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रविंद्र नाथ टैगोर जयंती || Ravindranath Tagore Jayanti 2022

 रविंद्र नाथ टैगोर

एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर (Ravindranath Tagore) का जन्म कोलकाता में 7 मई 1861 को हुआ था। 1915 में ब्रिटिश सत्ता ने रविंद्र नाथ टैगोर को "नाइटहुड" की उपाधि से सम्मानित किया था, हालांकि 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद टैगोर ने यह उपाधि लौटा दी थी। रवींद्रनाथ टैगोर (Ravindranath Tagore) को लोग "गुरुदेव" भी कहते थे। रविंद्रनाथ टैगोर विश्व विख्यात कवि के साथ ही मशहूर साहित्यकार, दार्शनिक, रचनाकार, नाटककार, चित्रकार, समाज सुधारक, संगीतकार आदि भी रह चुके हैं।

रविंद्र नाथ टैगोर जयंती || Ravindranath Tagore Jayanti 2022

भारत का राष्ट्रगान 'जन गण मन' भी रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा ही लिखी गई है। साथ ही उन्होंने बांग्लादेश का भी राष्ट्रगान 'आमार सोनार बांग्ला' लिखा है। नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्र नाथ टैगोर की गिनती देश के बड़े साहित्यकार और कलाकारों में होती है। साहित्य और कला में बचपन से ही रुचि होने के कारण उन्हें यह सम्मान मिला।

रविंद्र नाथ टैगोर जयंती || Ravindranath Tagore Jayanti 2022

एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार जीतने वाले 

रवींदनाथ टैगोर नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय थे। उन्हें 1913 में उनकी कृति "गीतांजलि" के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। टैगोर की कविताओं की पांडुलिपि को सबसे पहले विलियम रोथेनस्टाइन ने पढ़ा था और वह इतने मुग्ध हो गए कि उन्होंने अंग्रेजी कवि यीट्स से संपर्क किया और पश्चिमी जगत के लेखकों, कवियों, चित्रकारों और चिंतकों से टैगोर का परिचय कराया। रविंद्रनाथ टैगोर पहले गैर यूरोपीय थे, जिनको साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था।

रविंद्र नाथ टैगोर जयंती || Ravindranath Tagore Jayanti 2022

ब्रिटिश सत्ता ने "नाइटहुड" की उपाधि से नवाजा 

1915 में ब्रिटिश सत्ता ने रविंद्रनाथ टैगोर को नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था, जबकि 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद टैगोर ने यह उपाधि लौटा दी थी। ब्रिटिश सरकार ने उनको नाइटहुड (सर) की उपाधि वापस लेने के लिए मनाया भी था, मगर वह राजी नहीं हुए।

रविंद्रनाथ टैगोर का पारिवारिक जीवन

रविंद्र नाथ टैगोर की मां शारदा देवी का बचपन में ही निधन हो गया था। पिता देवेंद्र नाथ एक ब्रह्म समाजी थे और व्यापक यात्राओं में रहा करते थे। इस वजह से बालक रविंद्रनाथ का लालन-पालन नौकरों ने ही किया था।

रविंद्रनाथ टैगोर के चार बच्चे थे, जिनमें से दो की मृत्यु बाल्यावस्था में ही हो गई थी। एक बेटी टीवी की बीमारी से ग्रस्त थी, जिसका निधन 12 वर्ष की अवस्था में हो गया था। उसका नाम रेणुका था, जिस पर इस दौरान रविंद्रनाथ टैगोर ने 'शिशु' नामक कविता भी लिखी थी। इनके जीवन के अंतिम 4 वर्ष बीमारियों के चलते दर्द में गुजरे थे, जिसके कारण सन 1937 में वे कोमा में चले गए थे। वे 3 साल तक कोमा में ही रहे। इस पीड़ा की विस्तृत अवधि के बाद 7 अगस्त 1941 को उनका देहावसान हो गया। उनकी मृत्यु जोरसंघ को हवेली में हुई जहां उन्हें लाया गया था।

रविंद्र नाथ टैगोर जयंती || Ravindranath Tagore Jayanti 2022

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर उनको शत-शत नमन 🙏🌷


केवड़ा || Kevda || Kewra || keora

 केवड़ा (Kevda)

केवड़ा नाम तो आप सभी सुना होगा। ज्यादातर केवड़ा के तेल के विषय में लोग जानते हैं। केवड़े की खुशबू बहुत तेज होती है। फिल्म सूर्यवंशम में भी केवड़े के तेल के महक को दिखाया गया है। अब तो आप लोगों को पक्का याद आ गया होगा। जी हां आज यहां उसी केवड़े के फायदे के बारे में चर्चा करेंगे।

केवड़ा || Kevda || Kewra || keora

केवड़ा क्या है?

