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Sunday.. इतवार ..रविवार

 इतवार (Sunday)

"नकारात्मक लोगो से हमेशा दूर रहना चाहिए,
क्योंकि उनके पास हर समाधान के लिए,
एक नई परेशानी रहती है"
..

नहीं रहे अब वो जंगल

हरी भरी सी अपनी धरती,
लगती कितनी प्यारी थी,
जंगल ही तो इसकी शोभा थे,
इनकी दुनिया तो एकदम न्यारी थी।

इन जंगल के कारण ही,
इसके राजा-रानियों की प्यारी एक कहानी थी,
जिसको सुनाने के खातिर ही,
प्यारी दादी और नानी थी।

मोर-मोरनी के नृत्य का,
होता था दर्शन वर्षा के आगमन पर,
जिनके इंद्रधनुषी पंखों की,
पूरी दुनिया दीवानी थी।

मोगली और बघीरा की दुनिया की,
ये जंगल ही तो निशानी थी,
जिनको सुनकर बड़ा हुआ बच्चों का जीवन,
उस कहानी की दुनियाँ अजब निराली थी।

नहीं रहे अब वो जंगल,
जो कहानियों की निशानी थे,
खत्म हो गए कहानी किस्से,
लगता बस अब ये बात पुरानी थी।

पर याद बहुत आते है वो दिन,
पशु-पक्षियों संग बीता जीवन,
वो हरे-भरे लहलहाते जंगल,
जिनकी अपनी ही अलग कहानी थी।

हरी भरी सी अपनी धरती,
लगती कितनी प्यारी थी,
जंगल ही तो इसकी शोभा थे,
इनकी दुनिया तो एकदम न्यारी थी।

- Nidhi Agarwal

Sunday.. इतवार ..रविवार
"हौसले के तरकश में कोशिश का वो तीर ज़िंदा रखो,
हार जाओ चाहे जिन्दगी मे सब कुछ,
मगर फिर से जीतने की उम्मीद जिन्दा रखो"..

ढोल की पोल : पंचतंत्र / Dhol kiPol : Panchtantra

2. ढोल की पोल (गोमयु गीदड़ की कथा )

शब्दमात्रात् न भीतव्यम् 

शब्द मात्र से डरना उचित नहीं

ढोल की पोल (गोमयु गीदड़ की कथा )

"गोमायु नाम का गीदड़ एक बार भूखा - प्यासा जंगल में घूम रहा था। घूमते - घूमते हुए एक युद्ध भूमि में जा पहुंचा। वहां दो सेनाओं में युद्ध होकर शांत हो चुका था। किंतु एक ढोल अभी तक वहीं पड़ा था। उस ढोल पर इधर-उधर की बेलों की शाखाएं हवा से हिलती हुई प्रहार करती थी। उस प्रहार से ढोल से बड़े जोर की आवाज होती थी। 

आवाज सुनकर गोमायु बहुत डर गया। उसने सोचा, इससे पूर्व की भयानक शब्द वाला जानवर मुझे देखे, मैं यहां से भाग जाता हूं। किंतु दूसरे ही पल उसे याद आया कि भय या आनंद के उद्धेग में हमें सहसा कोई काम नहीं करना चाहिए। पहले भय के कारण की खोज करनी चाहिए। यह सोचकर वह धीरे-धीरे उधर चल पड़ा, जिधर से शब्द आ रहा था। शब्द के बहुत निकट पहुंचा, तो ढोल को देखा। ढोल पर बेलों की शाखाएं चोट कर रही थी। गोमायु ने स्वयं भी उस पर हाथ मारने शुरू कर दिए। ढोल और भी जोर से बज उठा। 

गीदड़ ने सोचा यह जानवर तो बहुत सीधा-साधा मालूम होता है। इसका शरीर भी बहुत बड़ा है। मांसल भी है। इसे खाने से बहुत दिनों की भूख मिट जाएगी। इसमें चर्बी, मांस, रक्त खूब होगा। यह सोचकर उसने ढोल के ऊपर लगे चमड़े में दांत गड़ा दिए। चमड़ा बहुत कठोर था। गीदड़ के 2 दांत टूट गए। बड़ी कठिनाई से ढोल में एक छेद हुआ।  उस छेद को चौड़ा करके गोमायु गीदड़ जब ढ़ोल में घुसा, तो यह देखकर बड़ा निराश हुआ कि वह तो अंदर से बिल्कुल खाली है। उसमें रक्त - मांस - मज्जा थे ही नहीं।"

गोमयु गीदड़ और ढ़ोल की कथा

यह कहानी सुनाने के बाद दमनक पिंगलक से कहता है -

इसलिए कहता हूं कि शब्द मात्र से डरना उचित नहीं है। 
पिंगलक ने कहा - मेरे सभी साथी उस आवाज से डरकर जंगल से भागने की योजना बना रहे हैं। इन्हें किस तरह धीरज बँधाऊँ?
दमनक - इसमें इनका क्या दोष? सेवक तो स्वामी का ही अनुकरण करते हैं। जैसा स्वामी होगा, वैसे ही सेवक होंगे। यह संसार की रीति है। आप कुछ काल धीरज रखें, साहस से काम लें। में शीघ्र ही शब्द का स्वरूप देख कर आऊंगा। 
पिंगलक - तूम वहां जाने का साहस कैसे करोगे? 
दमनक - स्वामी के आदेश का पालन करना ही सेवक का काम है। स्वामी की आज्ञा हो तो आग में कूद पड़ूँ, समुद्र में छलांग लगा दूं। 
पिंगलक - जाओ इस शब्द का पता लगाओ। तुम्हारा मार्ग कल्याणकारी हो। यही मेरा आशीर्वाद है। 

तब दमनक पिंगलक को प्रणाम करके संजीवक के शब्द की ध्वनि का लक्ष्य बांधकर उसी दिशा में चल दिया।

दमनक के जाने के बाद पिंगलक ने सोचा - यह बात अच्छी नहीं हुई कि मैंने दमनक का विश्वास करके उसके सामने अपने मन का भेद खोल दिया। कहीं वह उसका लाभ उठाकर दूसरे पक्ष से मिल जाए और उसे मुझ पर आक्रमण करने के लिए उकसा दे तो बुरा होगा। मुझे दमनक का भरोसा नहीं करना चाहिए। यह पदच्युत है। उसका पिता मेरा प्रधानमंत्री था। एक बार सम्मानित होकर अपमानित हुए सेवक विश्वास पात्र नहीं होते। वह सदा अपने इस अपमान का बदला लेने का अवसर खोजते रहते हैं। इसलिए किसी दूसरे स्थान पर जाकर दमनक की प्रतीक्षा करता हूं। 

यह सोचकर दमनक की राह देखते हुए वह दूसरे स्थान पर अकेला चला गया। 

दमनक जब संजीवक के शब्द का अनुकरण करता हुआ उसके पास पहुंचा, तो यह देखकर उसे प्रसन्नता हुई कि वह कोई भयंकर जानवर नहीं बल्कि सीधा-साधा बैल है। उसने सोचा जब मैं संधि विग्रह की कूटनीति से पिंगलक  को अवश्य अपने बस में कर लूंगा। आपत्तीग्रस्त राजा की मंत्रियों के बस में होते हैं। यह सोंचकर वह पिंगलक से मिलने के लिए वापस चल दिया। 

