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मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ... बासी भात में खुदा का साझा

 मानसरोवर-2 ...बासी भात में खुदा का साझा (Basi Bhat me Khuda ka Sajha)

बासी भात में खुदा का साझा - मुंशीप्रेमचंद | Basi Bhat me Khuda ka Sajha - Munshi Premchand

शाम को जब दीनानाथ ने घर आकर गौरी से कहा कि मुझे एक कार्यालय में पचास रुपये की नौकरी मिल गई हैं, तो गौरी खिल उठी। देवताओं में उसकी आस्था और भी मुझे ढृढ़ हो गयी। इधर एक साल से बुरा हाल था। न कोई रोजी न रोजगार। घर में जो थोड़े-बहुत गहने थे, वह बिक चुके थे। मकान का किराया सिर पर चढ़ा हुआ था। जिन मित्रों से कर्ज मिल सकता था, सबसे ले चुके थे। साल-भर का बच्चा दूध के लिए बिलख रहा था। एक वक़्त का भोजन मिलता, तो दूसरे जून की चिन्ता होती। तकाजों के मारे बेचारे दीनानाथ को घर से निकलना मुश्किल था। घर से बाहर निकला नहीं, कि चारों ओर से चिथाड़ मच जाती- वाह बाबूजी वाह! दो दिन का वादा करके ले गये थे और आज दो महीने से सूरत नहीं दिखायी! भाई साहब, यह तो अच्छी बात नहीं, आपको अपनी जरूरत का ख्याल हैं, मगर दूसरों की जरूरत का जरा भी ख्याल नहीं? इसी से कहा हैं, दुश्मन को चाहे कर्ज दे दो, दोस्त को कभी न दो। दीनानाथ को ये वाक्य तीरो-से लगते थे और उसका जी चाहता था कि जीवन का अन्त कर डाले. मगर बेजबान स्त्री और अबोध बच्चे का मुँह देखकर कलेजा थाम के रह जाते। बारे, आज भगवान् ने उस पर दया की और संकट के दिन कट गये।

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ... बासी भात में खुदा का साझा

गौरी नें प्रसन्नमुख होकर कहा- मैं कहती थी कि नहीं, ईश्वर सबकी सुधि लेते हैं और कभी-कभी हमारी भी सुधि लेंगे, मगर तुमको विश्वास ही न आया । बोलो, अब तो ईश्वर की दयालुता के कायल हुए?

दीनानाथ ने हठधर्मी करते हुए कहा- यह मेरी दौड़-धूप का नतीजा हैं, ईश्वर की क्या दयालुता? ईश्वर को तो तब जानता, जब कहीं से छप्पर फाड़ कर भेज देते।

लेकिन मुँह से चाहे कुछ करे, ईश्वर के प्रति उसके मन में श्रद्धा उदय हो गये थी।

दीनानाथ का स्वामी बड़ा ही रूखा आदमी था और काम में बड़ा चुस्त। उसकी उम्र पचास के लगभग थी और स्वास्थ्य भी अच्छा न था, फिर भी वह कार्यालय में सबसे ज्यादा काम करता। मजाल न थी कि कोई आदमी एक मिनट की देर करे, या एक मिनट भी समय से पहले चला जाय। बीच में 15 मिनट की छुट्टी मिलती थी, उसमें जिसका जी चाहे पान खा ले, या सिगरेट पी ले या जलपान कर ले। इसके अलावा एक मिनट का अवकाश न मिलता था। वेतन पहली तारीख को मिल जाता था। उत्सवों में भी दफ्तर बन्द रहता था और नियत समय के बाद कभी काम न लिया जाता था। सभी कर्मचारियों को बोनस मिलता था और प्राविडेन्ट फंड की भी सुविधा थी। फिर भी कोई आदमी खुश न था। काम या समय की पाबन्दी की किसी को शिकायत न थी। शिकायत थी केवल स्वामी के शुष्क व्यवहार की । कितना ही जी लगाकर काम करो, कितना ही प्राण दे दो, पर उसके बदले धन्यवाद का एक शब्द भी न मिलता था।

