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अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)

अहिल्याबाई होलकर 


अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
(31 मई 1725 - 13 अगस्त 1795), 
मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध महारानी 
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar) मराठा साम्राज्य की महारानी प्रसिद्ध सूबेदार मल्हार राव होलकर के पुत्र खांडेराव होलकर की धर्मपत्नी थी। इनका जन्म 31 मई 1725 में ग्राम चौड़ी जामखेड़ अहमदनगर महाराष्ट्र में हुआ था। इन्होंने महेश्वर को अपनी राजधानी बना कर शासन किया। इनकी मृत्यु 13 अगस्त 1795 में 70 वर्ष की आयु में हुई थी।
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)

शासन अवधि

अहिल्याबाई होलकर जी ने सन 1767 से 1795 तक 28 वर्षों से अधिक एक छत्र शासन किया। अहिल्याबाई होलकर जी ने सनातन धर्म संस्कृति को बढ़ाते हुए अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भी सारे भारत में अलग अलग जगह कई तीर्थ स्थलों पर मंदिर बनवाये, काशी विश्वनाथ मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की। मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति की, जिससे सारे जगत में सनातन धर्म का प्रचार प्रसार व्याकप रूप से बना रहे एवम सभी की धर्म के प्रति आस्था गहरी होती रहे। इसी क्रम में जनमानस की सेवा का भाव लिए जनमानस जनता के लिए घाट कुआँ बावड़ियों का निर्माण करवाया। जगह जगह पर व्यापक रूप से भूखों के लिए अन्यक्षेत्र खोले, जिससे गरीब निर्धनों को भूखे पेट सोने की आवश्यकता न पड़े। ऐसी थी महारानी अहिल्याबाई होलकर जी। 
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)

महारानी अहिल्याबाई होलकर जी के जीवन का छोटा सा परिचय 

महारानी अहिल्याबाई होलकर जी का जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ था, जो महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में है। महारानी जी का विवाह लगभग 10 वर्ष की आयु में खांडेराव जी से हुआ था, जो कि बहुत ही चंचल एवम उग्र स्वभाव के थे। महारानी अहिल्याबाई होलकर जी सिर्फ 29 वर्ष की थी, जब उनके पति का लोकगमन हुआ। उसके पश्चात बयालीस-तैंतालीस वर्ष की आयु में पुत्र मालेराव का देहान्त हो गया। जब अहिल्याबाई की आयु बासठ वर्ष के लगभग थी, दौहित्र नत्थू चल बसा। चार वर्ष पीछे दामाद यशवन्तराव फणसे न रहे और इनकी पुत्री मुक्ताबाई सती हो गई।
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
दूर के सम्बन्धी तुकोजीराव के पुत्र मल्हारराव पर उनका स्नेह था। महारानी सोचती थीं कि आगे चलकर यही शासन, व्यवस्था , न्याय की डोर सँभालेगा पर वह अन्त-अन्त तक उन्हें दुःख देता रहा। महारानी अहिल्याबाई होलकर आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती थी। महारानी सदैव उसी परंपरा का निर्वहन करती रही, जिसमें उनके समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री थे और उनके पीछे झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हुई। महारानी होलकर जी को अपने जीवनकाल में ही भारत भर की जनता इनके कार्यों, इनकी शासन व्यवस्था से इतनी प्रभावित थी कि इन्हें ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी। 

अहिल्याबाई होलकर जी का देश मे विशेष स्थान

अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
भारत में महारानी अहिल्‍याबाई होल्‍कर जी का नाम बहुत ही सम्‍मान के साथ लिया जाता है। महारानी जी के  बारे में अलग अलग राज्‍यों की पाठ्य पुस्‍तकों में अध्‍याय मौजूद हैं। चुकी महारानी अहिल्याबाई होलकर जी एक ऐसी महारानी थी, जो सदैव मानव सेवा, धर्म, सनातन संस्कृति परंपरा का निर्वहन करती थी। इसलिये भारत सरकार तथा विभिन्‍न राज्‍यों की सरकारों ने उनकी प्रतिमाएँ बनवायी हैं और उनके नाम से कई कल्‍याणकारी योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इसी तरह एक योजना उत्तराखंड सरकार की ओर से भी चलाई जा रही है, जो अहिल्‍याबाई होल्‍कर को पूर्णं सम्‍मान देती है। इस योजना का नाम अहिल्‍याबाई होल्‍कर भेड़ बकरी विकास योजना है।
अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar)
अहिल्‍याबाई होल्‍कर भेड़ बकरी पालन योजना के तहत उत्तराखणवड के बेरोजगार, बीपीएल राशनकार्ड धारकों, महिलाओं व आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को बकरी पालन यूनिट के निर्माण के लिये भारी अनुदान राशि प्रदान की जाती है। लगभग 1,00,000 रूपये की इस युनिट के निर्मांण के लिये सरकार की ओर से 91,770 रूपये सरकारी सहायता रूप में अहिल्‍याबाई होलकर के लाभार्थी को प्राप्‍त होते हैं।

श्रोत - विकिपीडिआ 

गंगा दशहरा || Ganga Dussehra ||

गंगा दशहरा (Ganga Dussehra)

गंगा दशहरा कर्म, वाणी और विचारों से संबंधित दस पापों को शुद्ध करने के लिए पवित्र गंगा की क्षमता का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि जब भक्त इस दिन देवी गंगा की पूजा करते हैं, तो उन्हें अपने वर्तमान और पिछले पापों से मुक्ति के साथ-साथ मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। यह निवेश करने, नई गृह संपत्ति, वाहन आदि खरीदने और नए घर में प्रवेश करने के लिए एक शुभ दिन माना जाता है। 

गंगा दशहरा || Ganga Dussehra ||

हिंदू धर्म में गंगा दशहरा का खास महत्व है। इस दिन मां गंगा की पूजा अर्चना बड़े धूमधाम से की जाती है। गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुई थी।

गंगा दशहरा || Ganga Dussehra ||

सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी के कमंडल से राजा भागीरथ द्वारा देवी गंगा को धरती पर अवतार दिवस को गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी पर अवतार से पहले गंगा नदी स्वर्ग का हिस्सा थीं। गंगा दशहरा के दिन भक्त देवी गंगा की पूजा करते हैं और गंगा जी में डुबकी लगाते हैं और दान-पुण्य, उपवास, भजन और गंगा आरती का आयोजन करते हैं। मान्यता है इस दिन मां गंगा की पूजा करने से भगवान विष्णु की अनंत कृपा प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म में तो गंगा को देवी मां का दर्जा दिया गया है। यह माना जाता है कि जब मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई तो, वह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी, तभी से इस तिथि को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है।
गंगा दशहरा || Ganga Dussehra ||

गंगाजल बहुत ही पवित्र और पूजनीय माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य और पूजा अनुष्ठान में गंगाजल का प्रयोग जरूर किया जाता है। गंगा भवतारिणी हैं, इसलिए हिंदू धर्म में गंगा दशहरा का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए इस दिन गंगा घाट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। इस दिन गंगा के घाट पर भव्य गंगा आरती भी होती है। 

इस बार आज ही के दिन साल का आखिरी बड़ा मंगल भी है। ऐसे में साधक पर मां गंगा और हनुमान जी की असीम कृपा होगी। 

गंगा दशहरा || Ganga Dussehra ||

ब्लॉग के सभी पाठकों को गंगा दशहरा और बड़े मंगल की हार्दिक शुभकामनाएं। 

गर्मियों में गुलकंद खाने के फायदे | Gulkand Benefits In Summer|

गुलकंद (Gulkand)

