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ज़िन्दगी जीने के लिए

ज़िन्दगी जीने के लिए

Rupa Oos ki ek Boond

झूठ भी बोलना पड़ता हैं,सच भी

छुपाना पड़ता है..

ज़िन्दगी जीने के लिए हर रास्ता

अपनाना पड़ता है..

शरीफ लोगों को जीने कहा

देते हैं,

कभी कभी बुरा भी बन जाना

पड़ता है..

ये ज़िन्दगी है साहब..

यहाँ दर्द छुपाकर भी मुस्कुराना

पड़ता है..

Rupa Oos ki ek Boond


शारीरिक सुख: उपदेशात्मक कहानियां

शारीरिक सुख

एक बार एक नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?

शारीरिक सुख: उपदेशात्मक कहानियां

कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।

नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।

कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।

शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।

जीत किसके लिए, हार किसके लिए
ज़िंदगीभर ये तकरार किसके लिए!!
जो भी आया है वो जायेगा एक दिन,
फिर ये इतना अहंकार किसके लिए।

मिजोरम का राज्य पशु "हिमालयन सीरो" || State Animal of Mizoram "Himalayan Serow" कैप्रिकोर्निस थार

मिजोरम का राज्य पशु "हिमालयन सीरो"

सामान्य नाम:  हिमालयन सीरो (Himalayan Serow)
स्थानीय नाम: साज़ा
वैज्ञानिक नाम: कैप्रिकोर्निस थार

"हिमालयन सीरो", जिसे मिज़ो भाषा में "साज़ा" भी कहा जाता है, मिज़ोरम का राज्य पशु है। निवास स्थान के नुकसान और शिकार के कारण इस प्रजाति को IUCN की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में "असुरक्षित" के रूप में वर्गीकृत किया गया है। सीरो राज्य के वन्य जीवन और जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है और क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए इसकी सुरक्षा आवश्यक है।

मिजोरम का राज्य पशु "हिमालयन सीरो" || State Animal of Mizoram "Himalayan Serow"

मिजोरम भारत के पूर्वोत्तर सात राज्यों में से एक है। इसकी राजधानी आइजोल है। 20 फरवरी 1987 को यह भारत के 23 वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इस राज्य की सीमा त्रिपुरा, असम और मणिपुर से मिलती हैं। इनके अतिरिक्त इसकी अंतर्राष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश और म्यांमार से मिलती है। इस राज्य का अपना पृथक उच्च न्यायालय नहीं है। यह गुवाहाटी उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र के अंतर्गत आता है। आज हम यहाँ के राजकीय पशु के बारे में चर्चा करेंगे। 

सीरो एक बकरी-मृग प्रजाति है जो बोविडे परिवार से संबंधित है और मिजोरम सहित भारत के उत्तरपूर्वी क्षेत्रों की मूल निवासी है। यह एक मध्यम आकार का जानवर है, जिसका शरीर मजबूत होता है और उसका कोट अलग-अलग रंग का होता है, जो आमतौर पर गहरे भूरे रंग से लेकर लाल-भूरे रंग का होता है। इसके गले पर और कभी-कभी छाती पर एक विशिष्ट सफेद धब्बा होता है। सीरो में नर और मादा दोनों में छोटे, सीधे सींग होते हैं, हालाँकि नर में सींग अधिक प्रमुख होते हैं।

सीरो पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में रहने के लिए अनुकूलित होते हैं और वे आमतौर पर मिजोरम के घने जंगलों और चट्टानी इलाकों में पाए जाते हैं। वे फुर्तीले पर्वतारोही हैं और पूर्वोत्तर राज्यों की खड़ी ढलानों और ऊबड़-खाबड़ परिदृश्यों को पार करने के लिए उपयुक्त हैं।

मिजोरम का राज्य पशुसीरोमिजोरम के वन क्षेत्रों के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह एक शाकाहारी जानवर है, जो वनस्पति को आकार देने और बीजों को फैलाने में योगदान देता है और पारिस्थितिकी तंत्र की जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करता है। सीरो खाद्य श्रृंखला में भूमिका निभाते हुए विभिन्न मांसाहारी शिकारियों के लिए भी शिकार का काम करता है।

मिजोरम का राज्य पशु "हिमालयन सीरो" || State Animal of Mizoram "Himalayan Serow"

सांस्कृतिक रूप सेसेरो को मिजोरम राज्य के साथ जुड़ाव के लिए सराहा जाता है। यह स्थानीय लोककथाओंपरंपराओं और वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में महत्व रखता है।

संरक्षण की स्थिति: सीरो को अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की लाल सूची में एक संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। कई अन्य वन्यजीव प्रजातियों की तरह, इसे निवास स्थान की हानि, अवैध शिकार और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे खतरों का सामना करना पड़ता है। मिजोरम में, सीरो और उसके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए संरक्षण के प्रयास किए जाते हैं।

मिजोरम के जंगलों की पारिस्थितिक अखंडता को बनाए रखने और राज्य की जैव विविधता की सुरक्षा के लिए सीरो और उसके प्राकृतिक आवास को संरक्षित करना आवश्यक है। आवास संरक्षण, अवैध शिकार विरोधी पहल और वन्यजीव संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने सहित संरक्षण उपाय, भविष्य की पीढ़ियों के लिए इस अनूठी और राजसी प्रजाति के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

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State Animal of Mizoram "Himalayan Serow"

Common Name: Himalayan Serow
Local name: Saza
Scientific name: Capricornis thar

The "Himalayan Serow", also known as "Saza" in the Mizo language, is the state animal of Mizoram. This species is classified as "Vulnerable" on the IUCN Red List of Threatened Species due to habitat loss and hunting. The serow is an important symbol of the state's wildlife and biodiversity and its protection is essential to maintain the ecological balance of the region.

मिजोरम का राज्य पशु "हिमालयन सीरो" || State Animal of Mizoram "Himalayan Serow"

Mizoram is one of the seven northeastern states of India. Its capital is Aizawl. It came into existence as the 23rd state of India on 20 February 1987. The borders of this state meet with Tripura, Assam and Manipur. Apart from these, its international border is with Bangladesh and Myanmar. This state does not have its own separate High Court. It comes under the jurisdiction of Gauhati High Court. Today we will discuss about the state animal of this place.

The serow is a goat-antelope species that belongs to the Bovidae family and is native to the northeastern regions of India, including Mizoram. It is a medium-sized animal, with a strong body and a coat that varies in color, usually ranging from dark brown to reddish-brown. It has a distinctive white spot on its throat and sometimes on its chest. Both males and females of the serow have small, straight horns, although the horns are more prominent in the male.

Serows are adapted to live in hilly and mountainous areas and are commonly found in the dense forests and rocky areas of Mizoram. They are agile climbers and are well suited for traversing the steep slopes and rugged landscapes of the northeastern states.

The state animal of Mizoram, the serow, plays an important role in maintaining the ecological balance of the forest areas of Mizoram. It is a herbivorous animal, which contributes to shaping vegetation and dispersing seeds and helps maintain the biodiversity of the ecosystem. The serow also serves as prey for various carnivorous predators, playing a role in the food chain.

Culturally, Sero is appreciated for its association with the state of Mizoram. It holds significance in local folklore, traditions and wildlife conservation efforts.

मिजोरम का राज्य पशु "हिमालयन सीरो" || State Animal of Mizoram "Himalayan Serow"

Conservation status: The serow is listed as a threatened species on the International Union for Conservation of Nature (IUCN) Red List. Like many other wildlife species, it faces threats such as habitat loss, poaching, and human-wildlife conflict. In Mizoram, conservation efforts are made to protect and conserve the serow and its natural habitats.

Conserving the serow and its natural habitat is essential to maintain the ecological integrity of Mizoram's forests and safeguard the biodiversity of the state. Conservation measures, including habitat protection, anti-poaching initiatives and raising awareness about the importance of wildlife conservation, are important to ensure the survival of this unique and majestic species for future generations.

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मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-1 .. माँ ..

मानसरोवर-1 .. माँ ..

 माँ - मुंशी प्रेमचंद | Maa by Munshi Premchand

आज बन्दी छूटकर घर आ रहा है। करुणा ने एक दिन पहले ही घर लीप-पोत रखा था। इन तीन वर्षों में उसने कठिन तपस्या करके जो दस-पाँच रूपये जमा कर रखे थे, वह सब पति के सत्कार और स्वागत की तैयारियों में खर्च कर दिये। पति के लिए धोतियों का नया जोड़ा लायी थी, नये कुरते बनवाये थे, बच्चे के लिए नये कोट और टोपी की आयोजना की थी। बार-बार बच्चे को गले लगाती ओर प्रसन्न होती। अगर इस बच्चे ने सूर्य की भाँति उदय होकर उसके अंधेरे जीवन को प्रदीप्त न कर दिया होता, तो कदाचित् ठोकरों ने उसके जीवन का अंत कर दिया होता। पति के कारावास-दण्ड के तीन ही महीने बाद इस बालक का जन्म हुआ। उसी का मुँह देख-देखकर करूणा ने यह तीन साल काट दिये थे। वह सोचती- जब मैं बालक को उनके सामने ले जाऊँगी, तो वह कितने प्रसन्न होंगे! उसे देखकर पहले तो चकित हो जायेंगे, फिर गोद में उठा लेंगे और कहेंगे- करूणा, तुमने यह रत्न देकर मुझे निहाल कर दिया। कैद के सारे कष्ट बालक की तोतली बातों में भूल जायेंगे, उनकी एक सरल, पवित्र, मोहक दृष्टि दृदय की सारी व्यथाओं को धो डालेगी। इस कल्पना का आनंद लेकर वह फूली न समाती थी।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-1 .. माँ ..

