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कुछ पल...

 कुछ पल...

Rupa Oos ki ek Boond

"ख़त्म होती मेरी सज़ा ही नहीं,
जबकि मेरी कोई ख़ता भी नहीं..❣️"

जीवन से विदा लेना, एक अटल सत्य 

उसमें जो खोया, वो हमारे वश में नहीं था।


मगर हमने खोया... 

वह वक्त जो हमें मिला था, 

प्रेम करने के लिये, प्रेम पाने के लिये। 

खूबसूरत एहसासों को जीने के लिये, 

जी भर कर मुस्कुराने के लिये।


हम नहीं सुन सके वह गीत, 

जो झरनों ने गाया, बस हमारे लिये, 

शोर-शराबों के उत्सव होते ही रहे 

छत पर रोज राह तकता रहा 

चाँद तारों का शामियाना।


फूलों की पंखुड़ियाँ, चटक कर खिली 

फिर उदास हो झर गई आंगन में। 

इंतज़ार करती रही एक कविता 

काग़ज़ों के बोझ तले, 

कि इक दिन तुम उसे जरुर गुनगुनाओगे।


मगर.. वक्त फिसलता रहा 

हाथों से रेत की मानिन्द

हमने खोया.... 

किसी का विश्वास, 

किसी का निश्छल प्रेम, 

दुआएं पाने के पल, बस बनाते रहे, 

कुछ आभासी शीशमहल।


आ जाओ ना!

सब कुछ खो जाने से पहले, 

थोड़ा-सा ही सही, 

कुछ पा लें जो हमारे वश में है...

Rupa Oos ki ek Boond

"लम्हों की खताएं,
लफ्जों में क्या बताएं..❣️"

कविता

 कविता

Rupa Oos ki ek Boond

"अगर कभी टकराते होगें मेरे अल्फाज तुम्हारे दिल से..
जरा सोंचो तो क्या बितती होगी मुझ पर..❣️"

कविता उतरती हैं

सफ़ेद कोरे कागज पर 

अपने पूरे भाव 

श्रृंगार के साथ

शब्दों में पिरो कर

अपनी आत्मा को

 कवि उकेरता हैं

एक किस्सा 

निचोड़ा है उसने एक एक शब्द

अपने अनुभव की धूप से 

तब कहीं जाकर रचता है

एक अद्भुत कलजयी रचना

सम्मोहित होता

 अपनी रचना पर स्वयं

जन्मदाता होता है ज्यों

अपनी अनुकृति पर 

प्रणाम हैं हर कवि की कल्पना को ||

Rupa Oos ki ek Boond

"कभी यूँ भी तो हो,
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें,
जब पास से तुम्हारे गुज़रें,
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
और मुझ तक ले आयें..❣️"

मौसम का मिज़ाज़

मौसम का मिज़ाज़

Rupa Oos ki ek Boond
"सब कुछ नहीं मिलता जिंदगी में...
 कुछ चीज मुस्कुरा कर छोड़ देनी चाहिए....❣️"

मौसम का मिज़ाज़

ठंडी हवाएं मन गुनगुनाता है

कहता है यह ढूंढे चलो नए रास्ते

मौसम का अजीब सा फलसबा है

ओस में डुबा सारा ज़माना है

कहां से आये है मेहमा नये

पंछियों का आज कल यह नया ठिकाना है

आग की आच पर तप रहे बदन,

चादर ओढ़े घूम रहे लोग

चाय की प्यले के साथ दिन भर गुज़रता है

पानी की बोतल वैसी भरी नज़र आती हैं

फिर बदलेगा ये मौसम का मिजाज 

सूरज की किरणों से 

तपेगी धरती 

ऐसी ही चलती रहेगी ज़िन्दगी

मैं एक पुरूष हूं

मैं एक पुरूष हूं

मैं एक पुरूष हूं
"इतना सब्र करना सीख जाओ कि, 
       अब कुछ बुरा भी हो तो बुरा ना लगे...❣️"

