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बुजुर्गों का अनुभव

बुजुर्गों का अनुभव

एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार किसी राज्य में एक जवान व्यक्ति राजा बना। उसने मंत्रियों को आदेश दे दिया कि बूढ़े लोग हमारे किसी काम के नहीं हैं। ये हमेशा बीमार रहते हैं, कोई काम नहीं करते, इनकी वजह से राज्य का पैसा बर्बाद होता है। सभी बूढ़ों को मृत्यु दंड दे दो। 

बुजुर्गों का अनुभव

जैसे ही ये आदेश राज्य के बूढ़ों को मालूम हुआ तो वे रातों रात दूसरे राज्य में चले गए। एक गरीब लड़का अपने पिता से बहुत प्रेम करता था, उसके पास इतना धन भी नहीं था कि वह घर छोड़कर दूसरे राज्य में जा सके। इसीलिए उसने अपने पिता को घर में ही छिपा लिया।

कुछ ही दिनों के बाद उस राज्य में अकाल पड़ गया। राजा को समझ नहीं आ रहा था कि अब प्रजा के खाने की व्यवस्था कैसे की जाए? उन दिनों भीषण गर्मी भी पड़ रही थी। गरीब लड़के ने अपने बूढ़े पिता से अकाल से निपटने का उपाय पूछा। उसके पिता ने कहा कि राज्य से कुछ ही दूर ही हिमालय स्थित था। गर्मी से हिमालय की बर्फ पिघलने लगेगी और वह पानी उस राज्य की ओर बहता हुआ आएगा। वह पानी यहां आए इससे पहले तुम एक काम करो राज्य के मार्ग पर दोनों तरफ हल चला दो।  


लड़के ने राज्य के लोगों को ये उपाय बताया, लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं मानी। लड़के ने अकेले ही रास्ते पर दोनों तरफ हल चला दिया। जल्दी ही हिमालय का पानी राज्य के रास्ते पर आ गया। कुछ ही दिनों में राज्य की सड़कों पर अनाज के पौधे उग आए। जब ये बात राजा को मालूम हुई तो उस गरीब लड़के को दरबार में बुलवाया गया। राजा ने लड़के से पूछा कि ये अनाज उगाने का ये उपाय तुम्हें किसने बताया?


लड़के ने कहा कि महाराज ये उपाय मेरे पिता ने बताया था। आपने जब बूढ़ों को मारने का आदेश दिया था, तो मैंने उन्हें अपने घर में छिपा लिया था। ये सुनकर राजा ने उस बूढ़े व्यक्ति को भी दरबार में बुलवाया। बूढ़े व्यक्ति ने राजा से कहा कि महाराज हमारे राज्य से लोग अपने खेतों से अनाज अपने घर ले जाते थे और कुछ लोग दूसरे राज्य अनाज बेचने जाते थे तो अनाज के कुछ दाने रास्ते के दोनों और गिर जाते थे। जब मेरे बेटे ने रास्ते की दोनों तरफ हल चलाया और हिमालय का पिघला हुआ पानी वहां पहुंचा तो वो दाने अंकूरित हो गए और अनाज उग गया।  बूढ़े व्यक्ति की ये बात सुनकर राजा को अपने आदेश का बहुत पछतावा हुआ और राज्य से गए हुए सभी बूढ़े लोगों को वापस अपने राज्य में बुलवा लिया। 


                         

शिक्षा :- बड़े-बूढ़े लोग बेकार नहीं होते हैं। उनका अनुभव हमें बड़ी-बड़ी कठिनाइयों से बचा सकता है। इसीलिए सभी वृद्ध का सम्मान करना चाहिए।

मन का भूत

 मन का भूत

तन्विक नामक आदमी ने एक भूत पकड़ लिया और उसे बेचने शहर गया , संयोगवश उसकी मुलाकात सेठ रघुवीर से हुई, सेठ ने उससे पूछा - भाई यह क्या है?

मन का भूत

उसने जवाब दिया कि यह एक भूत है। इसमें अपार बल है कितना भी कठिन कार्य क्यों न हो यह एक पल में निपटा देता है। यह कई वर्षों का काम मिनटों में कर सकता है

सेठ रघुवीर भूत की प्रशंसा सुन कर ललचा गया और उसकी कीमत पूछी......., 

उस तन्विक ने कहा कीमत बस पाँच सौ रुपए है ,

कीमत सुन कर सेठ ने हैरानी से पूछा- बस पाँच सौ रुपए.......

उस आदमी ने कहा - सेठ जी जहाँ इसके असंख्य गुण हैं वहाँ एक दोष भी है।अगर इसे काम न मिले तो मालिक को खाने दौड़ता है।

सेठ ने विचार किया कि मेरे तो सैकड़ों व्यवसाय हैं, विलायत तक कारोबार है यह भूत मर जायेगा पर काम खत्म न होगा , 

यह सोच कर उसने भूत खरीद लिया 

मगर भूत तो भूत ही था , उसने अपना मुँह फैलाया और बोला - काम काम काम काम...

सेठ भी तैयार ही था, उसने भूत को तुरन्त दस काम बता दिये ,

पर भूत उसकी सोच से कहीं अधिक तेज था इधर मुँह से काम निकलता उधर पूरा होता , अब सेठ घबरा गया ,

संयोग से एक सन्त वहाँ आये,

सेठ ने विनयपूर्वक उन्हें भूत की पूरी कहानी बताई..

सन्त ने हँस कर कहा अब जरा भी चिन्ता मत करो एक काम करो उस भूत से कहो कि एक लम्बा बाँस ला कर आपके आँगन में गाड़ दे बस जब काम हो तो काम करवा लो और कोई काम न हो तो उसे कहें कि वह बाँस पर चढ़ा और उतरा करे तब आपके काम भी हो जायेंगे और आपको कोई परेशानी भी न रहेगी सेठ ने ऐसा ही किया और सुख से रहने लगा.....।।


*💐💐शिक्षा💐💐*

यह मन ही वह भूत है। यह सदा कुछ न कुछ करता रहता है एक पल भी खाली बिठाना चाहो तो खाने को दौड़ता है।श्वास ही बाँस है।श्वास पर भजन- सिमरन का अभ्यास ही बाँस पर चढ़ना उतरना है।

खत्म होने जा रहा है एक युग

खत्म होने जा रहा है एक युग

आने वाले 10/15 साल में एक पीढी संसार छोड़ कर जाने वाली है, जो सीनियर सिटीजन है, जिनकी उम्र इस समय लगभग 60 -75 साल की है।

खत्म होने जा रहा है एक युग

इस पीढ़ी के लोग बिलकुल अलग ही हैं...

  • रात को जल्दी सोने वाले, सुबह जल्दी जागने वाले, भोर में घूमने निकलने वाले।
  • आंगन और पौधों को पानी देने वाले, देवपूजा के लिए फूल तोड़ने वाले, पूजा अर्चना करने वाले, प्रतिदिन मंदिर जाने वाले।
  • रास्ते में मिलने वालों से बात करने वाले, उनका सुख दु:ख पूछने वाले, दोनो हाथ जोड कर प्रणाम करने वाले, पूजा किये बगैर अन्नग्रहण न करने वाले।

उनका अजीब सा संसार...

  • तीज त्यौहार, मेहमान शिष्टाचार, अन्न, धान्य, सब्जी, भाजी की चिंता तीर्थयात्रा, रीति रिवाज, सनातन धर्म के इर्द गिर्द घूमने वाले।
  • पुराने फोन पे ही मोहित, फोन नंबर की डायरियां मेंटेन करने वाले, रॉन्ग नम्बर से भी बात कर लेने वाले, समाचार पत्र को दिन भर में दो-तीन बार पढ़ने वाले।
  • हमेशा एकादशी याद रखने वाले, अमावस्या और पूर्णमासी याद रखने वाले लोग, भगवान पर प्रचंड विश्वास रखने वाले, समाज का डर पालने वाले, पुरानी चप्पल, बनियान, चश्मे वाले।
  • गर्मियों में अचार पापड़ बनाने वाले, घर का कुटा हुआ मसाला इस्तेमाल करने वाले और हमेशा देशी टमाटर, बैंगन, मेथी, साग भाजी ढूंढने वाले।

नज़र उतारने वाले...

  • क्या आप जानते हैं कि ये सभी लोग धीरे धीरे, हमारा साथ छोड़ के जा रहे हैं।
  • क्या आपके घर में भी ऐसा कोई है?  यदि हाँ, तो उनका बेहद ख्याल रखें।
  • अन्यथा एक महत्वपूर्ण सीख, उनके साथ ही चली जायेगी... वो है, संतोषी जीवन, सादगीपूर्ण जीवन, प्रेरणा देने वाला जीवन, मिलावट और बनावट रहित जीवन, धर्म सम्मत मार्ग पर चलने वाला जीवन और सबकी फिक्र करने वाला आत्मीय जीवन।
  • आपके परिवार में जो भी बडे हों, उनको मान सन्मान और अपनापन, समय तथा प्यार दीजिये और हो सके तो उनके कुछ पद चिन्हो पर चलने की कोशिश करे ।

                         संस्कार ही
                 अपराध रोक सकते हैं                                                                                        
                      सरकार नहीं !!

 यह मानव इतिहास की आखिरी पीढ़ी है, जिसने अपने बड़ों की सुनी और अब अपने छोटों की भी सुन रहे ।

दिखावटीपन से बचें || Avoid Pretense

दिखावटीपन से बचें

एक व्यक्ति को किसी बड़े पद पर नौकरी मिल गयी। वह इस नौकरी से खुद को और बड़ा समझने लगा, लेकिन वह कभी भी खुद को बड़े पद के मुताबिक़ नहीं ढाल सका। एक दिन वह अपने ऑफिस में बैठा था, तभी बाहर से उसके दरवाजे को खटखटाने की आवाज आई।

दिखावटीपन से बचें || Avoid Pretense

खुद को बहुत व्यस्त दिखाने के लिए उसनें टेबल पर रखे टेलीफोन को उठा लिया और जो व्यक्ति दरवाजे के बाहर खड़ा था उसे अन्दर आने के लिए कहा। वह अन्दर आकर इंतजार करने लगा, इस बीच कुर्सी पर बैठा अधिकारी फ़ोन पर चिल्ला-चिल्ला कर बात कर रहा था। बीच-बीच में वह फोन पर कहता, कि मुझे वह काम जल्दी करके देना, टेलीफोन  पर अपनी बातों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बता रहा था। 

ऐसे ही कुछ मिनट तक बात करने के बाद उस आदमी ने फ़ोन रखा और सामने वाले व्यक्ति से उसके ऑफिस आने की वजह पूछी। उस आदमी ने अधिकारी को जवाब देते हुए कहा, “सर, मुझे बताया गया था कि 3 दिनों से आपके इस ऑफिस का टेलीफ़ोन ख़राब है और मैं इस टेलीफ़ोन को ठीक करने के लिए आया हूँ।”

हम दिखावा करके क्या साबित करना चाहते हैं? इससे हम कभी भी कुछ हासिल नहीं कर सकते, हमें किसी के सामने झूठ बोलने की क्या जरूरत? दिखावा करके हम खुद की नजरों में कभी भी ऊपर नहीं उठ सकते। दिखावा करने से बचिए क्योंकि इससे लोग पीठ पीछे हमारी ही बुराई करेंगे। मुखौटा मत लगायें।

English Translate

Avoid Pretense

A person got a job at a big position. He started considering himself bigger with this job, but he could never adapt himself to the higher position. One day he was sitting in his office when he heard a knock on his door from outside.
दिखावटीपन से बचें || Avoid Pretense
To make himself appear very busy, he picked up the telephone lying on the table and asked the person standing outside the door to come inside. He came inside and started waiting, meanwhile the officer sitting on the chair was shouting and talking on the phone. Every now and then he would say on the phone that he should get the work done quickly, he was exaggerating his words on the telephone.