केवड़ा एक सुगंधित फूलों वाला पौधा होता है, जो घने जंगलों में उगता है। इसकी मन मोहिनी खुशबू पूरे भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही लोकप्रिय रही है। कई स्थानों पर इसे 'फूलों का राजा' भी कहा जाता है। इसका उपयोग इत्र, साबुन, लोशन, अगरबत्ती आदि में सुगंध के लिए किया जाता है। साथ ही इसकी पत्तियों से चटाई, टोप, टोकनिया और पत्तलें भी बनाई जाती हैं। केवड़ा हर रूप में हर काम में काफी ज्यादा उपयोगी है। इसका पौधा गन्ने के पौधे की तरह होता है, जिसके लंबे - लंबे पत्ते होते हैं। इन पत्तों के किनारे पर कांटे रहत होते हैं।केवड़े के पेड़ की दो प्रजातियां पाई जाती हैं एक सफेद और दूसरी पीली। सफेद को केवड़ा कहते हैं और पीली प्रजाति को केतकी कहते हैं। केतकी बहुत ही सुगंधित होती है और उसके पत्ते भी कोमल होते हैं।

जानते हैं केवड़ा के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

केवड़ा का पौधा फेफड़ों की जलन, मूत्राशय के रोग, हृदय रोग, कान दर्द, रक्त विकार, सिर दर्द, पेट के दर्द आदि समस्याओं से निपटने में हमारी सहायता करता है। केवड़ा का इस्तेमाल ज्यादातर आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है। केवड़ा के फूलों से तेल और केवड़ा जल बनाया जाता है, जो कि शरीर और त्वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है। केवड़ा के जल का उपयोग मिठाई, सिरप, कोल्ड्रिंक्स, आदि बनाने में भी किया जाता है। भारत में यह समुद्र के किनारे वाले क्षेत्र में या नदी किनारे, नहर, खेत और तालाबों के आस पास होता है।

केवड़ा || Kevda || Kewra || keora

कमर दर्द की समस्या

केवड़े का अर्क शरीर के हर तरह के दर्द खासतौर पर जोड़ों के दर्द से राहत दिलाता है। प्रतिदिन केवड़े के तेल से मालिश करने से कमर का दर्द तथा गठिया से होने वाले दर्द में आराम मिलता है।

सिर दर्द की समस्या

केवड़ा के तेल के प्रयोग से सिर दर्द दूर होता है। अगर लगातार केवड़े के तेल की मालिश सिर पर की जाए तो इसका ज्यादा फायदा मिलता है।

त्वचा के लिए

केवड़ा त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है। गुलाब जल की तरह केवड़ा जल भी त्वचा को टोन करता है तथा त्वचा की गहराई से सफाई करता है।

चेहरे के दाग धब्बे होने पर

चेहरे पर दाग धब्बे की समस्या है, तो केवड़ा जल से दाग धब्बों को गायब किया जा सकता है। केवड़ा जल को चेहरे पर लगाने से त्वचा पर चमक आती है।

तनाव दूर करने में

केवड़ा तनाव दूर करने का एक प्रभावी और प्राकृतिक तरीका है। केवड़े के पत्ते में एंटी स्ट्रेस एजेंट पाए जाते हैं, जो कि हमारे तनाव को दूर करते हैं।

पेट संबंधी समस्या

पेट की बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए केवड़ा बहुत ही फायदेमंद होता है। इसका उपयोग पेट में जलन, पेट दर्द, गैस जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है।

बुखार होने पर

बुखार के दौरान शरीर में बहुत थकावट होती है और कमजोरी आ जाती है। ऐसे में केवड़े का रस 40 से 60 मिलीलीटर की मात्रा में पिलाने से बुखार उतर जाता है और शरीर को ताकत मिलती है।

भूख बढ़ाने के लिए

जिसको भी भूख नहीं लगने की समस्या है, उसके लिए केवड़ा फायदेमंद हो सकता है, केवड़ा का अर्क नियमित रूप से खाने में प्रयोग करने से भूख पहले की तुलना में बढ़ जाती है।

बालों में रूसी की समस्या 

केवड़ा के तेल से बालों की मालिश करने से बालों में रूसी की समस्या समाप्त हो जाती है।

कान के दर्द में 

यदि किसी के कान में दर्द हो रहा हो, तो केवड़े के इत्र की दो बूंदे कान में डालने से आराम मिलता है।

खुजली की समस्या

शरीर में कहीं पर भी अगर खुजली हो रही हो, तो उस जगह पर केवड़ा जल लगा लेने से खुजली मिट जाती है।

मासिक धर्म की समस्या 

अगर मासिक धर्म के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग हो रही है, तो गाय के दूध में 6 ग्राम केवड़ा की जड़ को घिसकर शक्कर मिलाकर सुबह-शाम पीने से आराम मिलता है।