पिंगलक ने उसे अकेले आता देखा तो उसके दिल में धीरज बंधा। उसने कहा - दमनक वह जानवर देख लिया तुमने? 
दमनक - आपकी दया से देखा स्वामी। 
पिंगलक - सचमुच? 
दमनक - स्वामी के सामने असत्य नहीं बोल सकता मैं। आपकी तो मैं देवता की तरह पूजा करता हूं। आपसे झूठ कैसे बोल सकूंगा। 
पिंगलक - संभव है तूने देखा हो। इसमें विस्मय क्या? और इसमें भी आश्चर्य नहीं कि उसने तुझे नहीं मारा। महान व्यक्ति महान शत्रु पर ही अपना पराक्रम दिखाते हैं। दीन और तुच्छ जन पर नहीं। आंधी का झोंका बड़े वृक्षों को ही गिराता है, घास - पात को नहीं। 
दमनक - मैं दीन ही सही, किंतु आपकी आज्ञा हो तो मैं उस महान पशु को भी आपका दीन सेवक बना दूं। 
पिंगलक ने लंबी सांस खींचते हुए कहा - यह कैसे होगा? 
दमनक - बुद्धि के बल से सब कुछ हो सकता है। स्वामी! जिस काम को बड़े - बड़े हथियार नहीं कर सकते, उस काम को छोटी सी बुद्धि कर सकती है। 
पिंगलक - यदि यही बात है तो मैं तुझे आज से अपना प्रधानमंत्री बनाता हूं। आज से मेरे राज्य के इनाम बांटने या दंड देने के काम तेरे ही अधीन होंगे। 
शेर और बैल की कहानी : पंचतंत्र
पिंगलक से यह आश्वासन पाने के बाद दमनक संजीवक के पास जाकर अकड़ता हुआ बोला - अरे दुष्ट बैल! मेरा स्वामी पिंगलक तुझे बुला रहा है। तू यहां नदी के किनारे व्यर्थ ही हूंकार क्यों भरता रहता है?
संजीवक - यह पिंगलक कौन? 
दमनक - अरे पिंगलक को नहीं जानता? थोड़ी देर ठहर तो उसकी शक्ति को जान जाएगा। जंगल में जब सब जानवरों का स्वामी पिंगलक शेर वहां वृक्ष की छाया में बैठा है। 
यह सुनकर संजीवक के प्राण सूख गए। दमनक के सामने गिडगिडाते हुए बोला - मित्र! तू सज्जन प्रतीत होता है। यदि तू मुझे वहां ले जाना चाहता है, तो पहले स्वामी से मेरे लिए अभय वचन ले ले। 
दमनक - तेरा कहना सच है। मित्र तू यहीं बैठ मैं अभय वचन लेकर अभी आता हूं। 

तब, दमनक पिंगलक के पास जाकर बोला, स्वामी! वह कोई साधारण जीव नहीं है। वह तो भगवान का वाहक बल है। मेरे पूछने पर उसने मुझे बताया कि उसे भगवान ने प्रसन्न होकर यमुना तट की हरी-भरी घास खाने को भेजा है। वह तो कहता है कि भगवान ने उसे यह सारा वन खेलने और चढ़ने को सौंप दिया है। 
पिंगलक - सच कहते हो भगवान के आशीर्वाद के बिना कौन है जो यहां इस वन में इतनी निष्ठा से घूम सके। फिर तूने क्या उत्तर दिया? 
दमनक - मैंने उसे कहा कि इस वन में तो चंडिका वाहन रूप शेर पिंगलक पहले से ही रहता है। तुम भी उसके अतिथि बनकर रहो। उसके साथ आनंद से विचरण करो। वह तुम्हारा स्वागत करेगा। 
पिंगलक - फिर उसने क्या कहा? 
दमनक - उसने यह बात मान ली और कहा कि अपने स्वामी से अभय वचन ले आओ। मैं तुम्हारे साथ चलूंगा। अब स्वामी जैसा चाहे वैसा करूंगा। 

दमनक की बात सुनकर पिंगलक बहुत प्रसन्न हुआ और बोला - बहुत अच्छा, तूने बहुत अच्छा कहा। मेरे दिल की बात कह दी। अब उसे अभय वचन देकर शीघ्र मेरे पास ले आओ। 
दमनक संजीवक के पास जाते - जाते सोचने लगा - स्वामी आज बहुत प्रसन्न हैं। बातों ही बातों में मैंने उन्हें प्रसन्न कर दिया। आज मुझ से अधिक धन्यभाग्य कोई नहीं। 
संजीवक के पास जाकर दमनक सविनय बोला - मित्र! मेरे स्वामी ने तुम्हें अभय वचन दे दिया है। मेरे साथ आ जाओ, किंतु राजप्रसाद में जाकर अभिमानी ना हो जाना। मुझसे मित्रवत मित्रता का संबंध निभाना। मैं भी तुम्हारे संकेत से राज्य चलाऊंगा। हम दोनों मिलकर राज्य लक्ष्मी का भोग करेंगे। दोनों मिलकर पिंगलक के पास गए।

पिंगलक ने नख विभूषित दाहिना हाथ उठाकर संजीवक का स्वागत किया और कहा कल्याण हो। आप इस निर्जन वन में कैसे आ गए? 
संजीवक ने सब वृतांत कह सुनाया। पिंगलक ने सब सुन कर कहा - मित्र! डरो मत इस वन में मेरा ही राज्य है। मेरी भुजाओं से रक्षित वन में तुम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। फिर भी अच्छा यही है कि तुम हर समय मेरे साथ रहो। वन में अनेक बड़े-बड़े हिंसक भयंकर पशु रहते हैं। वनचरों को भी डरकर रहना पड़ता है। तुम तो फिर हो ही निरामिषभोजी। 

शेर और बैल की इस मैत्री के बाद कुछ दिन तो वन का शासन करटक दमनक ही करते रहे। किंतु बाद में संजीवक के संपर्क में पिंगलक भी नगर की सभ्यता से परिचित हो गया। संजीवक को सभ्य जीव मानकर वह उसका सम्मान करने लगा और स्वयं भी संजीवक की तरह से सभ्य होने का यत्न करने लगा। थोड़े दिन बाद संजीवक का प्रभाव पिंगलक पर इतना बढ़ गया कि पिंगलक ने अन्य सब वन्य पशुओं की उपेक्षा शुरू कर दी। प्रत्येक प्रश्न पर पिंगलक संजीवक के साथ ही एकांत में मंत्रणा किया करता। करटक दमनक बीच में दखल नहीं दे पाते थे। संजीवक की इस मान वृद्धि से उनके मन में आग लग गई। 

शेर और बैल की इस मैत्री का एक दुष्परिणाम यह भी हुआ कि शेर ने शिकार के काम में ढ़ील कर दी। करटक - दमनक शेर का उच्छिष्ट मांस खाकर ही जीते थे। अब यह उच्छिष्ट मांस बहुत कम हो गया था। करटक - दमनक इससे भूखे रहने लगे। तब दोनों इसका उपाय सोचने लगे। 
शेर और बैल की कहानी : पंचतंत्र
दमनक बोला - करटक भाई! यह तो अनर्थ हो गया। शेर की दृष्टि में महत्व पाने के लिए ही तो मैंने यह प्रपंच रचा था। इसी लक्ष्य से मैंने संजीवक को शेर से मिलाया था। अब उसका परिणाम सर्वथा विपरीत हो रहा है। संजीवक को पाकर स्वामी ने हमें बिल्कुल भुला दिया है। यहां तक कि अपना काम भी वह भूल गया है। 
करटक ने कहा - किंतु इसमें भूल किसकी है? तूने ही दोनों की भेंट कराई थी। अब तू ही कोई उपाय कर। जिससे इन दोनों में बैर हो जाए। 
दमनक बोला - जिसने मेल कराया है, वह फूट भी डाल सकता है। 
करटक - यदि इनमें से किसी को भी यह ज्ञान हो गया कि तू फूट करना चाहता है, तो तेरा कल्याण नहीं। 
दमनक - मैं इतना कच्चा खिलाड़ी नहीं हूं। सब दांवपेच जानता हूं। करटक मुझे तो फिर भी डर लगता है। संजीवक बुद्धिमान है। वह ऐसा नहीं होने देगा। 
दमनक - भाई! मेरा बुद्धि कौशल सब करा देगा। बुद्धि के बल से असंभव भी संभव हो जाता है। जो काम शस्त्र से नहीं हो पाता वह बुद्धि से हो जाता है। जैसे - सोने की माला से काक पत्नी ने काले सांप का वध किया था। 

करकट ने पूछा - वह कैसे?
दमनक ने तब "सांप और कौवे" की कहानी सुनाई। 

 3. अक्ल बड़ी या भैंस (सांप और कौवे की कहानी)

To be continued ...

