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महाभारत में वर्णित ये पैंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

महाभारत में वर्णित ये पैंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

महाभारत भारत का धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ है। यह हिन्दू धर्म के मुख्यतम ग्रंथों में से एक है। इस ग्रन्थ को हिन्दू धर्म में पंचम वेद माना जाता है। इसी में हिन्दू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ भगवद्गीता सन्निहित है। इसी महाभारत में वर्णित पैंतीस नगर हैं, जो आज भी मौजूद हैं। महाभारतकाल में भारत देश कई बड़े जनपदों में बंटा हुआ था। जानते हैं महाभारत में वर्णित 35 नगर कौन कौन से हैं ? 

महाभारत में वर्णित ये पैंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

1. गांधार

आज के कंधार को कभी गांधार के रूप में जाना जाता था। यह देश पाकिस्तान के रावलपिन्डी से लेकर सुदूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी वहां के राजा सुबल की पुत्री थीं। गांधारी के भाई शकुनी दुर्योधन के मामा थे।

2. तक्षशिला

तक्षशिला गांधार देश की राजधानी थी। इसे वर्तमान में रावलपिन्डी कहा जाता है। तक्षशिला को ज्ञान और शिक्षा की नगरी भी कहा गया है।

3. केकय प्रदेश 

जम्मू-कश्मीर के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में केकय प्रदेश के रूप में है। केकय प्रदेश के राजा जयसेन का विवाह वसुदेव की बहन राधादेवी के साथ हुआ था। उनका पुत्र विन्द जरासंध, दुर्योधन का मित्र था। महाभारत के युद्ध में विन्द ने कौरवों का साथ दिया था।

4. मद्र देश

केकय प्रदेश से ही सटा हुआ मद्र देश का आशय जम्मू-कश्मीर से ही है। एतरेय ब्राह्मण के अनुसार हिमालय के नजदीक होने की वजह से मद्र देश को उत्तर कुरू भी कहा जाता था। महाभारत काल में मद्र देश के राजा शल्य थे, जिनकी बहन माद्री का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था। नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र थे।

5. उज्जनक

आज के नैनीताल का जिक्र महाभारत में उज्जनक के रूप में किया गया है। गुरु द्रोणचार्य यहां पांडवों और कौरवों की अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देते थे। कुन्ती पुत्र भीम ने गुरु द्रोण के आदेश पर यहां एक शिवलिंग की स्थापना की थी। यही वजह है कि इस क्षेत्र को भीमशंकर के नाम से भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव का एक विशाल मंदिर है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह शिवलिंग 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है।

6. शिवि देश

महाभारत काल में दक्षिण पंजाब को शिवि देश कहा जाता था। महाभारत में महाराज उशीनर का जिक्र है, जिनके पौत्र शैव्य थे। शैव्य की पुत्री देविका का विवाह युधिष्ठिर से हुआ था। शैव्य एक महान धनुर्धारी थे और उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों का साथ दिया था।

7. वाणगंगा

कुरुक्षेत्र से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वाणगंगा। कहा जाता है कि महाभारत की भीषण लड़ाई में घायल पितामह भीष्म को यहां सर-सैय्या पर लिटाया गया था। कथा के मुताबिक, भीष्ण ने प्यास लगने पर जब पानी की मांग की तो अर्जुन ने अपने वाणों से धरती पर प्रहार किया और गंगा की धारा फूट पड़ी। यही वजह है कि इस स्थान को वाणगंगा कहा जाता है।

8. कुरुक्षेत्र

हरियाणा के अम्बाला इलाके को कुरुक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यहां महाभारत की प्रसिद्ध लड़ाई हुई थी। यही नहीं, आदिकाल में ब्रह्माजी ने यहां यज्ञ का आयोजन किया था। इस स्थान पर एक ब्रह्म सरोवर या ब्रह्मकुंड भी है। श्रीमद् भागवत में लिखा हुआ है कि महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने यदुवंश के अन्य सदस्यों के साथ इस सरोवर में स्नान किया था।

9. हस्तिनापुर

महाभारत में उल्लिखित हस्तिनापुर का इलाका मेरठ के आसपास है। यह स्थान चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी थी। सही मायने में महाभारत युद्ध की पटकथा यहीं लिखी गई थी। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने हस्तिनापुर को अपने राज्य की राजधानी बनाया।

10. वर्नावत

यह स्थान भी उत्तर प्रदेश के मेरठ के नजदीक ही माना जाता है। वर्णावत में पांडवों को छल से मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह का निर्माण करवाया था। यह स्थान गंगा नदी के किनारे है। महाभारत की कथा के मुताबिक, इस ऐतिहासिक युद्ध को टालने के लिए पांडवों ने जिन पांच गांवों की मांग रखी थी, उनमें एक वर्णावत भी था। आज भी यहां एक छोटा सा गांव है, जिसका नाम वर्णावा है।

11. पांचाल प्रदेश

हिमालय की तराई का इलाका पांचाल प्रदेश के रूप में उल्लिखित है। पांचाल के राजा द्रुपद थे, जिनकी पुत्री द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। द्रौपदी को पांचाली के नाम से भी जाना जाता है।

12. इन्द्रप्रस्थ

मौजूदा समय में दक्षिण दिल्ली के इस इलाके का वर्णन महाभारत में इन्द्रप्रस्थ के रूप में है। कथा के मुताबिक, इस स्थान पर एक वियावान जंगल था, जिसका नाम खांडव-वन था। पांडवों ने विश्वकर्मा की मदद से यहां अपनी राजधानी बनाई थी। इन्द्रप्रस्थ नामक छोटा सा कस्बा आज भी मौजूद है।

