Cricket News: Latest Cricket News, Live Scores, Results, Upcoming match Schedules | Times of India

Sportstar - IPL

करने से पहले सोचो : पंचतंत्र

करने से पहले सोचो

उपायं चिन्तयेत्प्रज्ञास्त्थाSपायं च चिन्तयेत्। 

उपाय की चिन्ता के साथ, तज्जन्य अपाय या 
दुष्परिणाम की भी चिन्ता कर लेनी चाहिए।

करने से पहले सोचो : पंचतंत्र

जंगल के एक बड़े वटवृक्ष की खोल में बहुत-से बगुले रहते थे। उसी वृक्ष की जड़ में एक सांप भी रहता था। वह बगुलों के छोटे-छोटे बच्चों को खा जाता था।

एक बगुला सांप द्वारा बार-बार बच्चों के खाए जाने पर बहुत दु:खी और विरक्त-सा होकर नदी के किनारे आ बैठा। उसकी आंखों में आंसू भरे हुए थे। उसे इस प्रकार दु:खमग्न देखकर एक केकड़े ने पानी से निकालकर उसे कहा - मामा ,क्या बात है? आज रो क्यों रहे हो?

करने से पहले सोचो : पंचतंत्र

बगुले ने कहा - भैया! बात यह है कि मेरे बच्चों को सांप बार-बार खा जाता है। कुछ उपाय नहीं सूझता,किस प्रकार सांप का नाश किया जाए? तुम्हीं कोई उपाय बताओ।

केकड़ी ने मन में सोचा, यह बगुला मेरा जन्मबैरी है। इसे ऐसा उपाय बताऊंगा, जिससे सांप के नाश के साथ-साथ इसका भी नाश हो जाए। यह सोचकर वह बोला:

मामा , एक काम करो! मांस के कुछ टुकड़े लेकर नेवले के बिल के सामने डाल दो। इसके बाद बहुत से टुकडे उस बिल से शुरू करके सांप के बिल तक बिखेर दो। नेवला उन टुकड़ों को खाता - खाता सांप के बिल तक आ जाएगा और वहां सांप को भी देख कर उसे मार डालेगा। 

करने से पहले सोचो : पंचतंत्र

बगुले ने ऐसा ही किया। नेवले ने सांप को तो खा लिया, किंतु सांप के बाद उस वृक्ष पर रहने वाले बगुलों को भी खा डाला।

बगुले ने उपाय तो सोचा, किंतु उसने अन्य दुष्परिणाम नहीं सोचे। अपनी मूर्खता का फल उसे मिल गया। पाप बुद्धि ने भी उपाय तो सोचा, किंतु अपाय नहीं सोचा।

करटक ने कहा - इसी तरह दमनक तूने भी उपाय तो किया, किंतु अपाय की चिंता नहीं की। तू भी पापबुद्धि के समान ही मुर्ख है। तेरे जैसे पापबुद्धि के साथ रहना भी दोषपूर्ण है। आज से तू मेरे पास मत आना। जिस स्थान पर ऐसे - ऐसे अनर्थ हों वहां से दूर ही रहना चाहिए। जहां चूहे मन भर की तराजू को खा जाएं, वहां यह भी संभव है कि चील बच्चे को उठाकर ले जाए। 

दमक में पूछा - कैसे?          

करटक ने तब लोहे की तराजू की एक कहानी सुनाई। 

जैसे को तैसा 

To be continued ...

तोता: रबिंद्रनाथ टैगोर की कहानी

Rabindranath Tagore 

आज रविन्द्र नाथ टैगोर की एक कहानी पढ़ी "तोता", दिल को छू गई। आप सभी के साथ शेयर कर रही हूं। कहानी कैसी लगी, अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजियेगा...


एक था तोता 

एक था तोता। वह बड़ा मूर्ख था। गाता तो था, पर शास्त्र नहीं पढ़ता था। उछलता था, फुदकता था, उड़ता था, पर यह नहीं जानता था कि क़ायदा-क़ानून किसे कहते हैं?

तोता: रबिंद्रनाथ टैगोर की कहानी

राजा बोले, “ऐसा तोता किस काम का? इससे लाभ तो कोई नहीं, हानि ज़रूर है। जंगल के फल खा जाता है, जिससे राजा-मंडी के फल-बाज़ार में टोटा पड़ जाता है।”

मंत्री को बुलाकर कहा, “इस तोते को शिक्षा दो।”

तोते को शिक्षा देने का काम राजा के भांजे को मिला।

पंडितों की बैठक हुई। विषय था, “उक्त जीव की अविद्या का कारण क्या है?” बड़ा गहरा विचार हुआ।

सिद्धान्त ठहरा: तोता अपना घोंसला साधारण खर-पात से बनाता है। ऐसे आवास में विद्या नहीं आती। इसलिए सबसे पहले तो यह आवश्यक है कि इसके लिए कोई बढ़िया-सा पिंजरा बना दिया जाए।

राज-पंडितों को दक्षिणा मिली और वे प्रसन्न होकर अपने-अपने घर गए।

सुनार बुलाया गया। वह सोने का पिंजरा तैयार करने में जुट पड़ा। पिंजरा ऐसा अनोखा बना कि उसे देखने के लिए देश-विदेश के लोग टूट पडे। कोई कहता, “शिक्षा की तो इति हो गयी।” कोई कहता, “शिक्षा न भी हो तो क्या, पिंजरा तो बना। इस तोते का भी क्या नसीब है?”

