मानसरोवर-2 ...कुत्सा (Kutsa)
कुत्सा - मुंशीप्रेमचंद | Kutsa by Munshi Premchand
अपने घर में आदमी बादशाह को भी गाली देता हैं। एक दिन मैं अपने दो-तीन मित्रों के साथ बैठा हुआ एक राष्ट्रीय संस्था के व्यक्तियों की आलोचना कर रहा था। हमारे विचार में राष्ट्रीय कार्यकर्त्ताओं को स्वार्थ और लोभ से ऊपर रहना चाहिए। ऊँचा और पवित्र आदर्श सामने रख कर ही राष्ट्र की सच्ची सेवा की जा सकती हैं। कई व्यक्तियों के आचरण ने हमें क्षुब्ध कर दिया था और हम इस समय बैठे अपने दिल का गुबार निकाल रहे थे! सम्भव था, उस परिस्थिति में पड़कर हम और भी गिर जाते; लेकिन उस वक़्त तो हम विचारक के स्थान पर बैठे हुए थे और विचारक उदार बनने लगे, तो न्याय कौन करे? विचारक को यह भूल जाने में विलम्ब नहीं होता कि उसमें भी कमजोरियाँ हैं। उसमें और अभियुक्त में केवल इतनी ही अन्तर हैं कि या तो विचारक महाशय उस परिस्थिति में पड़े नहीं, या पड़कर भी अपनी चतुराई से बेदाग निकल गये।
पद्मादेवी ने कहा- महाशय ‘क’ काम तो बड़े उत्साह से करते हैं; लेकिन अगर हिसाब देखा जाय, तो उनके जिम्मे एक हजार से कम न निकलेगा।
उर्मिलादेवी ने कहा- खैर ‘क’ को तो क्षमा किया जा सकता हैं। उसके बाल-बच्चे हैं, आखिर उनका पालन-पोषण कैसे से करे? जब वह चौबीसों घंटे सेवा-कार्य में लगा रहता हैं, तो उसे कुछ-न-कुछ तो मिलना ही चाहिए। उस योग्यता का आदमी 500/ वेतन पर भी न मिलता। अगर इस साल-भर में उसने एक हजार खर्च कर डाला, तो बहुत नहीं हैं। महाशय ‘ख’ तो बिल्कुल निहंग हैं। ‘जोरू न जाँता अल्लाह मियाँ से नाता’; पर उनके जिम्मे भी एक हजार से कम न होंगे। किसी को क्या अधिकार हैं कि वह गरीबों का धन मोटर की सवारी और यार-दोस्तों की दावत में उड़ा दे?
श्यामादेवी उद्दंड होकर बोली- महाशय ‘ग’ को इसका जवाब देना पड़ेगा, भाई साहब! यों बचकर नहीं निकल सकते। हम लोग भिक्षा माँग-माँग कर पैसे लाते हैं; इसीलिए कि यार-दोस्तों की दावतें हों. शराबे उडायी जायँ और मुजरे देखे जायँ? रोज सिनेमा की सैर होती हैं। गरीबों का धन यों उड़ाने के लिए नहीं हैं। यहाँ पाई-पाई का लेखा समझना पड़ेगी। मै भरी सभा में रगेंदूँगी। उन्हें जहाँ पाँच सौ वेतन मिलता हो, वहाँ चले जायँ। राष्ट्र के सेवक बहुतेरे निकल आवेंगे।
मैं भी एक बार इसी संस्था का मन्त्री रह चुका हूँ । मुझे गर्व हैं कि मेरे ऊपर कभी किसी ने इस तरह का आक्षेप नहीं किया; पर न-जाने क्यों लोग मेरे मन्त्रित्व से सन्तुष्ट नहीं थे। लोगो का ख्याल था कि मैं बहुत कम समय देता हूँ, और मेरे समय में संस्था ने कोई गौरव बढ़ानेवाला काम नहीं किया; इसलिए मैने रूठकर इस्तीफा दे दिया था। मै उसी पद से बेलौस रहकर भी निकाला गया। महाशय ‘ग’ हजारों हड़प करके भी उसी पद पर जमें हुए हैं। क्या यह मेंरे उनसे कुनह रखने की काफी वजह न थी? मैं चतुर खिलाड़ी की भाँति खुद को कुछ न कहना चाहता था, किन्तु परदे की आड़ से रस्सी खींचता रहता था।
मैने रद्दा जमाया- देवीजी, आप अन्याय कर रही हैं। महाशय ‘ग’ से ज्यादा दिलेर और …
उर्मिला ने मेरी बात को काटकर कहा- मैं ऐसे आदमी की दिलेरी नहीं कहती जो छिपकर जनता के रुपये से शराब पियें। जिन शराब की दूकानों पर हम धरना देने जाते थे, उन्हीं दूकानों से उनके लिए शराब आती थी। इससे बढ़कर बेवफाई और क्या हो सकती हैं? ऐसे आदमी को देशद्रोही कहती हूँ ।
मैने और खींची- लेकिन यह तो तुम भी मानती हो कि क्या महाशय ‘ग’ केवल अपने प्रभाव से हजारों रुपयें चन्दा वसूल कर लाते हैं। विलायती कपड़े को रोकने का उन्हें जिनता श्रेय दिया जाय, थोड़ा हैं।
उर्मिला देवी कब माननेवाली थी। बोली- उन्हें चन्दे इस संस्था के नाम पर मिलते हैं, व्यक्तिगत रूप से एक धेला भी लावें तो कहूँ । रहा विलायती कपड़ा। जनता नामों को पूजती हैं औऱ महाशय की तारीफें हो रही हैं; पर सच पूछिए तो यह श्रेय हमें मिलना चाहिए। वह तो कभी किसी दूकान पर गये ही नही। आज सारे शहर में इस बात की चर्चा हो रही हैं। जहाँ चन्दा माँगने जाओ, वहीं लोग यही आक्षेप करने लगते हैं। किस-किसका मुँह बन्द कीजिएगा? आप बनते तो है जाति के सेवक; मगर आचरण ऐसा कि शोहदों का भी न होगा। देश का उद्धार ऐसे विलासियों के हाथों नहीं हो सकता। उसके लिए त्याग होना चाहिए।
यहीं आलोचनाएँ हो रही थी कि एक दूसरी देवी आयीं, भगवती! बेचारी चन्दा माँगने आयी थी। थकी-माँदी चली आ रही थी। यहाँ जो पंचायत देवी, तो रम गयी। उनके साथ उनकी बालिका भी थी। कोई दस साल उम्र होगी, इन कामों में बराबर माँ के साथ रहती थी। उसे जोर की भूख लगी हुई थी। घर की कुंजी भगवती देवी के पास थी। पतिदेव दफ्तर से आ गये होगे। घर का खुलना भी जरूरी था, इसलिए मैंन बालिका को उसके घर पहुँचाने की सेवा स्वीकार की
कुछ दूर चलकर बालिका न कहा- आपको मालूम हैं, महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं?