वह सोच रही थी- आदित्य के साथ बहुत-से आदमी होंगे। जिस समय वह द्वार पर पहुँचेगे, जय-जयकार' की ध्वनि से आकाश गूँज उठेगा। वह कितना स्वर्गीय दृश्य होगा! उन आदमियों के बैठने के लिए करूणा ने एक फटा-सा टाट बिछा दिया था, कुछ पान बना दिये थे ओर बार-बार आशामय नेत्रों से द्वार की ओर ताकती थी। पति की वह सुदृढ़ उदार तेजपूर्ण मुद्रा बार-बार आँखों में फिर जाती थी। उनकी वे बातें बार-बार याद आती थीं, जो चलते समय उनके मुख से निकलती थी, उनका वह धैर्य, वह आत्मबल, जो पुलिस के प्रहारों के सामने भी अटल रहा था, वह मुस्कराहट जो उस समय भी उनके अधरों पर खेल रही थी; वह आत्मभिमान, जो उस समय भी उनके मुख से टपक रहा था, क्या करूणा के हृदय से कभी विस्मृत हो सकता था! उसका स्मरण आते ही करुणा के निस्तेज मुख पर आत्मगौरव की लालिमा छा गयी। यही वह अवलम्ब था, जिसने इन तीन वर्षों की घोर यातनाओं में भी उसके हृदय को आश्वासन दिया था। कितनी ही राते फाकों से गुजरीं, बहुधा घर में दीपक जलने की नौबत भी न आती थी, पर दीनता के आँसू कभी उसकी आँखों से न गिरे। आज उन सारी विपत्तियों का अंत हो जाएगा। पति के प्रगाढ़ आलिंगन में वह सब कुछ हँसकर झेल लेगी। वह अनंत निधि पाकर फिर उसे कोई अभिलाषा न रहेगी।

गगन-पथ का चिरगामी लपका हुआ विश्राम की ओर चला जाता था, जहाँ संध्या ने सुनहरा फर्श सजाया था और उज्जवल पुष्पों की सेज बिछा रखी थी। उसी समय करूणा को एक आदमी लाठी टेकता आता दिखाई दिया, मानो किसी जीर्ण मनुष्य की वेदना-ध्वनि हो। पग-पग पर रूककर खाँसने लगता थी। उसका सिर झुका हुआ था, करणा उसका चेहरा न देख सकती थी, लेकिन चाल-ढाल से कोई बूढ़ा आदमी मालूम होता था; पर एक क्षण में जब वह समीप आ गया, तो करूणा पहचान गयी। वह उसका प्यारा पति ही था, किन्तु शोक! उसकी सूरत कितनी बदल गयी थी। वह जवानी, वह तेज, वह चपलता, वह सुगठन, सब प्रस्थान कर चुका था। केवल हड्‌डियों का एक ढाँचा रह गया था। न कोई संगी, न साथी, न यार, न दोस्त। करूणा उसे पहचानते ही बाहर निकल आयी, पर आलिंगन की कामना हृदय में दबकर रह गयी। सारे मनसूबे धूल में मिल गये। सारा मनोल्लास आँसुओं के प्रवाह में बह गया,विलीन हो गया।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-1 .. माँ ..

आदित्य ने घर में कदम रखते ही मुस्कराकर करूणा को देखा। पर उस मुस्कान में वेदना का एक संसार भरा हुआ था। करूणा ऐसी शिथिल हो गयी, मानो हृदय का स्पंदन रूक गया हो। वह फटी हुई आँखों से स्वामी की ओर टकटकी बाँधे खड़ी थी, मानो उसे अपनी आँखों पर अब भी विश्वास न आता हो। स्वागत या दु:ख का एक शब्द भी उसके मुँह से न निकला। बालक भी गोद में बैठा हुआ सहमी आँखों से इस कंकाल को देख रहा था और माता की गोद में चिपटा जाता था।

आखिर उसने कातर स्वर में कहा- यह तुम्हारी क्या दशा है? बिल्कुल पहचाने नहीं जाते!

आदित्य ने उसकी चिन्ता को शांत करने के लिए मुस्कराने की चेष्टा करके कहा- कुछ नहीं, जरा दुबला हो गया हूँ। तुम्हारे हाथों का भोजन पाकर फिर स्वस्थ हो जाऊँगा।

करूणा- छी! सूखकर काँटा हो गये। क्या वहाँ भरपेट भोजन नहीं मिलता? तुम कहते थे, राजनैतिक आदमियों के साथ बड़ा अच्छा व्यवहार किया जाता है और वह तुम्हारे साथी क्या हो गये जो तुम्हें आठों पहर घेरे रहते थे और तुम्हारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार रहते थे?

आदित्य की त्योरियों पर बल पड़ गये। बोले- यह बड़ा ही कटु अनुभव है करूणा! मुझे न मालूम था कि मेरे कैद होते ही लोग मेरी ओर से यों आँखें फेर लेंगे, कोई बात भी न पूछेगा। राष्ट्र के नाम पर मिटनेवालों का यही पुरस्कार है, यह मुझे न मालूम था। जनता अपने सेवकों को बहुत जल्द भूल जाती है, यह तो मैं जानता था, लेकिन अपने सहयोगी ओर सहायक इतने बेवफा होते हैं, इसका मुझे यह पहला ही अनुभव हुआ। लेकिन मुझे किसी से शिकायत नहीं। सेवा स्वयं अपना पुरस्कार हैं। मेरी भूल थी कि मैं इसके लिए यश और नाम चाहता था।

करूणा- तो क्या वहाँ भोजन भी न मिलता था?

आदित्य- यह न पूछो करूणा, बड़ी करूण कथा है। बस, यही गनीमत समझो कि जीता लौट आया। तुम्हारे दर्शन बदे थे, नहीं कष्ट तो ऐसे-ऐसे उठाए कि अब तक मुझे प्रस्थान कर जाना चाहिए था। मैं जरा लेटूँगा। खड़ा नहीं रहा जाता। दिन-भर में इतनी दूर आया हूँ।

करूणा- चलकर कुछ खा लो, तो आराम से लेटो। (बालक को गोद में उठाकर) बाबूजी हैं बेटा, तुम्हारे बाबूजी। इनकी गोद में जाओ, तुम्हें प्यार करेंगे।

आदित्य ने आँसू-भरी आँखों से बालक को देखा और उनका एक-एक रोम उनका तिरस्कार करने लगा। अपनी जीर्ण दशा पर उन्हें कभी इतना दु:ख न हुआ था। ईश्वर की असीम दया से यदि उनकी दशा संभल जाती, तो वह फिर कभी राष्ट्रीय आन्दोलन के समीप न जाते। इस फूल-से बच्चे को यों संसार में लाकर दरिद्रता की आग में झोंकने का उन्हें क्या अधिकार था? वह अब लक्ष्मी की उपासना करेंगे और अपना क्षुद्र जीवन बच्चे के लालन-पालन के लिए अपिर्त कर देंगे। उन्हें इस समय ऐसा ज्ञात हुआ कि बालक उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है, मानो कह रहा है- 'मेरे साथ आपने कौन-सा कर्तव्य-पालन किया?' उनकी सारी कामना, सारा प्यार बालक को हृदय से लगा देने के लिए अधीर हो उठा, पर हाथ फैल न सके। हाथों में शक्ति ही न थी।

करूणा बालक को लिये हुए उठी और थाली में कुछ भोजन निकालकर लायी। आदित्य ने क्षुधापूर्ण, नेत्रों से थाली की ओर देखा, मानो आज बहुत दिनों के बाद कोई खाने की चीज सामने आयी है। जानता था कि कई दिनों के उपवास के बाद और आरोग्य की इस गयी-गुजरी दशा में उसे जबान को काबू में रखना चाहिए पर सब्र न कर सका, थाली पर टूट पड़ा और देखते-देखते थाली साफ कर दी। करूणा सशंक हो गयी। उसने दोबारा किसी चीज के लिए न पूछा। थाली उठाकर चली गयी, पर उसका दिल कह रहा था- इतना तो कभी न खाते थे।

करूणा बच्चे को कुछ खिला रही थी, कि एकाएक कानों में आवाज आयी- करूणा!

करूणा ने आकर पूछा- क्या तुमने मुझे पुकारा है?

आदित्य का चेहरा पीला पड़ गया था और साँस जोर-जोर से चल रही थी। हाथों के सहारे वहीं टाट पर लेट गये थे। करूणा उनकी यह हालत देखकर घबरा गयी। बोली- जाकर किसी वैद्य को बुला लाऊँ?


आदित्य ने हाथ के इशारे से उसे मना करके कहा- व्यर्थ है करूणा! अब तुमसे छिपाना व्यर्थ है, मुझे तपेदिक हो गया है। कई बार मरते-मरते बच गया हूँ। तुम लोगों के दर्शन बदे थे,इसलिए प्राण न निकलते थे। देखो प्रिये, रोओ मत।

करूणा ने सिसकियों को दबाते हुए कहा- मैं वैद्य को लेकर अभी आती हूँ।

आदित्य ने फिर सिर हिलाया- नहीं करूणा, केवल मेरे पास बैठी रहो। अब किसी से कोई आशा नहीं है। डाक्टरों ने जवाब दे दिया है। मुझे तो यह आश्चर्य है कि यहाँ पहुँच कैसे गया। न जाने कौन दैवी शक्ति मुझे वहाँ से खींच लायी। कदाचित् यह इस बुझते हुए दीपक की अन्तिम झलक थी। आह! मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया। इसका मुझे हमेशा दु:ख रहेगा! मैं तुम्हें कोई आराम न दे सका। तुम्हारे लिए कुछ न कर सका। केवल सोहाग का दाग लगाकर और एक बालक के पालन का भार छोड़कर चला जा रहा हूँ। आह!

करूणा ने हृदय को दृढ़ करके कहा- तुम्हें कहीं दर्द तो नहीं है? आग बना लाऊँ? कुछ बताते क्यों नहीं?

