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विश्व पशु कल्याण दिवस 2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022

आज विश्व पशु कल्याण दिवस (World Animal Welfare Day) है। हम सभी इस बात से अवगत हैं कि हर पशु किसी न किसी रूप में हमारे लिए सहायक होते हैं। प्रकृति की संरचना ही कुछ इस प्रकार की गई है कि इसमें हर पशु की या यूँ कहे हर प्राणी, जीव - जंतु, पशु पक्षी की अपनी अलग महत्ता होती है। पशु प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक होते हैं, जो पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण में अहम भूमिका निभाते हैं। पशु प्रकृति के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखते हैं। यही वजह है कि प्रत्येक वर्ष 4 अक्टूबर को विश्व पशु कल्याण दिवस (World Animal Welfare Day) मनाया जाता है।

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

विश्व पशु कल्याण दिवस का आयोजन पहली बार सन 1931 को परिस्थिति विज्ञान शास्त्रियों के सम्मेलन में इटली के फ्लोरेंस शहर में शुरू किया गया था। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य था, विलुप्त हो रहे प्राणियों की रक्षा करना और उन्हें संरक्षण प्रदान करना तथा साथ ही जानवरों पर हो रहे क्रूरता और अत्याचारों को रोकना।

अधिकांशत यह देखा गया है कि आवारा जानवरों के प्रति हमारा व्यवहार बहुत ही घृणित तथा अमानवीय होता है। किसी प्राकृतिक आपदा के समय भी हम इन जानवरों के प्रति दया भाव और प्रेम का व्यवहार प्रगट नहीं करते तथा उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक नहीं होते। हम सिर्फ उन पशुओं के प्रति संवेदनशील होते हैं या प्रेम प्रकट करते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से हमें लाभ पहुंचाते हैं अथवा जिन्हें हम अपने शौक के लिए पालते हैं। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य ही पशु कल्याण मानकों में सुधार लाना और व्यक्तियों के समूह और संगठन का समर्थन प्राप्त करना तथा जानवरों के प्रति प्रेम और स्नेह प्रकट करना है ताकि उनके जीवन को सुरक्षित एवं बेहतर बनाया जा सके। 

विश्व पशु संरक्षण दिवस का इतिहास

Assisi के Francis ने अपने चारों ओर जानवरों की दुर्दशा को अपनी आँखों से देखा था और वे उनके दर्द को ठीक करना चाहते थे।

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

24 मार्च, 1925 को, मूल रूप से विश्व पशु दिवस का आयोजन हेनरिक ज़िमरमैन (1887-1942) नामक एक जर्मन द्वारा किया गया था,जो न केवल एक लेखक थे, बल्कि उन्होने एक द्वि-मासिक पत्रिका भी प्रकाशित की थी, जिसका नाम Mensch und Hund (Man And Dog) था, इसे उन्होंने इस पत्रिका को पशु कल्याण पर अपने विचारों को बढ़ावा देने के लिए एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया और विश्व पशु दिवस समिति की स्थापना के लिए इसका इस्तेमाल किया।

24 मार्च 1925 को, उनकी समिति ने विश्व पशु कल्याण दिवस का आयोजन किया, उन्होंने उस समय के पशु कल्याण मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए बर्लिन, जर्मनी के स्पोर्ट्स पैलेस (Sports Palace of Berlin, Germany)  में इसका आयोजन किया और लगभग 5,000 लोगों ने इस पहले कार्यक्रम में हिस्सा लिया और यह कार्यक्रम सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी (Francis of Assisi) के पर्व के साथ रेखित किया गया था जो 4 अक्टूबर का दिन था।

अगले कुछ वर्षों में, यह कार्यक्रम हर साल आयोजित किया गया और 1929 में, यह 4 अक्टूबर को आयोजित किया गया। अंततः मई 1931 में फ्लोरेंस इटली में अंतर्राष्ट्रीय पशु संरक्षण कांग्रेस (International Animal Protection Congress) द्वारा 4 अक्टूबर को विश्व पशु दिवस मनाने का संकल्प अपनाया गया था।

World Animal Welfare Day 2022: थीम (Theme)

इस साल विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 का थीम "रिकवरिंग की स्पेसीज फॉर इकोसिस्टम रेस्टोरेशन" है।

पिछले वर्ष विश्व पशु कल्याण दिवस 2021 का थीम "Forests and Livelihoods : Sustaining People and Planet"  था।

पशु कल्याण के लिए समय-समय पर अनेक नियम और कानून भी बनाए गए हैं। परंतु इन नियमों और कानूनों की सार्थकता तभी है जब मनुष्य खुद जागरूक हों और इन पशुओं के प्रति संवेदनशील हो, जो अपना दर्द तक भी बयां नहीं कर सकते। 

अंतर राष्ट्रीय पशु दिवस की अवधारणा यह है कि प्रत्येक जानवर एक अनोखा संवेदनात्मक प्राणी है और वह संवेदना और सामाजिक न्याय पाने के योग्य भी है।

English Translate

world animal welfare day 2022

Today is World Animal Welfare Day. We all are aware that every animal is helpful to us in some way or the other. Nature itself has been structured in such a way that every animal or rather every animal, animal, animal bird has its own importance. Animals are one of the most important parts of nature, which play an important role in environmental protection and human welfare. Animals keep nature's ecosystem balanced. This is the reason why World Animal Welfare Day is celebrated every year on 4 October.