नागदोन / Nagdon

नागदोन / Nagdon

प्रकृति ने हमें अनेक प्रकार के औषधीय पेड़ पौधों से नवाजा है, जिसका उपयोग सालों से आयुर्वेदिक उपचार में किया जाता रहा है। ऐसा ही एक औषधीय पौधा है नागदोन, जिसको नागदमनी भी कहते हैं। इसके बारे में कम लोगों को ही जानकारी है। इसके औषधीय गुण कई तरह की बीमारियों में राहत पहुंचाते हैं।

यह ब्रह्मा जी के दुर्गा कवच में वर्णित नव दुर्गा के नौ विशिष्ट औषधियों में से एक है - नागदोन (Nagdon)

नागदोन / Nagdon

नागदोन क्या है?

नागदोन छोटे आकार का एक पहाड़ी पौधा है। नागदोन किसी भी ऋतु में किसी भी स्थान पर आराम से हो जाता है। यह सर्वत्र ही देखने को मिल जाता है। यह पौधा खेतों, खलिहानों, बगीचों में या फिर लॉन में भी देखने को मिलता है। नागदोन का पौधा सिर्फ हरा- भरा पत्तेदार होता है। इसमें फल और फूल नहीं लगते हैं। इसके पत्ते और डंडियों को तोड़ने पर सफेद दूध जैसा द्रव्य निकलता है। नागदोन की जड़ें कंद की तरह नीचे की तरफ होती हैं।

जानते हैं नागदोन के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

नागदोन / Nagdon

नागदमनी या नागदोन एक बहुत अच्छा आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है। इसका उपयोग कई प्रकार के रोगों के उपचार में किया जाता है। यह ज्वरनाशक, विषनाशक, त्रिदोष नाशक सूजन को दूर करने वाला, प्रमेह को दूर करने वाला एक औषधीय पौधा है।

बवासीर में

बवासीर में नागदोन का प्रयोग बहुत लाभकारी है। इसके लिए नागदोन के 1 से 3 पत्ते व 1-2 कालीमिर्च को पीसकर रस निकाल लें। एक चम्मच रस को सुबह खाली पेट पीने से भयानक से भयानक बवासीर की ब्लीडिंग में फायदा होता है। नागदोन के पत्ते को चबाकर भी खा सकते हैं। 

सूजन या धाव में

शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन होने पर या फोड़ा होने पर नागदोन के पत्तों को थोड़ा गर्म कर उस पर दर्द वाला तेल लगाकर उस स्थान पर बांधे। इससे सूजन व दर्द में आराम मिलता है।

अल्सर की समस्या

अल्सर से पीड़ित रोगी को नागदोन के दो - तीन पत्तों को पानी में पीसकर प्रातः काल सेवन करने से लाभ होता है।

पेट दर्द की समस्या

जिस व्यक्ति को अल्सर की वजह से पेट में दर्द रहता है, वह नागदोन के 2 पत्ते के साथ 1-2 दाने कालीमिर्च को पीसकर सेवन करने से सेवन करें। इसके पश्चात ठंडा पानी पी लें। इससे पेट दर्द में आराम मिलता है और अल्सर की शिकायत भी दूर होती है।

मासिक धर्म की समस्या 

महिलाओं में मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव होने पर नागदोन के 2 - 3 पत्ते को लेकर उसमें एक या दो काली मिर्च मिलाकर पीस लें। सुबह खाली पेट इसका सेवन करने से अतिरिक्त रक्त श्राव की समस्या दूर होती है।

नागदोन / Nagdon

पेशाब की समस्या

जिन लोगों को मूत्र कृच्छ की समस्या है, कम पेशाब होने की समस्या या रुक रुक कर पेशाब होता है, या पेशाब में जलन या दर्द है, वे नागदोन के 2-3 पत्तों को पीसकर एक गिलास शरबत बनाकर सेवन करें। अगर रोगी को मधुमेह की समस्या नहीं है, तो उसमें थोड़ा मीठा मिलाकर सुबह खाली पेट सेवन करने से मूत्र संबंधी सभी समस्याएं दूर होती हैं।

कब्ज की समस्या

नागदोन के पत्तों का उपयोग कब्ज की समस्या से भी राहत दिलाता है। छोटे पत्ते दो या तीन या एक बड़े पत्ते में दो काली मिर्च मिलाकर सेवन करने से कब्ज में लाभ होता है।

नागदोन के पत्तों का नुकसान

सभी प्रकार के औषधीय पौधे हमें लाभ पहुंचाते हैं, परंतु कुछ विशेष परिस्थितियों में इसके नुकसान भी हो सकते हैं।

  • गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति किसी आयुर्वेदाचार्य की देखरेख में ही नागदोन का सेवन करें। 
  • शरीर के किसी भी हिस्से में सर्जरी करवाने के कुछ दिन पहले और कुछ दिन बाद तक नागदोन का सेवन हानिकारक हो सकता है अर्थात सर्जरी के कुछ महीने पहले और बाद तक नागदोन का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को नागदोन के सेवन से बचना चाहिए।
English Translate
नागदोन / Nagdon

Nagdon

Nature has blessed us with many types of medicinal tree plants, which have been used in Ayurvedic treatment for years. One such medicinal plant is Nagdon, also known as Nagdamani. Only few people know about it. Its medicinal properties provide relief in many diseases.

It is one of the nine specific medicines of Nav Durga mentioned in Durga Kavach of Brahma ji - Nagdon.

What is Nagdon?

Nagdon is a small sized mountain plant. Nagdon is easily grown at any place in any season. It is found everywhere. This plant is found in fields, barns, gardens or even in lawns. The wormwood plant is only green leafy. It does not bear fruits and flowers. When its leaves and stems are broken, a white milk-like liquid comes out. The roots of wormwood are at the bottom like a tuber.

Know about the benefits, harms, uses and medicinal properties of Nagdon

Nagdamani or Nagdon is a very good Ayurvedic herb. It is used in the treatment of many types of diseases. It is antipyretic, antipyretic, anti-inflammatory, anti-inflammatory, and a medicinal plant that cures gonorrhea.
नागदोन / Nagdon

in hemorrhoids

The use of wormwood is very beneficial in piles. For this, grind 1 to 3 leaves of wormwood and 1-2 black pepper and extract the juice. Drinking one spoon of juice on an empty stomach in the morning is beneficial in the bleeding of terrible hemorrhoids. You can also eat wormwood leaves by chewing them.

swollen or inflamed

In case of swelling or boil in any part of the body, heat the leaves of wormwood a little and apply pain oil on it and tie it at that place. This gives relief in swelling and pain.

ulcer problem

A patient suffering from ulcers, grinding two to three leaves of sagebrush in water and taking it in the morning is beneficial.

stomach ache problem

The person who has stomach pain due to ulcer, he should take 1-2 grains of black pepper with 2 leaves of wormwood and take it after taking it. After that drink cold water. This gives relief in stomach pain and also cures the complaints of ulcers.

menstrual problems

If there is excessive bleeding during menstruation in women, take 2-3 leaves of wormwood and mix one or two black pepper in it and grind it. Consuming it on an empty stomach in the morning ends the problem of excess bleeding.

urination problems

People who have problem of urinary incontinence, problem of less urination or frequent urination, or burning sensation or pain in urination, make a glass of syrup and consume it after grinding 2-3 leaves of wormwood. If the patient does not have the problem of diabetes, then mixing a little sweet in it and consuming it on an empty stomach in the morning ends all urinary problems.

constipation problem

The use of wormwood leaves also provides relief from the problem of constipation. Taking two or three small leaves or one big leaf mixed with two black peppers provides relief in constipation.
नागदोन / Nagdon

Side Effects of Nagdon's Leaves

All types of medicinal plants benefit us, but in some special circumstances it can also cause harm.

