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समझ लेना || इतवार (Sunday) ||

समझ लेना

Hindi Quotes, Hindi Poem,The Joy of Sunday
जीवन में हमेशा मुस्कुराने की वजह नहीं मिलती,
लेकिन हमारी मुस्कान, दूसरों के मुस्कुराने की वजह जरुर होती है.. ❤

समझ लेना

ज़िन्दगी के किसी दौर में 

जब तुम खुद को अकेले पाओ,

तो खुद को चाँद समझ लेना

जो अकेले ही स्याह रातों को उजियारीत करता है..


जब मंज़िल दूर लगे

और पग पग पर भी ठोकर लगे,

तो खुद को दीवार पर चढ़ती नन्ही चींटी समझ लेना

जो सौ बार फिसलती है पर हिम्मत नहीं खोती है.. 


जब राहों में कॉँटे ही काँटे हो

और मुश्किलों के पत्थर राह रोकें हो,

तो खुद को वो शिल्पकार समझ लेना

जो पत्थर को तराशकर ईश्वर बना दे.. 


जब हो रहा हो मन हताश

और विश्वास में न रहे कोई आस,

तब खुद को बच्चा समझ लेना

और हर मन को सच्चा समझ लेना..

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अगर हम बुरी स्थिति में भी खुद को सकारात्मक रखते हैं 
तो यह हमारी जीत है.. ❤

बिल्ली का न्याय : पंचतंत्र || Billi ka nyay : Panchtantra ||

बिल्ली का न्याय

क्षुद्रमर्थापतिं प्राप्य न्यायान्वेषणतत्परौ ।
उभावपि क्षयं प्राप्ती पुरा शशकपिञ्जलौ ॥

नीच और लोभी को पंच बनाने वाले दोनों पक्ष नष्ट हो जाते हैं।

बिल्ली का न्याय : पंचतंत्र || Billi ka nyay : Panchtantra ||

एक जंगल के जिस वृक्ष की शाखा पर मैं रहता था उसके नीचे के तने में एक खोल के अन्दर कपिंजल नाम का तीतर भी रहता था। शाम को हम दोनों में खूब बातें होती थीं। हम एक-दूसरे को दिन-भर के अनुभव सुनाते थे और पुराणों की कथाएँ कहते थे।

एक दिन वह तीतर अपने साथियों के साथ बहुत दूर के खेत में धान की नई-नई कोपलें खाने चला गया। बहुत रात बीतने पर भी जब वह नहीं आया तो मैं बहुत चिन्तित होने लगा। मैंने सोचा- किसी वधिक ने जाल में न बाँध लिया हो, या किसी जंगली बिल्ली ने न खा लिया हो। बहुत रात बीतने के बाद उस वृक्ष के खाली पड़े खोल में शीघ्रगो नाम का खरगोश घुस आया। मैं तो तीतर के वियोग में इतना दुःखी था कि उसे रोका नहीं।

दूसरे दिन कपिंजल अचानक ही आ गया। धान की नई-नई कोपलें खाने के बाद वह खूब मोटा-ताजा हो गया था। अपनी खोल में आने पर उसने देखा कि वहाँ एक खरगोश बैठा है। उसने खरगोश को अपनी जगह खाली करने को कहा। खरगोश भी तीखे स्वभाव का था; बोला- यह घर अब तेरा नहीं है। वापी, कूप, तालाब और वृक्ष के घरों का यही नियम है कि जो भी उनमें बसेरा कर ले, उसका ही वह घर हो जाता है। घर का स्वामित्व केवल मनुष्यों के लिए होता है, पक्षियों के लिए गृह-स्वामित्व का कोई विधान नहीं है।

झगड़ा बढ़ता गया। अन्त में, कपिंजल ने किसी भी तीसरे पंच से इसके निर्णय करने की बात कही। उनकी लड़ाई और समझौते की बातचीत को एक जंगली बिल्ली सुन रही थी। उसने सोचा, मैं ही पंच बन जाऊँ तो कितना अच्छा है; दोनों को मारकर खाने का अवसर मिल जाएगा।

बिल्ली का न्याय : पंचतंत्र || Billi ka nyay : Panchtantra ||

यह सोच, हाथ में माला लेकर सूर्य की ओर मुख करके, नदी के किनारे कुशासन बिछाकर वह आँखें मूँद बैठ गई और धर्म का उपदेश करने लगी। उसके धर्मोपदेश को सुनकर खरगोश ने कहा-यह देखो! कोई तपस्वी बैठा है, इसी को पंच बनाकर पूछ लें।-तीतर बिल्ली को देखकर डर गया; दूर से बोला- मुनिवर, तुम हमारे झगड़े का निपटारा कर दो। जिसका पक्ष धर्म-विरुद्ध होगा, उसे तुम खा लेना-यह सुन बिल्ली ने आँख खोली और कहा-राम-राम! ऐसा न कहो। मैंने हिंसा का नारकीय मार्ग छोड़ दिया है। अतः मैं धर्म-विरोधी पक्ष वाले की भी हिंसा नहीं करूंगी। हाँ, तुम्हारा निर्णय करना मुझे स्वीकार है। किन्तु मैं वृद्ध हूँ; दूर से तुम्हारी बात नहीं सुन सकती, पास आकर अपनी बात कहो-

बिल्ली की बात पर दोनों को विश्वास हो गया।

दोनों ने उसे पंच मान लिया और उसके पास आ गए। उसने भी झपट्टा मारकर दोनों को एक साथ ही पंजों में दबोच लिया।

इसी कारण मैं कहता हूँ कि नीच और व्यसनी को राजा बनाओगे तो तुम सब नष्ट हो जाओगे। इस दिवान्ध उल्लू को राजा बनाओगे तो वह भी रात के अन्धेरे में तुम्हारा नाश कर देगा।

कौवे की बात सुनकर सब पक्षी उल्लू को राजमुकुट पहनाए बिना चले गए। केवल अभिषेक की प्रतीक्षा करता हुआ उल्लू, उसकी मित्र कृकालिका और कौवा रह गए। उल्लू ने पूछा-मेरा अभिषेक क्यों हुआ ?