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

World Animal Welfare Day was first started in 1931 in the city of Florence, Italy at a conference of ecologists. The main purpose of celebrating this day was to protect and provide protection to the extinct animals as well as to stop cruelty and atrocities on animals.

Mostly it has been seen that our behavior towards stray animals is very disgusting and inhuman. Even during any natural calamity, we do not show kindness and love towards these animals and are not aware of their safety. We are sensitive or show love only to those animals which directly benefit us or which we keep for our hobby. The main purpose of celebrating this day is to improve the animal welfare standards and to get the support of group and organization of individuals and to show love and affection towards animals so that their life can be made safer and better.

History of World Animal Protection Day

Francis of Assisi had seen with his own eyes the plight of the animals around him and wanted to heal their pain.

On March 24, 1925, World Animal Day was originally organized by a German named Heinrich Zimmermann (1887–1942), who was not only a writer, but also published a bi-monthly magazine named Mensch und Hund (Man And Dog), he used this magazine as a medium to promote his views on animal welfare and to establish the World Animal Day Committee.

On 24 March 1925, his committee organized World Animal Welfare Day, he organized it at the Sports Palace of Berlin, Germany, to raise awareness of animal welfare issues of the time, and around 5,000 people took part in this first event and the event was marked with the Feast of St. Francis of Assisi which was the 4th of October.

Over the next few years, the event was held every year and in 1929, it was held on 4 October. Finally, in May 1931, the International Animal Protection Congress in Florence, Italy adopted a resolution to celebrate 4 October as World Animal Day.

विश्व पशु कल्याण दिवस  2022 || World Animal Welfare Day 2022 ||

World Animal Welfare Day 2022: Theme

This year the theme of World Animal Welfare Day 2022 is "Recovering Key Species for Ecosystem Restoration".

Last year the theme of World Animal Welfare Day 2021 was "Forests and Livelihoods: Sustaining People and Planet".

Many rules and regulations have also been made from time to time for animal welfare. But these rules and laws have meaning only when humans themselves are aware and sensitive to these animals, which cannot even express their pain.

The concept of International Animal Day is that each animal is a unique sentient being and is also worthy of compassion and social justice.


औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

Navdurga

9. सिद्धिदात्री (शतावरी) : -

मां का नवा रूप सिद्धिदात्री का है, जिसे नारायणी शतावरी कहते हैं। बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है। शतावरी का नियम पूर्वक सेवन करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर होते हैं।

सिद्धिदात्री (शतावरी)

इस नवरात्रि आपसब को समृद्धि एवं आरोग्य की शुभकामनाओं सहित

बर्बरी तुलसी || जंगली तुलसी || बन तुलसी || Barbari Tulsi ||

बर्बरी तुलसी अर्थात जंगली तुलसी

तुलसी के पौधे से तो सभी वाकिफ हैं। बच्चे से लेकर बुजुर्ग सभी को तुलसी का ज्ञान है। तुलसी एक पवित्र पौधा है, जिसकी पूजा लगभग हर घरों में की जाती है। तुलसी एक नहीं बल्कि कई प्रकार की होती हैं। उन्हीं में से एक है, बर्बरी तुलसी। बर्बरी तुलसी को जंगली तुलसी भी कहा जाता है, जो औषधीय गुणों से परिपूर्ण है। आज हम बर्बरी तुलसी अर्थात जंगली तुलसी के बारे में चर्चा करेंगे। 

बर्बरी तुलसी || जंगली तुलसी || बन तुलसी || Barbari Tulsi ||

बर्बरी तुलसी क्या है?

बरबरी तुलसी 60 से 90 सेंटीमीटर ऊंचा, सीधा और अनेक शाखा वाला पौधा होता है, जिसके तने बैंगनी रंग के होते हैं। इसके पत्ते सीधे, फूल सुगंधित, सफेद गुलाबी अथवा बैगनी होते हैं। इसके फल 2 मिली मीटर लंबे, थोड़े नुकीले, श्यामले रंग के चिकने तथा झुर्रीदार होते हैं। बर्बरी तुलसी के पौधे में फूल और फल सालों भर होते हैं।

जानते हैं बर्बरी तुलसी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

बर्बरी तुलसी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

आयुर्वेद के अनुसार, तुलसी बर्बरी के फायदे वात-पित्त-कफ विकार दोषों को दूर करने, भूख को बढ़ाने और ह्रदय को स्वस्थ बनाने में मिलते हैं। आप खुजली, रक्तविकार, कुष्ठ रोग, विसर्प और मूत्र संबंधित बीमारियों में भी तुलसी बर्बरी से लाभ ले सकते हैं।

सिर दर्द होने पर

वन तुलसी के पत्तों के रस को नाक में डालने से बेहोशी, सिर दर्द और साइनस की समस्या में फायदा होता है।

आंखों की समस्या

बन तुलसी के पत्ते के रस को आंखों में लगाने से आंखों की बीमारी में लाभ होता है।

बर्बरी तुलसी || जंगली तुलसी || बन तुलसी || Barbari Tulsi ||

नकसीर की समस्या (नाक से खून गिरना)