After talking like this for a few minutes, the man hung up the phone and asked the person in front of him the reason for coming to the office. The man replied to the officer, “Sir, I was told that the telephone in this office of yours has been broken for the last 3 days and I have come to repair this telephone.”

What are we trying to prove by pretending? We can never achieve anything from this, why do we need to lie in front of anyone? We can never rise in our own eyes by pretending. Avoid showing off because because of this people will speak ill of us behind our backs. Don't wear a mask.

कर्ज वाली लक्ष्मी || Karj wali lakshmi

कर्ज वाली लक्ष्मी

सोशल मीडिया पर एक प्रेरक प्रसंग पढ़ कर अच्छा लगा। यह प्रसंग ज्यादातर लोगों तक पहुंचना चाहिए। अतः इस लेख को यहां साझा कर रही हूं।

एक 15 साल का लड़का अपने पापा से कहा पापा पापा दीदी के होने वाले ससुर और सास कल आ रहे है अभी जीजाजी ने फोन पर बताया। दीदी मतलब उसकी बड़ी बहन की सगाई कुछ दिन पहले एक अच्छे घर में तय हुई थी।

कर्ज वाली लक्ष्मी || Karj wali lakshmi

दीनदयाल जी पहले से ही उदास बैठे थे धीरे से बोले - हां बेटा! उनका कल ही फोन आया था कि वो एक दो दिन में दहेज की  बात करने आ रहे हैं। बोले, दहेज के बारे में आप से ज़रूरी बात करनी है। बड़ी मुश्किल से यह अच्छा लड़का मिला था। कल को उनकी दहेज की मांग इतनी ज़्यादा हो कि मैं पूरी नहीं कर पाया तो ?" कहते कहते उनकी आँखें भर आयीं। 

घर के प्रत्येक सदस्य के मन व चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। लड़की भी उदास हो गयी। खैर, अगले दिन समधी समधिन आए, उनकी खूब आवभगत की गयी। कुछ देर बैठने के बाद लड़के के पिता ने लड़की के पिता से कहा दीनदयाल जी अब काम की बात हो जाए। 

दीनदयाल जी की धड़कन बढ़ गयी। बोले, हां हां समधी जी, जो आप हुकुम करें। 

लड़के के पिताजी ने धीरे से अपनी कुर्सी दीनदयाल जी और खिसकाई ओर धीरे से उनके कान में बोले - "दीनदयाल जी मुझे दहेज के बारे बात करनी है।"

दीनदयाल जी हाथ जोड़ते हुये आँखों में पानी लिए हुए बोले बताईए समधी जी, जो आप को उचित लगे मैं पूरी कोशिश करूंगा। समधी जी ने धीरे से दीनदयाल जी का हाथ अपने हाथों से दबाते हुये बस इतना ही कहा - आप कन्यादान में कुछ भी देगें या ना भी देंगे, थोड़ा देंगे या ज़्यादा देंगे, मुझे सब स्वीकार है, पर कर्ज लेकर आप एक रुपया भी दहेज मत देना, वो मुझे स्वीकार नहीं। क्योंकि जो बेटी अपने बाप को कर्ज में डुबो दे वैसी "कर्ज वाली लक्ष्मी" मुझे स्वीकार नहीं। मुझे बिना कर्ज वाली बहू ही चाहिए। जो मेरे यहाँ आकर मेरी सम्पति को दो गुना कर देगी। मेरे घर परिवार को खुशियों से भरेगी। 

दीनदयाल जी हैरान हो गए, उनसे गले मिलकर बोले - समधी जी बिल्कुल ऐसा ही होगा। 

शिक्षा-  कर्ज वाली लक्ष्मी ना कोई विदा करें न ही कोई स्वीकार करें..!!

जय श्री कृष्ण 🙏

English Translate

Karj wali lakshmi

Nice to read an inspiring story on social media. This topic should reach most people. Therefore, I am sharing this article here.

A 15 year old boy said to his father, Papa, sister's future father-in-law and mother-in-law are coming tomorrow, just now brother-in-law told on the phone. Sister means his elder sister's engagement was fixed a few days ago in a good house.

कर्ज वाली लक्ष्मी || Karj wali lakshmi

Deendayal ji was already sitting sad and said softly - Yes son! I had received a call from him yesterday that he was coming in a day or two to discuss dowry. He said, I need to talk to you about dowry. This good boy was found with great difficulty. What if tomorrow their demand for dowry is so high that I am not able to fulfill it?" His eyes filled with tears while saying this.

Lines of worry were clearly visible on the mind and face of every member of the house. The girl also became sad. Well, the next day Samadhi Samadhin came and he was greatly welcomed. After sitting for some time, the boy's father said to the girl's father, Deendayal ji, now let's talk about work.

Deendayal ji's heartbeat increased. He said, yes, Samadhi ji, whatever you order.

The boy's father slowly moved his chair towards Deendayal ji and whispered in his ear - "Deendayal ji, I want to talk about dowry."

Deendayal ji folded his hands and said with tears in his eyes, tell me, Samadhi ji, whatever suits you, I will try my best. Samadhi ji gently pressed Deendayal ji's hand with his own and said only this - You may or may not give anything in Kanyadaan, you may give a little or you may give a lot, I accept everything, but do not give even a single rupee dowry by taking a loan. Give, I don't accept that. Because a daughter who drowns her father in debt, I do not accept that kind of "Lakshmi with debt". I want a daughter-in-law without debt. Who will come to my place and double my wealth. Will fill my home and family with happiness.

Deendayal ji was surprised, hugged him and said - Samadhi ji, it will be exactly like this.

Education- No one should bid farewell to Lakshmi who is in debt, nor should anyone accept her..!!

Jai Shri Krishna 🙏

लकड़ी का कटोरा || प्रेरणादायक कहानी

लकड़ी का कटोरा

एक वृद्ध व्यक्ति अपने बहु-बेटे के यहाँ शहर रहने गया। उम्र के इस पड़ाव पर वह अत्यंत कमजोर हो चुका था, उसके हाथ कांपते थे और दिखाई भी कम देता था। वो एक छोटे से घर में रहते थे, पूरा परिवार और उसका चार वर्षीया पोता एक साथ डिनर टेबल पर खाना खाते थे। लेकिन वृद्ध होने के कारण उस व्यक्ति को खाने में बड़ी दिक्कत होती थी। कभी मटर के दाने उसकी चम्मच से निकल कर फर्श पे बिखर जाते तो कभी हाथ से दूध छलक कर मेजपोश पर गिर जाता।

लकड़ी का कटोरा || प्रेरणादायक कहानी

बहु-बेटे एक-दो दिन ये सब सहन करते रहे पर अब उन्हें अपने पिता की इस काम से चिढ़ होने लगी।

लड़के ने कहा - "हमें इनका कुछ करना पड़ेगा।"

बहु ने भी हाँ में हाँ मिलाई और बोली - "आखिर कब तक हम इनकी वजह से अपने खाने का मजा किरकिरा करते रहेंगे, और हम इस तरह चीजों का नुकसान होते हुए भी नहीं देख सकते।"

अगले दिन जब खाने का वक़्त हुआ तो बेटे ने एक पुरानी मेज को कमरे के कोने में लगा दिया, अब बूढ़े पिता को वहीं अकेले बैठ कर अपना भोजन करना था। यहाँ तक कि उनके खाने के बर्तनों की जगह एक लकड़ी का कटोरा दे दिया गया था, ताकि अब और बर्तन ना टूट-फूट सकें।

बाकी लोग पहले की तरह ही आराम से बैठ कर खाते और जब कभी-कभार उस बुजुर्ग की तरफ देखते तो उनकी आँखों में आंसू दिखाई देते। यह देखकर भी बहु-बेटे का मन नहीं पिघलता, वो उनकी छोटी से छोटी गलती पर ढेरों बातें सुना देते। वहां बैठा बालक भी यह सब बड़े ध्यान से देखता रहता और अपने में मस्त रहता।


एक रात खाने से पहले, उस छोटे बालक को उसके माता-पिता ने ज़मीन पर बैठ कर कुछ करते हुए देखा, "तुम क्या बना रहे हो ?" पिता ने पूछा। 

बच्चे ने मासूमियत के साथ उत्तर दिया- "अरे मैं तो आप लोगों के लिए एक लकड़ी का कटोरा बना रहा हूँ, ताकि जब मैं बड़ा हो जाऊं तो आप लोग इसमें खा सकें।"

और वह पुनः अपने काम में लग गया। पर इस बात का उसके माता-पिता पर बहुत गहरा असर हुआ, उनके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला और आँखों से आंसू बहने लगे। वो दोनों बिना बोले ही समझ चुके थे कि अब उन्हें क्या करना है। उस रात वो अपने बूढ़े पिता को वापस डिनर टेबल पर ले आये और फिर कभी उनके साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया।


शिक्षा:-

असल शिक्षा शब्दों में नहीं हमारे कर्म में छुपी होती है। अगर हम बच्चों को बस ये उपदेश देते रहे कि बड़ों का आदर करो, सबका सम्मान करो और खुद इसके उलट व्यवहार करें तो बच्चा भी ऐसा ही करना सीखता है। इसलिए कभी भी अपने पेरेंट्स के साथ ऐसा व्यवहार ना करें कि कल को आपकी संतान भी आपके लिए लकड़ी का कटोरा तैयार करने लगे!


सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।

जब मां सरस्वती ने चूर किया कालिदास का घमंड

जब मां सरस्वती ने चूर किया कालिदास का घमंड

कालीदास का प्रारंभिक जीवन मूर्खतापूर्ण हरकतों से भरा हुआ था, मगर समय का पहिया घूमता है और वह महामूर्ख कालीदास महापंडित कालीदास बन जाते हैं। अपने शास्त्रार्थ के दम पर उन्होंने दुनिया के कई विद्वानों को परास्त किया। उन्हें दुनिया के सबसे विद्वान व्यक्तियों में मान लिया गया। तमाम मान-सम्मान पाकर कालीदास को मतिभ्रम हो गया कि उन्होंने सारी दुनिया को जीत लिया है। अब उन्हें कुछ पाना शेष नहीं रहा। 

जब मां सरस्वती ने चूर किया कालिदास का घमंड

एक दिन पड़ोसी देश से उन्हें शास्त्रार्थ के लिए बुलावा आया। कालीदास सम्राट विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर सवार होकर गंतव्य की ओर रवाना हुए। चटखती गरमी का मौसम था। निरंतर यात्रा से कालीदास थक कर चूर-चूर हो चुके थे। उन्होंने सोचा कहीं प्यास बुझाकर आगे बढ़ेंगे तो आगे का रास्ता आसान हो जाएगा। थोड़ी देर तलाश करने के बाद उन्हें एक झोपड़ी नजर आई। उन्होंने अपना घोड़ा झोपड़े के सामने रोका। झोपड़े के पास ही एक कुंआ था। कुएं पर एक वृद्धा पानी भर रही थी। 

कालिदास बोले - माते! पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा।

स्त्री बोली - बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं, अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी।

कालीदास ने कहा - मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली - तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ।

कालिदास ने कहा - मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें।

स्त्री बोली - तुम मेहमान कैसे हो सकते हो, संसार में दो ही मेहमान हैं, पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम?

