvedic books that Satyanashi eliminates Kapha Pitta dosha. Its milk, leaf juice and seed oil are beneficial in wounds and leprosy. Swelling is cured by applying paste of its root. Satyanashi is also used in diseases like fever, sleeplessness, urinary disorders, stomach disorders, etc. Its seeds are poisonous. Sometimes mixing it with mustard also kills those who use its oil. Those who use mustard oil mixed with its seeds also get epidemic dropsy, a disease of filling water in the abdominal membrane (peritoneum).

night blindness problem

Take out the milk from the Satyanashi Panchang. Mixing three drops of ghee in one drop of yellow milk and applying it like kajal in the eyes is beneficial in cataract and night blindness.

white spots problem

Grinding the flowers of Satyanashi or applying the paste of Satyanashi milk is beneficial in white spots.

In respiratory diseases and cough

  • Putting yellow milk (four to five drops) of Satyanashi in Batase is beneficial.
  • Taking 500 mg to 1 gram powder of satanashi root with warm water or hot milk twice a day, it brings out phlegm. It is beneficial in respiratory diseases and cough.

in stomached 

Mix 3 to 5 ml yellow milk of Satyanashi with 10 grams ghee and take, it ends stomachache.

in jaundice

Mixing 8 to 10 drops of satanashi oil in 10 ml Giloy juice and taking it twice a day is beneficial in jaundice.

in urinary disorder

If there is burning sensation in urine, soak 20 grams Panchang of Satyanashi in 200 ml water. Make a decoction of this and drink 10 to 20 ml in quantity, it is beneficial in urinary disorders.

in leprosy

Massaging the body with the oil of satyanashi seeds is beneficial in leprosy and raktapitta (problem of bleeding from the nose, ear organs). Along with this, mixing 250 ml milk in 5 to 10 ml leaf juice and giving it twice a day is beneficial.

in skin diseases

  • Putting a little salt in the root of Satyanashi Panchang and consuming it for a long time is beneficial in skin disorders. Consuming 5 to 10 ml juice daily is beneficial.

  • Antifungal properties are found in Satyanashi. Therefore it is beneficial in the problem of ringworm. Due to its anti-fungal properties, it reduces the symptoms of ringworm and prevents the spread of ringworm. For this, apply the juice or oil of the leaves of Satyanashi on the ringworm area.

to dry wounds

  • Old and worn out wounds are also cured by applying Satyanashi's milk on the wound.
  • Applying satyanashi juice on the wound cures the wound.
  • Leprosy and boils are cured by applying the milk of Satyanashi.
  • Grinding the Panchang of Satyanashi and applying it on old wounds and itching is beneficial.
  • Applying satanashi Panchang juice or yellow milk on diseases like blisters, boils, pimple, itching, burning etc. is beneficial.

pain relief

Taking 10 drops of satyanashi oil mixed with 1 gram dry ginger ends the pain of all parts of the body.

Side Effects of Satyanashi

It is very important to take precautions while using Satyanashi.

  • The seeds of Satyanashi should be used only on the external parts of the body as they are highly toxic.
  • Its seeds are mixed with mustard oil, the use of which can lead to death.
So take special care while using Satyanashi.

सत्यानाशी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

Sunday.. इतवार ..रविवार

इतवार (Sunday)

Os ki Boond
"यदि मंज़िल न मिले तो रास्ते बदलो !
क्योंकि वृक्ष अपनी पत्तियाँ बदलते हैं जड़े नहीं...❤"

दीन 


सह जाते हो
उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न
हृदय तुम्हारा दुबला होता नग्न
अन्तिम आशा के कानों में
स्पन्दित हम – सबके प्राणों में

अपने उर की तप्त व्यथाएँ
क्षीण कण्ठ की करुण कथाएँ
कह जाते हो
और जगत की ओर ताककर
दुःख हृदय का क्षोभ त्यागकर
सह जाते हो