13. वृन्दावन

यह स्थान मथुरा से करीब 10 किलोमीटर दूर है। वृन्दावन को भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं के लिए जाना जाता है। यहां का बांके-बिहारी मंदिर प्रसिद्ध है।

14. गोकुल

यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह स्थान भी मथुरा से करीब 8 किलोमीटर दूर है। कंस से रक्षा के लिए कृष्ण के पिता वसुदेव ने उन्हें अपने मित्र नंदराय के घर गोकुल में छोड़ दिया था। कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम गोकुल में साथ-साथ पले-बढ़े थे।

15. बरसाना

यह स्थान भी उत्तर प्रदेश में है। यहां की चार पहाड़ियां के बारे में कहा जाता है कि ये ब्रह्मा के चार मुख हैं।

महाभारत में वर्णित ये पैंतीस नगर आज भी मौजूद हैं

16. मथुरा

यमुना नदी के किनारे बसा हुआ यह प्रसिद्ध शहर हिन्दू धर्म के लिए अनुयायियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। यहां राजा कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यहीं पर श्रीकृष्ण ने बाद में कंस की हत्या की थी। बाद में कृष्ण के पौत्र वृजनाथ को मथुरा की राजगद्दी दी गई।

17. अंग देश

वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के इलाके का उल्लेख महाभारत में अंगदेश के रूप में है। दुर्योधन ने कर्ण को इस देश का राजा घोषित किया था। मान्यताओं के मुताबिक, जरासंध ने अंग देश दुर्योधन को उपहारस्वरूप भेंट किया था। इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है।

18. कौशाम्बी

कौशाम्बी वत्स देश की राजधानी थी। वर्तमान में इलाहाबाद के नजदीक इस नगर के लोगों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था। बाद में कुरुवंशियों ने कौशाम्बी पर अपना अधिकार कर लिया। परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया।

19. काशी

महाभारत काल में काशी को शिक्षा का गढ़ माना जाता था। महाभारत की कथा के मुताबिक, पितामह भीष्म काशी नरेश की पुत्रियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका को जीत कर ले गए थे ताकि उनका विवाह विचित्रवीर्य से कर सकें। अम्बा के प्रेम संबंध राजा शल्य के साथ थे, इसलिए उसने विचित्रवीर्य से विवाह से इन्कार कर दिया। अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ कर दिया गया। विचित्रवीर्य के अम्बा और अम्बालिका से दो पुत्र धृतराष्ट्र और पान्डु हुए। बाद में धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाए और पान्डु के पांडव।

20. एकचक्रनगरी

वर्तमान कालखंड में बिहार का आरा जिला महाभारत काल में एकचक्रनगरी के रूप में जाना जाता था। लाक्षागृह की साजिश से बचने के बाद पांडव काफी समय तक एकचक्रनगरी में रहे थे। इस स्थान पर भीम ने बकासुर नामक एक राक्षक का अन्त किया था। महाभारत युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया था, उस समय बकासुर के पुत्र भीषक ने उनका घोड़ा पकड कर रख लिया था। बाद में वह अर्जुन के हाथों मारा गया।

21. मगध

दक्षिण बिहार में मौजूद मगध जरासंध की राजधानी थी। जरासंध की दो पुत्रियां अस्ती और प्राप्ति का विवाह कंस से हुआ था। जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तब वह अनायास ही जरासंध के दुश्मन बन बैठे। जरासंध ने मथुरा पर कई बार हमला किया। बाद में एक मल्लयुद्ध के दौरान भीम ने जरासंध का अंत किया। महाभारत के युद्ध में मगध की जनता ने पांडवों का समर्थन किया था।

22. पुन्डरू देश

मौजूदा समय में बिहार के इस स्थान पर राजा पोन्ड्रक का राज था। पोन्ड्रक जरासंध का मित्र था और उसे लगता था कि वह कृष्ण है। उसने न केवल कृष्ण का वेश धारण किया था, बल्कि उसे वासुदेव और पुरुषोत्तम कहलवाना पसन्द था। द्रौपदी के स्वयंवर में वह भी मौजूद था। कृष्ण से उसकी दुश्मनी जगजाहिर थी। द्वारका पर एक हमले के दौरान वह भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया।

23. प्रागज्योतिषपुर

गुवाहाटी का उल्लेख महाभारत में प्रागज्योतिषपुर के रूप में किया गया है। महाभारत काल में यहां नरकासुर का राज था, जिसने 16 हजार लड़कियों को बन्दी बना रखा था। बाद में श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया और सभी 16 हजार लड़कियों को वहां से छुड़ाकर द्वारका लाए। उन्होंने सभी से विवाह किया। मान्यता है कि यहां के प्रसिद्ध कामख्या देवी मंदिर को नरकासुर ने बनवाया था।

24. कामख्या

गुवाहाटी से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कामख्या एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। भागवत पुराण के मुताबिक, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर बदहवाश इधर-उधर भाग रहे थे, तभी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के कई टुकड़े कर दिए। इसका आशय यह था कि भगवान शिव को सती के मृत शरीर के भार से मुक्ति मिल जाए। सती के अंगों के 51 टुकड़े जगह-जगह गिरे और बाद में ये स्थान शक्तिपीठ बने। कामख्या भी उन्हीं शक्तिपीठों में से एक है।

25. मणिपुर

नगालैन्ड, असम, मिजोरम और वर्मा से घिरा हुआ मणिपुर महाभारत काल से भी पुराना है। मणिपुर के राजा चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा का विवाह अर्जुन के साथ हुआ था। इस विवाह से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम था बभ्रुवाहन। राजा चित्रवाहन की मृत्यु के बाद बभ्रुवाहन को यहां का राजपाट दिया गया। बभ्रुवाहन ने युधिष्ठिर द्वारा आयोजित किए गए राजसूय यज्ञ में भाग लिया था।

