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सौंफ और मिश्री साथ साथ खाने के फायदे

सौंफ और मिश्री साथ - साथ खाने के फायदे

भोजन करने के पश्चात सौंफ और मिश्री खाने का चलन बहुत पुराना है। साधारणतया कहीं भी रेस्टोरेंट, होटल या अन्यत्र बिल भरते समय मिलने वाली सौंफ और मिश्री को खाते समय हम यह नहीं सोचते कि यह स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हो सकती है, बल्कि इसका उपयोग माउथ फ्रेशनर के तौर पर किया जाता है। मिश्री और सौंफ एक साथ खाना सिर्फ एक माउथ फ्रेशनर ही नहीं है, अपितु दोनों में मौजूद पोषक तत्व मिलकर शरीर को कई लाभ पहुंचाते हैं। 

सौंफ और मिश्री साथ - साथ खाने के फायदे

जानते हैं सौंफ मिश्री को एक साथ खाने के फायदे

सौंफ में एंटी इन्फ्लेमेटरी, एंटी ऑक्सीडेंट, कैल्शियम, पोटेशियम आदि तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, तो मिश्री में विटामिन B1, B2, B12, आयरन आदि प्रचुर मात्रा में होते हैं। इसके साथ ही इसमें कैल्शियम, एंटीऑक्सीडेंट्स भी होते हैं। जब दोनों का साथ में सेवन करते हैं, तो वह शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाता है और साथ ही इम्यूनिटी को भी बढ़ाता है और यह पाचन शक्ति को मजबूत करता है।

पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में

सौंफ मिश्री को साथ में खाने से भोजन जल्दी पचता है। इससे पाचन क्रिया दुरुस्त होती है और पाचन तंत्र मजबूत होता है।

हीमोग्लोबिन

सौंफ और मिश्री का सेवन शरीर में रक्त परिसंचरण को सुधारता है और साथ ही हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाने में मदद करता है।

आंखों के लिए

सौंफ और मिश्री स्वाभाविक रूप से आंखों के स्वास्थ्य को ठीक करता है तथा दृष्टि में सुधार करता है। सौंफ मिश्री के साथ बादाम बराबर मात्रा में मिलाकर नियमित रूप से सेवन करने से आंखों के स्वास्थ्य लिए फायदेमंद होता है।

मानसिक एकाग्रता

सौंफ के साथ मिश्री खाने से शरीर और मन दोनों को ही लाभ पहुंचता है। इससे मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में मदद मिलती है।

सर्दी - जुकाम

सर्दी - जुकाम तथा गले में खराश होने पर सौंफ और मिश्री का सेवन चबा -चबाकर करने से गले को आराम मिलता है।

पेट दर्द और पेट में गैस बनने पर 

सौंफ और मिश्री साथ में खाने से शरीर को विटामिन सी की पूर्ति होती है, जिससे पेट की बीमारियों के लिए यह बहुत प्रभावी होती है और पेट के मरोड़ तथा दर्द और गैस की समस्या में फायदेमंद होता है।

सौंफ और मिश्री साथ - साथ खाने के फायदे

खून साफ करने में

सौंफ और मिश्री खाने से खून साफ होता है, जिससे त्वचा में चमक बढ़ती है। साथ ही पिंपल्स मुहासे और त्वचा पर दानों की समस्या भी दूर होती है।

कब्ज की समस्या

कब्ज की समस्या होने पर भोजन के कम से कम 15 मिनट बाद सौंफ और मिश्री का सेवन करें। इसके अलावा गुनगुने पानी के साथ सौंफ का सेवन करने से भी कब्ज की समस्या दूर होती है।

मुंह की बदबू

सौंफ और मिश्री का सेवन करने से इसमें मौजूद पोषक तत्व मुंह से आने वाली बदबू को दूर करने करते हैं। प्रतिदिन भोजन के बाद सौंफ और मिश्री खाने से मुंह में किसी भी प्रकार की बदबू नहीं आती तथा मुंह से अच्छी सुगंध आती है। यह दांत और मसूड़ों से संबंधित समस्याओं को भी दूर करने में सहायक होती है।

आलस से बचाने में

सौंफ के साथ मिश्री के सेवन का लाभ होता है। मिश्री अर्थात सीमित मात्रा में शुगर जब सौंफ के साथ शरीर में जाती है, तो वह शारीरिक तौर पर शिथिलता का एहसास नहीं होने देती है, क्योंकि भोजन करने के बाद सभी को कुछ समय के लिए आलस का अनुभव होता है। सौंफ और मिश्री का सेवन हमें उस आलस से बचाता है।

महिलाओं के लिए फायदेमंद

सौंफ और मिश्री खाने से मासिक धर्म में होने वाली समस्याओं में आराम मिलता है इसके साथ ही स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए भी यह फायदेमंद होता है इससे दूध पीने वाले बच्चे का भी पेट ठीक रहता है।

सौंफ और मिश्री साथ - साथ खाने के फायदे

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Benefits of eating fennel and sugar candy together

The practice of eating fennel and sugar candy after having a meal is very old. Generally, while eating fennel and sugar candy found anywhere while paying bills in restaurants, hotels or elsewhere, we do not think that it can be beneficial for health, but it is used as a mouth freshener. Eating sugar candy and fennel together is not just a mouth freshener, but the nutrients present in both together bring many benefits to the body.

सौंफ और मिश्री साथ - साथ खाने के फायदे

Know the benefits of eating fennel sugar together

Anti-inflammatory, anti-oxidant, calcium, potassium etc. elements are found in abundance in fennel, while vitamin B1, B2, B12, iron etc. are abundant in sugar candy. Along with this, it also contains calcium, antioxidants. When both are consumed together, it increases the level of hemoglobin in the body as well as increases immunity and it strengthens the digestive power.

strengthen the digestive system

Eating fennel sugar together helps in digesting the food quickly. It improves digestion and strengthens the digestive system.

hemoglobin

Consumption of fennel and sugar candy improves blood circulation in the body as well as helps in increasing the level of hemoglobin.

for the eyes

Fennel and sugar candy naturally improves eye health and improves vision. Mixing almonds with fennel sugar candy in equal quantity and consuming it regularly is beneficial for the health of the eyes.

mental concentration

Eating sugar candy with fennel benefits both the body and the mind. This helps in increasing mental concentration.

Cold and cough

In case of cold and sore throat, chewing fennel and sugar candy provides relief to the throat.