मैं पुरुष हूं

इसलिए कठोर हृदय हूं 

 मुझे कोमलता से क्या सरोकार 

आंसुओं को जब्त कर लेता हूं

पर आत्मा तो एक है 

वो कहां मानती है भेदभाव 

जन्मों से उसका आवागमन है 

कभी पुरुष तो कभी स्त्री का 

 वेश धारण किया है उसने 

पुरुष की कठोरता है उसमें 

तो स्त्री की कोमलता भी है 

मुझे (पुरुष) भी दर्द होता है 

स्त्री के प्रेम में पड़ा हुआ पुरूष 

चाहता है थोड़ा सा प्रेम 

उसके आंचल की छांव में 

आंसुओं से भीगना चाहता है

अपने कठोर हृदय के आवरण को उतारना चाहता है 

पिघलना चाहता है उसके प्रेम में 

थक कर उसकी गोद का आसरा खोजता है 

वह उससे कहना चाहता है 

हां मैं हूं एक.....

पिता पति पुत्र भाई और दोस्त ‌

पर एक कोमल हृदय आत्मा भी हूं 

मैं चाहता हूं स्पर्श तुम्हारे हाथों का 

मान अभिमान‌ कठोर होने का दिखावा 

सब उतार फेंकना चाहता हूं 

मैं चाहता हूं तुम्हारे प्रेम की तपिश 

थोड़ा सा तुम्हारे प्रेम में दुलार

दुनिया के मापदंडों से मैं थक गया हूं 

मैं खुलकर रोना चाहता हूं 

तुम अपने कोमल हाथों को 

मेरे सिर पर रखना 

और कहना कि मैं हुं 

अधिकार देना मुझे टूट कर बिखरने की 

आश्वासन और विश्वास देना 

समेट कर मुझे संबल प्रदान करोगी

हां मैं पुरुष हूं 

पर मैं एक कोमल हृदय भी हूं ।

हलधर

हलधर

हलधर नाग


जनता का जो पेट है भरता 

तिल-तिल कर वो ही मरता 

क्या शासन अब तक चेता है 

ये रोज़ आंकड़ा क्यूँ बढ़ता।


किससे अपना करे मलाल 

मण्डी में हैं खड़े दलाल 

उनकी रोज़ तिजोरी भरती 

बोझ कर्ज़ का नित बढ़ता 

क्या शासन अब तक चेता है।


कभी बाढ़ खेती को खाये 

सूखा कभी नींद उड़ाये 

ओले खड़ी फसल बिछाते 

नैनो से झरना झरता 

क्या शासन अब तक चेता है।


पीठ-पेट दोनों मिले हुये 

गुरबत में लब सिले हुये 

बेटी ब्याहे की फीस चुकाये 

यही सोच तिल-तिल मरता 

क्या शासन अब तक चेता है।


खाद बीज सब सरकारी 

लगा लाइन में वो भारी 

बनी किश्त की लाचारी

यही सोच मन में डरता 

क्या शासन अब तक चेता है।


सूख रही फूलों की डाली 

कहने को धरती का माली 

खीसा-हाथ दोनों ही खाली 

रोज़ बरफ सा वो गलता 

क्या शासन अब तक चेता है।


हाथों की हैं घिसी लकीरें 

माथे पर हैं पड़ी लकीरें 

रात-दिन उलझन में उलझा 

फिर एक फैसला वो करता 

क्या शासन अब तक चेता है 

ये रोज़ आंकड़ा क्यूँ बढ़ता।

ठहराव से भरी हुई परिपक्व स्त्री

ठहराव से भरी हुई परिपक्व स्त्री

Rupa Oos ki ek Boond

"अजीब से सिलसिले हैं तेरे मेरे दरमियान 
फासले भी बहुत हैं और महोब्बत भी बेपनाह...❣️"