26. सिन्धु देश

सिन्धु देश का तात्पर्य प्राचीन सिन्धु सभ्यता से है। यह स्थान न केवल अपनी कला और साहित्य के लिए विख्यात था, बल्कि वाणिज्य और व्यापार में भी यह अग्रणी था। यहां के राजा जयद्रथ का विवाह धृतराष्ट्र की पुत्री दुःश्शाला के साथ हुआ था। महाभारत के युद्ध में जयद्रथ ने कौरवों का साथ दिया था और चक्रव्युह के दौरान अभिमन्यू की मौत में उसकी बड़ी भूमिका थी।

27. मत्स्य देश

राजस्थान के उत्तरी इलाके का उल्लेख महाभारत में मत्स्य देश के रूप में है। इसकी राजधानी थी विराटनगरी। अज्ञातवास के दौरान पांडव वेश बदल कर राजा विराट के सेवक बन कर रहे थे। यहां राजा विराट के सेनापति और साले कीचक ने द्रौपदी पर बुरी नजर डाली थी। बाद में भीम ने उसकी हत्या कर दी। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यू का विवाह राजा विराट की पुत्री उत्तरा के साथ हुआ था।

28. मुचकुन्द तीर्थ

यह स्थान धौलपुर, राजस्थान में है। मथुरा पर जीत हासिल करने के बाद कालयावन ने भगवान श्रीकृष्ण का पीछा किया तो उन्होंने खुद को एक गुफा में छुपा लिया। उस गुफा में मुचकुन्द सो रहे थे, उन पर कृष्ण ने अपना पीताम्बर डाल दिया। कृष्ण का पीछा करते हुए कालयावन भी उसी गुफा में आ पहुंचा। मुचकुन्द को कृष्ण समझकर उसने उन्हें जगा दिया। जैसे ही मुचकुन्द ने आंख खोला तो कालयावन जलकर भस्म हो गया। मान्यताओं के मुताबिक, महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब पांडव हिमालय की तरफ चले गए और कृष्ण गोलोक निवासी हो गए, तब कलयुग ने पहली बार यहां अपने पग रखे थे।

29. पाटन

महाभारत की कथा के मुताबिक, गुजरात का पाटन द्वापर युग में एक प्रमुख वाणिज्यिक केन्द्र था। पाटन के नजदीक ही भीम ने हिडिम्ब नामक राक्षस का संहार किया था और उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया। हिडिम्बा ने बाद में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम था घटोत्कच्छ। घटोत्कच्छ और उनके पुत्र बर्बरीक की कहानी महाभारत में विस्तार से दी गई है।

30. द्वारका

माना जाता है कि गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित यह स्थान कालान्तर में समुन्दर में समा गया। कथाओं के मुताबिक, जरासंध के बार-बार के हमलों से यदुवंशियों को बचाने के लिए कृष्ण मथुरा से अपनी राजधानी स्थानांतरित कर द्वारका ले गए।

31. प्रभाष

गुजरात के पश्चिमी तट पर स्थित इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण का निवास-स्थान रहा है। महाभारत कथा के मुताबिक, यहां भगवान श्रीकृष्ण पैर के अंगूठे में तीर लगने की वजह से घायल हो गए थे। उनके गोलोकवासी होने के बाद द्वारका नगरी समुन्दर में डूब गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि समुन्दर के सतह पर द्वारका नगरी के अवेशष मिले हैं।

32. अवन्तिका

मध्यप्रदेश के उज्जैन का उल्लेख महाभारत में अवन्तिका के रूप में मिलता है। यहां ऋषि सांदपनी का आश्रम था। अवन्तिका को देश के सात प्रमुख पवित्र नगरों में एक माना जाता है। यहां भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में एक महाकाल लिंग स्थापित है।

33. चेदी

वर्तमान में ग्वालियर क्षेत्र को महाभारत काल में चेदी देश के रूप में जाना जाता था। गंगा व नर्मदा के मध्य स्थित चेदी महाभारत काल के संपन्न नगरों में एक था। इस राज्य पर श्रीकृष्ण के फुफेरे भाई शिशुपाल का राज था। शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था, लेकिन श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचा लिया। इस घटना की वजह से शिशुपाल और श्रीकृष्ण के बीच संबंध खराब हो गए। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय चेदी नरेश शिशुपाल को भी आमंत्रित किया गया था। शिशुपाल ने यहां कृष्ण को बुरा-भला कहा, तो कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया। महाभरत की कथा के मुताबिक, दुश्मनी की बात सामने आने पर श्रीकृष्ण की बुआ उनसे शिशुपाल को अभयदान देने की गुजारिश की थी। इस पर श्रीकृष्ण ने बुआ से कहा था कि वह शिशुपाल के 100 अपराधों को माफ कर दें, लेकिन 101वीं गलती पर माफ नहीं करेंगे।

34. सोणितपुर

मध्यप्रदेश के इटारसी को महाभारत काल में सोणितपुर के नाम से जाना जाता था। सोणितपुर पर वाणासुर का राज था। वाणासुर की पुत्री उषा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ सम्पन्न हुआ था। यह स्थान हिन्दुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ है।

35. विदर्भ

महाभारतकाल में विदर्भ क्षेत्र पर जरासंध के मित्र राजा भीष्मक का शासन था। रुक्मिणी भीष्मक की पुत्री थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का अपहरण कर उनसे विवाह रचाया था। यही वजह थी कि भीष्मक उन्हें अपना शत्रु मानने लगे। जब पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ किया था, तब भीष्मक ने उनका घोड़ा रोक लिया था। सहदेव ने भीष्मक को युद्ध में हरा दिया।