सुनार को थैलियां भर-भरकर इनाम मिला। वह उसी घड़ी अपने घर की ओर रवाना हो गया।

पंडितजी तोते को विद्या पढ़ाने बैठे। नस लेकर बोले, “यह काम थोड़ी पोथियों का नहीं है।”

राजा के भांजे ने सुना। उन्होंने उसी समय पोथी लिखनेवालों को बुलवाया। पोथियों की नक़ल होने लगी। नक़लों के और नक़लों की नक़लों के पहाड़ लग गए। जिसने भी देखा, उसने यही कहा कि, “शाबाश! इतनी विद्या के धरने को जगह भी नहीं रहेगी।”

नक़लनवीसों को लद्दू बैलों पर लाद-लादकर इनाम दिए गए। वे अपने-अपने घर की ओर दौड़ पड़े। उनकी दुनिया में तंगी का नाम-निशान भी बाक़ी न रहा।

दामी पिंजरे की देख-रेख में राजा के भांजे बहुत व्यस्त रहने लगे। इतने व्यस्त कि व्यस्तता की कोई सीमा न रही। मरम्मत के काम भी लगे ही रहते। फिर झाडू-पोंछ और पालिश की धूम भी मची ही रहती थी। जो ही देखता, यही कहता कि “उन्नति हो रही है।”

इन कामों पर अनेक-अनेक लोग लगाये गये और उनके कामों की देख-रेख करने पर और भी अनेक-अनेक लोग लगे। सब महीने-महीने मोटे-मोटे वेतन ले-लेकर बड़े-बड़े सन्दूक भरने लगे ।

वे और उनके चचेरे-ममेरे-मौसेरे भाई-बंद बड़े प्रसन्न हुए और बड़े-बड़े कोठों-बालाखानों में मोटे-मोटे गद्दे बिछाकर बैठ गये। 

संसार में और-और अभाव तो अनेक हैं, पर निन्दकों की कोई कमी नहीं है। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं। वे बोले, “पिंजरे की तो उन्नति हो रही है, पर तोते की खोज़-ख़बर लेने वाला कोई नहीं है। 

बात राजा के कानों में पड़ी। उन्होंने भांजे को बुलाया और कहा, “क्यों भानजे साहब, यह कैसी बात सुनाई पड़ रही है? ”

भांजे ने कहा, “महाराज, अगर सच-सच बात सुनना चाहते हों तो सुनारों को बुलाइये, पण्डितों को बुलाइये, नक़लनवीसों को बुलाइये, मरम्मत करनेवालों को और मरम्मत की देखभाल करने वालों को बुलाइये। निन्दकों को हलवे में हिस्सा नहीं मिलता, इसलिए वे ऐसी ओछी बात करते हैं। 

जवाब सुनकर राजा नें पूरे मामले को भली-भांति और साफ़-साफ़ तौर से समझ लिया। भांजे के गले में तत्काल सोने के हार पहनाये गये। 

राजा का मन हुआ कि एक बार चलकर अपनी आंखों से यह देखें कि शिक्षा कैसे धूमधड़ाके से और कैसी बगटुट तेज़ी के साथ चल रही है। सो, एक दिन वह अपने मुसाहबों, मुंहलगों, मित्रों और मन्त्रियों के साथ आप ही शिक्षा-शाला में आ धमके। 

उनके पहुंचते ही ड्योढ़ी के पास शंख, घड़ियाल, ढोल, तासे, खुरदक, नगाड़े, तुरहियां, भेरियां, दमामें, कांसे, बांसुरिया, झाल, करताल, मृदंग, जगझम्प आदि-आदि आप ही आप बज उठे। 

पंडित गले फाड़-फाड़कर और बूटियां फड़का-फड़काकर मन्त्र-पाठ करने लगे। मिस्त्री, मजदूर, सुनार, नक़लनवीस, देख-भाल करने वाले और उन सभी के ममेरे, फुफेरे, चचेरे, मौसेरे भाई जय-जयकार करने लगे।

भांजा बोला, “महाराज, देख रहे हैं न?”

