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स्वाधिष्ठान चक्र : निचले पेट का केन्द्र || शरीर विज्ञान व सातचक्र ||

स्वाधिष्ठान चक्र (Swadhisthana Chakra) : निचले पेट का केन्द्र

स्व = आत्मा
स्थान=जगह

स्वाधिष्ठान चक्र त्रिकास्थि (पेडू के पिछले भाग की पसली) के निचले छोर में स्थित है। इसका मंत्र वम (ङ्क्ररू) है।

शरीर विज्ञान व सातचक्र

स्वाधिष्ठान चक्र हमारे विकास के एक-दूसरे स्तर का संकेतक है। चेतना की शुद्ध, मानव चेतना की ओर उत्क्रांति का प्रारंभ स्वाधिष्ठान चक्र में होता है। यह अवचेतन मन का वह स्थान है जहां हमारे अस्तित्व के प्रारंभ में गर्भ से सभी जीवन अनुभव और परछाइयां संग्रहीत रहती हैं। मूलाधार चक्र हमारे कर्मों का भंडारग्रह है तथापि इसको स्वाधिष्ठान चक्र में सक्रिय किया जाता है।

स्वाधिष्ठान चक्र की जाग्रति स्पष्टता और व्यक्तित्व में विकास लाती है। किन्तु ऐसा हो, इससे पहले हमें अपनी चेतना को नकारात्मक गुणों से शुद्ध कर लेना चाहिए। स्वाधिष्ठान चक्र के प्रतीकात्मक चित्र ६ पंखुडिय़ों वाला एक कमल है। ये हमारे उन नकारात्मक गुणों को प्रकट करते हैं, जिन पर विजय प्राप्त करनी है - क्रोध, घृणा, वैमनस्य, क्रूरता, अभिलाषा और गर्व। अन्य प्रमुख गुण जो हमारे विकास को रोकते हैं, वे हैं आलस्य, भय, संदेह, बदला, ईर्ष्या और लोभ।

स्वाधिष्ठान चक्र (Swadhisthana Chakra) : निचले पेट का केन्द्र

स्वाधिष्ठान चक्र का प्रतीक पशु मगर (मगरमच्छ) है। यह सुस्ती, भावहीनता और खतरे का प्रतीक है जो इस चक्र में छिपे हैं। स्वाधिष्ठान चक्र का तत्त्व है जल, यह भी छुपे हुए खतरे का प्रतीक है। जल कोमल और लचीला है, किन्तु यह जब नियंत्रण से बाहर हो जाता है तो भयंकर शक्तिशाली भी है। स्वाधिष्ठान चक्र के साथ यही विचित्रता है। जब अवचेतन से चेतनावस्था की ओर नकारात्मक भावनाएं उत्पन्न होती हैं, तब हम पूर्णरूप से संतुलन खो सकते हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र (Swadhisthana Chakra) : निचले पेट का केन्द्र

इस चक्र का देवता ब्रह्मा सृष्टिकर्ता और उनकी पुत्री सरस्वती बुद्धि और ललितकलाओं की देवी है। स्वाधिष्ठान का रंग संतरी, सूर्योदय का रंग है जो उदीयमान चेतना का प्रतीक है। संतरी रंग सक्रियता और शुद्धता का रंग है। यह सकारात्मक गुणों का प्रतीक है और इस चक्र में प्रसन्नता, निष्ठा, आत्मविश्वास और ऊर्जा जैसे गुण पैदा होते हैं।

शरीर विज्ञान व सातोंचक्रों को एक साथ यहाँ क्लिक करके पढ़ें 


प्रेम का सौदा - रामधारी सिंह दिनकर || इतवार (Sunday) ||

प्रेम का सौदा

https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2022/07/sunday.html
"मोती कभी भी किनारे पे खुद नहीं आते, 
उन्हें पाने के लिए समुन्दर में उतरना ही पड़ता है..❤️"


प्रेम का सौदा
सत्य का जिसके हृदय में प्यार हो,
एक पथ, बलि के लिए तैयार हो ।

फूँक दे सोचे बिना संसार को,
तोड़ दे मँझधार जा पतवार को ।

कुछ नई पैदा रगों में जाँ करे,
कुछ अजब पैदा नया तूफाँ करे।

हाँ, नईं दुनिया गढ़े अपने लिए,
रैन-दिन जागे मधुर सपने लिए ।

बे-सरो-सामाँ रहे, कुछ गम नहीं,
कुछ नहीं जिसको, उसे कुछ कम नहीं ।

प्रेम का सौदा बड़ा अनमोल रे !
निःस्व हो, यह मोह-बन्धन खोल रे !
  