Abdominal pain and gas formation in the stomach

Eating fennel and sugar candy together provides vitamin C to the body, which makes it very effective for stomach diseases and beneficial in stomach cramps and pain and gas problem.

to clean the blood

Eating fennel and sugar candy purifies the blood, which increases the glow in the skin. Along with this, the problem of pimples, acne and pimples on the skin is also removed.

constipation problem

If there is a problem of constipation, take fennel and sugar candy at least 15 minutes after the meal. Apart from this, consuming fennel with lukewarm water also ends constipation.

mouth odor

By consuming fennel and sugar candy, the nutrients present in it remove the bad smell coming from the mouth. Eating fennel and sugar candy after every meal does not cause any kind of bad smell in the mouth and good aroma comes from the mouth. It is also helpful in removing problems related to teeth and gums.

to save from laziness

There is a benefit of consuming sugar candy with fennel. Mishri means when a limited amount of sugar enters the body with fennel, it does not allow one to feel sluggish physically, because after having a meal, everyone experiences lethargy for some time. Consuming fennel and sugar candy saves us from that laziness.

beneficial for women

Eating fennel and sugar candy provides relief in menstrual problems, as well as it is beneficial for lactating women.

सौंफ और मिश्री साथ - साथ खाने के फायदे

सौंफ । Indian Sweet Fennel । Saunf

मातृ वंदना || Sunday.. इतवार ..रविवार ||

  इतवार (Sunday)

Sunday.. इतवार ..रविवार
"एक छोटी सी चींटी 
हमारे पैर को काट सकती है,
पर हम, उसके पैर को नहीं काट सकते है,
इसलिए जिन्दगी में
किसी को छोटा ना समझें,
क्यूंकि वह जो कर सकता है
शायद बाकी वो ना कर पाएं ..❤"

मातृ वंदना 

नर जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणों पर, माँ
मेरे श्रम सिंचित सब फल

जीवन के रथ पर चढ़कर
सदा मृत्यु पथ पर बढ़ कर
महाकाल के खरतर शर सह
सकूँ, मुझे तू कर दृढ़तर

जागे मेरे उर में तेरी
मूर्ति अश्रु जल धौत विमल
दृग जल से पा बल बलि कर दूँ
जननि, जन्म श्रम संचित पल

बाधाएँ आएँ तन पर
देखूँ तुझे नयन मन भर
मुझे देख तू सजल दृगों से
अपलक, उर के शतदल पर

क्लेद युक्त, अपना तन दूंगा
मुक्त करूंगा तुझे अटल
तेरे चरणों पर दे कर बलि
सकल श्रेय श्रम संचित फल

    -सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

व्याख्या-

कवि कहते हैं, हे माँ! मुझे ऐसा आत्मबल दो कि मैं अपने मनुष्य जीवन के सारे स्वार्थों और अपने परिश्रम अर्जित सभी वस्तुओं को तुम्हारे चरणों पर न्योछावर कर दें।

मुझे इतना दृढ़ बना दो कि मैं जीवनरूपी रथ पर सवार होकर अर्थात् मृत्यु की चिंता किए बिना जीवन में आगे बढ़ते हुए, समय-समय पर आने वाले बाण की तरह कष्टदायक बाधा-विघ्नों को झेलते हुए तेरी सेवा करता रहूँ।

मेरे हृदय में तेरा। आँसूओं से धुला स्वच्छ स्वरूप साकार हो जाए। मैं परतन्त्रता में दुखी और आँसू बहाते तेरे रूप को मन में बसा लूं। तेरे आँसू मुझे इतना बल प्रदान करें कि मैं अपने सारे जीवन में परिश्रम से अर्जित सभी वस्तुएँ और जीवन भी तुझ पर बलिदान कर सकें।

कवि कहते हैं, हे मातृभूमि ! चाहे मेरे मार्ग में कितनी भी बाधाएँ आएँ पर मेरा ध्यान और मेरी दृष्टि सदा तुझ पर ही लगी रहे। हे माँ ! तू अपने आँसुओं भरे नेत्रों से एकटक देखती रहना। मुझे अपने हृदयरूपी कमल पर बैठाए रखना। मेरी याद मत भूलना।

मैं परिश्रम के पसीने से भीगे अपने शरीर को तुझे समर्पित कर दूंगा। बड़े से बड़ा बलिदान देकर भी मैं संदा के लिए तुझे स्वतन्त्र करा दूंगा। मैं अपने सारे श्रेष्ठ आचरणों और परिश्रम से प्राप्त सफलताओं और कीर्ति को तुझ पर न्योछावर कर दूंगा।

मातृ वंदना || Sunday.. इतवार ..रविवार ||

"खूबी और खामी..
दोनों ही हर इंसान में होती है। 
जो तराशता है उसे खूबी नज़र आती है,
जो तलाशता है उसे खामी नज़र आती है..❤"

एक और एक ग्यारह : पंचतंत्र

एक और एक ग्यारह

बहूनामप्यससाराणां  समवायो हि दुर्जयः 

छोटे और निर्बल भी संख्या में बहुत होकर दुर्जेय हो जाते हैं। 

एक और एक ग्यारह : पंचतंत्र

जंगल में वृक्ष की एक शाखा पर चिड़ा-चिड़ी का जोड़ा रहता था। उनके अंडे भी उसी शाखा पर बने घोसले में थे। एक दिन मतवाला हाथी वृक्ष की छाया में विश्राम करने आया। वहां उसने अपनी सूंड में पकड़कर वही शाखा तोड़ दी, जिस पर चिड़ियों का घोंसला था। अंडे जमीन पर गिरकर टूट गए। 

चिड़िया अपने अंडों के टूटने से बहुत दुखी हो गई। उसका विलाप सुनकर उसका मित्र कठफोड़ा भी वहां आ गया। उसने शोकातुर चिड़ा चिड़ी को धीरज बढ़ाने का बहुत यत्न किया, किंतु उसका विलाप शांत नहीं हुआ।  चिड़िया ने कहा - यदि तू हमारा सच्चा मित्र है, तो मतवाले हाथी से बदला लेने में हमारी सहायता कर। उसको मार कर ही हमारे मन को शांति मिलेगी। 

कठफोड़ ने कुछ सोचने के बाद कहा - यह काम हम दोनों से ही नहीं होगा, इसमें दूसरों से भी सहायता लेनी पड़ेगी। एक मक्खी मेरी मित्र है; उसकी आवाज बहुत सुरीली है, उसे भी बुला लेता हूं। 

मक्खी ने भी जब कठफोड़े और चिड़िया की बात सुनी तो वह मतवाले हाथी को मारने में उनको सहयोग देने को तैयार हो गई। किंतु उसने कहा कि यह काम हम तीन का ही नहीं, हमें औरों की भी सहायता लेनी चाहिए। मेरा मित्र एक मेंढक है, उसे भी बुला लाऊँ। 

तीनों ने जाकर मेघनाद नाम के मेंढक को अपनी दुख भरी कहानी सुनाई। उनकी बात सुनकर मेंढक भी मतवाले हाथी के विरुद्ध षडयंत्र में शामिल हो गया। उसने कहा - तभी तो मैं कहती हूं कि छोटे और निर्बल भी मिल-जुल कर बड़े-बड़े जानवरों को मार सकते हैं। 

