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श्रीरामचरितमानस – लंकाकांड ( Shri Ramcharitmanas – Lankakand )

श्री रामचरितमानस की महत्वपूर्ण घटनाएं

रामचरितमानस की समग्र घटनाओं को मुख्य 7 कांड में विभाजित कर सरलता से समझा जा सकता है। बालकाण्डअयोध्याकाण्डअरण्यकांड, किष्किंधा कांड, सुंदरकांड के बाद लंका कांड आता है।  

श्रीरामचरितमानस –  लंकाकांड ( Shri Ramcharitmanas – Lankakand )


श्रीरामचरितमानस –  लंकाकांड ( Shri Ramcharitmanas – Lankakand )

यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शंकरः शं तनोतु मे॥

भगवान शिव अपने भक्तों को कैवल्य भी देते हैं और साथ ही साथ दुष्टों को दंड देने वाले भी हैं। हितकारी देवों के देव महादेव मेरे मनोरथ और कर्तव्यों का विस्तार करें।

रामचरितमानस का छठा कांड जिसका नाम लंका कांड है ।लंका कांड में दुष्ट अभिमानी राक्षसों जैसे मेघनाथ कुंभकरण और राजकुमार प्रहस्त और कालनेमि और वज्रमुष्टि जैसे राज्यों का वध होता है। इनके वध के पश्चात पूरा ब्रह्मांड राम नाम से गूँजने लगता है ।देवता लोग कहते राम आपकी जय हो ।और ऊपर से फूल माला की वर्षा करने लगते हैं। लंका कांड हम सबको यह सूचित करता है कि अपने कर्तव्य का पालन कैसे करना चाहिए ? भक्त और भगवान का संबंध कैसा होता है? जब लक्ष्मण को शक्ति बाण लगा था। तो हनुमान जी संजीवनी बूटी लाए ।जिसके परिणाम स्वरूप लक्ष्मण के प्राण को बचाया जा सकता है। भक्ति, शक्ति और बुद्धि और साथ ही साथ संयम ,करुणा ,परोपकार का जो लंका कांड में तुलसीदास जी जिस प्रकार से वर्णन किया है वह अद्भुत है वह शब्दों से परे है।

लंका कांड का संक्षिप्त वर्णन

नल और नील द्वारा समुद्र सेतु का निर्माण किया जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप राम की सेना लंका पहुंचती है। तत्पश्चात सुबेल पर्वत पर अपना डेरा लगाकर रहने लगते हैं। उधर रावण के नाना मालीवाल और रावण की पत्नी मंदोदरी रावण को समझा रही है कि आप सीता के मोह का त्याग कर दीजिए ।रावण मंदोदरी की बातों का अनदेखा करके वहां से चला जाता है। राम भगवान फिर शांति प्रस्ताव रखते हैं इसके लिए अंगद को भेजते हैं। अंगद वहां जाने के बाद रावण को समझाता है कि वह सीता माता को प्रभु श्री राम को सौंप दे ।वह कृपा निधान है वह तुम्हें क्षमा कर देंगे। लेकिन रावण अंगद को ही बंदी बनाने का प्रयास करता है। लेकिन असफल रहता है उसके बाद युद्ध प्रारंभ हो जाता है। युद्ध में वज्र मुट्ठी और राजकुमार प्रहस्त जैसे शूरवीर योद्धा मारे जाते हैं। रावण का भाई कुंभकरण भी मारा जाता है। उसके बाद मेघनाथ आते हैं। मेघनाथ और लक्ष्मण में घमासान युद्ध होता है । इस घमासान युद्ध के बीच लक्ष्मण और राम को मेघनाथ नागपाश में बांध देता है। फिर हनुमान जी गरुड़ को लाते है।गरुड़ के माध्यम से नागपाश से मुक्ति मिलती है ।फिर लक्ष्मण और मेघनाथ में घमासान युद्ध होता है इस बार मेघनाथ ने शक्ति बाण छोड़ा शक्ति बाल लगते ही लक्ष्मण मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े जिसके बाद संजीवनी बूटी लाया गया संजीवनी बूटी के माध्यम से सुषेण लक्ष्मण को जीवित कर देते हैं जिसके बाद मेघनाथ मारा जाता है ।फिर अंततः रावण युद्ध में आता है ।राम और रावण का घमासान युद्ध 32 दिनों तक चलता है ।अंततः रावण भी मारा जाता है ।रावण के मरने के बाद पुष्पक विमान से राम और लक्ष्मण सुग्रीव और सीता हनुमान जामवंत सब अयोध्या आ जाते हैं।

लंका कांड की विशेषता क्या है ?

