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श्रीरामचरितमानस – अरण्यकांड ( Shri Ramcharitmanas – Aranyakand )

श्री रामचरितमानस की महत्वपूर्ण घटनाएं

रामचरितमानस की समग्र घटनाओं को मुख्य 7 कांड में विभाजित कर सरलता से समझा जा सकता है। बालकाण्डअयोध्याकाण्ड के बाद अरण्यकांड आता है।  

श्रीरामचरितमानस – अरण्यकांड ( Shri Ramcharitmanas – Aranyakand )

श्री रामचरितमानस – अरण्य कांड (Shri Ramcharitmanas Aranyakand)

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुंदरं
पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्।
राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं
सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे॥

अर्थात परम ब्रह्म श्रीराम का शरीर जलयुक्त कपासी मेघों की भांति सुंदर है। जो अपने शरीर पर पीले वस्त्र को धारण करते हैं। और साथ ही साथ हाथों में बाण और धनुष है। जिनके नेत्र सफेद कमल की भांति हैं ।और साथ ही अपने मस्तिष्क पर जटाजूट धारण किए हैं ।श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण और भार्या के साथ आनंद पूर्वक जा रहे हैं। मैं उनको देखकर नमन करता हूं।

अरण्यकांड में श्री राम ऋषि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसुइया और सरभंग मुनि से मिलते हैं। सरभंग मुनि श्री राम की आस में ही अपने शरीर का त्याग नहीं किए थे। जब श्री राम का दर्शन कर लेते हैं तो अपनी योग विद्या के माध्यम से अपने शरीर को भस्म कर देते हैं तदोपरांत ब्रह्मलोक की ओर प्रस्थान करते हैं। फिर उसके बाद ऋषि अगस्त और सुतीक्ष्ण ऋषि की आज्ञा से दंडक वन में जाते हैं ।दंडक वन में राक्षसों द्वारा ऋषि मुनि को सताए जाने की घटना सुनते हैं ।उसके बाद पंचवटी में ही अपना कुटिया बनाकर रहने लगते हैं। ऋषि और मुनि की राक्षसों से रक्षा करने लगते हैं। उसके बाद शूपर्णखा का राम से विवाह के लिए निवेदन करना। सीता का हरण करना से संबंधित प्रसंग अरण्यकांड में शामिल है।

अरण्य कांड का संक्षिप्त कहानी 

भरत के वन जाने के बाद श्री राम ऋषि अत्री और उनकी पत्नी अनुसुइया से मिलती है ।अनुसुइया सीता को पतिव्रत नारी की शिक्षा देती है। उसके बाद फिर श्री राम सरभंग मुनि के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं। सर भंग मुनि कई युगों से श्री राम की दर्शन के लिए अपने शरीर का त्याग नहीं किए थे ।श्री राम का दर्शन करने के बाद सरभंग मुनि अपनी योग विद्या के माध्यम से अपने शरीर को जलाकर भस्म कर देते हैं ।जिसके परिणाम स्वरुप वह ब्रह्म लोक की ओर प्रस्थान करते हैं। फिर उसके बाद श्री राम ऋषि सुतीक्ष्ण के माध्यम से अगस्त्य ऋषि से मिलते हैं । अगस्त्य ऋषि श्रीराम को कई गूढ़ ज्ञान और साथ ही साथ अस्त्र-शस्त्र देते हैं।

श्री राम से अनुग्रह करते हैं कि वह दंडक वन की रक्षा करें ।श्रीराम दंडक वन में ऋषि- मुनि की रक्षा की करने के लिए इस धरती को राक्षस से बचाने के लिए प्रतिज्ञा लेते हैं ।फिर उसके बाद श्री राम अपने भार्या सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ पंचवटी में रहने लगते हैं। एक दिन शूपर्णखा नाम की राक्षसी राम से विवाह की प्रस्ताव रखती है। उसके विवाह का प्रस्ताव श्रीराम राम मना कर देते हैं ।जिसके परिणाम स्वरूप लक्ष्मण शूपर्णखा का नाक काट देते हैं। फिर खर दूषण से युद्ध होता है।  खर -दूषण श्रीराम से परास्त होकर युध्द में वीरगति को प्राप्त करते है।

शूपर्णखा अपने महा प्रतापी भाई रावण के पास जाती है ।अपने साथ हुए अन्याय का वर्णन करती है। फिर रावण मारीच की सहायता से सीता का हरण कर लेता है। सीता हरण होने के बाद सीता की रक्षा करने के लिए जटायु रावण से युद्ध करता है।  जटायु रावण से युद्ध में परास्त होकर मारा जाता है। फिर राम माता शबरी से मिलते हैं। जो सदैव राम नाम का जाप करती थी।