कृकालिका ने कहा-मित्र! एक कौवे ने आकर रंग में भंग कर दिया। शेष सब पक्षी उड़कर चले गए हैं, केवल वह कौवा ही यहाँ बैठा है। तब उल्लू ने कौवे से कहा-दुष्ट कौवे! मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था जो तूने मेरे मार्य में विघ्न डाल दिया। आज से मेरा-तेरा वंश-परम्परागत वैर रहेगा।

यह कहकर उल्लू वहाँ से चला गया। कौवा बहुत चिन्तित हुआ वहीं बैठा रहा। उसने सोचा, मैंने अकारण ही उल्लू से वैर मोल ले लिया। दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप करना और कटु सत्य कहना भी दुःखप्रद होता है।

यही सोचता-सोचता वह कौवा वहाँ से आ गयातभी से कौवों और उल्लुओं में स्वाभाविक वैर चला आता है।

कहानी सुनने के बाद मेघवर्ण ने पूछा-अब हमें क्या करना चाहिए?

स्थिरजीवी ने धीरज बँधाते हुए कहा-हमें छल द्वारा शत्रु पर विजय पानी चाहिए। छल से अत्यन्त बुद्धिमान ब्राह्मण को भी मूर्ख बनाकर धूर्ती ने जीत लिया था।

मेघवर्ण ने पूछा-कैसे?

स्थिरजीवी ने तब धूर्तों और ब्राह्मण की यह कथा सुनाई :

धूतों के हथकंडे

To be continued ...

एक महिला जिन्होंने अपना बेशकीमती हीरा बेच बचाई थी 'टाटा कंपनी' - मेहरबाई टाटा || Meherbai Tata - The Original Feminist Icon ||

मेहरबाई टाटा (Meherbai Tata)

बहुत लोग मेहरबाई टाटा (Meherbai Tata) से अवगत होंगे और बहुत लोग अनभिज्ञ। देश में बहुत सी क्रांतिकारी, विदुषी और समाजसेवी महिलायें हुई हैं। आज इन्हीं महिलाओं में से एक मेहरबाई टाटा (Meherbai Tata) की चर्चा करते हैं। टाटा समूह को अर्श से फर्श तक पहुंचाने में मेहरबाई टाटा (Meherbai Tata) का महत्वपूर्ण योगदान है। टाटा ग्रुप के दूसरे अध्यक्ष सर दोराबजी टाटा की पत्नी मेहरबाई टाटा (Meherbai Tata) ने कभी टाटा स्टील को बचाने के लिए कोहिनूर से भी बड़ा अपना हीरा गिरवी रख दिया था।

मेहरबाई टाटा (Meherbai Tata)

सन 1924 में प्रथम विश्वयुद्ध के कारण जब मंदी का माहौल था और टाटा कंपनी के पास कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे नहीं थे, दोराबजी टाटा को कुछ सूझ नहीं रहा था। कंपनी को कैसे बचाया जाए? कोई रास्ता दिख नहीं रहा था। तभी मेहरबाई ने जुबिली हीरा गिरवी रख धन इकट्ठा करने की सलाह दी। पहले तो दोराबजी ने इससे इंकार कर दिया, लेकिन बाद में अपनी पत्नी की सलाह माननी पड़ी। तब मेहरबाई ने अपना बेशकीमती जुबली डायमंड इम्पीरियल बैंक में 1 करोड़ रुपयों में गिरवी रख दिया था ताकि कर्मचारियों को लगातार वेतन मिलता रहे और कंपनी चलती रहे। यह हीरा 254 कैरेट का था जो आकार और वजन में विश्व विख्यात "कोह-ए-नूर" हीरे से दोगुना है। 

टाटा समूह के दूसरे अध्यक्ष सर दोराबजी टाटा की पत्नी मेहरबाई

टाटा मेमोरियल कैंसर रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना

मेहरबाई टाटा, जमशेदजी टाटा की बहू और उनके बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा की पत्नी थीं। इनकी ब्लड कैंसर से असमय मृत्यु होने के बाद सर दोराबजी टाटा ने भारत के कैंसर रोगियों के बेहतर इलाज के लिये यह हीरा बेचकर ही टाटा मेमोरियल कैंसर रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की थी। प्रेम के लिये बनाया गया यह स्मारक (टाटा मेमोरियल कैंसर रिसर्च फाउंडेशन) मानवता के लिये एक उपहार है। विडम्बना ये है कि हम प्रेम स्मारक के रुप मे ताजमहल  को महिमामंडित करते रहते हैं और जो हमें जीवन प्रदान करता है, उसके इतिहास के बारे में जानते तक नहीं। 

मेहरबाई से जुड़ी कुछ रोचक बातें

खैर, आज हम मेहरबाई टाटा की बात करेंगे जो, टाटा समूह के दूसरे अध्यक्ष सर दोराबजी टाटा की पत्नी थी और अपने समय से काफी आगे थी। उन्होंने न सिर्फ बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष किया, बल्कि कई सामाजिक कार्य किए। जमशेदपुर में मेहरबाई कैंसर अस्पताल या फिर सर दोराबजी टाटा पार्क जाने पर मेहरबाई से जुड़ी कई यादें ताजा हो जाएंगी।

मेहरबाई से जुड़ी कुछ रोचक बातें 

टाटा स्टील को बचाने के लिए कोहिनूर से भी बड़ा हीरा रख दी थी गिरवी

टाटा स्टील को बचाने के लिए कोहिनूर से भी बड़ा हीरा रख दी थी गिरवी

टाटा समूह को "फर्श से अर्श" तक पहुंचाने में मेहरबाई टाटा का महत्वपूर्ण योगदान है। टाटा ग्रुप के दूसरे अध्यक्ष सर दोराबजी टाटा की पत्नी मेहरबाई टाटा ने कभी टाटा स्टील को बचाने के लिए कोहिनूर से भी बड़ा अपना हीरा गिरवी रख दिया था। 245 कैरेट का जुबिली हीरा प्रसिद्ध कोहिनूर से दोगुना बड़ा था और यह तोहफा उन्हें अपने पति सर दोराबजी टाटा से मिला था। विशेष प्लेटिनम चेन में लगा यह हीरा देख सभी चकित हो जाते थे। मेहरबाई टाटा इसे विशेष आयोजनों में पहना करती थीं।