चिड़िया और हाथी की कहानी

टिटिहरा - अच्छी बात है। मैं भी दूसरे पक्षियों की सहायता से समुंद्र को सुखाने का यत्न करूंगा। 

यह कहकर उसने बगुले, सारस, मोर आदि अनेक पक्षियों को बुलाकर अपनी दुख कथा सुनाई। उन्होंने कहा- हम तो अशक्त है, किंतु हमारा राजा गरुड़ अवश्य इस संबंध में हमारी सहायता कर सकता है। तब सब पक्षी मिलकर गरुड़ के पास जाकर रोने और चिल्लाने लगे - गरुड़ महाराज! आपके रहते पक्षिकुल पर समुद्र ने यह अत्याचार कर दिया है। हम इसका बदला चाहते हैं। आज उसने टिटहरी के अंडे नष्ट किए हैं, कल वह दूसरे पंछियों के अंडों को बहा ले जाएगा। इस अत्याचार की रोकथाम होनी चाहिए। अन्यथा संपूर्ण पक्षिकुल नष्ट हो जाएगा। 

गरुड़ ने पक्षियों का रोना सुनकर उनकी सहायता करने का निश्चय किया। उसी समय उसके पास भगवान विष्णु का दूत आया। उस दूत द्वारा भगवान विष्णु ने उसे सवारी के लिए बुलाया था। गरुड़ ने दूत से क्रोधपूर्वक कहा कि विष्णु भगवान को कह दे कि वे दूसरी सवारी का प्रबंध कर लें। दूत ने गरुड़ के क्रोध का कारण पूछा तो गरुड़ ने समुद्र के अत्याचार की कथा सुनाई। 

दूत के मुख से गरुड़ के क्रोध की कहानी सुनकर भगवान विष्णु स्वयं गरुड़ के घर गए। वहां पहुंचने पर गरुड़ ने प्रणामपूर्वक विनम्र शब्दों में कहा - "भगवान! आपके आश्रय का अभिमान करके समुद्र ने मेरे साथी पक्षियों के अंडों का अपहरण कर दिया है। इस तरह मुझे भी अपमानित किया है। मैं समुद्र से इस अपमान का बदला लेना चाहता हूं।"

भगवान विष्णु बोले - "गरुड़! तुम्हारा क्रोध युक्तियुक्त है। समुद्र को ऐसा काम नहीं करना चाहिए था। चलो, मैं समुद्र से उन अंडों को वापस लेकर टिटिहरी को दिलवा देता हूं। उसके बाद हमें अमरावती जाना है।"

 तब भगवान ने अपने धनुष पर अग्निबाण को चढ़ा कर समुद्र से कहा - "दुष्ट, अभी सब उन अंडों को वापस दे दे नहीं तो तुझे क्षण भर में सुखा दूंगा। 

विष्णु भगवान के भय से समुद्र ने उसी क्षण अण्डे वापस दे दिए। 

दमनक ने इन कथाओं को सुनाने के बाद संजीवकसे कहा - इसलिए मैं कहता हूं कि शत्रु पक्ष का बल जानकर ही युद्ध के लिए तैयार होना चाहिए, किंतु मुझे कैसे पता लगेगा कि पिंगलक के मन में मेरे लिए हिंसा के भाव हैं। आज तक वह मुझे सदा स्नेह की दृष्टि से देखता रहा है। उसकी वक्रदृष्टि का मुझे कोई ज्ञान नहीं है। मुझे उसके लक्षण बदला तो मैं उन्हें जानकर आत्मरक्षा के लिए तैयार हो जाऊंगा। 

दमनक - उन्हें जानना कुछ भी कठिन नहीं है। यदि उनके मन में तुम्हें मारने का पाप होगा तो उसकी आंखें लाल हो जाएँगी, भवें चढ़ जाएगी और वह होठों को चाटता हुआ तुम्हारी और क्रूर दृष्टि से देखेगा। अच्छा तो यह है कि तुम रातों-रात चुपके से चले जाओ। आगे तुम्हारी इच्छा। 

यह कहकर दमनक अपने साथी करटक के पास आया। करटक ने उससे भेंट करते हुए पूछा - कहो दमनक! कुछ सफलता मिली तुम्हें अपनी योजना में?

दमनक - मैंने तो नीतिपूर्वक जो कुछ भी करना उचित था, कर दिया। अब आगे सफलता देव के अधीन है। पुरुषार्थ करने के बाद भी यदि कार्य सिद्ध न हो तो हमारा दोष नहीं। 

करटक - तेरी क्या योजना है? किस तरह नितीयुक्त काम किया है तूने? मुझे भी बता। 

दमनक - मैंने झूठ बोल कर दोनों को एक दूसरे का ऐसा बैरी बना दिया है कि भविष्य में कभी एक दूसरे का विश्वास नहीं करेंगे। 

करटक - यह तूने अच्छा नहीं किया। मित्र! दो स्नेही हृदयों में द्वेष का बीज बोना बुरा काम है। 

दमनक - करटक! तू नीति की बातें नहीं जानता, तभी ऐसा कहता है। संजीवक ने हमारे मंत्री पद को हथिया लिया। वह हमारा शत्रु था। शत्रु को परास्त करने में धर्म अधर्म नहीं देखा जाता। आत्मरक्षा सबसे बड़ा धर्म है। स्वार्थ साधन ही सबसे महान कार्य है। स्वार्थ साधन करते हुए कपट नीति से ही काम लेना चाहिए, जैसे चतुरक ने लिया था। 

कटटक ने पूछा - कैसे?

दमनक ने तब चतुर गीदड़ और शेर की यह कहानी सुनाई:

कुटिल नीति का रहस्य

To be continued ... 

सूरजमुखी (Sunflower)

सूरजमुखी (Sunflower)

नाम से ही ज्ञात है, जिसका मुख सूरज की तरफ हो।  सूरजमुखी (Sunflower) दिनभर सूर्य के ओर घूमता रहता है, जिस दिशा में भी शुरू होता है सूरजमुखी (Sunflower) का पुष्प उसी दिशा में अपना मुंह कर लेता है, इसीलिए इसका नाम सूरजमुखी (Sunflower) है। इसके फूल सूर्योदय पर खिलते हैं तथा सूर्यास्त के समय बंद हो जाते हैं। श्वेत बैगनी और पीले पुष्पों के भेद से सूर्यमुखी की 3 जातियां मिलती हैं।

सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

सूरजमुखी क्या है?