मिल गया तो प्राण में रस घोल रे !
पी चुका तो मूक हो, मत बोल रे !

प्रेम का भी क्या मनोरम देश है !
जी उठा, जिसकी जलन निःशेष है ।

जल गए जो-जो लिपट अंगार से,
चाँद बन वे ही उगे फिर क्षार से ।

प्रेम की दुनिया बड़ी ऊँची बसी,
चढ़ सका आकाश पर विरला यशी।

हाँ, शिरिष के तन्तु का सोपान है,
भार का पन्थी ! तुम्हें कुछ ज्ञान है ?

है तुम्हें पाथेय का कुछ ध्यान भी ?
साथ जलने का लिया सामान भी ?

बिन मिटे, जल-जल बिना हलका बने,
एक पद रखना कठिन है सामने ।
 
प्रेम का उन्माद जिन-जिन को चढ़ा,
मिट गए उतना, नशा जितना बढ़ा ।

मर-मिटो, यह प्रेम का शृंगार है।
बेखुदी इस देश में त्योहार है ।

खोजते -ही-खोजते जो खो गया,
चाह थी जिसकी, वही खुद हो गया।

जानती अन्तर्जलन क्या कर नहीं ?
दाह से आराध्य भी सुन्दर नहीं ।

‘प्रेम की जय’ बोल पग-पग पर मिटो,
भय नहीं, आराध्य के मग पर मिटो ।

हाँ, मजा तब है कि हिम रह-रह गले,
वेदना हर गाँठ पर धीरे जले।

एक दिन धधको नहीं, तिल-तिल जलो,
नित्य कुछ मिटते हुए बढ़ते चलो ।

पूर्णता पर आ चुका जब नाश हो,
जान लो, आराध्य के तुम पास हो।

आग से मालिन्य जब धुल जायगा,
एक दिन परदा स्वयं खुल जायगा।

आह! अब भी तो न जग को ज्ञान है,
प्रेम को समझे हुए आसान है ।

फूल जो खिलता प्रल्य की गोद में,
ढूँढ़ते फिरते उसे हम मोद में ।

बिन बिंधे कलियाँ हुई हिय-हार क्या?
कर सका कोई सुखी हो प्यार क्या?

प्रेम-रस पीकर जिया जाता नहीं ।
प्यार भी जीकर किया जाता कहीं?

मिल सके निज को मिटा जो राख में,
वीर ऐसा एक कोई लाख में।

भेंट में जीवन नहीं तो क्या दिया ?
प्यार दिल से ही किया तो क्या किया ?

चाहिए उर-साथ जीवन-दान भी,
प्रेम की टीका सरल बलिदान ही।

- रामधारी सिंह दिनकर
https://rupaaooskiekboond.blogspot.com/2022/07/sunday.html
"हर वक़्त जीतने का जज्बा होना चाहिए, 
क्यूंकि किस्मत बदले न बदले पर समय ज़रूर बदलता है..❤️"

सांझ ढले कभी

सांझ ढले कभी

सांझ ढले कभी,
तो आओ बैठो साथ मेरे
एक चाय की प्याली के साथ
तुम्हें हाले दिल सुनाएं..
चाय पर शायरी (Chai Par Shayari)
कैसे बीते ये दिन, महीने, साल
तेरे बिन
उस हर एक पल का
तुम्हें एहसास कराएं..
चाय पर शायरी (Chai Par Shayari)

पतझड़ में जब
पेड़ों से पीले पत्ते गिरे
बिछड़ते उस मंजर को
अपनी आंखों में दिखाएं..
चाय पर शायरी (Chai Par Shayari)
वसंत ऋतु में जब
कोयल कूकी
विरह की उस गीत को
तुम्हें गा के सुनाएं..
चाय पर शायरी (Chai Par Shayari)
सावन के महीने में
जब मेरे बदन पर
पानी की बूंदे पड़ी
उन बूंदों की जलन बताएं..
चाय पर शायरी (Chai Par Shayari)
ओस की बूंदे जब
मेरे बालों पर गिरी
उन ओस की बूंदों में
तुम्हें तेरा ही अक्स दिखाएं..
चाय पर शायरी (Chai Par Shayari)