1879 में हुआ था मेहरबाई का जन्म, खेलों और पियानो में थी रुचि

मेहरबाई टाटा का जन्म 1879 में हुआ था। खुले विचार की मेहरबाई बाद में चलकर महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई की अगुआ बनी। खेल के प्रति रुचि रखने वाली मेहरबाई बहुमुखी प्रतिभा की धनी थी। वह कुशल पियानोवादक भी थी।

1879 में हुआ था मेहरबाई का जन्म, खेलों और पियानो में थी रुचि

ओलंपिक में टेनिस खेलने वाली पहली भारतीय महिला थी मेहरबाई

मेहरबाई को टेनिस खेलने का शौक था और वह इस खेल में बहुत कुशल हो गईं। वास्तव में, उसने टेनिस टूर्नामेंट में साठ से अधिक पुरस्कार जीते। वह ओलंपिक टेनिस खेलने वाली पहली भारतीय महिला थीं। 1924 के पेरिस ओलंपिक में मिश्रित युगल। सबसे दिलचस्प और अनोखी बात यह है कि उन्होंने अपने सभी टेनिस मैच पारसी साड़ी पहनकर खेले, जो उनके राष्ट्र में उनके गौरव से प्रेरित था, और शायद अंग्रेजों की ओर भी इशारा करने के लिए, जो उस समय भारत पर शासन कर रहे थे।

ओलंपिक में टेनिस खेलने वाली पहली भारतीय महिला थी मेहरबाई

जेपलिन एयरशिप में सवार होने वाली पहली भारतीय महिला

उनके पति और उन्हें अक्सर विंबलडन के सेंटर कोर्ट में टेनिस मैच देखते हुए देखा जाता था। मेहरबाई का खेल के प्रति जुनून टेनिस से भी आगे निकल गया। वह एक बेहतरीन घुड़सवार भी थी और 1912 में जेपेलिन एयरशिप पर सवार होने वाली पहली भारतीय महिला थी।

बाल विवाह अधिनियम बनाने में किया सहयोग

1929 में भारत में बाल विवाह अधिनियम पारित किया है, जिसे सारदा एक्ट के नाम से भी जाना जाता है। इस अधिनियम को बनाने में मेहरबाई का भी सहयोग लिया गया था। वह लेडी टाटा ने भारत और विदेशों में छुआछूत और पर्दा व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ी। वह भारत में महिलाओं की शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध थीं, और नेशनल काउंसिल ऑफ वीमेंस की संस्थापक भी रही।

अमेरिका में हिंदू विवाह अधिनियम पर दिया भाषण

29 नवंबर 1927 को उन्होंने अमेरिका के मिशिगन में बैटल क्रीक कॉलेज (अब एंड्रयूज यूनिवर्सिटी) में हिंदू विवाह अधिनियम के पक्ष में बात की। उनके उत्साही भाषण ने दर्शकों को भारतीय संस्कृति और इतिहास के साथ-साथ रीति-रिवाजों और अज्ञानता का एक उत्कृष्ट अवलोकन प्रदान किया, जिसने देश में महिलाओं की प्रगति को बाधित कर रहा था।

बाल विवाह खत्म करने पर दिया जोर

इसके बाद उन्होंने भारत सरकार से एक प्रस्तावित विधेयक को शीघ्रता से पारित करने का आह्वान किया जो बाल विवाह को गैरकानूनी घोषित करेगा और इस तरह इस सामाजिक बुराई को समाप्त करेगा। वास्तव में, वह भारत की महिलाओं के लिए एक शक्तिशाली प्रवक्ता थीं। अपने पति, टाटा समूह के दूसरे अध्यक्ष, सर दोराबजी टाटा के साथ, उन्होंने व्हाइट हाउस में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति केल्विन कूलिज से भी मुलाकात की।

'हम ग्रेसफुल नहीं, यूजफुल होने आए हैं'

एक धनी परिवार में विवाहित होने के बावजूद, वह समाज के सभी वर्गों के साथ सक्रिय संपर्क में रहीं। एक खास कहानी बड़ी दिलचस्प है। जब उसने सुना कि मुंबई के भायखला के एक गरीब इलाके में रहने वाली महिलाओं को दंगों के कारण भोजन नहीं मिल पा रहा है, तो उसने अपनी कुछ महिला सहयोगियों के साथ खुद एक भोजन और सब्जी लेकर उनके बीच पहुंच गई। महापौर ने उनके अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि आप प्रतिष्ठित महिलाएं है। आपको यह सब करना शोभा नहीं देता। लेडी टाटा ने शांत गरिमा के साथ जवाब दिया, 'हम महिलाएं यहां 'ग्रेसफुल' होने के लिए नहीं आईं, हम यहां 'यूजफुल' होने के लिए आए हैं।

पिता ने कहा, मेरी नाम रख लो

मेहरबाई स्वतंत्र विचारों वाली महिला थी। मेहरबाई पिता, एचजे भाभा, जो एक प्रोफेसर थे और बैंगलोर और फिर मैसूर में एक प्रख्यात शिक्षाविद् थे, ने उन्हें प्रगतिशील वेस्टर्न विचारों से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन जब पिता पश्चिमी फैशन के चक्कर में उनका नाम मेहर से मेरी करना चाहा तो मेहरबाई ने इससे इंकार कर दिया। वह अपने पिता के सामने खड़ी हुई और अपना नाम अपने मूल फ़ारसी रूप, 'मेहरी' में बनाए रखने पर जोर दिया, जो बाद में मेहरबाई बन गई। इससे यह साफ प्रतीत होता है कि मेहरबाई किस प्रकार अपनी संस्कृति से प्यार करती थी।

Meherbai Tata - The Original Feminist Icon

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Meherbai Tata

Many people will be aware of Meherbai Tata and many people are ignorant. There have been many revolutionary, intelligent and social service women in the country. Today these women discuss about a Meherbai Tata. Meherbai Tata has a significant contribution in taking the Tata group from floor to floor. Meherbai Tata, wife of Sir Dorabji Tata, the second chairman of the Tata Group, had once pledged her diamond bigger than the Kohinoor to save Tata Steel.