अपने भारतीय धर्म ग्रंथों के ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों को पढ़ें और ज्यादा से ज्यादा प्रचारित प्रसारित करें ताकि वर्तमान और भावी पीढ़ी भी अपने गौरवमई इतिहास से अवगत हो।

फाल्गुन का महीना और हमारा आहार

फाल्गुन का महीना और हमारा आहार

आज दिनांक 06.02.2023 से फाल्गुन मास की शुरुआत हो रही है। फाल्गुन मास हिंदू पंचाग का आखिरी महीना होता है। इसके पश्चता हिंदू नववर्ष का आरंभ होता है। हिंदू पंचाग के बारह महीनों में पहला महीना चैत्र का होता है तो फाल्गुन आखिरी। फाल्गुन मास को मस्त महीने के तौर पर जाना जाता है। 

फाल्गुन का महीना और हमारा आहार

आयुर्वेद के अनुसार वर्ष के प्रत्येक माह में एक विशेष खाद्य पदार्थ की मनाही हमारे मनीषियों द्वारा की गयी है। माघ माह में मिश्री खाने को निषेध बताया गया है। माघी पूर्णिमा के साथ माघ माह कल बीत गया है। फाल्गुन माह में चने को खाना निषेध बताया गया है। कहा गया है कि इसके सेवन से व्यक्ति बीमार तो पड़ ही सकता है, साथ ही कालग्रास भी बन सकता है। 

फाल्गुन माह उत्साह उमंग के लिए जाना जाता है। चहुंओर वसंती रंग की बहार होती है। खेत सरसों के पीले फूलों से लहलहा रहे होते हैं। फूलों से बाग़ बगीचों की रौनक बढ़ी हुई होती है। इसी वक़्त पर चना बूट भी बहुतायत में हरे और कच्चे उपलब्ध होते हैं। आयुर्वेेद में कच्चे पदार्थाें के सेवन पर अधिकांशतः रोक है। पका हुआ भोजन ही श्रेष्ठ बताया गया है। 

फाल्गुन का महीना और हमारा आहार

वैसे तो अंकुरित मूंग और अंकुरित चने खाने की सलाह दी जाती है, जो तन मन को स्फूर्तिवान बनाते हैं। वजन घटाने में तथा इम्युनिटी बढ़ाने के साथ ही अन्य कई रोगों के लिए लाभप्रद होते हैं। अंकुरित दाल और चना में विटामिन ए,बी,सी,डी तथा ई प्रचुर मात्रा में पाया जाता है तथा अंकुरित मूंग दाल में आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम आदि मिनरल्स भी अच्छी मात्रा में होते हैं। काले चने में आयरन, फोलेट, कॉपर, मैग्नीशियम, फास्फोरस आदि पोषक तत्व होते हैं तथा इसको अंकुरित करने पर इसकी गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। 

परन्तु फाल्गुन माह में चने का सेवन खासकर कच्चा चना खाना आयुर्वेद में निषिद्ध किया गया है। इसके साथ ही मौसम में बदलाव भी चने के सेवन को निषिद्ध बताता है। चने के समान ही गेंहूं की बाली, अन्य कच्चे व अधपके अन्न का प्रयोग निषिद्ध है। 

फाल्गुन का महीना और हमारा आहार

फाल्गुन माह की पूर्णिमा को फाल्गुन माह ख़त्म होती है और उसी दिन होली का पर्व मनाया जाता है। होली की पूर्णिमा के दिन होली की पवित्र अग्नि में चने और गेहूं की बालियों को भूनकर खाना आरंभ किया जाता है। इससे पहले इन्हें नहीं खाना चाहिए। इसीलिए होलिका दहन वाले दिन होलिका अग्नि में कहीं कहीं पर गेहूं और चने की बालियों को जलाने का रिवाज है। 

हमारे पूर्वजों द्वारा एक बहुत अच्छी कहावत कही गई है किस माह में क्या न खाएं-

चैते गुड़, वैशाखे तेल, जेठ के पंथ, अषाढ़े बेल। सावन साग, भादो मही, कुवांर करेला, कार्तिक दही। अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिश्री, फाल्गुन चना। जो कोई इतने परिहरै, ता घर बैद पैर नहिं धरै।

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों (गोपालदास नीरज)

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों

Gopaldas Neeraj (गोपालदास नीरज) Indian poet

गोपालदास नीरज (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018), हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक, एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। 

Gopaldas Neeraj (गोपालदास नीरज) Indian poet

प्रस्तुत है गोपालदास जी की एक बेहतरीन कविता :-

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है!
Gopaldas Neeraj (गोपालदास नीरज) Indian poet

गोपाल दास 'नीरज'

अपरीक्षितकारकम् : पंचतंत्र

अपरीक्षितकारकम्

दक्षिण प्रदेश में एक प्रसिद्ध नगर पाटलिपुत्र में मणिभद्र नाम का एक धनिक महाजन रहता था। लोक-सेवा और धर्म-कार्यों में रत रहने से उसके धन-संचय में कुछ कमी आ गई, समाज में मान घट गया। इससे मणिभद्र को बहुत दुःख हुआ। वह दिन-रात चिन्तातुर रहने लगा। वह चिन्ता निष्कारण नहीं थी। धनहीन मनुष्य के गुणों का भी समाज में आदर नहीं होता। 

अपरीक्षितकारकम् : पंचतंत्र

उसके शील-कुल-स्वभाव की श्रेष्ठता भी दरिद्रता में दब जाती है। बुद्धि, ज्ञान और प्रतिभा के सब गुण निर्धनता के तुषार में कुम्हला जाते हैं। जैसे पतझड़ के झंझावात में मौलसिरी के फूल झड़ जाते हैं, उसी तरह घर-परिवार के पोषण की चिन्ता में उसकी बुद्धि कुन्द हो जाती है। घर की घी, तेल, नमक, चावल की निरन्तर चिन्ता प्रखर प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति की प्रतिभा को भी खा जाती है। धनहीन घर श्मशान का रूप धारण कर लेता है। प्रियदर्शना पत्नी का सौन्दर्य भी रूखा और निर्जीव प्रतीत होने लगता है। जलाशय में उठते बुलबुलों की तरह उसकी मान-मर्यादा समाज में नष्ट हो जाती है। 