 स्वादिष्ट, ठंडा और पाचक गुलाब जाम

स्वाभाविक रूप से ठंडा, गुलकंद गर्मी की गर्मी को मात देने के लिए सबसे अच्छा है। एक उत्कृष्ट पित्त दोष शांत करनेवाला, गुलकंद सभी गर्मी और अतिरिक्त पित्त से उत्पन्न होने वाली अन्य बीमारियों के लिए उपयोग में लाई जाती है। गर्मी के मौसम में गर्म हवाओं और तपती धूप से राहत पाने के लिए हम लोग कई चीजों का सेवन करते हैं। वहीं कुछ चीजें गर्मी से बचाव के साथ-साथ शरीर को भी ठंडा रखने में मदद करती हैं। गुलकंद भी इन्हीं में से एक है। गर्मी में गुलकंद का सेवन शरीर को ठंडा रखकर गर्मी के कहर से बचाने में काफी मददगार होता है। मजे की बात तो यह है कि गुलकंद गुलाब की पत्तियों से बनता है, जो खाने में तो टेस्टी होता ही है, साथ ही इसका सेवन बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी कर सकते हैं। 

गर्मियों में गुलकंद खाने के फायदे | Gulkand Benefits In Summer|

गुलकंद एसिडिटी, सीने में जलन और तनाव से होने वाली गर्मी में फायदेमंद होता है। हथेलियों और तलवों में जलन, आंखों में जलन और लाली से राहत देता है।

गुलकंद एक तरह से पाचक टॉनिक है, इसके नियमित सेवन से अल्सर, कब्ज और पेट की गर्मी से बचाव होता है। नियमित सेवन से पित्त की अधिकता के कारण होने वाले सिर दर्द और मतली में लाभ होता है।

गुलकंद एंटी-ऑक्सीडेंट और रक्त शोधक होता है, जो झुर्रियों को कम करने में मदद करता है और गर्मियों में त्वचा पर चकत्ते और घमौरियों से राहत देता है। 

गुलकंद को अकेले ही या फिर गुलाब के मिल्कशेक के रूप में सेवन कर सकते हैं। इसे खीर या घर के बने डेसर्ट, आइसक्रीम में या फिर एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच मिलाकर अपने लिए एक ठंडा पेय बनाकर सेवन  सकते हैं।

गर्मियों में गुलकंद खाने के फायदे | Gulkand Benefits In Summer|

प्रमुख लाभ:

  • समग्र शरीर की गर्मी को कम करता है और पित्त दोष को शांत करता है। 
  • आंखों, हथेलियों और तलवों की जलन से भी राहत देता है। 
  • पित्त की अधिकता के कारण होने वाली मतली और सिर दर्द में लाभकारी। 
  • पाचन टॉनिक, भूख में सुधार करता है और आँतों की अच्छे से सफाई करता है। 
  • एसिडिटी, सीने,पेट की जलन को कम करता है। 
  • स्वाभाविक रूप से ठंडा, अतिरिक्त तनाव, थकान और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के उपयोग के कारण गर्मी से राहत में मदद करता है। 
  • गुलकंद एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट, कायाकल्प है। 

रोजमर्रा की परेशानियों को कहें गुडबॉय

गुलकंद का सेवन करने से गर्मी में रोजमर्रा की परेशानियों से भी छुटकारा पाया जा सकता है। इससे आपको थकान, कमजोरी, शरीर में दर्द और तनाव से भी राहत मिलती है। 

प्रयोग कैसे करें 

  • दूध से बने पेय जैसे फलूदा, ठंडाई में। 
  • लस्सी, गुलाब दूध के लिए या प्राकृतिक स्वीटनर के रूप में इसका आनंद लें। अपने डेजर्ट जैसे खीर, बर्फी, आइसक्रीम में कूलिंग फ्लेवर डालें।
  • एक गिलास मटका के ठंडे पानी में इस गुलकंद को, एक चुटकी इलायची पाउडर के साथ मिलाकर गर्मियों में अपना ठंडा पेय बनाएं।

गुलकंद के नुकसान (Side Effects of Gulkand) 

गुलकंद को बनाने में किसी प्रकार के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसलिए, इसके नुकसान न के बराबर हैं। हां, गुलकंद को तैयार करने में शुगर का इस्तेमाल किया जाता है।

गुलकंद बनाने की विधि :

सबसे पहले गुलाब की पंखुड़ियों को एक कपड़े पर फैला कर अच्छी तरह धो लें।
पानी सूख जाने पर पंखुड़ियों को चौडें आकार वाले बर्तन में रखें।
अब इस बर्तन में रखी गई गुलाब की पंखुड़ियों पर मिश्री डालकर हाथों से अच्छी तरह मिला दें।
अब इसमें ऊपर से पीसी हुई इलायची और पीसी हुई सौंफ मिलाकर कांच के एक बर्तन में बंद कर दें।
इसे आठ से दस दिनों तक धूप में रखें और बीच-बीच में इसे हिलाते रहें।
मिश्री से रस निकल जाने के बाद, गुलाब की पंखुड़ियां इसमें पिघल जाएंगी और गुलकंद तैयार हो जायेगा। 

English Translate

Gulkand

 Tasty, cooling and digestive rose jam

Cooling in nature, Gulkand is best to beat the summer heat. An excellent Pitta dosha pacifier, Gulkand is used for all heat and other ailments arising from excess Pitta. In the summer season, we consume many things to get relief from the hot winds and scorching sun. At the same time, some things help in keeping the body cool along with preventing the heat. Gulkand is also one of these. Consumption of Gulkand in summer is very helpful in keeping the body cool and protecting it from the havoc of the heat. The interesting thing is that Gulkand is made from rose leaves, which is not only tasty to eat, but it can be consumed by everyone from children to elders.
गर्मियों में गुलकंद खाने के फायदे | Gulkand Benefits In Summer|
Gulkand is beneficial in acidity, heartburn and heat caused by stress. Relieves burning sensation in palms and soles, burning sensation and redness in eyes.

Gulkand is a kind of digestive tonic, its regular intake prevents ulcers, constipation and stomach heat. Regular consumption provides relief in headache and nausea caused by excess pitta.

Gulkand is an anti-oxidant and blood purifier, which helps in reducing wrinkles and gives relief from skin rashes and heat rash in summer.

Gulkand can be consumed alone or in the form of rose milkshake. You can consume it in kheer or homemade desserts, ice cream or make a cool drink for yourself by adding a tablespoon to a glass of water.

key benefits:

  • Reduces overall body heat and pacifies pitta dosha.
  • Also provides relief from burning sensation of eyes, palms and soles.
  • Beneficial in nausea and headache caused by excess pitta.
  • Digestive tonic, improves appetite and cleanses the bowels well.
  • Reduces acidity, chest, stomach irritation.
  • Naturally cooling, helps in relieving heat caused by excess stress, fatigue and use of electronic gadgets.
  • Gulkand is a powerful antioxidant, rejuvenator.
गर्मियों में गुलकंद खाने के फायदे | Gulkand Benefits In Summer|

Say goodbye to everyday troubles

Consuming Gulkand can also get rid of everyday problems in summer. It also gives you relief from fatigue, weakness, body pain and stress.

how to use

  • Milk drinks like Falooda, Thandai.
  • Enjoy it for lassi, rose milk or as a natural sweetener. Add cooling flavor to your desserts like kheer, barfi, ice cream.
  • Mix this gulkand with a pinch of cardamom powder in a glass of cold matcha water to make your cool summer drink.

ओ गगन के जगमगाते दीप

ओ गगन के जगमगाते दीप

ओ गगन के जगमगाते दीप

"ख़ुशी किसी भी बाहरी स्थितियों पर निर्भर नही करती !
      यह हमारे मानसिक द्रष्टिकोण पर निर्भर करती है ..!!"

ओ गगन के जगमगाते दीप!

