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छींद वाले दादा हनुमान जी, मध्यप्रदेश || Chhind Wale Dada Hanuman ji, Madhya Pradesh ||

छींद वाले दादा हनुमान जी, मध्यप्रदेश

आज मध्यप्रदेश के एक हनुमान मंदिर की चर्चा करते हैं, छींद वाले दादा हनुमान जी, जो मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के ग्राम छींद में स्थित 200 साल पुराना मंदिर है। यह भोपाल से 40 किलो मीटर दूर रायसेन जिले के ग्राम छींद में स्थित है। दादा हनुमान जी का दरवार जो छींद के नाम से प्रसिद्ध है, मान्यता है कि यहाँ आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है। 
छींद वाले दादा हनुमान जी, मध्यप्रदेश || Chhind Wale Dada Hanuman ji, Madhya Pradesh ||
भगवान शिव का ग्यारहवें अवतार रूद्र रूप संकटमोचन हनुमान जी को माना जाता है। प्रसिद्ध मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है की हनुमान जी धरती पर लोगों के कष्टों को दूर करने के लिए आज भी हैं, वे अपने भक्तों की पुकार सुन तुरंत ही चमत्कार दिखाते हैं। क्योंकि त्रेतायुग में प्रभु श्रीराम ने उन्हें कलयुग के अंत तक धर्म की स्थापना और भक्तों के कल्याण के लिए पृथ्वी पर रहने को कहा था। देश भर में हनुमान जी के भक्त उनके पास अपने दुःख - पीड़ा लेकर मंदिर जाते हैं और आस्था के अनुसार व्रत और तपस्या करते हैं। बजरंगबली के इन्हीं चमत्कारों के बीच एक चमत्कारी मंदिर भी मौजूद है, जहां भक्त अपनी मुरादें लेकर जाते हैं और पूरी होने का आशीर्वाद लेकर आते हैं।
छींद वाले दादा हनुमान जी, मध्यप्रदेश || Chhind Wale Dada Hanuman ji, Madhya Pradesh ||
कहा जाता है जो पांच मंगलवार अपनी श्रद्धा पूर्वक दादाजी के चरणों मे आता है, उसकी हर मुराद को दादाजी महाराज पूरा करते हैं। हनुमान दादाजी के इस दरबार में अमीर, गरीब, नेता हो या अभिनेता, सभी शीश झुकाने  आते हैं। यहां पर मंदिर परिसर में विशाल पीपल के पेड़ के नीचे दक्षिणमुखी दादाजी की प्रतिमा है। हर मंगलवार और शनिवार को दूर-दूर से श्रद्धालु छींद पहुंचते हैं।
बिगड़ी को बनाने वाले दादा का यह दरबार लगभग दो सौ साल पुराना बताया जाता है। मान्यता है कि काफी समय पहले श्री हनुमान जी के किसी अनन्य भक्त ने यहां साधना की थी। उसकी साधना से प्रसन्न होकर दादाजी सदैव इस प्रतिमा में साक्षात निवास करते हैं। यहां आने वाले भक्तजनों का अनुभव है कि दादाजी अतिशीघ्र उनके कष्टों का निवारण करते हैं। 

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Chhind Wale Dada Hanuman ji, Madhya Pradesh

Today let us discuss a Hanuman temple in Madhya Pradesh, Chhind Wale Dada Hanuman ji, which is 200 years old temple located in village Chhind of Raisen district of Madhya Pradesh. It is situated 40 km away from Bhopal in village Chhind of Raisen district. Dada Hanuman ji's door, which is famous as Chhind, is believed to fulfill the wishes of every devotee who comes here.
छींद वाले दादा हनुमान जी, मध्यप्रदेश || Chhind Wale Dada Hanuman ji, Madhya Pradesh ||
The eleventh incarnation of Lord Shiva, Rudra form Sankatmochan Hanuman ji is considered. According to famous beliefs, it is said that Hanuman ji is still on earth to remove the sufferings of the people, he shows miracles immediately after hearing the call of his devotees. Because in Tretayuga Lord Shri Ram had asked him to stay on earth till the end of Kali Yuga for the establishment of Dharma and welfare of devotees. The devotees of Hanuman ji across the country go to the temple with their sorrows and pains and observe fast and penance according to their faith. In the midst of these miracles of Bajrangbali, a miraculous temple is also present, where devotees take their wishes and bring blessings of fulfillment.
It is said that the one who comes at the feet of Grandfather on five Tuesdays with reverence, his every wish is fulfilled by Dadaji Maharaj. In this court of Hanuman grandfather, rich, poor, politician or actor, all come to bow their heads. Here in the temple premises there is a statue of Dakshin Mukhi Grandfather under a huge peepal tree. Devotees from far and wide reach Chhind every Tuesday and Saturday.
छींद वाले दादा हनुमान जी, मध्यप्रदेश || Chhind Wale Dada Hanuman ji, Madhya Pradesh ||
This court of the grandfather who made the spoiled is said to be about two hundred years old. It is believed that a long time ago an exclusive devotee of Shri Hanuman ji did spiritual practice here. Pleased with his sadhana, Grandfather always resides in this idol. The experience of the devotees who come here is that Grandfather removes their sufferings very soon.


2. ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी) : -

मां दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी का है। ब्राह्मी मन, मस्तिष्क और स्मरण शक्ति को बढ़ाने के साथ-साथ रक्त संबंधी समस्याओं को दूर करती है और स्वर को मधुर करने में मदद करती है। अतः कहा गया है कि इन समस्याओं से ग्रस्त लोगों को ब्रह्मचारिणी की आराधना करनी चाहिए तथा ब्राह्मी का सेवन करना चाहिए। ब्राह्मी आयु व याददाश्त बढ़ाकर, रक्तविकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है। इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है।

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा click here





नवरात्रि || Navratri ||

नवरात्रि

सर्वप्रथम माता रानी के चरणों में कोटि कोटि नमन 🙏🙏

आज की पोस्ट धर्म और आस्था से जुड़ी है। कुछ लोग हो सकता है इन बातों से सहमत हों तो वहीँ कुछ लोगों को यह नागवारा भी हो सकता है। 

Navdurga

"नवरात्रि का उत्सव केवल मनोरंजन न बनकर रह जाये"

आज से शारदीय नवरात्र प्रारंभ हो रहा है। बचपन से ही हमलोग माँ दुर्गा की नवरात्र में विशेष पूजा अर्चना अपने घरों में देखते चले आ रहे हैं। पहले त्योहारों में इतनी भव्यता नहीं हुआ करती थी। धीरे - धीरे त्योहारों की मूल अवधारणा खोती जा रही है और दिखावा बढ़ता जा रहा है। जाने हम किस दिशा में आगे बढ़ते जा रहे हैं? 

जो त्यौहार हमारे अंतर्मन से प्रस्फुटित होते थे, वो कैलेंडर की तारीख मात्र हैं। कैलेंडर की तारीखों से हम एक भव्य आयोजन करते हैं और उसे आस्था का नाम दे देते हैं। अगर हम ईमानदारी से अपनी जीवनचर्या का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि हमारे त्यौहार हमें हमारी धार्मिकता ने नहीं बल्कि कैलेंडर ने दिए हैं। अगर बाहर का कैलेंडर ना बताए कि कोई त्यौहार आ पहुँचा है, तो यह हमारे संज्ञान में नहीं होता। हमारे भीतर धर्म की धारा इतनी मज़बूत नहीं कि उससे स्वतः ही कोई उत्सव फूट पड़े। 

हम धर्म की मूल संकल्पना से दूर होते जा रहे। राम को हम जानते नहीं पर दिवाली मना लेते हैं। गीता का हमें ज्ञान नहीं पर जन्माष्टमी की बधाइयाँ व्हाट्सअप पर धड़ाधड़ फॉरवर्ड कर लेते हैं। भगवान्न बुद्ध की पूजा कर लेते हैं, पर उनके द्वारा दिखाया मार्ग पता नहीं है। ना हम व्रत का अर्थ समझते हैं, न हम त्योहारों का मर्म जानते हैं, लेकिन कुट्टू का आटा और फलाहारी थाली बना लेते हैं। असंख्य रस्मों रिवाज़ों का पालन करते रहते हैं और यह पता भी नहीं होता कि उनका मर्म क्या है और हम कर क्या रहे हैं?