निर्धनता की इन भयानक कल्पनाओं में मणिभद्र का दिल काँप उठा। उसने सोचा, इस अपमानपूर्ण जीवन से मृत्यु अच्छी है। इन्हीं विचारों में डूबा हुआ था कि उसे नींद आ गई। नींद में उसने एक स्वप्न देखा। स्वप्न में पद्मनिधि ने एक भिक्षु की वेश-भूषा में उसे दर्शन दिए और कहा कि वैराग्य छोड़ दे। तेरे पूर्वजों ने मेरा भरपूर आदर किया था। इसलिए तेरे घर आया हूँ। कल सुबह फिर इसी वेश में तेरे पास आऊँगा। उस समय तू मुझे लाठी की चोट से मार डालना। तब मैं मरकर स्वर्णमय हो जाऊँगा। वह स्वर्ण तेरी गरीबी को हमेशा के लिए मिटा देगा।

सुबह उठने पर मणिभद्र इस स्वप्न की सार्थकता के सम्बन्ध में ही सोचता रहा। उसके मन में विचित्र शंकाएँ उठने लगीं। न जाने यह स्वप्न सत्य था या असत्य, यह सम्भव है या असम्भव, इन्हीं विचारों में उसका मन डाँवाडोल हो रहा था। हर समय धन की चिन्ता के कारण ही शायद उसे धनसंचय का स्वप्न आया था। उसे किसी के मुख से सुनी हुई यह बात याद आ गई कि रोगग्रस्त, शोकातुर, चिन्ताशील और कामार्त मनुष्य के स्वप्न निरर्थक होते हैं। उनकी सार्थकता के लिए आशावादी होना अपने को धोखा देना है।

मणिभद्र यह सोचा ही रहा था कि स्वप्न में देखे हुए भिक्षु के समान ही एक भिक्षु अचानक वहाँ आ गया। उसे देखकर मणिभद्र का चेहरा खिल गया, सपने की बात याद आ गई। उसने पास में पड़ी लाठी उठाई और भिक्षु के सिर पर मार दी। भिक्षु मर गया। भूमि पर गिरने के साथ ही उसका सारा शरीर स्वर्णमय हो गया। मणिभद्र ने उसकी स्वर्णमय मृतदेह को छिप लिया।

किन्तु, उसी समय एक नाई वहाँ आ गया था। उसने यह सब देख लिया था। मणिभद्र ने उसे पर्याप्त धन-वस्त्र आदि का लोभ देकर इस घटना को गुप्त रखने का आग्रह किया। नाई ने वह बात किसी और से तो नहीं कही, किन्तु धन कमाने की इस सरल नीति का स्वयं प्रयोग करने का निश्चय कर लिया। उसने सोचा यदि एक भिक्षु लाठी से चोट खाकर स्वर्णमय हो सकता है। तो दूसरा क्यों नहीं हो सकता। मन ही मन ठान ली कि वह भी कल सुबह कई भिक्षुओं को स्वर्णमय बनाकर एक ही दिन में मणिभद्र की तरह श्रीसम्पन्न हो जाएगा। इसी आशा से वह रात भर सुबह होने की प्रतीक्षा करता रहा, एक पल की नींद नहीं ली।

सुबह उठकर वह भिक्षुओं की खोज में निकला। पास ही भिक्षुओं का एक मन्दिर था। मन्दिर की तीन परिक्रमाएँ करने और अपनी मनोरथ सिद्धि के लिए भगवान बुद्ध से वरदान माँगने के बाद वह मन्दिर के प्रधान भिक्षु के पास गया, उसके चरणों का स्पर्श किया और उचित वन्दना के बाद यह विनम्र निवेदन किया कि आज की भिक्षा के लिए आप समस्त भिक्षुओं समेत मेरे द्वार पर पधारें।

प्रधान भिक्षु ने नाई से कहा- तुम शायद हमारी भिक्षा के नियमों से परिचित नहीं हो। उन ब्राह्मणों के समान नहीं है जो भोजन का निमन्त्रण पाकर गृहस्थों के घर जाते हैं। हम भिक्षु हैं जो यथेष्ठता से घूमते-घूमते किसी भी भक्त श्रावक के घर चले जाते हैं और वहाँ उतना ही भोजन करते हैं, जितना प्राण धारण करने मात्र के लिए पर्याप्त हो, अतः हमें निमन्त्रण न दो। अपने घर जाओ, हम किसी भी दिन तुम्हारे द्वार पर अचानक आ जाएँगे।

नाई को प्रधान भिक्षु की बात से कुछ निराशा हुई, किन्तु उसने नई युक्ति से काम लिया। वह बोला- मैं आपके नियमों से परिचित हूँ, किन्तु मैं आपको भिक्षा के लिए नहीं बुला रहा। मेरा उद्देश्य तो आपको पुस्तक-लेखन की सामग्री देना है। इस महान कार्य की सिद्धि आपके आए बिना नहीं होगी। प्रधान भिक्षु नाई की बात मान गया। नाई ने जल्दी से घर की राह ली। वहाँ जाकर उसने लाठियाँ तैयार कर लीं और उन्हें दरवाज़े के पास रख दिया। 