दीन जीवन के दुलारे

खो गये जो स्वप्न सारे,

ला सकोगे क्या उन्हें फिर खोज हृदय समीप?

ओ गगन के जगमगाते दीप!


यदि न मेरे स्वप्न पाते,

क्यों नहीं तुम खोज लाते

वह घड़ी चिर शान्ति दे जो पहुँच प्राण समीप?

ओ गगन के जगमगाते दीप!


यदि न वह भी मिल रही है,

है कठिन पाना-सही है,

नींद को ही क्यों न लाते खींच पलक समीप?

ओ गगन के जगमगाते दीप!

- हरिवंशराय बच्चन

Good Morning

"खुश रहने के बस तीन ही रास्ते हैं !
       शुक्र्राना, मुस्कुराना और किसी का दिल न दुखाना ..!!"

ईमानदारी का पथ क़भी न छोड़ना

ईमानदारी का पथ क़भी न छोड़ना

ईमानदारी से बड़ी कोई पूंजी नहीं होती है, यह देवगुण है तथा जिस व्यक्ति के चरित्र में ईमान का गुण होता है वह न केवल सुख के साथ जीवन बिताता है, बल्कि लोग भी उसका सम्मान और अनुसरण करते हैं। आज की दुनियां में ईमानदारी की राह पर चलकर सारे साधन पाए जा सकते हैं, मगर इन साधनों से ईमानदारी को पाना असम्भव है। हमें भीड़ में विशेष बन कर अपनी ऑनेस्टी को अपनी पहचान बनानी चाहिए। आज का प्रसंग इसी पर है यानी एक सच्चा ईमानदार धर्मनिष्ठ व्यक्ति। 

ईमानदारी का पथ क़भी न छोड़ना

नरोत्तम सेठ ने आज कहीं व्यस्त होने के कारण ईंट भट्टे पर फिर अपने बेटे को ही भेजा था। बेटे का मन क़भी भी भट्टा पर नहीं लगता, जिसके कारण वह अक्सर ग्राहकों से उलझ जाता था, जबकि नरोत्तम सेठ चाहते थे कि अब वह अपना अधिक से अधिक समय भट्टे पर दे, जिससे वो अपने पुस्तैनी व्यवसाय में दक्ष हो सके।

अभी उनका बेटा आकर अपने केबिन में बैठा ही था कि मुनीम आ गया - "भईया जी एक बुजुर्ग फटी-पुरानी पर्ची लेकर आया है और दस हजार ईंट मांग रहा है।"

बेटे ने पूछा - "क्या मतलब?

मुनीम ने कहा - "कह रहा है कि सन उन्नीस सौ अड़सठ में पन्द्रह रुपया हजार के भाव से उसने दस हजार ईंट का दाम एक सौ पचास रुपया जमा किए थे जो आज लेने आया है।"

बेटे ने कहा - "दिमाग खराब है उसका। आज दस हजार ईंट की कीमत अस्सी हजार है, एक सौ पचास रुपये में कैसे दे देंगे, भगा दो उसको यहां से।"

मुनीम ने कहा - "पर बड़े बाबूजी के हाथ की दस्तख़त की हुई रसीद है उसके पास है।"

"तो क्या हुआ? तब क्यों नहीं ले गये थे। अब जब ईंट का मूल्य आठ हजार रुपये प्रति हजार है तब ये पन्द्रह रुपये के भाव से ले जाएंगे। "

सेठ का लड़का अभी मुंशी और बुजुर्ग को डाट ही रहा था कि नरोत्तम सेठ स्वयं आ गये। देखा, बेटा फिर आज किसी से उलझा हुआ है। कारण पूछने पर बेटे ने वह मुड़ी तुड़ी पर्ची सेठ को पकड़ा दी।

सेठ पर्ची को देखते ही चौंक गये। अब बुजुर्ग की तरफ ध्यान से देखा और पहचानते ही मुस्करा पड़े। "धनीराम कहां गायब हो गये थे भाई, पैसा जमा करके? मैने तब कितनी प्रतीक्षा की थी आपकी? खैर, अब ले जाओ, दस हजार आपकी ईंट तो मेरे पास है ।"

"पर पापा, अस्सी हजार की ईंट एक सौ पचास रुपये में कैसे संभव है ?" बेटे ने कहा।

सेठ ने कहा - "बेटा जब इन्होंने पैसा जमा किया था तब वही भाव था। सन अड़सठ से इनका भी एक सौ पचास रुपया इस ईंट भट्ठा में लगा हुआ है और उससे पैसा कमाया है, जिसके कारण हम अपने इस व्यवसाय को इतना बढ़ा सके। उस एक सौ पचास रुपये की पूंजी का लाभ लगातार सन अडसठ से हम खा भी तो रहे हैं।

ये मेरे हाथ की रसीद हैं। मुझे याद है तब मैंने अपने पिताजी के साथ इस भट्ठा पर आना शुरू किया था। यह मेरी ही उम्र के हैं शायद। जब मैंने यह रसीद काट कर इन्हें दी थी तो इन्होंने हंसकर कहा था - 'अगर रसीद गायब हो गयी तो क्या होगा? तब मेरे पिताजी ने जो जवाब दिया था वह मुझे आज भी याद है।"

पिताजी ने कहा था कि अगर मेरे जीवन काल में आ गये तो रसीद न भी लाओगे तब भी आपका पैसा मुझ पर रहेगा। ईंट आपको मिलेगी क्योंकि मुझे आपका चेहरा याद है, लेकिन जहां तक रसीद की बात है तो अगर आप इसे रखे रह गये तो मेरे न रहने के बाद भी आपको ईंटें मिलेंगी क्योंकि बेईमानी न मुझमें है और न ही मेरे संस्कार व खून में ।"

इतना कहकर सेठ ने दस हजार ईंट बुजुर्ग के यहाँ पहुंचाने के लिए मुंशी को आदेशित कर दिया औऱ अपने बेटे के कंधे पर अपना हाथ रखकर बोला - "बेटा, तुम्हारे साथ परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल हों लेकिन ईमानदारी का पथ क़भी न छोड़ना। व्यापार ईमानदारी और पक्की जुबान से फलता फूलता है। छल से कमाई लक्ष्मी ज्यादा दिन नहीं ठहरती।"

English Translate

never leave the path of honesty

There is no capital greater than honesty, it is a divine quality and the person who has the quality of honesty in his character not only lives happily, but people also respect and follow him. In today's world all means can be found by following the path of honesty, but it is impossible to get honesty through these means. We should make our honesty our identity by being special in the crowd. Today's context is on this i.e. a true honest devout man .

never leave the path of honesty

Narottam Seth had again sent his son to the brick kiln due to being busy today. The son's mind was never on the kiln, due to which he often got confused with the customers, whereas Narottam Seth wanted him to devote more and more time to the kiln so that he could be proficient in his bookkeeping business.


Just now his son came and was sitting in his cabin when the accountant came - "Brother, an old man has brought a torn slip and is asking for ten thousand bricks."


The son asked - "What do you mean?


The accountant said - "He is saying that in the year 1968, at the rate of fifteen thousand rupees, he had deposited one hundred and fifty rupees for ten thousand bricks, which he has come to collect today."


The son said - "He has a bad mind. Today the price of ten thousand bricks is eighty thousand, how will he give it for one hundred and fifty rupees, drive him away from here."


The accountant said - "But he has the receipt signed by Bade Babuji."


"So what happened? Why were you not taken then. Now when the price of a brick is eight thousand rupees per thousand, then it will be taken at the rate of fifteen rupees."


Seth's son was still scolding the scribe and the old man when Narottam Seth himself came. See, son is again entangled with someone today. On asking the reason, the son handed over the twisted slip to Seth.