टाटा स्टील को बचाने के लिए हीरा को रख दिया गिरवी

In 1924, when there was a recession due to the First World War and the Tata Company did not have the money to pay salaries to the employees, Dorabji Tata was not able to understand anything. How to save the company? There was no way out. Then Meherbai advised to collect the money by pledging the Jubilee Diamond. At first Dorabji refused this, but later had to follow his wife's advice. Then Meherbai had pledged her prized Jubilee Diamond to the Imperial Bank for Rs 1 crore so that the employees would get a constant salary and the company would continue. The diamond was of 254 carats, which is twice the size and weight of the world famous "Koh-e-Noor" diamond.

Establishment of Tata Memorial Cancer Research Foundation

Meherbai Tata was the daughter-in-law of Jamsetji Tata and the wife of his eldest son Sir Dorabji Tata. After his untimely death from blood cancer, Sir Dorabji Tata established the Tata Memorial Cancer Research Foundation by selling this diamond for better treatment of cancer patients of India. This memorial built for love (Tata Memorial Cancer Research Foundation) is a gift to humanity. The irony is that we keep glorifying the Taj Mahal as a monument of love and do not even know about the history of the one who gives us life.

Well, today we will talk about Meherbai Tata who was the wife of the second chairman of Tata group Sir Dorabji Tata and was way ahead of her time. He not only fought against child marriage, but also did many social works. Visiting Meherbai Cancer Hospital or Sir Dorabji Tata Park in Jamshedpur will bring back many memories related to Meherbai.

Some interesting facts related to Meherbai

To save Tata Steel, a diamond bigger than Kohinoor was mortgaged

Meherbai Tata has been instrumental in taking the Tata Group from "Floor to Earth". Meherbai Tata, wife of Sir Dorabji Tata, the second chairman of the Tata Group, had once pledged her diamond bigger than the Kohinoor to save Tata Steel. The 245-carat Jubilee diamond was twice as big as the famous Kohinoor and was gifted to her by her husband, Sir Dorabji Tata. Everyone was astonished to see this diamond in a special platinum chain. Meherbai Tata used to wear it in special events.

Meherbai was born in 1879, was interested in games and piano

Meherbai Tata was born in 1879. The open-minded Meherbai later became the leader of the fight for women's rights. Meherbai, who was interested in sports, was rich in versatility. She was also a skilled pianist.

एक महिला जिन्होंने अपना बेशकीमती हीरा बेच बचाई थी 'टाटा कंपनी' - मेहरबाई टाटा

Meherbai was the first Indian woman to play tennis in the Olympics.

Meherbai was fond of playing tennis and became very skilled in this sport. In fact, she won over sixty awards in tennis tournaments. She was the first Indian woman to play Olympic tennis. Mixed doubles at the 1924 Paris Olympics. The most interesting and unique thing is that she played all her tennis matches wearing a Parsi saree, which was inspired by her pride in her nation, and perhaps also to allude to the British, who were ruling India at the time.

First Indian woman to board a Zeppelin airship

Her husband and she were often seen watching tennis matches on the center court of Wimbledon. Meherbai's passion for the game went beyond tennis. She was also a fine equestrian and was the first Indian woman to board a Zeppelin airship in 1912.

Helped in making Child Marriage Act

In 1929, India passed the Child Marriage Act, also known as the Saradha Act. Meherbai's cooperation was also taken in making this act. That Lady Tata fought against untouchability and purdah system in India and abroad. She was committed to the education of women in India, and was also the founder of the National Council of Women.

Speech on Hindu Marriage Act in America

On 29 November 1927, he spoke in favor of the Hindu Marriage Act at Battle Creek College (now Andrews University) in Michigan, USA. Her spirited speech provided the audience with an excellent overview of Indian culture and history as well as the customs and ignorance that was hindering the progress of women in the country.

एक महिला जिन्होंने अपना बेशकीमती हीरा बेच बचाई थी 'टाटा कंपनी' - मेहरबाई टाटा

Emphasis on ending child marriage

He then called upon the Government of India to expeditiously pass a proposed bill that would outlaw child marriage and thus end this social evil. In fact, she was a powerful spokesperson for the women of India. Along with her husband, the second chairman of the Tata Group, Sir Dorabji Tata, she also met the then US President Calvin Coolidge at the White House.

'We are not graceful, we have come to be useful'

Despite being married into a wealthy family, she remained in active contact with all sections of the society. One particular story is very interesting. When she heard that women living in a poor area of ​​Byculla, Mumbai could not get food due to riots

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta || अध्याय एक के अनुच्छेद 20-27 ||

श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय एक ~ अर्जुनविषादयोग ||

अथ प्रथमोऽध्यायः- अर्जुनविषादयोग

अध्याय एक के अनुच्छेद 20-27

 अध्याय एक के अनुच्छेद 20-27 में अर्जुन का सैन्य परिक्षण, गाण्डीव की विशेषता का वर्णन है 

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta || अध्याय एक के अनुच्छेद 20-27 ||

अर्जुन उवाचः

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः || 1.20 || 

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत || 1.21||

भावार्थ :

हे राजन्‌! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए॥20-21॥

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌ ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे || 1.22 ||

भावार्थ : 

और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए ॥ 1.22॥

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः || 1.23 ||

भावार्थ : 

दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा || 1.23 ||


संजय उवाच

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌ || 1.24 ||

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌ ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति || 1.25 ||

भावार्थ : 

संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख ॥24-25॥

तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌ ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा || 1.26 ||

श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌ || 1.27 ||

भावार्थ : इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों को भी देखा ॥26 और 27वें का पूर्वार्ध॥

कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌ ।

भावार्थ : 

उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले। ॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥

शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||

शुतुरमुर्ग के बारे में रोचक तथ्य

आज हम शुतुरमुर्ग के बारे में कुछ रोचक जानकारियां पढ़ेंगे, जो संसार का सबसे बड़ा पक्षी है। शुतुरमुर्ग अफ्रीका के बहुत दुर्लभ पक्षियों में से है। शुतुरमुर्ग की दुनिया में दो जीवित प्रजातियां हैं - आम शुतुरमुर्ग और सोमाली शुतुरमुर्ग। शुतुरमुर्ग की गिनती पक्षियों में तो होती है, परंतु यह एक ऐसा पक्षी है जो उड़ नहीं सकता। शुतुरमुर्ग भूमि पर सबसे तेज पक्षी है जो 70 किलोमीटर प्रति घंटा अर्थात 43.5 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता है। इसके तीन पेट होते हैं और पैरों में मात्र 2 उंगलियां होती हैं।

शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||

दुनिया में सबसे बड़ी आंखें और सबसे बड़ा अंडा शुतुरमुर्ग का होता है। शुतुरमुर्ग का अंडा इतना मजबूत होता है कि सामान्य वजन का व्यक्ति उस पर आसानी से खड़ा हो सकता है। इसी से आप शुतुरमुर्ग के अंडे के बारे में अंदाजा लगा सकते हैं। इसकी एक और खासियत है कि शुतुरमुर्ग को पानी पीने की जरूरत ही नहीं होती है और यह अपने पेट में एक से डेढ़ किलो तक कंकड़ भर कर चलता है।

शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||

  1. शुतुरमुर्ग का वजन 320 पाउंड और ऊंचाई लगभग ऊंचाई 9 फीट तक होती है। इस हिसाब से शुतुरमुर्ग दुनिया का सबसे भारी और सबसे ऊंचा पक्षी है। एमू (emu) दुनिया का दूसरा सबसे ऊंचा पक्षी है, जो 6.2 फीट तक ऊंचा होता है।
  2. जंगली शुतुरमुर्ग अफ्रीका के वुडलैंड्स और सवाना क्षेत्रों में पाए जाते हैं। पहले यह एशिया अफ्रीका और अरब प्रायद्वीपों में भी पाए जाते थे, परंतु अत्यधिक शिकार के कारण उनकी संख्या घटती चली गई। हालांकि सभी महाद्वीपों के चिड़िया घरों में शुतुरमुर्ग पाए जाते हैं।
  3. जमीन पर पड़े चमकीली वस्तुएं शुतुरमुर्ग को आकर्षित करती है और वह अपनी चोंच से इनके साथ खेलने लगते हैं।
  4. शुतुरमुर्ग एक साल में लगभग 50 अंडे देती है। 
  5. शुतुरमुर्ग के दांत नहीं होते, इसलिए वह अपना भोजन निगलकर खाता है। इसका मुख्य भोजन फल, बीज. घास तथा छोटे-छोटे कीड़े मकोड़े हैं। भोजन को निगलकर ग्रहण करने के बावजूद भी इनकी पाचन क्रिया बहुत अच्छी होती है। 
  6. यह पक्षी कंकड़ भी खाते हैं, जो पाचन क्रिया में मदद करते हैं।शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||
  7. शुतुरमुर्ग ना पूरी तरीके से शाकाहारी होते हैं और ना ही मांसाहारी। यह पौधों के साथ कुछ मकोड़े भी खा लेते हैं लेकिन ज्यादातर शुतुरमुर्ग शाकाहारी ही होते हैं।
  8. शुतुरमुर्ग पक्षी की आंखें उसके दिमाग से बड़ी होती हैं।
  9. नर शुतुरमुर्ग पक्षी का रंग काला होता है तथा मादा पक्षी का रंग भूरा व सफेद होता है।
  10. शुतुरमुर्ग के पैर बहुत ही शक्तिशाली होते हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शुतुरमुर्ग अपने पैरों से एक इंसान या शिकारी जानवर की जान भी ले सकता है।
  11. शुतुरमुर्ग पक्षी का एक अंडा मुर्गी के 24 अंडे के बराबर होता है तथा एक अण्डे का वजन करीब 1.6 किलोग्राम तक होता है।
  12. एक शुतुरमुर्ग का वजन औसतन 150 किलो का होता है।
  13. शुतुरमुर्ग का औसत जीवनकाल लगभग 50 से 70 साल तक होता है।
  14. शुतुरमुर्ग बिना पानी पिए लंबे समय तक जीवित रह सकता है, परंतु जहां इन्हें पानी मिलता है वह उसे पी भी लेते हैं और उससे नहा भी लेते हैं।
  15. कई देशों में शुतुरमुर्ग के मांस को खाने में प्रयोग किया जाता है तथा इसकी चमड़ी को भी अन्य चीजें बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
  16. इन्हें मारने के बावजूद भी इस पक्षी के विलुप्त होने का डर नहीं है, क्योंकि पूरी दुनिया में कम से कम 2 मिलियन शुतुरमुर्ग पाए जाते हैं।
  17. शुतुरमुर्ग धरती पर पाए जाने वाले सबसे पुराने पक्षी हैं। लगभग 120 मिलियन सालों से यह धरती पर निवास कर रहे हैं। 
  18. जिस तरह लोग घोड़ों की सवारी करते हैं, कुछ जगहों पर उसी तरह शुतुरमुर्ग की भी सवारी की जाती है। बहुत साल पहले शुतुरमुर्ग के बग्गी भी हुआ करते थे।
  19. शुतुरमुर्ग और जेब्रा एक दूसरे को शिकारी जानवरों से बचाते हैं और एक दूसरे की रक्षा करते हैं। शुतुरमुर्ग की अच्छी नजर और जेब्रा की अच्छे काम इन्हें आसानी से किसी भी खतरे से बचा लेते हैं।
  20. प्राचीन मिस्र में शुतुरमुर्ग सकारात्मकता का प्रतीक माने जाते थे। देवता शू (Deity Shu) को शुतुरमुर्ग के पंखों को पहने हुए और न्याय की देवी माट (Goddess Ma’at) को उसका सिर पहने हुए दिखाया गया है।
  21. शुतुरमुर्ग के अंडे को सॉफ्टबॉयल करने में एक घंटा और हार्ड बॉयल करने में डेढ़ घंटे का समय लगता है।
  22. सभी मादा शुतुरमुर्ग एक सामुदायिक घोंसले में अंडे देती हैं, जिसे डंप नेस्ट (Dump Nest) कहा जाता है। डंप नेस्ट (Dump Nest) 30 से 60 सेंटीमीटर गहरा और 3 मीटर चौड़ा होता है, जिसे नर शुतुरमुर्ग जमीन की मिट्टी खोदकर बनाता है। यह घोंसला एक बार में लगभग 60 अंडों का वजन संभाल सकता है। 
  23. अंडों को सेने की जिम्मेदारी नर और मादा दोनों निभाते हैं।शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||
  24. शुतुरमुर्ग के अंडे से चूजे निकालने में 42 से 46 दिन का समय लगता है।
  25. शुतुरमुर्ग के शरीर में पसीने की ग्रंथियां नहीं होती हैं तथा इसके गले में अन्य थलचर पक्षियों की तरह भोजन संचय की थैली और पित्ताशय नहीं होते हैं।
  26. अधिकांश पक्षियों के पैर में 3 से 4 उगलियां होती हैं, जबकि शुतुरमुर्ग के पैर में दो उंगलियां ही होती हैं जिनकी मदद से या बहुत तेज दौड़ते हैं।
  27. शुतुरमुर्ग के बारे में कहा जाता है कि खतरा देखकर वे अपना सिर रेत/जमीन में गड़ा लेते है, जो पूरी तरह से गलत है। ऐसा करने पर वे सांस नहीं पाएंगे और उनकी मौत हो जायेगी। शुतुरमुर्ग अंडे देने के लिए जमीन की मिट्टी खोदकर घोंसला बनाते है। अक्सर अंडों को पलटने के लिए वे घोंसले में अपना सिर डालते है, जो ऐसा दिखता है मानो वे अपना सिर रेत/जमीन में गड़ा रहे है। जब शुतुरमुर्ग खतरा महसूस करने पर भी भाग नहीं पाते, तो अपना सिर और गर्दन जमीन के समानान्तर कर लेट जाते है। सिर और गर्दन का हल्का रंग रेत/जमीन के रंग से मिल जाने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अपना सिर रेत/जमीन में गड़ा लिया है।
  28. शुतुरमुर्गों के समूह को ‘flock’ कहा जाता है। एक ‘flock’ में 10 से लेकर 100 तक सदस्य हो सकते है। सामान्यतः वे 10 के समूह में रहते है।
  29. शुतुरमुर्ग का अंडा दुनिया का सबसे बड़ा अंडा होता है, जिसका व्यास 6 इंच और भार 3 पौण्ड होता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि शरीर के आकार की तुलना में शुतुरमुर्ग का अंडा दुनिया का सबसे छोटा अंडा भी होता है।
  30. शुतुरमुर्ग के अंडे में 2000 कैलोरी होती है, जो एक व्यस्क महिला की दैनिक कैलोरी आवश्यकता के बराबर है।
शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||