केवड़ा || Kevda || Kewra || keora

विभिन्न भाषाओं में केवड़ा का नाम

संस्कृत - धुलिपुष्पिका, गंधपुष्प, इन्दुकलिका, नृपप्रिया, केतकी
हिंदी -     केवड़ा, केतकी 
बंगला -     केवरी, केतकी 
महाराष्ट्र - केंदा, केउर  
गुजराती -  केवड़ा,केवड़ों 
तमिल -     कदगई,केदगी  
तेलुगु -     केतकी, गोजंगी, उई-केवरा 
मलयालम - केतकी, 
मराठी -     केवड़ा 
कन्नड़ -     बिलेकेदगे गुण्डीगे, 
तमिल -     केदगें 
फारसी -     करंज 
अरबी -     करंद 
लैटिन -     पेंडेनस ओडोरा टिसीमस

केवड़ा का नुकसान 

केवड़ा का प्रयोग आज से नहीं अपितु पुराने समय से होता आ रहा है। केवड़ा से किसी भी तरह के नुकसान की कोई बात सामने नहीं आई है, परंतु अति सर्वत्र वर्जयेत। अतः केवड़ा का इस्तेमाल सीमित मात्रा में ही करें।

English Translate 

Kevda

You all must have heard the name Kevada. Most people know about Kewra oil. The smell of kewda is very strong. The smell of Kewda oil has also been shown in the film Suryavansham. Now you guys must have remembered for sure. Yes, today we will discuss about the benefits of the same Kevda here.

केवड़ा || Kevda || Kewra || keora

What is kewra?

Kewra is a fragrant flowering plant, which grows in dense forests. Its mesmerizing fragrance has been popular throughout India since ancient times. It is also called 'King of Flowers' in many places. It is used for fragrance in perfumes, soaps, lotions, incense sticks etc. Along with this, mats, hats, tokens and leaves are also made from its leaves. Kewra is very useful in every form in every work. Its plant is like a sugarcane plant, which has long leaves. There are thorns on the edge of these leaves. Two species of Kewda tree are found, one white and the other yellow. The white one is called Kevada and the yellow species is called Ketki. Ketki is very fragrant and its leaves are also tender.

Know about the advantages, disadvantages, uses and medicinal properties of Kevda

Kewra plant helps us in dealing with problems like lung irritation, bladder diseases, heart disease, ear pain, blood disorders, headache, colic etc. Kevda is mostly used in Ayurvedic medicines. Kewra flowers are used to make oil and kewra water, which is very beneficial for the body and skin. Kewra water is also used for making sweets, syrups, cold drinks, etc. In India, it occurs in the area along the sea or near river banks, canals, fields and ponds.

back pain problem

Kevda extract provides relief from all types of pain in the body, especially joint pain. Massaging with Kewda oil daily provides relief in back pain and pain due to arthritis.

headache problem

Headache is relieved by the use of Kewra oil. If Kevada oil is continuously massaged on the head, then it gets more benefit.

to skin

Kewra is very beneficial for the skin. Like rose water, kewra water also tones the skin and deeply cleanses the skin.

on facial scars

If there is a problem of blemishes on the face, then the stains can be disappeared with kewra water. Applying kewra water on the face brings glow on the skin.

to relieve stress

Kewra is an effective and natural way to relieve stress. Anti-stress agents are found in Kevda leaves, which remove our stress.

stomach problems

Kevda is very beneficial for people suffering from stomach diseases. It is used to relieve problems like heartburn, stomach pain, gas.

having a fever

During fever, there is a lot of tiredness in the body and weakness comes. In such a situation, by taking 40 to 60 ml of Kevada juice, the fever subsides and the body gets strength.

to increase appetite

Whoever has the problem of loss of appetite, kewra can be beneficial for him, using kewra extract regularly in food increases the appetite than before.

dandruff problem

Massaging the hair with kewra oil ends the problem of dandruff in the hair.

केवड़ा || Kevda || Kewra || keora

in earache

If someone is suffering from ear pain, then putting two drops of Kevada's perfume in the ear provides relief.

itching problem

If there is itching anywhere in the body, then applying kewra water on that place ends the itching.

menstrual problems

If excessive bleeding is taking place during menstruation, then grinding 6 grams of Kevada root in cow's milk mixed with sugar provides relief in the morning and evening.