(अब कालिदास सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे। )

कालिदास बोले - मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें।

स्त्री ने कहा - नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है। दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो?

(कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले)

कालिदास बोले - मैं हठी हूँ ।

स्त्री बोली - फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप?

कालिदास ने कहा - फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ ।

स्त्री ने कहा - नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते? मूर्ख दो ही हैं, पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

(कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे)

वृद्धा ने कहा - उठो वत्स (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए)

माता ने कहा - शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे। इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा।

कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े।

शिक्षा :- विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।

दो पोटली || Two Bundles

दो पोटली

एक बार भगवान ने जब इंसान की रचना की तो उसे दो पोटली दी। कहा एक पोटली को आगे की तरफ लटकाना और दूसरी को कंधे के पीछे पीठ पर। आदमी दोनों पोटलियां लेकर चल पड़ा।

दो पोटली || Two Bundles

हां, भगवान ने उसे ये भी कहा था कि आगे वाली पोटली पर नजर रखना पीछे वाली पर नहीं। समय बीतता गया। वह आदमी आगे वाली पोटली पर बराबर नजर रखता। आगे वाली पोटली में उसकी कमियां थीं और पीछे वाली में दुनिया की।

वे अपनी कमियां सुधारता गया और तरक्की करता गया। पीछे वाली पोटली को इसने नजरंदाज कर रखा था। एक दिन तालाब में नहाने के पश्चात, दोनों पोटलियां अदल बदल हो गई। आगे वाली पीछे और पीछे वाली आगे आ गई।

अब उसे दुनिया की कमियां ही कमियां नजर आने लगी। ये ठीक नहीं, वो ठीक नहीं। बच्चे ठीक नहीं, पड़ोसी बेकार है, सरकार निक्कमी है आदि-आदि। अब वह खुद के अलावा सब में कमियां ढूंढने लगा।

परिणाम ये हुआ कि कोई नहीं सुधरा, पर उसका पतन होने लगा। वह चक्कर में पड़ गया कि ये क्या हुआ है? वो वापस भगवान के पास गया। भगवान ने उसे समझाया कि जब तक तेरी नजर अपनी कमियों पर थी, तू तरक्की कर रहा था। जैसे ही तूने दूसरों में मीन-मेख निकालने शुरू कर दिए, वहीं से तेरा पतन शुरू हो गया।

शिक्षा:

हकीकत यही है कि हम किसी को नहीं सुधार सकते, हम अपने आपको सुधार लें इसी में हमारा कल्याण है। हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। हम यही सोचते हैं कि सबको ठीक करके ही शांति प्राप्त होगी, जबकि खुद को ठीक नहीं करते।

सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है |
जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है ||

English Translate

Two Bundles

Once when God created man, he gave him two bundles. Said to hang one potli on the front and the other on the back behind the shoulder. The man walked away with both the bundles.

Yes, God also told him to keep an eye on the bundle in front and not on the one behind. Time passed by. That man would keep an eye on the bundle in front. The front bundle had his shortcomings and the back bundle contained the world's.

He kept correcting his shortcomings and progressed. It had ignored the back bundle. One day after taking bath in the pond, both the bundles got interchanged. The front came back and the back came forward.

Now he started seeing only the shortcomings of the world. This is not right, that is not right. The children are not well, the neighbor is useless, the government is useless, etc. Now he started finding faults in everyone except himself.

The result was that no one improved, but his downfall started. He got confused that what has happened? He went back to God. God explained to him that as long as your eyes were on your shortcomings, you were progressing. As soon as you started finding fault with others, your downfall started from there itself.

Moral:

The reality is that we cannot improve anyone, we should improve ourselves, this is our welfare. If we improve, the world will improve. We think that peace will be achieved only by correcting everyone, while we do not correct ourselves.

अपना दिमाग इस्तेमाल करो || Use Your Mind ||

अपना दिमाग इस्तेमाल करो

एक बार की बात है कि जंगल के राजा सिंह को भूख लगी और उसने लोमड़ी से कहा, मेरे लिए कोई शिकार ढूंढकर लाओ, अन्यथा मैं तुम्हें ही खा जाऊँगा। लोमड़ी एक गधे के पास गई और बोली, मेरे साथ सिंह के समीप चलो, क्योंकि सिंह तुम्हें जंगल का राजा बनाना चाहता है।

अपना दिमाग इस्तेमाल करो

गधा उसके साथ चल दिया, सिंह ने गधे को देखते ही उस पर हमला करके उसके कान काट लिए। लेकिन गधा किसी प्रकार भागने में सफल रहा। तब गधे ने लोमड़ी से कहा, तुमने मुझे धोखा दिया, सिंह ने तो मुझे मारने का प्रयास किया और तुम कह रही थी कि वह मुझे जंगल का राजा बनायेगा।

लोमड़ी ने कहा, मूर्खता भरी बात मत करो। उसने तुम्हारे कान इसीलिए काट लिए ताकि तुम्हारे सिर पर मुकुट सुगमता पूर्वक पहनाया जा सके, समझे! चलो लौट चलें सिंह के पास। गधे को यह बात ठीक लगी, इसलिए वह पुनः लोमड़ी के साथ चला गया।

सिंह ने फिर गधे पर हमला किया तथा इस बार उसकी पूँछ काट ली। गधा फिर लोमड़ी से यह कहकर भाग चला कि तुमने मुझसे झूठ कहा, इस बार सिंह ने तो मेरी पूँछ भी काट ली। लोमड़ी ने कहा, सिंह ने तो तुम्हारी पूँछ इसलिए काट ली ताकि तुम सिंहासन पर सहजतापूर्वक बैठ सको, चलो पुनः उसके पास चलते हैं। लोमड़ी ने गधे को फिर से लौटने के लिए मना लिया।

 इस बार सिंह गधे को पकड़ने में सफल रहा और उसे मार डाला। सिंह ने लोमड़ी से कहा जाओ, इसकी चमड़ी उतार कर इसका दिमाग, फेफड़ा और हृदय मेरे पास लेते आओ और बचा हुआ अंश तुम खा जाओ। लोमड़ी ने गधे की चमड़ी निकाली और गधे का दिमाग खा लिया और केवल फेफड़ा तथा हृदय सिंह के पास ले गई। सिंह ने गुस्से में पूछा, इसका दिमाग कहाँ गया?

लोमड़ी ने जवाब दिया, महाराज! इसके पास तो दिमाग था ही नहीं। यदि इसके पास दिमाग होता तो क्या कान और पूँछ कटने के उपरान्त भी आपके पास यह पुनः वापस आता। सिंह सन्तुष्ट होकर बोला, हाँ तुम पूर्णतया सत्य बोल रही हो।

English Translate

Use Your Mind

Once upon a time, the king of the jungle, the lion felt hungry and said to the fox, find a prey for me, otherwise I will eat you. The fox went to a donkey and said, come with me near the lion, because the lion wants to make you the king of the jungle.

Use Your Mind

The donkey walked with him, the lion on seeing the donkey attacked it and bit off its ears. But the donkey somehow managed to escape. Then the donkey said to the fox, you cheated me, the lion tried to kill me and you were saying that he would make me the king of the jungle.

The fox said, don't talk nonsense. He cut off your ears so that the crown could be easily worn on your head, understand! Let's go back to Singh. The donkey liked this, so he again went with the fox.

The lion again attacked the donkey and this time bit off its tail. The donkey again ran away saying to the fox that you lied to me, this time the lion even bit my tail. The fox said, the lion has cut your tail so that you can sit comfortably on the throne, let's go to him again. The fox persuaded the donkey to return again.

  This time the lion was successful in catching the donkey and killed it. The lion said to the fox, take off its skin and bring its brain, lungs and heart to me and eat the remaining part. The fox skinned the donkey and ate the donkey's brain and took only the lungs and heart to the lion. Singh asked angrily, where did his mind go?

The fox replied, Maharaj! It didn't have brain at all. If it had a brain, would it come back to you even after having its ears and tail cut off? Singh said satisfiedly, yes you are telling the complete truth.

काँच और हीरा की पहचान || Identification of Glass and Diamond ||

 काँच और हीरा की पहचान

एक राजा का दरबार लगा हुआ था, चूँकि कि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले में लगा हुआ था। पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी। महाराज के सिंहासन के सामने एक शाही मेज थी और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं। पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार में बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे। उसी समय एक व्यक्ति आया और उसने कुछ कहने की आज्ञा मांगी, आज्ञा मिल गयी। 

काँच और हीरा की पहचान

तो उसने कहा - "मेरे पास दो वस्तुएं हैं। मैं हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी वस्तुओं को रखता हूँ, पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ। अब आपके नगर में आया हूँ।" राजा ने बुलाया और कहा - "क्या वस्तु है? तो उसने दोनो वस्तुएं उस कीमती मेज पर रख दीं और कहा कि वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान है।"

राजा ने कहा - "ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं।"

तो उस व्यक्ति ने कहा - "हाँ दिखाई तो एक सी ही देती हैं, लेकिन हैं भिन्न। इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और एक है काँच का टुकडा। लेकिन रूप रंग सब एक है। कोई आज तक परख नहीं पाया क़ि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा? कोइ परख कर बताये की कौन हीरा है और कौन काँच? अगर परख खरी निकली तो मैं हार जाऊंगा और यह कीमती हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा।"

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होंगी। इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ। राजा ने कहा मैं तो नहीं परख सकूंगा। दीवान बोले हम भी हिम्मत नहीं कर सकते। क्योंकि दोनों बिल्कुल समान है। सब हारे कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हारने पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था।

कोई व्यक्ति पहचान नहीं पाया। आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई। एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो। मैंने सब बातें सुनी है और यह भी सुना है कि कोई परख नहीं पा रहा है एक अवसर मुझे भी दो। 

एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुंचा। उसने राजा से प्रार्थना की मैं तो जनम से अंधा हूँ। फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये, जिससे मैं भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप तो हारे ही हैं।

राजा को लगा कि इसे अवसर देने में क्या हर्ज है? राजा ने कहा क़ि ठीक है तो तब उस अंधे आदमी को दोनों चीजे हाथ में दी गयी और पूछा गया इसमें कौन सा हीरा है और कौन सा काँच? यही तुम्हें परखना है।

हाथ में आते ही उस आदमी ने एक क्षण में कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच। जो आदमी इतने राज्यों को जीतकर आया था , वह नतमस्तक हो गया और बोला - "सही है! आपने पहचान लिया। धन्य हो आप। अब अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में दे रहा हूँ। 

सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला। उस आदमी, राजा और अन्य सभी लोगों ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसेपहचाना कि यह हीरा है और वह काँच?

उस अंधे ने कहा - "सीधी सी बात है मालिक धूप में हम सब बैठे हैं, मैंने दोनों को छुआ जो ठंडा रहा वह हीरा और जो गरम हो गया वह काँच।"

"जीवन में जो बात - बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये वह व्यक्ति "काँच" है और जो विपरीत परिस्थिति में भी ठंडा रहे वह व्यक्ति "हीरा" है!"

English Translate

Identification of Glass and Diamond

A king's court was set up, since it was a winter day, that's why the king's court was set up in the open. The whole general assembly was sitting in the morning sun. There was a royal table in front of the Maharaja's throne and some valuable things were kept on it. Pundits, Ministers and Diwan etc. were all sitting in the court and the family members of the king were also sitting. At the same time a person came and asked permission to say something, permission was granted.