कह जाते हो
यहाँ कभी मत आना
उत्पीड़न का राज्य दुःख ही दुःख
यहाँ है सदा उठाना

क्रूर यहाँ पर कहलाता है शूर
और हृदय का शूर सदा ही दुर्बल क्रूर
स्वार्थ सदा ही रहता परार्थ से दूर
यहाँ परार्थ वही, जो रहे
स्वार्थ से हो भरपूर
जगतकी निद्रा, है जागरण
और जागरण जगत का – इस संसृति का

अन्त – विराम – मरण
अविराम घात – आघात
आह – उत्पात
यही जगजीवन के दिन-रात
यही मेरा, इनका, उनका, सबका स्पन्दन
हास्य से मिला हुआ क्रन्दन

यही मेरा, इनका, उनका, सबका जीवन
दिवस का किरणोज्ज्वल उत्थान
रात्रि की सुप्ति, पतन
दिवस की कर्म – कुटिल तम – भ्रान्ति
रात्रि का मोह, स्वप्न भी भ्रान्ति
सदा अशान्ति

– सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' 
Sunday.. इतवार ..रविवार
"इतवार में भी कुछ यूँ हो गयी है मिलावट,
छुट्टी तो दिखती है,
पर सुकून नजर नहीं आता...❤"

कुसंग का फल : पंचतंत्र / Kusang ka Fal : Panchtantra

कुसंग का फल

न ह्यविज्ञातशीलस्य प्रदातव्यः प्रतिश्रयः 

 अज्ञात या विरोधी प्रवृत्ति के व्यक्ति को आश्रय नहीं देना चाहिए।

कुसंग का फल : पंचतंत्र / Kusang ka Fal : Panchtantra

एक राजा के शयनगृह में शय्या पर बिछी सफेद चादरों के बीच एक मंदविसर्पिणी सफेद जूं रहती थी। एक दिन इधर-उधर घूमता हुआ एक खटमल वहां आ गया। उस खटमल का नाम था अग्निमुख। 

अग्निमुख को देखकर दु:खी जूं ने कहा - हे अग्निमुख! तू यहां अनुचित स्थान पर आ गया है। इससे पूर्व कि कोई आकर तुझे देखे, यहां से भाग जा। 

खटमल बोला - भगवती! घर आए हुए दुष्ट व्यक्ति का भी इतना अनादर नहीं किया जाता, जितना तू मेरा कर रही है। उससे भी कुशल क्षेम पूछा जाता है। घर बना कर बैठने वालों का यही धर्म है। मैंने आज तक अनेक प्रकार का कटु -तिक्त, कषाय- अम्ल रस का खून पिया है। केवल मीठा खून नहीं पिया। आज इस राजा के मीठे खून का स्वाद लेना चाहता हूं। तू तो रोज ही मीठा खून पीती है। एक दिन मुझे भी इसका स्वाद लेने दे। 

जूँ बोली - अग्निमुख! मैं राजा के सो जाने के बाद उसका खून पीती हूं। तू बड़ा चंचल है, कहीं मुझसे पहले ही तूने खून पीना शुरू कर दिया तो दोनों ही मारे जाएंगे। हां, मेरे पीछे रक्तदान करने की प्रतिज्ञा करे, तो एक रात भले ही ठहर जा। 

खटमल बोला - भगवती! मुझे स्वीकार है। मैं तब तक रक्त नहीं पियूंगा, जब तक तुम नहीं पी लेती। वचन भंग करूं तो मुझे देवगुरु का शाप लगे। 

इतने में राजा ने चादर ओढ़ ली। दीपक बुझा दिया। खटमल बड़ा चंचल था। उसकी जीभ से पानी निकल रहा था। मीठे खून के लालच से उसने जूँ के रक्तदान से पहले ही राजा को काट लिया। जिसका जो स्वभाव हो, वह उपदेशों से नहीं छूटता। अग्नि अपनी जलन और पानी अपनी शीतलता के स्वभाव को कहां छोड़ सकता है? मर्त्य जीव भी अपने स्वभाव के विरुद्ध नहीं जा सकते। 