गर्मी की तपिश में
पसीने की बूंदों के साथ
आंसू कैसे मिलते,
अरमान कैसे पिघलते तुम्हें बताएं..
चाय पर शायरी (Chai Par Shayari)

सांझ ढले कभी
तो आओ बैठो साथ मेरे
एक चाय की प्याली के साथ
तुम्हें हाले दिल सुनाएं..
चाय पर शायरी (Chai Par Shayari)

तृतीया तंत्र : काकोलूकीयम्

तृतीया तंत्र :  काकोलूकीयम्

तृतीया तंत्र :  काकोलूकीयम्,कौवे और उल्लुओं की कहानी:पंचतंत्र

दक्षिण देश में महिलारोप्य नाम का एक नगर था। नगर के पास एक बड़ा पीपल का वृक्ष था। उसकी घने पत्तों से ढकी शाखाओं पर पक्षियों के घोंसले बने हुए थे। उन्हीं में से कुछ घोंसलों में कौवों के बहुत-से परिवार रहते थे। कौवों का राजा वायसराज मेघवर्ण भी वहीं रहता था। वहाँ उसने अपने दल के लिए एक व्यूह-सा बना लिया था। उससे कुछ दूर पर्वत की गुफा में उल्लुओं का दल रहता था। इनका राजा अरिमर्दन था। 

दोनों में स्वाभाविक वैर था। अरिमर्दन हर रात पीपल के वृक्ष के चारों ओर चक्कर लगाता था। वहाँ कोई इकला-दुकला कौवा मिल जाता, तो उसे मार देता था। इसी तरह एक-एक करके उसने सेकड़ो कौवे मार दिए। 

कौवे और उल्लुओं की कहानी:पंचतंत्र

तब मेघवर्ण ने अपने मन्त्रियों को बुलाकर उनसे उलूकराज के प्रहारों से बचने का उपाय पूछा। उसने कहा- कठिनाई यह है कि हम रात को देख नहीं सकते और दिन को उल्लू न जाने कहाँ जा छिप जाते हैं। हमें उनके स्थान के सम्बन्ध में कुछ भी पता नहीं। समझ में नहीं आता कि इस समय सन्धि, युद्ध, यान, आसन, संश्रय, द्वैधीभाव आदि उपायों में किसका प्रयोग किया जाए? 

पहले मेघवर्ण ने उज्जीवी नाम के प्रथम सचिव से प्रश्न किया। उसने उत्तर दिया- महाराज ! बलवान् शत्रु से युद्ध नहीं करना चाहिए। उससे तो सन्धि करना ठीक है। युद्ध से हानि ही हानि है। समान बल वाले शत्रु से भी पहले सन्धि करके, कछुए की तरह सिमटकर, शक्ति संग्रह करने के बाद ही युद्ध करना उचित है। 

उसके बाद संजीवी नाम के द्वितीय सचिव से प्रश्न किया गया। उसने कहा-महाराज शत्रु के साथ सन्धि नहीं करनी चाहिए। शत्रु सन्धि बाद भी नाश ही करता है। पानी अग्नि द्वारा गर्म होने के बाद भी अग्नि को बुझा ही देता है। विशेषतः क्रूर, अत्यन्त लोभी और धर्मरहित शत्रु से कभी भी सन्धि न करे। शत्रु के प्रति शान्ति-भाव दिखलाने से उसकी शत्रुता की आग और भी भड़क जाती है। वह और भी कर हो जाता है। जिस : से हम आमने-सामने की लड़ाई न लड़ सकें उसे छल-बल द्वारा हराना चाहिए शत्रु किन्तु सन्धि नहीं करनी चाहिए। सच तो यह है कि जिस राजा की भूमि शत्रु के खून और उनकी विधवा स्त्रियों के आँसुओं से नहीं सींची गई, वह राजा होने के योग्य ही नहीं। 