Interesting facts about Ostrich

Today we will read some interesting information about Ostrich, which is the largest bird in the world. Ostrich is one of the very rare birds of Africa. There are two living species in the world of ostriches - the common ostrich and the Somali ostrich. Ostrich is counted among birds, but it is such a bird that cannot fly. Ostrich is the fastest bird on land which can run at a speed of 70 kilometers per hour i.e. 43.5 miles per hour. It has three abdomens and only two fingers on the feet.

शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||

The ostrich has the biggest eyes and largest egg in the world. The ostrich egg is so strong that a person of normal weight can easily stand on it. From this you can get an idea about the ostrich egg. Another feature of this is that the ostrich does not need to drink water and it walks by filling one to one and a half kilograms of pebbles in its stomach.

शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||

  1. Ostrich weighs 320 pounds and grows to a height of about 9 feet. According to this, the ostrich is the heaviest and tallest bird in the world. The emu is the second tallest bird in the world, reaching a height of 6.2 feet.
  2. Wild ostriches are found in the woodlands and savanna regions of Africa. Earlier, they were also found in Asia, Africa and Arabian Peninsula, but due to excessive hunting their numbers went down. However, ostriches are found in bird houses on all continents.
  3. The shiny objects lying on the ground attract the ostrich and he starts playing with them with his beak.
  4. Ostrich lays about 50 eggs in a year.
  5. Ostrich does not have teeth, so it eats its food by swallowing it. Its main food is fruits, seeds. Grass and small insects are spiders. Even after swallowing food, their digestive system is very good.
  6. These birds also eat pebbles, which help in digestion.
  7. Ostriches are neither completely vegetarian nor carnivorous. It also eats some insects along with plants, but most ostriches are herbivores.
  8. An ostrich bird's eyes are bigger than its brain.
  9. The color of the male ostrich bird is black and the color of the female bird is brown and white.
  10. Ostrich legs are very powerful. This can be gauged from the fact that the ostrich can kill a human or a predatory animal with its feet.
  11. An ostrich bird's egg is equal to 24 chicken eggs and the weight of one egg is about 1.6 kg.
  12. An ostrich weighs an average of 150 kg.
  13. The average lifespan of an ostrich is about 50 to 70 years.
  14. Ostrich can live for a long time without drinking water, but where they get water they also drink it and take bath with it.
  15. In many countries, ostrich meat is used in food and its skin is also used to make other things.
  16. Despite killing them, there is no fear of extinction of this bird, because at least 2 million ostriches are found all over the world.
  17. Ostrich is the oldest bird found on earth. They have been living on the earth for about 120 million years.
  18. Just as people ride horses, in some places ostriches are also ridden in the same way. Many years ago there used to be ostrich buggies too.
  19. Ostrich and zebra protect each other from predatory animals and protect each other. Ostrich's good eyesight and zebra's good deeds easily save them from any danger.
  20. In ancient Egypt, ostriches were considered a symbol of positivity. The god Deity Shu is depicted wearing the feathers of an ostrich and Goddess Ma'at, the goddess of justice, is shown wearing his head.
  21. It takes one hour to softboil an ostrich egg and one and a half hour to hardboil an ostrich egg.
  22. All female ostriches lay their eggs in a community nest called a dump nest. The Dump Nest is 30 to 60 cm deep and 3 m wide, which the male ostrich makes by digging the soil of the ground. This nest can handle a weight of about 60 eggs at a time.
  23. The responsibility of incubating the eggs is shared by both the male and the female.
  24. It takes 42 to 46 days to hatch a chick from an ostrich egg.
  25. The body of an ostrich does not have sweat glands and it does not have a food storage sac and gall bladder like other land birds.
  26. Most birds have 3 to 4 toes on their feet, while ostriches have only two toes, which are assisted or run very fast.
  27. It is said about Ostrich that seeing danger, they bury their head in the sand/ground, which is completely wrong. By doing this they will not be able to breathe and they will die. The ostrich builds a nest by digging the soil of the ground to lay eggs. Often to turn the eggs, they put their head in the nest, which looks as if they are burying their head in the sand/ground. When ostriches cannot run away when they feel threatened, they lie down with their head and neck parallel to the ground. Due to the light color of the head and neck mixing with the color of the sand/ground, it appears that they have buried their head in the sand/ground.
  28. A group of ostriches is called a 'flock'. A 'Flock' can have from 10 to 100 members. Usually they live in groups of 10.
  29. The ostrich egg is the largest egg in the world, measuring 6 inches in diameter and 3 pounds in weight. But the interesting thing is that the ostrich egg is also the smallest egg in the world when compared to the body size.
  30. Ostrich eggs contain 2000 calories, which is equivalent to the daily caloric requirement of an adult woman.
शुतुरमुर्ग के बारे में 30 रोचक तथ्य || 30 Interesting facts about Ostrich ||