कुसंग का फल : पंचतंत्र / Kusang ka Fal : Panchtantra

अग्निमुख के पैने दातों राजा को तड़पा कर उठा दिया। पलंग से नीचे कूदकर राजा ने संतरी से कहा - देखो, इस शय्या में खटमल या जूँ  अवश्य हैं। इन्हीं में से किसी ने मुझे काटा है। संतरियों ने दीपक जलाकर चादर की तहें देखनी शुरू कर दी। इस बीच खटमल जल्दी से भागकर पलंग के पायों के जोड़ों में जा छिपा। मंदविसर्पिणी जूँ चादर की तह में ही छिपी थी। संतरियों ने उसे देखकर पकड़ लिया और मसल डाला। 

दमनक शेर से बोला - इसीलिए मैं कहता हूं कि संजीवक को मार दें। अन्यथा वह आपको मार देगा, अथवा उसकी संगति से आप जब स्वभाव - विरुद्ध काम करेंगे, अपनों को छोड़कर परायों को अपनाएंगे, तो आप पर वही आपत्ति आ जाएगी जो चण्डरव पर आई थी। 

पिंगलक ने पूछा - कैसे? 
दमनक ने कहा - सुनो :            

रंगा सियार

To be continued ...

गोखरू / Gokhru

गोखरू (Gokhru)

गोखरू (Gokhru) को गोक्षुर (Gokshura) नाम से भी जाना जाता है। गोखरू एक ऐसी जड़ी बूटी है, जो हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ तीनों को नियंत्रित करने में सहायता करती है। गोखरू का प्रयोग सदियों से आयुर्वेदिक जड़ी बूटी के रूप में किया जाता है। गोखरू का फल, पत्ता और तना आयुर्वेद में औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। 

गोखरू के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

गोखरू क्या है?

गोखरू वर्षा ऋतु में जमीन पर फैलकर बढ़ने वाला शाखा प्रशाखा युक्त पौधा होता है। इसके तने 1.5 मीटर लंबे और जमीन पर फैले हुए होते हैं। पत्ते चने के पत्तों के समान, परंतु आकार में कुछ बड़े होते हैं। इसके फूल पीले, छोटे, चक्राकार, कांटों से युक्त तथा चमकीले होते हैं। इसके फल छोटे, गोल, चपटे, पांच कोण वाले, 2-6 कंटक युक्त व अनेक बिजी होते हैं। इसकी जड़ मुलायम, रेशेदार, 10 से 15 सेंटीमीटर लंबी, हलके भूरे रंग के एवं थोड़े सुगंधित होते हैं। गोखरू अगस्त से दिसंबर महीने में फलते फूलते हैं।

जानते हैं गोखरू के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

गोखरू के बहुत सारे गुण हैं। इन्हीं गुणों के कारण ही यह अनेक रोगों में औषधि के रूप में उपयोग में लाया जाता है। यह वात, पित्त, सूजन, दर्द को कम करने में सहायता करने के साथ-साथ रक्तपित्त से राहत दिलाता है। गोखरू कफ को दूर करने वाला, मूत्राशय संबंधी रोगों में भी लाभकारी, शक्तिवर्धक और स्वादिष्ट होता है। 

गोखरू के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

सिर दर्द में

10 से 20 मिलीलीटर गोखरू के काढ़े को सुबह-शाम पिलाने से पित्त बढ़ने के कारण होने वाले सिर दर्द में आराम मिलता है।

दमा रोग में 

  • 2 ग्राम गोखरू फल के चूर्ण को 2 से 3 नग सूखे अंजीर के साथ दिन में 3 बार कुछ दिनों तक लगातार सेवन करने से दमा में लाभ होता है। 
  • गोखरू तथा अश्वगंधा को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना कर, दो चम्मच मधु के साथ दिन में 2 बार 250 मिली लीटर दूध के साथ सेवन करने से सांस संबंधी समस्या एवं कमजोरी में लाभ होता है।