कर्मचारियों में और कोई सन्तुष्ट हो या न हो, दीनानाथ को स्वामी से कोई शिकायत न थी। वह घुड़कियाँ और फटकार पाकर भी शायद उतने ही परिश्रम से काम करता था। साल-भर में उसने कर्ज चुका दिये और कुछ संचय भी कर लिया। वह उन लोगों में था, जो थोड़े में भी संतुष्ट रह सकते हैं- अगर नियमित रूप से मिलता जाय। एक रुपया भी किसी खास काम में खर्च करना पड़ता, तो दम्पत्ति में घंटों सलाह होती औऱ बड़े झाँव-झाँव के बाद मंजूरी री मिलती थी। बिल गौरी की तरफ से पेश होती, तो दीनानाथ विरोध में खड़ा होता। दीनानाथ की तरफ से पेश होता, तो गौरी उसकी कड़ी आलोचना करती। बिल को पास करा लेना प्रस्तावक की जोरदार वकालत पर मुनसहर था। सर्टिफाई करने वाली कोई तीसरी शक्ति वहाँ न थी।

और दीनानाथ अब पक्का आस्तिक हो गया था। ईश्वर की दया या न्याय में अब उसे कोई शंका न थी। नित्य संध्या करता और नियमित रूप से गीता का पाठ करता। एक दिन उसके एक नास्तिक मित्र ने जब ईश्वर की निन्दा की, तो उसने कहा- भाई, इसका तो आज तक निश्चय नहीं हो सका ईश्वर हैं या नहीं। दोनो पक्षों के पास इस्पात की-सी दलीले मौजूद हैं; लेकिन मेरे विचार में नास्तिक रहने से आस्तिक रहना कही अच्छा हैं। अगर ईश्वर की सत्ता हैं, तब तो नास्तिकों को नरक के सिवा कहीं ठिकाना नहीं। आस्तिक के दोनों हाथों में लड‌्डू हैं। ईश्वर है तो पूछना ही क्या, नहीं है, तब भी क्या बिगड़ता हैं। दो-चार मिनट का समय ही तो जाता हैं।

नास्तिक मित्र इस दोरुखी बात पर मुँह बिचकाकर चल दिये।

एक दिन जब दीनानाथ शाम को दफ्तर से चलने लगा, तो स्वामी ने उसे अपने कमरे में बुला भेजा और बड़ी खातिर से उसे कुर्सी पर बैठाकर बोला- तुम्हें यहाँ काम करते कितने दिन हुए ? साल-भर तो हुआ ही होगा?

दीनानाथ ने नम्रता से कहा- जी हाँ, तेरहवाँ महीना चल रहा हैं।

‘आराम से बैठो, इस वक़्त घर जाकर जलपान करते हो?’

‘जी नहीं, मैं जलपान का आदी नही।’

‘पान-वान तो खाते ही होगे? जवान आदमी होकर अभी से इतना संयम।’

यह कहकर उसने उसने घंटी बजायी और अर्दली से पान और कुछ मिठाइयाँ लाने को कहा

दीनानाथ को शंका हो रही थी- आज इतनी खातिरदारी क्यों हो रही हैं। कहाँ तो सलाम भी नहीं लेते थे, कहाँ आज मिठाई और पान सभी कुछ मँगाया जा रहा हैं! मालूम होता हैं मेरे काम से खुश हो गये हैं। इस खयाल से उसे कुछ आत्मविश्वास हुआ और ईश्वर की याद आ गयी। अवश्य परमात्मा सर्वदर्शी और न्यायकारी हैं; नहीं तो मुझे कौन पूछता?

अर्दली मिठाई और पान लाया। दीनानाथ आग्रह से विवश होकर मिठाई खाने लगा।

स्वामी ने मुसकराते हुए कहा- तुमने मुझे बहुत रूखा पाया होगा। बात यह हैं कि हमारे यहाँ अभी तक लोगों को अपनी जिम्मेदारी का इतना कम ज्ञान हैं कि अफसर जरा भी नर्म पड़ जाय और काम खराब होने लगता हैं। कुछ ऐसे भाग्यशाली हैं, जो नौकरों से हेल-मेल भी रखते हैं, उनसे हँसते- बोलते भी हैं, फिर भी नौकर नहीं बिगड़ते, बल्कि और भी दिल लगाकर काम करते हैं। मुझमें वह कला नहीं हैं, इसलिए मैं अपने आदमियों से कुछ अलग-अलग रहना ही अच्छा समझता हूँ और अब तक मुझे इस नीति से कोई हानि भी नहीं हुई; लेकिन मैं आदमियों का रंग-ढंग देखता हूँ और सब को परखता रहा हूँ । मैने तुम्हारे विषय में जो मत स्थिर किया हैं; वह यह हैं कि तुम वफादार हो और मैं तुम्हारे ऊपर विश्वास कर सकता हूँ, जहाँ तुम्हें खुद बहुत कम काम करना पड़ेगा। केवल निगरानी करनी पड़ेगी। तुम्हारे वेतन में पचास रुपये की और तरक्की हो जायगी। मुझे विश्वास हैं, तुमने अब तक जितनी तनदेही से काम किया हैं, उससे भी ज्यादा तनदेही से आगे करोगे।