आदित्य ने करवट बदलकर कहा- कुछ करने की जरूरत नहीं प्रिये! कहीं दर्द नहीं। बस, ऐसा मालूम हो रहा है कि दिल बैठा जाता है, जैसे पानी में डूबा जाता हूँ। जीवन की लीला समाप्त हो रही है। दीपक को बुझते हुए देख रहा हूँ। कह नहीं सकता, कब आवाज बन्द हो जाये। जो कुछ कहना है, वह कह डालना चाहता हूँ, क्यों वह लालसा ले जाऊँ। मेरे एक प्रश्न का जवाब दोगी, पूछूँ?

करूणा के मन की सारी दुर्बलता, सारा शोक, सारी वेदना मानो लुप्त हो गयी और उनकी जगह उस आत्मबल का उदय हुआ, जो मृत्यु पर हँसता है और विपत्ति के साँपों से खेलता है। रत्नजटित मखमली म्यान में जैसे तेज तलवार छिपी रहती है, जल के कोमल प्रवाह में जैसे असीम शक्ति छिपी रहती है, वैसे ही रमणी का कोमल हृदय साहस और धैर्य को अपनी गोद में छिपाये रहता है। क्रोध जैसे तलवार को बाहर खींच लेता है, विज्ञान जैसे जल-शक्ति का उद्घाटन कर लेता है, वैसे ही प्रेम रमणी के साहस और धैर्य को प्रदीप्त कर देता है।

करूणा ने पति के सिर पर हाथ रखते हुए कहा- पूछते क्यों नहीं प्यारे!

आदित्य ने करूणा के हाथों के कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए कहा- तुम्हारे विचार में मेरा जीवन कैसा था? बधाई के योग्य? देखो, तुमने मुझसे कभी पर्दा नहीं रखा। इस समय भी स्पष्ट कहना। तुम्हारे विचार में मुझे अपने जीवन पर हँसना चाहिए या रोना चाहिए?

करूणा ने उल्लास के साथ कहा- यह प्रश्न क्यों करते हो प्रियतम? क्या मैंने तुम्हारी उपेक्षा कभी की है? तुम्हारा जीवन देवताओं का-सा जीवन था, नि:स्वार्थ, निर्लिप्त और आदर्श! विघ्न-बाधाओं से तंग आकर मैंने तुम्हें कितनी ही बार संसार की ओर खींचने की चेष्टा की है; पर उस समय भी मैं मन में जानती थी कि मैं तुम्हें ऊँचे आसन से गिरा रही हूँ। अगर तुम माया-मोह में फँसे होते, तो कदाचित् मेरे मन को अधिक संतोष होता; लेकिन मेरी आत्मा को वह गर्व और उल्लास न होता, जो इस समय हो रहा है। मैं अगर किसी को बड़े-से-बड़ा आर्शीवाद दे सकती हूँ, तो वह यही होगा कि उसका जीवन तुम्हारे जैसा हो।

यह कहते-कहते करूणा का आभाहीन मुखमंडल जयोतिर्मय हो गया, मानो उसकी आत्मा दिव्य हो गयी हो। आदित्य ने सगर्व नेत्रों से करूणा को देखकर कहा बस, अब मुझे संतोष हो गया, करूणा, इस बच्चे की ओर से मुझे कोई शंका नहीं है, मैं उसे इससे अधिक कुशल हाथों में नहीं छोड़ सकता। मुझे विश्वास है कि जीवन-भर यह ऊँचा और पवित्र आदर्श सदैव तुम्हारे सामने रहेगा। अब मैं मरने को तैयार हूँ।

2

सात वर्ष बीत गये।

बालक प्रकाश अब दस साल का रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्नमुख कुमार था, बल का तेज, साहसी और मनस्वी। भय तो उसे छू भी नहीं गया था। करूणा का संतप्त हृदय उसे देखकर शीतल हो जाता। संसार करूणा को अभागिनी और दीन समझे। वह कभी भाग्य का रोना नहीं रोती। उसने उन आभूषणों को बेच डाला, जो पति के जीवन में उसे प्राणों से प्रिय थे, और उस धन से कुछ गायें और भैंसे मोल ले लीं। वह कृषक की बेटी थी, और गो-पालन उसके लिए कोई नया व्यवसाय न था। इसी को उसने अपनी जीविका का साधन बनाया। विशुद्ध दूध कहाँ मयस्सर होता है? सब दूध हाथों-हाथ बिक जाता। करूणा को पहर रात से पहर रात तक काम में लगा रहना पड़ता, पर वह प्रसन्न थी। उसके मुख पर निराशा या दीनता की छाया नहीं, संकल्प और साहस का तेज है। उसके एक-एक अंग से आत्मगौरव की ज्योति-सी निकल रही है; आँखों में एक दिव्य प्रकाश है, गंभीर, अथाह और असीम। सारी वेदनाएँ-वैधव्य का शोक और विधि का निर्मम प्रहार-सब उस प्रकाश की गहराई में विलीन हो गया है।

प्रकाश पर वह जान देती है। उसका आनंद, उसकी अभिलाषा, उसका संसार उसका स्वर्ग सब प्रकाश पर न्यौछावर है; पर यह मजाल नहीं कि प्रकाश कोई शरारत करे और करूणा आँखें बंद कर ले। नहीं, वह उसके चरित्र की बड़ी कठोरता से देख-भाल करती है। वह प्रकाश की माँ नहीं, माँ-बाप दोनों हैं। उसके पुत्र-स्नेह में माता की ममता के साथ पिता की कठोरता भी मिली हुई है। पति के अन्तिम शब्द अभी तक उसके कानों में गूँज रहे हैं। वह आत्मोल्लास, जो उनके चेहरे पर झलकने लगा था, वह गर्वमय लाली, जो उनकी आँखो में छा गयी थी,अभी तक उसकी आँखों में फिर रही है। निरंतर पति-चिन्तन ने आदित्य को उसकी आँखों में प्रत्यक्ष कर दिया है। वह सदैव उनकी उपस्थिति का अनुभव किया करती है। उसे ऐसा जान पड़ता है कि आदित्य की आत्मा सदैव उसकी रक्षा करती रहती है। उसकी यही हार्दिक अभिलाषा है कि प्रकाश जवान होकर पिता का पथगामी हो।

संध्या हो गयी थी। एक भिखारिन द्वार पर आकर भीख माँगने लगी। करूणा उस समय गउओं को पानी दे रही थी। प्रकाश बाहर खेल रहा था। बालक ही तो ठहरा! शरारत सूझी। घर में गया और कटोरे में थोड़ा-सा भूसा लेकर बाहर निकला। भिखारिन ने अबकी झेली फैला दी। प्रकाश ने भूसा उसकी झोली में डाल दिया और जोर-जोर से तालियाँ बजाता हुआ भागा।

भिखारिन ने अग्निमय नेत्रों से देखकर कहा- वाह रे लाड़ले! मुझसे हँसी करने चला है! यही माँ-बाप ने सिखाया है! तब तो खूब कुल का नाम जगाओगे!

करूणा उसकी बोली सुनकर बाहर निकल आयी और पूछा- क्या है माता? किसे कह रही हो?

भिखारिन ने प्रकाश की तरफ इशारा करके कहा- वह तुम्हारा लड़का है न। देखो, कटोरे में भूसा भरकर मेरी झोली में डाल गया है। चुटकी-भर आटा था, वह भी मिट्टी में मिल गया। कोई इस तरह दुखियों को सताता है? सबके दिन एक-से नहीं रहते! आदमी को घमंड न करना चाहिए।

करूणा ने कठोर स्वर में पुकारा- प्रकाश?

प्रकाश लज्जित न हुआ। अभिमान से सिर उठाए हुए आया और बोला- वह हमारे घर भीख क्यों माँगने आयी है? कुछ काम क्यों नहीं करती?

करुणा ने उसे समझाने की चेष्टा करके कहा- शर्म नहीं आती, उल्टे और आँख दिखाते हो।

प्रकाश- शर्म क्यों आए? यह क्यों रोज भीख माँगने आती है? हमारे यहाँ क्या कोई चीज मुफ्त आती है?

करूणा- तुम्हें कुछ न देना था तो सीधे से कह देते; जाओ। तुमने यह शरारत क्यों की?

प्रकाश- उनकी आदत कैसे छूटती?

करूणा ने बिगड़कर कहा- तुम अब पिटोगे मेरे हाथों।

प्रकाश- पिटूँगा क्यों? आप जबरदस्ती पीटेंगी? दूसरे मुल्कों में अगर कोई भीख माँगे, तो कैद कर लिया जाय। यह नहीं कि उल्टे भिखमंगो को और शह दी जाय।

करूणा- जो अपंग है, वह कैसे काम करे?

प्रकाश- तो जाकर डूब मरे, जिन्दा क्यों रहती है?

करूणा निरूत्तर हो गयी। बुढ़िया को तो उसने आटा-दाल देकर विदा किया, किन्तु प्रकाश का कुतर्क उसके हृदय में फोड़े के समान टीसता रहा। उसने यह धृष्टता, यह अविनय कहाँ सीखी? रात को भी उसे बार-बार यही ख्याल सताता रहा।

आधी रात के समीप एकाएक प्रकाश की नींद टूटी। लालटेन जल रही है और करुणा बैठी रो रही है। उठ बैठा और बोला- अम्माँ, अभी तुम सोयी नहीं?

करूणा ने मुँह फेरकर कहा- नींद नहीं आयी। तुम कैसे जग गये? प्यास तो नहीं लगी है?

प्रकाश- नही अम्माँ, न जाने क्यों आँख खुल गयी। मुझसे आज बड़ा अपराध हुआ, अम्माँ !

करूणा ने उसके मुख की ओर स्नेह के नेत्रों से देखा।

प्रकाश- मैंने आज बुढ़िया के साथ बड़ी नटखट की। मुझे क्षमा करो, फिर कभी ऐसी शरारत न करूँगा।

यह कहकर रोने लगा। करूणा ने स्नेहार्द्र होकर उसे गले लगा लिया और उसके कपोलों का चुम्बन करके बोली- बेटा, मुझे खुश करने के लिए यह कह रहे हो या तुम्हारे मन में सचमुच पछतावा हो रहा है?