सूरजमुखी एक प्रमुख तिलहन है। सूरजमुखी का तेल सूरजमुखी के बीज से बनता है, जिसके गुण अनगिनत हैं। सुरजमुखी का फूल देखने में तो आकर्षक होता है लेकिन इसमें कोई सुगंध नहीं होता है। इसके फूल कड़वे और ठंडे तासीर के होते हैं। सूरजमुखी का जड़, पत्ता, फूल और बीज में पौष्टिक गुण भरपूर मात्रा में होते हैं।

सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

जानते हैं सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

सूरजमुखी के बीज में विटामिन बी1, बी3, बी6, मैग्निशियम, फॉस्फोरस, प्रोटीन जैसे बहुत सारे पोषक तत्व हैं। इसलिए सूरजमुखी का प्रयोग आयुर्वेद में कई तरह के दवाईयों के लिए किया जाता है। यह पाचन में सहायक होता है तथा वातदोष को कम करने वाला है। सूरजमुखी की जड़ मूत्र संबंधी बीमारी में फायदेमंद होने के साथ-साथ दर्दनिवारक के रुप में भी उपयोग में आता है।

माइग्रेन की समस्या

सूरजमुखी के पत्तों के रस में उसके बीजों को घोटकर माथे पर दो-तीन दिन तक लेप करने से आधासीसी अर्थात माइग्रेन की का दर्द ठीक होता है।

सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

कान के रोग

सूरजमुखी के पत्तों तथा पुष्प के रस में सिद्ध किया हुआ तेल कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है इसके पत्तों का रस अकेला भी प्रयोग किया जा सकता है।

कान दर्द में 

अगर सर्दी-खांसी या  किसी बीमारी के साइड इफेक्ट की वजह से कान में दर्द हो रहा है, तो सूरजमुखी पत्र के स्वरस से सिद्ध तेल को 1-2 बूंद कान में डालने से कान का दर्द एवं पूतिकर्ण में लाभ होता है। (इसका पत्र स्वरस अकेला भी प्रयोग किया जा सकता है।)

कोलेस्ट्रोल की समस्या 

सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

सूरजमुखी के बीजों को अंकुरित कर सेवन करने से  कोलेस्ट्रोल की मात्रा नियमित रहती है।

बुखार होने पर

सूरजमुखी के 10 ग्राम जड़ का क्वाथ बनाकर 20 मिलीलीटर सुबह-शाम पिलाने से हल्का बुखार छूट जाता है।

दांत के दर्द में

सूरजमुखी के जड़ को पीसकर दांतों पर मलने से दांत का दर्द में आराम मिलता है।

सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

पेट दर्द में 

अगर खाने-पीने में गड़बड़ी होने के कारण पेट में दर्द हो रहा है, तो सूरजमुखी के फूलों के रस की दस बूंदे दूध में डालकर पिलाने से पेट दर्द तथा अपच में लाभ होता है।

पेट साफ करने में

सूरजमुखी के बीजों के तेल की एक बूंद नाभि में गिराने से रेचन क्रिया होकर पेट साफ हो जाता है।

पेट की कृमि निकालने में 

बच्चों को विशेष रुप से पेट के कृमि की समस्या सबसे ज्यादा होती है। ऐसे में 1 से 3 ग्राम की मात्रा में सूरजमुखी के बीज खिलाने से पेट की कृमि निकल जाती है।


अर्श या पाइल्स होने पर 

अगर कोई व्यक्ति ज्यादा मसालेदार, तीखा खाने के आदि है, तो पाइल्स के बीमारी होने की संभावना बढ़ जाती है। पाइल्स होने पर 3 ग्राम सूरजमुखी बीज चूर्ण लेकर, उसमें 3 ग्राम शक्कर मिलाकर प्रतिदिन सुबह शाम खाने से अर्श में लाभ होता है। इसके पूरे लाभ के लिए आहार में घी, खिचड़ी और छाछ का ही प्रयोग करना चाहिए।

किडनी में पथरी (स्टोन) होने पर

प्रदूषित खाद्द, पैकेज़्ड फूड और असंतुलित आहार के सेवन की वजह से पथरी की समस्या हो जाती है। 2 ग्राम सूरजमुखी के जड़ को गाय के दूध में पीसकर पिलाने से अश्मरी या पथरी टूटकर निकल जाती है।

सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

कमर दर्द होने पर

अगर लंबे समय तक बैठकर काम करने के कारण कमर में दर्द हो रहा है, तो सूरजमुखी के पत्तों को पीसकर कमर पर लगाने से कमर का दर्द कम होता है।

खुजली की समस्या

त्वचा पर तरह तरह के कॉज़्मेटिक उत्पाद का उपयोग करने से त्वचा रोग होने का खतरा भी दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है।  सूरजमुखी के तेल में कपूर मिलाकर खुजली वाली जगह पर लगाने से लाभ होता है।

बुखार होने पर

अगर मौसम के बदलने के वजह से या किसी संक्रमण के कारण बुखार हुआ है, तो सूरजमुखी मूल का काढ़ा बनाकर 20 मिली मात्रा में सुबह-शाम पिलाने से बुखार कम होता है। 


इसकी जड़ को कान में बाँधने से ज्वर छूट जाता है। 

सूरजमुखी के पत्ते और काली मिर्च को समभाग पीसकर काली मिर्च के बराबर गोलियां बना लें। इन गोलियों में से 1-1 गोली तीन दिन तक सुबह, दोपहर तथा शाम देने से शीतज्वर में लाभ होता है।

सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

विभिन्न भाषाओं में सूरजमुखी के नाम

Sanskrit-       सूर्यमुखी; 
Hindi-           सूरजमुखी, सुर्जमुखी; 
Urdu-           सुरजमुखी (Surajamukkhi); 
Assamese-   बेलीफूल (Beliphul); 
Konkani-     जीरासोल (Jirasol), सूरियाकमल (Suriakamal); 
Kannada-    आदित्यभक्ति (Adityabhakti), सूर्यकान्थी हूवु (Suryakanthi huvu); 
Gujrati-       सुमुखी (Sumukhi), सूरजमुखी (Surajmukhi); 
Tamil-        कुरियाकांति (Curiyakanti), सूर्या कान्ति (Suryakanti); 
Telegu-       आदित्यभक्ति चेट्टू (Adityabhakti chettu); 
Bengali-    शूरियामुक्ति (Shuriamukti), सूरजमूखी (Surajmukhi); 
Marathi-    सूर्यफूला (Suryaphula), ब्राहमोका (Brahmoka), सूरजमुखा (Surajmuka); 
Malayalam- सूर्यकान्ति (Suryakanti)। 
English-    मिरासोल (Mirasol), कॉमन सनफ्लावर (Common sunflower); 
Arbi-    अर्जीवान (Arzivana); 
Persian-आफताबी (Aftabi), गुलीआफताब (Guliaftab)।
सूरजमुखी के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

सूरजमुखी के नुकसान (Side Effects of Sunflower)

सूरजमुखी के नुकसान के विषय में कोई भी उल्लेख प्राप्त नहीं है। 



तेनालीराम - होली उत्सव और महामूर्ख की उपाधि | Tenali Raman - Holi Utsav Aur Mahamurkh Ki Upadhi