तैयारी पूरी हो जाने पर वह फिर भिक्षुओं के पास गया और उन्हें घर की ओर ले चला भिक्षुवर्ग भी धन-वस्त्र के लालच से उसके पीछे-पीछे चलने लगा। भिक्षुओं के मन में भी तृष्णा का निवास रहता ही है। जगत् के सब प्रलोभन छोड़ने के बाद भी तृष्णा सम्पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होती। उनके देह के अंगों में जीर्णता आ जाती है, बाल रूखे हो जाते हैं, दाँत टूटकर गिर जाते हैं, आँख-कान बूढ़े हो जाते हैं, केवल मन की तृष्णा ही है, जो अन्तिम श्वास तक जवान रहती है।

उनकी तृष्णा ने ही उन्हें ठग लिया। नाई ने उन्हें घर के अन्दर ले जाकर लाठियों से मारना शुरू कर दिया। उनमें से कुछ तो वहीं धराशाई हो गए। नगर के द्वारपाल भी वहाँ आ पहुँचे वहाँ आकर उन्होंने देखा कि अनेक भिक्षुओं की मृत देह पड़ी है, और अनेक भिक्षु आहत प्राण-रक्षा के लिए इधर-उधर दौड़ रहे हैं।

नाई से जब इस रक्तपात का कारण पूछा गया तो उसने मणिभद्र के घर में आहत भिक्षु के स्वर्णमय हो जाने की बात बतलाते हुए कहा कि वह भी शीघ्र स्वर्णसंचय करना चाहता था। नाई के मुख से यह बात सुनने के बाद राज्य के अधिकारियों ने बुलाया और पूछा कि तुमने किसी भिक्षु की हत्या की है? तब मणिभद्र ने अपने स्वप्न की कहानी आरम्भ से लेकर अन्त तक सुना दी। राज्य के धर्माधिकारियों ने उस नाई को मृत्यु दण्ड की आज्ञा दी और कहा- ऐसे कुपरीक्षितकारी, बिना सोचे काम करने वाले के लिए यही दण्ड उचित था। मनुष्य को उचित है कि वह अच्छी तरह देखे, जाने सुने और उचित परीक्षा किए बिना कोई भी कार्य न करे। अन्यथा उसका वही परिणाम होता है जो इस कहानी के नाई का हुआ और उसके बाद में वैसा ही सन्ताप होता है जैसे नेवले को मारने वाली ब्राह्मणी को ?

मणिभद्र ने पूछा- किस ब्राह्मणी को ?

धर्माधिकारियों ने इसके उत्तर में यह कथा सुनाई

बिना विचारे जो करे

अयोध्या पहुंचीं शालिग्राम शिलाएं

अयोध्या पहुंचीं शालिग्राम शिलाएं

जैसा कि सभी जानते हैं बुधवार देर शाम को नेपाल से शालिग्राम की 2 दिव्य शिलाएं अयोध्या पहुंच चुकी हैं। इन्हीं दोनों शिलाओं को तराश कर भगवान राम और माता सीता की प्रतिमा बनाई जानी है। शालिग्राम आने पर शहर शहर, नगर नगर सभी भाव विह्वल थे। हज़ारों की संख्या में लोग हाथ जोड़े किसी की प्रतीक्षा में खड़े रहे।

अयोध्या पहुंचीं शालिग्राम शिलाएं

सर्वविदित है कि अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बन रहा है। उसी प्रभु श्री राम, जन जन के आराध्य राम की मूर्ति बनाने के लिए नेपाल से शालिग्राम पत्थर जा रहा था। 1 फरवरी को देर रात ये शिलाएं अयोध्या पहुँची।नेपाल से चलकर बिहार होते हुए, कुशीनगर और गोरखपुर के रास्ते ये शिलाएं अयोध्या पहुँची। कोई प्रचार नहीं, कोई बुलाहट नहीं, परंतु जहां - जहां से ये शिलाएं गुज़रीं वहां पर लोग निकल आये सड़क पर... युवक, बूढ़े, बच्चे, बूढ़ी स्त्रियां, घूंघट ओढ़े खड़ी दुल्हनें, बच्चियां. सर्दी की परवाह किये बिना घंटों खड़ी रहीं।

कुछ धर्म पारायण स्त्रियां हाथ में जल अक्षत ले कर सुबह से खड़ी थीं। शिलाओं के आते ही लोगों का हुजूम दौड़ पड़ा। श्रद्धा पूर्ण हृदयों से लोग निहार रहे थे उन शिलाओं को, जिसे राम होना है।

अयोध्या पहुंचीं शालिग्राम शिलाएं

लोग जी भरकर निहारना चाह रहे थे अपने राम को... निर्जीव पत्थर में भी अपने आराध्य को देख लेने की शक्ति पाने के लिए किसी सभ्यता को आध्यात्म का उच्चतम स्तर छूना पड़ता है। इस समय बिना किसी प्रयास के सब कुछ सहज ही प्राप्त हो रहा था। युवा लड़कियां,जोश से भरे लड़के सभी उत्साह में थे, इधर से उधर दौड़ रहे थे। 

ध्यान से देखने पर हम पाएंगे कि इस भीड़ की कोई जाति नहीं थी। यहां अमीर गरीब का कोई भेद नही था, किसी को अपना वर्ण भी याद नहीं था। उन्हें बस इतना याद था कि उनके शहर से होकर भगवान राम जा रहे थे। इन शिलाओं को जाते हुए देखकर लोग अपने को सौभाग्यशाली समझ रहे थे और समझें भी क्यों न, वे अपने को सौभाग्यशाली। आखिर पाँच सौ वर्ष की प्रतीक्षा और असँख्य पीढ़ियों की तपस्या के बाद यह सौभाग्यशाली दिन उनके जीवन में आया था। इस महत्वपूर्ण पल को वे जी लेना चाहते थे। इस असीम आनंद के सागर में वे गोते लगाना चाहते थे।