प्रकाश ने सिसकते हुए कहा- नहीं अम्माँ, मुझे दिल से अफसोस हो रहा है। अबकी वह बुढ़िया आयेगी, तो मैं उसे बहुत-से पैसे दूँगा।

करूणा का हृदय मतवाला हो गया। ऐसा जान पड़ा, आदित्य सामने खड़े बच्चे को आर्शीवाद दे रहे हैं और कह रहे हैं, करूणा, क्षोभ मत कर, प्रकाश अपने पिता का नाम रोशन करेगा। तेरी संपूर्ण कामनाएँ पूरी हो जाएँगी।

3

लेकिन प्रकाश के कर्म और वचन में मेल न था और दिनों के साथ उसके चरित्र का अंग प्रत्यक्ष होता जाता था। जहीन था ही, विश्वविद्यालय से उसे वजीफे मिलते थे, करूणा भी उसकी यथेष्ट सहायता करती थी, फिर भी उसका खर्च पूरा न पड़ता था। वह मितव्ययता और सरल जीवन पर विद्वत्ता से भरे हुए व्याख्यान दे सकता था, पर उसका रहन-सहन फैशन के अंधभक्तों से जौ-भर घटकर न था। प्रदर्शन की धुन उसे हमेशा सवार रहती थी। उसके मन और बुद्धि में निरंतर द्वन्द्व होता रहता था। मन जाति की ओर था, बुद्धि अपनी ओर। बुद्धि मन को दबाये रहती थी। उसके सामने मन की एक न चलती थी। जाति-सेवा ऊसर की खेती है, वहाँ बड़े-से-बड़ा उपहार जो मिल सकता है, वह है गौरव और यश; पर वह भी स्थायी नहीं, इतना अस्थिर कि क्षण में जीवन-भर की कमाई पर पानी फिर सकता है। अतएव उसका अंत:करण अनिवार्य वेग के साथ विलासमय जीवन की ओर झुकता था। यहाँ तक कि धीरे-धीरे उसे त्याग और निग्रह से घृणा होने लगी। वह दुरवस्था और दरिद्रता को हेय समझता था। उसके हृदय न था, भाव न थे, केवल मस्तिष्क था। मस्तिष्क में दर्द कहाँ?वहाँ तो तर्क हैं, मनसूबे हैं।

सिंध में बाढ़ आयी। हजारों आदमी तबाह हो गये। विद्यालय ने वहाँ एक सेवा समिति भेजी। प्रकाश के मन में द्वंद्व होने लगा- जाऊँ या न जाऊँ? इतने दिनों अगर वह परीक्षा की तैयारी करे, तो प्रथम श्रेणी में पास हो। चलते समय उसने बीमारी का बहाना कर दिया। करूणा ने लिखा, तुम सिन्ध न गये, इसका मुझे दुख है। तुम बीमार रहते हुए भी वहाँ जा सकते थे। समिति में चिकित्सक भी तो थे! प्रकाश ने पत्र का उत्तर न दिया।

उड़ीसा में अकाल पड़ा। प्रजा मक्खियों की तरह मरने लगी। कांग्रेस ने पीड़ितो के लिए एक मिशन तैयार किया। उन्हीं दिनों विद्यालयों ने इतिहास के छात्रों को ऐतिहासिक खोज के लिए लंका भेजने का निश्चय किया। करूणा ने प्रकाश को लिखा-तुम उड़ीसा जाओ। किन्तु प्रकाश लंका जाने को लालायित था। वह कई दिन इसी दुविधा में रहा। अंत को सीलोन ने उड़ीसा पर विजय पायी। करुणा ने अबकी उसे कुछ न लिखा। चुपचाप रोती रही।

सीलोन से लौटकर प्रकाश छुट्टियों में घर गया। करुणा उससे खिंची-खिंची रहीं। प्रकाश मन में लज्जित हुआ और संकल्प किया कि अबकी कोई अवसर आया, तो अम्माँ को अवश्य प्रसन्न करूँगा। यह निश्चय करके वह विद्यालय लौटा। लेकिन यहाँ आते ही फिर परीक्षा की फिक्र सवार हो गयी। यहाँ तक कि परीक्षा के दिन आ गये; मगर इम्तहान से फुरसत पाकर भी प्रकाश घर न गया। विद्यालय के एक अध्यापक काश्मीर सैर करने जा रहे थे। प्रकाश उन्हीं के साथ काश्मीर चल खड़ा हुआ। जब परीक्षा-फल निकला और प्रकाश प्रथम आया, तब उसे घर की याद आयी! उसने तुरन्त करूणा को पत्र लिखा और अपने आने की सूचना दी। माता को प्रसन्न करने के लिए उसने दो-चार शब्द जाति-सेवा के विषय में भी लिखे- अब मै आपकी आज्ञा का पालन करने को तैयार हूँ। मैंने शिक्षा-सम्बन्धी कार्य करने का निश्चय किया है इसी विचार से मैने वह विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। हमारे नेता भी तो विद्यालयों के आचार्यों ही का सम्मान करते हैं। अभी तक इन उपाधियों के मोह से वे मुक्त नहीं हुए हैं। हमारे नेता भी योग्यता, सदुत्साह, लगन का उतना सम्मान नहीं करते, जितना उपाधियों का! अब मेरी इज्जत करेंगे और जिम्मेदारी का काम सौपेंगें, जो पहले माँगे भी न मिलता।

करूणा की आस फिर बँधी।

4

विद्यालय खुलते ही प्रकाश के नाम रजिस्ट्रार का पत्र पहुँचा। उन्होंने प्रकाश को इंग्लैंड जाकर विद्याभ्यास करने के लिए सरकारी वजीफे की मंजूरी की सूचना दी थी। प्रकाश पत्र हाथ में लिये हर्ष के उन्माद में जाकर माँ से बोला- अम्माँ, मुझे इंग्लैंड जाकर पढ़ने के लिए सरकारी वजीफा मिल गया।

करूणा ने उदासीन भाव से पूछा- तो तुम्हारा क्या इरादा है?

प्रकाश- मेरा इरादा? ऐसा अवसर पाकर भला कौन छोड़ता है!

करूणा- तुम तो स्वयंसेवकों में भरती होने जा रहे थे?

प्रकाश- तो आप समझती हैं, स्वयंसेवक बन जाना ही जाति-सेवा है? मैं इंग्लैंड से आकर भी तो सेवा-कार्य कर सकता हूँ और अम्माँ, सच पूछो, तो एक मजिस्ट्रेट अपने देश का जितना उपकार कर सकता है, उतना एक हजार स्वयंसेवक मिलकर भी नहीं कर सकते। मैं तो सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठूँगा और मुझे विश्वास है कि सफल हो जाऊँगा।

करूणा ने चकित होकर पूछा- तो क्या तुम मजिस्ट्रेट हो जाओगे?

प्रकाश- सेवा-भाव रखनेवाला एक मजिस्ट्रेट कांग्रेस के एक हजार सभापतियों से ज्यादा उपकार कर सकता है। अखबारों में उसकी लम्बी-लम्बी तारीफें न छपेंगी, उसकी वक्तृताओं पर तालियाँ न बजेंगी, जनता उसके जुलूस की गाड़ी न खींचेगी और न विद्यालयों के छात्र उसको अभिनंदन-पत्र देंगे; पर सच्ची सेवा मजिस्ट्रेट ही कर सकता है।

करूणा ने आपत्ति के भाव से कहा- लेकिन यही मजिस्ट्रेट तो जाति के सेवकों को सजाएँ देते हें, उन पर गोलियाँ चलाते हैं?

प्रकाश- अगर मजिस्ट्रेट के हृदय में परोपकार का भाव है, तो वह नरमी से वही काम करता है, जो दूसरे गोलियाँ चलाकर भी नहीं कर सकते।

करूणा- मैं यह नहीं मानूँगी। सरकार अपने नौकरों को इतनी स्वाधीनता नहीं देती। वह एक नीति बना देती है और हर एक सरकारी नौकर को उसका पालन करना पड़ता है। सरकार की पहली नीति यह है कि वह दिन-दिन अधिक संगठित और दृढ़ हों। इसके लिए स्वाधीनता के भावों का दमन करना जरूरी है; अगर कोई मजिस्ट्रेट इस नीति के विरूद्ध काम करता है, तो वह मजिस्ट्रेट न रहेगा। वह हिन्दुस्तानी था, जिसने तुम्हारे बाबूजी को जरा-सी बात पर तीन साल की सजा दे दी। इसी सजा ने उनके प्राण लिये बेटा, मेरी इतनी बात मानो। सरकारी पदों पर न गिरो। मुझे यह मंजूर है कि तुम मोटा खाकर और मोटा पहनकर देश की कुछ सेवा करो, इसके बदले कि तुम हाकिम बन जाओ और शान से जीवन बिताओ। यह समझ लो कि जिस दिन तुम हाकिम की कुरसी पर बैठोगे, उस दिन से तुम्हारा दिमाग हाकिमों का-सा हो जाएगा। तुम यही चाहेगे कि अफसरों में तुम्हारी नेकनामी और तरक्की हो। एक गँवारू मिसाल लो। लड़की जब तक मैके में क्वाँरी रहती है, वह अपने को उसी घर की समझती है, लेकिन जिस दिन ससुराल चली जाती है, वह अपने घर को दूसरों का घर समझने लगती है। माँ-बाप, भाई-बंद सब वही रहते हैं, लेकिन वह घर अपना नहीं रहता। यही दुनिया का दस्तूर है।

प्रकाश ने खीझकर कहा- तो क्या आप यही चाहती हैं कि मैं जिंदगी-भर चारों तरफ ठोकरें खाता फिरूँ?

करुणा कठोर नेत्रों से देखकर बोली- अगर ठोकर खाकर आत्मा स्वाधीन रह सकती है, तो मैं कहूँगी, ठोकर खाना अच्छा है।

प्रकाश ने निश्चयात्मक भाव से पूछा- तो आपकी यही इच्छा है?