महाराज ने कहा, “आश्चर्य! शब्द तो कोई कम नहीं हो रहा।

भांजा बोला, “शब्द ही क्यों, इसके पीछे अर्थ भी कोई कम नहीं।”

राजा प्रसन्न होकर लौट पड़े। ड्योड़ी को पार करके हाथी पर सवार होने ही वाले थे कि पास के झुरमुट में छिपा बैठा निन्दक बोल उठा, “महाराज आपने तोते को देखा भी है?”

राजा चौंके. बोले, ”अरे हां! यह तो मैं बिल्कुल भूल ही गया था! तोते को तो देखा ही नहीं। ”

लौटकर पंडित से बोले, “मुझे यह देखना है कि तोते को तुम पढ़ाते किस ढंग से हो।”

पढ़ाने का ढंग उन्हें दिखाया गया। देखकर उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। पढ़ाने का ढंग तोते की तुलना में इतना बड़ा था कि तोता दिखाई ही नहीं पड़ता था। राजा ने सोचा: अब तोते को देखने की ज़रूरत ही क्या है? उसे देखे बिना भी काम चल सकता है। राजा ने इतना तो अच्छी तरह समझ लिया कि बंदोबस्त में कहीं कोई भूल-चूक नहीं है। पिंजरे में दाना-पानी तो नहीं था, थी सिर्फ़ शिक्षा। यानी ढेर की ढेर पोथियों के ढेर के ढेर पन्ने फाड़-फाड़कर क़लम की नोंक से तोते के मुंह में घुसेड़े जाते थे। गाना तो बन्द हो ही गया था, चिखने-चिल्लाने के लिए भी कोई गुंजायश नहीं छोड़ी गयी थी। तोते का मुंह ठसाठस भरकर बिल्कुल बन्द हो गया था। देखनेवाले के रोंगटे खड़े हो जाते।

अब दुबारा जब राजा हाथी पर चढ़ने लगे तो उन्होंने कान-उमेठू सरदार को ताकीद कर दी कि “निन्दक के कान अच्छी तरह उमेठ देना।”

तोता दिन पर दिन भद्र रीति के अनुसार अधमरा होता गया। अभिभावकों ने समझा कि प्रगति काफ़ी आशाजनक हो रही है। फिर भी पक्षी-स्वभाव के एक स्वाभाविक दोष से तोते का पिंड अब भी छूट नहीं पाया था। सुबह होते ही वह उजाले की ओर टुकुर-टुकुर निहारने लगता था और बड़ी ही अन्याय-भरी रीति से अपने डैने फड़फड़ाने लगता था। इतना ही नहीं, किसी-किसी दिन तो ऐसा भी देखा गया कि वह अपनी रोगी चोंचों से पिंजरे की सलाखें काटने में जुटा हुआ है।

कोतवाल गरजा, “यह कैसी बेअदबी है।”

फ़ौरन लुहार हाजिर हुआ. आग, भाथी और हथौड़ा लेकर।

वह धम्माधम्म लोहा-पिटाई हुई कि कुछ न पूछिये। लोहे की सांकल तैयार की गई और तोते के डैने भी काट दिये गए।

राजा के सम्बन्धियों ने हांड़ी-जैसे मुंह लटका कर और सिर हिलाकर कहा, “इस राज्य के पक्षी सिर्फ़ बेवकूफ़ ही नहीं, नमक-हराम भी हैं।”

और तब, पण्डितों ने एक हाथ में क़लम और दूसरे हाथ मे बरछा ले-लेकर वह कांड रचाया, जिसे शिक्षा कहते हैं।

लुहार की लुहसार बेहद फैल गयी और लुहारिन के अंगों पर सोने के गहने शोभने लगे और कोतवाल की चतुराई देखकर राजा ने उसे सिरोपा अता किया।

तोता मर गया। कब मरा, इसका निश्चय कोई भी नहीं कर सकता।

कमबख़्त निन्दक ने अफ़वाह फैलायी कि “तोता मर गया।”

राजा ने भांजे को बुलवाया और कहा, “भानजे साहब यह कैसी बात सुनी जा रही है? ”

भांजे ने कहा, “महाराज, तोते की शिक्षा पूरी हो गई है।”

राजा ने पूछा, “अब भी वह उछलता-फुदकता है? ”

भांजा बोला, अजी, राम कहिये। ”

“अब भी उड़ता है?”

“ना:, क़तई नहीं।”

“अब भी गाता है?”

“नहीं तो। ”

“दाना न मिलने पर अब भी चिल्लाता है?”