ठहराव से भरी हुई परिपक्व स्त्री 

चुंबक सा सम्मोहित करती है 

चेहरे पर उकेरती है 

 उसका बीता जीवन 

अपने गर्भ में छुपाती है 

जीवन के अनेक रहस्य 

जंगल सी धारण करती हैं 

हर एक रूप और रंग की बातें 

जो जिया है उसने अपने इतिहास में 

बच्चों के प्रेम से भरी हुई आंखें उसकी 

थोड़ी थोड़ी सी बैरागी आंखें उसकी 

देह में उभरती गहरी और मोटी लकीरें 

बयां करती हैं उसके अनुभव को 

अनगिनत कविताएं रच रखी है उसने अपने मन में 

जिसकी सुगंध रिसती है कस्तूरी कुंडल सदृश 

सराबोर करती है अपने आसपास के वातावरण को 

यह सभी रहस्य की बातें 

जानता है वह पथिक 

जिसने जुटा कर साहस 

खोला है उसके मन की परतों को 

हृदय पवित्र किया है 

अपने आध्यात्मिक ज्ञान से 

सु....नीति से भरी हुई ऐसी स्त्री

प्रेम बैराग और वात्सल्य का प्रमाण है।

Rupa Oos ki ek Boond.

"शिद्दत से निभाइए अपने किरदार को,
कहानी तो एक दिन सबको होना है .....❤️❤️"

प्यार शब्दों का मोहताज होता नहीं

प्यार शब्दों का मोहताज होता नहीं

Rupa Oos ki ek Boond
"एक लम्हे में सिमट आया है सदियों का सफ़र, 
ज़िंदगी तेज़ बहुत तेज़ चली हो जैसे... ❣️❣️"

प्यार शब्दों का मोहताज होता नहीं,

इसका लफ़्ज़ों से आग़ाज़ होता नहीं..


दोस्त सच्चा उसे ही समझना सदा,

भूलकर भी जो नाराज़ होता नहीं..


बात सारे जहाँ में ये सब जानते,

जो दग़ा दे वो हमराज़ होता नहीं..


इस जहाँ में मुहब्बत के दो लफ़्ज़ से,

प्यारा कोई भी अल्फ़ाज़ होता नहीं..


आसमां पे न ख़ुर्शीद जबतक दिखे,

दिन निकलने का आग़ाज़ होता नहीं..


आजकल की मोहब्बत में जाने ख़ुदा,

क्यूँ वो पहले सा अन्दाज़ होता नहीं..


छिपाते न उल्फ़त को "आशिक़" कभी,

ज़ब्त हमसे कोई राज़ होता नहीं..

Rupa Oos ki ek Boond
"हर रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़े हैं ,
ऐ जिंदगी देख मेरे हौसले तुझ से भी बड़े है....❣️❣️"

मौसम बदल गया..

मौसम बदल गया..


Rupa Oos ki ek Boond
"गुज़र जाते हैं खूबसूरत लम्हें यूं ही मुसाफिरों की तरह 
यादें वहीं खडी रह जाती हैं रूके रास्तों की तरह...❣️❣️"

संवेदना की आंच से पत्थर पिघल गया,

यूँ देखते ही देखते मौसम बदल गया..

हर शै गुलाम वक्त का है देखो तो जरा,

सूरज को शाम ढ़लते समन्दर निगल गया..


सुनिये तो जरा आप मेरी बात गौर से,

कहते नहीं हैं दर्द कभी अपना और से..

देखा है हमने तंग दस्ती भूख शिद्दतें-

गुज़रे हुए हैं हम भी मुफ़लिसी के दौर से..


मन खोखला है जिसमें प्रेम तत्व नहीं है,

संबंध व्यर्थ है अगर अपनत्व नहीं है..

पर्दा पड़ा है आंख में बस अर्थ मूल है-

रिश्ते तो हैं जिंदगी में, पर अब महत्व नहीं है..


Rupa Oos ki ek Boond
"ऐ जिंदगी तेरी नाराजगी से क्या होगा
मुस्कुराहट मेरी आदतों में शामिल हैं ....❣️❣️"

इसी बारिश में

इसी बारिश में

Rupa Oos ki ek Boond

"इस नदी का है कोई तीर नहीं,
ख़त्म हो जाये वो जागीर नहीं.. 
दौलते-दर्द से भरा दिल है-
मेरे जैसा कोई अमीर नहीं..❣️"

कल हम भी

बारिश में छपाके

लगाया करते थे...

आज इसी बारिश में

कीटाणु देखना सीख गये!!