तेनालीराम: कुछ नहीं || Tenaliram: Kuch Nahi

कुछ नहीं

तेनालीराम की चतुर बुद्धि तथा राजा कृष्ण देव राय से उनका सानिध्य होने के कारण बहुत से लोग उनसे जलते थे। तेनालीराम से ईर्ष्या करने वालों में से एक रघु नाम का व्यक्ति था, जो फल का व्यापारी था। उसने एक बार तेनालीराम को षड्यंत्र में फंसाने की युक्ति बनाई। उसने तेनालीराम को फल खरीदने के लिए बुलाया। जब तेनालीराम ने फलों का मूल्य पूछा तो रघु मुस्कुराते हुए बोला - "आपके लिए तो इनका दाम ‘कुछ नहीं’ है।"

तेनालीराम: कुछ नहीं  || Tenaliram: Kuch Nahi

इसके बाद तेनालीराम ने कुछ फल खाए और बाकी थैले में भर आगे बढ़ने लगे। तभी रघु ने उन्हें रोका और कहा कि मेरे फल के दाम तो देते जाइये तेनाली जी। 

तेनालीराम रघु की बात से हैरान होते हुए बोले - "अभी तो तुमने कहा की फल का दाम ‘कुछ नहीं’ है। तो अब क्यों अपनी बात से पलट रहे हो।" 

तब रघु बोला - "मेरे फल मुफ्त में नहीं है। मैंने साफ-साफ बताया था की मेरे फलों का दाम ‘कुछ नहीं’ है। अब सीधी तरह मुझे ‘कुछ नहीं’ दे दो, अन्यथा मैं राजा कृष्ण देव राय के पास फरियाद ले कर जाऊंगा और तुम्हें कठोर दंड दिलाऊँगा।"

तेनालीराम बड़े सोंच में पड़ गए और सोचते-सोचते वहाँ से अपने घर चले गए।

उनके मन में एक ही सवाल चल रहा था कि इस पागल फल वाले के अजीब षड्यंत्र का तोड़ कैसे खोजूँ? इसे ‘कुछ नहीं’ कहाँ से लाकर दूँ?

अगले ही दिन फल वाला राजा कृष्णदेव राय के दरबार में आ गया और फरियाद करने लगा। वह बोला की तेनालीराम ने मेरे फलों का दाम ‘कुछ नहीं’ मुझे नहीं दिया है।

राजा कृष्ण देव राय ने तुरंत तेनालीराम को हाज़िर होने को कहा। तेनालीराम के आते ही उनसे सफाई मांगी गई। तेनालीराम पहले से ही इसके लिए तैयार थे। उन्होंने एक रत्न-जड़ित संदूक लाकर रघु फल वाले के सामने रख दिया और कहा ये लो तुम्हारे फलों का दाम।

संदूक को देखते ही रघु की आँखें चौंधिया गयीं, उसने अनुमान लगाया कि इस संदूक में बहुमूल्य हीरे-जवाहरात होंगे। कुछ ही पलों में वह रातों-रात अमीर बनने के ख्वाब देखने लगा। और इन्हीं ख़यालों में खोये-खोये उसने संदूक खोला।

संदूक खोलते ही मानो उसका ख्वाब टूट गया, वह जोर से चिल्लाया, "ये क्या? इसमें तो ‘कुछ नहीं’ है।"

तब तेनालीराम बोले- "बिलकुल सही, अब तुम इसमें से अपना ‘कुछ नहीं’ निकाल लो और यहाँ से चलते बनो।"

वहां मौजूद महाराज और सभी दरबारी ठहाका लगा कर हंसने लगे। और रघु को अपना सा मुंह लेकर वापस जाना पड़ा। एक बार फिर तेनालीराम ने अपने बुद्धि चातुर्य से महाराज का मन जीत लिया।

English Translate

Kuch Nahi

Many people used to envy him because of Tenaliram's clever intellect and his association with King Krishna Deva Raya. One of the envious of Tenalirama was a man named Raghu, who was a merchant of fruits. He once hatched a plan to implicate Tenaliram in a conspiracy. He called Tenaliram to buy fruits. When Tenaliram asked the price of fruits, Raghu smiled and said - "For you they cost 'nothing'."

तेनालीराम: कुछ नहीं  || Tenaliram: Kuch Nahi

After this Tenaliram ate some fruits and started moving ahead in the rest of the bag. Then Raghu stopped them and said that Tenali ji should give the price of my fruits.

Tenaliram was surprised by Raghu's words and said - "Just now you said that the price of the fruit is 'nothing'. So why are you going back on your words now."

Then Raghu said - "My fruits are not for free. I had clearly told that the price of my fruits is 'nothing'. Now give me 'nothing' directly, otherwise I should approach King Krishna Deva Raya. I will do it and I will give you severe punishment."

Tenaliram fell into deep thought and went to his home from there thinking.

There was only one question going on in his mind that how to find the break of this strange conspiracy of this crazy fruit guy? From where should I get this 'nothing'?

The very next day the king of fruits came to the court of Krishna Deva Raya and started complaining. He said that Tenaliram has not given me 'nothing' for my fruits.

King Krishna Deva Raya immediately asked Tenaliram to attend. As soon as Tenaliram came, he was asked for clarification. Tenaliram was already prepared for it. He brought a gem-studded box and placed it in front of the Raghu fruit person and said, take the price of your fruits.