Seth was shocked to see the slip. Now looked at the old man carefully and smiled upon recognition. "Where did Dhaniram disappear brother, after depositing the money? How long did I wait for you then? Well, now take it, I have ten thousand of your bricks."


"But father, how is a brick worth eighty thousand possible for one hundred and fifty rupees?" The son said.


Seth said - "Son, when he had deposited the money, then it was the same price. Since the year 68, his one hundred and fifty rupees is also engaged in this brick kiln and has earned money from it, due to which we could increase this business of ours so much. We have been reaping the benefits of that one hundred and fifty rupees capital continuously since the year sixty eight.


These are the receipts in my hand. I remember then I started coming to this kiln with my father. He is probably of my age. When I cut this receipt and gave it to him, he laughed and said - 'What will happen if the receipt disappears? I still remember the answer my father gave then.


Father had said that if you come in my lifetime, even if you do not bring the receipt, your money will be on me. You will get the brick because I remember your face, but as far as the receipt is concerned, if you keep it, you will get the bricks even after I am gone, because dishonesty is neither in me nor in my values and blood.


Saying this, Seth ordered the scribe to deliver ten thousand bricks to the old man and put his hand on his son's shoulder and said - "Son, no matter how adverse the circumstances are with you, never leave the path of honesty. Business thrives on honesty and a firm tongue. Lakshmi earned by deceit does not last long."

ओडिशा, कर्नाटक और तेलंगाना का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa, Karnataka and Telangana ||

ओडिशा, कर्नाटक और तेलंगाना का राजकीय/राज्य पक्षी

 नीलकंठ (Coracias benghalensis) (Neelkanth)

सुंदर "नीलकंठ (Neelkanth)" पक्षी ओडिशा का राज्य पक्षी है। उड़ीसा राज्य के साथ ही यह कर्नाटक और तेलंगाना का भी राज्य पक्षी है। दिखने में यह बहुत ही सुंदर पक्षी है, जिसके मुख्य पंख नीले रंग के होते हैं। "नीलकंठ (Neelkanth)" पक्षी में नर और मादा लगभग एक से ही दिखते हैं। 

ओडिशा, कर्नाटक और तेलंगाना का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa,  Karnataka and Telangana ||

साधारणतया नीलकंठ खेती वाले जगह, पतले जंगल और घास के मैदान में पाए जाते हैं। इसको "भारतीय रोलर (Indian roller)" भी कहा जाता है। नीलकंठ पक्षी मुख्य रूप से  हिमालय के पास स्थित छोटी पहाड़ियों के नीचे स्थित जंगलों में पाया जाता है। यह दक्षिण भारत और पश्चिम भारत के जंगलों में भी मिलता है, भारतीय उपमहाद्वीप में यह पाकिस्तान वर्मा दक्षिण पूर्व एशिया तिब्बत, चीन और अरब प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों में भी पाया जाता है। यह पक्षी पेड़ों की नंगी शाखाओं पर बैठे या आराम करते हुए आसानी से दिख जाते हैं। कभी-कभी इन पक्षियों को शहरी क्षेत्रों में तारों पर भी देखा जाता है।

ओडिशा का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa ||

नीलकंठ पक्षी का वजन 70 ग्राम से 100 ग्राम तक का होता है। नीलकंठ सामान्यतः बीज, दाने, कीट पतंगे और छोटे सरीसृप खाता है। इसके सर और पूछ के नीचे हल्के नीले रंग का धब्बा होता है। उड़ते वक्त इसके गहरे नीले आकर्षक पंख दिखाई देते हैं। इसके सामने का हिस्सा पीला भूरे रंग का होता है। इसकी चोंच और आंखें काले रंग की होती हैं। इसका सिर बड़ा और गर्दन छोटी होती है। इसके सर, निचले पंख और पूछ नीले रंग के होते हैं। प्राथमिक पंख और पूंछ गहरे नीले रंग की होती है।

ओडिशा का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa ||

नीलकंठ अपना घोसला 3 से 9 मीटर की ऊंचाई पर बनाता है, घोंसला बनाने के लिए यह पेड़ों की टहनियों, पत्तियों जड़ों और घास का उपयोग करता है, इसकी घोसले का आकार किसी कप के जैसा होता है। "नीलकंठ (Neelkanth)" पक्षी की प्रजातियों को विलुप्त होने के खतरे का सामना नहीं करना पड़ता है। यह लुप्तप्राय प्रजाति नहीं है।

ओडिशा का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa ||

नीलकंठ पक्षी एक बार में 3 से 6 नीले, हरे और पीले रंग लिए हुए अंडे जिन पर भूरे और काले रंग के धब्बे होते हैं देता है। अंडे सेने की अवधि 16 से 21 दिन होती है। 21 दिन बाद अण्डों से बच्चे बाहर आ जाते हैं। बच्चों की देखभाल नर और मादा दोनों मिलकर करते हैं। नर नीलकंठ पक्षी मादा और बच्चों के लिए भोजन लाता है। तीन हफ्तों के बाद नीलकंठ पक्षी के बच्चे स्वयं भोजन खोज सकते हैं, हालांकि यह अपने माता पिता के साथ 2 महीने तक रहते हैं। 2 महीने के बाद यह अपना घोंसला छोड़कर उड़ जाते हैं। नीलकंठ पक्षी का जीवनकाल 18 वर्ष तक हो सकता है। 

English Translate

State Bird Of Odisa,  Karnataka and Telangana

The beautiful "Neelkanth" bird is the state bird of Odisha. Along with the state of Orissa, it is also the state bird of Karnataka and Telangana. It is a very beautiful bird in appearance, whose main feathers are of blue colour. Male and female look almost the same in "Neelkanth" bird.

ओडिशा, कर्नाटक और तेलंगाना का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa,  Karnataka and Telangana ||

Neelkanth is generally found in cultivated places, thin forests and grasslands. It is also called "Indian roller". The Neelkanth bird is mainly found in the forests located at the foot of the small hills near the Himalayas. It is also found in the forests of South India and West India, in the Indian subcontinent it is also found in parts of Pakistan, Burma, Southeast Asia, Tibet, China and the Arabian Peninsula. These birds are easily seen sitting or resting on the bare branches of trees. Sometimes these birds are also seen on wires in urban areas.

ओडिशा का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa ||

The weight of Neelkanth bird ranges from 70 grams to 100 grams. Neelkanth generally eats seeds, grains, insects, moths and small reptiles. There is a light blue spot under its head and tail. Its deep blue attractive wings are visible while flying. Its front part is yellowish brown. Its beak and eyes are black. Its head is big and neck is short. Its head, lower wings and tail are blue. The primary wings and tail are dark blue.

ओडिशा का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa ||

Neelkanth builds its nest at a height of 3 to 9 meters, it uses tree branches, leaves, roots and grass to make the nest, its nest shape is like a cup. The "Neelkanth" bird species does not face the threat of extinction. It is not an endangered species.

ओडिशा का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Odisa ||

The Neelkanth bird lays 3 to 6 blue, green and yellow colored eggs at a time with brown and black spots on them. The hatching period is 16 to 21 days. After 21 days the kids come out from the eggs. Both the male and the female take care of the young. The male Neelkanth bird brings food for the female and the children. After three weeks, the nestlings can forage for themselves, although they remain with their parents for up to 2 months. After 2 months they leave their nest and fly away. The life span of the Neelkanth bird can be up to 18 years.