सिद्धेश्वर धाम , नामची सिक्किम || Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim ||

सिद्धेश्वर धाम , नामची सिक्किम

नामची का शाब्दिक अर्थ आकाश का शिखर होता है। सिद्धेश्वर धाम एक हिंदू मंदिर है जो कि भारत के राज्य सिक्किम के नामची शहर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नामची अपने खूबसूरत तीर्थ स्थलों के कारण आज के समय में बहुत ही तेजी से पर्यटक स्थल के रूप में प्रसिद्ध हुआ है।

सिद्धेश्वर धाम,  नामची सिक्किम || Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim ||

महाकाव्य महाभारत में एक अध्याय है, जहां अर्जुन भगवान शिव से पशुपति अस्त्र प्राप्त करने के लिए तपस्या करते हैं, और तब भगवान शिव अर्जुन की कठिन तपस्या से खुश होकर अपने पशुपति अस्त्र का वरदान देते हैं। यह घटना नामची के सोलोफोक पहाड़ी पर हुई थी। भगवान शिव के अवतार की खुशी मनाने के लिए इस पहाड़ी पर 12 ज्योतिर्लिंगों और चार धाम का परिसर बनाया गया। इस परिसर का उद्घाटन नवंबर 2011 में जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज और कई धार्मिक गणमान्य लोगों द्वारा किया गया था।

सिद्धेश्वर धाम,  नामची सिक्किम || Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim ||

चार धाम, नामची शहर से 5 किलोमीटर दूर सोलोफोक पहाड़ी पर स्थित एक पवित्र मंदिर है, जिसे सिद्धेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है। इस पहाड़ी का मुख्य आकर्षण भगवान शिव की 108 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा है। यह मूर्ति पहाड़ी के पश्चिमी छोर पर स्थित है, जिसका मुख पूर्व दिशा की ओर है। यह मूर्ति 12 ज्योतिर्लिंगों से घिरी हुई है। यहां 12 ज्योतिर्लिंग का प्रतिकृति और पवित्र चार धाम के मॉडल हैं। चार धाम के चार मंदिर उत्तराखंड के बद्रीनाथ, उड़ीसा के पुरी, तमिलनाडु के रामेश्वरम और गुजरात के द्वारिकाधीश को समर्पित है। 12 ज्योतिर्लिंग अर्थात् सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओमकारेश्वर, केदारनाथ, भीमाशंकर, विश्वनाथ, वैद्यनाथ, नागेश्वर, त्रयंबकेश्वर, ग्रीष्णेश्वर और रामेश्वर हैं। नामची में इन सभी धामों के प्रतिरूप के रुप में एक ही जगह पर हम दर्शन कर सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां दर्शन करने पर मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

सिद्धेश्वर धाम,  नामची सिक्किम || Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim ||

मंदिर आकर्षक प्राकृतिक सुंदरता और शानदार पहाड़ी से घिरा हुआ है। सिक्किम की राजधानी गंगतोक से चार धाम पहुंचने में केवल 2 घंटे का समय लगता है। यह उन जगहों में से एक है जहां भरपूर शांति और प्राकृतिक दृश्य हमारा मन मोह लेते हैं।

ऐसा माना जाता है कि कोई मनुष्य अपने जीवन काल में चार धाम और 12 ज्योतिर्लिंगों का दर्शन नहीं कर सकता है।इसलिए सिद्धेश्वर मंदिर में चारों धामों और 12 ज्योतिर्लिंगों का एक ही स्थान पर दर्शन कर सकता है। चार धाम मंदिरों को मूल मंदिर के जैसा बनाने की पूरी कोशिश की गई है। सिद्धेश्वर मंदिर का वातावरण भक्ति पूर्ण है। मंदिर परिसर में सभी मंदिरों के दर्शन में लगभग 2 घंटे का समय लग जाता है।

पूजा करने के साथ-साथ एक और आकर्षक चीज है, जो हम मंदिर परिसर के अंदर कर सकते हैं। हम पारंपरिक वेशभूषा किराए पर लेकर स्थानीय फोटोग्राफरों द्वारा अपनी तस्वीरें खींचा सकते हैं। मंदिर से जुड़ा एक शाकाहारी भोजनालय और पार्किंग की सुविधा भी है।

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Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim

The literal meaning of Namchi is the peak of the sky. Siddheshwar Dham is a Hindu temple located at a distance of about 5 kilometers from the Indian state of Sikkim. Namchi has become famous as a tourist destination very fast in today's time due to its beautiful pilgrimage sites.