धर्म की धारा ही दूषित और कमज़ोर हो रही है। जब हमें अपने त्योहारों, रीति रिवाजों का ही मर्म नहीं पता तो फिर अपने इस जीवन के मर्म को जानने की बात तो बहुत दूर है। जीवन मानों एक रेस हो चला है और हम उस रेस में आँखें बंद किये दौड़े जा रहे हैं। 

आज से नवरात्रि प्रारंभ है। साड़ियों की, डांडियों की, पकवानों की और पांडालों की धूम है। लेकिन ये धूम बहुत ही झूठी और बाहरी है। ये धूम हमारी आत्मा को आनंदित नहीं करती। बस थोड़ी देर के लिए मनोरंजन हो जाता है। उत्सव एक आंतरिक घटना है, जबकि मनोरंजन बहुत ही बाहरी। उत्सव तो वो है जो यदि एक बार जीवन मे उतर आए तो फिर उसकी खुमारी जीवन भर नहीं उतररी और उसके पश्चात हम बाहरी आडम्बरोँ और दिखावे में नहीं होते। 

दुर्गा के नौ रूपोँ में हम किसकी पूजा करते हैं और वह किस तरह हमारी जिंदगी से जुड़े हैं और हमें लाभ पहुंचाते हैं। एक मत के अनुसार ब्रह्माजी के दुर्गा कवच में वर्णित नवदुर्गा नौ विशिष्ट औषधियों में विराजमान हैं। यह नौ  औषधियां ऐसी हैं, जिनमें मां दुर्गा के नौ रूप विराजमान है। इन 9 औषधियों को दुर्गा कवच कहा जाता है क्योंकि मानना है कि यह औषधियां रोगों को हरने वाली और उनसे बचा कर रखने के लिए एक कवच के रूप में कार्य करती हैं। आज यहां नवरात्र के 9 दिनों से संबंधित इन दिव्य गुणों वाली 9 औषधियों के बारे में अवश्य जानें। 

प्रथम शैलपुत्री (हरड़) :- 

मां दुर्गा के नौ रूपों में प्रथम शैलपुत्री के रूप में जाना जाता है। इसी प्रकार औषधियों में प्रथम औषधि हरण को चिकित्सा शास्त्र में प्रथम स्थान प्राप्त है। यह सात प्रकार की होती है। इसको हरीतकी के नाम से भी जानते हैं। कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमावती है, जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। यह पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है। 

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा click here

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

🚩जय माता दी🚩

हिन्दी वर्णमाला की कविता

हिन्दी वर्णमाला की कविता


हिन्दी वर्णमाला का क्रमबद्ध बहुत ही सुन्दर प्रयोग 
आप भी अद्भुत, अद्वितीय, अविस्मरणीय कह उठेंगे...   
यह कविता जिसने भी लिखी प्रशंसनीय है।

Rupa Os ki ek Boond
"मोती कभी भी किनारे पे खुद नहीं आते, 
उन्हें पाने के लिए समुन्दर में उतरना ही पड़ता है..❤"


अ चानक

आ कर मुझसे

इ ठलाता हुआ पंछी बोला

ई श्वर ने मानव को तो

उ त्तम ज्ञान-दान से तौला

ऊ पर हो तुम सब जीवों में

ऋ ष्य तुल्य अनमोल

ए क अकेली जात अनोखी

ऐ सी क्या मजबूरी तुमको

ओ ट रहे होंठों की शोख़ी

औ र सताकर कमज़ोरों को

अं ग तुम्हारा खिल जाता है

अ: तुम्हें क्या मिल जाता है.?

क हा मैंने- कि कहो

ख ग आज सम्पूर्ण

ग र्व से कि- हर अभाव में भी

घ र तुम्हारा बड़े मजे से

च ल रहा है

छो टी सी- टहनी के सिरे की

ज गह में, बिना किसी

झ गड़े के, ना ही किसी

ट कराव के पूरा कुनबा पल रहा है

ठौ र यहीं है उसमें

डा ली-डाली, पत्ते-पत्ते

ढ लता सूरज

त रावट देता है

थ कावट सारी, पूरे

दि वस की-तारों की लड़ियों से

ध न-धान्य की लिखावट लेता है

ना दान-नियति से अनजान अरे

प्र गतिशील मानव

फ़ ल के चक्कर में 

ब न बैठे हो असमर्थ

भ ला याद कहाँ तुम्हें

म नुष्यता का अर्थ.?