भारत के सभी राज्यों के राजकीय पक्षियों की सूची |(List of State Birds of India)

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

 श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय दसवाँ  विभूतियोग ||

अथ दशमोऽध्याय:- विभूतियोग

अध्याय दस के अनुच्छेद 19 - 30

भगवान द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्ति का वर्णन

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

श्रीभगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥10.19॥

भावार्थ : 

श्री भगवान बोले- हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिए प्रधानता से कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है॥10.19॥

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥10.20॥

भावार्थ : 

हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥10.20॥

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌ ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥10.21॥

भावार्थ : 

मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ॥10.21॥

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥10.22॥

भावार्थ : 

मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ॥10.22॥

रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌ ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌ ॥10.23॥

भावार्थ : 

मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ॥10.23॥

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌ ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥10.24॥

भावार्थ : 

पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ॥10.24॥

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥10.25॥

भावार्थ : 

मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ॥10.25॥

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥10.26॥

भावार्थ : 

मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ॥10.26॥

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌ ।
एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌ ॥10.27॥

भावार्थ : 

घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान॥10.27॥

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌ ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥10.28॥

भावार्थ : 

मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ॥10.28॥

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌ ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌ ॥10.29॥

भावार्थ : 

मैं नागों में (नाग और सर्प ये दो प्रकार की सर्पों की ही जाति है।) शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ॥10.29॥

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌ ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌ ॥10.30॥

भावार्थ : मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय (क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि में जो समय है वह मैं हूँ) हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ॥10.30॥

यूमिलिप्स पर्सेफोन (umilips persephone) - दुनिया का सबसे ज्यादा पैरों वाला जीव, पाताल में रहता है 200 फिट अंदर

यूमिलिप्स पर्सेफोन (Umilips P)

दुनिया का सबसे ज्यादा पैरों वाला जीव, पाताल में रहता है 200 फिट अंदर

यूमिलिप्स पर्सेफोन (umilips persephone) - दुनिया का सबसे ज्यादा पैरों वाला जीव, पाताल में रहता है 200 फिट अंदर

कुदरत की बनाई इस दुनिया में कई अजीबोगरीब जीव मौजूद है, जिनके बारे में शायद ही हम इंसानों को पता है। आज एक ऐसे जीव की चर्चा करेंगे, जिसके पास 1306 पैर हैं और यह जमीन के अंदर बेहद गहराई में रहता है। धरती पर तमाम तरह के जीव– जन्तु पाए जाते हैं, जो हजारों सालों से धरती पर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। वहीं वैज्ञानिक लगातार खोजों में लगे रहते हैं और जीव– जन्तुओं की नई नई प्रजातियों के बारे में पता लगाते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा जीव ढूंढ निकाला है, जो दुनिया का सबसे ज्यादा पैरों वाला जीव है। यह अद्भुत जीव दुनिया का पहला ऐसा पिलिपीड्स है, जो अपने हजारों पैरों के साथ चलता हैं। सबसे पहले 40 करोड़ साल पहले मिलिपीड्स पाया गया था, लेकिन हजारों पैर वाला मिलिपीड्स नहीं देखा गया था। 

यूमिलिप्स पर्सेफोन (umilips persephone) - दुनिया का सबसे ज्यादा पैरों वाला जीव, पाताल में रहता है 200 फिट अंदर

इस जीव को ऑस्ट्रेलिया की खनिज संपदा से भरे इलाके में देखा था। जहां पर लगातार खनन का काम होता है। खनन के दौरान ही दो फीमेल और दो मेल मिलिपीड्स मिले थे, जिसमें फिमेल मिलिपीड्स में 1306 पैर और मेल मिलिपीड्स में 998 पैर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पैर को गिनना आसान नहीं था, क्योंकि यह जीव अपने आप को गोलाकर चक्करघिन्नी की तरह लपेट लेता है। वैज्ञानिकों ने इस जीव पर माइक्रोस्कोप की मदद से रिसर्च किया और इनकी तस्वीर दिखाई है

वैज्ञानिकों के अनुसार, पहले जिसे सबसे ज्यादा पैरों वाला जीव माना जाता था-  “इलाक्मे प्लेनिप्स” उसके 750 पैर गिने गए थे, लेकिन अब जो जीव मिला है उसके 1306 पैर गिने गए हैं। 1306 पैरों वाली मिलिपीड्स की प्रजाति का नाम यूमिलिप्स पर्सेफोन हैं ये सतह से 200 फीट नीचे रहते हैं। 

वैज्ञानिकों का कहना है कि इनकी उम्र 5-10 साल तक हो सकती है। यूमिलिप्स पर्सेफोन का रंग हल्का पीला होता है। हैरान करने वाली बात ये है की धागा नुमा संरचना वाले इस जीव की आंखे नहीं होती हैं। ये अपनी चौड़ाई से 100 गुना ज्यादा लम्बे होते हैं। लंबे धागे जैसे दिखने वाले इस जीव का सिर आइसक्रीम कोन की तरह है जिस पर बहुत सारे एंटीना हैं, जो इन्हें अंधेरे में चलने में मदद करते हैं। यह यह फंगस खाता है। 

English Translate

Umilips Persephone

The world's most legged creature lives 200 feet inside the underworld.

यूमिलिप्स पर्सेफोन (umilips persephone) - दुनिया का सबसे ज्यादा पैरों वाला जीव, पाताल में रहता है 200 फिट अंदर

There are many strange creatures present in this world created by nature, about which we humans hardly know. Today we will discuss about such a creature, which has 1306 legs and it lives very deep inside the ground. All kinds of creatures are found on the earth, which have been living their life on the earth for thousands of years. At the same time, scientists are constantly engaged in research and keep finding out about new species of animals. Scientists have found such an organism, which is the most legged creature in the world. This amazing creature is the world's first pilipide, which moves with its thousands of legs. Millipedes were first found 400 million years ago, but thousands of legged millipedes were not seen.

This creature was seen in an area full of mineral wealth of Australia. Where continuous mining work is done. Two female and two male millipedes were found during mining itself, in which female millipedes have 1306 legs and male millipedes have 998 legs. Scientists say that it was not easy to count its legs, because this creature wraps itself like a whirligig. Scientists did research on this organism with the help of microscope and showed their picture.

According to the scientists, earlier what was considered to be the most legged creature – “Elacme Planips” had 750 legs counted, but now the creature found has 1306 legs counted. The name of the species of millipedes with 1306 legs is Eumilipes Persephone, they live 200 feet below the surface.

Scientists say that their age can be up to 5-10 years. The color of Eumilips Persephone is pale yellow. The surprising thing is that this creature with a thread-like structure does not have eyes. They are 100 times longer than their width. This long thread-like creature has a head like an ice cream cone with many antennae on it, which help them to walk in the dark. It eats this fungus.

चतुर्भुज मंदिर, ओरछा (मध्य प्रदेश)- Chaturbhuj Temple, Orchha (Madhya Pradesh)

चतुर्भुज मंदिर, ओरछा (मध्य प्रदेश)

चतुर्भुज मंदिर (Chaturbhuj Temple) भारत के मध्य प्रदेश राज्य के ओरछा नगर में एक भगवान विष्णु का मन्दिर है। ओरछा मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित है। यह मंदिर जटिल बहुमंजिला संरचना वाला है तथा मंदिर, दुर्ग एवं राजमहल की वास्तुगत विशेषताओं से युक्त है। यह विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। चतुर्भुज मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है जो अपनी वह अद्भुत वास्तुकला के लिए जाना जाता है।

चतुर्भुज मंदिर, ओरछा (मध्य प्रदेश)- Chaturbhuj Temple, Orchha (Madhya Pradesh)

चतुर्भुज मंदिर का निर्माण ओरछा के राजा मधुकर शाह ने 1558 और 1573 के बीच बनवाया था। मधुकर शाह ने अपनी पत्नी रानी गणेश कुमारी के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया था, जो भगवान राम की भक्त थीं।