अयोध्या पहुंचीं शालिग्राम शिलाएं

इस भीड़ में कोई नेता नहीं, कोई संत नहीं और इसकी कोई विचारधारा नहीं थी, फिर भी इतना जोश, इतना  उत्साह। यह शक्ति केवल और केवल प्रभु श्री राम जी में है।

यात्रा के दौरान शिलाओं वाला ट्रक बीच बीच मे रुकता भी था। लोग इसी समय आगे बढ़ कर पत्थर को छू लेना चाहते थे। कारण कुछ भी नहीं बस भगवान को स्पर्श करने का सुख। ट्रक के ऊपर चढ़े स्वयं सेवक से भीड़ प्रसाद स्वरूप  शालिग्राम पर चढ़ाई गयी माला मांगती थी और माला जिसको भी मिलती उसके आगे किनारे खड़ी स्त्रियां हाथ पसारती थीं, माला के  एक फूल के लिए। अच्छे अच्छे सम्पन्न घरों की देवियाँ हाथ पसारती नजर आईं। यह  प्रभु श्री रामजी का ही तो प्रभाव था।

अयोध्या पहुंचीं शालिग्राम शिलाएं

फिर भी दुर्भाग्य से कुछ लोग समझते हैं कि एक सौ पचास रुपये में खरीद कर रामचरितमानस की प्रति जला वे लोगों की आस्था को चोटिल कर देंगे। यह भीड़ गवाही दे चुकी थी कि राम जी का यह देश अखंड है, यह सभ्यता अक्षुण्ण है, सनातन अजर अमर है।

श्री राम भारत के असंख्य नर नारियों के ह्रदयों में सदैव बसे रहेंगे।

श्रीमद्भगवद्गीता ||अध्याय छः - आत्मसंयमयोग || अनुच्छेद 16 - 32 ||

 श्रीमद्भगवद्गीता ||अध्याय छः आत्मसंयमयोग ||

अथ षष्ठोऽध्यायः  ~ आत्मसंयमयोग 

अध्याय छः के अनुच्छेद 16 - 32

अध्याय छः के अनुच्छेद 16-32 में विस्तार से ध्यान योग विषय का वर्णन है। 

संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता || Sampurn Shrimad Bhagwat Geeta ||

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

भावार्थ : 

हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है॥16॥

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

भावार्थ : 

दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है॥17॥

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥

भावार्थ : 

अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है॥18॥

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥

भावार्थ : 

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है॥19॥

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥

भावार्थ : 

योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है॥20॥

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌ ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥

भावार्थ : 

इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं॥21॥

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥

भावार्थ : 

परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता॥22॥

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥

भावार्थ : 

जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है॥23॥

सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥

भावार्थ : 

संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर॥24॥

शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ॥

भावार्थ : 

क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे॥25॥

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ॥

भावार्थ : 

यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे॥26॥

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ ।
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ ॥

भावार्थ : 

क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है॥27॥

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥

भावार्थ : 

वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है॥28॥

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥

भावार्थ : 

सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है॥29॥

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥

भावार्थ : 

जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत (गीता अध्याय 9 श्लोक 6 में देखना चाहिए।) देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता॥30॥

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥

भावार्थ : 

जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है॥31॥

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥

भावार्थ : 

हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना 'अपनी भाँति' सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है॥32॥

मध्य प्रदेश का राजकीय/ राज्य पक्षी || State Bird of Madhya Pradesh ||

मध्य प्रदेश का राजकीय/ राज्य पक्षी

दूधराज (Paradise Flycatcher)

चिड़ियों को देखकर उड़ान भरने की इच्छा सभी के मन में जागृत होती होगी। काश की मेरे पास भी पंख होता और मैं भी उड़कर मनचाहे जगह पर पहुंच जाती। एक समय का बड़ा ही मशहूर गाना था- पंख होती तो उड़ आती रे...। खैर छोड़िए, आते हैं आज के टॉपिक पर और बात करते हैं, मध्य प्रदेश के राजकीय पक्षी के बारे में। बहुत ही खूबसूरत दिखने वाले मध्य प्रदेश के राजकीय पक्षी का नाम है "दूधराज (Doodhraj)"। 

मध्य प्रदेश का राजकीय/ राज्य पक्षी || State Bird of Madhya Pradesh ||

"दूधराज (Doodhraj)" नाम से ही प्रतीत हो रहा है कि यह दूध की तरह दिखता होगा। जी हां, बिल्कुल नाम के अनुरुप ही यह पक्षी दूध जैसे रंग का होता है। दूध जैसा रंग होने के कारण ही इसे दूधराज कहा जाता है। वैसे तो यह पक्षी तीन रंगों में पाया जाता है। इसमें से एक रंग दूधिया सफेद, दूसरा काला और तीसरा भूरा रंग का होता है। वैसे तो यह मध्यप्रदेश का राजकीय पक्षी है, परंतु यह मध्यप्रदेश के अलावा हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, पंजाब, बिहार और राजस्थान में भी पाया जाता है। भारतीय प्रायद्वीप के साथ ही यह बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यांमार में भी पाया जाता है। इसे हिमालय की पहाड़ियों में 2000 मीटर की ऊंचाई तक देखा गया है।

मध्य प्रदेश का राजकीय/ राज्य पक्षी || State Bird of Madhya Pradesh ||

दूधराज पक्षी को और भी कई नामों से जाना जाता है। इसे शाहबुलबुल, महारानी हुसैनी बुलबुल, सुल्ताना बुलबुल और टिटैनी के नाम से भी जाना जाता है। दूधराज पक्षी को अंग्रेजी में पैराडाइज फ्लाईकैचर (Paradise Flycatcher) के नाम से जाना जाता है। 2015 से पहले इसका नाम एशियन पैराडाइज फ्लाईकैचर (Asian Paradise Flycatcher था। 2015 में इसकी दो अन्य उपजातियां ज्ञात होने के बाद इसका नाम इंडियन पैराडाइज फ्लाई कैचर Indian Paradise Flycatcher ) हो गया। 