कल बेफिक्र थे कि

माँ क्या कहेगी

आज बारिश से

मोबाइल बचाना सीख गये!!


कल कहा करते थे कि

बरसे बेहिसाब

तो छुट्टी हो जाए...

अब डरते हैं कि रुके ये बारिश

कहीं दफ़्तर ना छूट जाये!!


किसने कहा कि

नहीं आती वो

बचपन वाली बारिश...

हम ख़ुद अब काग़ज़ की

नाव बनाना भूल गए!!


बारिश तो अब भी बारिश ही है

बस हम अपना ज़माना भूल गये...

Rupa Oos ki ek Boond

"बांध ले मन को ऐसी कोई जंजीर नहीं,
तेरे सिवा मेरे दिल में कोई तश्वीर नहीं..
छटपटाता न हो मुहब्बत में-
कौन सा दिल है जिसमें पीर नहीं..❣️"

"मेरी अन्तिम अभिलाषा"

 "मेरी अन्तिम अभिलाषा"

Rupa Oos ki ek Boond
"प्रेम का अर्थ राधा से पूछो...
रुक्मिणी से पुछोगे तो 
अधिकार बताएगी.. 
जहर का स्वाद शिव से पूछो...
मीरा से पूछोगे तो अमृत ही 
बताएगी.....❣️"

मैं जीवन के अन्तिम पल तक

नतमस्तक हूं तुम्हारे लिए

मैं प्रेम की रीत निभाऊंगी,

बस मन से तुम मेरे रहना..

नियति ने बेशक हमें दूर किया,

पर सांसें सब तुम्हारी हैं,

मेरी अंतिम अभिलाषा,  

मेरा विश्रामगृह तुम्हारी बाहें..

मेरी आखरी तपिश तुम्हारा स्पर्श..

मेरे पुण्य की कमाई तुम..

मेरा बैकुंठ धाम तुम्हारा आलिंगन,

मस्तक का तिलक अधर तुम्हारे,

निर्मल प्रेम हमारा थाती मेरी..

 हृदय में दीप नयन तुम्हारे,

जीवन का एक पुण्य तुम,

बाकी सब कर्म निरर्थक,

प्रिय की वाणी जीवन संगीत मेरा..

मत थमना मेरी राहों में,

पर मुड़ कर नज़र में भरना,

याद मेरी तुम और भूल तुम्हीं हो,

गले से लगा कर शीतल छाया.. 

बेशक न करना,

दिल में धड़कना,

श्रृंगार रस में न हो विरह में रहना..

सावन में न आना पतझड़ में आना, 

मुझे अपना समंदर न देना,

पर मेरी नदी में समहित होना..

आखरी विदाई पर तुम आना,

इतना अधिकार चाहिए,

गंगा जल मुख में तुम ही देना..

आखरी सेज पर ले चलना,

बाहों में भर कर अपने,

अब मौन व्रत धारण करती हूं..

तुम संग मेरा प्रेम और मोह यही है..

Rupa Oos ki ek Boond

"दिवंगत हो जाते हैं सम्बन्ध ,
पर...
स्मृतियों का कोई तर्पण नहीं होता..
.❣️"

हाँ सुनो

हाँ सुनो

Rupa Oos ki ek Boond
"मुझे  तुम्हारी प्रतीक्षा तमाम उम्र रहेगी,
मुझे तुमसे ही नहीं, तुम्हारे होने से भी प्रेम हैं..❣️"


हाँ सुनो, जब मैं पुकारूॅं तुम्हें आना होगा,

मेरी आवाज के सहारे चले आना होगा..


जब नहीं होंगे उजाले,

आँखों पे जो ऐनक होगी,

झुर्रियों से भरा चेहरा..

न पहले सी रौनक होगी 

हाँ सुनो....


जो तुम्हें याद रहेगी मेरी आवाज, 

सुनो, 

बस दिल की सुनना न रोकना कदम सुन लो,

तुम्हें देखे बिना न छूटेगा जहाँन सुनों.. 

आओगे न बस इक यही वादा कर लो..

हाँ सुनों...