इस भव्य मंदिर को ओरछा के छोटे शहर के लगभग किसी भी कोने से देखा जा सकता है। मंदिर एक विशाल पत्थर के मंच पर बनाया गया है और दीवारों में जटिल डिजाइन और धार्मिक प्रतीक, विशेष रूप से कमल हैं। यह बड़ा पत्थर का मंच है जो इसे अतिरिक्त ऊंचाई प्रदान करता है और इसलिए यह एक बड़े टॉवर की तरह दिखाई देता है। मंदिर के तहखानों के भीतर विष्णु की एक रत्न और रेशम से सजी मूर्ति है। चतुर्भुज का अर्थ है चार भुजाओं वाला और कोई इसे मूर्ति में चित्रित देख सकता है। सर्पिल गुंबदों को न केवल बाहर से जटिल रूप से उकेरा गया है, बल्कि आंतरिक नक्काशी भी उतनी ही उत्तम है। मंदिर का निर्माण राजा मधुकर शाह ने शुरू किया था और उनके बेटे बीर सिंह देव ने पूरा किया था।

किंवदंतियों के अनुसार रानी ने एक सपना देखा था, जिसमें भगवान राम ने उन्हें अपने लिए एक मंदिर बनाने के लिए कहा था।

चतुर्भुज मंदिर, ओरछा (मध्य प्रदेश)- Chaturbhuj Temple, Orchha (Madhya Pradesh)

इस मंदिर के निर्माण की स्वीकृति के बाद, रानी भगवान राम की मूर्ति लाने के लिए अयोध्या गईं, जो उनके नए मंदिर में स्थापित हुई, जब वह अयोध्या से वापस आईं, तो मंदिर का निर्माण अधूरा था, इसलिए उन्होंने सबसे पहले मूर्ति को रानी महल में रखा। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण पूरा करने के बाद, रानी ने इस मंदिर में मूर्ति स्थापित करने का फैसला किया। लेकिन मूर्ति उस महल से नहीं हिली, तब रानी ने इस मंदिर में चार भुजाओं वाली भगवान विष्णु की एक मूर्ति स्थापित की और तभी से इस मंदिर का नाम चतुर्भुज मंदिर पड़ा।

चतुर्भुज मंदिर, ओरछा (मध्य प्रदेश)- Chaturbhuj Temple, Orchha (Madhya Pradesh)

English Translate

Chaturbhuj Temple, Orchha (Madhya Pradesh)

Chaturbhuj Temple is a temple dedicated to Lord Vishnu in the city of Orchha in the Indian state of Madhya Pradesh. Orchha is located in the Tikamgarh district of Madhya Pradesh. This temple is a complex multi-storied structure and has the architectural features of a temple, a fort and a palace. This is a world famous temple. Chaturbhuj Temple is under the Archaeological Survey of India which is known for its amazing architecture.

चतुर्भुज मंदिर, ओरछा (मध्य प्रदेश)- Chaturbhuj Temple, Orchha (Madhya Pradesh)

The Chaturbhuj Temple was built by King Madhukar Shah of Orchha between 1558 and 1573. Madhukar Shah built this temple for his wife, Rani Ganesh Kumari, who was a devotee of Lord Rama.

This grand temple can be seen from almost any corner of the small town of Orchha. The temple is built on a massive stone platform and the walls have intricate designs and religious symbols, especially the lotus. It is the big stone platform which gives it extra height and hence it looks like a big tower. Within the vaults of the temple is a jeweled and silk-encrusted idol of Vishnu. Chaturbhuj means having four sides and one can see it depicted in the idol. The spiral domes are not only intricately carved from the outside, but the inner carvings are equally exquisite. The construction of the temple was started by Raja Madhukar Shah and completed by his son Bir Singh Deo.

चतुर्भुज मंदिर, ओरछा (मध्य प्रदेश)- Chaturbhuj Temple, Orchha (Madhya Pradesh)

According to legends, the queen had a dream, in which Lord Rama asked her to build a temple for him.

After approving the construction of this temple, the queen went to Ayodhya to bring the idol of Lord Rama, which was installed in her new temple, when she came back from Ayodhya, the construction of the temple was incomplete, so she first brought the idol to Rani Mahal. Kept in After completing the construction of the Chaturbhuj temple, the queen decided to install the idol in this temple. But the idol did not move from that palace, then the queen installed an idol of Lord Vishnu with four arms in this temple and since then this temple was named Chaturbhuj Temple.

चतुर्भुज मंदिर, ओरछा (मध्य प्रदेश)- Chaturbhuj Temple, Orchha (Madhya Pradesh)

जायफल || Nutmeg ||

 जायफल

भारतीय रसोई घर में जायफल का अपना एक अलग स्थान है। भारतीय व्यंजन के स्वाद को बढ़ाने के लिए तरह-तरह के मसाले का प्रयोग किया जाता है, जो ना सिर्फ खाने के स्वाद को बढ़ाते हैं अपितु स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते हैं। उन्हीं में से "जायफल" भी एक मसाला है। लगभग हर रसोई घर में यह मसाला पाया जाता है। आज इस मसाले के औषधीय गुणों की चर्चा करेंगे।

जायफल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

जायफल क्या है?

जायफल एक जड़ी बूटी है, जिसका प्रयोग मसाले के रूप में किया जाता है। जायफल का वृक्ष हमेशा हरा-भरा रहता है और सुगंधित होता है। वृक्ष के तने श्यामल रंग के होते हैं, जिसमें बाहर छिद्र होता है। अंदर लाल रंग के द्रव्य होते हैं। इसके पत्ते लंबे और भालाकार होते हैं। इसके फूल छोटे-छोटे सुगंधित और पीले सफेद रंग के होते हैं। यह गोलाकार, अंडाकार तथा लाल और पीला रंग का होता है। फल पकने पर दो भागों में फट जाता है, जिसमें से जायफल निकलता है। जायफल को चारों ओर से घेरे हुए लाल रंग का कड़ा मांसल कवच होता है, जिसे जावित्री कहते हैं। इसी जावित्री के अंदर जायफल होता है।

जानते हैं जायफल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

जायफल कई पोषक तत्वों और गुणों से भरपूर होता है, जो स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है।

अनिद्रा की समस्या

2 हफ्तों तक रात को सोने से पहले चुटकी भर जायफल पाउडर को शहद में मिलाकर प्रयोग करने से अनिद्रा की समस्या में लाभ होता है।

मुंह में छाले छाले की समस्या

ताजे जायफल के रस को पानी में मिलाकर कुल्ला करने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।

चेहरे के दाग धब्बे और झाइयां की समस्या

  • जायफल को पीसकर शहद मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे के दाग और धब्बे मिटते हैं।
  • जावित्री और जायफल के बारीक चूर्ण को पानी में घोलकर लेप करने से चेहरे की झाइयां मिट जाती हैं।

बिवाई फटना

सर्दियों के मौसम में हाथ और पैर की त्वचा फट जाती है। ऐसे में जायफल को पानी में घिसकर पैरों पर लेप करने से बिवाइयां ठीक हो जाती हैं।

दांत दर्द की समस्या

जायफल के तेल में रुई के फाहे को भिगोकर दातों में दबाकर रखने से दांत के दर्द में लाभ मिलता है।

सिर दर्द की समस्या

जायफल को पानी में घिसकर सिर पर लेप लगाने से सिर दर्द ठीक होता है।

कान का दर्द

जायफल को पीसकर कान के पीछे लेप करने से कान के दर्द में लाभ होता है। जायफल के तेल को उबालकर छानकर एक दो बूंद की मात्रा में कान में डालने से भी कान के दर्द और सूजन में आराम होता है।

अधिक प्यास लगने की समस्या

जायफल को रात भर पानी में डुबोकर रख दें। इस पानी को सुबह 5 से 10 मिलीलीटर मात्रा पीने से अधिक प्यास लगने की समस्या में लाभ होता है।