तब मेघवर्ण ने तृतीय सचिव अनुजीवी से प्रश्न किया। उसने कहा-महाराज हमारा शत्रु दुष्ट है, बल में भी अधिक है। इसलिए उसके साथ सन्धि और युद्ध दोनों के करने में हानि है। उसके लिए तो शास्त्रों में यान-नीति ही विधान है। हमें यहाँ से किसी दूसरे देश में चला जाना चाहिए। इस तरह पीछे हटने में कायरता दोष नहीं होता। शेर भी तो हमला करने से पहले पीछे हटता है। वीरता का अभियान करके जो हठपूर्वक युद्ध करता है वह शत्रु की इच्छा पूरी करता है और अपने व अपने वंश का नाश कर लेता है। का 

इसके बाद मेघवर्ण ने चतुर्थ सचिव प्रजीवी से प्रश्न किया। उसने कहा—महाराज! मेरी सम्मति में तो सन्धि, विग्रह और यान तीनों में दोष है। हमारे लिए आसन नीति का आश्रय लेना ही ठीक है। अपने स्थान पर दृढ़ता से बैठना सबसे अच्छा उपाय है। मगरमच्छ अपने स्थान पर बैठकर शेर को भी हरा देता है, हाथी को भी पानी में खींच लेता है। यही यदि अपना स्थान छोड़ दे तो चूहे से भी हार जाए। अपने दुर्ग में बैठकर हमारा एक सिपाही शत-शत शत्रुओं का नाश कर सकता है। हमें अपने दुर्ग को दृढ़ बनाना चाहिए। अपने स्थान पर दृढ़ता से खड़े छोटे-छोटे वृक्षों को आँधी-तूफान के प्रबल झोंके भी उखाड़ नहीं सकते। 

कौवे और उल्लुओं की कहानी, kauwa aur ullu ki kahani, पंचतंत्र

तब मेघवर्ण ने चिरंजीवी नाम के पंचम सचिव से प्रश्न किया। उसने कहा- महाराज! मुझे तो इस समय संश्रय नीति ही उचित प्रतीत होती है। 

किसी बलशाली सहायक मित्र को अपने पक्ष में करके ही हम शत्रु को हरा सकते हैं। अतः हमें यहीं ठहरकर किसी समर्थ मित्र की सहायता ढूँढ़नी चाहिए। यदि एक समर्थ मित्र न मिले तो अनेक छोटे-छोटे मित्रों की सहायता भी हमारे पक्ष को सबल बना सकती है। छोटे-छोटे तिनकों से गुंथी हुई रस्सी भी इतनी मज़बूत बन जाती है कि हाथी को जकड़कर बाँध लेती है। 

पाँचों मन्त्रियों से सलाह लेने के बाद वायसराज मेघवर्ण अपने वंशागत सचिव स्थिरजीवी के पास गया। उसे प्रणाम करके वह बोला-श्रीमान! मेरे सभी मन्त्री मुझे जुदा-जुदा राय दे रहे हैं। आप उनकी सलाहें सुनकर अपना निश्चय दीजिए। 

स्थिरजीवी ने उत्तर दिया- वत्स! सभी मन्त्रियों ने अपनी बुद्धि के अनुसार ठीक ही मन्त्रणा दी है; अपने-अपने समय सभी नीतियाँ अच्छी होती है। किन्तु मेरी सम्मति में तो तुम्हें द्वैधीभाव या भेद-नीति का ही आश्रय लेना चाहिए। उचित यह है कि पहले हम सन्धि द्वारा शत्रु में अपने लिए विश्वास पैदा कर लें, किन्तु शत्रु पर विश्वास न करें। सन्धि करके युद्ध की तैयारी करते रहे; तैयारी पूरी होने पर युद्ध कर दें। सन्धिकाल में हमें शत्रु के निर्बल स्थलों का पता लगाते रहना चाहिए। उनसे परिचित होने के बाद वहीं आक्रमण कर देना उचित है। 

मेघवर्ण ने कहा- आपका कहना निःसन्देह सत्य है, किन्तु शत्रु का निर्बल स्थल किस तरह देखा जाए? 

स्थिरजीवी गुप्तचरों द्वारा ही हम शत्रु के निर्बल स्थल की खोज कर सकते हैं। गुप्तचर ही राजा की आँख का काम देता है। स्थिरजीवी की बात सुनने के बाद मेघवर्ण ने पूछा - श्रीमान! यह तो 

बतलाइए कि कौवों और उल्लुओं का यह स्वाभाविक वैर किस कारण से है? 