य ह जो थी, प्रभु की

र चना अनुपम...

ला लच-लोभ के 

व शीभूत होकर

श र्म-धर्म सब तजकर

ष ड्यंत्रों के खेतों में

स दा पाप-बीजों को बोकर

हो कर स्वयं से दूर

क्ष णभंगुर सुख में अटक चुके हो

त्रा स को आमंत्रित करते हुए

ज्ञा न-पथ से भटक चुके हो।


है न मजेदार 

Sunday Morning
"हार तो वो सबक है जो
 हमें बेहतर होने का मौका देती है..❤"

घर का भेद : पंचतंत्र || Ghar ka Bhed : Panchtantra ||

घर का भेद

परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः । त एवं निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ।

एक दूसरे का भेद खोलने वाले नष्ट हो जाते हैं।

घर का भेद : पंचतंत्र || Ghar ka Bhed : Panchtantra ||

एक नगर में देवशक्ति नाम का राजा रहता था। उसके पुत्र के पेट में एक साँप चल गया था। उस साँप ने वहीं अपना बिल बना लिया था। पेट में बैठे साँप के कारण उसके शरीर का प्रतिदिन क्षय होता जा रहा था। बहुत उपचार करने के बाद भी जब स्वास्थ्य में कोई सुधार न हुआ तो अत्यन्त निराश होकर राजपुत्र अपने राज्य से बहुत दूर दूसरे प्रदेश में चला गया और वहाँ सामान्य भिखारी की तरह मन्दिर में रहने लगा।

उस प्रदेश के राजा बलि की दो नौजवान लड़कियाँ थीं। वे दोनों प्रतिदिन सुबह अपने पिता को प्रणाम करने आती थीं उनमें से एक राजा को नमस्कार करती हुई कहती थी-महाराज! जय हो। आपकी कृपा से ही संसार के सुख हैं। दूसरी कहती थी। - महाराज ! ईश्वर आपके कर्मों को फल दे। दूसरी के वचन को सुनकर महाराज क्रोधित हो जाता था। एक दिन इस क्रोधावेश में उसने मन्त्री को बुलाकर आज्ञा दी-मन्त्री ! इस कट् बोलने वाली लड़की को किसी गरीब परदेशी के हाथों में दे दो, जिससे यह अपने कर्मों का फल स्वयं चखे ।

मन्त्रियों ने राजाज्ञा से उस लड़की का विवाह मन्दिर में सामान्य भिखारी की तरह ठहरे हुए परदेशी राजपुत्र के साथ कर दिया। राजकुमारी ने उसे ही अपना पति मानकर सेवा की। दोनों ने उस देश को छोड़ दिया। थोड़ी दूर जाने पर वे एक तालाब के किनारे ठहरे। वहाँ राजपुत्र को

छोड़कर उसकी पत्नी पास के गाँव से घी-तेल अन्न आदि सौदा लेने गई।

सौदा लेकर जब वह वापस आ रही थी तब उसने देखा कि उसका पति तालाब में कुछ दूरी पर एक साँप के बिल के पास सो रहा है। उसके मुख से एक फनियल सॉप बाहर निकलकर हवा खा रहा था। एक दूसरा साँप भी अपने बिल से निकलकर फन फैलाए वहीं बैठा था। दोनों में बातचीत हो रही थी ।

बिल वाला साँप पेट वाले साँप से कह रहा था - दुष्ट ! तू इतने सर्वांग

सुन्दर राजकुमार का जीवन क्यों नष्ट कर रहा है? पेट वाला साँप बोला- तू भी तो इस बिल में पड़े स्वर्ण कलश को दूषित कर रहा है।

बिल वाला साँप बोला- तो क्या तू समझता है कि तुझे पेट से निकालने की दवा किसी को भी मालूम नहीं? कोई भी व्यक्ति राजकुमार को उबली हुई राई की काँजी पिलाकर तुझे मार सकता है।

पेट वाला साँप बोला-तुझे भी तो तेरे बिल में गरम तेल डालकर कोई भी मार सकता है।

इस तरह दोनों ने एक-दूसरे का भेद खोल दिया। राजकन्या ने दोनों की बातें सुन ली थीं। उसने उनकी बताई विधियों से ही दोनों का नाश कर दिया। उसका पति भी नीरोग हो गया; और बिल में से स्वर्ण-भरा कलश पाकर उनकी गरीबी भी दूर हो गई। तब, दोनों अपने देश को चल दिए।