Raghu's eyes were dazzled on seeing the box, he guessed that this box would contain valuable diamonds and jewels. Within a few moments, he started dreaming of becoming rich overnight. And lost in these thoughts he opened the box.

As he opened the box, he cried out loudly, "What is this? There is nothing in it."

Then Tenaliram said - "All right, now take your 'nothing' out of it and keep walking from here."

The Maharaj and all the courtiers present there started laughing. And Raghu had to go back with his own mouth. Once again Tenaliram won the mind of Maharaj with his intellect.

भारतीय राजनीति और धर्म

भारतीय राजनीति और धर्म 

भारत को हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है। अक्सर कहा जाता है, कि भारत में धर्मनिरपेक्षवाद का भविष्य अंधकार में है। यह एक विवादास्पद विषय है, किंतु पक्ष में जो तर्क दिया जाता है, कि भारत में धर्मनिरपेक्ष समाज के निर्माण में धर्म सबसे बड़ी बाधा है, तो यह पूर्णतः सत्य भले ही न हो,परन्तु थोड़ा सत्य तो है ही। 

भारतीय राजनीति और धर्म

हमारे देश भारत में हर व्यक्ति कहीं ना कहीं (प्रत्यक्ष या परोक्ष) इस राजनीतिक कड़ी से जुड़ा हुआ है। लोग कहते हैं कि राजनीति बहुत ही गंदी चीज होती है, लेकिन मौका आने पर हर व्यक्ति राजनीति से जुड़ना चाहता है। किसी ने खूब कहा है कि राजनीतिक वह गंधैली तकिया है या चादर है, जिसमें से बदबू तो बहुत आती है, लेकिन मौका आने पर हर कोई उस चादर को ओढ़ना चाहता है। आज के समय में राजनीति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीति का स्तर काफी निम्न दर्जे का हो गया है। आज की राजनीति भी जाति और धर्म प्रधान हो गयी है। राजनीति में धर्म होना चाहिए परंतु धर्म की राजनीति कभी नहीं होनी चाहिए। आए दिन देखा जाता है कि सांप्रदायिक दंगे फैल रहे हैं। दोनों गुट आपस में लड़ रहे हैं। जान माल का नुकसान हो रहा है। सरकारी संपत्ति का नुकसान होता है कुछ ऊपर बैठे राजनेता अपने निजी हित के लिए अपने आंखों को बंद किए हुए बैठे रहते हैं, जो समय रहते उचित कार्यवाही करके रोका जा सकता है उसे रोकने का प्रयास नहीं करते हैं। 

वैसे तो धर्म और राजनीति को हमेशा एक दूसरे से अलग माना जाता रहा हैं। मगर आज के समय में ये एक दूसरे को इस प्रकार प्रभावित करते हैं, जिससे एक दूसरे का पूरक कहा जाना, गलत नहीं होगा। 

राजनितिक संस्थाएं लोगों में विश्वास तथा उनका प्रतिनिधित्व दर्शाने के लिए धर्म तथा धर्म से जुडी संस्थाओं का सहारा लेती हैं। दूसरी तरफ आज हर धर्म की अपनी संस्थाएं जो प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष तौर पर राजनितिक दलों को अपना समर्थन देती हैं, तथा लोगो से अपील भी करती हैं। 

भारतीय राजनीति और धर्म

यही वजह हैं कि भारत जैसे देश में लोग धर्म प्रिय हैं। इसी कारण हर तरह के चुनावों में धर्म के नाम पर वोट भी मांगे जाते हैं। वहीं अमेरिका जैसे पश्चिम देशों की राजनीति में धर्म का राजनीति पर ना के बराबर प्रभाव पड़ता है। 

भारत हमेशा से सहिष्णुता का पुजारी रहा हैं, कई विदेशी जातियों ने यहाँ आक्रमण किया तथा यही पर रच बस गये। जब भारत का संविधान बना तो इसे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में मान्यता दी गईं। मगर बहुत से सता स्वार्थी धूर्त राजनेता, जो अंग्रेजों के संभवतः चापलूसी करने वालों की सन्तान ही रहे होंगे, जो इस तथ्य से भली भांति वाकिफ थे, कि भारत में राजनीति को धर्म से अलग नहीं रखा जा सकता। 

हमारा धर्म चुनना हमारी स्वतंत्रता हैं, इसका मतलब यह नहीं कि हम हर बात को धर्म के नजरिये से ही देखें। अब वक्त आ चूका हैं धर्म व राजनीति में साठ गाठ करने वालों की दुकाने बंद होनी ही चाहिए। क्योंकि धर्म व्यक्ति की आस्था, परम्परा व इतिहास हैं, इसे व्यक्ति तक ही रहने दिया जाए, न कि विवाद के साथ राजनेताओं के पक्ष-विपक्ष का मुद्दा। 