करूणा ने उसी स्वर में उत्तर दिया- हाँ, मेरी यही इच्छा है।

प्रकाश ने कुछ जवाब न दिया। उठकर बाहर चला गया और तुरन्त रजिस्ट्रार को इनकारी-पत्र लिख भेजा; मगर उसी क्षण से मानों उसके सिर पर विपत्ति ने आसन जमा लिया। विरक्त और विमन अपने कमरें में पड़ा रहता, न कहीं घूमने जाता, न किसी से मिलता। मुँह लटकाये भीतर आता और फिर बाहर चला जाता, यहाँ तक महीना गुजर गया। न चेहरे पर वह लाली रही, न वह ओज; आँखें अनाथों के मुख की भाँति याचना से भरी हुई, ओठ हँसना भूल गये, मानों उस इनकारी-पत्र के साथ उसकी सारी सजीवता, और चपलता, सारी सरलता बिदा हो गयी। करूणा उसके मनोभाव समझती थी और उसके शोक को भुलाने की चेष्टा करती थी, पर रूठे देवता प्रसन्न न होते थे।

आखिर एक दिन उसने प्रकाश से कहा- बेटा, अगर तुमने विलायत जाने की ठान ही ली है, तो चले जाओ। मना न करूँगी। मुझे खेद है कि मैंने तुम्हें रोका। अगर मैं जानती कि तुम्हें इतना आघात पहुँचेगा, तो कभी न रोकती। मैंने तो केवल इस विचार से रोका था कि तुम्हें जाति-सेवा में मग्न देखकर तुम्हारे बाबूजी की आत्मा प्रसन्न होगी। उन्होंने चलते समय यही वसीयत की थी।

प्रकाश ने रूखाई से जवाब दिया- अब क्या जाऊँगा! इनकारी-खत लिख चुका। मेरे लिए कोई अब तक बैठा थोड़े ही होगा। कोई दूसरा लड़का चुन लिया होगा और फिर करना ही क्या है?जब आपकी मर्जी है कि गाँव-गाँव की खाक छानता फिरूँ, तो वही सही।

करूणा का गर्व चूर-चूर हो गया। इस अनुमति से उसने बाधा का काम लेना चाहा था; पर सफल न हुई। बोली- अभी कोई न चुना गया होगा। लिख दो, मैं जाने को तैयार हूँ।

प्रकाश ने झुँझलाकर कहा- अब कुछ नहीं हो सकता। लोग हँसी उड़ायेंगे। मैने तय कर लिया है कि जीवन को आपकी इच्छा के अनुकूल बनाऊँगा।

करूणा- तुमने अगर शुद्ध मन से यह इरादा किया होता, तो यों न रहते। तुम मुझसे सत्याग्रह कर रहे हो; अगर मन को दबाकर, मुझे अपनी राह का काँटा समझकर तुमने मेरी इच्छा पूरी भी की, तो क्या? मैं तो जब जानती कि तुम्हारे मन में आप-ही-आप सेवा का भाव उत्पन्न होता। तुम आज ही रजिस्ट्रार साहब को पत्र लिख दो।

प्रकाश- अब मैं नहीं लिख सकता।

'तो इसी शोक में तने बैठे रहोगे?'

'लाचारी है।'

करूणा ने और कुछ न कहा। जरा देर में प्रकाश ने देखा कि वह कहीं जा रही है; मगर वह कुछ बोला नहीं। करूणा के लिए बाहर आना-जाना कोई असाधारण बात न थी; लेकिन जब संध्या हो गयी और करुणा न आयी, तो प्रकाश को चिन्ता होने लगी। अम्मा कहाँ गयीं? यह प्रश्न बार-बार उसके मन में उठने लगा।

प्रकाश सारी रात द्वार पर बैठा रहा। भाँति-भाँति की शंकाएँ मन में उठने लगीं। उसे अब याद आया, चलते समय करूणा कितनी उदास थी; उसकी आँखें कितनी लाल थी। यह बातें प्रकाश को उस समय क्यों न नजर आयी? वह क्यों स्वार्थ में अंधा हो गया था?

हाँ, अब प्रकाश को याद आया- माता ने साफ-सुथरे कपड़े पहने थे। उनके हाथ में छतरी भी थी। तो क्या वह कहीं बहुत दूर गयी हैं? किससे पूछे? अनिष्ट के भय से प्रकाश रोने लगा।

श्रावण की अंधेरी भयानक रात थी। आकाश में श्याम मेघमालाएँ, भीषण स्वप्न की भाँति छायी हुई थीं। प्रकाश रह-रहकर आकाश की ओर देखता था, मानो करूणा उन्हीं मेघमालाओं में छिपी बैठी हो। उसने निश्चय किया, सवेरा होते ही माँ को खोजने चलूँगा और अगर....

किसी ने द्वार खटखटाया। प्रकाश ने दौड़कर खोला, तो देखा, करूणा खड़ी है। उसका मुख-मंडल इतना खोया हुआ, इतना करूण था, जैसे आज ही उसका सोहाग उठ गया है, जैसे संसार में अब उसके लिए कुछ नहीं रहा, जैसे वह नदी के किनारे खड़ी अपनी लदी हुई नाव को डूबते देख रही है और कुछ कर नहीं सकती।

प्रकाश ने अधीर होकर पूछा- अम्माँ कहाँ चली गयी थीं? बहुत देर लगायी?

करूणा ने भूमि की ओर ताकते हुए जवाब दिया- एक काम से गयी थी। देर हो गयी।

यह कहते हुए उसने प्रकाश के सामने एक बंद लिफाफा फेंक दिया। प्रकाश ने उत्सुक होकर लिफाफा उठा लिया। ऊपर ही विद्यालय की मुहर थी। तुरन्त ही लिफाफा खोलकर पढ़ा। हलकी-सी लालिमा चेहरे पर दौड़ गयी। पूछा- यह तुम्हें कहाँ मिल गया अम्मा?

करूणा- तुम्हारे रजिस्ट्रार के पास से लायी हूँ।

'क्या तुम वहाँ चली गयी थी?'

'और क्या करती।'

'कल तो गाड़ी का समय न था?'

'मोटर ले ली थी।'

प्रकाश एक क्षण तक मौन खड़ा रहा, फिर कुंठित स्वर में बोला- जब तुम्हारी इच्छा नहीं है तो मुझे क्यों भेज रही हो?

करूणा ने विरक्त भाव से कहा- इसलिए कि तुम्हारी जाने की इच्छा है। तुम्हारा यह मलिन वेश नहीं देखा जाता। अपने जीवन के बीस वर्ष तुम्हारी हितकामना पर अर्पित कर दिये; अब तुम्हारी महत्त्वाकांक्षा की हत्या नहीं कर सकती। तुम्हारी यात्रा सफल हो, यही हमारी हार्दिक अभिलाषा है।

करूणा का कंठ रूँध गया और कुछ न कह सकी।

5

प्रकाश उसी दिन से यात्रा की तैयारियाँ करने लगा। करूणा के पास जो कुछ था, वह सब खर्च हो गया। कुछ ऋण भी लेना पड़ा। नये सूट बने, सूटकेस लिए गये। प्रकाश अपनी धुन में मस्त था। कभी किसी चीज की फरमाइश लेकर आता, कभी किसी चीज की।

करूणा इस एक सप्ताह में इतनी दुर्बल हो गयी है, उसके बालों पर कितनी सफेदी आ गयी है, चेहरे पर कितनी झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, यह उसे कुछ न नजर आता। उसकी आँखों में इंगलैंड के दृश्य समाये हुए थे। महत्त्वाकांक्षा आँखों पर परदा डाल देती है।

प्रस्थान का दिन आया। आज कई दिनों के बाद धूप निकली थी। करूणा स्वामी के पुराने कपड़ों को बाहर निकाल रही थी। उनकी गाढ़े की चादरें, खद्दर के कुरते, पाजामें और लिहाफ अभी तक सन्दूक में संचित थे। प्रतिवर्ष वे धूप में सुखाये जाते और झाड़-पोंछकर रख दिये जाते थे। करूणा ने आज फिर उन कपड़ो को निकाला, मगर सुखाकर रखने के लिए नहीं गरीबों में बाँट देने के लिए। वह आज पति से नाराज है। वह लुटिया, डोर और घड़ी, जो आदित्य की चिरसंगिनी थीं और जिनकी बीस वर्ष से करूणा ने उपासना की थी, आज निकालकर आँगन में फेंक दी गयी; वह झोली जो बरसों आदित्य के कन्धों पर आरूढ़ रह चुकी थी, आप कूड़े में डाल दी गयी; वह चित्र जिसके सामने बीस वर्ष से करूणा सिर झुकाती थी, आज वही निर्दयता से भूमि पर डाल दिया गया। पति का कोई स्मृति-चिन्ह वह अब अपने घर में नहीं रखना चाहती। उसका अंत:करण शोक और निराशा से विदीर्ण हो गया है और पति के सिवा वह किस पर क्रोध उतारे? कौन उसका अपना हैं? वह किससे अपनी व्यथा कहे? किसे अपनी छाती चीरकर दिखाए? वह होते तो क्या प्रकाश दासता की जंजीर गले में डालकर फूला न समाता? उसे कौन समझाये कि आदित्य भी इस अवसर पर पछताने के सिवा और कुछ न कर सकते।

प्रकाश के मित्रों ने आज उसे विदाई का भोज दिया था। वहाँ से वह संध्या समय कई मित्रों के साथ मोटर पर लौटा। सफर का सामान मोटर पर रख दिया गया, तब वह अन्दर आकर माँ से बोला- अम्मा, जाता हूँ। बम्बई पहूँचकर पत्र लिखूँगा। तुम्हें मेरी कसम, रोना मत और मेरे खतों का जवाब बराबर देना।