राजपुत्र के माता-पिता ने उनका स्वागत किया।

अरिमर्दन ने भी प्राकारकर्ण की बात का समर्थन करते हुए किया कि स्थिरजीवी की हत्या न की जाए। रक्ताक्ष का उलूकराज के इस निश्चय से गहरा मतभेद था। वह स्थिरजीवी की मृत्यु में ही उल्लुओं का हित देखता था। अतः उसने अपनी सम्मति प्रकट करते हुए अन्य मन्त्रियों से कहा कि तुम अपनी मूर्खता से उलूकवंश का नाश कर दोगे। किन्तु रक्ताक्ष की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। यही निश्चय

उलूकराज के सैनिकों ने स्थिरजीवी कौवे को शय्या पर लिटाकर अपने पर्वतीय दुर्ग की ओर कूच कर दिया। दुर्ग के पास पहुँच स्थिरजीवी ने उलूकराज से निवेदन किया-महाराजा! मुझपर इतनी कृपा क्यों करते हो? मैं इस योग्य नहीं हूँ। अच्छा हो, आप मुझे आग में डाल दें।

उलूकराज ने कहा- ऐसा क्यों कहते हो? स्थिरजीवी - स्वामी! आग में जलकर मेरे पापों का प्रायश्चित्त हो

जाएगा। मैं चाहता हूँ कि मेरा वायसत्व आग में नष्ट हो जाए और मुझमें उलूकत्व आ जाए, तभी मैं उस पापी मेघवर्ण से बदला ले सकूँगा । रक्ताक्ष स्थिरजीवी की इन पाखण्ड-भरी चालों को खूब समझ रहा था। उसने कहा-स्थिरजीवी! तू बड़ा चतुर और कुटिल है। मैं जानता हूँ कि उल्लू बनकर भी तू कौवों का ही हित सोचेगा । तुझे भी चुहिया की तरह अपने वंश से प्रेम है, जिसने सूर्य, चन्द्र, पवन, पर्वत आदि वरों को छोड़कर एक चूहे का ही वरण किया था।

मन्त्रियों ने रक्ताक्ष से पूछा- वह किस तरह? रक्ताक्ष ने चुहिया के स्वयंवर की कथा सुनाई।

चुहिया का स्वयंवर

To be continued ...

पीपल (Peepal)/ Pipal

पीपल

ज्यादातर लोग पीपल (Peepal) को सिर्फ पूजनीय पेड़ मानते हैं। वैसे तो सभी पीपल से परिचित हैं, परंतु पीपल के पेड़ का औषधीय प्रयोग भी होता है और इससे कई रोगों में लाभ भी होता है, इससे कम लोग ही अवगत होंगे। हमारी भारतीय संस्कृति में पीपल की पूजा होती है। इसे देव वृक्ष का दर्जा प्राप्त है। स्कंद पुराण के अनुसार पीपल के जड़ में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं का वास होता है।
पीपल का वृक्ष हमारे लिए किसतरह जीवनदायिनी है