  • A person suffering from serious illness should consume Nagdon only under the supervision of an Ayurvedacharya.
  • Consumption of wormwood for a few days before and for a few days after surgery in any part of the body can be harmful, that is, it should not be consumed for a few months before and after surgery.
  • Pregnant and lactating women should avoid the consumption of wormwood.
ब्रह्माजी के दुर्गा कवच में वर्णित नवदुर्गा के नौ विशिष्ट औषधियों में से एक नागदोन (Nagdon)

तेनालीराम - रिश्वत का खेल । Tenali Raman - Rishwat ka Khel

रिश्वत का खेल

कृष्णदेव राय कला प्रेमी थे। इसीलिए कलाकारों का प्रोत्साहन बढ़ाने के लिए उनके अच्छे प्रदर्शन के लिए उन्हें पुरस्कार देकर सम्मानित भी किया करते थे। कलाकारों को सम्मानित करने से पहले वे एक बार तेनालीराम से जरुर पूछते थे। महाराज की ये बात तेनालीराम के विरोधियों को बहुत खलती थी।

तेनालीराम - रिश्वत का खेल । Tenali Raman - Rishwat ka Khel

तेनालीराम कुछ दिनों से राजदरबार में नहीं आ रहे थे, जिसका फायदा उठाते हुए उसके विरोधियों ने महाराज के कान भरने शुरू कर दिए। उनमें से एक विरोधी महाराज से बोला, "महाराज तेनालीराम रिश्वतखोर है।" दूसरा बोला, "महाराज वह जिसको जितना बड़ा पुरस्कार दिलवाता है उससे उतनी ही बड़ी रिश्वत लेता है।" अब रोज़ दरबार में महाराज को ये ही सब सुनने को मिलता, जिससे महाराज को भी तेनालीराम पर शक होने लगा। जब कुछ दिनों बाद तेनालीराम ने राजदरबार में आना शुरू कर दिया, तो महाराज ने उनसे कुछ कहा तो नहीं लेकिन अब तेनालीराम से कुछ भी पूछना उन्होंने बंद कर दिया।

अब तेनालीराम को भी लगने लगा की उनके पीछे जरुर कुछ बात हुई है, जिसकी वजह से महाराज ने मुझसे पूछना बिल्कुल बंद कर दिया है। एक बार दरबार में बहुत सारे कलाकार आए हुए थे। उनमें से तेनालीराम ने एक को छोडकर सब को पुरस्कार देने को कहा, लेकिन महाराज ने उसका बिल्कुल उल्टा किया। उन्होंने सारे कलाकारों को खाली हाथ ही भेज दिया और उस एक को ढेरों इनाम देकर विदा किया। महाराज का ये रवैया देखकर तेनालीराम अपने आप को अपमानित महसूस कर रहे थे।वही तेनालीराम के विरोधी ये सब देखकर बहुत खुश हो रहे थे। 

एक बार दरबार में एक गायक आया। उसने अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए महाराज की आज्ञा मांगी।महाराज ने अगले दिन उसे संगीतशाला में आकर अपनी कला का प्रदर्शन करने का आदेश दिया। अगले दिन उस गायक का प्रदर्शन देखने के लिए संगीतशाला में काफी भीड़ जमा हो गई थी। महाराज के आते ही उसने गायन शुरू किया तो चारों ओर वाह -वाह होने लगी। गायन समाप्त होते ही तेनालीराम बोले, "तुमने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। मैंने तुम्हारे जैसा कलाकार आज तक नही देखा। तुम्हारे प्रदर्शन के लिए तुम्हें कम से कम पंद्रह हज़ार मुद्राएँ मिलनी चाहिए।"

महाराज तेनालीराम की ओर देखते हुए बोले, "सच में तुम्हारा प्रदर्शन तो काबिले तारीफ था, लेकिन तुम्हें देने के लिए हमारे पास इतना धन ही नहीं है कि हम तुम्हें दे सके। बेचारा गायक निराश होकर अपना सामान बटोरने लगा कि तभी तेनालीराम ने एक पोटली लाकर उसे थमा दी। तभी राजपुरोहित बोले, "ये तो महाराज का अपमान हो रहा है। जब महाराज ने उस कलाकार को कुछ नहीं दिया तो तेनालीराम को देने की क्या जरुरत थी?"

यह सुनते ही महाराज गुस्से से लाल- पीले हो गए। उन्होंने सैनिकों को तेनालीराम और गायक को पकड़कर अपने पास लाने का आदेश दिया। सैनिक गायक और तेनालीराम को पकड़कर महाराज के पास ले आए। महाराज ने एक सेवक से उस पोटली को छिनकर उसे खोलने का आदेश दिया। जैसे ही सेवक ने पोटली खोली तो उसमें मिट्टी का खाली बर्तन था, जिसे देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग अचंभित थे। महाराज ने तेनालीराम से पूछा, " तुमने ये खाली बर्तन क्यूँ दिया है?” तेनालीराम बोले, "महाराज यह गायक बहुत दूर से आपके पास आया था। मैंने सोचा पुरस्कार न सही कम से कम इस खाली बर्तन में वाहवाही भर कर ले जाएगा। इसीलिए मैंने ये खाली बर्तन इसे दे दिया।

तेनालीराम का जवाब सुनते ही महाराज का गुस्सा फुर्र हो गया और उन्होंने उस गायक को पन्द्रह हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ इनाम के रूप में दे दी। इस प्रकार तेनालीराम ने अपने बुद्धि बल से अपने विरोधियों की चाल पर पानी फेर दिया।

तेनालीराम - रिश्वत का खेल । Tenali Raman - Rishwat ka Khel

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bribery game

Krishnadeva Raya was an art lover. That is why to increase the encouragement of the artists, they used to honor them by giving them awards for their good performance. He used to ask Tenaliram once before honoring the artists. This word of Maharaj was very painful to the opponents of Tenaliram.

Tenaliram was not coming to the court for a few days, taking advantage of which his opponents started filling the ears of Maharaj. One of them said to the opponent Maharaj, "Maharaj Tenaliram is a bribe-taker." The other said, "Your Majesty, the bigger the reward he gets, the bigger the bribe he takes." Now every day in the court, Maharaj would get to hear all this, due to which Maharaj also started doubting Tenaliram. When Tenaliram started coming to the court after a few days, Maharaj did not say anything to him but now he stopped asking anything from Tenaliram.

Now Tenaliram also started feeling that something must have happened behind him, due to which Maharaj has stopped asking me at all. Once many artists had come to the court. Among them, Tenaliram asked everyone to give the prize except one, but Maharaj did the exact opposite. He sent all the artists empty handed and sent that one away with many prizes. Seeing this attitude of Maharaj, Tenaliram was feeling humiliated himself. Tenaliram's opponents were getting very happy seeing all this.

Once a singer came to the court. He sought Maharaj's permission to perform his art. The next day the Maharaj ordered him to come to the Sangeetshaala and perform his art. The next day a large crowd had gathered in the concert hall to watch the singer's performance. As soon as Maharaj came, he started singing and there was wah-wah all around. As soon as the singing ended, Tenaliram said, "You have performed very well. I have never seen an artist like you. You should get at least fifteen thousand mudras for your performance."