“ना।

राजा ने कहा, “एक बार तोते को लाना तो सही, देखूंगा ज़रा।

तोता लाया गया। साथ में कोतवाल आये, प्यादे आये, घुड़सवार आये।

राजा ने तोते को चुटकी से दबाया। तोते ने न हां की, न हूं की। हां, उसके पेट में पोथियों के सूखे पत्ते खड़खड़ाने ज़रूर लगे।

तोता: रबिंद्रनाथ टैगोर की कहानी

तेनालीराम और नीलकेतु || Tenaliram aur Neelketu

तेनालीराम और नीलकेतु 

राजा कृष्णदेव राय अपने दरबार में बैठे हुए थे, तभी वहां एक नीलकेतु नाम का व्यक्ति आया। नीलकेतु काफी दुबला-पतला व्यक्ति था। वो दरबार में पहुंचा और राजा कृष्णदेव राय को बताया कि वो नीलदेश से आया है और अभी वो विश्व भ्रमर के मकसद से इस यात्रा पर निकला है। उसने राजा को यह भी बताया कि सभी जगह घूमने के बाद वो राजा के दरबार में पहुंचा है।   

तेनालीराम और नीलकेतु || Tenaliram aur Neelketu

इतना सब कुछ सुनता राजा कृष्णदेव राय काफी खुश हुए, फिर राजा ने उसका स्वागत विशेष मेहमान के रूप में किया। राजा द्वारा किए गए सम्मान और सत्कार को देखकर नीलकेतु काफी खुश हुआ। उसने राजा से बोला- "महाराज! मैं उस जगह के बारे में जानता हूं, जहां कई सारी परियां रहती हैं। मैं अपने जादू से उन्हें बुला भी सकता हूं।" 

यह सुनकर राजा कृष्णदेव राय काफी खुश हुए और उत्सुक होते हुए बोले - "अच्छा, ऐसा भी हो सकता है क्या? चलो बताओ इसके लिए मुझे क्या करना होगा?"             

यह सुनकर नीलकेतु ने राजा को रात में तालाब के पास आने को कहा और बोला कि वो परियों को मनोरंजन और नृत्य के लिए बुला सकता है। यह सुनकर राजा ने नीलकेतु की बात मान ली। फिर जैसे ही रात हुई, राजा अपने घोड़े पर बैठकर तालाब की ओर चल दिए। राजा जैसे ही तालाब के पास पहुंचे, तो वहां पास ही में एक किले के सामने नीलकेतु राजा का इंतजार कर रहा था। राजा उसके पास पहुंचे, तो नीलकेतु ने उनका स्वागत करते हुए कहा - "महाराज! मैंने सारा इंतजाम कर लिया है और सारी परियां किले के अंदर ही मौजूद हैं।"

राजा जैसे ही नीलकेतु के साथ किले के अंदर जाने लगे, तभी राजा के सैनिकों ने नीलकेतु को बंधक बना लिया। यह देख राजा हैरान रह गए।

महाराज ने पूछा - "यह सब क्या हो रहा है? तुम सब ने इसे बंधक क्यों बना लिया है?" तभी किले के अंदर से तेनालीराम बाहर आए और उन्होंने कहा - "महाराज! मैं बताता हूं कि क्या हो रहा है?"     

तेनालीराम ने बताना शुरू किया -"महाराज! यह नीलकेतु कोई यात्रा करने वाला नहीं है, बल्कि नीलदेश का रक्षा मंत्री है और उसने धोखे से आपको यहां बुलाया है। किले के अंदर कोई परियां नहीं है। यह सिर्फ आपको यहां मारने के लिए लेकर आया था।" 

यह सुनकर राजा ने तेनालीराम को अपनी जान बचाने के लिए धन्यवाद किया और पूछा - "तुम्हें इस बात का पता कैसे लगा तेनालीरामन?"          

तब तेनालीराम ने कहा - "महाराज, पहले दिन ही जब वो दरबार में आया था, उसी दिन मुझे इस पर शक हो गया था। उसके बाद मैंने इसके पीछे अपने साथियों को जासूसी के लिए लगा दिया था, जिससे मुझे पता चला कि यह आपको मारने की योजना बना रहा था।" तेनालीराम की सूझबूझ के लिए राजा कृष्णदेव राय ने उन्हें धन्यवाद दिया।

English Translate

Tenaliram and Neelketu

King Krishnadeva Raya was sitting in his court when a person named Neelketu came there. Neelketu was a very thin person. He reached the court and told King Krishnadev Raya that he had come from Nildesh and now he has gone on this journey for the purpose of world illusion. He also told the king that after roaming all over the place, he had reached the king's court.

तेनालीराम और नीलकेतु || Tenaliram aur Neelketu

Hearing all this, King Krishnadev Raya was very happy, then the king welcomed him as a special guest. Neelketu was overjoyed to see the respect and hospitality accorded to him by the king. He said to the king- "Maharaj! I know of a place where many fairies live. I can even summon them by my magic."