चलिए जानते हैं पीपल का वृक्ष हमारे लिए किसतरह जीवनदायिनी है

  1. अकेला ऐसा पौधा जो दिन और रात दोनों समय आक्सीजन देता है। 
  2. पीपल के ताजा 6-7 पत्ते लेकर 400 ग्राम पानी में डालकर 100 ग्राम रहने तक उबालें, ठंडा होने पर पिएं। ब्रर्तन स्टील और एल्युमिनियम का नहीं हो, आपका ह्रदय पहले ही दिन में ठीक होना शुरू हो जाएगा। 
  3. पीपल के पत्तों पर भोजन करें, लीवर ठीक हो जाता है। 
  4. पीपल के सूखे पत्तों का पाउडर बनाकर आधा चम्मच गुड़ में मिलाकर सुबह, दोपहर, शाम खायेँ, किंतना भी पुराना दमा ठीक कर देता है। 
  5. पीपल के ताजा 4-5 पत्ते लेकर पीसकर पानी में मिलाकर पिलायें,1- 2 बार में ही पीलिया में आराम देना शुरू कर देता है। पीपल का वृक्ष हमारे लिए किसतरह जीवनदायिनी है
  6. पीपल की छाल को गंगाजल में घिसकर घाव में लगाये तुरंत आराम देता है। 
  7. पीपल की छाल को खांड (चीनी) मिलाकर दिन में 5-6 बार चूसें, कोई भी नशा छूट जाता है। 
  8. पीपल के पत्तों का काढ़ा पियें, फेफड़ो, दिल, अमाशय और लीवर के सभी रोग ठीक कर देता है। 
  9. पीपल के पत्तों का काढ़ा बनाकर पियें, किडनी के रोग ठीक कर देता है व पथरी को तोड़कर बाहर करता है। 
  10. कितना भी डिप्रेशन हो, पीपल के पेड़ के नीचे जाकर रोज 30 मिनट बैठने से डिप्रेशन खत्म कर देता है। 
  11. पीपल की फल और ताजा कोपलें बराबर मात्रा में लेकर पीसकर सुखाकर खांड मिलाकर दिन में 2 बार लें, महिलाओ के गर्भशाय और मासिक समय के सभी रोग ठीक करता है। साथ ही बच्चों का तुतलाना ठीक कर देता है और दिमाग बहुत तेज करता है। पीपल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण
  12. पीपल का फल और ताजा कोपले लेकर बराबर मात्रा में लेकर पीसकर सुखाकर खांड मिलाकर दिन में 2 बार ले, जिन बच्चों में हाइपर एक्टिविटी होती है, जो बच्चे दिनभर रातभर दौड़ते भागते हैं, सोते कम हैं, पीपल के पेड़ के नीचे बैठाइए सब ठीक कर देता है। 
  13. कितना भी पुराना घुटनों का दर्द हो, पीपल के नीचे बैठें 30-45 दिन में सब खत्म हो जाएगा। 
  14. शरीर में कहीं से भी खून आये, महिलाओं को मासिक समय में रक्त अधिक आता हो, बाबासीर में रक्त आता हो, दांत निकलवाने पर रक्त आये ,चोट लग जाये, 8-10 पत्ते पीसकर छानकर पी जाएं, यह रक्त का बहना बंद कर देता है। 
  15. शरीर मे कहीं भी सूजन हो, दर्द हो, पीपल के पत्तों को गर्म करके बांधने से दर्द ठीक हो जायेगा। 
पीपल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

पीपल क्या है? पीपल के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें 

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta || अध्याय दो के अनुच्छेद 54 - 72 ||

 श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय दो ~ सांख्ययोग ||

अथ द्वितीयोऽध्यायः ~ सांख्ययोग

अध्यायदो के अनुच्छेद 54 - 72

अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और

अध्याय दो के अनुच्छेद 64-72 में स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा की व्याख्या है।

अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌ ॥2.54॥

भावार्थ : 

अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?॥54॥

श्रीभगवानुवाच

प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌ ।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥2.55॥

भावार्थ : 

श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है॥55॥

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥2.56॥

भावार्थ :  

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है॥56॥

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌ ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.57॥

भावार्थ : 

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है॥57॥

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.58॥

भावार्थ : 

और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)॥58॥

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते ॥2.59॥

भावार्थ : 

इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है॥59॥

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥2.60॥

भावार्थ : 

हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं॥60॥

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.61॥

भावार्थ : 

इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है॥61॥

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥2.62॥

भावार्थ : 

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है॥62॥

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2.63॥

भावार्थ : 

क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है॥63॥

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌ ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥2.64॥

भावार्थ : 

परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है॥64॥

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥2.65॥

भावार्थ : 

अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है॥65॥

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌ ॥2.66॥

भावार्थ : 

न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?॥66॥

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥2.67॥

भावार्थ : 

क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है॥67॥

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥2.68॥

भावार्थ : 

इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है॥68॥

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥2.69॥

भावार्थ : 

सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है॥69॥

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥2.70॥
भावार्थ : 
जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं॥70॥

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥2.71॥

भावार्थ : 
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है॥71॥

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥2.72॥

भावार्थ : 
हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है॥72॥

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चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||