Looking at the Maharaja Tenaliram said, "Your performance was really commendable, but we do not have enough money to give you that we can give you. Poor singer started collecting his belongings in despair when Tenaliram took a bundle. He brought it and handed it over. Then the Rajpurohit said, "This is insulting to the Maharaj. When Maharaj did not give anything to the artist, what was the need to give it to Tenaliram?"

On hearing this, Maharaj turned red and yellow with anger. He ordered the soldiers to capture Tenaliram and the singer and bring them to him. The soldiers caught the singer and Tenaliram and brought them to Maharaj. The Maharaj snatched that bundle from a servant and ordered it to be opened. As soon as the servant opened the bundle, there was an empty earthen pot in it, seeing which all the people present there were astonished. Maharaj asked Tenaliram, "Why have you given this empty vessel?" Tenaliram said, "Sir, this singer had come to you from far away. I thought the award would at least be filled with applause in this empty vessel. That's why I gave this empty vessel to him.

On hearing Tenaliram's answer, Maharaj's anger became furious and he gave fifteen thousand gold coins to the singer as a reward. In this way, Tenaliram with the power of his intelligence turned water on the tricks of his opponents.

तेनालीराम - रिश्वत का खेल । Tenali Raman - Rishwat ka Khel

दहेज प्रथा – एक सामाजिक अभिशाप

दहेज़ प्रथा

कन्या दान को ना जाने कब समाज के लालची लोगों ने दहेज जैसी भयावह सामाजिक कुप्रथा बना कर रख दिया पता ही नहीं चला। कन्यादान शादी के समय मां - बाप द्वारा अपनी पुत्री को दिया जाता था। आज की स्थिति तो इसके बिल्कुल विपरीत है...

दहेज प्रथा – एक सामाजिक अभिशाप

समय बीतता चला गया स्वेच्छा से कन्या को दिया जाने वाला धन धीरे-धीरे वरपक्ष का अधिकार बनने लगा और वरपक्ष के लोग तो वर्तमान समय में इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार ही मान बैठे हैं ।

अखबारों में अब विज्ञापन निकलते हैं कि लड़के या लडकी की योग्यता इस प्रकार हैं। उनकी मासिक आय इतनी है और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत सम्माननीय है। ये सब बातें पढ़कर कन्यापक्ष का कोई व्यक्ति यदि वरपक्ष के यहाँ जाता है, तो असली चेहरा सामने आता है। वरपक्ष के लोग घुमा-फिराकर ऐसी कहानी शुरू करते हैं जिसका आशय निश्चित रूप से दहेज होता है।

दहेज मांगना और देना दोनों निन्दनीय कार्य हैं। जब वर और कन्या दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक जैसी है, दोनों रोजगार में लगे हुए हैं, दोनों ही देखने-सुनने में सुन्दर हैं, तो फिर दहेज की मांग क्यों की जाती है? कन्यापक्ष की मजबूरी का नाजायज फायदा क्यों उठाया जाता है?

दहेज प्रथा – एक सामाजिक अभिशाप

शायद इसलिए कि समाज में अच्छे वरों की कमी है तथा योग्य लड़के बड़ी मुश्किल से तलाशने पर मिलते हैं । हिन्दुस्तान में ऐसी कुछ जातियां भी हैं, जो वर को नहीं, अपितु कन्या को दहेज देकर ब्याह कर लेते हैं; लेकिन ऐसा कम ही होता है । अब तो ज्यादातर जाति वर के लिए ही दहेज लेती हैं ।

दहेज अब एक लिप्सा हो गई है, जो कभी शान्त नहीं होती। वर के लोभी माता-पिता यह चाह करते हैं कि लड़की अपने मायके वालों से सदा कुछ-न-कुछ लाती ही रहे और उनका घर भरती रहे। वे अपने लड़के को पैसा पैदा करने की मशीन समझते हैं और बेचारी बहू को मुरगी, जो रोज उन्हें सोने का अंडा देती रहे। माता- पिता अपनी बेटी की मांग कब तक पूरी कर सकते हैं। फिर वे भी यह जानते हैं कि बेटी जो कुछ कर रही है, वह उनकी बेटी नहीं वरन् ससुराल वालों के दबाव के कारण कह रही है ।

दहेज प्रथा – एक सामाजिक अभिशाप

यदि फरमाइश पूरी न की गई तो हो सकता है कि उनकी लाड़ली बिटिया प्रताड़ित की जाए, उसे यातनाएं दी जाएं और यह भी असंभव नहीं है कि उसे मार दिया जाए। ऐसी न जाने कितनी तरुणियों को जला देने, मार डालने की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं ।

दहेज-दानव को रोकने के लिए सरकार द्वारा सख्त कानून बनाया गया है। इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों अपराध माने गए हैं। अपराध प्रमाणित होने पर सजा और जुर्माना दोनों भरना पड़ता है। यह कानून कालान्तर में संशोधित करके अधिक कठोर बना दिया गया है।

दहेज प्रथा – एक सामाजिक अभिशाप

किन्तु ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं कोई कमी इसमें अवश्य रह गई है। क्योंकि न तो दहेज लेने में कोई अंतर आया है और न नवयुवतियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं अथवा उनकी हत्याओं में ही कोई कमी आई है । दहेज संबंधी कानून से बचने के लिए दहेज लेने और दहेज देने के तरीके बदल गए हैं ।

दहेज जैसे कुप्रथा से बाहर आने के लिए हम सब को ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि इस पिछङी सोच से अपने समाज को बाहर निकाला जा सके। तभी हमारी बहन बेटी सुरक्षित महसूस करेंगी। 

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Dowry System – A Social Curse

It is not known when the greedy people of the society created a dreadful social evil like dowry, not knowing about the girl's donation. Kanyadan was given by the parents to their daughter at the time of marriage. Today's situation is just the opposite...

दहेज प्रथा – एक सामाजिक अभिशाप

As time went on, the money given to the girl voluntarily gradually became the right of the bride and the people of the groom have accepted it as their birthright in the present time.

Advertisements are now coming out in the newspapers that the qualifications of the boy or girl are as follows. His monthly income is such and his family background is very respectable. After reading all these things, if a person from the Virgo side goes to the bride's side, then the real face comes to the fore. The people of Varapaksha start such a story by twisting which definitely means dowry.

Both demanding and giving dowry is a condemnable act. When the education and initiation of both the bride and groom are the same, both are engaged in employment, both are beautiful in sight and hearing, then why dowry is demanded? Why is the compulsion of the Virgo side taken illegitimately?

Perhaps because there is a shortage of good grooms in the society and suitable boys are found with great difficulty on search. There are also some castes in India who get married by giving dowry to the girl and not the groom; But this rarely happens. Now most castes take dowry only for the groom.

दहेज प्रथा – एक सामाजिक अभिशाप

Dowry has now become a lust, which is never pacified. The greedy parents of the groom want that the girl should always bring something or the other from her maternal relatives and fill their house. They think of their son as a money-generating machine and the poor daughter-in-law as a chicken, who gives them golden eggs every day. How long can parents take to fulfill their daughter's demand? Then they also know that whatever the daughter is doing, she is not saying it because of pressure from her in-laws.

If the request is not fulfilled, his dear daughter may be harassed, tortured and it is not impossible that she should be killed. There are reports of many such young women being burnt and killed in the newspapers.

A strict law has been made by the government to stop the dowry demon. According to this law, both taking dowry and giving dowry are considered crimes. If the offense is proved, both punishment and fine have to be paid. This law has been amended over time to make it more stringent.

But it seems that there must be some deficiency in it somewhere. Because neither there has been any difference in taking dowry nor has there been any reduction in suicides or murders by young girls. The methods of taking dowry and giving dowry have changed to avoid dowry related laws.

To come out from the evil practice like dowry, we all need to take concrete steps so that our society can be taken out of this backward thinking. Only then our sister daughter will feel safe.