होली उत्सव और महामूर्ख की उपाधि

विजयनगर की होली आसपास के कई गांवों में काफी मशहूर थी। इस पर्व को यहां बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता था। खुद महाराज कृष्णदेव राय भी इस मौके पर होने वाले आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। होली के दिन किसी एक निवासी को महामूर्ख की उपाधि से नवाजा जाता था। साथ ही दस हजार सोने की मुद्राएं भी भेंट की जाती थीं। अपनी सूझ-बूझ और वाकपटुता के कारण तेनालीराम हर साल इस उपाधि को अपने नाम कर लेते थे। एक साल की बात है, होली का त्योहार नजदीक था। तभी दरबारियों ने मिलकर तय किया कि इस साल किसी भी कीमत पर तेनालीराम को यह उपाधि नहीं लेने देंगे। दरबारियों ने योजना बनाई कि तेनालीराम को चुपके से भांग पिला देंगे, ताकि तेनालीराम होली के उत्सव में हिस्सा ही न ले सके।
        होली उत्सव और महामूर्ख की उपाधि | Holi Utsav Aur Mahamurkh Ki Upadhi
होली कार्यक्रम का आयोजन इस साल एक खास बगीचे में हुआ था। वहां खूबसूरत सजावट के साथ ही होली खेलने वाले लोगों के लिए रंग, इत्र से तैयार गुलाल और तरह-तरह के पकवान रखे गए थे। 
उत्सव की शुरुआत महाराज की घोषणा के साथ हुई, जिसमें महाराज ने कहा कि सभी दिल खोल कर खाएं-पिएं और होली खेलें। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि किसी भी दूसरे व्यक्ति को उनसे कोई तकलीफ न हो। वहीं, जितना हो सके अपनी हरकतों से अपनी मूर्खता का प्रमाण दें, ताकि वे महामूर्ख की उपाधि हासिल कर सकें।                         
महाराज की घोषणा के बाद सभी होली खेलने में व्यस्त हो गए और खुलकर मौज-मस्ती करने लगे। कुछ लोग नाच रहे थे और कुछ लोग रंगों को हवा में उछाल रहे थे। वहीं कुछ ऐसे भी थे, जिनका ध्यान होली खेलने पर कम और खाने-पीने पर ज्यादा था। 

इसी बीच जब तेनालीराम का भांग का नशा कुछ कम हुआ तो वह भी होली उत्सव में हिस्सा लेने पहुंच गए। तभी तेनालीराम की नजर एक पुरोहित पर पड़ी जो मिठाईयां खा कम और झोली में भर ज्यादा रहे थे। तेनालीराम कुछ देर तक उन्हें बड़ी ध्यान से देखते रहे। पुरोहित की झोली और दोनों जेबें जब मिठाइयों से भर गईं, तो तेनालीराम उनके करीब गए। तेनालीराम ने पानी से भरा एक लोटा लिया और पुरोहित की झोली व जेब में उड़ेल दिया।                                   
फिर क्या था, तेनालीराम के ऐसा करने की वजह से पुरोहित जी बहुत नाराज हो गए। वह तेनालीराम पर जोर-जोर से चिल्लाने लगे और चीखने लगे। पुरोहित के इस तरह चीखने से सभी उनकी ओर देखने लगे और महाराज की नजर भी उन लोगों पर पड़ी। 

तब राजा कृष्णदेव उन लोगों के करीब गए और पुरोहित से उनके चिल्लाने की वजह पूछे। तब पुरोहित जी ने उन्हें बताया कि कैसे तेनालीराम ने उनकी जेब और झोली में पानी डाल दिया। इस पर महाराज तेनालीराम से बहुत नाराज हुए और तेनालीराम से ऐसा करने की वजह पूछे।                    
तब तेनालीराम मुस्कुराते हुए बोले - "महाराज! पुरोहित जी की जेबों और झोले ने बहुत मिठाईयां खा ली थीं। मुझे लगा कहीं उन्हें बदहजमी न हो जाए, बस इसी वजह से मैंने पुरोहित जी की जेबों और झोले को थोड़ा पानी पिलाया था।" 
तेनालीराम की बात सुनकर महाराज जोर-जोर से हंसने लगे और कुछ देर बाद बोले - "तेनालीराम! तुम सबसे बड़े महामूर्ख हो, भला झोला और जेब भी कहीं मिठाईयां खाते हैं क्या?"                 
महाराज की बात सुनकर तेनालीराम को भी हंसी आ गई और उसने पुरोहित जी की जेबों व झोले को पलट दिया। ऐसा करते ही सारी बर्फी और मिठाईयां घास पर गिर गई। पुरोहित जी भी अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हुए। देखते ही देखते वहां मौजूद सभी लोग जोर-जोर से हंसने लगे।
तभी तेनालीराम ने महाराज से पूछा कि - महाराज! क्या आपने मुझे महामूर्ख कहकर पुकारा? वहीं तेनालीराम ने वहां मौजूद अन्य दरबारियों से भी यही पूछा, "क्या आप सब को भी मैं महामूर्ख लगता हूं?"            
तब सभी ने एक स्वर में कहा - "तुमने जो अभी हरकत की है, वह महामूर्ख वाली ही है।" बस फिर क्या था? हर साल के जैसे ही इस साल भी होली के मौके पर दी जाने वाली महामूर्ख की उपाधि चालक और चतुर तेनालीराम को ही मिली। साथ ही उसे दस हजार स्वर्ण मुद्राएं भी दी गई।

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Holi festival and the title of a fool

Holi of Vijayanagar was very famous in many nearby villages. This festival was celebrated here with great pomp. Maharaj Krishnadev Rai himself also actively participated in the events organized on this occasion. On the day of Holi, a resident was awarded the title of a great fool. Also ten thousand gold coins were also offered. Due to his intelligence and eloquence, Tenaliram used to adopt this title every year. Once upon a time, the festival of Holi was near. Then the courtiers together decided that this year at any cost Tenaliram would not be allowed to take this title. The courtiers planned that Tenaliram would secretly drink cannabis, so that Tenaliram could not participate in the Holi celebrations.
होली उत्सव और महामूर्ख की उपाधि | Holi Utsav Aur Mahamurkh Ki Upadhi
The Holi program was organized this year in a special garden. Along with beautiful decorations, colors, perfume prepared gulal and different types of dishes were kept for the people playing Holi.
The festivities began with the announcement of the Maharaja, in which the Maharaja asked everyone to eat and drink with open hearts and play Holi. Also, keep in mind that no other person should have any problem with them. At the same time, prove your foolishness with your actions as much as possible, so that they can earn the title of great fool.
After Maharaj's announcement everyone got busy in playing Holi and started having fun freely. Some people were dancing and some people were tossing colors in the air. At the same time, there were some who were less focused on playing Holi and more on food and drink.