बन तुलसी के पत्ते के रस को नाक में डालने से बहने वाला खून रुक जाता है। 

कान का दर्द

बन तुलसी के पत्ते के एक से दो बूंद रस को कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है।

खांसी की समस्या

5 से 10 मिलीलीटर बर्बरी तुलसी के पत्ते के रस में शहद मिलाकर चटाने से खांसी में आराम मिलता है।

दस्त होने पर

बन तुलसी के 10 से 15 मिलीलीटर काढ़े में 500 मिलीग्राम जायफल चूर्ण मिलाकर पिलाने से दस्त रूकती है।

पेट दर्द होने पर

वन तुलसी के पत्ते के 5 से 10 मिलीलीटर रस में मिश्री मिलाकर सेवन करने से पेट का दर्द ठीक होता है।

गठिया की समस्या

बन तुलसी के पत्तियों के 15 से 30 मिलीलीटर काढ़ा में 1 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर तथा 500 मिलीग्राम काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से गठिया के दर्द में आराम होता है।

बर्बरी तुलसी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

मोच आने पर

बन तुलसी के पत्ते के रस को लगाने से मोच ठीक होता है।

त्वचा संबंधी समस्या

बन तुलसी के पत्ते के रस को त्वचा पर लगाने से दाग, सूजन तथा खुजली में लाभ होता है।

घाव को सुखाने में

बन तुलसी के पत्तों को पीसकर घाव पर लगाने से घाव तुरंत भर जाता है।

माइग्रेन की समस्या

बन तुलसी का उपयोग करने से माइग्रेन की समस्या दूर होती है और सिर दर्द में आराम मिलता है।

बुखार होने पर

बन तुलसी के 5 ग्राम बीजों को पीसकर उसका शर्बत बनाकर पीने से बुखार उतर जाता है।

शरीर में जलन होने पर

वन तुलसी को पीसकर लगाने से बुखार के कारण होने वाले शरीर में की जलन ठीक होती है।

सूजन की समस्या

वन तुलसी के पत्तों को पीसकर सूजन वाली जगह पर लगाने से सूजन में आराम मिलता है तथा दर्द ठीक होता है।

मलेरिया होने पर

वन तुलसी का औषधीय गुण मलेरिया के लक्षणों को कम करने में सहायक होता है तथा इसका पौधा घर में लगे रहने से मच्छर दूर होते हैं।

हृदय को मजबूत बनाने में

वन तुलसी का औषधीय गुण खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक होता है साथ ही यह दिल की कार्य क्षमता को भी बढ़ाता है। इसीलिए दिल के मरीजों को तुलसी जी का सेवन करने की सलाह दी जाती है।

बर्बरी तुलसी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

विभिन्न भाषाओं में तुलसी बर्बरी के नाम

Hindi – बर्बरी, बबुई तुलसी, गुलाल तुलसी, काली तुलसी, वन तुलसी, बार्बर, सबजा
Sanskrit – बर्बरी, क्षुद्रतुलसी, पर्णास, तुंगी (बड़ी होने से), खरपुष्पा
English – कॉमन बैसिल (Common basil), लेमन बैसिल (Lemon basil), मॉन्वस बैसिल (Maunvus basil), Common sweet-basil (कॉमन स्वीट बैसिल)
Urdu – जंगली तुलसी (Baburi tulasi)
Oriya – धालातुलसी (Dhalatulsi)
Kannada – कामकस्तूरी (Kamkasturi), रामकस्तूरी (Ramkasturi)
Gujarati – डमरो (Damaro), रन तुलसी (Ran tulsi)
Telugu – भू तुलसी (Bhu tulasi), विबूतिपत्ते (Vibuti patra)
Tami – तिरनुत्पतची (Tirnutpatchi)
Bengali – बाबुई तुलसी (Babui tulsi)
Nepali – बामरी (Bamri)
Punjabi – बबरि (Babri)
Marathi – सबजा (Sabza), मारवा (Marva)
Malayalam – पाच्चा (Pachcha)
Arabic – अलरिहान (Alrihan), हबाक (Habaq), रेहान (Rihan)
Persian – नाजबू (Nazbu), फिरंज मुश्क (Firanj mushk)

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा 

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

8. महागौरी (तुलसी) : -

माता का आठवां रूप महागौरी का है। महागौरी का औषधीय नाम तुलसी है और इसको प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है। इसे घर में लगाकर इन की पूजा की जाती है। पौराणिक महत्व से तुलसी एक औषधि है, जिसका इस्तेमाल कई बीमारियों में किया जाता है। तुलसी सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये रक्त को साफ कर ह्वदय रोगों का नाश करती है। 

महागौरी (तुलसी)

इस नवरात्रि आपसब को समृद्धि एवं आरोग्य की शुभकामनाओं सहित

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा


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Tulsi Barbari: तुलसी बर्बरी (जंगली तुलसी) के फायदे- Acharya Balkrishan Ji (Patanjali)

@भारतीय मसाला || Indian Spice || Bharatiya Masale ||

गर जुनून हो सिर पे तेरे

गर जुनून हो सिर पे तेरे

Rupa Oos ki ek Boond
"बारिश की बूँदें भले ही छोटी हों,
लेकिन उनका लगातार बरसना
बड़ी नदियों का बहाव बन जाता है...
वैसे ही हमारे छोटे छोटे प्रयास भी
जिंदगी में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं...❤"

गर जुनून हो सिर पे तेरे, और अंतर मन में हो विश्वास,

फिर ठोकर और ठुकराने का , क्या होगा तुम्हें एहसास?