तब स्थिरजीवी ने अगली कथा सुनाई:

उल्लू का राज्याभिषेख 

To be continued ...

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta || अध्याय एक के अनुच्छेद 01-11

श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय एक ~ अर्जुनविषादयोग ||

अथ प्रथमोऽध्यायः- अर्जुनविषादयोग

अध्याय एक के अनुच्छेद 01-11

अध्याय एक के अनुच्छेद 01-11 में दोनों सेनाओं के प्रधान शूरवीरों और अन्य महान वीरों का वर्णन किया गया है। 

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta || अध्याय एक के अनुच्छेद 01-11

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥1-1॥

भावार्थ : 
धृतराष्ट्र बोले
हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1॥

संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌ ॥1-2 ॥

भावार्थ : 
संजय बोले
उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा॥2॥

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥1.3॥
भावार्थ : 
हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए। 

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥1.4॥

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌ ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः ॥1.5॥

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌ ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥1.6॥
भावार्थ : 
इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं। 

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥1.7॥
भावार्थ : 
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ। 

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥1.8॥
भावार्थ : 
आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा। 

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥1.9॥
भावार्थ : 
और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं। 
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥1.10॥
भावार्थ : 
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है। 
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥1.11॥
भावार्थ : 
इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें। 

तेनालीराम - बड़ा कौन || Tenali Raman - Bada Kaun ||

 बड़ा कौन

एक बार राजा कृष्णदेव राय अपनी पत्नी के साथ बैठे बातें कर रहे थे। बातों बातों में तेनालीराम की बात चली, तो राजा कृष्णदेव राय बोले - "सचमुच हमारे दरबार में तेनालीराम जैसा चतुर कोई और नहीं है। इसलिए अभी तक तो कोई उसे हरा नहीं पाया है।"

तेनालीराम - बड़ा कौन || Tenali Raman - Bada Kaun ||

राजा की बात सुनकर रानी बोली - "आप कल तेनालीराम को भोजन के लिए महल में आमंत्रित करें। मैं तेनालीराम को जरूर हरा दूंगी।"

राजा ने मुस्कुराकर हामी भर ली। अगले दिन रानी ने अपने हाथों से स्वादिष्ट पकवान बनाए। तेनालीराम के समक्ष पकवान पेश किये गए। राजा के साथ बैठे तेनालीराम उन पकवानों की जी-भरकर प्रशंसा करते हुए खाते जा रहे थे। खाने के बाद रानी ने तेनालीराम को बढ़िया पान का बीड़ा भी खाने को दिया।

तेनालीराम मुस्कराकर बोले - "सचमुच, आज जैसा खाने का आनंद तो मुझे कभी नहीं आया। मन तृप्त हो गया। तभी रानी ने तेनालीराम से पूछ लिया - "अच्छा तेनालीराम एक बात बताओ। राजा बड़े हैं या मैं?"

अब तो तेनालीराम का माथा घुमा कि रानी के सवाल का क्या जवाब दे। राजा और रानी भी उत्सुकता से देख रहे थे कि भला तेनालीराम क्या जवाब देता है?

तेनालीराम भी कहाँ कम थे, फटाक से अपने दोनों हाथ जोड़कर पहले धरती को प्रणाम किया, फिर एकाएक जमीन पर गिर पड़े।

रानी घबराकर बोली - "अरे-अरे, यह क्या तेनालीराम? तेनालीराम उठकर खड़े हो गए और बोले - "महारानी! मेरे लिए तो आप धरती हैं और राजा आसमान, दोनों में से किसे छोटा, किसे बड़ा कहूं? कुछ समझ में नहीं आ रहा है?वैसे आज महारानी के हाथों का बना भोजन इतना स्वादिष्ट था कि उन्हीं को बड़ा कहना होगा। इसलिए मैं धरती को ही दंडवत प्रणाम कर रहा था।"

तेनालीराम की बात सुनकर राजा और रानी दोनों खुश हुए और रानी बोली - " तेनालीराम! तुम सचमुच चतुर हो।  मुझे भी जिता दिया और हारकर खुद भी जीत गए। 

English Translate

who is the elder

Once King Krishnadev Raya was talking with his wife. Talking about Tenaliram, King Krishnadev Raya said - "There is really no one else as clever as Tenaliram in our court. That's why no one has been able to defeat him so far."