मेरी आवाज के सहारे चले आना होगा..

Rupa Oos ki ek Boond

"कि छोड़ आई हूं खुद को तुझ में ही कहीं,
अब तुझको देखकर हर जुबां पर मेरा भी ज़िक्र आयेगा..❣️"

मीलों जहां न पता खुशी का

मीलों जहां न पता खुशी का..

Rupa Oos ki ek Boond
होके मायूस ना यूं शाम से ढलते रहिए,
जिंदगी भोर है, सूरज से निकलते रहिए..

मैं पीड़ा का राजकुंवर हूं तुम शहज़ादी रूप नगर की

हो भी गया प्यार हम में तो बोलो मिलन कहां पर होगा ?


मीलों जहां न पता खुशी का

मैं उस आंगन का इकलौता,

तुम उस घर की कली जहां नित

होंठ करें गीतों का न्योता,

मेरी उमर अमावस काली और तुम्हारी पूनम गोरी

मिल भी गई राशि अपनी तो बोलो लगन कहां पर होगा ?


मैं पीड़ा का...

मेरा कुर्ता सिला दुखों ने

बदनामी ने काज निकाले

तुम जो आंचल ओढ़े उसमें

नभ ने सब तारे जड़ डाले

मैं केवल पानी ही पानी तुम केवल मदिरा ही मदिरा

मिट भी गया भेद तन का तो मन का हवन कहां पर होगा ?


मैं पीड़ा का...

मैं जन्मा इसलिए कि थोड़ी

उम्र आंसुओं की बढ़ जाए

तुम आई इस हेतु कि मेंहदी

रोज़ नए कंगन जड़वाए,

तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल तुम सुखान्तकी, मैं दुखान्तकी

जुड़ भी गए अंक अपने तो रस-अवतरण कहां पर होगा ?


मैं पीड़ा का...

इतना दानी नहीं समय जो

हर गमले में फूल खिला दे,

इतनी भावुक नहीं ज़िन्दगी

हर ख़त का उत्तर भिजवा दे,

मिलना अपना सरल नहीं है फिर भी यह सोचा करता हूँ

जब न आदमी प्यार करेगा जाने भुवन कहां पर होगा ?

मैं पीड़ा का...


गोपालदास "नीरज"

Rupa Oos ki ek Boond
एक ही ठांव पे ठहरेंगे तो थक जाएंगे
धीर-धीरे ही सही राह पे चलते रहिये...

ख्वाहिश नहीं, मुझे मशहूर होने की..

 ख्वाहिश नहीं, मुझे मशहूर होने की..

मुंशी प्रेमचंद जी की एक "सुंदर कविता", जिसके एक-एक शब्द को, बार-बार "पढ़ने" को "मन करता" है-
ख्वाहिश नहीं, मुझे  मशहूर होने की..
“उम्र जाया कर दी लोगों ने औरों के वजूद में नुक्स निकालते निकालते.. 
इतना ही खुद को तराशा होता तो फ़रिश्ते बन जाते..❣️"