मकसद में सच्चाई हो तो सीना ठोक के यही कहो,

झुकना होगा, दुनिया, तुमको, विश्वास पे अपने अडे रहो,

दुनिया बदली है जिसने भी, पहले उसको इनकार मिला,

अपमानों का हार मिला और तानों का उपहार मिला,

अविश्वास में अब विश्वास भरो, और लहरों के विपरीत बहो।

हाथों में विजय मशाल लिये विश्वास पे अपने खड़े रहो।


अपने सपने तुम स्वयं चुनो और बुन लो विश्वास कि डोरी से,

तुम विजय के नायक हो, तुमको क्या करना है लोरी से?

तुम सर्व सिद्ध इस जीवन के उन्मुक्त गगन में उडे चलो।

आरम्भ आज से नव युग का विश्वास पे अपने खडे रहो।

Rupa Oos ki ek Boond

"जब तक हम अपनी समस्याओं एंव
कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है,
तब तक हम अपनी समस्याओं एंव
कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते...❤"

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा 

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

7. कालरात्रि (नागदौन) : -

मां का सातवां रूप कालरात्रि का है। यह देवी नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती हैं। यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी और मन एवं मस्तिष्क के विकारों को दूर करने वाली औषधि है।
कालरात्रि (नागदौन)

चुहिया का स्वयंवर : पंचतंत्र || Chuhiya ka Swayambar : Panchtantra || The Wedding Of The Mice ||

चुहिया का स्वयंवर

स्वजातिः दुरतिक्रमा।

स्वजातीय ही सबको प्रिय होते हैं।

चुहिया का स्वयंवर : पंचतंत्र || Chuhiya ka Swayambar  : Panchtantra ||

गंगा नदी के किनारे एक तपस्वियों का आश्रम था। वहाँ याज्ञवल्क्य नाम के मुनि रहते थे। मुनिवर एक नदी के किनारे जल लेकर आचमन कर रहे थे कि पानी से भरी हथेली में ऊपर से एक चुहिया गिर गई। उस चुहिया को आकाश में बाज लिए जा रहा था। उसके पंजे से छुटकर वह नीचे गिर गई। मुनि ने उसे पीपल के पत्ते पर रखा और फिर गंगाजल में स्नान किया। चुहिया में अभी प्राण शेष थे। उसे मुनि ने अपने प्रताप से कन्या का रूप दे दिया, और अपने आश्रम में ले आए। मुनि-पत्नी को कन्या अर्पित करते हुए मुनि ने कहा कि इसे अपनी ही लड़की की तरह पालना। उनके अपनी कोई सन्तान नहीं थी, इसलिए मुनि-पत्नी ने उसका लालन-पालन बड़े प्रेम से किया। बारह वर्ष तक वह उनके आश्रम में पलती रही।

चुहिया का स्वयंवर : पंचतंत्र || Chuhiya ka Swayambar  : Panchtantra || The Wedding Of The Mice ||

जब यह विवाह-योग्य अवस्था की हो गई तो पत्नी ने मुनि से कहा- नाथ! अपनी कन्या अब विवाह योग्य हो गई है। इसके विवाह का प्रबन्ध कीजिए।

मुनि ने कहा ममैं अभी आदित्य को बुलाकर इसे उसके हाथ सौंप देता हूँ । यदि इसे स्वीकार होगा तो उसके साथ विवाह कर लेगी, अन्यथा नहीं-मुनि ने आदित्य को बुलाकर अपनी कन्या से पूछा-पुत्री ! क्या तुझे यह त्रिलोक को प्रकाश देने वाला सूर्य पतिरूप में स्वीकार है? पुत्री ने उत्तर दिया- तात ! यह तो आग जैसा गरम हे, मुझे स्वीकार नहीं। इससे अच्छा कोई वर बुलाइए। 

मुनि ने सूर्य से पूछा कि वह अपने से अच्छा कोई वर बतलाए। सूर्य ने कहा मुझसे अच्छे मेघ हैं, जो मुझे ढककर छिपा लेते हैं। मुनि ने मेघ को बुलाकर फिर कन्या से पूछा- क्या तुझे स्वीकार है? कन्या ने कहा- यह तो बहुत काला है। इससे भी अच्छे किसी वर को बुलाओ। मुनि ने मेघ से पूछा कि उससे अच्छा कौन है? मेघ ने कहा - हमसे अच्छा पवन है, जो हमें उड़ाकर दिशा-दिशा में ले जाता है। मुनि ने पवन को बुलाया और कन्या से स्वीकृति ली। कन्या ने कहा – तात, यह तो बड़ा चंचल है। इससे भी किसी अच्छे वर को बुलाओ। मुनि ने पवन से भी पूछा कि उससे अच्छा कौन है पवन ने कहा मुझसे अच्छा पर्वत है जो बड़ी से बड़ी आँधी में भी स्थिर रहता है। मुनि ने पर्वत को बुलाया, तो कन्या ने कहा तात यह तो बड़ा कठोर और गम्भीर है, इससे भी अच्छा कोई वर बुलाओ। मुनि ने पर्वत से कहा कि वह अपने से अच्छा कोई वर सुझाए। तब पर्वत ने कहा-मुझसे अच्छा तो चूहा है, जो मुझे तोड़कर अपना बिल बना लेता है। मुनि ने तब चूहे को बुलाया और कन्या से कहा- पुत्री ! यह मूषकराज तुझे स्वीकार हो तो इससे विवाह कर लो। मुनिकन्या ने मूषकराज को बड़े ध्यान से देखा उसके साथ उसे विलक्षण अपनापन अनुभव हो रहा था। प्रथम दृष्टि में ही वह उसपर मुग्ध हो गयी और बोली मुझे मूषिका बनाकर मूषकराज के हाथ सौंप दीजिए। मुनि ने अपने तपोबल से उसे फिर चुहिया बना दिया और चूहे के साथ उसका विवाह कर दिया। 