यह कहा जा सकता है, कि हम भारतीय हैं।  हमें इस बात पर गर्व है क्योंकि यहां विभिन्न धर्मों एवं जातियों के लोग रहते हैं। इसीलिए भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है, जिससे कि धर्म को राजनीति से हटाया जाए किंतु धर्म का प्रभाव व्यवहारिक रूप से भारतीय जनता के मन मस्तिष्क से नहीं मिट पाया है। 

अक्षय तृतीया 2022 : Akshaya Tritiya 2022

अक्षय तृतीया

हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के रूप में मनाते हैं। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार अक्षय तृतीया की तिथि बहुत ही शुभ और मंगलकारी मानी गई है। मान्यता है कि इस दिन किए गए सभी कार्यों का शुभ फल मिलता है। इसलिए इस दिन मांगलिक कार्य, शुभ काम अच्छा माना जाता है। 

अक्षय तृतीया 2022 : Akshaya Tritiya 2022

 इस वर्ष 3 मई 2022, दिन मंगलवार को अक्षय तृतीया मनाई जा रही है। अक्षय तृतीया के दिन किया गया कोई भी कार्य अत्यंत शुभ और अक्षय फल देने वाला माना जाता है। इसका नाम "आखा तीज" भी है। वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि की अधिष्ठात्री देवी माता गौरी है। अतः माता गौरी को साक्षी मानकर किया गया धर्म-कर्म एवं दान अक्षय हो जाता है। इसलिए इस तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। यह एक अबूझ मुहूर्त मानी गई है, अतः अक्षय तृतीया के दिन हर तरह के शुभ कार्य किए जा सकते हैं एवं हर प्रकार का मांगलिक कार्य इस दिन प्रारंभ हो जाता है। कई पुराणों और ग्रंथों में यह भी वर्णित है कि अगर पूरे साल तक कोई दान धर्म नहीं किया है, तो अक्षय तृतीया के दिन दान जरूर करना चाहिए। इस दान का अच्छा फल प्राप्त होता है।

अक्षय तृतीया 2022 : Akshaya Tritiya 2022

आप सभी को अक्षय तृतीया व भगवान परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ। 

गोलकोंडा किला हैदराबाद

गोलकोंडा किला हैदराबाद

दुनिया में ऐसे कई रहस्य हैं, जिसकी गुत्थी आज तक कोई सुलझा नहीं पाया है। ऐसे रहस्य जो विज्ञान के लिए भी चुनौती बने हुए हैं। आज हम आपको ऐसे ही एक रहस्यमई जगह के बारे में बताने जा रहे हैं। दरअसल यह एक रहस्यमई किला है। यह किला हैदराबाद के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है, जिसका नाम गोलकोंडा किला है।

गोलकोंडा किला हैदराबाद

 यह किला देश के सबसे बड़ी मानव निर्मित झीलों में से एक हुसैन सागर झील से लगभग 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, और इस क्षेत्र के सबसे संरक्षित स्मारकों में से एक है। इस किले का निर्माण कार्य 1600 दशक के आसपास में पूरा हुआ था, लेकिन इसे बनाने की शुरुआत 13वीं शताब्दी में काकतिया राजवंश द्वारा की गई थी। यह किला अपने वास्तुकला, पौराणिक कथाओं, इतिहास और रहस्यों के लिए जाना जाता है।

हैदराबाद से लगभग 11 किलोमीटर दूर 16वीं शताब्दी का निर्मित प्रभावशाली गोलकुंडा किला भारत के सबसे प्रसिद्ध किलो में से एक है। पूर्व गोलकुंडा साम्राज्य की राजधानी, यह किला इस क्षेत्र में गोलकुंडा राज्य शक्ति का केंद्र था और इसलिए इसे एक अभेद्य संरचना के रूप में बनाया गया था। इसका पूर्व गौरव और ऐश्वर्य आज भी इसके शक्तिशाली दीवारों और इसकी किलेबंदी में देखी जा सकती है।120 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थिति यह किला वैसा प्रमुख सुविधाजनक स्थान था, जहां से दुश्मन पर दूर से नजर रखी जा सकती थी। आज यह किला इस ऊंचाई से पर्यटकों को आसपास के क्षेत्रों के व्यापक दृश्य प्रस्तुत करता है, जहां से कोई भी काफी दूर तक लगभग क्षितिज तक को देख सकता है। 