Identification of Glass and Diamond

So he said - "I have two things. I go to the king of every state and keep my things, but no one can test them, everyone loses and I am roaming around as a winner. Now I have come to your city. " The king called and said - "What is the object? So he put both the objects on that precious table and said that both those objects are exactly the same size, same color, same light, everything is like a fingernail."

The king said - "These two things are one."

So that person said - "Yes, they look the same, but they are different. One of them is a very precious diamond and the other is a piece of glass. But the color is all the same. Till date no one has been able to distinguish which one. Which is a diamond and which is a piece of glass? Someone test and tell which is diamond and which is glass? If the test turns out to be true, I will lose and I will get this precious diamond deposited in the vault of your kingdom.

But the condition is that if no one can identify it, then you will have to pay me the amount of this diamond. This is how I have been winning from many states. The king said, I will not be able to test. Diwan said, we too cannot dare. Because both are exactly the same. Everyone lost, no one was able to gather courage. Everyone feared that the king's prestige would fall if he was defeated.

No person identified. At last there was some commotion behind. A blind man got up with a stick in his hand and said take me to Maharaj. I have heard all the things and have also heard that no one is able to test, give me a chance too.

He reached the king with the help of a man. He prayed to the king, I am blind by birth. Even then I should be given an opportunity, so that I can test my intelligence once and maybe I will be successful and even if I don't succeed, you are a loser anyway.

The king felt that what is the harm in giving it an opportunity? The king said that it is okay, then the blind man was given both the things in his hand and was asked which is the diamond and which is the glass? This is what you have to test.

As soon as it came in hand, that man said in a moment that this is diamond and this is glass. The man who had come after conquering so many kingdoms, bowed down and said - "Right! You have recognized. You are blessed. Now according to my promise, I am giving this diamond in the vault of your kingdom."

Everyone became very happy and the person who had come was also very happy that at least he found someone to judge him. The man, the king and all the other people expressed the same curiosity to the blind man that how did you recognize that it was a diamond and that glass?

That blind man said - "It's a simple thing, Lord, we are all sitting in the sun, I touched both, the diamond which remained cold and the glass which became hot."

"The person who gets heated up in every thing in life, gets entangled is a "glass" and the person who remains cool even in adverse circumstances is a "diamond"!"

सपने और हकीकत || dreams and reality ||

सपने और हकीकत

एक समय की बात हैं, एक व्यक्ति जो बेहद आलसी होने के साथ ही साथ गरीब भी था। वह बिल्कुल भी मेहनत नहीं करना चाहता था। लेकिन अमीर बनने का सपना देखता रहता था। वह भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करता था।

सपने और हकीकत || dreams and reality ||

एक सुबह उसे भिक्षा के रूप में दूध से भरा एक घड़ा मिला। वह बहुत प्रसन्न हुआ और दूध का घड़ा लेकर घर चला गया।

उसने दूध को उबाला, उसमें से कुछ दूध पिया और बचा हुआ दूध, एक बर्तन में डाल दिया। दूध को दही में बदलने के लिए उसने बर्तन में थोड़ा सा दही डाला। इसके बाद वह सोने के लिए लेट गया। वह सोते समय दही के बर्तन के बारे में सोचने लगा।

उसने सोचा - "सुबह तक दूध दही बन जायेगा। मैं दही को मथकर उससे मक्खन बना लूंगा। फिर मक्खन को गर्म करके उससे घी बना लूंगा। फिर घी को बाजार में जाकर उसे बेच दूँगा और कुछ पैसे कमा लूंगा। उस पैसे से मैं एक मुर्गी खरीदूंगा। मुर्गी अंडे देगी, उन अंडो से बहुत सारे मुर्गे मुर्गी पैदा होंगे। फिर ये मुर्गियां सैकड़ों अंडे देगी और मेरे पास जल्द ही एक पोल्ट्री फार्म होगा।" वह कल्पना में डूबा रहा।

फिर उसने सोचा - "मैं सारी मुर्गियां बेच दूंगा और फिर कुछ गाय भैंस खरीद लूंगा और दूध की डेयरी खोल दूंगा। शहर के सभी लोग मुझसे दूध खरीदने आएंगे और मैं बहुत जल्दी ही अमीर हो जाऊंगा। फिर में अमीर परिवार की खूबसूरत लड़की से शादी कर कर लूंगा। फिर मेरा एक सुंदर सा बेटा होगा। अगर वह कोई शरारत करेगा तो मुझे बहुत गुस्सा आएगा और उसे सबक सिखाने के लिए मैं उसे डंडे से ऐसे मारूंगा।"

यह सोचने के दौरान उसने बिस्तर के बगल में पड़ा डंडा उठाया और मारने का नाटक करने लगा। यही डंडा उसके दूध के बर्तन में लग गया और दूध का बर्तन टूट गया, इससे सारा दूध जमीन पर फैल गया। बर्तन की आवाज सुनकर उस आदमी की नींद उड़ गई। फैला हुआ दूध देखकर उसने अपना सिर पकड़ लिया।

शिक्षा:

सपने देखो, सपने देखना अच्छा है, लेकिन सिर्फ सपने देखने से कुछ नहीं होगा। सपनों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। कुछ भी जिंदगी में आसानी से नहीं मिलता हैं। हमारी जिंदगी को बेहतरीन बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। क्योंकि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है।

English Translate

dreams and reality

Once upon a time, there was a man who was extremely lazy as well as poor. He didn't want to work hard at all. But he used to dream of becoming rich. He used to live by begging.

One morning he received a pitcher full of milk as alms. He was very happy and went home with a pitcher of milk.

सपने और हकीकत || dreams and reality ||

He boiled the milk, drank some of it and poured the rest of the milk into a vessel. To convert the milk into curd, he put a little curd in the vessel. After that he lay down to sleep. He started thinking about the pot of curd while sleeping.

He thought - "By morning the milk will turn into curd. I will churn the curd and make butter out of it. Then I will heat the butter and make ghee out of it. Then I will sell the ghee in the market and earn some money. With that money I will make a Will buy a chicken. The chicken will lay eggs, many chickens will be born from those eggs. Then these chickens will lay hundreds of eggs and I will soon have a poultry farm." He was engrossed in imagination.

Then he thought - "I will sell all the chickens and then buy some cows and buffaloes and open a milk dairy. All the people of the city will come to buy milk from me and I will become rich very soon. Then I will marry a beautiful girl from a rich family. I will do it. Then I will have a handsome son. If he does any mischief, I will be very angry and will beat him with a stick like this to teach him a lesson."

While thinking this he picked up the stick lying beside the bed and pretended to hit. This stick hit his milk pot and the milk pot broke, due to which all the milk spread on the ground. Hearing the sound of the utensil, the man lost his sleep. Seeing the spilled milk, he held his head.

Education:

Dream, it is good to dream, but nothing will come of just dreaming. One has to work hard to fulfill dreams. Nothing comes easily in life. We have to work hard to make our life the best. Because there is no substitute for hard work.

"गाय का जूठा गुड़"

 "गाय का जूठा गुड़"

आज एक लेख पढ़ा, जो दिल को छू गई। लेख का शीर्षक पढ़कर ही मन में उत्सुकता जाग गई। यह तो सुना था कि गाय को गुड़ खिलाना बहुत अच्छा माना जाता है, परंतु शीर्षक कुछ भिन्न था जिससे उत्सुकता बढ़ी और पूरा लेख एक लगातार पढ़ती गई। शायद आप लोगों को भी यह लेख पसंद आए।

"गाय का जूठा गुड़"

एक शादी के निमंत्रण पर जाना था, पर मैं जाना नहीं चाहता था। वजह थी कि शादी गांव में थी। एक व्यस्त होने का बहाना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना, लेक‌िन घर परिवार का दबाव था सो जाना पड़ा।

शादी के घर में हर किसी को कोई न कोई काम सौंप दिया जा रहा था। उस दिन शादी की सुबह मैं काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर गांव को जाने बाली रोड़ पर बैठा हुआ था। हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था। शहर में देर से उठना और काम पर लग जाना, कहाँ इतना सुहाना मौसम मिल पाता। खैर, पास के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी कि तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी और उसमें से एक वृद्ध उतरे। अमीरी उसके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।

वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये। पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी। उसमें गुड़ भरा हुआ था। अब उन्होंने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायों को बुलाया। सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनों बाद बच्चे अपने मां - बाप को घेर लेते हैं। कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे, तो कुछ स्वयम् खा रही थी। वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।

कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गईं। इसके बाद जो हुआ वो वाक्या है, जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता। 

हुआ यूँ कि गायों के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था, वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे।मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।

मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला श्रीमानजी क्षमा चाहता हूँ, पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का झूठा गुड़ क्यों खा रहे थे। 

उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी। उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता। जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं, मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।

मैं अब भी नहीं समझा श्री मान जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ? मैंने बड़ी उत्सुकता से कहा। 

वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की है। उस वक़्त मैं 22 साल का था। घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था। भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।

तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए। यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था। मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था। मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई। मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्राय आत्मा में प्राण से आ गये।

मैं उसी पेड़ की जड़ों में रात भर पड़ा रहा। सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी। मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश में फिर सारा दिन भटकता रहा। पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था। एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।

शाम ढल रही थी। कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था। वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय। कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने। गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई। मुझे अज़ीब लगा, परन्तू मैं बेबस था, सो आज फिर गुड खा लिया और वहीं सो गया। 

सुबह काम तलासने निकल गया। आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी, सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।

इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई। मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया। इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था कि गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था। 

मेरा हृदय भर उठा, उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर। मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा और बहुत सोचता रहा। फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई। दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया। शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ। जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया। मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायों को गुड़ डालकर इनका झूँठा गुड़ खाता हूँ, जिससे मेरी आत्मा तृप्त हो जाती है। 

मैं लाखों रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ, परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यहीं आकर मिटती हैं बेटे। मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम। 

मैंने सिर हाँ में हिलाया। वे चल पड़े, गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई। मैं उठा उन्हीं टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला वापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ। सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था। उसमें कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।

घर आकर गाय के बारे में जानने के लिए कुछ किताबें पढ़नी शुरू की। पढ़ने के बाद जाना कि गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है, जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। गौएं विकार-रहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं।

सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं।

ऋग्वेद में गौ को ‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है। 

वास्तव में सुखी कौन..?

वास्तव में सुखी कौन..?

सुख हमारे अंतर मन मे जन्म लेता है। वाह्य जगत में जो सुख दिखता है वह आभासी है। 

आज मैंने एक कहानी पढ़ी। मुझे बहुत पसंद आई। उम्मीद है आपलोगों को भी अच्छी लगेगी। 

वास्तव में सुखी कौन..?