पाचन तंत्र विकार

500 मिलीग्राम जायफल के चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है।

गठिया की समस्या

जायफल या जावित्री के तेल को सरसों के तेल में मिलाकर जोड़ों के दर्द वाले स्थान पर लगाने से लाभ होता है।  इससे जकड़न, मोच, गठिया, लकवा में भी लाभ होता है।

जायफल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

विभिन्न भाषाओं में जायफल का नाम

Hindi – जायफल, जायफर

English –Nutmeg,False aril, Fragrant nut tree, True nutmeg, Mac tree

Sanskrit– जातीफल, मालतीफल

Oriya– जायफोलो (Jaipholo)

Kannada– जाजीकाय (Jajikaya)

Gujarati– जायफल (Jayaphal)

Telugu– जाजीकाय (Jajikaya), जाजीपत्री (Jajipattiri)

Tamil - अडिपलम (Adipalam), अट्टिगम (Attigam)

Nepali– जाइफल (Jaiphal);

Punjabi– जयफल (Jayphala)

Marathi- जायफल (Jayaphala), बांडा जायफल (Banda jayaphala)

Malayalam - जाति (Jati)

Arabic– जीआन्सीबेन (Jiansiban), जोउजबाव्वा (Jouzbawwa)

जायफल के नुकसान

जैसा कि हम सभी जानते हैं किसी भी चीज की अधिकता बुरी होती है।

जायफल कि 5 ग्राम या उससे अधिक मात्रा का प्रयोग करने पर हिचकी, बहुत अधिक प्यास लगना, पेट दर्द, व्याकुलता तथा लिवर से जुड़ी समस्या हो सकती है।

English Translate

nutmeg

Nutmeg has its own special place in the Indian kitchen. Various spices are used to enhance the taste of Indian cuisine, which not only enhance the taste of food but are also beneficial for health. Nutmeg is also a spice among them. This spice is found in almost every kitchen. Today we will discuss the medicinal properties of this spice.

जायफल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

What is nutmeg?

Nutmeg is an herb, which is used as a spice. The nutmeg tree always remains green and is fragrant. The trunk of the tree is dark in colour, with holes on the outside. There are red colored substances inside. Its leaves are long and lanceolate. Its flowers are small, fragrant and yellowish white in colour. It is circular, oval and red and yellow in color. When the fruit ripens, it splits into two, from which nutmeg comes out. Surrounding the nutmeg from all sides is a hard fleshy armor of red colour, which is called Javitri. There is nutmeg inside this mace.

जायफल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

Know about the benefits, disadvantages, uses and medicinal properties of nutmeg

Nutmeg is rich in many nutrients and properties, which are beneficial for health.


insomnia problem

Mixing a pinch of nutmeg powder with honey and using it before sleeping at night for 2 weeks is beneficial in the problem of insomnia.


mouth ulcer problem

Mouth ulcers are cured by gargling with fresh nutmeg juice mixed with water.


Problem of spots and freckles on the face

Grinding nutmeg and mixing honey and applying it on the face removes facial spots and spots.

Mixing fine powder of mace and nutmeg in water and applying it on the face ends freckles.


sowing

In the winter season, the skin of hands and feet gets cracked. In this case, rubbing nutmeg in water and applying it on the feet cures wives.


toothache problem

Soaking a cotton swab in nutmeg oil and pressing it between the teeth provides relief in toothache.


headache problem

Grinding nutmeg in water and applying it on the head cures headache.


ear ache

Applying ground nutmeg behind the ear provides relief in ear pain. Boiling nutmeg oil after filtering it and putting one or two drops in the ear also provides relief in earache and swelling.


excessive thirst problem

Soak nutmeg in water overnight. Drinking 5 to 10 ml of this water in the morning is beneficial in the problem of excessive thirst.


digestive system disorders

Mixing 500 mg of nutmeg powder with honey and consuming it ignites the gastric fire.


arthritis problem

Mixing nutmeg or mace oil with mustard oil and applying it on the place of joint pain is beneficial. It is also beneficial in stiffness, sprain, arthritis, paralysis.

Disadvantages of Nutmeg

As we all know, excess of anything is bad.

Using 5 grams or more of nutmeg can cause hiccups, excessive thirst, abdominal pain, agitation and liver problems.

जायफल के पौष्टिक तत्व – Nutmeg Nutritional Value

जायफल के पौष्टिक तत्व – Nutmeg Nutritional Value

Nutmeg name in different languages

Hindi – Nutmeg
English – Nutmeg, False aril, Fragrant nut tree, True nutmeg, Mac tree
Sanskrit – Jatifal, Maltifal
Oriya – Nutmeg (Jaipholo)
Kannada – Jajikaya
Gujarati – Nutmeg (Jayaphal)
Telugu – Jajikaya, Jajipattiri
Tamil - Adipalam, Attigam
Nepali – Nutmeg (Jaiphal);
Punjabi – Jaiphal (Jayphala)
Marathi- Nutmeg (Jayaphala), Banda nutmeg 
Malayalam - Caste
Arabic – Jiansiban, Jouzbawwa

मैंने गाकर दुख अपनाए - हरिवंशराय बच्चन

मैंने गाकर दुख अपनाए

मैंने गाकर दुख अपनाए - हरिवंशराय बच्चन

"जरूरी नहीं कि मिठाई खिलाकर ही दूसरों का मुंह मीठा करें, 
 हम मीठा बोलकर भी लोगों को खुशियां दे सकते हैं.."

मैंने गाकर दुख अपनाए!

कभी न मेरे मन को भाया,

जब दुख मेरे ऊपर आया,

मेरा दुख अपने ऊपर ले कोई मुझे बचाए!

मैंने गाकर दुख अपनाए!


कभी न मेरे मन को भाया,

जब-जब मुझको गया रुलाया,

कोई मेरी अश्रु धार में अपने अश्रु मिलाए!

मैंने गाकर दुख अपनाए!


पर न दबा यह इच्छा पाता,

मृत्यु-सेज पर कोई आता,

कहता सिर पर हाथ फिराता-

’ज्ञात मुझे है, दुख जीवन में तुमने बहुत उठाये!

मैंने गाकर दुख अपनाए!

- हरिवंशराय बच्चन

Good Morning

"ख़ुशी उपलब्धि पाने के उत्त्साह 
और रचनात्मक प्रयास के रोमांच में निहित है.."

कुत्ता, बन्दर और शेर की मज़ेदार कहानी

कुत्ता, बन्दर और शेर की मज़ेदार कहानी

एक दिन एक कुत्ता जंगल में रास्ता खो गया। तभी उसने देखा कि एक शेर उसकी तरफ आ रहा है। कुत्ते की सांस रूक गयी। उसने सोचा - "आज तो मेरा, काम तमाम होगा..!"