माँ मुंडेश्वरी मंदिर (भगवानपुर) / Maa Mundeshwari Temple (Bhagwanpur)

मुंडेश्वरी मंदिर

बिहार के भभुआ जिला केंद्र से 14 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित है कैमूर की पहाड़ी। यह पहाड़ी रामगढ़ गांव के पंवरा पहाड़ी पर स्थित है, जिसकी ऊंचाई लगभग 600 फीट है। इस पहाड़ी पर माता मुंडेश्वरी एवं महामंडलेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर को भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है पर कितना प्राचीन है इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। पुरातत्वविदों के अनुसार यहां से प्राप्त शिलालेख 389 ई० के बीच का है, जो इसके प्राचीनतम समय का एहसास कराता है। सन्  1812 ईस्वी से लेकर 1904 ईस्वी के बीच ब्रिटिश यात्री आरएन मार्टिन, फ्रांसिस बुकानन और ब्लॉक ने इस मंदिर का भ्रमण किया था। मुंडेश्वरी भवानी के मंदिर की नक्काशी और मूर्तियां उत्तर गुप्तकालीन हैं, और यह मंदिर अष्टकोणीय आकार में पुराने पत्थरों से बना हुआ है।

माँ मुंडेश्वरी मंदिर (भगवानपुर) / Maa Mundeshwari Temple (Bhagwanpur)

सूर्य की स्थिति के साथ-साथ शिवलिंग के पत्थर का रंग भी बदलता रहता है

इस मंदिर के पूर्वी खंड में देवी मुंडेश्वरी की पत्थर से भव्य व प्राचीन मूर्ति मुख्य आकर्षण का केंद्र है। मां वाराही रूप में विराजमान है जिनका वाहन महिष है। इस मंदिर के मध्य भाग में पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है। जिस पत्थर से यह शिवलिंग निर्मित किया गया है उसमें सूर्य की स्थिति के साथ-साथ पत्थर का रंग भी बदलता रहता है।मुख्य मंदिर के पश्चिम में पुर्वाभिमुख विशाल नंदी की मूर्ति है, जो आज भी अक्षुण्ण है। 

सूर्य की स्थिति के साथ-साथ शिवलिंग के पत्थर का रंग भी बदलता रहता है

दुनिया का सबसे प्राचीन मंदिर, जहां बलि के बाद भी जिंदा रहते हैं बकरे

यहां पशु बलि में बकरा तो चढ़ाया जाता है परंतु उसका वध नहीं किया जाता, बलि की यह सात्विक परंपरा पूरे भारतवर्ष में अन्यत्र कहीं नहीं है। यहां माता के चरण में बलि भी चढ़ जाती है, लेकिन खून का एक कतरा बाहर नहीं निकलता है। पूजा होने के बाद बलि देने के लिए बकरे को मंदिर के भीतर माता के समक्ष लाया जाता है। बकरे को माता के सामने लाने के बाद मंदिर के पुजारी ने बकरे के चारों पैरो को मज़बूती से पकड़ लेता है और माता के चरणों में स्पर्श करने के बाद मंत्र का उच्चारण करता है। बकरे को माता के चरण के सामने रख देता है और फिर बकरे पर पूजा किया हुआ चावल छिड़कता है। जैसे ही वो चावल बकरे पर पड़ता है बकरा अचेत हो जाता है। कुछ देर तक बकरा अचेत रहता है। जब पुजारी कुछ मंत्र पढ़ते हैं और माता के चरण में पड़े फूल को फिर से बकरे पर फेंकते हैं, तो बकरा ऐसा जगता है मानो वो नींद से जागा हो। इस प्रकार बकरे की बलि की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। यही इस बलि की अनोखी परम्परा है, जो सदियों से चली आ रही है। इस बलि में बकरा चढ़ाया जाता है, लेकिन उसकी जान नहीं ली जाती है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता पशु बलि की सात्विक परम्परा है, जिसे देख भक्त माता का जोर जोर से जयकारा लगाने लगते हैं। श्रद्धालु इसे माता का चमत्कार मानते हैं। 

दुनिया का सबसे प्राचीन मंदिर, जहां बलि के बाद भी जिंदा रहते हैं बकरे

इस मंदिर को सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। यह मंदिर अपनी महिमा और गरिमा के लिए विख्यात है। राम नवमी और शिवरात्रि का त्योहार मुंडेश्वरी मंदिर में विशेष आकर्षण रखते हैं और प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों द्वारा मंदिर का दौरा किया जाता है। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है।

माँ मुंडेश्वरी मंदिर (भगवानपुर) की कहानी

कहते हैं कि चंड मुंड के नाश के लिए जब देवी उद्यत हुईं, तो, चंड के विनाश के बाद मुंड युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी पर छिप गया था, और यहीं पर माता ने उस का वध किया था। अतएव यह मुंडेश्वरी माता के नाम से स्थानीय लोगों में जानी जाती हैं।

स्थिती

वर्तमान में पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर  भग्नावशेष के रूप में है। ऐसा लगता है कि किसी ने इस मंदिर को तोड़ा है। मंदिर के अंग ऐसे टूटे हैं, मानो किसी तेज हथियार से उन पर चोट की गई हो।पंचमुखी महादेव का मंदिर ध्वस्त स्थिति में है, इसी के एक भाग में माता की प्रतिमा को दक्षिण मुखी स्वरूप में खड़ा कर पूजा अर्चना की जाती है।माता की साढ़े तीन फीट की काले पत्थर की प्रतिमा है, जो भैंस पर सवार हैं।

पहाड़ी पर बिखरे हुए पत्थर एवं स्तंभ पर श्री यंत्र सरीखे कई सिद्ध यंत्र एवं मंत्र उत्तकीर्ण है। प्रत्येक कोने पर शिवलिंग है, ऐसा लगता है कि पहाड़ी के पूर्वी उत्तरी क्षेत्र में माता मुंडेश्वरी का मंदिर स्थापित रहा होगा और उसके चारों तरफ विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित थीं। पहाड़ी पर एक गुफा भी मिली है, जिसे सुरक्षा की दृष्टि से बंद कर दिया गया है। इस मंदिर के रास्ते में सिक्के भी मिले हैं, और तमिल, सिंहली भाषा में पहाड़ी के पत्थर पर कुछ अक्षर भी खुदे हुए हैं। कहते हैं कि यहां पर श्रीलंका से भी भक्त आया करते थे।बहरहाल, मंदिर के गर्भ में अभी कई रहस्य छिपे हुए हैं। बहुत कुछ पता नहीं है। बस माता की अर्चना होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मंदिर अपने आप में कई अनुभवी आध्यात्मिक स्वरूपों को छुपाए हुए हैं, बस आवरण नहीं उठ रहा है।

Maa Mundeshwari Temple (Bhagwanpur)

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Maa Mundeshwari Temple (Bhagwanpur)

Kaimur Hills is situated 14 km southwest of Bhabua district center of Bihar. This hill is situated on the Panwara hill of Ramgarh village, whose height is about 600 feet. There is an ancient temple of Mata Mundeshwari and Mahamandaleshwar Mahadev on this hill. This temple is considered to be one of the ancient temples of India, but there is no clear evidence of how old it is. According to archaeologists, the inscription obtained from here is between 389 AD, which gives a sense of its oldest time. From 1812 AD to 1904 AD, British travelers RN Martin, Francis Buchanan and Block visited this temple. The carvings and sculptures of the temple of Mundeshwari Bhavani date back to the post-Gupta period, and the temple is made of old stones in an octagonal shape.

Along with the position of the sun, the color of the Shivalinga stone also changes.

In the eastern section of this temple, the grand and ancient stone idol of Goddess Mundeshwari is the center of attraction. Mother is seated in the form of Varahi whose vehicle is Mahisha. Panchmukhi Shivling is established in the central part of this temple. The color of the stone varies with the position of the sun in the stone from which this Shivling has been built. To the west of the main temple is a giant Nandi statue facing east, which is still intact.