मध्य प्रदेश का राजकीय/ राज्य पक्षी || State Bird of Madhya Pradesh ||

दूधराज पक्षी मध्यम आकार के होते हैं। इसकी लंबाई 18 सेंटीमीटर से 21 सेंटीमीटर तक होती है। आकार में छोटा होने के कारण इसका वजन 12 ग्राम से 23 ग्राम तक का होता है। तस्वीरों में देख सकते हैं कि इस पक्षी में लंबी तथा छोटी पूँछ पाई जाती है, इससे नर और मादा में फर्क पता लगता है, क्योंकि नर पक्षी की पूंछ अधिक लंबी होती है तथा मादा पक्षी की पूंछ छोटी होती है। नरपक्षी की पूंछ की लंबाई उसके शरीर के चार गुना होती है। इसकी पूँछ में दो 30 सेंटीमीटर लंबे पंख निकले होते हैं। एक व्यस्क दूधराज पक्षी के पंखों का फैलाव 86 सेंटीमीटर से 92 सेंटीमीटर तक हो सकता है, जबकि मादा दूधराज पक्षी की ज्यादा से ज्यादा 20 सेंटीमीटर लंबी पूँछ होती है। मादा पक्षी की पूंछ लगभग इसके शरीर के बराबर ही होती है। 

मध्य प्रदेश का राजकीय/ राज्य पक्षी || State Bird of Madhya Pradesh ||

दूधराज पक्षीयों में किशोरावस्था तक नर व मादा एक रंग के दिखते हैं। वयस्क होने पर नर का रंग दूध जैसा सफेद हो जाता है, जिसके कारण ही इसे दूधराज कहा जाता है। दूधराज का एक और रूप जिसमें नर केसरिया लाल और भूरे रंग में दिखाई देता है।

दूधराज पक्षी का मुख्य भोजन फल, कीट, पतंगे, तितलियां, मक्खियां आदि होते हैं। यह अपना घोंसला पेड़ों की ऊंचाई पर घास और तिनकों तथा छोटी टहनियों को मिलाकर बनाते हैं। दूधराज पक्षी मुख्य रूप से घने जंगलों, बागीचों, घनी झाड़ियों वाले जंगल, पतझड़ वनों तथा बांस के जंगलों में रहते हैं। सर्दी ऋतु में यह अपना पूरा समय एशिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बिताते हैं।

दूधराज पक्षी को मध्यप्रदेश का राजकीय पक्षी 1985 में घोषित किया गया था। 

English Translate

State Bird of Madhya Pradesh

Dudhraj (Paradise Flycatcher)

Seeing the birds, the desire to fly must have awakened in everyone's mind. I wish I had wings too and I could fly and reach wherever I wanted. Once upon a time, there was a very famous song – If you had wings, you would have flown…. Well leave it, come on today's topic and talk about the state bird of Madhya Pradesh. The name of the very beautiful looking state bird of Madhya Pradesh is "Doodhraj".

मध्य प्रदेश का राजकीय/ राज्य पक्षी || State Bird of Madhya Pradesh ||

From the name "Doodhraj" it appears that it must have looked like milk. Yes, exactly as per the name this bird is of milk colour. Because of its color like milk, it is called Dudhraj. By the way, this bird is found in three colors. Out of this, one color is milky white, the other black and the third brown. Although it is the state bird of Madhya Pradesh, but apart from Madhya Pradesh it is also found in Himachal Pradesh, Kashmir, Punjab, Bihar and Rajasthan. Along with the Indian peninsula, it is also found in Bangladesh, Pakistan, Sri Lanka and Myanmar. It has been observed up to an altitude of 2000 m in the Himalayan hills.

Dudhraj bird is known by many other names. It is also known as Shah Bulbul, Maharani Hussaini Bulbul, Sultana Bulbul and Titani. Dudhraj bird is known as Paradise Flycatcher in English. Before 2015, its name was Asian Paradise Flycatcher. In 2015, after its two other subspecies were known, its name became Indian Paradise Flycatcher.

Dudhraj birds are of medium size. Its length ranges from 18 cm to 21 cm. Being small in size, its weight ranges from 12 grams to 23 grams. It can be seen in the pictures that long and short tail is found in this bird, due to this the difference between male and female is known, because the tail of the male bird is longer and the tail of the female bird is shorter. The length of the tail of a male bird is four times that of its body. Its tail has two 30 cm long feathers. The wingspan of an adult dudhraj bird can be from 86 cm to 92 cm, while the female dudhraj bird has a tail of maximum 20 cm long. The tail of the female bird is almost as long as its body.

मध्य प्रदेश का राजकीय/ राज्य पक्षी || State Bird of Madhya Pradesh ||

In Dudhraj birds, male and female look of the same color till adolescence. On becoming an adult, the color of the male becomes white like milk, due to which it is called Dudhraj. Another form of Dudhraj in which the male saffron appears in red and brown.

The main food of Dudhraj bird is fruits, insects, moths, butterflies, flies etc. It makes its nest at the height of trees by mixing grass and straws and small twigs. Dudhraj birds mainly live in dense forests, orchards, dense scrub forests, deciduous forests and bamboo forests. In winter, they spend all their time in the tropical regions of Asia.

The Dudhraj bird was declared the state bird of Madhya Pradesh in 1985.

भारत के सभी राज्यों के राजकीय पक्षियों की सूची |(List of State Birds of India)