कुत्ता, बन्दर और शेर की मज़ेदार कहानी

उसने इधर उधर देखा तो कुछ सुखी हड्डियां पड़ी थी, उन हड्डियों को देखते ही उसके दिमाग में एक तरकीब आई और वो आते हुए शेर की तरफ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हड्डी को चूसने लगा और जोर जोर से बोलने लगा - "वाह! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है। एक और मिल जाए तो आज की दावत पूरी हो जायेगी।" और उसने जोर से डकार मारी। 

ये सुन कर शेर सोच में पड़ गया। उसने सोचा- "ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है। जान बचा कर भागने में ही भलाई है।" यही सोंचता हुआ शेर वहां से भाग गया। 

मगर पास के पेड़ पर बैठा एक बन्दर यह सब तमाशा देख रहा था। उसने सोचा यह अच्छा मौका है, शेर को सारी कहानी बता देता हूँ, शेर से दोस्ती भी हो जायेगी और उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा भी दूर हो जायेगा। वो फटाफट शेर के पीछे भागा। पर कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया की कुछ तो गड़बड़ है। 

उधर बन्दर ने शेर को सारी कहानी बता दी कि कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ बनाया है। शेर जोर से दहाडा और बोला -"चल मेरे साथ, अभी उसकी लीला ख़तम करता हूँ।" बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर शेर कुत्ते की तरफ चल दिया। 

कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसके आगे जान का संकट आ गया, मगर कुत्ता फिर हिम्मत करके उसकी तरफ पीठ करके बैठ गया और जोर जोर से बोलने लगा - "ये बंदर ना जाने कहां मर गया, उसको गए 1 घंटा हो गया। साला एक शेर को फंसा कर नहीं ला सकता।"

यह सुनते ही शेर ने बंदर को वही पटका और उसको मार दिया और वापस पीछे भाग गया। इस तरह कुत्ते ने अपनी हिम्मत और समझदारी से दो बार अपनी जान बचा ली। साथ ही अपने खिलाफ मौका उठाने का प्रयास कर रहे बंदर को भी अपने दुश्मन के हाथों ही मरवा दिया। 

शिक्षा : मुश्किल समय में अपना आत्मविश्वास कभी नहीं खोएं। 

हार्ड वर्क के बजाय स्मार्ट वर्क ही करें तभी जीवन की असली सफलता मिलेगी। 

उत्तराखंड का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Uttarakhand ||

उत्तराखंड का राजकीय/राज्य पक्षी

उत्तराखंड अपनी खूबसूरत वादियों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश के 13 हिमालई जिलों को अलग कर 9 नवंबर 2000 को भारतीय गणतंत्र में 27वें राज्य और हिमालई राज्य में 11वें राज्य के रूप में उत्तराखंड का गठन हुआ। पहले इसका नाम उत्तरांचल था, फिर 1 जनवरी 2007 में इसका नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया। "मोनाल (Monal)" को उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वर्ष 2000 में राज्य पक्षी का दर्जा दिया गया था। 

उत्तराखंड  का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Uttarakhand ||

हर राज्य की तरह उत्तराखंड राज्य का भी अपना राजकीय पक्षी है। राजकीय पक्षियों के क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज बात करते हैं उत्तराखंड के राजकीय पक्षी "मोनाल (Monal)" के बारे में। हिमालय के मयूर के नाम से प्रसिद्ध मोनाल उत्तराखंड का राजकीय पक्षी है। यह पक्षी लगभग संपूर्ण हिमालई क्षेत्र में 2500 से 5000 मीटर के ऊँचाई वाले घने जंगलों में पाए जाते हैं। 'मोनाल' और 'डफिया' एक ही प्रजाति के पक्षी हैं, लेकिन मोनाल मादा पक्षी है और डफिया नर पक्षी।

उत्तराखंड, कश्मीर, असम तथा नेपाल में स्थानीय भाषा में इस पक्षी को "मन्यार" या "मुनाल" के नाम से भी जाना जाता है। पश्चिमोत्तर हिमालय में मुनाल, घुर मुनाल, रतिया कावाँ, रतनल, रतकप, कश्मीर में सुनाल (नर सुनामुर्ग़ तथा मादा हाम), हिमाचल प्रदेश में नीलगुरु या मुनाल (नर नील तथा मादा करेरी), उत्तर प्रदेश में दतिया, मिश्मी भाषा में पिया पदिर या दाफ़े, लेपचा भाषा में फ़ो दौंग, नेपाल में डंगन, भूटान में बुप तथा सिक्किम में चामदौंग के नामों से जाना जाता है।

उत्तराखंड  का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Uttarakhand ||

विभिन्न रंगों के मिश्रण से बनाया यह पक्षी बहुत ही खूबसूरत दिखता है। नीले, काले, हरे आदि रंगों वाले इस पक्षी की पूँछ हरी होती है। मोर की तरह इसके नर के सिर पर एक रंगीन कलगी होता है। यह पक्षी अपना घोंसला नहीं बनाते हैं, चट्टान और पेड़ के छिद्र में अंडे दे देते हैं। वनस्पति, कीड़े मकोड़े, आलू आदि मोनाल के प्रिय भोजन हैं। मोनाल आलू को बेहद शौक से खाते हैं, इसलिए आलू की फसल को यह बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।

यह उत्तराखण्ड का राज्य पक्षी होने के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल का राष्ट्रीय पक्षी भी है। मांस और खाल के लिए मोनाल का शिकार अधिक होता है जिसकी वजह से इनकी संख्या दिन प्रतिदिन घट रही है। 

उत्तराखंड  का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Uttarakhand ||

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State bird of Uttarakhand

Uttarakhand is famous all over the world for its beautiful valleys. Uttarakhand was formed on 9 November 2000 as the 27th state in the Republic of India and the 11th state in the Himalayan region by carving out 13 Himalayan districts of Uttar Pradesh. Earlier its name was Uttaranchal, then on January 1, 2007, its name was changed to Uttarakhand. "Monal" was given the status of state bird in the year 2000 after the formation of Uttarakhand state.

उत्तराखंड  का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Uttarakhand ||

Like every state, the state of Uttarakhand also has its own state bird. Taking forward the sequence of state birds, today let's talk about the state bird of Uttarakhand "Monal". Monal, popularly known as the Peacock of the Himalayas, is the state bird of Uttarakhand. These birds are found in dense forests with an altitude of 2500 to 5000 meters in almost the entire Himalayan region. 'Monal' and 'Daphia' are birds of the same species, but Monal is a female bird and Daphia is a male bird.

In Uttarakhand, Kashmir, Assam and Nepal, this bird is also known as "Manyar" or "Munal" in the local language. Munal, Ghur Munal, Ratia Kawan, Ratnal, Ratkap in North-Western Himalayas, Sunal (male Sunamurgh and female Ham) in Kashmir, Nilguru or Munal (male Neel and female Kareri) in Himachal Pradesh, Datia in Uttar Pradesh, Piya Padir in Mishmi language Or Dafe, known as Pho Doung in Lepcha language, Dangan in Nepal, Bup in Bhutan and Chamdong in Sikkim.

This bird made by mixing different colors looks very beautiful. The tail of this bird with colors like blue, black, green etc. is green. Like a peacock, its male has a colorful crest on its head. These birds do not make their nests, they lay eggs in holes in rocks and trees. Vegetables, insects, potatoes etc. are Monal's favorite food. Monal eats potatoes very fondly, so it causes a lot of damage to the potato crop.

उत्तराखंड  का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Uttarakhand ||

Apart from being the state bird of Uttarakhand, it is also the national bird of the neighboring country Nepal. Monal's hunting is more for meat and skin, due to which their number is decreasing day by day.

भारत के सभी राज्यों के राजकीय पक्षियों की सूची |(List of State Birds of India)

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

 श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय दसवाँ  विभूतियोग ||

अथ दशमोऽध्याय:- विभूतियोग

अध्याय दस के अनुच्छेद 12 - 18

अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति तथा विभूति और योगशक्ति को कहने के लिए प्रार्थना

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

अर्जुन उवाच

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्‌ ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌ ॥10.12॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥10.13॥

भावार्थ : 

अर्जुन बोले- आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं॥10.12-10.13॥

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥10.14॥

भावार्थ : 

हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्‌! आपके लीलामय (गीता अध्याय 4 श्लोक 6 में इसका विस्तार देखना चाहिए) स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही॥10.14॥

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥10.15॥

भावार्थ : 

हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत्‌ के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं॥10.15॥

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥10.16॥

भावार्थ : 

इसलिए आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं॥10.16॥

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌ ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥10.17॥

भावार्थ : 

हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?॥10.17॥

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌ ॥10.18॥

भावार्थ : 

हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात्‌ सुनने की उत्कंठा बनी ही रहती है॥10.18॥