एक भिखारी किसी किसान के घर भीख माँगने गया। किसान की स्त्री घर में थी, उसने चने की रोटी बना रखी थी। किसान जब घर आया, उसने अपने बच्चों का मुख चूमा, स्त्री ने उनके हाथ पैर धुलाये, उसके बाद वह रोटी खाने बैठ गया। स्त्री ने एक मुट्ठी चना भिखारी को डाल दिया, भिखारी चना लेकर चल दिया।

रास्ते में भिखारी सोचने लगा, “हमारा भी कोई जीवन है? दिन भर कुत्ते की तरह माँगते फिरते हैं। फिर स्वयं बनाना पड़ता है। इस किसान को देखो कैसा सुन्दर घर है। घर में स्त्री है, बच्चे हैं, अपने आप अन्न पैदा करता है। बच्चों के साथ प्रेम से भोजन करता है। वास्तव में सुखी तो यह किसान है।

इधर वह किसान रोटी खाते-खाते अपनी स्त्री से कहने लगा, “नीला बैल बहुत बुड्ढा हो गया है, अब वह किसी तरह काम नहीं देता, यदि कहीं से कुछ रुपयों का इन्तजाम हो जाये तो इस साल का काम चले। साधोराम महाजन के पास जाऊँगा, वह ब्याज पर दे देगा।” 

भोजन करके वह साधोराम महाजन के पास गया। बहुत देर चिरौरी विनती करने पर 1रु. सैकड़ा सूद पर साधों ने रुपये देना स्वीकार किया। एक लोहे की तिजोरी में से साधोराम ने एक थैली निकाली और गिनकर रुपये किसान को दे दिये।

रुपये लेकर किसान अपने घर को चला, वह रास्ते में सोचने लगा- “हम भी कोई आदमी हैं, घर में 5 रु. भी नकद नहीं। कितनी चिरौरी विनती करने पर उसने रुपये दिये हैं। साधो कितना धनी है, उसके पास सैकड़ों रुपये हैं।” वास्तव में सुखी तो यह साधो राम ही है। साधोराम छोटी सी दुकान करता था, वह एक बड़ी दुकान से कपड़े ले आता था और उसे बेचता था।

दूसरे दिन साधोराम कपड़े लेने गया, वहाँ सेठ पृथ्वीचन्द की दुकान से कपड़ा लिया। वह वहाँ बैठा ही था कि इतनी देर में कई तार आए कोई बम्बई का था तो कोई कलकत्ते का, किसी में लिखा था 5 लाख मुनाफा हुआ, किसी में एक लाख का। साधो महाजन यह सब देखता रहा, कपड़ा लेकर वह चला आया। रास्ते में सोचने लगा, “हम भी कोई आदमी हैं, सौ दो सौ जुड़ गये महाजन कहलाने लगे। पृथ्वीचन्द कैसे हैं, एक दिन में लाखों का फायदा। “वास्तव में सुखी तो यह है, उधर पृथ्वीचन्द बैठा ही था, कि इतने ही में तार आया कि 5 लाख का घाटा हुआ। वह बड़ी चिन्ता में था कि नौकर ने कहा, आज लाट साहब की रायबहादुर सेठ के यहाँ दावत है। आपको जाना है, मोटर तैयार है।” 

पृथ्वीचन्द मोटर पर चढ़ कर रायबहादुर की कोठी पर चला गया। वहाँ सोने चाँदी की कुर्सियाँ पड़ी थी, रायबहादुर जी से कलक्टर-कमिश्नर हाथ मिला रहे थे। बड़े-बड़े सेठ खड़े थे। वहाँ पृथ्वीचन्द सेठ को कौन पूछता, वे भी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया। लाट साहब आये, राय बहादुर से हाथ मिलाया, उनके साथ चाय पी और चले गये।

पृथ्वीचन्द अपनी मोटर में लौट रहें थे, रास्ते में सोचते आते हैं, हम भी कोई सेठ हैं, 5 लाख के घाटे से ही घबड़ा गये। राय बहादुर का कैसा ठाठ है, लाट साहब उनसे हाथ मिलाते हैं। “वास्तव में सुखी तो ये ही है।”         

अब इधर लाट साहब के चले जाने पर रायबहदुर के सिर में दर्द हो गया, बड़े-बड़े डॉक्टर आये एक कमरे वे पड़े थे। कई तार घाटे के एक साथ आ गये थे। उनकी भी चिन्ता थी, कारोबार की भी बात याद आ गई। वे चिन्ता में पड़े थे, तभी खिड़की से उन्होंने झाँक कर नीचे देखा, एक भिखारी हाथ में एक डंडा लिये अपनी मस्ती में जा रहा था। राय बहादुर ने उसे देखा और बोले, “वास्तव में तो सुखी यही है, इसे न तो घाटे की चिन्ता न मुनाफे की फिक्र, इसे लाट साहब को पार्टी भी नहीं देनी पड़ती, सुखी तो यही है।”

इस कहानी से हमें यह पता चलता है कि हम एक-दूसरे को सुखी समझते हैं, पर वास्तव में सुखी कौन है, इसे तो वही जानता है, जिसे आन्तरिक शान्ति है, जिसे आन्तरिक सुकून है। कोई चाहे भिखारी हों चाहे करोड़पति हों। लेकिन उसके मन में जब तक शांति नहीं है, तब तक उसको सुकून नहीं मिल सकता। अतः जहाँ तक हो सके सदैव प्रसन्न रहने का प्रयास करिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है। जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।

मुझे पता है यह लिखना कितना आसान है और इसपर अमल करना कितना मुश्किल। फिर भी.... छोटा सा एक प्रयास .... 

मधुर व्यवहार

मधुर व्यवहार

हमारा व्यवहार हमारे व्यक्तित्व में निखार के साथ साथ हमें कई संभावित कष्टों से भी छुटकारा दिला सकता हैं। सब के साथ अपनी वाणी में संयम बरतते हुए मधुर व्यवहार करना चाहिए।

मधुर व्यवहार

एक कहानी है

एक राजा था। उसने एक सपना देखा। सपने में उससे एक परोपकारी साधु कह रहा था कि बेटा! कल रात को तुम्हें एक विषैला सांप काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुमसे पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है।

सुबह हुई, राजा सोकर उठा और सपने की बात सोंचने लगा कि अपनी आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? सोचते-सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया।

एक राजा का सपना

शाम होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने की कोशिश न करें।

रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे - जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता रहा।

इस तरह क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुंचाने की चेष्टा नहीं कर रहे हैं।

यह असाधारण सी लगने वाले दृश्य देखकर सांप के मन में स्नेह उमड़ आया। सदव्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मंत्रमुग्ध कर लिया था। कहां वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुंचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूं तो किस प्रकार काटूं? यह प्रश्न के चलते वह दुविधा में पड़ गया।

राजा के पलंग तक जाने तक सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया। उधर समय से कुछ देर बाद सांप राजा के शयन कक्ष में पहुंचा। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सदव्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया।

अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं, मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूं। लो इसे अपने पास रखो। इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सांप चला गया।

यह महज कहानी नहीं जीवन की सच्चाई है। अच्छा व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को सरल बना देता है। मधुर व्यवहार से हम खुद सम भाव में रहकर अपने आस पास के परिवेश को शांत और खुशनुमा बना सकते हैं। जब व्यक्ति श्रेष्ठ गुणों को अपनाता है और दूसरों के साथ उसका बर्ताव अच्छा और मधुर होता है तो ऐसे व्यक्ति सभी के प्रिय होते हैं और हर स्थान पर सम्मान प्राप्त करते हैं। यदि व्यक्ति का व्यवहार कुशल है, तो वो सब कुछ पा सकता है जो पाने की वो हार्दिक इच्छा रखता है। 

पूर्व जन्म से जुड़े कुछ रोचक रहस्य

पूर्व जन्म से जुड़े कुछ रोचक रहस्य

मुझे नहीं पता कि ब्लॉग के पाठकों में कितने लोग पूर्व जन्म को मानते हैं, कितने नहीं। हो सकता है कुछ लोग इससे इत्तेफाक रखते होंगे और कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो पूर्व जन्म को नहीं मानते होंगे। ज्योतिष शास्त्र की एक बड़ी अवधारणा यह है कि मनुष्य के वर्तमान जीवन में जो कुछ भी अच्छा या बुरा अनायास घट रहा है, उसे पिछले जन्म का प्रारब्ध माना जाता है। पोस्ट आगे लिख रही हूँ, अपनी सहमति या असहमति जो भी हो, कमेंट बॉक्स में जरूर साझा कीजियेगा। 

पूर्व जन्म से जुड़े कुछ रोचक रहस्य

आइये जानते है पूर्व जन्म से जुड़े कुछ रोचक रहस्य 

आपने अक्सर सुना होगा जब किसी के घर की मृत्यु होती है, उसके पश्चात कुछ ही अवधि में किसी संतान के जन्म लेने पर कहा जाता है जाने वाला इस संतान के रूप में बापस आ गया। 

पूर्वजन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नि, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसारके जितने भी रिश्ते नाते हैं,सब मिलते हैं। क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है। वैसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है, जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है :-

ऋणानुबन्ध- 

पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा, आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।

शत्रुपुत्र-

पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा। हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा !

उदासीनपुत्र

इस प्रकार की सन्तान ना तो माता-पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है, बस उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है विवाह होने पर यह माता-पिता से अलग हो जाते हैं। 

सेवकपुत्र 

पूर्व जन्म में यदि हमने किसी की खूब सेवा की है, तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है, जो बोया है वही तो काटोगे। अपने माँ-बाप की सेवा की है तो ही आपकी औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी अन्यथा कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा। 

यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं। इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है। जैसे यदि कोई किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा की है, तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है। यदि गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया, तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी। यदि किसी ने किसी निरपराध जीव को सताया है, तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा। इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें। क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे, उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी। यदि आपने किसी को एक रुपया दिया है, तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं। यदि आपने किसी का एक रुपया छीना है, तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये। 

ज़रा सोचिये, "हम कौन सा धन साथ लेकर आये थे और कितना साथ लेकर जायेंगे ?

मरने पर जो सोना-चाँदी, धन-दौलत बैंक में पड़ा रह गया, समझो वो व्यर्थ ही कमाया। औलाद अगर अच्छी और लायक है, तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है, खुद ही खा-कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ,वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही चैन लेगी। मैं, मेरा, तेरा और सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा, कुछभी साथ नहीं जायेगा। साथ यदि कुछ जायेगा भी तो सिर्फ नेकियाँ ही साथ जायेंगी। इसलिए जितना हो सके नेकी करें, सत्कर्म करें और सभी के के साथ मिलजुल कर प्रेम से रहें। 

ताले की दुकान || The lock shop ||

ताले की दुकान

आज एक लघु कथा पढ़ी, दिल को छू गयी। आपलोगों के साथ साझा कर रही हूँ। 

ताले की दुकान

किसी गाँव में एक ताले की दुकान थी। ताले वाला रोजाना अनेकों ताले तोड़ा करता और अनेकों चाबियाँ भी बनाया करता था। ताले वाले की दुकान में एक बच्चा भी रोज काम सीखने आया करता था। बच्चा रोज देखा करता कि छोटी सी चाबी इतने मजबूत ताले को भी कितनी आसानी से खोल देती है। 

बाल मन जिज्ञासा से भरा हुआ। आखिर बच्चे ही तो होते हैं, जिनके पास सवालों के अम्बार होते। उत्सुकतावश एक दिन बच्चे ने ताले वाले से पूछा कि, हथौड़ा ज्यादा शक्तिशाली है और हथौड़े के अंदर लोहा भी ज्यादा है और आकार में भी चाबी से बड़ा है, लेकिन फिर भी हथौड़े से ताला तोड़ने में बहुत समय लगता है और इतनी छोटी चाबी बड़ी ही आसानी से मजबूत ताला कैसे खोल देती है?