ख्वाहिश नहीं, मुझे
मशहूर होने की,"
आप मुझे "पहचानते" हो,
बस इतना ही "काफी" है।
अच्छे ने अच्छा और
बुरे ने बुरा "जाना" मुझे,
जिसकी जितनी "जरूरत" थी
उसने उतना ही "पहचाना "मुझे!
जिन्दगी का "फलसफा" भी
कितना अजीब है,
"शामें "कटती नहीं और
"साल" गुजरते चले जा रहे हैं!
एक अजीब सी
'दौड़' है ये जिन्दगी,
"जीत" जाओ तो कई
अपने "पीछे छूट" जाते हैं और
हार जाओ तो,
अपने ही "पीछे छोड़ "जाते हैं!
बैठ जाता हूँ
मिट्टी पे अक्सर,
मुझे अपनी
"औकात" अच्छी लगती है।
मैंने समंदर से
"सीखा "है जीने का तरीका,
चुपचाप से "बहना "और
अपनी "मौज" में रहना।
ऐसा नहीं कि मुझमें
कोई "ऐब "नहीं है,
पर सच कहता हूँ
मुझमें कोई "फरेब" नहीं है।
जल जाते हैं मेरे "अंदाज" से,
मेरे "दुश्मन",
एक मुद्दत से मैंने
न तो "मोहब्बत बदली" 
और न ही "दोस्त बदले "हैं।
एक "घड़ी" खरीदकर,
हाथ में क्या बाँध ली,
"वक्त" पीछे ही
पड़ गया मेरे!
सोचा था घर बनाकर
बैठूँगा "सुकून" से,
पर घर की जरूरतों ने
"मुसाफिर" बना डाला मुझे!
"सुकून" की बात मत कर-
बचपन वाला, "इतवार" अब नहीं आता!
जीवन की "भागदौड़" में
क्यूँ वक्त के साथ, "रंगत "खो जाती है ?
हँसती-खेलती जिन्दगी भी
आम हो जाती है!
एक सबेरा था
जब "हँसकर "उठते थे हम,
और आज कई बार, बिना मुस्कुराए
ही "शाम" हो जाती है!
कितने "दूर" निकल गए
रिश्तों को निभाते-निभाते,
खुद को "खो" दिया हमने
अपनों को "पाते-पाते"
लोग कहते हैं
हम "मुस्कुराते "बहुत हैं,
और हम थक गए,
"दर्द छुपाते-छुपाते"!
खुश हूँ और सबको
"खुश "रखता हूँ,
"लापरवाह" हूँ ख़ुद के लिए
मगर सबकी "परवाह" करता हूँ।
मालूम है
कोई मोल नहीं है "मेरा" फिर भी
कुछ "अनमोल" लोगों से

"रिश्ते" रखता हूँ।

Good Morning

"यूँ जमीन पर बैठकर क्यूँ आसमान देखता है,
पँखों को खोल जमाना सिर्फ उड़ान देखता है..❣️"

मिलूँ भी जब मिलूँ मैं तुमसे

मिलूँ भी जब मिलूँ मैं तुमसे

Rupa OOs ki ek Boond

मिलूँ भी जब मिलूँ मैं तुमसे   

तेरी आरज़ुओं को मुट्ठियों में समेटे

हर सांस को बाँहों में लपेटे

कुछ अपना - सा बिखर जाता है मुझमें

मिलूँ भी जब मिलूँ मैं तुमसे

ऐसा लगे मानो मिलूँ मैं मुझसे!

मीलों के फासले ये कैसे

पर चाँद हर रोज़ है मिलाता तुमसे

इनायत की है, बादलों से मैंने

उनकी कुछ पसीने की बूंद से ही

महका देना फ़िज़ा यूँ जैसे

हर चुस्की लेकर तेरी

कुछ चाय - सा उबाल आता मुझमें

मिलूँ भी जब मिलूँ मैं तुमसे

ऐसा लगे मानो मिलूँ मैं मुझसे!

हर पहेली में छुपा तू एक राज़

जैसे हर राह में मिलूँ तुझसे

फिर से हमराज़ कैसे

करवटें तो लाख काटी मैंने

तेरी सिलवटों में

मुस्करा कर मुँह फेर

जाना ये तेरा मिजाज़ जैसे

हर पतझड़ समेट तेरी

कुछ बसंत - सा खिल जाता मुझमें

मिलूँ भी जब मिलूँ मैं तुमसे

ऐसा लगे मानो मिलूँ मैं मुझसे !

कुछ अंदर ही अंदर झूम रहा है

करूंं इबादत या करूंं सजदा

कि दिल सातवें आसमां पर झूम रहा है

मेरी रूह की हर गली बीच

तेरा ही गुल खिला है

हर नुक्कड़ और नज़ारे में

बस तू ही तू मुझको मिला है

हर कीचड़ में तुझको पा कर

कुछ कमल - सा खिल जाता है मुझमें

मिलूँ भी जब मिलूँ मैं तुमसे

ऐसा लगे मानो मिलूँ मैं मुझसे !