मैं इस आक्षेप का समर्थन न कर सका। भोली-भाली बालिका के हृदय में कटुता, द्वेष और प्रपंच का विष बोना मेरी ईर्ष्यालु प्रक प्रकृति को भी रुचिकर न जान पड़ा। जहाँ कोमलता और सारल्य, विश्वास और माधुर्य का राज्य होना चाहिए, वहाँ कुत्सा और क्षुद्रता का मर्यादित होना कौन पसन्द करेगा? देवता के गले में काँटों की माला कौन पहनायेगा?
मैने पूछा- तुमसे किसने कहा कि महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं?
‘वाह पीते ही हैं, आप क्या जानें?’
‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ?’
‘सारे शहर के लोग कह रहे हैं!’
‘शहर वाले झूठ बोल रहे हैं।’
बालिका ने मेरी ओर अविश्वास की आँखों से देखा, शायद वह समझी, मैं भी महाशय ‘ग’ के ही भाई-बन्दों में हूँ ।
‘आप कह सकते हैं, महाशय ‘ग’ शराब नहीं पीते?’
‘हाँ, वह कभी शराब नहीं पीते।’
‘और महाशय ‘क’ ने जनता के रुपये भी नहीं उड़ाये?’
‘यह भी असत्य हैं।’
‘और महाशय ‘ख’ मोटर पर हवा खाने नही जाते?’
‘मोटर पर हवा खाना अपराध नहीं हैं।’
‘अपराध नहीं हैं, राजाओं के लिए, रईसों के लिए, अफसरों के लिए, जो जनता का खून चूसते हैं, देश-भक्ति का दम भरनेवालों के लिए यह बहुत बड़ा अपराध हैं।’
‘लेकिन यह तो सोचो, इन लोगों को कितना दौड़ना पड़ता हैं। पैदल कहाँ तक दौड़े?’
‘पैरगाड़ी पर तो चल सकते हैं। यह कुछ बात नहीं हैं। ये लोग शान दिखाना चाहते हैं, जिससे लोग समझे कि यह भी बहुत बड़े आदमी हैं। हमारी संस्था गरीबों की संस्था हैं। यहाँ मोटर पर उसी वक़्त बैठना चाहिए, जब और किसी तरह काम ही न चल सके औऱ शराबियों के लिए तो यहाँ स्थान ही न होना हिए। आप तो चन्दे माँगने जाते नहीं। हमें कितना लज्जित होना पड़ता हैं, आपको क्या मालूम।’
मैने गम्भीर होकर कहा- तुम्हें लोगों से कह देना चाहिए, यह सरासर गलत हैं। हम और तुम इस संस्था के शुभचिन्तक हैं। हमें अपने कार्यकर्त्ताओं का अपमान करना उचित नहीं हैं। मैं यह नही कहता कि क, ख, ग में बुराईयाँ नहीं हैं। संसार में ऐसा कौन हैं, जिसमें बुराईयाँ न हो, लेकिन बुराईयों के मुकाबले में उनमें गुण कितने हैं, यह तो देखो। हम सभी स्वार्थ पर जान देते हैं- मकान बनाते हैं, जायदाद खरीदते हैं। और कुछ नही, तो आराम से घर में सोते हैं। ये बेचारे चौबीसों घंटे देश-हित की फिक्र में डूबे रहते हैं। तीनों ही साल-साल भर की सजा काटकर, कई महीने हुए, लौटे हैं। तीनों ही के उद्योग से अस्पताल और पुस्तकायल खुले खुले। इन्हीं वीरों ने आन्दोलन करके किसानों का लगान कम कराया। अगर इन्हें शराब पीना और धन कमाना होता, तो इस क्षेत्र में आते हीं क्यो?
बालिका ने विचारपूर्ण दृष्टि से मुझे देखा। फिर बोली- यह बतलाइए, महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं या नहीं?
मैने निश्चयपूर्वक कहा- नहीं। जो यह कहता हैं, वह झूठ बोलता हैं।
भगवती देवी का मकान आ गया। बालिका चली गयी। मैं आज झूठ बोलकर जितना प्रसन्न था, उतना कभी सच बोलकर भी न हुआ था। मैने बालिका के निर्मल हृदय को कुत्सा के पंक में गिरने से बचा लिया था!