अरण्य कांड की विशेषता क्या है

(1) जयंत की कुटिलता 

इंद्र का महामूर्ख पुत्र श्री राम के बल की परीक्षा लेनी चाहिए ।परीक्षा लेने के लिए जयंत ने कौवे का वेश बनाकर वह सीता जी के पैर में चोंच मारता है। जिसके परिणाम स्वरूप सीता जी की पैर से रक्त स्रावित होने लगता है ।इसको देखकर श्रीराम ने अपने धनुष पर सरकंडे का सन्धान किया ।उसे इस कौवे पर छोड़ दिया। इसके विषय में तुलसीदास जी लिखते हैं कि

सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥

श्री राम प्रभु के द्वारा छोड़े गए बाण से बचने के लिए जयंत तीनो लोक में भागता है। लेकिन उसकी तीनों लोको में रक्षा नहीं हो पाती है। तब अंततः नारद भगवान उसे राय देते हैं कि तुम प्रभु निर्विकार श्री राम के चरणों में जाओ वही तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं। इसके विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि

आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई॥
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहीं पाई॥

अर्थात भयभीत जयंत अंत में जाकर श्री राम प्रभु के चरण को पकड़ लिए और चरण पकड़ कर कहने लगा कि प्रभु मैं आप की महिमा को नहीं जान पाया। आप कौन हैं ।आपके निर्विकार स्वरूप से मैं अपरिचित था। प्रभु में महामूर्ख हूं ।जो आप की प्रभुता को नहीं समझ पाया ।हे प्रभु इस नासमझ को माफ कर दीजिए।

(2)विराध का वध

ऋषि और मुनि से विदा लेने के बाद श्री राम अत्रि के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं। श्री राम के आने की सूचना को सुनकर ऋषि अत्री श्री राम के दर्शन के लिए व्याकुल हो जाते हैं। उनके आने के राह को निहारने लगते हैं ।इसके विषय में तुलसीदास जी लिखते हैं कि

पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए॥
करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए॥

अर्थात ऋषि अत्रि का रोम-रोम पुलकित हो उठता है ।जब यह सुनते हैं कि श्री राम हमारे आश्रम की ओर आ रहे हैं। वह तुरंत दौड़े-दौड़े श्री राम के पास जाते हैं ।जिसके बाद श्री राम का दर्शन कर सके। श्री राम जैसे ही ऋषि अत्रि को दंडवत प्रणाम करते हैं। ऋषि अत्रि श्री राम को अपने हृदय लगाकर उनके पैरों को अपनी प्रेम की आंसुओं से नहला देते हैं।

श्री राम अत्रि के आश्रम में प्रवेश करने के बाद श्री राम प्रभु की भार्या माता सीता ऋषि अत्री की पत्नी सती अनुसुइया से मिलती है ।सती अनसुईया से भेंट के स्वरूप माता पिता को अपने पास पाकर आनंद का अनुभव करती है। फिर माता सती अनुसुइया मां सीता को कुछ देना चाहती हैं ।इसके विषय में तुलसीदास जी लिखते हैं कि

दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥2॥

अर्थात सती अनसूया माता -सीता को ऐसे दिव्य आभूषण देती हैं जो कभी मैला नहीं होता था अर्थात वह प्रतिदिन नया जैसा प्रतीत होने लगता था। सीता जी उन आभूषण और वस्त्रों को धारण करके फिर ऋषि अत्री की पत्नी सती अनुसुइया कोमल और मीठे शब्दों में नारी धर्म के विषय में सीता को बताने लगती है। इसके विषय में तुलसीदास जी आगे लिखते हैं कि

मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥

अर्थात हे जनक पुत्री सीता माता -पिता और भाई का प्रेम एक सीमा तक सही है ।लेकिन जो पतिव्रता स्त्री अपने पति की सेवा नहीं करती है। सच्चे भाव से वह स्त्री, स्त्री नहीं होती है बल्कि वह एक अधम स्त्री होती है।

ऋषि अत्रि से विदा लेकर राम भगवान फिर वन की ओर प्रस्थान करते हैं। जब वह वन की ओर प्रस्थान करते हैं। जो मार्ग में रुकावट आती है जैसे कि विराध द्वारा श्री राम पर आक्रमण इसके विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं

जहँ जहँ जाहिं देव रघुराया। करहिं मेघ तहँ तहँ नभ छाया॥
मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुबीर निपाता॥

अर्थात जिस जिस रास्ते से श्रीराम जाते हैं उस रास्ते में बादल छाया करते जाते हैं फिर राम को मार्ग में विराध नामक राक्षस मिलता है। राम भगवान विराध का फिर तुरंत वध कर देते हैं।

3)अगस्त्य ऋषि से मिलन

विराट राक्षस का वध करने के बाद श्री राम शरभंग ऋषि के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं। शरभंग ऋषि राम को अपने पास देखकर आनंद का अनुभव करने लगते हैं।  कहने लगते हैं श्री राम आपके दर्शन से मेरा जन्म धन्य हो गया ।आपके दर्शन मात्र से ही मेरे नयन में जो निराशा के आंसू छलकने लगे थे ।उसमें आस आ गई है। हे प्रभु !आपके दर्शन के सामने स्वर्ग का सुख भी बेकार है फिर आगे गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि

अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥

अपने संपूर्ण जीवन में जो यज्ञ, योग और जप और तप और साथ ही साथ व्रत अर्जित किया था ।उसे श्री राम के चरणों में  समर्पित कर दिया ।उसके बदले में श्रीराम से अनन्य भक्ति की मांग की ।उसके बाद फिर सरभंग मुनि ने अपनी योग विद्या के माध्यम से अपने शरीर को भस्म कर लेते हैं।

श्री राम वन की ओर जब प्रस्थान करते हैं। वन में अनेकों हड्डियों का ढेर दिखता है। फिर जिज्ञासावश श्री राम वहां के एक ग्वाल से पूछते हैं कि यह किसी जानवर का हड्डी है या किसी मनुष्य का ।इसके विषय में वह ग्वाल कहता है कि यह हड्डी ऋषि और मुनि का है। जो इस वन में तपस्या करते हैं यह राक्षस लोग ऋषि मुनि को खा करके उनके हड्डी का ढेर यहां पर ढेर लगा दिए हैं ।श्रीराम ऋषि मुनि के प्रति यह अत्याचार को देखकर फिर प्रतिज्ञा लेते हैं फिर इसके विषय में तुलसीदास जी लिखते हैं कि

अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥

फिर श्री राम अपने हाथ को उठाकर यह प्रतिज्ञा लेते हैं कि मैं इस धरती को राक्षसों से विहीन कर दूंगा फिर उसके बाद जाकर अनेक ऋषि मुनि से मिलते हैं। उसके बाद श्री राम ऋषि अगस्त्य की शिष्य सुतीक्ष्ण के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं। सुतीक्ष्ण श्री राम का अनन्य भक्त था ।वह श्री राम नाम का जाप प्रतिदिन करता था जिससे श्रीराम का उसे दर्शन हो जाए। तुलसीदास जी ने सुतीक्ष्ण के अनन्य भक्ति के विषय में लिखा है कि

मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥

सुतीक्ष्ण श्री राम के दर्शन करके आह्लादित हो उठे  फिर उसके बाद अपने गुरु ऋषि अगस्त्य के आश्रम की ओर ले जाते हैं गोस्वामी तुलसीदास ऋषि अगस्त्य के मिलन के विषय में लिखते हैं कि

पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा॥
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ॥

गुरुदेव श्री राज राजेश्वर श्री राम आपके आश्रम पहुंच चुके हैं। दंडवत की मुद्रा में सुतीक्ष्ण ने ऋषि अगस्त से कहाँ। ऋषि अगस्त्य श्रीराम से मिलने के बाद ऐसा अनुभव करते हैं कि जैसे कि सारे कर्मों का फल अभी इसी वक्त मिल गया है।राम भगवान को दिव्य धनुष और तुरीन देते हैं और लक्ष्मण को दिव्य तलवार देते हैं जिससे दंडकारण्य वन को राक्षसों के भय से मुक्ति दिलाई जा सके।

(4) सीताहरण 

श्रीराम पृथ्वी को राक्षसों से मुक्ति दिलाने के लिए पंचवटी में रहने लगते हैं। फिर एक दिन रावण की बहन शूपर्णखा आकाश यात्रा के माध्यम से श्री राम को देखती है। उनके सुंदर रूप को देखकर उनकी ओर आकर्षित हो जाती है । श्री राम से विवाह करने का प्रस्ताव रखती है। श्री राम ने कहा कि हे परम सुंदरी मैंने प्रतिज्ञा ले ली है कि मैं अब दूसरी शादी नहीं करूंगा । क्योंकि इसका कारण है कि मैंने एक पत्नी का प्रतिज्ञा लिया है । फिर राम भगवान बोलते हैं कि मेरे छोटे भाई लक्ष्मण से पूछो वह शायद आपकी इच्छा को पूर्ति कर दे ।