(1) राम की सेना का लंका में आगमन

नल और नील दोनों भाई बड़े हर्ष के साथ राम सेतु का निर्माण करने लगते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप जब रामसेतु बनकर पूर्ण हो जाता है ।तब राम भगवान की सेना उस सेतु के माध्यम से लंका पहुंच जाती है ।उसके बाद सुबेल नामक पर्वत पर डेरा लगाकर वास करने लगते हैं ।सुबेल पर्वत पर डेरा इसलिए लगाया गया था क्योंकि सुबेल पर्वत पर से यहां का मूल्यांकन किया जा सकता था की रावण से जासूस कहीं आस-पास तो नहीं है ।यह आसानी से जाना जा सकता था।

इस प्रसंग में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि
चला कटकु प्रभु आयसु पाई।
 को कहि सक कपि दल बिपुलाई॥

सभी वानर राम की आज्ञा से वहां की फलों को बड़े चाव से खाने लगते हैं इसके विषय में तुलसीदास जी लिखते हैं कि 

सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा॥
खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालू कपि जहँ तहँ धाए॥

(2) मेघनाथ की मृत्यु

राम भगवान इस भीषण युद्ध को टालना चाहते थे इसके लिए वह शांतिदूत रावण के दरबार में भेजते हैं ।अंगद शांति दूत के रूप में रावण के दरबार में जब पहुंचता है। उसने अपना परिचय दिया ।परिचय देने के परिणाम स्वरुप रावण को यह चेतावनी दी थी ।वह माता सीता को सही सलामत श्री राम को सौंप दें अन्यथा लंका की ईट से ईट बज जाएगी। रावण नहीं मानता है जिसके परिणाम स्वरूप रावण अपने सैनिकों का आदेश देता है कि अंगद को बंदी बना लो अंगद छलांग लगाकर रावण का मुकुट लेकर चल पड़ते हैं ।निर्णय के रूप में अंगद ने रावण को 1 दिन का समय दिया था। रावण को उसकी पत्नी मंदोदरी बहुत समझाती है कि स्वामी आप एक स्त्री की खातिर पूरे निर्दोष प्रजा को क्यों दंड देना चाहते हैं ।रावण अहंकार में मंदोदरी की बातों को अनसुना कर देता है । रावण के नाना मालीवाल भी समझाते हैं कि सीता को सही सलामत श्री राम को लौटा दे। लेकिन अपने नाना की बात भी नहीं मानता है। जब एक दिन बीत जाता है फिर युद्ध प्रारंभ हो जाता है ।रावण की सेना की ओर से राजकुमार प्रहस्त नेतृत्व करते हैं ।प्रहस्त और लक्ष्मण का घमासान युद्ध होता है। प्रहस्त जाता है और साथ ही साथ वज्रमुष्टि भी मारा जाता है

इसके विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि
भागत भट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी॥
गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं॥

फिर रावण का पुत्र अतिकाय आता है। वह भी लक्ष्मण के हाथों मारा जाता है। फिर उसके बाद रावण स्वयं आता है। फिर प्रभु श्री राम रावण का उपहास करके उसे निःशस्त्र करके वापस भेज देते हैं। फिर कुंभकरण आता है। कुंभकरण से राम का भीषण युद्ध होता है जिसमें कुंभकरण परास्त होकर मारा जाता है

इसके विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि
सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा॥

और फिर अंत में अपने परम प्रतापी पुत्र मेघनाथ को रणभूमि में रावण भेजता है। मेघनाथ के रन में आने से राक्षसों में हर्षोल्लास छा गया । बड़ी ऊर्जा के साथ वानर भालू से युद्ध करने लगे। मेघनाथ अपने धनुष की झंकार से पूरे ब्रह्मांड को कम्पित कर रहा था । फिर मेघनाथ और लक्ष्मण का युद्ध होता है। मेघनाथ नागपाश के माध्यम से लक्ष्मण और राम को बांध देता है।  गरुड़ की सहायता से राम और लक्ष्मण को नागपाश से मुक्ति मिलती है। उसके बाद फिर से एक बार मेघनाथ और लक्ष्मण का युद्ध होता है ।इस बार मेघनाथ ने शक्ति बाण छोड़ा ।शक्ति बाण लगते लक्ष्मण धरती पर मूर्छित अवस्था में गिर पड़ते है।