मजबूत पाचनशक्ति के लिए

गोखरू के 30 से 40 मिलीलीटर काढ़े में 5 ग्राम पीपल के चूर्ण को मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पीने से पाचन शक्ति बढ़ती है।

दस्त रोकने में 

अगर मसालेदार खाना खाने के बाद दस्त हो रहा है, तो गोखरू के 500 मिलीग्राम चूर्ण को मट्ठे के साथ दिन में 2 बार खिलाने से अतिसार और आम अतिसार में लाभ होता है।

गर्भाशय के दर्द में 

अगर किसी कारण गर्भाशय में दर्द हो रहा है, तो गोखरू के 5 ग्राम फल, 5 ग्राम काली किशमिश और 2 ग्राम मुलेठी को मिलाकर पीसकर सुबह-शाम सेवन करने से राहत मिलता है।

जोड़ों के दर्द में

बढ़ती उम्र के साथ यदि जोड़ों में दर्द की परेशानी है, तो गोखरू फल में समान भाग सोंठ मिलाकर काढ़ा बनाकर सुबह एवं रात में सेवन करने से कमर दर्द एवं जोड़ों के दर्द से आराम मिलता है।

त्वचा के रोग

गोखरू फल को पानी में पीसकर त्वचा पर लेप करने से खुजली, दाद आदि त्वचा संबंधी रोगों में लाभ होता है।

बुखार होने पर 

अगर मौसम के बदलने के साथ-साथ बार-बार बुखार आता है, तो गोखरू का सेवन बहुत फायदेमंद होता है। 15 ग्राम गोखरू पंचांग को 250 मिलीलीटर जल में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को रोगी को चार बार पिलाने से ज्वर के लक्षणों में राहत मिलती है। 

रक्तपित्त (कान- नाक से खून बहना) की समस्या

यदि कोई व्यक्ति रक्तपित्त के समस्या से पीड़ित है, तो गोखरू के 10 ग्राम को 250 मिली लीटर दूध में उबालकर पिलाने से रक्त पित्त में लाभ होता है।

गोखरू के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

गोखरू के नुकसान (Side Effects of Gokhru)

  • गर्भावस्था एवं शिशु को स्तनपान कराने के दौरान इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • मधुमेह और उच्च रक्तचाप की समस्या होने पर किसी भी आयुर्वेद आयुर्वेदाचार्य के देखरेख में ही इसका सेवन करें।
  • इसका अधिक मात्रा में सेवन करने से पीलिया एवं गुर्दों के विकार हो सकते हैं थोड़ी सी मात्रा में ही करनी चाहिए।
  • अधिक मात्रा में सेवन से पाचन शक्ति वाली धरा पर भी दुष्प्रभाव पड़ सकता है।
  • मासिक धर्म चक्र पर भी प्रभाव डाल सकता है।
  • इसीलिए गोखरू का उपयोग सावधानी से और डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए।

अन्य भाषाओं में गोखरू के नाम (Gokhru in Other Languages)