चांद के बारे में रोचक तथ्य

बचपन से हम चांद को आसमान में देखते आ रहे हैं, और इससे जुड़ी किस्से कहानियों को सुनते आ रहे हैं। परंतु कई ऐसे तथ्य हैं, जिनसे हम अनजान हैं, तो आइए जानते हैं आज चंद्रमा के बारे में कुछ आवश्यक और रोचक तथ्य-

चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||

  1. चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। सौरमंडल के 181 उपग्रहों में यह पांचवा सबसे बड़ा उपग्रह है।
  2. पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा गोलाकार नजर आता है, किंतु वास्तव में इसका आकार अंडे के समान है अर्थात् अंडाकार है।
  3. नासा के अपोलो 40 मिशन के दौरान एकत्रित किए गए लूनर रॉक्स के सैंपल का अध्ययन कर वैज्ञानिकों द्वारा पता लगाया गया कि चंद्रमा लगभग 4.51 बिलियन वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया।मंगल ग्रह के बराबर एक थिया(thia) नामक चट्टान लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी से आकर टकराई थी। इस टकराव के फलस्वरुप चंद्रमा का निर्माण हुआ था।
  4. चंद्रमा का व्यास 3476 किलोमीटर है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग 1/4 है चंद्रमा का आकार बृहस्पति और शनि के उपग्रहों से भी छोटा है।
  5. चंद्रमा का वजन लगभग 81 अरब टन है।चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||
  6. जिन उपग्रहों के घनत्व ज्ञात हैं, उसमें चंद्रमा दूसरा सबसे अधिक घनत्व वाला उपग्रह है। पहले स्थान पर बृहस्पति का उपग्रह आयो (lo) है।
  7. चंद्रमा को पृथ्वी का चक्कर लगाने में लगभग 27.3 दिन का समय लगता है।
  8. चंद्रमा 2300 मील/घंटे (3700 किलोमीटर/ घंटे) की औसत गति से पृथ्वी की परिक्रमा करता है।
  9. चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी लगभग1,3 8,900 मिल (3,84,000किमी) है।
  10. हालांकि चंद्रमा रात में चमकता दिखाई पड़ता है, लेकिन उसका स्वयं का कोई प्रकाश नहीं होता वह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। यह प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचने में 1.3 सेकंड लगते हैं।चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||
  11. चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का मात्र छठा हिस्सा है, इसका अर्थ यह हुआ कि चंद्रमा पर किसी व्यक्ति का भार पृथ्वी की तुलना में 1/6 होगा। वजन कम होने के कारण चंद्रमा पर कोई भी व्यक्ति बहुत ऊंची छलांग लगा सकता है।
  12. गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम होने के कारण चंद्रमा पर वायुमंडल नहीं है। इसका अर्थ यह है कि चंद्रमा ब्रह्मांडीय किरणों, उल्कापिंडों और सौर हवाओं से असुरक्षित है। यहां तापमान में भी बहुत भिन्नता पाई जाती है।वायुमंडल की कमी के कारण चंद्रमा पर कोई आवाज नहीं सुनी जा सकती है,और यहां से आकाश हमेशा काला दिखाई पड़ता है।
  13. चंद्रमा दिन के समय अत्यंत गर्म और रात में अत्यंत ठंढा होता है। यहां दिन का औसत तापमान 134 डिग्री सेल्सियस और रात का -153 डिग्री सेल्सियस रहता है।
  14. चंद्रमा प्रतिवर्ष पृथ्वी से लगभग 3.8 सेंटीमीटर दूर होता जा रहा है। अनुमान है कि यही क्रम लगभग 50 बिलियन वर्षों तक जारी रहेगा। उस स्थिति में चंद्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करने में 27.3 दिनों के बजाय लगभग 47 दिन लगेंगे। 
  15. पृथ्वी से देखने पर सूर्य और चंद्रमा दोनों एक ही आकार के दिखाई पड़ते हैं, लेकिन वास्तव में चंद्रमा सूर्य से 400 गुना छोटा है। सूर्य की तुलना में पृथ्वी से 400 गुना करीब होने के कारण चंद्रमा आकार में सूर्य जितना प्रतीत होता है।
  16. हमेशा चंद्रमा का एक ही भाग पृथ्वी के सामने होता है, ऐसा इसलिए है क्योंकि चंद्रमा के अपने अक्ष पर घुर्णन की अवधि और पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा की अवधि एक समान है, इसलिए हम हमेशा चंद्रमा का 50% भाग देख पाते हैं।
  17. आधे चांद की तुलना में पूरा चांद 9 गुना अधिक चमकदार होता है।
  18. यदि चंद्रमा ना रहे तो पृथ्वी पर दिन मात्र 6 घंटे का होगा।चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||
  19. चंद्रमा का क्षेत्रफल अफ्रीका के क्षेत्रफल के बराबर है।
  20. पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा की पारस्परिक कुर्ता कैसे शक्ति की क्रियाशीलता के कारण समुद्र में ज्वार भाटा उत्पन्न होता है।
  21. चंद्रमा पर सर्वप्रथम पानी की स्थिति की खोज भारत द्वारा की गई वर्ष 2008 में चंद्रयान मिशन में चंद्रमा पर बर्फ के रूप में पानी के अस्तित्व की खोज की गई जिसकी पुष्टि नासा द्वारा भी किया गया।
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interesting facts about moon