रक्ताक्ष द्वारा यह कहानी सुनने के बाद भी उलूकराज के सैनिक स्थिरजीवी को अपने दुर्ग में ले आए। दुर्ग के द्वार पर पहुंचकर अरिमर्दन ने अपने साथियों से कहा कि स्थिरजीवी को वही स्थान दिया जाए जहाँ वह रहना चाहे। स्थिरजीवी ने सोचा कि दुर्ग के द्वार पर ही रहना चाहिए, दु से बाहर जाने का अवसर मिलता रहे यही सोच उसने उ से कहा-देव! आपने मुझे यह आदर देकर बहुत लज्जित किया है। मैं तो आपका सेवक हूँ, और सेवक के स्थान पर ही रहना चाहता हूँ। मेरा स्थान दुर्ग के द्वार पर रखिए। द्वार की जो धूलि आपके पद-कमलों से पवित्र होगी उसे अपने मस्तक पर रखकर ही मैं अपने को सौभाग्यवान् मानूँगा।

उलूकराज इन मीठे वचनों को सुनकर फूले न समाए। उन्होंने अपने साथियों से कहा कि स्थिरजीवी को यथेष्ट भोजन दिया जाए। प्रतिदिन स्वादु और पुष्ट भोजन खाते-पीते स्थिरजीवी थोड़े ही दिनों में पहले जैसा मोटा और बलवान हो गया।  रक्ताक्ष ने जब स्थिरजीवी को हष्ट-पुष्ट होते देखा तो वह मन्त्रियों से बोला- यहाँ सभी मूर्ख हैं। जिस तरह उस सोने की बीट देने वाले पक्षी ने कहा था कि यहाँ सब मूर्ख हैं, उसी तरह में कहता हूँ यहाँ सभी मूर्ख मण्डल हैं।

मन्त्रियों ने पूछा- किस पक्षी की तरह ?

तब रक्ताक्ष ने स्वर्ण पक्षी की यह कहानी सुनाई

To be continued ...

मूर्ख मण्डली



औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

6. कात्यायनी (मोइया) :- 

मां दुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। देवी कात्यायनी को आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है। जैसे- अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका। इसके अलावा इन्हें मोइया भी कहते हैं। यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा
औषधियों में विराजमान नवदुर्गा
औषधियों में विराजमान नवदुर्गा
मोइया को किसी किसी स्थान पर माचिका भी कहते हैं। 

लकड़बग्घा से जुड़े 20 रोचक तथ्य || 20 Interesting facts about Hyena ||

लकड़बग्घा(Hyena) से जुड़े रोचक तथ्य

लकड़बग्घा (Hyena) एक मांसाहारी जानवर है, जो कुत्ते के आकार के जैसा दिखता है, लेकिन यह कुत्ते के किसी भी प्रजाति या पुर्वजों से नहीं मिलता जुलता है। लकड़बग्घा (Hyena) का आकार कुत्तों के जैसा होता है,पर ये कुत्ते की अपेक्षा अधिक खतरनाक होते हैं। तो आइए जानते हैं आज लकड़बग्घा (Hyena) के बारे में- 