गोलकोंडा किला हैदराबाद

इस किले के निर्माण से एक रोचक इतिहास जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि एक दिन एक चरवाहे लड़के को पहाड़ी पर एक मूर्ति मिली थी। जब उस मूर्ति की सूचना तत्कालिक शासक काकतिया राजा को मिली तो उन्होंने उसे पवित्र स्थान मान कर उसके चारों और मिट्टी का एक किला बनवा दिया, जिसे आज गोलकोंडा किला के नाम से जाना जाता है। मुख्यत: यह किला सन 1687 में मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा जीते जाने के पहले तक एक अभेद्य दुर्ग था। यह किला अपने समय की इंजीनियरिंग का एक शानदार नमूना है और शायद इसलिए अनेक शक्तिशाली सम्राटों ने इस पर कब्जा करने की कोशिश की।

गोलकोंडा किला हैदराबाद

400 फीट ऊंची पहाड़ी पर बने इस किले में 8 दरवाजे और 87 गढ़ हैं। फतेह दरवाजा इस किले का मुख्य द्वार है जो 13 फीट चौड़ा और 25 फीट लंबा है। इसके विशाल फाटकों पर हाथियों के प्रहार को रोकने के लिए लोहे की अनेक बड़ी-बड़ी किलें लगी हैं। किले की घेराबंदी के दौरान निर्बाध जलआपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए इसमें एक छिपी हुई पानी की पाइप लाइन भी बिछी है। सुरक्षा की दृष्टि से किले में सबसे शानदार इसकी अनूठी ध्वनिकी (अकाऊस्टिक) है, जो यह सुनिश्चित करती है कि प्रवेश द्वार पर की गई हल्की सी आवाज भी पूरे परिसर में गूंज उठेगी। इसमें चार कलदार पुल हैं, जिसे हटाया जा सकता है, अनेक हाल और अस्तबल भी हैं। इस किले की शानदार भव्यता का अंदाजा यहां के दरबार हाल को देखकर लगाया जा सकता है जिसे हैदराबाद और सिकंदराबाद के दोनों शहरों को ध्यान में रखते हुए पहाड़ी की चोटी पर बनाया गया है। यहां पहुंचने के लिए 1000 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

ऐसा माना जाता है कि किले में एक रहस्यमय सुरंग भी है, जो किले के सबसे निचले भाग से होकर किले के बाहर निकलती है। कहा जाता है कि इस सुरंग को आपातकालीन स्थिति में शाही परिवार के लोगों को सुरक्षित बाहर पहुंचाने के लिए बनाई गई थी, लेकिन अब तक इस सुरंग का कुछ पता नहीं चल पाया है। 

Golconda Fort Hyderabad

 There are many such mysteries in the world, whose mystery has not been solved till date. Such mysteries remain a challenge even for science. Today we are going to tell you about such a mysterious place. Actually it is a mysterious fort. 

गोलकोंडा किला हैदराबाद

 This fort is one of the major tourist places of Hyderabad, whose name is Golconda Fort. The fort is located about 9 kilometers from Hussain Sagar Lake, one of the largest man-made lakes in the country, and is one of the best-preserved monuments of the region. The construction work of this fort was completed around 1600s, but its construction was started by the Kakatiya dynasty in the 13th century. This fort is known for its architecture, mythology, history and mysteries.

गोलकोंडा किला हैदराबाद

 The impressive 16th century Golconda Fort, about 11 km from Hyderabad, is one of the most famous forts in India. The capital of the former Golconda kingdom, this fort was the center of Golconda state power in the region and was therefore built as an impregnable structure. Its former glory and majesty can be seen even today in its mighty walls and fortifications. The fort, situated on a hill 120 meters high, was such a prime vantage point from which the enemy could be kept a close watch. Today, the fort offers tourists a sweeping view of the surrounding areas from this height, from where one can see quite a distance almost to the horizon.

गोलकोंडा किला हैदराबाद

 An interesting history is attached to the construction of this fort. It is said that one day a shepherd boy found an idol on the hill. When the information of that idol was received by the then ruler Kakatiya Raja, he considered it as a holy place and built a mud fort around it, which is today known as Golconda Fort. Primarily this fort was an impregnable fort until it was conquered by the Mughal Emperor Aurangzeb in 1687. This fort is a splendid piece of engineering of its time and perhaps that is why many powerful emperors tried to capture it.

Built on a 400 feet high hill, this fort has 8 gates and 87 bastions. Fateh Darwaza is the main gate of this fort which is 13 feet wide and 25 feet long. Many big iron forts have been built on its huge gates to prevent the attack of elephants. It also has a hidden water pipeline to ensure uninterrupted water supply during the siege of the fort. The most striking feature of the fort from the point of view of security is its unique acoustics, which ensure that even the slightest sound made at the entrance will reverberate throughout the complex. It has four Kaldar bridges, which can be removed, there are also many halls and stables. The splendid grandeur of this fort can be gauged by looking at the Durbar Hall here, which has been built on a hilltop keeping in mind the two cities of Hyderabad and Secunderabad. One has to climb 1000 steps to reach here.