Hearing this, King Krishna Deva Raya was very happy and said being curious - "Well, can this also happen? Let's tell what I have to do for this?"

Hearing this, Neelketu asked the king to come near the pond at night and said that he could invite the fairies for entertainment and dance. Hearing this, the king agreed to Neelketu. Then as soon as the night came, the king sat on his horse and walked towards the pond. As soon as the king reached near the pond, Neelketu was waiting for the king in front of a fort nearby. When the king reached him, Neelketu welcomed him and said - "Maharaj! I have made all the arrangements and all the fairies are present inside the fort."

As soon as the king started going inside the fort with Neelketu, only then the king's soldiers took Neelketu hostage. The king was surprised to see this.

Maharaj asked - "What is all this happening? Why have you all taken it hostage?" Then Tenaliram came out from inside the fort and said - "Maharaj! I will tell what is happening?"

Tenaliram started telling - "Maharaj! This Nileketu is not a traveller, but the defense minister of Nildesh and he has called you here by deceit. There are no fairies inside the fort. It just brought you here to kill you." Was."

Hearing this, the king thanked Tenaliram for saving his life and asked - "How did you come to know about this, Tenaliraman?"

Then Tenaliram said - "Maharaj, on the very first day when he came to the court, I had doubts about it. After that I had put my comrades behind it for spying, from which I came to know that it was you. Was planning to kill." King Krishnadeva Raya thanked Tenalirama for his wisdom.

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति' || Increasing 'drug trend' among youth ||

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'

हमारा यह समाज आज बहुत ही तेजी से आधुनिक होता जा रहा है। दिन प्रतिदिन हमें नई- नई खोजें देखने को मिलती हैं। हमारा हिंदुस्तान युवाओं से भरा एक देश है। इन सबके बीच एक चिंता का विषय भी है, हमारे समाज के अधिकतर युवा पीढ़ी किसी ना किसी नशे की लत की आदी होती जा रही है, जो हमारी युवाओं के लिए आने वाले समय में बहुत ही घातक सिद्ध हो सकता है। 

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||

आज हर वर्ग का व्यक्ति हर वर्ग का युवा चाहे वह स्कूल में हो, कॉलेज में हो या किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहा हो, किसी ना किसी नशे की लत उसको लगी हुई है। नशा एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जो हमारे युवा पीढ़ी को दिन प्रतिदिन बर्बादी की खाई में ढकेलता जा रहा है, जिसके कारण मनुष्य बहुत सी बीमारियों से ग्रसित होता जा रहा है और मनुष्य की आयु दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। 

नशे की ओर आकर्षित होने के बहुत से कारण हैं, जिनमें मूल कारण कहीं ना कहीं पारिवारिक व्यस्तता भी है। मां- बाप अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने एवं हर आधुनिक वस्तु अपने संतान को देना चाहते हैं। इसी कारण कई घरों में कई परिवारों में मां-बाप दोनों किसी का किसी प्रकार के काम में सम्मिलित होते हैं, जिसके कारण उनका पूरा ध्यान अपने बच्चों पर नहीं रहता। यही वजह है कि बच्चे गलत संगति में फंसकर इन नशे की वस्तुओं का उपयोग करने लगते हैं। हर मां बाप का कर्तव्य है कि अपने बच्चे की दिनचर्या पर पूर्ण ध्यान रखें। 

युवा वर्ग में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति वास्तव में चिंताजनक है। युवा उचित मार्गदर्शन के अभाव में नशा करते हैं। किशोरावस्था के बालकों पर खास ध्यान देना बहुत ही जरुरी है। उनकी संगत पर निगाह रखी जाए। संगत ठीक हो तो बच्चे नशे के जाल से बच जाते हैं।

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||

युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति के और भी अनेक कारण हैं। नशे की उपलब्धता एवं पहुंच आसान होने से भी नशे की प्रवृत्ति बढ़ी है। संयुक्त परिवार का विघटन होने से भी युवाओं को अधिक स्वतंत्रता मिली है। मीडिया ने भी नशे के कारोबार को प्रचारित किया है। वर्तमान में बढ़ती बेरोजगारी में मानसिक अवसाद दूर करने के लिए भी युवा नशे का सहारा लेते हैं। अत: इन सब पर ध्यान देकर हमें समस्या का निराकरण करना होगा।

बेरोजगारी, आधुनिक दिखने का भ्रम, प्रेम में हताशा, सद् शिक्षा का अभाव, भ्रामक विचारधाराओं में उलझना, सामाजिक एवं पारिवारिक अनुशासन के प्रति विद्रोह की भावना, हाईप्रोफाइल जीवनशैली की लालसा जैसे अनेक कारण अवसाद की वजह हैं। इससे युवाओं में नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। युवा अपनी क्षमता को पहचानें, दूसरों से अपनी तुलना ना करें। नशे में खो जाना कायरता है। खेलों से जुड़ें। परोपकार के काम करें। इसी से अच्छे समाज का निर्माण होगा।

युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए सरकार को नशे से संबंधित सामानों पर पूर्णत: प्रतिबंध लगाना चाहिए। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया व सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए और युवाओं में जो नशे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, उसे पूर्णत: खत्म करने का प्रयास करना चाहिए।

English Translate

Increasing 'drug trend' among youth

Today our society is becoming very modern very fast. Every day we get to see new discoveries. Our India is a country full of youth. In the midst of all this, there is also a matter of concern, most of the young generation of our society is becoming addicted to some kind of drug addiction, which can prove to be very fatal for our youth in the coming times.

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||

Today, the youth of every class, whether it is in school, college or working in a multinational company, is addicted to some kind of drug addiction. Drug addiction is such a food item, which is pushing our young generation into the abyss of waste day by day, due to which man is suffering from many diseases and man's life is decreasing day by day.

There are many reasons for being attracted towards drugs, in which the root cause is also family busyness somewhere. Parents want to give good education to their children and give every modern thing to their children. For this reason, in many homes, in many families, both parents are involved in some kind of work, due to which their full attention is not given to their children. This is the reason why children get trapped in the wrong company and start using these intoxicants. It is the duty of every parent to take full care of their child's routine.

The increasing trend of drug addiction among the youth is really worrying. Youth indulge in drugs due to lack of proper guidance. It is very important to pay special attention to the children of adolescence. Keep an eye on their company. If the company is right, then the children are saved from the trap of intoxication.

There are many other reasons for the increasing trend of drug addiction among the youth. Due to the availability and ease of access to drugs, the tendency of drug addiction has also increased. The dissolution of the joint family has also given more freedom to the youth. The media has also publicized the drug business. In the current rising unemployment, youth also resort to drugs to overcome mental depression. So by paying attention to all these, we have to solve the problem.

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||

Unemployment, illusion of modern appearance, frustration in love, lack of good education, entanglement in deceptive ideologies, feeling of rebellion against social and family discipline, craving for high profile lifestyle are the reasons for depression. Due to this, the tendency of drug addiction is increasing among the youth. Know your potential, don't compare yourself to others. Getting drunk is cowardice. Join the Games. Do charity work. This will create a good society.

In order to stop the increasing trend of drug addiction among the youth, the government should completely ban the drug related goods. Awareness campaign should be conducted with the help of social media, print media and social organizations and efforts should be made to eliminate the drug addiction which is increasing in the youth.

युवा वर्ग में बढ़ती 'नशे की प्रवृत्ति'  || Increasing 'drug trend' among youth ||


मनसा देवी मंदिर हरिद्वार || Manasa Devi Temple, Haridwar ||

मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार (Manasa Devi Temple, Haridwar)

उत्तरांचल के हरिद्वार के पहाड़ियों में बसा माता मनसा देवी मंदिर का अधिक महत्व बताया गया है। मनसा देवी मंदिर का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि यह देवी सर्प दोष दूर करती हैं। विष्णु पुराण के अनुसार मनसा देवी एक नागकन्या थीं। मनसा देवी की पूजा से धन संबंधी समस्या रोगों से मुक्ति और घर की समस्त बाधा दूर होती है।

मनसा देवी मंदिर हरिद्वार  || Manasa Devi Temple, Haridwar ||

मनसा देवी मां की उत्पत्ति

भगवान शिव और माता पार्वती की एक पुत्री थी जिसका नाम मनसा देवी था। यह मस्तक से उत्पन्न हुई थीं इसलिए उनका नाम मनसा देवी पड़ा। मनसा देवी को कश्यप ऋषि की पुत्री भी कहा गया है, क्योंकि कश्यप ऋषि के मन से उत्पन्न होने के कारण देवी का नाम मनसा रखा गया।मनसा देवी के दो बड़े भाई और दो छोटी बहनें हैं जिनका नाम क्रमशः कार्तिकेय, अय्यप्पा, देवी ज्योति और देवी अशोक सुंदरी है।

मनसा देवी मंदिर हरिद्वार  || Manasa Devi Temple, Haridwar ||

उनके छोटे भाई गणेश हैं। मनसा देवी का विवाह जरत्कारु के साथ किया गया था और उनसे उनका एक पुत्र हुआ, जिसका नाम आस्तिक था