World's oldest temple, where goats remain alive even after sacrifice

Here goat is offered in animal sacrifice but it is not slaughtered, this sattvik tradition of sacrifice is not found anywhere else in the whole of India. Here sacrifices are also made at the feet of the mother, but not a single drop of blood comes out. After the worship is done, the goat is brought inside the temple to the mother to be sacrificed. After bringing the goat in front of the mother, the priest of the temple firmly grasps the four legs of the goat and chants the mantra after touching the feet of the mother. Places the goat in front of the feet of the mother and then sprinkles the worshiped rice on the goat. As soon as that rice falls on the goat, the goat becomes unconscious. For some time the goat remains unconscious. When the priest recites some mantras and again throws the flower lying at the feet of the mother on the goat, the goat wakes up as if it has woken up from its sleep. Thus the process of goat sacrifice is completed. This is the unique tradition of this sacrifice, which is going on for centuries. A goat is offered in this sacrifice, but its life is not taken. The biggest feature of this temple is the sattvik tradition of animal sacrifice, seeing which the devotees start shouting loudly for the mother. Devotees consider it a miracle of the mother.

This temple is considered to be one of the oldest temples. This temple is famous for its glory and dignity. The festivals of Ram Navami and Shivratri hold special attractions in the Mundeshwari temple and the temple is visited by a large number of pilgrims every year. This temple is under the Archaeological Survey of India.

Story of Maa Mundeshwari Temple (Bhagwanpur)

It is said that when the goddess got ready to destroy Chand Munda, then, after the destruction of Chand, Munda hid on this hill while fighting, and it was here that the mother killed him. Hence she is known among the local people by the name of Mundeshwari Mata.

माँ मुंडेश्वरी मंदिर (भगवानपुर) / Maa Mundeshwari Temple (Bhagwanpur)

position

Presently the hill conditions are in the form of temple and ruins, it seems that someone has broken this temple. The parts of the temple are broken as if they have been hit by a sharp weapon. The temple of Panchmukhi Mahadev is in a ruined condition, in a part of it, the idol of the mother is erected in the south-facing form. There is a three feet black stone statue, who is riding a buffalo.

On the scattered stones and pillars on the hill, there are many proven instruments and mantras like Shri Yantra. There is a Shivling on each corner, it seems that the temple of Mata Mundeshwari must have been established in the eastern northern region of the hill and the idols of different gods and goddesses were installed around it. A cave has also been found on the hill, which has been closed for security. Coins have also been found on the way to this temple, and some letters are also engraved on the stone of the hill in Tamil, Sinhala language. It is said that devotees from Sri Lanka used to come here too. However, many secrets are still hidden in the womb of the temple. Don't know much. Only the mother is worshipped. It seems that the temple itself is hiding many experienced spiritual forms, just the cover is not lifting.

लिवर / जिगर / यकृत / Liver

लिवर में सूजन और गर्मी

इस पोस्ट में लिवर की सूजन, लिवर की गर्मी और लिवर की कमजोरी दूर करने के घरेलू और आयुर्वेदिक नुस्खों के बारे में बताया गया है। ये नुस्खे लिवर से जुडी सभी बीमारियों के इलाज में कारगर है, और इनका शरीर पर किसी प्रकार का कोई गलत असर नहीं पड़ता। 

जिगर क्या है?

जिगर को अंग्रेजी भाषा में लिवर (Liver) कहते है| लिवर हमारे शरीर का मुख्य और सबसे बड़ा अंग है| लिवर लाल भूरे रंग का होता है और यह पेट में दाएं हिस्से में होता है| लिवर का वजन 2.5 से लेकर 3 पौंड तक होता है| जिगर हमारे शरीर में होने वाली अनेक प्रकार की क्रियाओं को अपने कण्ट्रोल में रखता है| इसी कारण से लिवर के खराब होने पर शरीर की अनेक प्रकार की क्रियाये सही तरीके से काम करना बंद कर देती है| लिवर में किसी भी प्रकार की समस्या होने पर तुरंत इलाज करा लेना चाहिए, क्योंकि लिवर में चलने वाली प्रॉब्लम अनेक प्रकार के रोगो को जन्म दे सकती है|

लिवर / जिगर / यकृत / Liver

लिवर शरीर का अहम हिस्सा है, इसीलिए लिवर में किसी भी प्रकार का संक्रमण, दर्द, सूजन या कोई अन्य बीमारी होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए| लिवर से जुडी किसी भी समस्या को नजरअंदाज करना आपके लिए बहुत खतरनाक हो सकता है| इस पोस्ट में हम आपको लिवर की सूजन, लिवर की खराबी और लिवर की गर्मी दूर करने के घरेलू और आयुर्वेदिक उपाय बताएंगे

लिवर की सूजन क्या है?

लीवर शरीर के मुख्य अंगो में से एक है| कई बार गलत आदतों, गलत दवा या कई प्रकार की दवा के सेवन से लीवर में सूजन आ जाती है| लीवर शरीर के 500 से अधिक काम को करने में काम आता है और यह शरीर की बड़ी ग्रंथि है| लीवर को यकृत और कलेजा आदि नामो से भी जाना जाता है लीवर विषैले पदार्थो को शरीर से बाहर निकालता है, शरीर को ऊर्जा देता है और भोजन पचाने जैसे शरीर के मुख्य काम करता है|

लिवर की सूजन का इलाज करने से पहले यह जान लेना चाहिए, कि लिवर शरीर का मुख्य हिस्सा क्यों है और इस शरीर में किस प्रकार और क्या क्या काम करता है| आइये जाने लिवर की सूजन और लिवर से जुडी अन्य प्रॉब्लम के इलाज के बारे में विस्तार से|

लिवर / जिगर / यकृत / Liver

लिवर के कार्य क्या क्या है?

लिवर शरीर के मुख्य अंगो में से एक है और यह शरीर में अनेक प्रकार के काम भी करता है| लिवर शरीर में पित्त का उत्पादन करने और भोजन को पचाने का काम करता है| पित्त एक प्रकार का तरह पदार्थ होता है और यह पित्ताशय की थैली में विटामिन और प्रोटीन के अवशोषण के लिए बहुत जरुरी होता है यह शरीर में खून को छानने का काम भी करता है|

हम जब कुछ ऐसा आहार लेते है, जो हमारे शरीर के लिए नुकसानदायक है, तो लिवर उस आहार को निष्क्रिय कर देता है| इसके बाद यह प्रोटीन का निर्माण करता है, जो शरीर को संक्रमण से बचाता है| लिवर के मुख्य कार्य निम्न लिखित है|

रक्त डिटॉक्सिफिकैशन
रक्त का शुद्धिकरण
भोजन का पाचन
मलत्याग
एन्जाइम सक्रियण
पित्त उत्पादन

जिगर के रोग (Liver Disease)

लीवर सिरोसिस – यह लीवर में होने वाला एक विशेष प्रकार का रोग है और इस रोग का विकास लीवर में धीमी गति से होता है| लीवर सिरोसिस की प्रॉब्लम में लिवर धीरे धीरे सिकुड़ने लगता है और कठोर हो जाता है|

स्वप्रतिरक्षित रोग स्वप्रतिरक्षित रोग से शरीर के उत्तको, कोशिकाओं और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुँचता है| इन सभी बीमारियों का सीधा असर हमारे लीवर पर पड़ता है और हमारे लिवर की कार्य करने की शक्ति धीरे धीरे कम होती जाती है|

फैटी लीवर – जब लिवर में संक्रमण पैदा करने वाली वसा या फैट अधिक जमा हो जाता है, तब इसे फैटी लीवर कहते है|