कुछ खाली कुछ गुमनाम - सा है

प्यार है जो तेरा

बड़ा कत्लेआम - सा है

बेचैन कर देती है

वो निगाहें ही तेरी

तू जो मिला है

ऐसे जैसे कोई इनाम - सा है

हर लौ में जल कर उनकी

कुछ शमाँ - सा जल जाता मुझमें

मिलूँ भी जब मिलूँ मैं तुमसे

ऐसा लगे मानो मिलूँ मैं मुझसे !

Rupa OOs ki ek Boond

आ गया बसंत है, छा गया बसंत है

आ गया बसंत है, छा गया बसंत है

Rupa Oos ki ek Boond

आ गया बसंत है, छा गया बसंत है

खेल रही गौरैया सरसों की बाल से

मधुमाती गन्ध उठी अमवा की डाल से

अमृतरस घोल रही झुरमुट से बोल रही

बोल रही कोयलिया


आ गया बसंत है, छा गया बसंत है

नया-नया रंग लिए आ गया मधुमास है

आंखों से दूर है जो वह दिल के पास है

फिर से जमुना तट पर कुंज में पनघट पर

खेल रहा छलिया


आ गया बसंत है छा गया बसंत है

मस्ती का रंग भरा मौज भरा मौसम है

फूलों की दुनिया है गीतों का आलम है

आंखों में प्यार भरे स्नेहिल उदगार लिए

राधा की मचल रही पायलिया

आ गया बसन्त है छा गया बसंन्त है..

Rupa Oos ki ek Boond

कर दें न क़त्ल ख़ुद ही ख़्वाबों का ख़ंजरों से

कर दें न क़त्ल ख़ुद ही ख़्वाबों का ख़ंजरों से

Rupa Oos ki ek Boond

कर दें न क़त्ल ख़ुद ही ख़्वाबों का ख़ंजरों से

डरने लगे हैं हम तो अपने ही बाज़ुओं से..


ये शक्ल भी किसी दिन हो जाएगी मुकम्मल

ख़ुद को तराशते हैं हम रोज छेनियों से..


ग़मगीन रास्तों पर कैसे ये चल रही हैं

हम रोज पूछते हैं ये राज़ धड़कनों से..


फूलों की डोलियाँ जब रुख़्सत हुई चमन से

बेकाबू होके काँटे जा उलझे क़ातिलों से..


ख़त इश्क़ के जले हैं या ख़्वाब ज़िंदगी के

लपटें सी उठ रहीं हैं आँखों की चिमनियों से..


आया है अश्क़ पीने का हल्क़ को हुनर जब

आँखों ने बहने का हक़ छीना है आँसुओं से..


धोखे फ़रेब की हैं दीवार बीच में जब

हो दोस्ती भी कैसे पत्थर की आइनों से..


- Amit verma

Rupa Oos ki ek Boond

हम ऐसी दुनिया में क्यों जीते हैं ?

हम ऐसी दुनिया में क्यों जीते हैं ?

Rupa Oos ki ek Boond

हम ऐसी दुनिया में क्यों जीते हैं ?

दस्तूर-ए-दुनिया कुछ ऐसा ही नज़र आता है

कोई ताक़त से तो कोई ज़बान से वार करता है

दोनो ही सूरत में

इन्सान घायल होता है

पर ज़बानी हमलों से शायद

ज़्यादा दर्द झेलता है

फिर भी हम सब कुछ सहते हैं

हम ऐसी दुनिया में क्यों जीते हैं ?


जिस पर आँखें मूँद कर हम

भरोसा करते हैं

वो ही उम्र भर के लिए

हमारी आँखें खोल देता है

और हमें सब कुछ

शफ़्फ़ाफ़ दिखने लगता है,

हद तो तब होती है

जब अपना पेट पालने के लिए ऐसे कुछ लोग

किसी के आँचल से

सूखी रोटी भी छीन लेते हैं

हम ऐसी दुनिया में क्यों जीते हैं ?


मेहनत मुशक़्क़त किए बग़ैर 

आमदनी होती रहे

इस फ़लसफ़े पर आज कई लोग

अमल करते हैं 

हद तो तब होती है जब

जिससे माली इ’आनत मिलती है

उसी की क़द्र नहीं करते हैं

हम ऐसी दुनिया में क्यों जीते हैं ?