It is believed that there is also a mysterious tunnel in the fort, which exits the fort through the lowest part of the fort. It is said that this tunnel was built to bring the people of the royal family out safely in case of emergency, but till now nothing of this tunnel has been known.

ओस की बूँद (Os ki boond)

ओस की बूँद (Os ki boond)

आभार,शुक्रिया,धन्यवाद

आप सभी सहृदय विद्वानों का दिल से।

आज सबसे पहले मेरे इस ब्लॉग से जुड़े लोगों को प्रणाम।

आपलोगों के निरंतर सहयोग का, दिल से निकली दुआओें और आशीर्वाद का ही सुपरिणाम है कि विगत दो वर्षों से निरंतर, बिना किसी बाधा के यह ब्लॉग प्रतिदिन प्रकाशित होता रहा। आपके सतत उत्साहवर्धन के कारण ही आज यह ब्लॉग इस मुकाम पर पहुँच पाया है। किसी भी कार्य को करने पर यदि सराहना मिलती है, तो उस कार्य को और अधिक निष्ठा और लगन से करने की प्रेरणा मिलती है।  पिछले दो वर्षों से लगातार आपलोगाें की प्रतिक्रियाएं मेरे जोश और जज्बे में वृद्धि करती रहीं और ये सिलसिला लगातार बिना थमे,बिना रुके चल रहा है। इस क्रम में बहुत लोग हैं जो शुरू से अभी तक मुझसे जुड़े रहे, मेरी अच्छी- बुरी सभी पोस्ट की सराहना करते रहे और मेरा मनोबल बढ़ाते रहे। दो साल के इस समयान्तराल में  नए-नए लोग जुड़ते रहे और यह कारवां आगे बढ़ता रहा। इस राह में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो कुछ वक्त के लिए ही यहां आए। कदाचित  मेरी तरफ से ही कुछ कमी रही होगी जो मैं उन्हें ब्लॉग पर रोक नहीं सकी। आगे से मेरा प्रयास रहेगा कि इस कमी को भी पूरी कर सकूं और ब्लॉग में कुछ ऐसा जोड़ूँ  ताकि यहां आने वाले यहां रुकें और अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से मेरा उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन करते रहें।

Os ki Ek Boond ~ ओस की एक बूँद
 💦यूं तो ओस की बूंद है तो जल की ही बूंद का एक स्वरूप। यह स्वरूप नदी झील, झरने का भी हो सकता है और कभी आंसू का भी। वक्त सुखकारी हो या दुखकारी आंसू बनकर यह हमेशा नयनों में समाई रहती है। सृजन काल से लेकर मुक्ति काल तक सदैव इंसान की सच्ची साथी। कभी पलकों पर मेरा बसेरा होता है तो कभी अधरों पर मेरा आशियाना। एक मां के लिए यह उसके आंचल के साथ क्रीड़ा करती उसकी ममता है, और शायद उस ममता में ही अखिल विश्व समाहित है। जिंदगी इस बूंद के कारण ही चलायमान है। जब इसका आविर्भाव होता है तो प्रकृति भी मुस्कुराती है। मन मयूर नृत्य करने लगता है, हृदय में प्यार का उल्लास जाग उठता है।
Os ki Ek Boond ~ ओस की एक बूँद
            पत्तों से टपकती ओस की बूंदे नाजुक मोती जैसी ही तो है। इन्हें ध्यान से देखिए तो सही। आपको लगेगा जैसे ये आप से बहुत कुछ कहना चाहती हों। आपसे आपका हाल चाल पूछने को शायद ये बैचैन  हैं। लेकिन मिट्टी की सोंधी खुशबू याद करते ही वे पत्तों में भी नहीं ठहरतीं। इस छोटी सी जिंदगी को भी ओस की बूंद की तरह चमकीली होना चाहिए। भले ही वह कम उम्र की हो। ओस की बूंद स्वयं में पूर्ण है। वह स्रोत है नवशक्ति का। ओस की बूंद प्रतीक है जीवन की गति का, जीवन को गुनगुनाने का, निश्छल प्रेम को सहेजने का, जिंदगी के बलिदान का, और अंत में आपके साथ मिलजुल कर बैठने का, कुछ अपनी सुनाने और आपकी सुनने का। 💦
Os ki Ek Boond ~ ओस की एक बूँद
जानी पहचानी "ओस की बूंद"
अनगिनत यादों को समेटे
चमकती मोतियों सी "ओस की बूंद"
महकती यादों को ओढ़े
जाने कितने रिश्ते गढ़ती "ओस की बूंद"
जीवन की आपा धापी को सहेजते
सपनों के घरौंदे सी "ओस की बूंद"
उड़ते दिलों को संभालते
निश्छल बचपन जैसी 
मीठी मीठी यादों को संजोते "ओस की बूंद"