Sanskrit –गोक्षुरक, त्रिकण्ट, स्वादुकण्टक, गोकण्टक, गोक्षुरक,वन शृङ्गाट, पलङकषा,  श्वदंष्ट्रा, इक्षुगन्धिका, चणद्रुम;
Hindi –गोखरू, छोटा गोखरू, हाथीचिकार;
Oriya –गाखुरा (Gokhura), गोक्षरा (Gokshra);
Urdu –गोखरू (Gokharu);
Kannada –नेग्गिलुमुल्लु (Negillumullu), नेरूंजी (Nerunji);
Gujrati –बेटागोखरू (Betagokharu), नहानगोखरू (Nahanagokharu);
Tamil –नेरिंजिल (Nerinjil), नेरींजीकाई (Nerinjeekai);
Telugu –पाल्लैरु (Palleru), चिरूपाल्लैरू (Chirupalleru), चिरूपल्लेख (Cherupallekh);
Bengali –गोखरू (Gokharu), गोखुरी (Gokhuri);
Punjabi –बखरा (Bakhra), लोटक (Lotak), भखर (Bhakhar);
Marathi –शराट्टे (Sharatte), काटे गोखरू (Kate gokharu), लहानगोखरू (Lahangokharu), सरला ज्ञरोत्ते (Sarla gyarote);
Malayalam –नेरिंजिल (Neringil)।
English –डेविल्स् थोर्न (Devil’s thorn), गोट हैड (Goat head), पंक्चर वाईन (Puncture vine), स्मॉल कैल्ट्रॉप्स (Small caltrops);
Arbi –बास्तीताज (Bastitaj), खसक (Khasak), मसक (Masak);
Persian –खारेखसक (Khare khasak)।
गोखरू के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

Gokhru

Gokhru is also known as Gokshura. Buckwheat is one such herb, which helps in controlling all the three in our body Vata, Pitta and Kapha. Buckwheat has been used for centuries as an Ayurvedic herb. Buckwheat fruit, leaves and stem are used as medicine in Ayurveda.

What is bunion?

Buckwheat is a branchy plant growing on the ground in the rainy season. Its stems are 1.5 m long and spread on the ground. Leaves are similar to gram leaves, but slightly larger in size. Its flowers are yellow, small, ringed, thorny and shiny. Its fruits are small, round, flat, five-angled, with 2-6 thorns and many busy. Its root is soft, fibrous, 10 to 15 cm long, light brown in color and slightly fragrant. Buckwheat flowers in the months of August to December.

गोखरू के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

Know about the advantages, disadvantages, uses and medicinal properties of Gokhru

Buckwheat has many properties. Due to these properties, it is used as a medicine in many diseases. It helps in reducing Vata, Pitta, inflammation, pain as well as relieves blood Pitta. Buckwheat removes phlegm, is also beneficial in urinary diseases, is powerful and tasty.

in headache

Taking 10 to 20 ml decoction of bunion in the morning and evening provides relief in headache due to increase in bile.

in asthma

  • Taking 2 grams powder of Gokhru fruit with 2 to 3 pieces of dried figs thrice a day for a few days provides relief in asthma.
  • Make a powder by taking equal quantity of Gokhru and Ashwagandha and take two spoons of honey with 250 ml of milk twice a day, it provides relief in respiratory problems and weakness.

for strong digestion

Mixing 5 grams powder of peepal in 30-40 ml decoction of buckwheat and drinking it little by little increases the digestive power.

to stop diarrhea

If diarrhea is occurring after eating spicy food, then taking 500 mg powder of buckwheat with whey twice a day provides relief in diarrhea and general diarrhoea.

in uterine pain

If there is pain in the uterus due to any reason, then grinding together 5 grams fruit of bun, 5 grams black raisins and 2 grams liquorice and taking it twice a day provides relief.

गोखरू के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

in joint pain

If there is a problem of pain in the joints with increasing age, then making a decoction by mixing equal parts dry ginger in buckwheat fruit and consuming it in the morning and night provides relief from back pain and joint pain.

skin diseases

Grinding the fruit of bunion in water and applying it on the skin is beneficial in skin diseases like itching, ringworm etc.

having a fever

If the fever comes again and again along with the change of season, then the consumption of bunion is very beneficial. Make a decoction by boiling 15 grams of Gokhru Panchang in 250 ml water. Feeding this decoction four times to the patient provides relief in the symptoms of fever.

Bleeding problem

If a person is suffering from the problem of blood bile, then boiling 10 grams of bunion in 250 ml of milk and giving it, it is beneficial in blood bile.

गोखरू के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण