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नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना

क्या है इसके पीछे का रहस्य..?

जब भी हम किसी शिव मंदिर जाते हैं, तो अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग शिवलिंग के सामने बैठे नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं। ये एक परंपरा बन गई है। इस परंपरा के पीछे की वजह एक मान्यता है। आज हम इसी बारे में चर्चा करेंगे। 

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

इसलिए नंदी के कान में कहते हैं मनोकामना

मान्यता है जहां भी शिव मंदिर होता है, वहां नंदी की स्थापना भी जरूर की जाती है, क्योंकि नंदी भगवान शिव के परम भक्त हैं। जब भी कोई व्यक्ति शिव मंदिर में आता है, तो वह नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहता है। इसके पीछे मान्यता है कि भगवान शिव तपस्वी हैं और वे हमेशा समाधि में रहते हैं। ऐसे में उनकी समाधि और तपस्या में कोई विघ्न ना आए। इसलिए नंदी ही हमारी मनोकामना शिवजी तक पहुंचाते हैं। इसी मान्यता के चलते नंदी को लोग अपनी मनोकामना कहते हैं।

शिव के ही अवतार हैं नंदी

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

शिलाद नाम के एक मुनि थे, जो ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने उनसे संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद मुनि ने संतान भगवान शिव की प्रसन्न कर अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र मांगा। भगवान शिव ने शिलाद मुनि को ये वरदान दे दिया। एक दिन जब शिलाद मुनि भूमि जोत रहे थे, उन्हें एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। एक दिन मित्रा और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम आए। उन्होंने बताया कि नंदी अल्पायु हैं। यह सुनकर नंदी महादेव की आराधना करने लगे। प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और कहा कि तुम मेरे ही अंश हो, इसलिए तुम्हें मृत्यु से भय कैसे हो सकता है? ऐसा कहकर भगवान शिव ने नंदी का अपना गणाध्यक्ष भी बनाया।

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ?

ॐ नमः शिवाय 🙏🔱
हर हर महादेव 🙏🔱

इतवार

इतवार

Rupa Oos ki ek Boond

"बरसात में घुल रही है महक अदरक की,
आज बूंदों को भी चाय कि तलब लगेगी…!
❣️"

जो छूट गया उसका क्या मलाल करें,

जो हासिल है,चल उस से ही सवाल करें !!


बहुत दूर तक जाते है, याँदो के क़ाफ़िले,

फिर क्यों पुरानी याँदो में सुबह से शाम करें !!


माना इक कमी सी है,जिंदगी थमीं सी हैं,

पर क्यों दिल की धड़कनों को दर-किनार करें!!


मिल ही जाएगा जीने का कोई नया बहाना,

आ ज़रा इत्मीनान से किसी ख़ास का इंतज़ार करें !!


वैसे तो आज इतवार है,

छोड़ो दुनिया की बातें, एक कप चाय की प्याली से दिन की शुरुवात करें !!

Rupa Oos ki ek Boond

"इंतजार का वक्त इतना प्यारा ना होता,
अगर साथ में चाय का सहारा ना होता…
!
❣️"

भिखारी V/S व्यापारी

भिखारी V/S व्यापारी

एक था भिखारी ! रेल सफ़र में भीख़ माँगने के दौरान एक सूट बूट पहने सेठ जी उसे दिखे। उसने सोचा कि यह व्यक्ति बहुत अमीर लगता है, इससे भीख़ माँगने पर यह मुझे जरूर अच्छे पैसे देगा। वह उस सेठ से भीख़ माँगने लगा।

भिखारी V/S व्यापारी

भिख़ारी को देखकर उस सेठ ने कहा, “तुम हमेशा मांगते ही हो, क्या कभी किसी को कुछ देते भी हो?”

भिख़ारी बोला- “साहब मैं तो भिख़ारी हूँ, हमेशा लोगों से मांगता ही रहता हूँ, मेरी इतनी औकात कहाँ कि किसी को कुछ दे सकूँ?”

सेठ - जब किसी को कुछ दे नहीं सकते तो तुम्हें मांगने का भी कोई हक़ नहीं है। मैं एक व्यापारी हूँ और लेन-देन में ही विश्वास करता हूँ, अगर तुम्हारे पास मुझे कुछ देने को हो तभी मैं तुम्हे बदले में कुछ दे सकता हूँ।

तभी वह स्टेशन आ गया जहाँ पर उस सेठ को उतरना था, वह ट्रेन से उतरा और चला गया।

इधर भिख़ारी सेठ की कही गई बात के बारे में सोचने लगा। सेठ के द्वारा कही गयी बात उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह सोचने लगा कि शायद मुझे भीख में अधिक पैसा इसीलिए नहीं मिलता क्योकि मैं उसके बदले में किसी को कुछ दे नहीं पाता हूँ। लेकिन मैं तो भिखारी हूँ, किसी को कुछ देने लायक भी नहीं हूँ। लेकिन कब तक मैं लोगों को बिना कुछ दिए केवल मांगता ही रहूँगा।

बहुत सोचने के बाद भिख़ारी ने निर्णय किया कि जो भी व्यक्ति उसे भीख देगा तो उसके बदले मे वह भी उस व्यक्ति को कुछ जरूर देगा। लेकिन अब उसके दिमाग में यह प्रश्न चल रहा था कि वह खुद भिख़ारी है, तो भीख के बदले में वह दूसरों को क्या दे सकता है?

इस बात को सोचते हुए दिनभर गुजरा लेकिन उसे अपने प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला।

दुसरे दिन जब वह स्टेशन के पास बैठा हुआ था तभी उसकी नजर कुछ फूलों पर पड़ी जो स्टेशन के आस-पास के पौधों पर खिल रहे थे, उसने सोचा, क्यों न मैं लोगों को भीख़ के बदले कुछ फूल दे दिया करूँ। उसको अपना यह विचार अच्छा लगा और उसने वहां से कुछ फूल तोड़ लिए।

वह ट्रेन में भीख मांगने पहुंचा। जब भी कोई उसे भीख देता तो उसके बदले में वह भीख देने वाले को कुछ फूल दे देता। उन फूलों को लोग खुश होकर अपने पास रख लेते थे। अब भिख़ारी रोज फूल तोड़ता और भीख के बदले में उन फूलों को लोगों में बांट देता था।

कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि अब उसे बहुत अधिक लोग भीख देने लगे हैं। वह स्टेशन के पास के सभी फूलों को तोड़ लाता था। जब तक उसके पास फूल रहते थे तब तक उसे बहुत से लोग भीख देते थे। लेकिन जब फूल बांटते बांटते ख़त्म हो जाते तो उसे भीख भी नहीं मिलती थी, अब रोज ऐसा ही चलता रहा।

एक दिन जब वह भीख मांग रहा था तो उसने देखा कि वही सेठ ट्रेन में बैठे है जिसकी वजह से उसे भीख के बदले फूल देने की प्रेरणा मिली थी।

वह तुरंत उस व्यक्ति के पास पहुंच गया और भीख मांगते हुए बोला - आज मेरे पास आपको देने के लिए कुछ फूल हैं, आप मुझे भीख दीजिये बदले में मैं आपको कुछ फूल दूंगा।

सेठ ने उसे भीख के रूप में कुछ पैसे दे दिए और भिख़ारी ने कुछ फूल उसे दे दिए। उस सेठ को यह बात बहुत पसंद आयी।

सेठ - वाह क्या बात है..? आज तुम भी मेरी तरह एक व्यापारी बन गए हो, इतना कहकर फूल लेकर वह सेठ स्टेशन पर उतर गया।

लेकिन उस सेठ द्वारा कही गई बात एक बार फिर से उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह बार-बार उस सेठ के द्वारा कही गई बात के बारे में सोचने लगा और बहुत खुश होने लगा। उसकी आँखे अब चमकने लगीं, उसे लगने लगा कि अब उसके हाथ सफलता की वह चाबी लग गई है जिसके द्वारा वह अपने जीवन को बदल सकता है।

वह तुरंत ट्रेन से नीचे उतरा और उत्साहित होकर बहुत तेज आवाज में ऊपर आसमान की ओर देखकर बोला, “मैं भिखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ।

मैं भी उस सेठ जैसा बन सकता हूँ। मैं भी अमीर बन सकता हूँ।

लोगों ने उसे देखा तो सोचा कि शायद यह भिख़ारी पागल हो गया है। अगले दिन से वह भिख़ारी उस स्टेशन पर फिर कभी नहीं दिखा।

एक वर्ष बाद इसी स्टेशन पर दो व्यक्ति सूट बूट पहने हुए यात्रा कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उनमे से एक ने दूसरे को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा, “क्या आपने मुझे पहचाना?”

सेठ - “नहीं तो ! शायद हम लोग पहली बार मिल रहे हैं।”

भिखारी - सेठ जी.. आप याद कीजिए, हम पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार मिल रहे हैं।

सेठ - मुझे याद नहीं आ रहा, वैसे हम पहले दो बार कब मिले थे?

अब पहला व्यक्ति मुस्कुराया और बोला: हम पहले भी दो बार इसी ट्रेन में मिले थे, मैं वही भिख़ारी हूँ जिसको आपने पहली मुलाकात में बताया कि मुझे जीवन में क्या करना चाहिए और दूसरी मुलाकात में बताया कि मैं वास्तव में कौन हूँ।

नतीजा यह निकला कि आज मैं फूलों का एक बहुत बड़ा व्यापारी हूँ और इसी व्यापार के काम से दूसरे शहर जा रहा हूँ।

आपने मुझे पहली मुलाकात में प्रकृति का नियम बताया था, जिसके अनुसार हमें तभी कुछ मिलता है, जब हम कुछ देते हैं। लेन देन का यह नियम वास्तव में काम करता है, मैंने यह बहुत अच्छी तरह महसूस किया है, लेकिन मैं खुद को हमेशा भिख़ारी ही समझता रहा, इससे ऊपर उठकर मैंने कभी सोचा ही नहीं था और जब आपसे मेरी दूसरी मुलाकात हुई तब आपने मुझे बताया कि मैं एक व्यापारी बन चुका हूँ। अब मैं समझ चुका था कि मैं वास्तव में एक भिखारी नहीं बल्कि व्यापारी बन चुका हूँ।

भारतीय मनीषियों ने संभवतः इसीलिए स्वयं को जानने पर सबसे अधिक जोर दिया और फिर कहा -

सोऽहं 
शिवोहम !!

समझ की ही तो बात है...

भिखारी ने स्वयं को जब तक भिखारी समझा, वह भिखारी रहा। उसने स्वयं को व्यापारी मान लिया, व्यापारी बन गया।

जिस दिन हम समझ लेंगे कि मैं कौन हूँ...अर्थात मैं भगवान का अंश हूॅ। फिर जानने समझने को रह ही क्या जाएगा ?

English Translate

Beggar V/S Trader

One was a beggar! While begging in the train journey, he saw Seth ji wearing a suit boot. He thought that this person looks very rich, he will definitely give me good money if I beg him. He started begging from that Seth.

Seeing the beggar, that Seth said, "You always beg, do you ever give anything to anyone?"

The beggar said - "Sir, I am a beggar, I always beg from people, where is my status that I can give something to someone?"

Seth - When you cannot give anything to anyone, then you have no right to even ask. I am a businessman and believe in transaction only, if you have something to give me then only I can give you something in return.

Only then the station came where that Seth had to get down, he got off the train and left.

Here the beggar started thinking about what Seth had said. What was said by Seth entered the heart of that beggar. He started thinking that maybe I don't get much money in begging because I am not able to give anything to anyone in return. But I am a beggar, I am not even capable of giving anything to anyone. But how long will I keep asking people without giving anything.

After thinking a lot, the beggar decided that whatever person gives him alms, he will definitely give something to that person in return. But now the question was running in his mind that he himself is a beggar, so what can he give to others in return of alms?

The whole day passed thinking about this but he could not find any answer to his question.

The next day when he was sitting near the station, he saw some flowers which were blooming on the plants around the station, he thought, why not give some flowers instead of alms to the people. He liked this idea of his and plucked some flowers from there.

He reached to beg in the train. Whenever someone gave him alms, he would give some flowers to the beggar in return. People happily kept those flowers with them. Now the beggar used to pluck flowers everyday and in return of alms he used to distribute those flowers among the people.

Within a few days, he realized that now too many people have started begging him. He used to pluck all the flowers near the station. As long as flowers remained with him, many people used to give him alms. But when the flowers were finished while being distributed, he did not even get alms, now it continued like this everyday.

One day when he was begging, he saw the same Seth sitting in the train, because of which he was inspired to give flowers instead of alms.

He immediately reached to that person and begged - today I have some flowers to give you, you give me alms, I will give you some flowers in return.

Seth gave him some money as alms and the beggar gave him some flowers. That Seth liked this very much.

Seth - Wow what's the matter..? Today you have also become a businessman like me, saying this, he took the flower and got down at the Seth station.

But what was said by that Seth once again entered the heart of that beggar. He started thinking about what that Seth had said again and again and became very happy. His eyes started shining now, he felt that now he has got the key to success in his hands by which he can change his life.

He immediately got down from the train and excitedly looking up at the sky said in a very loud voice, “I am not a beggar, I am a businessman.

I too can become like that Seth. I too can become rich.

When people saw him, they thought that perhaps this beggar has gone mad. From the next day that beggar was never seen again at that station.

A year later, two persons were traveling at the same station wearing suit boots. When both saw each other, one of them bowed to the other with folded hands and said, "Did you recognize me?"

Seth - "No! Maybe we are meeting for the first time."

Beggar - Seth ji.. You remember, we are meeting not for the first time but for the third time.

Seth - I can't remember, when was the first time we met?

Now the first person smiled and said: We met twice before in the same train, I am the same beggar whom you told in the first meeting what I should do in life and in the second meeting you told who I really am.

As a result, today I am a very big trader of flowers and I am going to another city for the work of this business.

You told me the law of nature in the first meeting, according to which we get something only when we give something. This rule of transaction really works, I have felt it very well, but I always thought of myself as a beggar, I never thought of rising above this and when I met you for the second time, you told me that I have become a businessman. Now I understood that I have not really become a beggar but a businessman.

Perhaps that is why Indian sages laid maximum emphasis on knowing oneself and then said –

As long as a beggar considered himself a beggar, he remained a beggar. He considered himself a businessman, became a businessman.

The day we will understand who I am... means I am a part of God. Then what will be left to know and understand?

महाराष्ट्र का राज्य पक्षी (State Bird of Maharastra ) || हरियल (Treron phoenicoptera) (Yellow-footed Green-Pigeon)

हरियल (Treron phoenicoptera)(Yellow-footed Green-Pigeon)

आज मिलते हैं एक और बेहद खूबसूरत चिड़िया से जो महाराष्ट्र का राज्य की राज्य पक्षी है, इसका नाम है ‘हरियल पक्षी’ (Hariyal Pakshi)। हर राज्य का राजकीय पशु, पक्षी, वृक्ष, पुष्प आदि होते हैं, जिनमें से पिछले कुछ अंकों से हम राज्य के राजकीय पक्षी की चर्चा कर रहे हैं। इसी क्रम में आज महाराष्ट्र के राजकीय पक्षी की चर्चा करेंगे। 

महाराष्ट्र  का राज्य पक्षी  (State Bird of Maharastra ) || ‘हरियल पक्षी’ (Hariyal Pakshi) ||

हर राज्यों की तरह महाराष्ट्र द्वारा भी राज्य का राजकीय पक्षी चुना गया है। यह पक्षी दिखने में बेहद सुंदर है और ऊँचे पेड़ों पर निवास करता है। इसकी विशेष बात ये है कि ये कभी जमीन पर नहीं उतरता। वर्ष 1985 में इंडियन बोर्ड ऑफ़ वाइल्ड लाइफ द्वारा भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे अपने राज्य का राजकीय पशु, पक्षी, वृक्ष, पुष्प आदि घोषित करें। कई राज्यों के इस प्रक्रिया में रूचि दिखाई, कईओं ने नहीं दिखाई।

हरियल पक्षी कबूतर की तरह दिखने वाला पक्षी है। इसका रंग हल्का हरा-पीला होता है। रंग के कारण ही इसे ‘हरियल पक्षी’ कहा जाता है। इसके सिर के ऊपर हल्के नीले भूरे रंग के बाल होते हैं। इसक आकार 29 से.मी से 33 सेमी और वजन 225 ग्राम से 260 ग्राम होता है। इसके पंखों का फैलाव 17 सेमी से 19 सेमी होता है। इसकी आँखों का रंग काला होता है। आँखों के आसपास लाल रंग की रिंग होती हैं तथा पैर चमकीले पीले रंग के होते हैं। नर मादा दिखने में एक जैसे होते हैं। बस नर की तुलना में मादा थोड़ी सुस्त होती है। 

महाराष्ट्र  का राज्य पक्षी  (State Bird of Maharastra ) || ‘हरियल पक्षी’ (Hariyal Pakshi) ||

हरियल पक्षी मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला पक्षी हैं। यह पक्षी भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, बर्मा, नेपाल, बांग्लादेश के अतिरिक्त कंबोडिया, चीन में भी पाया जाता है। भारत में यह उत्तरी-पश्चिम रेगिस्तानी क्षेत्र को छोड़कर संपूर्ण भारत में पाए जाते हैं। भारत में हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक और राजस्थान से लेकर पूर्व में असम तक पाये जाते हैं। यह महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी है, लेकिन उत्तर प्रदेश में बहुतायत में पाया जाता है। 

हरियल पक्षी सदाबहार जंगलों में रहते हैं। इन्हें ऊँचे-ऊँचे पेड़ों वाले जंगलों में रहना पसंद है। ये पीपल या बरगद के पेड़ पर तिनकों और पत्तियों से अपना घोंसला बनाता है। हरियल पक्षी पूर्णतः शाकाहारी होता है। यह कई प्रकार के फल खाते हैं। अनाज के दाने भी खाते हैं। कई प्रकार के फूलों की कलियाँ, छोटे पौधों के अंकुर और बीज खाना पसंद करते हैं। हरियल पक्षी पके फल बड़े चाव से खाते हैं और फल खाते समय कलाबाजियां भी करते हैं। इसके पीपल से लेकर बड, गूलर, अंजीर के पेड़ों के पत्ते  खाते हैं। यह बहुत खाऊ पक्षी है और इसे बेर, चिरौंजी जामुन के फल ज्यादा पसंद हैं। 

महाराष्ट्र  का राज्य पक्षी  (State Bird of Maharastra ) || ‘हरियल पक्षी’ (Hariyal Pakshi) ||

हरियल पक्षी के बारे में रोचक तथ्य 

  1. हरियक पक्षी जमीन पर बहुत कम उत्तरते हैं और सारा जीवन पेड़ पर बिता देते हैं। इन्हें पतझड़ या सदाबहार जंगलों के पेड़ ज्यादा पसंद होते हैं।
  2. हरियल पक्षी की सबसे विशेष बात ये है कि ये कभी जमीन पर पैर नहीं रखता। यदि इसे कभी जमीन पर उतरना भी पड़े, तो ये अपने पैरों में लकड़ी का टुकड़ा लेकर उतरता है। 
  3. ये पानी पीने के लिए भी जमीन पर नहीं उतरता, बल्कि फलों और पत्तियों पर जमी ओंस से ही अपनी प्यास बुझा लेता है। 
  4. हरियल पक्षी बहुत शर्मीला पक्षी है, जो इंसान को देखते ही चुप्पी साध लेता है। 
  5. हरियल पक्षी का जीवनकाल 26 वर्ष होता है।
  6. हरियल पक्षी आजीवन एक ही साथी के साथ जीवन व्यतीत करते हैं। 
  7. कबूतर की तरह हरियल पक्षी एक सामाजिक पक्षी है और समूह में रहते हैं। इनका छोटा समूह 5 से 10 पक्षियों का होता है। ये समूह में उड़ान भरते हैं। 
  8. हरियल पक्षी की आवाज़ सीटी जैसी मधुर होती है।
  9. हरियल पक्षी प्रजनन काल मार्च से जून तक होता है।
  10. मादा हरियल पक्षी एक बार में 1 या 2 अंडे देती है।
  11. हरियल पक्षी के अंडे चिकने और लीची के आकार के होते हैं तथा चमकीले सफ़ेद रंग के होते हैं।
  12. नर और मादा दोनों अंडों की देखभाल करते हैं। ये अंडों को 13 दिन तक सेते हैं।
  13. हरियल पक्षी का मांस नरम होता है, जिसके कारण इसका अधिक शिकार होता है।
  14. हरियल पक्षी विलुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में शामिल है। 
English Translate

Yellow-footed Green-Pigeon (Treron phoenicoptera)

Today we meet another very beautiful bird which is the state bird of Maharashtra, its name is 'Hariyal Pakshi'. Every state has its state animal, bird, tree, flower, etc., out of which we are discussing the state bird from the last few points. In this sequence, today we will discuss about the state bird of Maharashtra.
महाराष्ट्र  का राज्य पक्षी  (State Bird of Maharastra ) || ‘हरियल पक्षी’ (Hariyal Pakshi) ||

Like every state, Maharashtra has also chosen the state bird as its state bird. This bird is very beautiful in appearance and lives on tall trees. Its special thing is that it never lands on the ground. In the year 1985, the Indian Board of Wild Life ordered the states and union territories of India to declare their state animal, bird, tree, flower etc. Many states showed interest in this process, many did not.

Harial bird is a pigeon-like bird. Its color is light greenish-yellow. Because of its colour, it is called the 'green bird'. It has light blue brown hair on top of its head. Its size is 29 cm to 33 cm and weight is 225 grams to 260 grams. The spread of its wings is 17 cm to 19 cm. The color of its eyes is black. There are red rings around the eyes and the legs are bright yellow. Males are similar in appearance to females. The female is just a bit duller than the male.

Harial birds are mainly birds found in the Indian subcontinent. Apart from India, Sri Lanka, Pakistan, Burma, Nepal, Bangladesh, this bird is also found in Cambodia, China. In India, it is found all over India except the north-west desert region. In India, it is found from the Himalayas to Kanyakumari and from Rajasthan to Assam in the east. It is the state bird of Maharashtra, but is found in abundance in Uttar Pradesh.

Harial birds live in evergreen forests. They like to live in forests with tall trees. It builds its nest on a Peepal or Banyan tree with straws and leaves. Harial bird is completely vegetarian. It eats many types of fruits. They also eat grain grains. Likes to eat buds of many types of flowers, shoots and seeds of small plants. Harial birds eat ripe fruits with great gusto and also do acrobatics while eating fruits. From its peepal to bud, sycamore, leaves of fig trees are eaten. It is a very voracious bird and likes the fruits of ber, chironji jamun more.
महाराष्ट्र  का राज्य पक्षी  (State Bird of Maharastra ) || ‘हरियल पक्षी’ (Hariyal Pakshi) ||

interesting facts about green bird

  1. Hariyak birds answer very little on the ground and spend their whole life on the tree. They like trees of autumn or evergreen forests more.
  2. The most special thing about the green bird is that it never sets foot on the ground. If it ever has to land on the ground, it lands with a piece of wood in its feet.
  3. It does not descend to the ground even to drink water, but quenches its thirst only by the dew on fruits and leaves.
  4. Harial bird is a very shy bird, which takes silence on seeing a human being.
  5. The life span of Hariyal bird is 26 years.
  6. Harial birds spend life with only one partner.
  7. Harial birds like pigeons are a social bird and live in groups. Their small group is of 5 to 10 birds. They fly in groups.
  8. Hariyal bird's voice is as sweet as a whistle.
  9. Harial bird breeding season is from March to June.
  10. The female green bird lays 1 or 2 eggs at a time.
  11. The eggs of the Hariyal bird are smooth and litchi shaped and are bright white in colour.
  12. Both the male and the female take care of the eggs. They incubate the eggs for 13 days.
  13. The meat of Harial bird is soft, due to which it is more hunted.
  14. The green bird is included in the category of endangered species.

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta) अथ द्वादशोऽध्यायः- भक्तियोग अनुच्छेद 01-20

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

इस ब्लॉग के माध्यम से हम सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता प्रकाशित कर रहे हैं, इसके तहत हम सभी 18 अध्यायों और उनके सभी श्लोकों का सरल अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करेंगे। 

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के 18 अध्यायों में से अध्याय 1,2,3,4,5, 6, 7, 8,9, 10 और 11 के पूरे होने के बाद आज प्रस्तुत है, अध्याय 12 के सभी अनुच्छेद।

अथ द्वादशोऽध्यायः- भक्तियोग

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय

अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः || 12.1 ||

भावार्थ : 

अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?॥1॥

श्रीभगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः || 12.2 ||

भावार्थ : 

श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए (अर्थात गीता अध्याय 11 श्लोक 55 में लिखे हुए प्रकार से निरन्तर मेरे में लगे हुए) जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं॥2॥

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌  || 12.3 ||
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः  || 12.4 ||

भावार्थ : 

परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं॥

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌ ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते  || 12.5 ||

भावार्थ : 

उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है॥5॥

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते  || 12.6 ||

भावार्थ : 

परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। (इस श्लोक का विशेष भाव जानने के लिए गीता अध्याय 11 श्लोक 55 देखना चाहिए)॥6॥

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌  || 12.7 ||

भावार्थ : 

हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ॥7॥

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः  || 12.8 ||

भावार्थ : 

मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥8॥

अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌ ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय  || 12.9 ||

भावार्थ : 

यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर॥9॥

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि  || 12.10 ||

भावार्थ : 

यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण (स्वार्थ को त्यागकर तथा परमेश्वर को ही परम आश्रय और परम गति समझकर, निष्काम प्रेमभाव से सती-शिरोमणि, पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और शरीर द्वारा परमेश्वर के ही लिए यज्ञ, दान और तपादि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों के करने का नाम 'भगवदर्थ कर्म करने के परायण होना' है) हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा॥10॥

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌  || 12.11 ||

भावार्थ : 

यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में विस्तार देखना चाहिए) कर॥11॥

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌  || 12.12 ||

भावार्थ : 

मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग (केवल भगवदर्थ कर्म करने वाले पुरुष का भगवान में प्रेम और श्रद्धा तथा भगवान का चिन्तन भी बना रहता है, इसलिए ध्यान से 'कर्मफल का त्याग' श्रेष्ठ कहा है) श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है॥12॥

भगवत्‌-प्राप्त पुरुषों के लक्षण

अर्जुन उवाच

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्‍कारः समदुःखसुखः क्षमी  || 12.13 ||
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः || 12.14 ||

भावार्थ : 

जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है- वह मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥13-14॥

श्रीभगवानुवाच

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः || 12.15 ||

भावार्थ : 

जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (दूसरे की उन्नति को देखकर संताप होने का नाम 'अमर्ष' है), भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है॥15॥

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः || 12.16 ||

भावार्थ : 

जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए) चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है॥16॥

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः || 12.17 ||

भावार्थ : 

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है॥17॥

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्‍गविवर्जितः || 12.18 ||

भावार्थ : 

जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है॥18॥

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः || 12.19 ||

भावार्थ : 

जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है॥19॥

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः || 12.20 ||

भावार्थ : 

परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम 'श्रद्धा' है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं॥20॥

अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)

अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस

अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस, विश्व में रहने वाले आदिवासी लोगों के मूलभूत अधिकारों जल, जंगल, जमीन को बढ़ावा देने और उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और न्यायिक सुरक्षा के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है। विश्व मे आदिवासी समुदाय की जनसंख्या लगभग 37 करोड़ है, जिसमें लगभग 5000 अलग–अलग आदिवासी समुदाय है और इनकी लगभग 7 हजार भाषाएं हैं। आदिवासी समाज के उत्थान और उनकी संस्कृति व सम्मान को बचाने के लिए हर साल 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस (World Tribal Day) के तौर पर मनाया जाता है।

अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)

प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को पूरी दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोग सामुदायिक कार्यक्रम का आयोजन करते हैं जिसमें अपने सभ्यताओं रीति रिवाज को उत्सव के रूप में मनाते हैं और सामूहिक रूप से खुशियों का इजहार करते हैं आदिवासी समुदाय प्रकृति की पूजा करते हैं इस दिन खुशी के इस खुशी के मौके पर प्रकृति में पाए जाने वाले सभी जीव जंतु पर्वत नदियां नाल खेत सूरज चांद इत्यादि इन सभी की पूजा करते हैं आदिवासी समुदाय मानते हैं की प्रकृति की हर एक वस्तु में जीवन होता है इस दिन आदिवासी समुदाय के लोग अपने खेतों और घरों में एक विशिष्ट प्रकार का झंडा लगाते हैं जिसमें सूरज चांद तारे इत्यादि सभी प्रतीक होते हैं और यह झंडे किसी भी रंग के हो सकते हैं किसी विशेष रंग से बंधे हुए नहीं होते हैं।
अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)
भारत समेत विश्व के कई देशों में आदिवासी जाति (World Tribal Day 2021) के लोग रहते हैं। इनका रहन-सहन, खान-पान और रीति-रिवाज और पहनावा आदि बाकी अन्य लोगों से अलग होता है। समाज के मुख्यधारा से कटे होने की वजह से दुनियाभर में आदिवासी लोग आज भी काफी पिछड़े हुए हैं। हालांकि, समाज के मुख्यधारा से जोड़ने और आगे बढ़ाने के लिए देश-दुनिया में तमाम तरह के सरकारी कार्यक्रम और गैर-सरकारी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। भारत की बात करें तो देश की आजादी में आदिवासी समाज के लोगों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। आजादी की लड़ाई में बिरसा मुंडा ने झारखंड और छोटानागपुर क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाई थी।
अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)
पहली बार अमरीका में 1994 में आदिवासी दिवस मनाया गया था। इसके बाद से पूरे विश्व में 9 अगस्त को आदिवासी दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार 1994 को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी वर्ष घोषित किया था। विश्व के आदिवासी लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दिसंबर 1994 में घोषित किया गया था, जिसे हर साल विश्व के आदिवासी लोगों (1995-2004) के पहले अंतर्राष्ट्रीय दशक के दौरान मनाया जाता है। 2004 में असेंबली ने "ए डिकैड फ़ॉर एक्शन एंड डिग्निटी" की थीम के साथ, 2005-2015 से एक दूसरे अंतर्राष्ट्रीय दशक की घोषणा की। आदिवासी लोगों पर संयुक्त राष्ट्र के संदेश को फैलाने के लिए विभिन्न देशों के लोगों को दिन के अवलोकन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। गतिविधियों में शैक्षिक मंच और कक्षा की गतिविधियाँ शामिल हो सकती हैं ताकि एक सराहना और आदिवासी लोगों की बेहतर समझ प्राप्त हो सके।

23 दिसंबर 1994 के प्रस्ताव 49/214 द्वारा, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने निर्णय लिया कि विश्व के आदिवासी लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दशक के दौरान अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस हर साल 9 अगस्त को मनाया जाएगा।
अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)

अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस 2023 का थीम 

हर साल इस दिन को मनाने की एक विशेष थीम होती है। इस साल की थीम महिलाओं पर केंद्रित है। यह ‘आदिवासी महिलाओं की भूमिका है, जो पैतृक ज्ञान को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण हैं जो बड़े पैमाने पर समाज के लिए सहायक हो सकते हैं। आदिवासी महिलाएं अपने क्षेत्रों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा में भाग ले रही हैं। वे मूल जनजातियों के अधिकारों के लिए भी लड़ते हैं।उनके योगदान के बावजूद, आदिवासी महिलाओं को वह प्रतिनिधित्व नहीं मिलता जिसकी वे हकदार हैं। उन्हें कभी-कभी हिंसा और भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। इन सामान्य मुद्दों पर इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र की डीईएसए बैठक में चर्चा की जाएगी, जो महामारी की स्थिति को देखते हुए वस्तुतः इस दिन होगी। संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश, आदिवासी लोग, नागरिक समाज के प्रतिनिधि, अन्य संयुक्त राष्ट्र संस्थाएँ और यहाँ तक कि आम जनता भी बैठक में भाग लेगी।
अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)

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International Tribal Day

International Tribal Day is celebrated every year on 9th August to promote the fundamental rights of indigenous people living in the world to water, forest, land and their social, economic, political and judicial security. The population of tribal community in the world is about 370 million, in which there are about 5000 different tribal communities and they have about 7 thousand languages. Every year 9th August is celebrated as International Tribal Day for the upliftment of tribal society and to save their culture and honour.
अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)
Every year on 9th August, people of tribal communities living in different regions all over the world organize community programs in which they celebrate their civilizations, customs as festivals and collectively express happiness. Tribal communities worship nature. On this day of happiness, all the creatures found in nature, animals, mountains, rivers, canals, fields, sun, moon, etc., are worshiped by the tribal community. They believe that there is life in every object of nature. People put a special type of flag in their fields and homes, which have all the symbols like sun, moon, stars, etc. and these flags can be of any color and are not tied to any particular color.

People of tribal caste (World Tribal Day 2021) live in many countries of the world including India. Their way of living, eating habits and customs and dress etc. are different from other people. Due to being cut off from the mainstream of the society, tribal people all over the world are still very backward. However, to connect and move forward with the mainstream of the society, all kinds of government programs and non-government programs are being run in the country and the world. If we talk about India, the people of tribal society have contributed a lot in the independence of the country. Birsa Munda had played a big role in the freedom struggle in Jharkhand and Chhotanagpur region.
अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)
For the first time, Tribal Day was celebrated in America in 1994. After this, August 9 was celebrated as Tribal Day all over the world. The United Nations General Assembly first declared 1994 as the International Year of the Indigenous Peoples. The International Day of the World's Indigenous Peoples was first proclaimed by the United Nations General Assembly in December 1994, to be observed annually during the first International Decade of the World's Indigenous Peoples (1995–2004). In 2004 the Assembly proclaimed a second International Decade, from 2005–2015, with the theme of "A Decade for Action and Dignity". People from different countries are encouraged to participate in the observation of the day to spread the message of the United Nations on indigenous peoples. Activities may include educational forums and classroom activities to gain an appreciation and better understanding of Aboriginal peoples.

By resolution 49/214 of 23 December 1994, the United Nations General Assembly decided that the International Day of Indigenous Peoples would be observed on 9 August every year during the International Decade of the World's Indigenous Peoples.

Theme of International Tribal Day 2023

अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Tribal Day)
Every year there is a special theme to celebrate this day. This year's theme focuses on women. It is the role of 'tribal women, who are important in preserving ancestral knowledge that can be of use to society at large'. Tribal women are participating in protecting their territories and natural resources. They also fight for the rights of the native tribes. Despite their contribution, tribal women do not get the representation they deserve. They are sometimes subjected to violence and discrimination. These general issues will be discussed at the UN's DESA meeting this year, which will take place virtually on this day given the pandemic situation. UN member states, indigenous peoples, representatives of civil society, other UN organizations and even the general public will participate in the meeting.

हर शुभ कार्य से पहले क्यों बनाया जाता है स्वास्तिक?

हर शुभ कार्य से पहले क्यों बनाया जाता है स्वास्तिक?

स्वास्तिक को प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में अच्छाई और शुभता का प्रतीक माना जाता रहा है। हिन्दू धर्म में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले स्वास्तिक का चिन्ह जरूर बनाया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क शब्दों से मिलकर बना है। 'सु' का अर्थ है अच्छा या शुभ, 'अस' का अर्थ है 'शक्ति' या 'अस्तित्व' और 'अ' का अर्थ है 'कर्ता' या कर्ता। इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं है, बल्कि इसमें समस्त विश्व का कल्याण या 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना निहित है। 

हर शुभ कार्य से पहले क्यों बनाया जाता है स्वास्तिक?

स्वास्तिक का अर्थ है 'स्वास्तिक' कौशल या कल्याण का प्रतीक है। स्वास्तिक में एक दूसरे को काटने वाली दो सीधी रेखाएँ होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएं उनके सिर पर थोड़ा आगे मुड़ जाती हैं। स्वास्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है। पहला स्वस्तिक, जिसमें रेखाएं आगे की ओर इशारा करते हुए हमारे दाहिनी ओर मुड़ जाती हैं। इसे 'स्वस्तिक' कहते हैं। यह शुभ संकेत है, जो हमारी प्रगति का संकेत देता है। 

ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सिद्धांतसार नामक ग्रन्थ में इन्हें जगत् जगत का प्रतीक माना गया है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में वर्णित किया गया है। अन्य ग्रंथों में स्वस्तिक में चार वर्ण, चार आश्रम और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, सामाजिक व्यवस्था और व्यक्तिगत मान्यताओं को जीवित रखने वाले लक्षण बताए गए हैं। स्वास्तिक की चार रेखाओं को जोड़ने के बाद बीच में बने बिंदु को भी अलग-अलग मान्यताओं से परिभाषित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यदि स्वस्तिक की चार रेखाओं को भगवान ब्रह्मा के चार सिरों के बराबर माना जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप मध्य में बिंदु भगवान विष्णु की नाभि है, जिससे भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं।

हर शुभ कार्य से पहले क्यों बनाया जाता है स्वास्तिक?

स्वास्तिक में भगवान गणेश और नारद की शक्तियां समाहित हैं। स्वास्तिक को भगवान विष्णु और सूर्य का आसन माना गया है। स्वस्तिक का बायां भाग गणेश की शक्ति 'ग' बीज मंत्र का स्थान है। 

प्राचीन हिंदू प्रतीक: स्वस्तिक का इतिहास, दुनिया में हर जगह मौजूद है

आज के संचार युग में जब प्रत्येक व्यक्ति के लिए किसी भी देश की यात्रा करने और किसी से भी संवाद बेहद आसान है, हम सोचते हैं कि प्राचीन काल में लोग अपनी संस्कृति और विचारों को साझा करने में सक्षम नहीं थे। लेकिन जब हम प्राचीन ग्रंथ का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, तो हम पाते हैं कि संस्कृतियों के बीच इतनी समानताएं हैं, चाहे वह प्राचीन बाढ़ के बारे में हो या ब्रह्मांड निर्माण पौराणिक कथाओं के बारे में हो। यह लगभग हर संस्कृति में समान है जो समुद्र से हजारों मील दूर थी।

ऐसी कोई जगह नहीं है जहां स्वास्तिक प्रतीक मौजूद न हो। यह हर प्रकार के धार्मिक स्मारकों में दिखाई देता है, इसका उपयोग मिट्टी के बर्तनों में किया जाता था, यह आंशिक रूप से दैनिक पूजा प्रथाओं के लिए उपयोग किया जाता है, और इसका उपयोग हेलमेट और तलवार जैसे युद्ध के सामान में किया जाता है। इसे स्वास्तिक कहते हैं।

हर शुभ कार्य से पहले क्यों बनाया जाता है स्वास्तिक?