दुकानदार ने मुस्कुरा के बच्चे से कहा कि, हथौड़े से तुम ताले पर ऊपर से प्रहार करते हो और उसे तोड़ने की कोशिश करते हो लेकिन चाबी ताले के अंदर तक जाती है, उसके अंतर्मन को छूती है और घूमकर ताले के अंतर्मन को बिना चोट किए स्पर्श करती है और ताला खुल जाया करता है।

इसी प्रकार आप चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली हो. ताकतवर हो, लेकिन जब तक वह लोगों के दिल में नहीं उतरेगा, उनके अंतर्मन को नहीं छुएगा, तब तक कोई उसकी इज्जत नहीं करेगा अर्थात् जिस प्रकार हथौड़े के प्रहार से ताला खुलता नहीं बल्कि टूट जाता है। ठीक वैसे ही अगर हम शक्ति के बल पर कुछ काम करना चाहते हैं तो हम हर बार सामान्यत: असफल रहेंगे। क्योंकि शक्ति के द्वारा हम लोगों के दिलों को नहीं छू सकते हैं। 

*दिल में उतरना है* या *दिल से उतरना है*, इच्छा हमारी अपनी है।


English Translate

The lock shop

There was a lock shop in a village. The locksmith used to break many locks daily and also used to make many keys. A child also used to come daily to learn work in the locksmith's shop. The child used to see every day how easily a small key can open such a strong lock.

The lock shop

Child mind full of curiosity. After all, it is the children who have a lot of questions. Out of curiosity, one day the child asked the locksmith that the hammer is more powerful and the iron inside the hammer is also bigger and bigger in size than the key, but still it takes a lot of time to break the lock with the hammer and such a small key is too big. How to open a strong lock easily?

The shopkeeper smiled and told the child that, with a hammer, you hit the lock from above and try to break it, but the key goes inside the lock, touches its inside and turns around and touches the inside of the lock without hurting it. and the lock is opened.

Similarly, no matter how powerful you are. May he be strong, but until he does not enter the hearts of people, does not touch their conscience, then no one will respect him, that is, the way a lock does not open with a hammer but breaks it. In the same way, if we want to do some work on the strength of power, then we will usually fail every time. Because by power we cannot touch people's hearts.

* to land in the heart * or * to descend from the heart *, the desire is our own.

हलधर नाग || Haldhar Nag ||

हलधर नाग

आज एक ऐसे कवि और लेखक की चर्चा करते हैं, जिन्हें 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था - हलधर नाग

हलधर नाग, जिसके नाम के आगे कभी श्री नहीं लगाया गया, 3 जोड़ी कपड़े, एक टूटी रबड़ की चप्पल, एक बिन कमानी का चश्मा और जमा पूंजी 732/- रुपया। 

ये हैं ओड़िशा के हलधर नाग ।

हलधर नाग || Haldhar Nag ||

हलधर नाग, जिनका जन्म 31 मार्च 1950 में हुआ था, ओड़ीसा के संबंलपुरी भाषा के कवि और लेखक हैं। वे "लोककवि रत्न" के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनके बारे में विशेष बात यह है कि उन्हें अपनी लिखी सारी कविताएँ और 20 महाकाव्य कण्ठस्थ हैं। संभलपुर विश्वविद्यालय में उनके लेखन के एक संकलन "हलधर ग्रन्थावली-2" को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। सादा लिबास, सफेद धोती, गमछा और बनियान पहने, नाग नंगे पैर ही रहते हैं। उड़‍िया के लोक-कवि हलधर नाग के बारे में जब आप जानेंगे, तो प्रेरणा से ओतप्रोत हो जायेंगे।

हलधर का जन्म 1950 में ओडिशा के बरगढ़ में एक गरीब परिवार में हुआ था। जब वे 10 वर्ष के थे तभी उनके पिता की मृत्यु के साथ हलधर का संघर्ष शुरू हो गया। तब उन्हें मजबूरी में तीसरी कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। घर की अत्यन्त विपन्न स्थिति के कारण मिठाई की दुकान में बर्तन धोने पड़े। दो साल बाद गाँव के सरपंच ने हलधर को पास ही के एक स्कूल में खाना पकाने के लिए नियुक्त कर दिया, जहाँ उन्होंने 16 वर्ष तक काम किया। जब उन्हें लगा कि उनके गाँव में बहुत सारे विद्यालय खुल रहे हैं, तो उन्होंने एक बैंक से सम्पर्क किया और स्कूली बच्चों के लिए स्टेशनरी और खाने-पीने की एक छोटी सी दुकान शुरू करने के लिए 1000 रुपये का ऋण लिया। यह दुकान स्कूल के सामने थी, जहाँ वो छुट्टी के समय बैठते थे। 

कुछ समय पश्चात हलधर नाग ने स्थानीय उड़िया भाषा में ''राम-शबरी'' जैसे कुछ धार्मिक प्रसंगों पर लिखकर लोगों को सुनाना शुरू किया। उन्होंने भावनाओं से ओत प्रोत कवितायें लिखी, शुरुवाती दौर में जिन्हें नाग जबरन लोगों के बीच प्रस्तुत करते थे। धीरे - धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। 

1990 में हलधर ने पहली कविता "धोधो बारगाजी" (अर्थ : 'पुराना बरगद') नाम से लिखी, जिसे एक स्थानीय पत्रिका ने छापा और उसके बाद हलधर की सभी कविताओं को पत्रिका में जगह मिलती रही और वे आस-पास के गाँवों से भी कविता सुनाने के लिए बुलाए जाने लगे। लोगों को हलधर की कविताएँ इतनी पसन्द आईं कि वे उन्हें "लोक कविरत्न" के नाम से बुलाने लगे।

नाग पर PHD कर रहे रिसर्चर्स

अब उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी कि सन 2016 में हलधर नाग को भारत के राष्ट्रपति के द्वारा साहित्य के लिये पद्मश्री प्रदान किया। इतना ही नहीं अब 5 रिसर्चर्स हलधर नाग के साहित्य पर PHd कर रहे हैं, जबकि हलधर खुद केवल तीसरी कक्षा तक ही पढ़े हैं। हलधर नाग को पदम्श्री से सम्मानित करने और उनपर रिसर्चर्स के PHD करने पर कहा गया है कि

 ''आप किताबों में प्रकृति को चुनते है, 
पद्मश्री ने प्रकृति से किताबें चुनी हैं।''
जानिये पद्मश्री कवि हलधर नाग के बारे में

2021 में सोशल मिडिया पर एक पोस्ट वायरल हुई थी "साहिब - दिल्ही आने तक के पैसे नहीं हैं, कृपया पुरुस्कार डाक से भिजवा दो।"

डा. हलधर नाग को लेकर इंटरनेट मीडिया में एक गलत पोस्ट वायरल हुई थी। इस पोस्ट को लेकर नाग ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा था कि उनके नाम पर किया गया पोस्ट पूरी तरह झूठा और मनगढ़ंत है। ऐसे पोस्ट से वे काफी दुखी और आहत हैं। वायरल पोस्ट में कहा गया है कि पद्मश्री पुरस्कार लेने के लिए हलधर नाग के पास दिल्ली जाने के पैसे नहीं हैं और इस संबंध में सरकार को पत्र लिखकर नाग ने आग्रह किया है कि उनका पुरस्कार डाक से भेज दिया जाय।

नाग ने कहा कि शरारतपूर्ण तरीके से यह झूठी जानकारी वायरल की गई है। सच तो यह है कि उन्हें इस वर्ष नहीं बल्कि 2016 में पद्मश्री का पुरस्कार मिला था। 2016 में भी जब पद्मश्री पुरस्कार लेने के लिए उन्हें दिल्ली बुलाया गया था तब उन्होंने सरकार को अपनी गरीबी का हवाला देते हुए कोई पत्र नहीं लिखा था और न ही पदमश्री पुरस्कार को डाक से भेज देने की बात कही थी। लोककवि डा. हलधर नाग ने कहा कि पद्मश्री पुरस्कार से पहले से ही ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की ओर से उन्हें कलाकार भत्ता दिया जा रहा था। ओडिशा सरकार ने उन्हें रहने के लिए जमीन भी दी है, जिसपर बरगढ़ के एक डाक्टर ने अपने खर्च से मकान भी बनवा दिया है। वर्तमान में उन्हें सरकार की ओर से साढ़े 18 हजार रुपये का मासिक भत्ता भी मिलता है।

Haldhar Nag

Today let's discuss a poet and writer who was awarded Padma Shri in 2016 - Haldhar Nag

Haldhar Nag, whose name has never been preceded by Shri, 3 pairs of clothes, a broken rubber slipper, a pair of spectacles without springs and a deposit of Rs. 732/-.

मात्र तीसरी पास, पद्म श्री हलधर नाग की कोसली कविताएँ बनी पीएचडी अनुसंधान का विषय

These are the Haldhar Nag of Odisha.

Haldhar Nag, born 31 March 1950, is a poet and writer from the Sambalpuri language of Orissa. He is popularly known as "Lokkavi Ratna". The special thing about him is that he has memorized all his poems and 20 epics. A compilation of his writings "Haldhar Granthavali-2" will be made part of the curriculum at Sambhalpur University. Wearing plain clothes, white dhoti, gamchha and vest, the snakes remain barefoot. When you learn about the Oriya folk-poet Haldhar Nag, you will be filled with inspiration.

Haldhar was born in 1950 in a poor family in Bargarh, Odisha. Haldhar's struggle began with the death of his father when he was 10 years old. Then he was forced to leave school after the third grade. Due to the very poor condition of the house, the dishes had to be washed in the sweet shop. Two years later, the village sarpanch appointed Haldhar to cook at a nearby school, where he worked for 16 years. When he realized that too many schools were opening in his village, he approached a bank and took a loan of Rs 1000 to start a small shop for stationery and food for school children. This shop was in front of the school, where he used to sit during the holidays.

After some time Haldhar Nag started narrating to the people by writing on some religious themes like "Ram-Shabri" in the local Oriya language. He wrote poems full of emotion, which in the early stages were forcibly presented among the people by the serpents. Gradually his popularity started increasing.

In 1990, Haldhar wrote the first poem called "Dhodho Bargazi" (meaning: 'Old Banyan') which was published by a local magazine and thereafter all Haldhar's poems continued to find place in the magazine and they were also from nearby villages. They were called to recite poetry. People liked Haldhar's poems so much that they started calling him "Lok Kaviratna".

Researchers doing PhD on Haldhar Nag

Now his popularity had increased so much that in 2016, Haldhar Nag was awarded Padma Shri by the President of India for literature. Not only this, now 5 researchers are doing PHd on the literature of Haldhar Nag, while Haldhar himself has studied only till the third standard. On conferring Padmashree on Haldhar Nag and doing PhD on him, it has been said that

 "You choose nature in books,
Padmashree has chosen books from nature.

In 2021, a post went viral on social media "Sahib - till Delhi aane ke paisa nahi hai, please send the award by post."

A wrong post had gone viral in the internet media about Dr. Haldhar Nag. Expressing strong displeasure over this post, Nag had said that the post made in his name is completely false and concocted. Very sad and hurt by such post. The viral post states that Haldhar Nag has no money to go to Delhi to receive the Padma Shri award and in this regard, Nag has written a letter to the government requesting that his award be sent by post.


Nag said that this false information has been made viral in a mischievous manner. The truth is that he got the Padma Shri award in 2016 and not this year. Even in 2016, when he was called to Delhi to receive the Padma Shri award, he did not write any letter to the government citing his poverty, nor did he talk about sending the Padma Shri award by post. Folk poet Dr. Haldhar Nag said that even before the Padma Shri award, Odisha Chief Minister Naveen Patnaik was giving him artist allowance. The Odisha government has also given them land to live on, on which a doctor from Bargarh has also built a house at his own expense. At present, they also get a monthly allowance of Rs 18,000 from the government.