लकड़बग्घा से जुड़े 20 रोचक तथ्य || 20 Interesting facts about Hyena ||

  1. लकड़बग्घे को हमारे धरती का सफाई कर्मी ही बोला जाता है क्योंकि यह धरती पर मौजूद जितनी भी जानवरों का सड़ा एवं गला हुआ मांस है वह सभी खा कर खत्म कर देते हैं, यहां तक कि वे हड्डियां भी नहीं छोड़ते।
  2. विश्वभर में लकड़बग्घों की चार ज्ञात जातियां अस्तित्व में हैं - I. धारीदार लकड़बग्घा  II. भूरा लकड़बग्घा  III. धब्बेदार लकड़बग्घा  IV. कीटभक्षी लकड़बग्घा लकड़बग्घा से जुड़े 20 रोचक तथ्य || 20 Interesting facts about Hyena ||
  3. लकड़बग्घा इस धरती पर लगभग 24 मिलियन साल से हैं।यानि ये प्राचीन काल से चले आ रहे हैं। मुख्य रूप से अफ्रीका और एशिया के सवाना जंगलों पाए जाते हैं।
  4. लकड़बग्घे की आयु लगभग 10 से 12 वर्ष की होती है।
  5. मादा चित्तीदार लकड़बग्घा नर लकड़बग्घा से 10 गुना अधिक भारी होती है। इस वजह से यह अधिक ताकतवर और आक्रामक होती है।
  6. चित्तीदार लकड़बग्घा अपना भोजन जानवर का शिकार करके प्राप्त करता है, लेकिन धारीदार और बुरा लकड़बग्घा मरे हुए जानवरों को खाकर अपना पेट भरते हैं। अतः हम इन्हें ऐसा भी कह सकते हैं कि यह सफाई का कार्य करते हैं।
  7. कीट भक्षी लकड़बग्घा कीड़ा मकोड़ा खाकर अपना पेट भरता है। यह मुख्य रूप से दीमक को खाता है। एक रात में यह 30,000 से अधिक दिमाग खा सकता है।
  8. लकड़बग्घा उन जानवरों में से नहीं है जो पेट भर जाए तो अपना भोजन छोड़ देते हैं। वह जानवरों की हड्डियां तक भी खा जाता है ताकि उसका भोजन बर्बाद ना हो। यदि भोजन बच जाए तो वह उसे एक सुरक्षित स्थान पर छुपा देता है।
  9. लकड़बग्घा में भी कई प्रजातियां होती हैं। वह अपने प्रजाति अनुसार छोटे- बड़े रहते हैं, लेकिन उनको समूह में रहना पसंद है इसलिए लकड़बग्घे हमेशा अपने प्रजाति के साथ समूह बनाकर रखते हैं। इनके समूह को 'clan' कहा जाता है।
  10. लकड़बग्घा मुख्य रूप से निशाचर जानवर हैं, लेकिन कभी-कभी सुबह के समय भी अपनी मांद से निकल जाता है। लकड़बग्घा से जुड़े 20 रोचक तथ्य || 20 Interesting facts about Hyena ||
  11. एक चित्तीदार लकड़बग्घा एक बार में अपने शरीर के वजन का एक तिहाई आहार ग्रहण कर सकता है।
  12. चित्तीदार लकड़बग्घा को 'लाफिंग हाइनास' भी कहा जाता है ऐसा उसके द्वारा निकाली जाने वाली एक विशिष्ट ध्वनि के कारण है जो मनुष्य की हंसी के समान होती है।
  13. धारीदार लकड़बग्घा किसी प्रकार की आवाज नहीं निकालता है। वे शारीरिक हरकतों के द्वारा संवाद करते हैं।
  14. लकड़बग्घा और शेर एक-दूसरे द्वारा मारे गए शिकार चुराने के लिए भी जाने जाते हैं. शिकार के बाद लकड़बग्घा द्वारा अपन साथियों को बुलाने के लिए दी जाने वाली आवाज़ को शेर पहचानता है और वहाँ पहुँचकर उससे लड़कर उसका शिकार छीन लेता है।
  15. मादा लकड़बग्घा एक बार में 2 से 4 शावकों को जन्म देती है, जिन्हें (cub)कहा जाता है।
  16. जन्म के बाद लकड़बग्घा के शावकों की आंखें 5 से 9 दिन तक बंद रहती हैं, उसके बाद खुलती हैं।
  17. एक समूह के मादाएं एक दूसरे के शावकों की देखभाल करने की जिम्मेदारी साझा करती हैं। समूह के अन्य सदस्य शावकों के लिए मांद में भोजन लाते हैं।
  18.  2 सप्ताह का होने तक शावक मांद में ही रहते हैं, उसके बाद वे मांद से बाहर जाने लायक हो जाते हैं।
  19. शावक 6 माह तक पूर्णतः मां के दूध पर निर्भर रहते हैं।
  20. कायर और डरपोक के रूप में जाना जाने वाला लकड़बग्घा खतरनाक भी हो सकता है और अन्य जानवरों व मनुष्यों पर हमला कर सकता है।
लकड़बग्घा से जुड़े 20 रोचक तथ्य || 20 Interesting facts about Hyena ||
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Interesting facts about Hyena