इस विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं की
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥
मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥

सुषेण वैद्य बताते हैं कि यदि लक्ष्मण को बचाना है इसके लिए संजीवनी बूटी लाना है। वह भी सूर्योदय से पहले हनुमान जी बड़े वेग के साथ उत्तर दिशा में उड़ते हैं। और रास्ते में अड़चन डालने के लिए रावण द्वारा कालनेमि को भेजा जाता है। कालनेमि का  भेद खुलने के बाद वीर हनुमान उसे मार देते हैं ।फिर उसके बाद जब वह संजीवनी बूटी लेकर वापस लौटते हैं। भरत अनजाने में हनुमान के ऊपर बाण से प्रहार कर देते हैं जिसके परिणाम स्वरूप हनुमान पर्वत सहित जमीन पर गिर जाते हैं । मुख से राम नाम निकल रहा था ।उसके बाद भरत राम नाम की सौगंध देते हैं। तुरंत हनुमान मूर्छित की अवस्था से  खड़े हो जाते हैं। और पूरी आपबीती भरत से बताते हैं ।उसके बाद भारत कहते मैं वैष्णवआस्त्र का संधान करता हूं। तुम मेरे वैष्णव अस्त्र पर बैठ कर जाइए। हनुमान जी कहते हैं कि मेरे पास राम नाम की ऐसी शक्ति है। मैं वहां सूर्योदय से पहले ही पहुंच जाऊंगा ।उसके बाद हनुमान जी सूर्योदय से पहले पहुंच जाते हैं । संजीवनी बूटी का उपयोग होता है संजीवनी बूटी से  लक्ष्मण जीवित होते हैं ।उसके बाद मेघनाथ और लक्ष्मण का युद्ध होता है ।इस बार मेघनाथ लक्ष्मण के हाथों मारा जाता है

फिर विषय में तुलसीदास जी लिखते हैं कि
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥
छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥

(3) पुष्पक विमान से राम अपनी भार्या सीता और अनुज सहित अयोध्या पहुंचे

मेघनाथ की मृत्यु के उपरांत रावण बहुत क्रोधित होता है। फिर राम और रावण का भीषण युद्ध होता है ।इस युद्ध से पूर्व ब्रह्मांड कांपने लगता है। ऐसे- ऐसे अस्त्रों और शस्त्रों का उपयोग होता है ।जिसे देखकर नाग और गंधर्व भी भयभीत हो जाते हैं। 32 दिन तक चलने वाला यह युद्ध बहुत भीषण होता है ।लेकिन भविषन की  सहायता से रावण राम को मार देते हैं।

इस विषय मे तुलसीदास जी लिखते हैं कि
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥

रावण की मृत्यु के बाद लंका का राजा भविषन को बनाया जाता है ।फिर सीता की अग्नि परीक्षा होती है। अग्नि परीक्षा होने के बाद राम भगवान द्वारा दिए गए पुष्पक विमान की मदद से अयोध्या पहुंचते हैं। भरत उनको देखकर बहुत आनंदित होते हैं

इस विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि
 लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापति।
बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती॥
अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे।
सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते॥

13 comments:

  1. कितने कांड हैं

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    1. श्री रामचरितमानस भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसकी रचना 16वीं शताब्दी में संत तुलसीदास जी ने की थी। इस किताब में कुल 7 तरह के कांड देखने मिलते है।

      बाल कांड
      अयोध्या कांड
      अरण्य कांड
      किष्किंधा कांड
      सुंदर कांड
      युद्ध कांड
      उत्तर कांड

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  2. जय श्री सीताराम

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  3. जय श्री राम

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  4. जय श्री राम 🙏🏻🙏🏻

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  5. जय सिया राम

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  6. 🙏🙏💐💐शुभरात्रि 🕉️
    🚩🚩जय जय सियाराम 🚩🚩
    👍👍👍बहुत सुन्दर प्रस्तुति शेयर करने के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद 💐💐

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  7. पवन कुमारMarch 1, 2024 at 2:04 PM

    🌹🙏जय सियाराम🙏🌹

    रामचरितमानस के सातों कांड में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के बारे में जितनी बारीकी से संत तुलसी दास ने लिखी है वो कलयुगी जीव के लिए
    कल्याणकारी है।

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