सिद्धेश्वर धाम,  नामची सिक्किम || Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim ||

There is a chapter in the epic Mahabharata, where Arjuna performs penance to obtain the Pashupati weapon from Lord Shiva, and then Lord Shiva, pleased with Arjuna's severe penance, grants him the boon of his Pashupati weapon. The incident took place on the Solophok hill in Namchi. A complex of 12 Jyotirlingas and Char Dham was built on this hill to celebrate the incarnation of Lord Shiva. The complex was inaugurated in November 2011 by Jagatguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Saraswati Maharaj and several religious dignitaries.

सिद्धेश्वर धाम,  नामची सिक्किम || Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim ||

Char Dham, also known as Siddheshwar Dham, is a holy temple situated on the Solophok hill, 5 km from Namchi town. The main attraction of this hill is the huge 108 feet high statue of Lord Shiva. This idol is situated at the western end of the hill, facing east. This idol is surrounded by 12 Jyotirlingas. There are replicas of 12 Jyotirlingas and models of the holy Char Dham. The four temples of Char Dham are dedicated to Badrinath in Uttarakhand, Puri in Orissa, Rameswaram in Tamil Nadu and Dwarkadhish in Gujarat. There are 12 Jyotirlingas namely Somnath, Mallikarjuna, Mahakaleshwar, Omkareshwar, Kedarnath, Bhimashankar, Vishwanath, Vaidyanath, Nageshwar, Trimbakeshwar, Grishneshwar and Rameshwar. We can have darshan in Namchi as a replica of all these Dhams at one place. It is believed that by visiting here one gets freedom from all sins.

सिद्धेश्वर धाम,  नामची सिक्किम || Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim ||

The temple is surrounded by alluring natural beauty and splendid hillocks. It takes only 2 hours to reach Char Dham from Gangtok, the capital of Sikkim. It is one of those places where the abundance of peace and natural scenery captivates us.

It is believed that a person cannot visit the Char Dham and 12 Jyotirlingas in his lifetime. Hence one can visit the four Dhams and 12 Jyotirlingas at one place in the Siddheshwar temple. Every effort has been made to make the Char Dham temples like the original temple. The atmosphere of Siddheshwar temple is full of devotion. It takes about 2 hours to visit all the temples in the temple premises.

सिद्धेश्वर धाम,  नामची सिक्किम || Siddheshwar Dham, Namchi Sikkim ||

Along with worshiping there is another fascinating thing that we can do inside the temple premises. We can rent traditional costumes and have our photographs taken by local photographers. There is also a vegetarian eatery and parking facilities attached to the temple.

अनाहत नाद : हृदय केन्द्र || शरीर विज्ञान व सातचक्र ||

अनाहत नाद : हृदय केन्द्र

शाश्वत ध्वनि 
ॐ ध्वनि

शरीर विज्ञान व सातचक्र

अनाहत चक्र हृदय के निकट सीने के बीच में स्थित है। इसका मंत्र यम(YAM)है। अनाहत चक्र का रंग हलका नीला, आकाश का रंग है। इसका समान रूप तत्त्व वायु है। वायु प्रतीक है-स्वतंत्रता और फैलाव का। इसका अर्थ है कि इस चक्र में हमारी चेतना अनंत तक फैल सकती है।

अनाहत चक्र आत्मा की पीठ (स्थान) है। अनाहत चक्र के प्रतीक चित्र में बारह पंखुडिय़ों का एक कमल है। यह हृदय के दैवीय गुणों जैसे परमानंद, शांति, सुव्यवस्था, प्रेम, संज्ञान, स्पष्टता, शुद्धता, एकता, अनुकंपा, दयालुता, क्षमाभाव और सुनिश्चिय का प्रतीक है। तथापि, हृदय केन्द्र भावनाओं और मनोभावों का केन्द्र भी है। इसके प्रतीक छवि में दो तारक आकार के ऊपर से ढाले गए त्रिकोण हैं। एक त्रिकोण का शीर्ष ऊपर की ओर संकेत करता है और दूसरा नीचे की ओर। जब अनाहत चक्र की ऊर्जा आध्यात्मिक चेतना की ओर प्रवाहित होती है, तब हमारी भावनाएं भक्ति, शुद्ध, ईश्वर प्रेम और निष्ठा प्रकट करती है। तथापि यदि हमारी चेतना सांसारिक कामनाओं के क्षेत्र में डूब जाती है, तब हमारी भावनाएं भ्रमित और असंतुलित हो जाती हैं। तब होता यह है कि इच्छा, द्वेष-जलन, उदासीनता और हताशा भाव हमारे ऊपर छा जाते हैं।

अनाहत नाद : हृदय केन्द्र || शरीर विज्ञान व सातचक्र ||

अनाहत, ध्वनि (नाद) की पीठ है। इस चक्र पर एकाग्रता व्यक्ति की प्रतिभा को लेखक या कवि के रूप में विकसित कर सकती है। अनाहत चक्र से उदय होने वाली दूसरी शक्ति संकल्प शक्ति है जो इच्छा पूर्ति की शक्ति है। जब आप किसी इच्छा की पूर्ति करना चाहते हैं, तब अपने हृदय में इसे एकाग्रचित्त करें। आपका अनाहत चक्र जितना अधिक शुद्ध होगा उतनी ही शीघ्रता से आपकी इच्छा पूरी होगी।

अनाहत चक्र का प्रतीक पशु कुरंग (हिरण) है जो अत्यधिक ध्यान देने और चौकन्नेपन का हमें स्मरण कराता है। इस चक्र के देवता शिव और पार्वती हैं, जो चेतना और प्रकृति के प्रतीक हैं। इस चक्र में दोनों को सुव्यवस्था में एक हो जाना चाहिए।