Meanwhile, when Tenaliram's cannabis intoxication subsided, he also reached to participate in the Holi festival. Then Tenaliram's eyes fell on a priest who was eating less sweets and more in his bag. Tenaliram kept watching them very carefully for some time. When the purser's bag and both his pockets were filled with sweets, Tenaliram approached him. Tenaliram took a pot full of water and poured it into the purser's bag and pocket.
What was then, because of Tenaliram doing this, Purohit ji got very angry. He started shouting loudly at Tenaliram and started screaming. Due to such screaming of the priest, everyone started looking at him and Maharaj's eyes also fell on them.

Then King Krishnadev went close to them and asked the priest the reason for their shouting. Then Purohit ji told him how Tenaliram put water in his pocket and bag. On this Maharaj was very angry with Tenaliram and asked Tenaliram the reason for doing so.
Then Tenaliram smiled and said - "Maharaj! Purohit ji's pockets and bag had eaten a lot of sweets. I thought that he should not get upset, that is why I had given some water to Purohit ji's pockets and bags."
After listening to Tenaliram, Maharaj started laughing loudly and after some time said - "Tenaliram! You are the biggest idiot, do you eat sweets in your bag and pocket too?"
Hearing the words of the Maharaj, Tenaliram also laughed and turned the purser's pockets and bags. Doing so, all the burfi and sweets fell on the grass. Purohit ji was also very ashamed of his actions. Soon all the people present there started laughing out loud.
Then Tenaliram asked Maharaj that - Maharaj! Did you call me a fool? At the same time, Tenaliram asked the same to the other courtiers present there, "Do you all think I am a fool?"
Then everyone said in one voice - "Whatever you have done now, it is only that of a great fool." Just what then? Like every year, this year also the driver and clever Tenaliram got the title of great fool given on the occasion of Holi. Along with this, ten thousand gold coins were also given to him.

भारत की न्याय व्यवस्था || Judicial system of India ||

भारत की न्याय व्यवस्था

किसी भी देश की न्याय व्यवस्था वहां के नागरिकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। न्याय व्यवस्था जितनी सरल और सहज होती है, उतना ही लाभ उस देश के नागरिकों को मिलता है।

भारत में न्यायिक प्रणाली में न तो उचित प्रक्रियाओं को अपनाया गया था और न ही प्राचीन भारत से लेकर मुगल भारत तक कानून अदालत का उचित संगठन था। हिंदू में मुकदमेबाजी की प्रक्रिया या तो जाति के बुजुर्गों या ग्राम पंचायतों या जमींदारों द्वारा की जाती थी, जबकि मुसलमानों में मुस्लिम काजी मुकदमों की निगरानी करते थे। यदि कोई विसंगति होती तो, राजा और बादशाह न्याय के पक्षधर माने जाते थे।

भारत की न्याय व्यवस्था  || Judicial system of India ||

न्यायालयों की संरचना भी समय-समय पर और राज्य से राज्य तक भिन्न होती थी। लेकिन विभिन्न राज्यों के न्यायिक प्रशासन की एक सामान्य विशेषता यह थी कि जूरी की व्यवस्था अस्तित्व में थी। यहां तक कि राजा और मुख्य न्यायाधीश को न्यायाधीशों के एक पैनल द्वारा सहायता प्रदान की गई। आम तौर पर न्यायाधीशों की संख्या तीन, पाँच या सात थी।

भारतीय न्यायिक प्रणाली अंग्रेजों ने औपनिवेशिक शासन के दौरान बनाई थी। इसको आम कानून व्यवस्था के रुप में जाना जाता है, जिसमें न्यायाधीश अपने फैसलों, आदेशों और निर्णयों से कानून का विकास करते हैं। देश में कई स्तर की विभिन्न तरह की अदालतें न्यायपालिका बनाती हैं। भारत की शीर्ष अदालत नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट है और उसके नीचे विभिन्न राज्यों में हाई कोर्ट हैं। हाई कोर्ट के नीचे जिला अदालतें और उसकी अधीनस्थ अदालतें हैं, जिन्हें निचली अदालत कहा जाता है। इसके अलावा ट्रिब्यूनल, फास्ट ट्रेक कोर्ट , लोक अदालत आदि न्यायपालिका के अंग के रुप में कार्य करते हैं। कानून को बनाए रखने और चलाने में न्यायपालिका की बहुत अहम भूमिका है। यह सिर्फ न्याय नहीं करती बल्कि नागरिकों के हितों की रक्षा भी करती है। न्यायपालिका कानूनों और अधिनियमों की व्याख्या कर संविधान के रक्षक के तौर पर का…

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार:-

सरकार की किसी भी अन्य संस्था की तरह भारतीय न्यायिक प्रणाली भी समान रुप से भ्रष्ट है। हाल ही में हुए विभिन्न घोटालों जैसे सीडब्ल्यूजी घोटाला, 2जी घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला और बलात्कार सहित समाज में हो रहे अन्य अत्याचारों ने नेताओं और गणमान्य व्यक्तियों और आम जनता सभी के आचरण पर जोर डाला है और भारतीय न्यायपालिका के काम के तरीकों में भी कमियां दिखाई हैं। यहां जवाबदेही की कोई व्यवस्था नहीं है। मीडिया भी अवमानना के डर से साफ तस्वीर पेश नहीं करता है। रिश्वत लेने वाले किसी जज के खिलाफ बिना मुख्य न्यायाधीश की इजाजत के एफआईआर दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं है।

भारत की न्याय व्यवस्था  || Judicial system of India ||

पारदर्शिता की कमी

भारतीय न्यायिक प्रणाली की एक और समस्या उसमें पारदर्शिता की कमी है। यह देखा गया है कि सूचना के अधिकार को पूरी तरह से कानून प्रणाली से बाहर रखा गया है। इसलिए न्यायपालिका के कामकाज में महत्वपूर्ण मुद्दों, जैसे न्याय और गुणवत्ता को ठीक से नहीं जाना जाता है। 

विचाराधीन कैदियों की मुश्किलें: भारतीय जेलों में बंद कैदियों में से ज्यादातर विचाराधीन हैं, जो कि उनके मामलों के फैसले आने तक जेल में ही बंद रहते हैं। कुछ मामलों में तो ये कैदी अपने उपर दायर मामलों की सजा से ज्यादा का समय सिर्फ सुनवाई के इंतजार में ही जेल में निकाल देते हैं। इसके अलावा अदालत में खुद के बचाव का खर्च और दर्द वास्तविक सजा से भी ज्यादा होता है। वहीं दूसरी ओर अमीर लोग पुलिस को अपनी ओर कर लेते हैं, जिससे पुलिस अदालत में लंबित मामले के दौरान गरीब व्यक्ति को परेशान या चुप कर सकती है।

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Judicial system of India

The judicial system of any country is very important for its citizens. The simpler and simpler the judicial system, the more benefits the citizens of that country get.