कुछ अनमोल रिश्ते

कुछ अनमोल रिश्ते

प्रत्येक इंसान जन्म से ही कुछ रिश्तों की डोर में बंध जाता है। हर व्यक्ति के पास रिश्तों की एक मनमोहक बॉन्डिंग होती है। मनुष्य के भीतर की भावनाएं रिश्तों को और अधिक सुदृढ बनाती हैं। हमारे आपके सब के जीवन में कुछ ऐसे रिश्ते भी होते हैं, जिनका न ही कोई नाम होता है और न ही कभी इनका मूल्य चुकाया जा सकता है। यही रिश्ते अनमोल होते हैं। ये रिश्ते मन की भावनाओं से जुड़ते हैं। ऐसी भावनाएं (feelings) जिन्हें चंद शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। 
कुछ अनमोल रिश्ते
स्वाभाविक तौर पर कुछ रिश्ते हमारे जन्म के साथ ही हमसे जुड़ जाते हैं। माता-पिता, भाई- बहन वाले ब्लड रिलेशंस अथवा चाचा, ताऊ, मामा, मौसी वाले धीर गंभीर रिश्ते। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो कुछ समय बाद में बनते हैं।
परंतु इन सबसे कुछ अलग हटकर अनमोल रिश्ता भी होता है, जिसकी पहली शर्त है निःस्वार्थ प्रेम। तथाकथित चकाचौंध भरी जिंदगी के मोह में आजकल रिश्ते भी बहुत बेमाने से हो गए हैं। हमारे खून के रिश्तों में भी स्वार्थ शामिल हो गया है। कदाचित आजकल इसी वजह से रिश्तो में दूरियां पैदा हो रही हैं। कभी-कभी कुछ रिश्ते जिन्हें हम शिद्दत से चाहते हैं, स्वार्थ और ईर्ष्या की आंधी में उनकी भी बुनियाद दरक जाती है। कुछ रिश्ते जिनके बारे में कभी सोचा नहीं होता, वह जुड़ जाते हैं। रिश्तों का यह जुड़ाव दिल से दिल तक की आवृत्ति (frequency) मिलने पर होता है और आवृत्तियों को मिलाना नहीं पड़ता बस मिल जाती हैं। कभी-कभी यह प्रेम, अपनापन, लगाव कोई भी नाम दीजिये, किसी ऐसे इंसान से हो जाता है, जिससे हम बिल्कुल अनभिज्ञ होते हैं। कुछ दिनों का साथ होता है और वह हमेशा के लिए जुड़ जाता है। यही रिश्ते शायद अनमोल होते हैं।
रिश्तों को हमेशा सहेज कर रखिये क्योंकि इनका एहसास मात्र ही जिंदगी की वास्तविक खुशी है।

तोता: रबिंद्रनाथ टैगोर की कहानी

Rabindranath Tagore 

आज रविन्द्र नाथ टैगोर की एक कहानी पढ़ी "तोता", दिल को छू गई। आप सभी के साथ शेयर कर रही हूं। कहानी कैसी लगी, अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा...


एक था तोता 

एक था तोता। वह बड़ा मूर्ख था। गाता तो था, पर शास्त्र नहीं पढ़ता था। उछलता था, फुदकता था, उड़ता था, पर यह नहीं जानता था कि क़ायदा-क़ानून किसे कहते हैं?

तोता: रबिंद्रनाथ टैगोर की कहानी

राजा बोले, “ऐसा तोता किस काम का? इससे लाभ तो कोई नहीं, हानि ज़रूर है। जंगल के फल खा जाता है, जिससे राजा-मंडी के फल-बाज़ार में टोटा पड़ जाता है।”

मंत्री को बुलाकर कहा, “इस तोते को शिक्षा दो।”

तोते को शिक्षा देने का काम राजा के भांजे को मिला।

पंडितों की बैठक हुई। विषय था, “उक्त जीव की अविद्या का कारण क्या है?” बड़ा गहरा विचार हुआ।

सिद्धान्त ठहरा: तोता अपना घोंसला साधारण खर-पात से बनाता है। ऐसे आवास में विद्या नहीं आती। इसलिए सबसे पहले तो यह आवश्यक है कि इसके लिए कोई बढ़िया-सा पिंजरा बना दिया जाए।

राज-पंडितों को दक्षिणा मिली और वे प्रसन्न होकर अपने-अपने घर गए।

सुनार बुलाया गया। वह सोने का पिंजरा तैयार करने में जुट पड़ा। पिंजरा ऐसा अनोखा बना कि उसे देखने के लिए देश-विदेश के लोग टूट पडे। कोई कहता, “शिक्षा की तो इति हो गयी।” कोई कहता, “शिक्षा न भी हो तो क्या, पिंजरा तो बना। इस तोते का भी क्या नसीब है?”

सुनार को थैलियां भर-भरकर इनाम मिला। वह उसी घड़ी अपने घर की ओर रवाना हो गया।

पंडितजी तोते को विद्या पढ़ाने बैठे। नस लेकर बोले, “यह काम थोड़ी पोथियों का नहीं है।”

राजा के भांजे ने सुना। उन्होंने उसी समय पोथी लिखनेवालों को बुलवाया। पोथियों की नक़ल होने लगी। नक़लों के और नक़लों की नक़लों के पहाड़ लग गए। जिसने भी देखा, उसने यही कहा कि, “शाबाश! इतनी विद्या के धरने को जगह भी नहीं रहेगी।”

नक़लनवीसों को लद्दू बैलों पर लाद-लादकर इनाम दिए गए। वे अपने-अपने घर की ओर दौड़ पड़े। उनकी दुनिया में तंगी का नाम-निशान भी बाक़ी न रहा।

दामी पिंजरे की देख-रेख में राजा के भांजे बहुत व्यस्त रहने लगे। इतने व्यस्त कि व्यस्तता की कोई सीमा न रही। मरम्मत के काम भी लगे ही रहते। फिर झाडू-पोंछ और पालिश की धूम भी मची ही रहती थी। जो ही देखता, यही कहता कि “उन्नति हो रही है।”

इन कामों पर अनेक-अनेक लोग लगाये गये और उनके कामों की देख-रेख करने पर और भी अनेक-अनेक लोग लगे। सब महीने-महीने मोटे-मोटे वेतन ले-लेकर बड़े-बड़े सन्दूक भरने लगे ।

वे और उनके चचेरे-ममेरे-मौसेरे भाई-बंद बड़े प्रसन्न हुए और बड़े-बड़े कोठों-बालाखानों में मोटे-मोटे गद्दे बिछाकर बैठ गये। 

संसार में और-और अभाव तो अनेक हैं, पर निन्दकों की कोई कमी नहीं है। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं। वे बोले, “पिंजरे की तो उन्नति हो रही है, पर तोते की खोज़-ख़बर लेने वाला कोई नहीं है। 

बात राजा के कानों में पड़ी। उन्होंने भांजे को बुलाया और कहा, “क्यों भानजे साहब, यह कैसी बात सुनाई पड़ रही है? ”

भांजे ने कहा, “महाराज, अगर सच-सच बात सुनना चाहते हों तो सुनारों को बुलाइये, पण्डितों को बुलाइये, नक़लनवीसों को बुलाइये, मरम्मत करनेवालों को और मरम्मत की देखभाल करने वालों को बुलाइये। निन्दकों को हलवे में हिस्सा नहीं मिलता, इसलिए वे ऐसी ओछी बात करते हैं। 

जवाब सुनकर राजा नें पूरे मामले को भली-भांति और साफ़-साफ़ तौर से समझ लिया। भांजे के गले में तत्काल सोने के हार पहनाये गये। 

राजा का मन हुआ कि एक बार चलकर अपनी आंखों से यह देखें कि शिक्षा कैसे धूमधड़ाके से और कैसी बगटुट तेज़ी के साथ चल रही है। सो, एक दिन वह अपने मुसाहबों, मुंहलगों, मित्रों और मन्त्रियों के साथ आप ही शिक्षा-शाला में आ धमके। 

उनके पहुंचते ही ड्योढ़ी के पास शंख, घड़ियाल, ढोल, तासे, खुरदक, नगाड़े, तुरहियां, भेरियां, दमामें, कांसे, बांसुरिया, झाल, करताल, मृदंग, जगझम्प आदि-आदि आप ही आप बज उठे। 

पंडित गले फाड़-फाड़कर और बूटियां फड़का-फड़काकर मन्त्र-पाठ करने लगे। मिस्त्री, मजदूर, सुनार, नक़लनवीस, देख-भाल करने वाले और उन सभी के ममेरे, फुफेरे, चचेरे, मौसेरे भाई जय-जयकार करने लगे।

भांजा बोला, “महाराज, देख रहे हैं न?”

महाराज ने कहा, “आश्चर्य! शब्द तो कोई कम नहीं हो रहा।

भांजा बोला, “शब्द ही क्यों, इसके पीछे अर्थ भी कोई कम नहीं।”

राजा प्रसन्न होकर लौट पड़े। ड्योड़ी को पार करके हाथी पर सवार होने ही वाले थे कि पास के झुरमुट में छिपा बैठा निन्दक बोल उठा, “महाराज आपने तोते को देखा भी है?”

राजा चौंके. बोले, ”अरे हां! यह तो मैं बिल्कुल भूल ही गया था! तोते को तो देखा ही नहीं। ”

लौटकर पंडित से बोले, “मुझे यह देखना है कि तोते को तुम पढ़ाते किस ढंग से हो।”

पढ़ाने का ढंग उन्हें दिखाया गया। देखकर उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। पढ़ाने का ढंग तोते की तुलना में इतना बड़ा था कि तोता दिखाई ही नहीं पड़ता था। राजा ने सोचा: अब तोते को देखने की ज़रूरत ही क्या है? उसे देखे बिना भी काम चल सकता है। राजा ने इतना तो अच्छी तरह समझ लिया कि बंदोबस्त में कहीं कोई भूल-चूक नहीं है। पिंजरे में दाना-पानी तो नहीं था, थी सिर्फ़ शिक्षा। यानी ढेर की ढेर पोथियों के ढेर के ढेर पन्ने फाड़-फाड़कर क़लम की नोंक से तोते के मुंह में घुसेड़े जाते थे। गाना तो बन्द हो ही गया था, चिखने-चिल्लाने के लिए भी कोई गुंजायश नहीं छोड़ी गयी थी। तोते का मुंह ठसाठस भरकर बिल्कुल बन्द हो गया था। देखनेवाले के रोंगटे खड़े हो जाते।

अब दुबारा जब राजा हाथी पर चढ़ने लगे तो उन्होंने कान-उमेठू सरदार को ताकीद कर दी कि “निन्दक के कान अच्छी तरह उमेठ देना।”

तोता दिन पर दिन भद्र रीति के अनुसार अधमरा होता गया। अभिभावकों ने समझा कि प्रगति काफ़ी आशाजनक हो रही है। फिर भी पक्षी-स्वभाव के एक स्वाभाविक दोष से तोते का पिंड अब भी छूट नहीं पाया था। सुबह होते ही वह उजाले की ओर टुकुर-टुकुर निहारने लगता था और बड़ी ही अन्याय-भरी रीति से अपने डैने फड़फड़ाने लगता था। इतना ही नहीं, किसी-किसी दिन तो ऐसा भी देखा गया कि वह अपनी रोगी चोंचों से पिंजरे की सलाखें काटने में जुटा हुआ है।

कोतवाल गरजा, “यह कैसी बेअदबी है।”

फ़ौरन लुहार हाजिर हुआ. आग, भाथी और हथौड़ा लेकर।

वह धम्माधम्म लोहा-पिटाई हुई कि कुछ न पूछिये। लोहे की सांकल तैयार की गई और तोते के डैने भी काट दिये गए।

राजा के सम्बन्धियों ने हांड़ी-जैसे मुंह लटका कर और सिर हिलाकर कहा, “इस राज्य के पक्षी सिर्फ़ बेवकूफ़ ही नहीं, नमक-हराम भी हैं।”

और तब, पण्डितों ने एक हाथ में क़लम और दूसरे हाथ मे बरछा ले-लेकर वह कांड रचाया, जिसे शिक्षा कहते हैं।

लुहार की लुहसार बेहद फैल गयी और लुहारिन के अंगों पर सोने के गहने शोभने लगे और कोतवाल की चतुराई देखकर राजा ने उसे सिरोपा अता किया।

तोता मर गया। कब मरा, इसका निश्चय कोई भी नहीं कर सकता।

कमबख़्त निन्दक ने अफ़वाह फैलायी कि “तोता मर गया।”

राजा ने भांजे को बुलवाया और कहा, “भानजे साहब यह कैसी बात सुनी जा रही है? ”

भांजे ने कहा, “महाराज, तोते की शिक्षा पूरी हो गई है।”

राजा ने पूछा, “अब भी वह उछलता-फुदकता है? ”

भांजा बोला, अजी, राम कहिये। ”

“अब भी उड़ता है?”