तेनालीराम - बड़ा कौन || Tenali Raman - Bada Kaun ||

After listening to the king, the queen said - "You invite Tenaliram to the palace for food tomorrow. I will definitely defeat Tenaliram."

The king agreed with a smile. The next day the queen made a delicious dish with her own hands. Dishes were presented to Tenaliram. Tenaliram, who was sitting with the king, was going to eat, praising those dishes wholeheartedly. After eating, the queen gave Tenaliram a piece of fine betel leaf to eat.

Tenaliram smiled and said - "Really, I have never had the pleasure of eating like today. The mind was satisfied. Then the queen asked Tenaliram - "Well Tenaliram, tell me one thing. Is the king older or me?"

Now Tenaliram's head turned around that what should be the answer of the queen's question. The king and queen were also eagerly watching what Tenaliram would answer.

Where Tenaliram was also less, he first bowed down to the earth with both his hands folded, then suddenly fell on the ground.

The queen panicked and said - "Hey, what is this Tenaliram? Tenaliram stood up and said - "Empress! For me, you are the earth and the king of the sky, which of the two should I call smaller, which is bigger? Do not understand anything? Well today the food prepared by the queen's hands was so delicious that she would have to say big. That's why I was bowing down to the earth itself."

Both the king and the queen were happy after listening to Tenaliram and the queen said - "Tenaliram! You are really smart. Gave me the victory and defeated myself.

गुरु पूर्णिमा - २०२२ || Guru Purnima - 2022 ||

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima)

गुरु पूर्णिमा का खास पर्व इस साल 13 जुलाई यानी आज मनाया जा रहा है।  हिंदू धर्म में आषाढ़ पूर्णिमा का विशेष महत्व है, ऐसा इसलिए क्योंकि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही वेदों के रचयिता वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। आषाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।शास्त्रों में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दिया गया है, इसलिए इस दिन गुरू पूजन का विशेष महत्व बताया गया है।

गुरु पूर्णिमा - २०२२ || Guru Purnima - 2022 ||

गुरु पूर्णिमा का महत्व

गुरु पूर्णिमा, जिसे "व्यास पूर्णिमा" कहा जाता है, महाभारत के महान लेखक वेद व्यास की जयंती के अवसर पर मनाई जाती है।

जून-जुलाई के महीने में पूर्णिमा का दिन गुरु पूर्णिमा मनाने का गवाह है।

हिंदू, बौद्ध और जैन इस दिन को विभिन्न रूपों में मनाते हैं।

हमारी संस्कृति के हिस्से के रूप में, हिंदू उस दिन वेद व्यास का सम्मान करते हैं।

शिष्य अपने शिक्षकों के प्रति अपने प्रेम, कृतज्ञता और समर्पण का इजहार करते हैं।

बौद्ध धर्म में, शिष्य गुरु पूर्णिमा के दिन "भगवान बुद्ध" की पूजा अर्चना करते हैं।

जैन धर्म की परंपरा के अनुसार लोग गुरु पूर्णिमा को गणधारा के "तीनोक गुहा" बनने के नाम पर त्रेणोक गुहा पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं।

सबसे पुरानी हिंदू पौराणिक कथाओं की मूल बातों के अनुसार, "भगवान शिव को पहले गुरु के रूप में दर्शाया गया है" और उनके दो शिष्य शनि और परशुराम थे।

उन्होंने पृथ्वी पर सभ्यता और धर्म का परिचय दिया। "भगवान शिव के आदिदेव और आदिगुरु" के नाम के पीछे यही कहानी है।

भगवान् शिव ने शनिदेव और भगवान् परशुराम के साथ सात लोगों को शिक्षा प्रदान किया और उसके बाद, वे "सप्तऋषियों" के रूप में जाने जाने लगे और उन्होंने पूरी दुनिया में शिव का ज्ञान वितरित किया।

पूर्णिमा अनुष्ठान की शुरुआत सुबह जल्दी उठकर स्नान करके की जाती है।

सफेद या पीले वस्त्र धारण करना आवश्यक है।

उसके बाद अपने गुरु सहित भगवान विष्णु, भगवान शिव, गुरु बृहस्पति, संत वेद व्यास से प्रार्थना करते हैं।