The judicial system in India neither followed proper procedures nor proper organization of the court of law from ancient India to Mughal India. In Hindus the process of litigation was carried out either by caste elders or by village panchayats or zamindars, while among Muslims the Muslim Qazi supervised the cases. If there was any discrepancy, the king and the emperor were considered to be the advocates of justice.

भारत की न्याय व्यवस्था  || Judicial system of India ||

The composition of the courts also varied from time to time and from state to state. But a common feature of the judicial administration of different states was the existence of a system of jury. Even the king and the chief justice were assisted by a panel of judges. Usually the number of judges was three, five or seven.

The Indian judicial system was created by the British during the colonial rule. This is known as the common law system, in which the judges develop the law by their decisions, orders and judgments. Various levels of courts make up the judiciary in the country. The top court of India is the Supreme Court in New Delhi and below it are the High Courts in various states. Below the High Court are the district courts and its subordinate courts, which are called lower courts. Apart from this, Tribunals, Fast Track Courts, Lok Adalats etc. work as part of the judiciary. The judiciary has a very important role in maintaining and running the law. It not only does justice but also protects the interests of citizens. The judiciary acts as the protector of the constitution by interpreting laws and enactments.

Corruption in Judiciary:-

The Indian judicial system, like any other institution of government, is equally corrupt. Various recent scams like CWG scam, 2G scam, Adarsh ​​society scam and other atrocities taking place in the society including rape have put emphasis on the conduct of politicians and dignitaries and the general public and also deficiencies in the working of the Indian judiciary. are shown. There is no system of accountability here. Media also does not paint a clear picture for fear of contempt. There is no provision for registering an FIR against a judge taking bribe without the permission of the Chief Justice.

भारत की न्याय व्यवस्था  || Judicial system of India ||

lack of transparency

Another problem of the Indian judicial system is its lack of transparency. It has been observed that the Right to Information has been completely kept out of the legal system. Therefore the important issues in the functioning of the judiciary, such as justice and quality, are not properly known.


Difficulties of undertrials: Most of the prisoners in Indian prisons are undertrials, who remain in jail till their cases are decided. In some cases, these prisoners spend more time in jail just waiting for the hearing of the cases filed against them. Moreover, the cost and pain of defending oneself in court is more than the actual punishment. On the other hand rich people turn the police on their side, due to which the police can harass or silence the poor person during the case pending in the court.

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र)

गोदावरी नदी के किनारे बसा नांदेड़ शहर हजूर साहिब 'सचखंड' गुरुद्वारा के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। यहां हर साल दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु आते हैं, और मत्था टेक कर स्वयं को धन्य समझते हैं।

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

हजूर साहिब सिखों के पांच तख्तों में से एक है। यह नांदेड नगर में गोदावरी नदी के किनारे स्थित है। इसमें स्थित गुरुद्वारा 'सचखंड'' कहलाता है। 

सन 1708 में तख्त श्री हजूर साहिब में सिखों के दसवें तथा अंतिम गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने प्रिय घोड़े दिलबाग के साथ अंतिम सांस ली थी। सन 1708 से पहले गुरु गोविंद सिंह जी ने धर्म प्रचार के लिए कुछ वर्षों के लिए यहां अपने कुछ अनुयायियों के साथ अपना पड़ाव डाला था।

यहीं पर कुछ धार्मिक तथा राजनीतिक कारणों से सरहिंद के नवाब वजीर शाह ने अपने दो आदमी भेज कर उनकी हत्या करवा दी थी।

अपनी मृत्यु को समीप देखकर गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में किसी अन्य को गुरु चुनने के बजाए सभी सिखों को आदेश दिया कि मेरे बाद आप सभी पवित्र ग्रंथ को ही गुरु मानें और तभी से पवित्र ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा जाता है।

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

गुरु गोविंद सिंह जी के ही शब्दों में:-
आगिआ भई अकाल की तवी चलाओ पंथ..
सब सिखन को हुकम है गुरु मानियो ग्रंथ..
गुरु ग्रंथ जी मानियो प्रगट गुरां की देह..
जो प्रभ को मिलबो चहै खोज शब्द में लेह..

परिसर में स्थित गुरुद्वारे को सचखंड नाम से जाना जाता है। यह गुरुद्वारा गुरु गोविंद सिंह जी जहां ज्योति जोति समाये थे, उसी स्थान पर ही बनाया गया है।

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

गुरुद्वारे का आंतरिक कक्ष अंगीठा साहिब कहलाता है। यह ठीक उसी स्थान पर बनाया गया है, जहां गुरु गोविंद सिंह जी का दाह संस्कार किया गया था।

तख्त के गर्भ गृह में गुरुद्वारा पटना साहिब की तर्ज पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब तथा श्री दशम ग्रंथ दोनों स्थापित हैं। गुरुद्वारे का निर्माण सन 1832 से 1837 के बीच पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के द्वारा करवाया गया था।

गुरू गोविंद सिंह जी ने ज्योति ज्योत में समाने से पहले ही सब तख्तों पर योग्य व्यक्तियों को सेवा के लिए लगा दिए थे। तख्त श्री अनचल नगर पर अपने सेवक भाई संतोख सिंह जी की सेवा लगाई और हुक्म दिया कि यहाँ पर देग तेग का पहरा रखना, और हुक्म दिया कि लंगर बनवा कर बांटते जाना किसी बात की कमी नहीं आयेगी।

 यह स्थान श्री गुरू गोविंद सिंह जी महाराज के अद्वितीय जीवन की अंतिम सुनहरी यादों से जुडा है।  प्रथम नौ गुरू साहिबान के बसाए गये अधिकतर स्थान सुल्तानपुर लोधी, खडूर साहिब, गोइंदवाल, अमृतसर, तरनतारन, कीरतपुर आदि पंजाब राज्य में ही स्थित है,परंतु श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने विशाल भारत के कोने कोने को अपनी पावन चरण रज से पवित्र किया। पटना साहिब में इनका जन्म हुआ। उत्तर दिशा में स्थित नगर श्री आनंदपुर साहिब में आपने खालसा पंथ स्थापना की। माता पिता और अपने चारों पुत्रों को देश, कौम और धर्म की खातिर न्यौछावर करने के पश्चात दमदमा साहिब मालवा देश में प्रवेश किया। औरंगजेब की मौत के बाद उसके बड़े पुत्र बहादुर शाह जफर को दिल्ली का तख्त सौंप के संगत को तारते हुए भारत की दक्षिण दिशा में पहुंचे। गोदावरी नदी के किनारे बसे नगर नांदेड़ की धरती को पावन किया।