“ना:, क़तई नहीं।”

“अब भी गाता है?”

“नहीं तो। ”

“दाना न मिलने पर अब भी चिल्लाता है?”

“ना।

राजा ने कहा, “एक बार तोते को लाना तो सही, देखूंगा ज़रा।

तोता लाया गया। साथ में कोतवाल आये, प्यादे आये, घुड़सवार आये।

राजा ने तोते को चुटकी से दबाया। तोते ने न हां की, न हूं की। हां, उसके पेट में पोथियों के सूखे पत्ते खड़खड़ाने ज़रूर लगे।

तोता: रबिंद्रनाथ टैगोर की कहानी

समय बैंक || टाइम बैंक || Time Bank ||

समय बैंक (Time Bank)

कहीं आप "टाइम बैंक (Time Bank)" के बारे में पहली बार तो नहीं सुन रहे हैं? अगर हां, तो आइए हम आपको इससे अवगत कराते हैं। 

समय बैंक || टाइम बैंक || Time Bank ||

क्या है "टाइम बैंक योजना" ?

"टाइम बैंक योजना" एक Barter System (वस्तु विनिमय प्रणाली) है, जो लोगों को उनकी क्षमताओं और जरूरतों के आधार पर अपना समय "जमा" करने और "वापस" लेने की अनुमति देता है। 

"टाइम बैंक योजना" में हम अपनी इच्छानुसार कोई स्वैच्छिक सेवा देंगे और उसके बदले हमारे खाते में उतने ही घंटे जमा कर दिए जाएंगे, जिनका लाभ हम ऐसी ही किसी सेवा के लिए कभी भी ले सकेंगे। कोई शख्स किसी जरूरतमंद की जितनी मदद करेगा उतने घंटे उसके खाते में जमा कर दिए जाएंगे। जब उसी शख्स को कभी मदद की जरूरत होगी तो इन्हीं जमा घंटों की मदद से टाइम बैंक नेटवर्क में वह किसी की मदद ले सकेगा।

समय बैंक || टाइम बैंक || Time Bank ||

स्विट्जरलैंड ने यह नई पहल की है : बुजुर्गों को ध्यान में रखकर "टाइम बैंक योजना" शुरू, वॉलंटियर्स के तौर पर युवा जुड़ रहे

अपना वक्त किसी की मदद में लगाइए, ये टाइम बैंक में जमा  रहेगा, भविष्य में जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल कर सकेंगे।

सबसे पहले यह योजना स्विट्जरलैंड में शुरू की गई है। अब स्विट्जरलैंड के अलावा ब्रिटेन में टाइम बैंक योजना को अपनाया है। साथ ही सिंगापुर भी इस योजना पर विचार कर रहा है। 2018 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक पैनल ने भारत को भी टाइम बैंक योजना अपनाने के लिए सिफारिश की थी।

"टाइम बैंक योजना" कैसे काम करता है ?

टाइम बैंकिंग की अवधारणा बहुत सीधी है। इसमें एक व्यक्ति या संस्था दूसरे व्यक्ति या संस्था को समय-आधारित सेवा देता है। इस सेवा में आईटी सेवाएं, परामर्श, बच्चों की देखभाल, बागवानी, निर्माण, शिक्षण या कोई अन्य समय देने वाली सेवाएं शामिल हो सकती हैं। सेवा प्रदान करने में लगे समय को ट्रैक करने के लिए टाइम बैंक का उपयोग किया जाता है। जब समय-आधारित यूनिट टाइम बैंक में जमा होती हैं, तो उनका उपयोग अन्य लोगों से समय-आधारित सेवाएं खरीदने के लिए किया जा सकता है। 

किन किन देशों ने "टाइम बैंक योजना" को अपनाया 

भारत में मध्य प्रदेश में है "टाइम बैंक"

इस योजना की पूरी दुनिया में सराहना हो रही है। यही वजह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, न्यूजीलैंड, स्पेन और ग्रीस जैसे देश भी इस योजना को अपना चुके हैं। बताया जा रहा है कि सिंगापुर भी इसे जल्द लागू करने पर विचार कर रहा है। वहीं अगर हम भारत की बात करें तो, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की समिति ने साल 2018 में इस योजना को अपने देश में लागू करने की सिफारिश की थी। इसके बाद इस समिति के सुझावों के आधार पर ही साल 2019 में मध्य प्रदेश, टाइम बैंक खोलने वाला भारत का पहला राज्य बना। 

समय बैंक || टाइम बैंक || Time Bank ||

स्विट्जरलैंड के इस पहल के बारे में, स्विट्जरलैंड में पढ़ने वाली एक छात्रा ने बताया है -

स्विट्जरलैंड में पढ़ाई के दौरान, मैंने अपने स्कूल के पास एक मकान किराए पर लिया था। मकान मालकिन क्रिस्टीना एक 67 वर्षीय एकलौती बूढ़ी महिला थी, जो सेवानिवृत्त होने से पहले एक माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में काम कर चुकी थी। स्विट्जरलैंड की पेंशन बहुत अच्छी है, उसे बाद के वर्षों में भोजन और आश्रय के बारे में चिंता नहीं करने के लिए पर्याप्त है। एक दिन मुझे पता चला कि उसने एक 87 वर्षीय एकल बूढ़े व्यक्ति की देखभाल करने का काम पाया है। मैंने उस महिला से पूछा कि क्या वह पैसे के लिए काम कर रही है। उसके जवाब ने मुझे चौंका दिया: "मैं पैसे के लिए काम नहीं कर रही, बल्कि मैं अपना समय 'समय बैंक' में रख रही हूँ, और जब मैं अपने बुढ़ापे में चल नहीं सकूंगी, तो मैं इसे वापस ले सकती हूँ।"

पहली बार जब मैंने "समय बैंक" की इस अवधारणा के बारे में सुना, तो मैं बहुत उत्सुक हुआ और मकान मालकिन से और पूछा। "समय बैंक" की अवधारणा स्विस फेडरल सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित एक वृद्धावस्था पेंशन कार्यक्रम है। लोगों ने बुजुर्गों की देखभाल करने के लिए 'समय' बचा लिया और जब वे बूढ़े हो गए, या बीमार या आवश्यक देखभाल के लिए जब जरुरत हुई वे इसे वापस ले सकते हैं। आवेदक स्वस्थ होना चाहिए, संवाद करने में अच्छा और प्यार से भरा होना चाहिए। रोज उन्हें बुजुर्गों की देखभाल करनी होती है, जिन्हें मदद की ज़रूरत होती है। उनके सेवा घंटों को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के व्यक्तिगत 'समय' खातों में जमा किया जाता है। वह सप्ताह में दो बार काम पर जाती थीं, हर बार दो घंटे बिताती थीं, बुजुर्गों की मदद करती थीं, खरीदारी करती थीं, उनके कमरे की सफाई करती थीं, उन्हें धूप सेंकने के लिए ले जाती थीं, उनसे बातें करती थीं।

समय बैंक || टाइम बैंक || Time Bank ||

नियमानुसार सेवा के एक वर्ष के बाद, "समय बैंक" सेवा देने वाले व्यक्ति के काम के घंटे की गणना करता है और उसे एक "समय बैंक कार्ड" जारी करता है। जब उसे अपनी देखभाल करने के लिए किसी की आवश्यकता होती है, तो वह "समय और ब्याज" को वापस लेने के लिए अपने "समय बैंक कार्ड" का उपयोग कर सकती है। सूचना सत्यापन के बाद, "समय बैंक" अस्पताल या उसके घर पर उसकी देखभाल करने के लिए स्वयंसेवकों को नियुक्त करता है।

एक दिन, मैं स्कूल में था और मकान मालकिन ने फोन किया और कहा कि वह खिड़की से पोंछा लगा रही थी और वह स्टूल से गिर गई। मैंने जल्दी से छुट्टी ली और उसे इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया। मकान मालकिन का टखना टूट गया था और उसे थोड़ी देर बिस्तर पर रहने की जरूरत पड़ी। जब मैं उसकी देखभाल के लिए अपने स्कूल से छुट्टी के लिए आवेदन करने की तैयारी कर रही था , तो मकान मालकिन ने मुझसे कहा कि मुझे उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसने पहले ही "समय बैंक" को एक निकासी अनुरोध प्रस्तुत कर दिया है। दो घंटे से भी कम समय में "समय बैंक" ने एक नर्सिंग कर्मी को मकान मालकिन की देखभाल के लिए भेज दिया।

अगले एक महीने तक, देखभाल नर्सिंग कर्मी ने मकान मालकिन की रोज़ देखभाल की, उसके साथ बातचीत की और उसके लिए स्वादिष्ट भोजन बनाया। देखभालकर्ता की सावधानीपूर्वक देखभाल के तहत, मकान मालकिन ने जल्द ही अपना स्वास्थ्य ठीक कर लिया। ठीक होने के बाद, मकान मालकिन "काम" पर वापस चली गई। उसने कहा कि वह "समय बैंक" में अधिक समय बचाने का इरादा रखती है, क्योंकि वह अभी भी स्वस्थ है।

आज, स्विट्जरलैंड में, बुढ़ापे का समर्थन करने के लिए "समय बैंकों" का उपयोग एक आम बात बन गई है। यह न केवल देश के पेंशन खर्च को बचाता है, बल्कि अन्य सामाजिक समस्याओं को भी हल करता है। कई स्विस नागरिक इस तरह के वृद्धावस्था पेंशन के बहुत समर्थक हैं।

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स्विस पेंशन संगठन द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि स्विस के आधे से अधिक लोग भी इस प्रकार की वृद्धावस्था देखभाल सेवा में भाग लेना चाहते हैं। स्विस सरकार ने "समय बैंक" पेंशन योजना का समर्थन करने के लिए कानून भी पारित किया। वर्तमान में एशियाई देशों में "घरों में अकेले रहने वाले बूढ़े लोगों" की संख्या बढ़ रही है और यह धीरे-धीरे एक सामाजिक समस्या बन गई है। स्विट्जरलैंड शैली "समय बैंक" पेंशन हमारे लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

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