लीवर एबसेस– लीवर एबसेस जिगर में फोड़ा होने की समस्या को कहते है|

लीवर कैंसर – लीवर की कोशिकाओं में असामान्य वृद्धि होने के कारण लीवर में कैंसर हो जाता है|

लीवर फेल्योर – लीवर में किसी भी बीमारी के लम्बे समय तक चलने और दवा के माध्यम से भी ये बीमारी ठीक ना होने के कारण लीवर काम करना बंद कर देता है| लीवर के काम करना बंद करने की स्थति को लीवर फेल्योर कहते है|

विषाणुज हेपेटाइटिस विषाणुज हेपेटाइटिस में संक्रमण के कारण लिवर में सूजन आ जाती है| विषाणुज हेपेटाइटिस हेपेटाइटिस वायरस के कारण होता है|

जिगर की कमजोरी का कारण 

अधिक तैलीय और मशालेदार भोजन का सेवन
खराब और अधिक दवा का सेवन
लम्बे समय तक कब्ज की समस्या
फ़ास्ट फ़ूड और बाहर के भोजन का अधिक सेवन
अधिक मात्रा में शराब और धूम्रपान करना

लिवर खराब होने के लक्षण 

शरीर का रंग पीला पड़ना
पाचन तंत्र डैमेज होना
मतली की समस्या होना
पेट में सूजन आना
पेशाब के रंग में परिवर्तन
शारीरिक कमजोरी
आँखों के निचे काले घेरे
नींद में कमी
मुँह से बदबू आना
मानसिक प्रॉब्लम
स्थति खराब होने पर मरीज कोमा में जा सकता है|

लिवर की सूजन कैसे कम करे?

1. लिवर में सूजन आने पर करेला, गाजर, टमाटर और पालक जैसी गुणकारी सब्जियों का सेवन अधिक करना चाहिए|
2. लिवर की सूजन में लीची, सेब, जामुन और पपीते का सेवन करे|
3. लिवर में सूजन और गर्मी की समस्या होने पर घी और तैलीय चीजों का सेवन ना करे|
4. लिवर की गर्मी दूर करने के लिए पानी अधिक मात्रा में पियें|
5. लिवर की गर्मी और सूजन को दूर करने के लिए लस्सी का सेवन करे|
6. लिवर से जुडी बीमारियों से बचने और लिवर की सूजन को दूर रखने के लिए कम मिर्च मशालेदार चीजों का सेवन करे|
7. लिवर में सूजन, गर्मी और कमजोरी आने पर मीठी चीजों का सेवन ना करे|
8. लिवर सूजन और गर्मी की समस्या होने पर भोजन के स्थान पर ताजे फलो और हरी सब्जियों का सेवन करे|
लिवर / जिगर / यकृत / Liver

लिवर की सूजन और गर्मी का इलाज

1. लिवर की सभी प्रकार की सूजन और सभी प्रकार की बीमारियों को दूर करने के लिए रोजाना खाली पेट 300 ग्राम जामुन खाये| इसके बाद सूरज ढलने से पहले 200 ग्राम जामुन खाये| ध्यान रहे जामुन अच्छी क्वालिटी की होनी चाहिए| नियमित रूप से कुछ दिनों तक ऐसा करने से लिवर की सूजन और अन्य जुडी बीमारियां दूर हो जायेगी|

2. पीले रंग की बड़ी हरड़ को पीसकर बारीक़ चूर्ण बना ले| अब पुराने गुड में इस चूर्ण को मिलाकर छोटी छोटी गोलियां बना ले| अब सुबह शाम रोजन ताजे पानी से एक एक गोली ले| एक से डेढ़ महिले तक रोजाना ऐसा करने से लिवर की सूजन और अन्य बीमारियां दूर हो जायेगी|

3. पपीते के बीजो को सुखाये और इसका बारीक़ चूर्ण बना ले| अब एक बड़े चम्मच पपीते के बीज के चूर्ण में आधा चम्मच नींबू का रस मिलाकर रोजाना दिन में दो बार कुछ दिनों तक नियमित रूप से ले| इस घरेलू नुस्खे के सेवन से लिवर की सूजन जल्दी ही दूर हो जायेगी|

4. एक गिलास पानी में 25 ग्राम आंवले का रस मिलाकर रोजाना दिन में चार बार सेवन करने से लिवर की सूजन दूर हो जाती है और इससे लिवर को मजबूती भी मिलती है|

5. लिवर से जुडी सभी बीमारियों को दूर करने के लिए और लिवर की कमजोरी दूर करने के लिए रोजाना दिन में तीन बार नियमित रूप से गेहूँ के ज्वारे (Wheatgrass) का सेवन करे| इसमें शरीर के लिए जरुरी सभी प्रकार के पोषक तत्व मौजूद होते है|

6. लिवर की सूजन, गर्मी और अनेक सम्बंधित बीमारियों को दूर करने के लिए रोजाना दिन में दो बार गाजर के जूस में पालक का जूस मिलाकर पियें|

7. एक गिलास ताजे पानी में स्वादनुसार शहद और एक चम्मच सेब का सिरका मिलाकर रोजाना दिन में दो बार पियें| इससे शरीर में मौजूद सभी विषैले पदार्थ शरीर से बाहर निकल जाते है| जिससे लिवर की कमजोरी दूर होती और लिवर सभी प्रकार के संक्रमण से बच जाता है|

8. लिवर की सूजन और कमजोरी को दूर करने के लिए रोजाना रात को सोने से पहले एक गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी पाउडर मिलाकर पियें| हल्दी वाला दूध सूजन कम करने का सबसे अच्छा और सस्ता उपाय है|

9. लिवर अच्छी तरह काम करे, इसके लिए लिवर को विटामिन डी उपयुक्त मात्रा में मिलना जरुरी होता है| आंवले में अधिक मात्रा में विटामिन डी पाया जाता है| लिवर अच्छी तरह काम करे और लिवर से जुडी सभी प्रकार की बीमारियां दूर हो जाये, इसके लिए रोजाना तीन बार आंवले के जूस या आंवले के मुरब्बे का सेवन करे|

10. लिवर की गर्मी दूर करने के लिए एक गिलास ताजी लस्सी में पीसी काली मिर्च, पीसा जीरा और पीसी हींग मिलाकर भोजन करने के बाद रोजाना एक गिलास पियें| इस घरेलू नुस्खे के रोजाना सेवन से कुछ ही दिनों में लिवर की गर्मी दूर हो जायेगी|

11. लिवर की कमजोरी और गर्मी को दूर करने के लिए रोजाना सुबह शाम एक गिलास ताजे पानी में एक नींबू का रस निचोड़कर पियें|

12. अगर आपको लीवर सिरोसिस की समस्या है अर्थात अगर आपका लिवर सिकुड़ने लगा है, तो रोजना दिन में दो बार 100 ग्राम कच्ची प्याज खाये| कुछ दिनों तक नियमित ऐसा करने से लीवर से जुडी सभी बीमारियां दूर हो जायेगी|

13. पानी को उबालने के लिए रखे और इस पानी में मुलेठी की जड़ का पाउडर डाले और कुछ देर बाद छलनी से छानकर इसे ठंडा करके पियें| नियमित रूप से कुछ दिनों तक इस घरेलू नुस्खे के सेवन से लिवर की गर्मी दूर हो जायेगी|

लिवर स्वास्थ्य के टिप्स 

1. रोजाना योग और व्यायाम करे

2. एंटीबायोटिक दवा का अधिक जरूरत पड़ने पर ही करे|

3. अधिक तैलीय और मशालेदार भोजन ना करे|

4. दवा का अधिक सेवन करने से बचे|

5. दवा हमेशा अच्छी कंपनी की खाये|

6. शराब और धूम्रपान से हमेशा दूर रहे|

7. बाहर का खाना और जंक फ़ूड ना खाये|

🌺🌺 Dr Krishna 9427824557