जैसे किसी लाश को बाहर निकालते समय सम्बन्धियों का धैर्य छूट जाता है, रूके हुए आँसू निकल पड़ते हैं और शोक की तरंगें उठने लगती हैं, वही दशा करूणा की हुई। कलेजे में एक हाहाकार हुआ, जिसने उसकी दुर्बल आत्मा के एक-एक अणु को कंपा दिया। मालूम हुआ, पाँव पानी में फिसल गया है और वह लहरों में बही जा रही है। उसके मुख से शोक या आर्शीवाद का एक शब्द भी न निकला। प्रकाश ने उसके चरण छुए, अश्रु-जल से माता के चरणों को पखारा, फिर बाहर चला। करूणा पाषाण मूर्ति की भाँति खड़ी थी।

सहसा ग्वाले ने आकर कहा- बहूजी, भइया चले गये। बहुत रोते थे।

तब करूणा की समाधि टूटी। देखा, सामने कोई नहीं है। घर में मृत्यु का-सा सन्नाटा छाया हुआ है, और मानो हृदय की गति बन्द हो गयी है।

सहसा करूणा की दृष्टि ऊपर उठ गयी। उसने देखा कि आदित्य अपनी गोद में प्रकाश की निर्जीव देह लिए खड़े हो रहे हैं। करूणा पछाड़ खाकर गिर पड़ी।

6

करूणा जीवित थी, पर संसार से उसका कोई नाता न था। उसका छोटा-सा संसार, जिसे उसने अपनी कल्पनाओं के हृदय में रचा था, स्वप्न की भाँति अनन्त में विलीन हो गया था। जिस प्रकाश को सामने देखकर वह जीवन की अंधेरी रात में भी हृदय में आशाओं की सम्पत्ति लिये जी रही थी, वह बुझ गया और सम्पत्ति लुट गयी। अब न कोई आश्रय था और न उसकी जरूरत। जिन गउओं को वह दोनों वक्त अपने हाथों से दाना-चारा देती और सहलाती थी, वे अब खूँटे पर बँधी निराश नेत्रों से द्वार की ओर ताकती रहती थीं। बछड़ों को गले लगाकर पुचकारने वाला अब कोई न था, जिसके लिए दूध दुहे, मट्ठा निकाले। खानेवाला कौन था? करूणा ने अपने छोटे-से संसार को अपने ही अंदर समेट लिया था।

किन्तु एक ही सप्ताह में करूणा के जीवन ने फिर रंग बदला। उसका छोटा-सा संसार फैलते-फैलते विश्वव्यापी हो गया। जिस लंगर ने नौका को तट से एक केन्द्र पर बाँध रखा था, वह उखड़ गया। अब नौका सागर के अशेष विस्तार में भ्रमण करेगी, चाहे वह उद्दाम तरंगों के वक्ष में ही क्यों न विलीन हो जाए।

करूणा द्वार पर आ बैठती और मुहल्ले-भर के लड़कों को जमा करके दूध पिलाती। दोपहर तक मक्खन निकालती और वह मक्खन मुहल्ले के लड़के खाते। फिर भाँति-भाँति के पकवान बनाती और कुत्तों को खिलाती। अब यही उसका नित्य का नियम हो गया। चिड़ियाँ, कुत्ते, बिल्लियाँ चींटे-चीटियाँ सब अपने हो गये। प्रेम का वह द्वार अब किसी के लिए बन्द न था। उस अंगुल-भर जगह में, जो प्रकाश के लिए भी काफी न थी, अब समस्त संसार समा गया था।

एक दिन प्रकाश का पत्र आया। करूणा ने उसे उठाकर फेंक दिया। फिर थोड़ी देर के बाद उसे उठाकर फाड़ डाला और चिड़ियों को दाना चुगाने लगी; मगर जब निशा-योगिनी ने अपनी धूनी जलायी और वेदनाएँ उससे वरदान माँगने के लिए विकल हो-होकर चलीं, तो करूणा की मनोवेदना भी सजग हो उठी- प्रकाश का पत्र पढ़ने के लिए उसका मन व्याकुल हो उठा। उसने सोचा, प्रकाश मेरा कौन है? मेरा उससे क्या प्रयोजन? हाँ, प्रकाश मेरा कौन है? हाँ, प्रकाश मेरा कौन है? हृदय ने उत्तर दिया, प्रकाश तेरा सर्वस्व है, वह तेरे उस अमर प्रेम की निशानी है, जिससे तू सदैव के लिए वंचित हो गयी। वह तेरा प्राण है, तेरे जीवन-दीपक का प्रकाश, तेरी वंचित कामनाओं का माधुर्य, तेरे अश्रु-जल में विहार करने वाला करने वाला हँस। करूणा उस पत्र के टुकड़ों को जमा करने लगी, माना उसके प्राण बिखर गये हों। एक-एक टुकड़ा उसे अपने खोये हुए प्रेम का एक पदचिन्ह-सा मालूम होता था। जब सारे पुरजे जमा हो गये, तो करूणा दीपक के सामने बैठकर उसे जोड़ने लगी, जैसे कोई वियोगी हृदय प्रेम के टूटे हुए तारों को जोड़ रहा हो। हाय री ममता! वह अभागिन सारी रात उन पुरजों को जोड़ने में लगी रही। पत्र दोनों ओर लिखा था, इसलिए पुरजों को ठीक स्थान पर रखना और भी कठिन था। कोई शब्द, कोई वाक्य बीच में गायब हो जाता। उस एक टुकड़े को वह फिर खोजने लगती। सारी रात बीत गयी, पर पत्र अभी तक अपूर्ण था।

दिन चढ़ आया, मुहल्ले के लौंडे मक्खन और दूध की चाह में एकत्र हो गये, कुत्तों ओर बिल्लियों का आगमन हुआ, चिड़ियाँ आ-आकर आँगन में फुदकने लगीं, कोई ओखली पर बैठी,कोई तुलसी के चौतरे पर, पर करूणा को सिर उठाने तक की फुरसत नहीं।

दोपहर हुआ, करुणा ने सिर न उठाया। न भूख थी, न प्यास। फिर संध्या हो गयी। पर वह पत्र अभी तक अधूरा था। पत्र का आशय समझ में आ रहा था- प्रकाश का जहाज कहीं-से-कहीं जा रहा है। उसके हृदय में कुछ उठा हुआ है। क्या उठा हुआ है, यह करुणा न सोच सकी? करूणा पुत्र की लेखनी से निकले हुए एक-एक शब्द को पढ़ना और उसे हृदय पर अंकित कर लेना चाहती थी।

इस भाँति तीन दिन गुजर गये। संध्या हो गयी थी। तीन दिन की जागी आँखें जरा झपक गयी। करूणा ने देखा, एक लम्बा-चौड़ा कमरा है, उसमें मेजें और कुर्सियाँ लगी हुई हैं, बीच में ऊँचे मंच पर कोई आदमी बैठा हुआ है। करूणा ने ध्यान से देखा, प्रकाश था।

एक क्षण में एक कैदी उसके सामने लाया गया, उसके हाथ-पाँव में जंजीर थी, कमर झुकी हुई, यह आदित्य थे।

करूणा की आँखें खुल गयीं। आँसू बहने लगे। उसने पत्र के टुकड़ों को फिर समेट लिया और उसे जलाकर राख कर डाला। राख की एक चुटकी के सिवा वहाँ कुछ न रहा, जो उसके हृदय में विदीर्ण किए डालती थी। इसी एक चुटकी राख में उसका गुड़ियोंवाला बचपन, उसका संतप्त यौवन और उसका तृष्णामय वैधव्य सब समा गया।

प्रात:काल लोगों ने देखा, पक्षी पिंजड़े से उड़ चुका था! आदित्य का चित्र अब भी उसके शून्य हृदय से चिपटा हुआ था। भग्नहृदय पति की स्नेह-स्मृति में विश्राम कर रहा था और प्रकाश का जहाज योरप चला जा रहा था।

परियाँ (Fairies)

परियाँ (Fairies)

परियों की कहानीयां तो सभी ने बहुत सुनी होगी, लेकिन क्या कभी सोंचा है कि ये कहानियां अस्तित्व में कैसे आईं? परियां वास्तव में कभी इस धरती पर थीं कि यह किसी की कल्पना मात्र है? तो चलिए आज आपको लिए चलते हैं परियों की दुनिया में।

परियाँ (Fairies)

परियों के बारे में मिथकों और कहानियों की उत्पत्ति एक ही नहीं है, बल्कि वे अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त लोक मान्यताओं का संग्रह हैं। परियों की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न लोक सिद्धांतों में उन्हें ईसाई परंपरा में पदावनत स्वर्गदूतों या राक्षसों के रूप में, बुतपरस्त विश्वास प्रणालियों में देवताओं के रूप में , मृतकों की आत्माओं के रूप में, मनुष्यों के प्रागैतिहासिक अग्रदूतों के रूप में, या प्रकृति की आत्माओं के रूप में प्रस्तुत करना शामिल है।

परी शब्द यूरोप में मध्य युग से ही चला आ रहा है, इन प्राणियों के अनुरूप अलग-अलग रूपों में लिखित और मौखिक दोनों साहित्य में दिखाई देते हैं, संस्कृत गंधर्व (अर्धदिव्य खगोलीय संगीतकार) से लेकर ग्रीक पौराणिक कथाओं की अप्सराएं और होमर, जिन्नी अरबी पौराणिक कथाएँ और समोआवासियों, आर्कटिक लोगों और अन्य मूल अमेरिकियों के समान लोक चरित्र। बच्चों की कहानियों में परियों का आम आधुनिक चित्रण उस समय की गंभीर और यहाँ तक कि भयावह लोककथाओं की परंपरा के झुकाव का प्रतिनिधित्व करता है। अतीत की परियों को खतरनाक और शक्तिशाली प्राणी माना जाता था, जो कभी-कभी मनुष्यों के अनुकूल होती थीं लेकिन क्रूर या शरारती भी हो सकती थीं।

परियों, कल्पित बौनों, चुड़ैलों और अन्य जैसे जादुई प्राणियों की वास्तविकता पर अक्सर बहस होती है। परियों के बारे में हमारी अधिकांश सांस्कृतिक समझ और मान्यताएँ मुख्यधारा की फिल्मों, टीवी शो और कॉमिक्स से आती हैं। हालाँकि कुछ लोगों के लिए इसे ख़ारिज करना एक आसान विषय हो सकता है, लेकिन ये रहस्यमय आकृतियाँ यूरोपीय इतिहास और लोककथाओं का एक दिलचस्प हिस्सा हैं।

परियाँ (Fairies)

ब्रिटानिका के अनुसार, परियाँ प्राचीन लोककथाओं से संबंधित पौराणिक जीव हैं, जो आमतौर पर जादुई शक्तियों के लिए जानी जाती हैं, कभी-कभी दिखने में बौने आकार की और "विशेष रूप से सुंदर या सुंदर" होती हैं। यहां इन पात्रों की उत्पत्ति के बारे में और क्या वे वास्तविक हैं या केवल काल्पनिक कृति हैं, इसके बारे में अधिक जानकारी दी गई है।

क्या परियाँ असली हैं?