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

गुरू गोविंद सिंह जी ने ज्योति ज्योत में समाने से पहले ही सब तख्तों पर योग्य व्यक्तियों को सेवा के लिए लगा दिया था। तख्त श्री अनचल नगर पर आपने गढ़वई सेवक भाई संतोख सिंह जी की सेवा लगाई और हुक्म दिया कि यहाँ पर देग तेग का पहरा रखना,और हुक्म दिया कि लंगर बनवा कर बांटते जाना किसी बात की कमी नहीं आयेगी, धन की चिंता नहीं करना, जितना धन आए,लंगर पर खर्च करते जाना।

गुरु नांदेड़ साहिब का स्थापत्य

तख्त सचखंड साहिब का गुरूद्वारा 8 एकड़ में फैला हुआ है। गुरूद्वारे में प्रवेश के लिए 6 तरफ से विशाल द्वार बनाये गये है। सभी द्वार लगभग 40 फुट ऊंचे हैं, और सुंदर वास्तुकला से सुसज्जित है। तख्त साहिब के चारों तरफ श्वेत संगमरमर के 160 वातानुकूलित कक्ष अतिथियों के ठहरने के लिए बनाये गये है। यह भवन दो मंजिला है, भूतल से 15 फुट ऊंचाई पर तख्त साहिब विराजमान है। गुरूद्वारे का मुख्य द्वार सोने का है, अन्य सभी द्वार चांदी के है। सम्पूर्ण सिंहासन साहिब सोने के पत्तरों से सुसज्जित है। छत, दीवारें, द्वार, श्री गुरू ग्रंथ साहिब का सिंहासन सब कुछ स्वर्ण मंडित है। गुम्बद का कलश भी स्वर्ण मंडित है। गर्भ गृह के चारों ओर परिक्रमा मार्ग है। सम्पूर्ण निर्माण श्वेत संगमरमर एवं ग्रेनाइट पत्थरों से किया गया है।

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

गुरूद्वारा बोर्ड नांदेड के इतिहास से सम्बंधित यहां नौ अन्य गुरूद्वारे और है। बोर्ड उनका भी प्रबंधन देखता है। इन नौ गुरूद्वारे के दर्शन के लिए निशुल्क बस सेवा चलाई जाती है। गुरूद्वारा बोर्ड की ओर से जनकल्याण के अनेक कार्य किये जाते हैं।

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Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra)

The city of Nanded, situated on the banks of the Godavari River, is famous all over the world for the Hazur Sahib 'Sachkhand' Gurdwara. Every year lakhs of devotees from all over the world come here, and consider themselves blessed by paying obeisance.

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

Hazur Sahib is one of the five Takhts of the Sikhs. It is situated on the bank of Godavari River in Nanded Nagar. The Gurudwara situated in it is called 'Sachkhand'.

In 1708, at Takht Sri Hazur Sahib, the tenth and last Guru of the Sikhs, Gobind Singh, breathed his last with his beloved horse Dilbagh. Before 1708, Guru Gobind Singh ji had made his camp here with some of his followers for some years for the propagation of religion.

It was here that for some religious and political reasons, the Nawab of Sirhind, Wazir Shah, had sent two of his men to get him killed.

Seeing his death near, Guru Gobind Singh Ji ordered all the Sikhs instead of choosing any other Guru as his successor, that after me all of you should consider the holy book as Guru and since then the holy book is called Guru Granth Sahib. .

In the words of Guru Gobind Singh Ji:-

Agiya Bhai, run the tavi of famine..
All Sikhans have their dictates from the Guru Manio Granth..
Guru Granth ji Maniyo revealed the body of the Guru..
Whoever wants to meet the Lord.

The Gurdwara situated in the complex is known as Sachkhand. This Gurdwara has been built at the same place where Guru Gobind Singh Ji used to hold Jyoti Joti.

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

The inner chamber of the Gurdwara is called Angitha Sahib. It is built at the exact same place where Guru Gobind Singh was cremated.

In the sanctum sanctorum of Takht, both Sri Guru Granth Sahib and Sri Dasam Granth are established on the lines of Gurdwara Patna Sahib. The Gurdwara was built between 1832 and 1837 by Maharaja Ranjit Singh of Punjab.

Even before joining the Jyoti Jyot, Guru Gobind Singh ji had put qualified people on all the boards for service. He put the service of his servant Bhai Santokh Singh ji at Takht Shri Anchal Nagar and ordered that Deg Teg should be guarded here, and ordered that nothing would be lacking by getting langar made and distributed.

 This place is associated with the last golden memories of the unique life of Shri Guru Gobind Singh Ji Maharaj. Most of the places inhabited by the first nine Guru Sahibans, Sultanpur Lodhi, Khadur Sahib, Goindwal, Amritsar, Tarn Taran, Kiratpur etc. are located in the state of Punjab, but Shri Guru Gobind Singh Ji Maharaj has sanctified every corner of vast India with his holy feet. did. He was born in Patna Sahib. You established the Khalsa Panth in the city Sri Anandpur Sahib located in the north direction. After sacrificing his parents and his four sons for the sake of country, community and religion, Damdama Sahib entered the country of Malwa. After the death of Aurangzeb, he handed over the throne of Delhi to his eldest son Bahadur Shah Zafar and reached in the south direction of India. Purified the land of Nanded, a city situated on the banks of river Godavari.

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||

Even before joining the Jyoti Jyot, Guru Gobind Singh ji had engaged qualified persons for service on all the boards. At Takht Shree Anchal Nagar, you put the service of Gadhwai Sevak Bhai Santokh Singh ji and ordered that Deg Teg should be guarded here, and ordered that there will be no shortage of anything by making langar and distributing it, don't worry about money, as much as Money comes, go on spending it on anchor.

Architecture of Guru Nanded Sahib

The Gurudwara of Takht Sachkhand Sahib is spread over 8 acres. Huge gates have been made from 6 sides to enter the Gurudwara. All the gates are about 40 feet high, and are adorned with beautiful architecture. 160 air-conditioned rooms of white marble have been built around the Takht Sahib for the stay of the guests. This building is two storeyed, the Takht Sahib is situated at a height of 15 feet from the ground floor. The main gate of the Gurudwara is of gold, all other doors are of silver. The entire throne sahib is decorated with gold leaves. The ceiling, the walls, the gates, the throne of Sri Guru Granth Sahib, everything is gold-plated. The urn of the dome is also gold-plated. There is a parikrama path around the sanctum sanctorum. The entire construction is done with white marble and granite stones.

There are nine more Gurdwaras here related to the history of Gurdwara Board Nanded. The board also looks after their management. Free bus service is run to visit these nine Gurudwaras. Many works of public welfare are done by the Gurudwara Board.

हजूर साहिब 'सचखंड' नांदेड़ (महाराष्ट्र) || Hazur Sahib 'Sachkhand' Nanded (Maharashtra) ||