स्वास्तिक चिन्ह का उपयोग दुनिया की लगभग हर प्राचीन सभ्यता में मिलता है। बौद्ध, ग्रीक, रोमन, ईसाई, मध्ययुगीन हर काल और समय में इस प्रतीक चिन्ह को देखा गया है। स्थान और सभ्यता के अनुसार स्वास्तिक का नाम भी अलग अलग होता रहता है। सबसे पुराना स्वास्तिक चिन्ह उक्रेन की गुफाओं में मिला है।

प्रतीक स्वास्तिक के बारे में 10 आश्चर्यजनक तथ्य:

  1. शोधकर्ताओं के अनुसार स्वास्तिक का चिह्न आर्य युग और सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुराना है। 
  2. स्वास्तिक अपनी शुभता की वजह से जाना जाता है और यह शांति एवं निरंतरता का प्रतीक है। हिटलर ने अपने आर्य वर्चस्व सिद्धांत के लिए चुना था।
  3. इसे प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध से पहले नाजी जर्मनी की नाजी पार्टी ने अपनाया था। स्वास्तिक 11,000 वर्षों से भी पुराना है और पश्चिमी एवं मध्य– पूर्वी सभ्यताओं तक इसके प्रसार का पता चलता है।
  4. आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि यूक्रेन का स्वास्तिक पाषाण काल के समय यानि 12,000 वर्ष पुराना माना जाता है।
  5. खोज के दौरान शोधकर्ताओं को स्वास्तिक के बारे में जानकारी मिली कि आर्य सभ्यता के साथ संबंधित ऋग्वेद से भी यह पुराना है। शायद पूर्व– हड़प्पा युग से भी पुराना, जब श्रुति परंपरा में यह मौजूद था और मौखिक रूप से इसे सिंधु घाटी सभ्यता को सौंपा गया था।
  6. पूर्व– हड़प्पा काल में स्वास्तिक सबसे अधिक परिपक्व पाया गया। साथ ही यह ज्यामीति (Geometrically) के अनुसार अधिक व्यवस्थित और मोहर के रूप में मिला।
  7. पूर्व– हड़प्पा युग के आस–पास, वेदों में भी स्वास्तिक के निशान मिले हैं। इन सभी तथ्यों के आधार पर अनुसंधानकर्ताओँ ने यह निष्कर्ष दिया की भारतीय सभ्यता इतिहास की किताबों में लिखी कालावधि के मुकाबले बहुत प्राचीन है। 
  8. शोधकर्ताओं की टीम ने यह भी बताया कि स्वास्तिक को कमचाटका (Kamchatka) के माध्यम से टैटार (Tartar) मंगोल मार्ग से होकर भारत से बाहर ले जाया गया और अमेरिका पहुंचाया गया ( एज्टेक (Aztec) और मायान (Mayan) सभ्यता में स्वास्तिक का निशान बहुतायत में मिला है) और पश्चिमी भू– मार्ग से फिनलैंड, स्कैंडिनेविया, ब्रिटिश हाइलैंड्स और यूरोप पहुंचाया गया था जहां यह प्रतीक क्रॉस के अलग– अलग आकार (क्रुसिफोर्म) में मौजूद है।
  9. आईआईटी–खड़गपुर (IIT-Kharagpur ) और वहां के वरिष्ठ प्रोफेसरों द्वारा आयोजित एक सभा में प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियों को समकालीन विज्ञान के साथ मिश्रित करने का प्रयास किया गया| इन लोगों ने स्वास्तिक के बारे मे महत्वपूर्ण जानकारी जुटायी | इस प्रोग्राम को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्रायोजित किया था ।
  10. शोधकर्ताओँ ने बताया कि उन्होंने विश्व को नौ खंडों में बांटने के बाद भारत से स्वास्तिक को कहां ले जाया गया, के निशानों का फिर से पता लगाया है और वे प्राचीन मोहरों, शिलालेखों, छापों आदि के माध्यम से अपने दावे को स्पष्ट रूप से सिद्ध करने में सक्षम हैं।
हर शुभ कार्य से पहले क्यों बनाया जाता है स्वास्तिक?

स्वास्तिक के प्रतीक का संक्षिप्त इतिहास और उसका महत्व इस प्रकार हैः

  • एशिया में सबसे पहले स्वास्तिक का प्रतीक सिंधु घाटी सभ्यता में 3000 ईसा पूर्व में मिलता है।
  • स्वास्तिक का प्रतीक फारक के पारसी घर्म (Zoroastrian religion of Persia) में घूमते हुए सूरज, अनंत या निरंतर सृजन का प्रतीक था।
  • मौर्य साम्राज्य के दौरान स्वास्तिक का महत्व बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म के साथ बढ़ा लेकिन गुप्त साम्राज्य के दौरान बौद्ध धर्म के पतन के साथ इसका महत्व भी कम हो गया।
  • दिलचस्प बात यह है कि थाईलैंड में "स्वाद्दी" शब्द जिसका अर्थ होता है " नमस्ते (Hello)" और जिसका इस्तेमाल लोगों के अभिवादन के लिए किया जाता है, संस्कृत शब्द "स्वास्ति" से बना है, जिसका अर्थ है शब्दों का संयोजन यानि समृद्धि, भाग्य, सुरक्षा, महिमा और अच्छाई।
  • जैन धर्म में स्वास्तिक सातवें तीर्थंकर का प्रतीक और अधिक महत्वपूर्ण है।
  • चीन, जापान और कोरिया में स्वास्तिक संख्या– 10,000 का हमनाम (homonym) है और आम तौर पर इसका प्रयोग संपूर्ण सृजन के लिए किया जाता है। साथ ही इसका उपयोग सूर्य के वैकल्पिक प्रतीक के तौर पर भी होता है।
  • स्वास्तिक का प्रयोग ईसाई धर्म में ईसाई क्रॉस के अंकुशाकार संस्करण (hooked version) के लिए किया जाता है जो प्रभु ईसा मसीह की मौत पर जीत का प्रतीक है।
  • पश्चिमी अफ्रीका में स्वास्तिक का प्रतीक अशांति स्वर्ण वजन (Ashanti gold weights) पर और अदिंकरा प्रतीकों (adinkra symbols) पर पाए गए हैं।
  • फिनिश वायुसेना ने स्वास्तिक का प्रयोग राज्य– चिन्ह के तौर पर किया जिसकी शुरुआत 1918 में हुई थी।