माना जाता है कि परियाँ, जिन्हें परी भी कहा जाता है, कई शताब्दियों पहले अस्तित्व में थीं क्योंकि दुनिया का अधिकांश भाग अभी भी अज्ञात था। आधुनिक समय में, परियों को बच्चों की किताबों के साथ जोड़ दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप लाइव साइंस के अनुसार उपनाम "परी कथाएँ" हो गया है।

परियाँ (Fairies)

परियाँ क्या हैं?

कई शताब्दियों पहले, परियों को परोपकारी होने के अलावा प्रतिशोधी, शक्तिशाली और क्रूर माना जाता था। उदाहरण के लिए, लंबी यात्रा पर जाने वाले यात्री सुरक्षित रास्ते और अच्छे मौसम के बदले में परियों के लिए प्रसाद लाते थे। परियों को प्रसन्न करने में असफल होने पर देशवासियों को प्राकृतिक आपदाओं या भयानक दुर्घटनाओं के रूप में बर्बाद होने का खतरा होगा

लाइव साइंस की रिपोर्ट के अनुसार, परियाँ बदलती मान्यताओं से भी जुड़ी थीं और माना जाता था कि वे "बीमार परी शिशुओं को स्वस्थ इंसानों से बदल देती हैं।" यूरोपीय लोककथाओं में, चेंजलिंग परियों या कल्पित बौने की विकृत संतानें थीं जिन्हें अपने वंश को मजबूत करने के लिए मानव शिशुओं के साथ गुप्त रूप से आदान-प्रदान किया जाता था। ब्रिटैनिका के अनुसार, चेंजलिंग्स का अस्तित्व इस विचार से उपजा माना जाता है कि शिशु शैतानी कब्जे के प्रति संवेदनशील होते हैं।

परी लोककथाओं में ऐसी कहानियों और मान्यताओं के बावजूद, आधुनिक वैज्ञानिकों का मानना है कि उन्नीसवीं सदी या उससे पहले की अज्ञात चिकित्सा स्थितियों ने लोगों के मन में परियों के प्रति विश्वास पैदा किया होगा।

परियाँ (Fairies)

परियाँ कैसी दिखती हैं?

सदियों के दौरान, परियों ने विभिन्न किंवदंतियों में अलग-अलग रूप धारण किए हैं। परियों को आम तौर पर जादुई शक्तियों के साथ दिखने में मानव की तरह चित्रित किया गया है, जो उन्हें अपने आकार को असामान्य रूप से छोटे से मानव आकार में बदलने की अनुमति देती है। ऑर्कनी, स्कॉटलैंड में, परियों को छोटे कद के, गहरे भूरे रंग के कपड़े पहने हुए और कभी-कभी कवच में देखा जाता था। परियों के आधुनिक चित्रण में अन्य विशिष्ट परी विशेषताओं के अलावा गॉसमर पंख और नुकीले योगिनी जैसे कान शामिल हैं।

कॉटिंग्ले परियां

साक्ष्य का एक मामला? परियों के लिए कथित साक्ष्य के सबसे प्रसिद्ध मामलों में से एक कॉटिंग्ले परियों की कहानी है। 1917 में, दो युवा लड़कियों, एल्सी राइट और फ्रांसिस ग्रिफिथ्स ने इंग्लैंड के कॉटिंग्ले में अपने घर के पास परियों की तस्वीरें खींचने का दावा किया था। तस्वीरों पर गहरी बहस और दिलचस्पी पैदा हुई, प्रसिद्ध लेखक सर आर्थर कॉनन डॉयल, जो स्वयं एक अध्यात्मवादी हैं, ने तस्वीरों की प्रामाणिकता का समर्थन किया। हालाँकि, 1980 के दशक में, लड़कियाँ, जो अब बुजुर्ग हो चुकी थीं, ने स्वीकार किया कि तस्वीरें एक धोखा थीं, जो एक किताब से कट-आउट चित्रों का उपयोग करके बनाई गई थीं।

परियों के दर्शन और मुठभेड़

सदियों से, परियों के मिलने और देखे जाने की कई रिपोर्टें आती रही हैं। जबकि कई कहानियों को प्राकृतिक घटनाओं, मतिभ्रम या धोखाधड़ी के रूप में समझाया जा सकता है, कुछ कहानियों को खारिज करना अधिक कठिन है। ऐसे लोगों के अनगिनत किस्से हैं जो दावा करते हैं कि उन्होंने परियों का सामना किया है, या कम से कम किसी तरह से उनकी उपस्थिति महसूस की है। हालाँकि ये अनुभव व्यक्तिपरक हैं और इन्हें सत्यापित नहीं किया जा सकता है, वे परी अस्तित्व की संभावना के साथ चल रहे आकर्षण में योगदान करते हैं।

परियाँ (Fairies)
सीई ब्रॉक द्वारा एक परी का चित्रण

वैज्ञानिक साक्ष्य का अभाव

मनोरम कहानियों और किंवदंतियों के बावजूद, परियों के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। हालांकि कुछ लोगों का तर्क है कि सबूतों की कमी का कारण परियों का मायावी होना और इंसानों से छिपने में माहिर होना है, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय संशय में है। कई शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि परियों में विश्वास को मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारकों के साथ-साथ अस्पष्ट घटनाओं के लिए स्पष्टीकरण खोजने की मानवीय प्रवृत्ति द्वारा समझाया जा सकता है।

परियाँ (Fairies)
जोसेफ नोएल पैटन द्वारा ओबेरॉन और टाइटेनिया का झगड़ा (1849): शेक्सपियर में परियां

परी कथा विशेष रूप से आयरलैंड , कॉर्नवाल, वेल्स और स्कॉटलैंड में प्रचलित है। परियाँ मध्य युग से साहित्य में आम हैं और इटालियंस माटेओ बोइआर्डो और लुडोविको एरियोस्टो , अंग्रेजी कवि एडमंड स्पेंसर , फ्रांसीसी चार्ल्स पेरौल्ट और डेन हंस क्रिश्चियन एंडरसन सहित अन्य लोगों के लेखन में दिखाई देती हैं। हालाँकि परियों में विश्वास आज भी मौजूद है, लेकिन परियों के अस्तित्व के पक्ष या विपक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं है।

14 रहस्यमयी, विचित्र और भयानक जीव :-

  1. जर्सी डेविल (Jersey Devil)
  2. लिजार्डमैन (Lizard Man)
  3. फ्लैटवुड मॉन्स्टर (Flat woods Monster)
  4. डोवर डीमन (Dover Demon)
  5. आउलमैन (Owlman)
  6. गॉटमैन (Goatman)
  7. कन्वै आईलैंड मॉन्स्टर (Canvey Island Monster)
  8. पोप लिक मॉन्स्टर (Pop Lick Monster)
  9. यति (Yeti)
  10. लोच मॉन्स्टर (Loch Monster)
  11. छुपाकाबरा (Chupacabra)
  12. मोथमैन (Mothman)
  13. परियाँ (Fairies)
  14. सिगबिन (Sigbin)

रात की रानी || Night blooming jasmine

रात की रानी


माैसम में तेजी से बदलाव आ गया है। हल्की हल्की ठंड के बाद तेज गर्मी की शुरुवात हो गई है। वैसे आज हम मौसम की नहीं बल्कि फूलों की बात करने वाले हैं। ऐसे मौसम में फुलवारी और नर्सरी फूलों से भरे हुए हैं। इन्हीं फूलों में से एक है रात की रानी। नाम पढ़ के ही खुशबू का एहसास तो हुआ ही होगा। आज हम रात की रानी के औषधीय गुणों की चर्चा करेंगे, जिसको हम क्वीन ऑफ द नाईट के नाम से भी जानते हैं। इसका बोटेनिकल नाम Cestrum Nocturnum है। रातरानी के पत्ते और फूल में काफी सारे औषधीय गुण पाए जाते हैं। 

रात की रानी || Night blooming jasmine

रात की रानी क्या है?