Since childhood, we have been seeing the moon in the sky, and listening to stories related to it. But there are many such facts, which we are unaware of, so let us know some important and interesting facts about the moon today-
चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||
  1. The Moon is the only natural satellite of the Earth. It is the fifth largest satellite among the 181 satellites of the Solar System.
  2. The Moon appears spherical when viewed from Earth, but in reality its shape is like an egg, that is, oval.
  3. By studying samples of lunar rocks collected during NASA's Apollo 40 mission, it was discovered by scientists that the Moon came into existence about 4.51 billion years ago. had come and collided. The Moon was formed as a result of this collision.
  4. The diameter of the Moon is 3476 km, which is about 1/4 of the diameter of the Earth. The size of the Moon is smaller than the satellites of Jupiter and Saturn.
  5. The Moon weighs about 81 billion tons.
  6. Among the satellites whose densities are known, the Moon is the second most dense satellite. In the first place is Jupiter's satellite Io (lo).
  7. It takes about 27.3 days for the Moon to orbit the Earth.
  8. The Moon orbits the Earth at an average speed of 2300 miles/h (3700 km/h).
  9. The distance between the Moon and Earth is approximately 1,3 8,900 mil (3,84,000 km).
  10. Although the moon appears to shine at night, it has no light of its own, it is illuminated by sunlight. This light takes 1.3 seconds to reach the Earth.चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||
  11. The Moon's gravity is only one-sixth that of Earth's, which means that the weight of a person on the Moon would be 1/6 that of Earth's. Due to the low weight, one can jump very high on the moon.
  12. The Moon does not have an atmosphere because of its low gravitational force. This means that the Moon is vulnerable to cosmic rays, meteorites and solar winds. There is also a lot of variation in temperature here. Due to the lack of atmosphere, no sound can be heard on the moon, and from here the sky always looks black.
  13. The Moon is extremely hot during the day and very cold at night. The average day temperature here is 134 °C and night time is -153 °C.
  14. The Moon is moving away from Earth by about 3.8 cm every year. It is estimated that this sequence will continue for about 50 billion years. In that case the Moon would take about 47 days instead of 27.3 days to orbit the Earth.
  15. When viewed from Earth, both the Sun and the Moon appear to be the same size, but in reality the Moon is 400 times smaller than the Sun. Being 400 times closer to the Earth than the Sun, the Moon appears to be about the same size as the Sun.
  16. Always the same side of the Moon is in front of the Earth, this is because the period of rotation of the Moon on its axis and the period of revolution in Earth's orbit is the same, so we always see 50% of the Moon.चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||
  17. The full moon is 9 times brighter than the half moon.
  18. Without the Moon, the day on Earth would be only 6 hours.
  19. The area of ​​the Moon is equal to the area of ​​Africa.
  20. The tidal ebb in the sea is generated due to the interaction of the Earth, the Sun and the Moon.
  21. The existence of water on the Moon was first discovered by India in the Chandrayaan mission in 2008, the existence of water in the form of ice on the Moon, which was also confirmed by NASA.
चांद के बारे में 21 रोचक तथ्य || 21 Interesting Facts About Moon ||

चाँद पर कविता 

चाँद कोट्स