लक्ष्मण के पास जाती है। लक्ष्मण भी मना कर देते हैं कहते मैं तो श्रीराम का दास हूं ।दास से शादी करके आपको क्या मिलेगा? फिर वह क्रोध में आकर सीता को खाने के लिए दौड़ती है फिर लक्ष्मण राम के संकेत मात्र से शूपर्णखा की नाक को काट देते हैं।

तुलसीदास जी इस संदर्भ में लिखते हैं कि
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥

सुपर्णखा अपना प्रतिशोध लेने के लिए खर दूषण के पास जाती है । खर दूषण भी अपनी बहन की दुर्दशा को देखकर क्रोधित होते हैं। और राम से युद्ध करने के लिए पहुंच जाते हैं। खर दूषण और श्रीराम का भीषण युद्ध होता है। इस युद्ध में खर दूषण परास्त हो जाते है और परास्त होकर वीरगति को प्राप्त हो जाते है। फिर सुपर्णखा लंका की राजा और अपने भाई रावण के पास जाती है और अपने साथ हुई ज्यादती का वर्णन करती है। रावण फिर मारीच की सहायता से मां सीता के हरण की योजना बनाता है।

मारीच अपनी माया का उपयोग करके अपने शरीर को स्वर्ण मृग में बदल देता है। स्वर्ण मृग को देखकर सीता श्रीराम से जिद करने लगती है कि वह स्वर्ण मृग मुझे चाहिए। श्री राम उस स्वर्ण मृग को लाने के लिए उस मृग का पीछा करते हैं। वह मृग भागने लगता है श्री राम भी उसके पीछे भागने लगते हैं। जैसे ही श्रीराम अपना बाढ़ संधान करते हैं और उस मृग पर अपने बाण को छोड़ते हैं । बाण लगते ही वह श्री राम की आवाज में चिल्लाने लगता है कि बचाओ बचाओ यह सब सुनकर के  सीता का हृदय द्रवित हो जाता है। और लक्ष्मण से कहती है लक्ष्मण जाकर देखो कि तुम्हारे भैया किसी समस्या में है। उनकी तुम मदद करो लक्ष्मण ने कुटिया के चारों ओर एक लक्ष्मण रेखा खींच कर के अपने भैया की मदद के लिए चल देते हैं। रावण इस अवसर का लाभ उठाकर सीता का हरण कर लेता है

इस प्रसंग में तुलसीदास जी लिखते हैं कि
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।

(5) शबरी को जीवन का गूढ़ रहस्य बताना

सीता हरण के पश्चात राम लक्ष्मण सीता को ढूंढने लगते हैं ।फिर रास्ते में जटायु मिलते हैं ।जो घायल अवस्था में पड़े रहते हैं। जटायु ने बताया कि लंका के राजा रावण ने सीता का हरण लिया है। मैंने सीता को बचाने का प्रयास किया ।लेकिन मैं असफल रहा। इतना कहने के बाद जटायु की मृत्यु हो जाती है। फिर राम भगवान जटायु का अंतिम संस्कार करने के बाद सीता की खोज में वन वन भटकने लगते हैं। फिर ऋषि दुर्वासा के श्राप से  श्रापित काबन्ध का उद्धार करते हैं। काबन्ध बताते हैं कि आपकी सहायता आपकी परम भक्त शबरी कर सकती हैं ।राम भगवान शबरी के आश्रम की ओर चल पड़ती हैं। फिर आगे इसकेविषय में तुलसीदास जी लिखते हैं कि

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥

शबरी ने श्री राम को जब अपने आश्रम में देखा वह ऋषि मतंग के कथनों को याद करके भाव विभोर हो उठी।

14 comments:

  1. अति सुन्दर रचना 👍🏻

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  2. बहुत सुंदर।
    जय श्री राम 🌻🙏

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  3. जय श्री राम

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  4. 🙏🙏💐💐शुभरात्रि 🕉️
    👏सियावर रामचंद्र की जय 🚩
    🚩🚩जय जय सियाराम 🚩🚩
    👍👍👍बहुत सुन्दर प्रस्तुति के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद 💐💐

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