रात की रानी को जिसे की चांदनी भी कहा जाता है, उसे इंग्लिश में Night blooming jasmine कहते हैं। रात की रानी का पौधा एक सदाबहार झाड़ी वाला पौधा है, जो 13 फुट तक ऊँचा हो सकता है। इसकी पत्तियां सरल, संकीर्ण, लम्बी, चिकनी और चमकदार होती हैं। इसका फूल लम्बा और सफ़ेद रंग का होता है और बहुत ज्यादा खुसबूदार होता है। 

रात की रानी || Night blooming jasmine

जानते हैं रात की रानी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

इसमें एंटीबायोटिक और एंटी इंफ्लेमेट्री गुण पाए जाते हैं। इसके अलावा रातरानी में बहुत सारी विटामिन्स और मिनरल्स भी पाए जाते हैं। यह विटामिन ए,बी ,सी,और डी से परिपूर्ण है। रातरानी के पौधे का उपयोग इत्र और तेल बनाने में किया जाता है।

शुगर रोग में

शुगर रोग में यह रामबाण काम करता है। यदि इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर उसे पिया जाए, तो इससे शुगर नियंत्रित होता है। 

 कील - मुंहासे के लिए 

रातरानी के पौधे के फूल से इतर और तेल बनाया जाता है, जो कि हमारे चेहरे संबंधी समस्याएं जैसे की कील, मुंहासे, कोई चोट के निशान, दाग धब्बे इन जैसी परेशानियों से निजात दिलाता है।

रात की रानी || Night blooming jasmine

अवसाद होने पर 

  • रातरानी का इत्र भी बहुत ही फायदेमंद होता है। इसे लगाने से आपको मन की शांति मिलती है और हमारा दिमाग शांत होता है और मन एकाग्र चित्त होकर किसी काम को करने में अग्रसर होता है।
  • रातरानी के फूल की खुशबू में इतनी शक्ति होती है कि यह व्यक्ति के डर तनाव परेशानी को दूर कर देता है। इसीलिए इसका प्रयोग अरोमा थेरेपी में भी किया जाता है।

सूजन होने पर 

रातरानी के पौधे में एक औषधीय गुण होता है। अगर व्यक्ति के शरीर के किसी भी अंग में सूजन हो गया हो तो उस अंग में रातरानी के पौधे की पत्तियों को पीसकर पट्टी से बांध दें और कुछ ही देर में वह सूजन कम हो जाएगा।

चोट लग जाने पर 

रातरानी की पत्तियों को पीसकर या उसके फूलों का तेल निकालकर चोट लगे स्थान पर लगाने से लाभ होता है। 

मुंह के अंदर छाले होने पर 

यदि किसी व्यक्ति को मुंह के अंदर छाले हो गए हो तो उसमें भी रातरानी के पत्तियों को पीसकर दिन में दो-तीन बार लगाने से व्यक्ति को बहुत जल्द मुंह के छाले से आराम मिल जाता है।

रात की रानी || Night blooming jasmine

रात की रानी का अन्य उपयोग 

  • रातरानी के पौधे के तेल से मालिश करने पर शरीर में ऊर्जा बनती है और व्यक्ति कार्य करने के लिए अग्रसर रहता है। अपने काम और अपने मानसिक तनाव में बैलेंस कर पाता है।
  • रातरानी के पौधे की पत्तियां में मच्छर भगाने का गुण होता है। अगर इसकी पत्तियों को सुखाकर जला दे तो इसके धुआं से भी मच्छर नहीं आते हैं और नहीं तो अगर इसकी पत्तियों को पीसकर उसके रस को अपने खिड़की दरवाजे पर लगा दें तो इससे भी मच्छर घर में प्रवेश नहीं करते हैं।
  • कॉस्मेटिक इंडस्ट्री में रातरानी के पौधे के फूल की या उसके पत्तियों की इस्तेमाल करके कई प्रकार के शैंपू, क्रीम, एंटीसेप्टिक क्रीम, लोशन और भी बहुत तरह से प्रयोग किया जाता है।


स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर || Stambheshwar Mahadev Temple

स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर

सनातन धर्म में मंदिरों की परम्परा काफी पूरानी है। देश में लाखों करोड़ों मंदिर हैं, इन मंदिरों में कई मंदिर आज भी रहस्य बने हुए हैं। दरअसल इनका रहस्‍य आज भी लोगों और वैज्ञानिकों के लिए एक अनसुलझी पहेली है। इन्हीं में से एक है स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर (Stambheshwar Mahadev Temple)

स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर || Stambheshwar Mahadev Temple

अभी तक हम भगवान शिव के ऐसे मंदिरों को जानते हैं, जहां उनकी एक मूर्ती स्थापित है और श्रद्धालु उनकी सच्चे दिल से पूजा कर रहे हैं। लेकिन आज हम ऐसे मंदिर की चर्चा करेंगे, जहां भगवान शिव पूरे दिन में केवल दो बार दर्शन देने के लिए आते हैं और पूरा मंदिर फिर जलमग्न हो जाता है।

स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर गुजरात की राजधानी गांधीनगर से लगभग 175 किमी दूर जंबूसर के कवि कंबोई गांव में मौजूद है। मंदिर 150 साल पुराना है, जो अरब सागर और खंभात की खाड़ी से घिरा हुआ है। सबसे पुराना मंदिर होने के होने के साथ स्तंभेश्वर महादेव मंदिर को 'गायब मंदिर' भी कहा जाता है। सावन के महीने में इस मंदिर में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। दूर-दूर से लोग महादेव के दर्शन करने के लिए यहां आते हैं।

स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर || Stambheshwar Mahadev Temple

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने अपने तपोबल से किया था। यह मंदिर समुद्र में स्थित है और रोज़ाना दो बार गायब हो जाता है। कई लोगों को मंदिर का गायब होना एक चमत्कार लगता है। इसके पीछे प्राकृतिक कारण है, दरअसल दिन भर में समुद्र का स्तर इतना बढ़ जाता है कि मंदिर पूरी तरह डूब जाता है। फिर कुछ ही पलों में समुद्र का स्तर घट जाता है और फिर मंदिर पुनः दिखाई देने लगता है। ऐसा हमेशा सुबह और शाम के समय होता है। मंदिर के गायब होने के पीछे लोग समुद्र द्वारा शिव का अभिषेक करना मानते हैं। यही नहीं श्रद्धालु भगवान शिव के इस मंदिर का नजारा लेने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

मंदिर की पौराणिक कथा

इस मंदिर के निर्माण की कहानी का वर्णन स्कन्दपुराण में मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि ताड़कासुर ने भगवान शिव की काफी कठोर तपस्या की थी, जिससे भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो गए थे और असुर से मनचाहा वरदान मांगने को कहा। वरदान में असुर ने मांगा कि उस असुर को सिर्फ भगवान शिव का छह महीने का पुत्र ही मार पाए।

भगवान शिव से वरदान मिलते ही ताड़कासूर ने सब जगह आतंक फैला दिया और सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों को परेशान करने लगा। असुर के आतंक से परेशान होकर सभी देवता और ऋषि-मुनि महादेव के पास पहुंचे और भोलेनाथ को सभी बात बताई। जिसके बाद कार्तिकेय ने ही मात्र 6 दिन की आयु में ताड़कासुर का वध किया। 

स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर || Stambheshwar Mahadev Temple

बाद में जब कार्तिकेय को ताड़कासुर के भगवान शंकर भक्त होने का पता चला तो वह काफी निराश हुए। भगवान विष्णु ने उन्हें सांत्वना दी- 'एक दुष्ट व्यक्ति को मारना, जो निर्दोष लोगों के खून पर अपना पोषण करता है, कोई पाप कर्म नहीं है। लेकिन, फिर भी यदि आप दोषी महसूस करते हैं तो अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए भगवान शिव की पूजा से बेहतर कोई तरीका नहीं है। शिवलिंग स्थापित करें और गहरी भक्ति के साथ उनकी पूजा करें।' इसके बाद ही सभी देवताओं ने मिलकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनन्दक स्तम्भ की स्थापना की, जिसे आज के समय में स्तम्भेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। 

English Translate

Stambheshwar Mahadev Temple

The tradition of temples in Sanatan Dharma is very old. There are lakhs and crores of temples in the country, many of these temples remain a mystery even today. In fact, their mystery is still an unsolved puzzle for people and scientists. One of these is Stambheshwar Mahadev Temple.

स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर || Stambheshwar Mahadev Temple

Till now we know such temples of Lord Shiva, where his idol is installed and the devotees are worshiping him with true heart. But today we will discuss about such a temple, where Lord Shiva comes to give darshan only twice in the whole day and then the entire temple gets submerged.

Stambheshwar Mahadev Temple is located in Kavi Kamboi village of Jambusar, about 175 km from Gandhinagar, the capital of Gujarat. The temple is 150 years old, surrounded by the Arabian Sea and the Gulf of Khambhat. Apart from being the oldest temple, Stambheshwar Mahadev Temple is also called the 'Missing Temple'. In the month of Sawan, there is a huge crowd of people in this temple. People come here from far and wide to have darshan of Mahadev.

Stambheshwar Mahadev Temple was built by Lord Shiva's son Kartikeya with his spiritual power. This temple is located in the sea and disappears twice daily. Many people consider the disappearance of the temple a miracle. There is a natural reason behind this, in fact the sea level increases so much throughout the day that the temple gets completely submerged. Then within a few moments the sea level decreases and the temple becomes visible again. This always happens in the morning and evening. People believe that the reason behind the disappearance of the temple is the consecration of Shiva by the sea. Not only this, devotees come from far and wide to see this temple of Lord Shiva.

Legend of the temple

The story of construction of this temple is described in Skandapuran. It is said that Tarakasura had performed very rigorous penance for Lord Shiva, due to which Lord Bholenath was pleased and asked the demon to ask for the desired boon. In the boon, the demon asked that only the six-month-old son of Lord Shiva could kill that demon.

स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर || Stambheshwar Mahadev Temple

As soon as he got the boon from Lord Shiva, Tadkasur spread terror everywhere and started harassing all the gods, goddesses and sages. Troubled by the terror of the demon, all the gods and sages reached Mahadev and told everything to Bholenath. After which Kartikeya himself killed Tadkasur at the age of just 6 days.

Later, when Kartikeya came to know that Tarakasura was a devotee of Lord Shankar, he was quite disappointed. Lord Vishnu consoled him- 'Killing an evil person, who nourishes himself on the blood of innocent people, is not a sinful act. But, still if you feel guilty then there is no better way to atone for your sin than worshiping Lord Shiva. Install Shivalinga and worship it with deep devotion. Only after this, all the gods together established the Vishwanandak Stambh at Mahisagar Sangam Teerth, which is today known as Stambheshwar Teerth.