The hyena is a carnivorous animal, similar in size to a dog, but does not resemble any of the dog species or ancestors. The size of a hyena is like a dog, but they are more dangerous than a dog. So let's know about the hyena today-
लकड़बग्घा से जुड़े 20 रोचक तथ्य || 20 Interesting facts about Hyena ||
  1. The hyena is called the cleaner of our earth because it eats all the rotten and decomposed flesh of all the animals present on the earth, they do not even leave the bones.
  2. There are four known species of hyena in the world - I. Striped hyena II. Brown hyena III. Spotted hyena IV. insectivorous hyena
  3. The hyenas have been on this earth for about 24 million years. That is, they have been coming since ancient times. Mainly found in the savanna forests of Africa and Asia.
  4. The lifespan of a hyena is about 10 to 12 years.
  5. The female spotted hyena is 10 times heavier than the male hyena. Because of this it is more powerful and aggressive.
  6. The spotted hyena gets its food by hunting the animal, but the striped and bad hyenas feed on dead animals. Therefore, we can also call them in such a way that they do the work of cleaning.
  7. The insect-eating hyena fills its stomach by eating insects. It mainly feeds on termites. In one night it can eat more than 30,000 brains.
  8. The hyena is not one of those animals that give up its food when its stomach is full. He even eats animal bones so that his food is not wasted. If food remains, he hides it in a safe place.
  9. There are also many species in the hyena. They live small and big according to their species, but they like to live in groups, so hyenas always keep groups with their species. Their group is called 'clan'.
  10. The hyenas are primarily nocturnal animals, but occasionally emerge from their den in the early morning. लकड़बग्घा से जुड़े 20 रोचक तथ्य || 20 Interesting facts about Hyena ||
  11. A spotted hyena can eat up to a third of its body weight at a time.
  12. The spotted hyena is also called 'laughing hyena' because of the characteristic sound it makes, which is similar to human laughter.
  13. The striped hyena does not make any sound. They communicate through physical movements.
  14. The hyena and the lion are also known to steal the prey killed by each other. After hunting, the lion recognizes the sound given by the hyena to call its companions and reaches there and fights it and snatches its prey.
  15. The female hyena gives birth to 2 to 4 cubs at a time, which are called cubs.
  16. After birth, the eyes of the rulers of the hyena remain closed for 5 to 9 days, after that they open.
  17. Females in a group share the responsibility of caring for each other's cubs. Other members of the group bring food to the den for the cubs.
  18.  The cubs remain in the den until they are 2 weeks old, after which they are able to leave the den.
  19. Cubs are completely dependent on mother's milk for 6 months.
  20. Known as cowardly and timid, the hyena can also be dangerous and attack other animals and humans.


औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

Navdurga

5. स्कंदमाता (अलसी) :-

मां दुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता का है। देवी स्कंदमाता औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है। अलसी कई औषधीय गुणों से परिपूर्ण है। इसके प्रतिदिन सेवन से कई रोगों से छुटकारा मिलता है। इसमें ओमेगा-3 और फाइबर बहुत अधिक मात्रा में होता है।

स्कंदमाता (अलसी)

इस नवरात्रि आपसब को समृद्धि एवं आरोग्य की शुभकामनाओं सहित

औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta ||अध्याय तीन ~ कर्मयोग || अनुच्छेद 01 - 08 में ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की आवश्यकता ||

 श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

इस ब्लॉग के माध्यम से हम सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता प्रकाशित करेंगे, इसके तहत हम सभी 18 अध्यायों और उनके सभी श्लोकों का सरल अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करेंगे। 

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के 18 अध्यायों में से अध्याय 1 और 2 के पूरे होने के बाद आज से अध्याय 3 की शुरुवात करते हैं।

अध्याय तीन       - कर्मयोग

01-08 ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की आवश्यकता
09-16 यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता तथा यज्ञ की महिमा का वर्णन
17-24 ज्ञानवानऔर भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता
25-35 अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिएप्रेरणा
36-43 पापके कारणभूत कामरूपी शत्रु को नष्ट करने का उपदेश 

श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय तीन ~ कर्मयोग ||

अथ तृतीयोऽध्यायः ~ कर्मयोग

अध्यायतीन के अनुच्छेद 01 - 08

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta ||अध्याय तीन ~ कर्मयोग || अनुच्छेद 01 - 08 में  ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की आवश्यकता ||

अध्याय तीन के अनुच्छेद 01 - 08 में  ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की आवश्यकता की व्याख्या है।

अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥3 .1॥
भावार्थ : 

अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?॥1॥

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌ ॥3 .2॥

भावार्थ : 

आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ॥2॥

श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌ ॥3 .3॥

भावार्थ :  

श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा (साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा का नाम 'निष्ठा' है।) मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से (माया से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरतते हैं, ऐसे समझकर तथा मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से रहित होकर सर्वव्यापी सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहने का नाम 'ज्ञान योग' है, इसी को 'संन्यास', 'सांख्ययोग' आदि नामों से कहा गया है।) और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से (फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदाज्ञानुसार केवल भगवदर्थ समत्व बुद्धि से कर्म करने का नाम 'निष्काम कर्मयोग' है, इसी को 'समत्वयोग', 'बुद्धियोग', 'कर्मयोग', 'तदर्थकर्म', 'मदर्थकर्म', 'मत्कर्म' आदि नामों से कहा गया है।) होती है॥3॥

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥3 .4॥

भावार्थ : 
मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम 'निष्कर्मता' है।) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है॥4॥

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥3 .5॥

भावार्थ : 

निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है॥5॥
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥3 .6॥

भावार्थ : 

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है॥6॥
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥3 .7॥

भावार्थ : 

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है॥7॥

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥3 .8॥

भावार्थ :  

तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा॥8॥



औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

Navdurga

4. कूष्मांडा (पेठा) : -


मां दुर्गा का चौथा रूप कुष्मांडा का है। कुष्मांडा अर्थात पेठा, इसे साधारण बोलचाल की भाषा में कुम्हड़ा (कोहड़ा) भी कहा जाता है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है। इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। यह रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिक रोगों में यह अमृत समान है। यह हृदय रोगियों के लिए भी लाभदायक होता है। कोलेस्ट्रोल को कम करने वाला, ठंडक पहुंचाने वाला और मूत्र वर्धक होता है। यह पेट की गड़बड़ियों में भी असरदायक है।
मां दुर्गा का चौथा रूप कुष्मांडा