मनसा का अर्थ अभिलाषा से भी होता है। हरिद्वार की शिवालिक पहाडि़यों पर स्थित मनसा देवी का मन्दिर अत्यन्त प्राचीन और सिद्धपीठों में से एक है। मनसा देवी के मन्दिर में एक मूर्ति के पॉच मुख और दस भुजायें है और दूसरी मूर्ति की अठारह भुजायें व एक मुख है। इनके पति जगत्कारु तथा पुत्र आस्तिक जी हैं। इन्हें नागराज वासुकी की बहन के रूप में पूजा जाता है, प्रसिद्ध मंदिर एक शक्तिपीठ पर हरिद्वार में स्थापित है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अंतर्गत एक नागकन्या थी जो शिव तथा कृष्ण की भक्त थी। उसने कई युगों तक तप किया तथा शिव से वेद तथा कृष्ण मंत्र का ज्ञान प्राप्त किया जो मंत्र आगे जाकर कल्पतरु मंत्र के नाम से प्रचलित हुआ। उस कन्या ने पुष्कर में तप कर कृष्ण के दर्शन किए तथा उनसे सदैव पूजित होने का वरदान प्राप्त किया।

मनसा देवी मंदिर हरिद्वार  || Manasa Devi Temple, Haridwar ||

English Translate

Manasa Devi Temple, Haridwar

The importance of Mata Mansa Devi temple, situated in the hills of Haridwar of Uttaranchal, has been told. The importance of Mansa Devi temple is also because this goddess removes snake defects. According to Vishnu Purana, Manasa Devi was a Nagakanya. Worshiping Mansa Devi removes money related problems, diseases and removes all obstacles in the house.

मनसा देवी मंदिर हरिद्वार  || Manasa Devi Temple, Haridwar ||

Origin of Mansa Devi Maa

Lord Shiva and Mother Parvati had a daughter named Mansa Devi. She was born from the head, hence she was named Mansa Devi. Manasa Devi is also said to be the daughter of Kashyapa Rishi, as the goddess was named Manasa due to her origin from the mind of Kashyap Rishi. Manasa Devi has two elder brothers and two younger sisters named respectively Kartikeya, Ayyappa, Devi Jyoti and Goddess Ashok is Sundari.

मनसा देवी मंदिर हरिद्वार  || Manasa Devi Temple, Haridwar ||

His younger brother is Ganesh. Manasa Devi was married to Jaratkaru and they had a son, Aastik.

Manasa also means desire. Situated on the Shivalik hills of Haridwar, the temple of Mansa Devi is one of the most ancient and Siddhapeeths. In the temple of Mansa Devi, one idol has five faces and ten arms and the other idol has eighteen arms and one face. Her husband is Jagatkaru and son is Aastik. She is worshiped as the sister of Nagraj Vasuki, the famous temple situated in Haridwar on a Shaktipeeth. Under the Brahmavaivarta Purana, there was a Nagakanya who was a devotee of Shiva and Krishna. He meditated for many ages and received the knowledge of Vedas and Krishna mantra from Shiva, which later became popular as Kalpataru Mantra. After doing penance in Pushkar, that girl had darshan of Krishna and got the boon of being worshiped from him forever.

मनसा देवी मंदिर हरिद्वार  || Manasa Devi Temple, Haridwar ||


जो कह दिया वह शब्द थे || Sunday.. इतवार ..रविवार ||

  इतवार (Sunday)

जो कह दिया वह शब्द थे || Sunday.. इतवार ..रविवार ||
"परिंदों को मंज़िल मिलेगी यक़ीनन,
ये फैले हुए उनके पंख बोलते हैं,
वो लोग रहते हैं खामोश अक्सर,
जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं..❤"

जो कह दिया वह शब्द थे

जो कह दिया वह शब्द थे ;
जो नहीं कह सके
वो अनुभूति थी..
और,
जो कहना है मगर ;
कह नहीं सकते,
वो मर्यादा है..

जिंदगी का क्या है ?
आ कर नहाया,
और,
नहाकर चल दिए..

बात पर गौर करना
पत्तों सी होती है
कई रिश्तों की उम्र,
आज हरे,
कल सूखे..

क्यों न हम,
जड़ों से;
रिश्ते निभाना सीखें 

रिश्तों को निभाने के लिए,
कभी अंधा,
कभी गूँगा,
और कभी बहरा,
होना ही पड़ता है 

बरसात गिरी
और कानों में इतना कह गई कि
'गर्मी' हमेशा किसी की भी नहीं रहती..

'नसीहत'
नर्म लहजे में ही
अच्छी लगती है..
क्योंकि,

'दस्तक' का मकसद,
दरवाजा खुलवाना होता है;
तोड़ना नहीं..

'घमंड'
किसी का भी नहीं रहा,
टूटने से पहले ,
गुल्लक को भी लगता है कि
सारे पैसे उसी के हैं..

जिस बात पर ,
कोई मुस्कुरा दे,
बात 
बस वही खूबसूरत है..