घर में चाहे रोटी न हो

पर अक्सर लोग

मुफ़्त में मिले लज़ीज़ पकवान में भी

ख़ामियाँ तलाशते हैं

हम ऐसी दुनिया में क्यों जीते हैं ?


ऐसे बेशुमार सवालात हमारे ज़ेहन में 

हमेशा से उठते आए हैं

और हम युगों युगों से

इसी दुनिया में जीते आए हैं !

प्रेम क्या है..

प्रेम क्या है.. 

Rupa Oos ki ek Boond

प्रेम क्या है.. 

हथेली पर रखा 

एक कपूर का टुकड़ा

टुकड़ा गल जाता है.. 

खुशबू रह जाती है


प्रेम क्या है.. 

बदन पर गिरा

शबनम का एक क़तरा

क़तरा बह जाता है.. 

एहसास रह जाता है


प्रेम क्या है.. 

माथे पर दिया गया

एक मीठा बोसा

बोसा छूट जाता है.. 

तिलस्म रह जाता है 


प्रेम क्या है.. 

आँखों का जादू

जादू चल जाता है.. 

बुत थम जाता है


बस यूँ ही.. 

प्रेम चलता रहता है

दिल बहलता रहता है

रुत आती हैं 

कभी गुदगुदा कर चली जाती हैं

तो कभी जख्म कुरेद जाती हैं..

शेष रह जाती हैं बस यादें..

फूल शाख़ों पे जब भी खिलते हैं

फूल शाख़ों पे जब भी खिलते हैं

Rupa Oos ki ek Boond

फूल शाख़ों पे जब भी खिलते हैं ,

दिन ख़िज़ाँ के भी तब बदलते हैं ।


ज़िन्दगी रूठती नहीं उनकी ,

जिनकी आँखों में ख़्वाब पलते हैं।


चाहे कितना भी हो कोई दानिश,

ठोकरें खा के ही सम्भलते हैं ।


तुम क़दम सोच कर यहाँ रखना,

कर्मों के फल सभी को मिलते हैं ।


उनकी गुस्ताख़ि तुम ज़रा देखो ,

मुफ़लिसी में भी वो अकड़ते हैं ।


तुम जो,” मौसम “ बहार लाते हो ,

हर तरफ़ फूल ही महकते हैं ।


रूपा, "ओस की बूंद"

उनकी तारीफ की अदा..

उनकी तारीफ की अदा..

Rupa Oos ki ek Boond

"उगती सुबह और डुबती शाम..
इनके बीच का इन्तजार हो तुम 
❣️"

कभी शबनमी-सी रात कभी, भीगी-भीगी चांदनीं से होते हैं 

कभी मुझपे गजल वो कहते हैं, तो कभी मुझे गजल-सा कहते हैं।

उनकी तारीफ की अदा..

चांद की मदमाती चांदनी से, यू मेरे अक्स को छू जाती हैं,

शरारात भरी नजरों से मेरे दिल को, तार- तार कर जाती हैं।

उनकी तारीफ के लफ्ज ..

बिखरे हैं फकत आरजूओं से तो, कभी जुस्तजू से ख़िलते हैं,

दुआ में फरिश्तों को शामिल कर, उस दुआ से फलते हैं।

उनकी तारीफ का अन्दाज..

फूलों सी हंसी, चाँदनी का गुरूर, मुझे चांद-सा मजहबी, कहते हैं,

कहते हैं कि जो तू गर देख ले दर्पण, तो वो़ भी महक़ उठता है।

उनकी तारीफ की हंसी..

मेरे लबों से छूकर फ़िर उनक़ी आंखो से, टपकती खिलख़िलाती हैं,

चांद के चांदनीं नूर से सराब़ोर करती, मुझें कोहिनूर ब़ना ज़ाती हैं।

Rupa Oos ki ek Boond

"शंका का कोई इलाज नहीं,
चरित्र का कोई प्रमाण नहीं,
मौन से अच्छा कोई साधन नहीं, 
और शब्द से तीखा कोई बाण नहीं ..❣️"