🙏🚩जय माता दी 🚩🙏

मंगल महादेव मंदिर, दिल्ली || Mangal Mahadev Temple, Delhi ||

 मंगल महादेव मंदिर, दिल्ली

 महादेव बिरला कानन मंदिर एक हिंदू मंदिर है जो शिवाजी मार्ग रंगापूरी, नई दिल्ली में स्थित है। मंगल महादेव बिरला कानन मंदिर भगवान शिव और अन्य देवी देवताओं के विशालकाय मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। यह लगभग 200 एकड़ जमीन में बना हुआ है जहां असीम शांति की अनुभूति होती है। जब दिल्ली से गुड़गांव NH8 से जाते हैं तो रास्ते में ही इस मंदिर को देखा जा सकता है तथा मंदिर में भगवान शिव की विशाल मूर्ति को राष्ट्रीय राजमार्ग NH8 से देखा जा सकता है।

मंगल महादेव मंदिर, दिल्ली || Mangal Mahadev Temple, Delhi ||

मंगल महादेव बिरला कानन मंदिर में भगवान शिव की विशाल मूर्ति है, जिसकी ऊंचाई लगभग 100 फीट से ऊपर है। इस मंदिर में भगवान शिव के अलावा माता पार्वती, कार्तिकेय, नंदी बैल, सीताराम, राधा कृष्ण और भगवान गणेश की मूर्ति भी है।यह सभी मुर्तियां काफी विशाल और कांस्य की बनी हुई हैं, जिसके कारण मंदिर बहुत सुंदर और अद्भुत लगता है।

मंगल महादेव मंदिर, दिल्ली || Mangal Mahadev Temple, Delhi ||

मंगल महादेव मंदिर का निर्माण श्री सरल बसंत बिड़ला द्वारा कराया गया है और पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी बाजपेयी द्वारा 10  मार्च 1994 को इस मंदिर को लोकार्पित किया गया था।  मंदिर में जन सुविधाएं, पीने के पानी के लिये कूलर, टॉयलेट्स, बेंच आदि की अच्छी व्यवस्था की गयी है। इसके अलावा मंगल मंजूषा के नाम से प्रसाद व सोविनियर का रिटेल काउंटर भी उपलब्ध कराया गया है। यहाँ एक सत्संग हॉल भी मौजूद है।

मंगल महादेव मंदिर, दिल्ली || Mangal Mahadev Temple, Delhi ||

मंदिर परिसर में सफाई का काफी ध्यान रखा जाता है। मंदिर के दोनों तरफ बगीचे बने हुए हैं जिनके बीच से मंदिर परिसर में जाने का रास्ता है। मंदिर के आध्यात्मिक वातावरण से भक्तों के मन और हृदय को शांति प्राप्त होती है।

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Mangal Mahadev Temple, Delhi

 Mahadev Birla Kanan Temple is a Hindu temple located at Shivaji Marg, Rangapuri, New Delhi. Mangal Mahadev Birla Kanan Temple is famous for the giant statues of Lord Shiva and other deities. It is built in about 200 acres of land where there is a feeling of infinite peace. When going from Delhi to Gurgaon via NH8, this temple can be seen on the way and the huge idol of Lord Shiva in the temple can be seen from National Highway NH8.

मंगल महादेव मंदिर, दिल्ली || Mangal Mahadev Temple, Delhi ||

Mangal Mahadev Birla Kanan Temple has a huge idol of Lord Shiva, whose height is above about 100 feet. Apart from Lord Shiva, this temple also has idols of Mata Parvati, Kartikeya, Nandi Bull, Sitaram, Radha Krishna and Lord Ganesha. All these idols are quite huge and made of bronze, due to which the temple looks very beautiful and wonderful.

मंगल महादेव मंदिर, दिल्ली || Mangal Mahadev Temple, Delhi ||

Mangal Mahadev Temple has been constructed by Shri Saral Basant Birla and former Prime Minister Late Shri. This temple was dedicated by Atal Bihari Bajpayee on 10 March 1994. Good arrangements have been made in the temple for public facilities, coolers for drinking water, toilets, benches etc. Apart from this, a retail counter of Prasad and Souvenir has also been made available in the name of Mangal Manjusha. A satsang hall is also present here.

मंगल महादेव मंदिर, दिल्ली || Mangal Mahadev Temple, Delhi ||

A lot of care is taken of cleanliness in the temple premises. There are gardens on both sides of the temple, through which there is a path to the temple premises. The spiritual atmosphere of the temple brings peace to the mind and heart of the devotees.

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औषधियों में विराजमान नवदुर्गा

3. चंद्रघंटा (चंदुसूर) : -

मां दुर्गा का तृतीय रूप चंद्रघंटा का है। इसको चंदुसूर से जोड़ा गया है। यह एक ऎसा पौधा है, जो धनिए के समान है। यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है। इसलिए इसे चर्महंती भी कहते हैं। इस पौधे में कई औषधीय गुण है। यह शक्ति को बढ़ाने वाली एवं ह्रदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अतः इन बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति को मां चंद्रघंटा की पूजा और प्रसाद के रूप में चंदुसूर ग्रहण करना चाहिए।

चंद्रघंटा (चंदुसूर)

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