थमती नहीं,
जिंदगी कभी,
किसी के बिना..
मगर,
यह गुजरती भी नहीं,
अपनों के बिना 
जो कह दिया वह शब्द थे || Sunday.. इतवार ..रविवार ||
"समय बहुत ही कीमती है इसलिए
इसे अपने काम करने में लगाएं ना की
नेगेटिव लोगों की बातों को सुनने में..❤"

मित्र द्रोह का फल : पंचतंत्र

मित्र द्रोह का फल

किं करोत्येव पाण्डित्यमस्थाने विनियोजितम् 

अयोग्य को मिले ज्ञान का फल विपरीत ही होता है। 

मित्र द्रोह का फल : पंचतंत्र

किसी स्थान पर धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। एक दिन पापबुद्धि ने सोचा कि धर्मबुद्धि की सहायता से विदेश में जाकर धन पैदा किया जाए दोनों ने देश-देशान्तरों मैं घूमकर प्रचुर धन पैदा किया। जब वे वापस आ रहे थे, तो गांव के पास आकर पापबुद्धि ने सलाह दी की इतने धन के बंधु -बान्धवों के बीच नहीं ले जाना चाहिए। इसे देखकर ईर्ष्या होगी, लोभ होगा। किसी ने किसी बहाने वे बांटकर खाने का यत्न करेंगे। इसीलिए इस धन का ब‌ड़ा भाग ज़मीन में गाड़ देते हैं। जब जरूरत होगी लेते रहेंगे।

मित्र द्रोह का फल : पंचतंत्र

धर्मबुद्धि यह बात मान गया। ज़मीन में गड्ढा खोदकर दोनों ने अपना संचित धन वहां रख दिया और गांव में चले आए।

कुछ दिन बाद पापबुद्धि आधी रात को उसी स्थान पर जाकर सारा धन खोद लाया और ऊपर से मिट्टी डालकर गड्ढा भरकर चला आया।

दूसरे दिन वह धर्मबुद्धि के पास गया और बोला-मित्र! मेरा परिवार बड़ा है। मुझे फिर कुछ धन की ज़रूरत पड़ गई है। चलो, चलकर थोड़ा-थोड़ा और ले आएं।

धर्मबुद्धि मान गया। दोनों ने आकर जब ज़मीन खुदी और वह बर्तन निकाला जिसमें धन रखा था, तो देखा कि वह खाली है। पापबुद्धि सिर पीटकर रोने लगा-मैं लुट गया, धर्मबुद्धि ने मेरा धन चुरा लिया। मैं मर गाया, लुट गया।

दोनों अदालत में धर्माधिकारी के सामने पेश हुए। पाप बुद्धि ने कहा मैं गड्ढे के पास वाले वृक्ष के साक्षी मानने को तैयार‌ हूं। वे जिसे चोर कहेंगे, वह चोर माना जाएगा।

अदालत ने यह बात मान ली और निश्चय किया कि कल वृक्षों की साक्षी ली जाएगी और साक्षी पर ही निर्णय सुनाया जाएगा।

रात को पापबुद्धि ने अपने पिता से कहा-तुम अभी गड्ढे के पास वाले वृक्ष की खोखली जड़ में बैठ जाओ। जब धर्माधिकारी पूछे तो कह देना कि चोर धर्मबुद्धि है।

उसके पिता ने यह किया; वह सवेरे ही वहां जाकर बैठ गया धर्माधिकारी ने जब ऊंचे‌ स्वर।में पुकारा-हे वनदेवता! तुम्हीं साक्षी हो कि इन दोनों में चोर कौन है?

धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्रों की कहानी

तब वृक्ष की में बैठे हुए पापबुद्धि के पिता ने कहा:- धर्मबुद्धि चोर है, उसने ही धन चुराया है।

धर्माधिकारी तथा राजपुरुषों को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे अभी अपने धर्मग्रन्थों को देखकर निर्णय देने की तैयारी ही कर रहे थे कि धर्मबुद्धि ने उस वृक्ष को आग लगा दी, जहां से वह आवाज़ आई थी।

थोड़ी देर में पापबुद्धि का पिता आग से झुलसा हुआ उस वृक्ष की जड़ में से निकला। उसने वनदेवता की साक्षी का सच्चा भेद प्रकट कर दिया।

तब राजपुरुष ने पापबुद्धि को उसी वृक्ष की शाखाओं पर लटकाते हुए कहा कि मनुष्य का यह धर्म है कि वह उपाय की चिन्ता के साथ अपाय की भी चिन्ता करे। अन्यथा उसकी वही दशा होती है जो उन बगुलों की हुई थी। जिन्हे नेवले ने मार दिया था।

धर्मबुद्धि ने पूछा-कैसे? राजपुरुषों ने कहा-सुनो:

करने से पहले सोंचो 

                                                                                                                                        To be continued ...