इस अवसर पर छात्र सफेद कपड़े पर इन देवताओं के चित्र की पूजा करते हैं।

लोग गुरु के सम्मान के लिए फूल, दीपक, नैवेद्य, चंदन आदि का उपयोग करते हैं।

गुरु के चरणों को मंत्र जाप करके और उनके सम्मान को दिखाने के लिए फूल चढ़ाते हैं।

गुरु पूर्णिमा को उस व्यक्ति के लिए शुभ माना जाता है, जो संत बनना चाहता है और गुरु को अपना जीवन देना चाहता है, वह गुरु आश्रम में शामिल हो सकता है।

गुरु पूर्णिमा का पारंपरिक दृष्टिकोण आधुनिक दृष्टिकोण से बिल्कुल अलग है। पारंपरिक हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, शिष्य अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों के आधार पर अपने गुरु की पूजा करते हैं, लेकिन आज सभी शैक्षणिक संस्थानों के छात्र गुरु पूर्णिमा को शिक्षक दिवस के रूप में अपने शिक्षकों का धन्यवाद कर मनाते हैं।

भक्त कुछ तथ्यों के माध्यम से संत व्यास को याद करते हैं।

महर्षि व्यास को महाभारत और भगवद गीता के लेखक के रूप में जाना जाता है।

महर्षि व्यास अट्ठारह पुराणों के रचयिता थे।

व्यास को दत्तात्रेय के गुरु के रूप में दर्शाया गया है।

उन्हें सभी गुरुओं के गुरु के रूप में जाना जाता था।

गुरु पूर्णिमा - २०२२ || Guru Purnima - 2022 ||

English Translate 

Significance of Guru Purnima 

*Guru Purnima*, otherwise called *Vyas Purnima*, is celebrating the birth anniversary of Veda Vyasa, the legendary author of Mahabharata.

 Full moon day in the month of June-July is the witness of celebrating Guru Purnima.

 Hindus, Buddhists and Jains are celebrating this day in various forms. 

As part of our culture, Hindus are honouring Veda Vyas on that day. 

Disciples are expressing their love, gratitude and devotion to their teachers.

 Among Buddhists, disciples are worshipping and honouring *Lord Buddha* during Guru Purnima day. 

As per the part of Jain religious custom, people are celebrating Guru Purnima as Treenok Guha Purnima in the name of Ganadhara becoming *Treenok Guha*. 

As in the terms of the basics of oldest Hindu mythology, *Lord Shiva is denoted as first Guru* and he had two disciples Shani and Parashurama.

 He introduced civilization and religion on earth. That is the story behind the name of *Adidev and Adiguru to Lord Shiva*. 

He provided seven people with Shani and Parasurama and after that, they began to be known as *Saptarishis* and they distributed knowledge of Shiva to the whole world.

 Purnima ritual is started by waking up in the early morning and taking a bath.

 Wearing white or yellow clothes is necessary. 

After that, praying to Lord Vishnu, Lord Shiva, Guru Brihaspati, Saint Ved Vyas along with our own Guru. 

On that occasion, student worship the picture of these Gods by setting on a white cloth. 

Yet, people are using flowers, lamps, naivedya, sandalwood etc to honour Guru.

 Washing the feet of Guru by chanting the mantra and offering flowers to show their respect. 

Guru Purnima is considered as auspicious for the person who wants to become saint and give their life to Guru can join Ashram. 

The traditional perspective of Guru Purnima is entirely different from the modern view. 

As per the traditional Hindu mythology, disciples are worshipping their Guru based on rituals and customs. 

*But today, all the academic institutions' students are celebrating Guru Purnima as Teachers day by thanking their teachers.* 

*Devotees are remembering saint Vyasa through some facts.* 

Vyasa is known as the author of Mahabharata and Bhagavad Gita. 

He was the legend who wrote eighteen Puranas. 

Vyasa is represented as the guru of Dattatreya. 

He was rightly known as the guru of all gurus.


*गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई । जौ बिरंचि संकर सम होई ।।* 🙏🏻🙏🏻🌸🌸

आपकेे अंदर विराजमान गुरु तत्व को सादर वंदन । गुरु पूर्णिमा की अनन्त शुभकामना। 🙏🏻🌺🌺