दीनानाथ की आँखों में आँसू भर आये और कंठ की मिठाई कुछ नमकीन हो गयी। जी में आया, स्वामी के चरणों पर सिर दें और कहे- आपकी सेवा के लिए मेरी जान हाजिर हैं। आपने मेरा जो सम्मान बढ़ाया हैं, मैं उसे निभाने में कोई कसर न उठा रखूँगा; लेकिन स्वर काँप रहा था और वह केवल कृतज्ञता-भरी आँखों से देखकर रह गया।

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र

सेठजी ने एक मोटा-सा लेजर निकालते हुए कहा- मैं एक ऐसे काम में तुम्हारी मदद चाहता हूँ, जिस पर इस कार्यालय का सारा भविष्य टिका हुआ हैं। इतने आदमियों में मैने केवल तुम्हीं को विश्वास-योग्य समझा हैं। और मुझे आशा हैं कि तुम मुझे निराश न करोगे। यह पिछले साल का लेजर है और इसमें कुछ ऐसी रकमें दर्ज हो गयी हैं; जिनके अनुसार कम्पनी को कई हजार का लाभ होता हैं, लेकिन तुम जानते हो, हम कई महीनों से घाटे पर काम कर रहे हैं। जिस क्लर्क ने यह लेजर लिखा था, उसकी लिखावट तुम्हारी लिखावट से बिल्कुल मिलती हैं। अगर दोनों लिखावटें आमने-सामने रख दी जायँ, तो किसी विशेषज्ञ को भी उसमें भेद करना कठिन हो जायगा। मैं चाहता हूँ, तुम लेजर में एक पृष्ठ फिर से लिख कर जोड़ दो और उसी नम्बर का पृष्ठ उसमें से निकाल दो। मैने पृष्ठ का नम्बर छपवा लिया हैं; एक दफतरी भी ठीक कर लिया हैं, जो रात भर में लेजर की जिल्दबन्दी कर देगा। किसी को पता तक न चलेगा। जरूरत सिर्फ यह हैं कि तुम अपनी कलम से उस पृष्ठ की नकल कर दो।

दीनानाथ ने शंका की- जब उस पृष्ठ की नकल ही करनी हैं, तो उसे निकालने की क्या जरूरत हैं?

सेठजी हँसे- तो क्या तुम समझते हो, उस पृष्ठ की हूबहू नकल करनी होगी। मैं कुछ रकमों में परिवर्तन कर दूँगा। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैं केवल कार्यालय की भलाई के खयाल से यह कार्यवाई कर रहा हूँ । अगर रद्दोबदल न किया गया, तो कार्यालय के एक सौ आदमियों की जीविका में बाधा पड़ जायगी। इसमें कुछ सोच-विचार करने की जरूरत नहीं। केवल आध घंटे का काम हैं। तुम बहुत तेज लिखते हो।

कठिन समस्या थी। स्पष्ट थी कि उससे जाल बनाने को कहा जा रहा हैं। उसके पास इस रहस्य के पता लगाने का कोई साधन न था कि सेठजी जो कुछ कह रहे हैं, वह स्वार्थवश होकर या कार्यालय की रक्षा के लिए; लेकिन किसी दशा में भी हैं यह जाल, घोर जाल। क्या वह अपनी आत्मा की हत्या करेगा? नहीं; किसी तरह नहीं।

उसने डरते-डरते कहा- मुझे आप क्षमा करें, मैं यह काम न कर सकूँगा।

सेठजी ने उसी अविचलित मुसकान के साथ पूछा- क्यों?

‘इसलिए कि यह सरासर जाल हैं।’

‘जाल किसे कहते हैं?’

‘किसी हिसाब में उलटफेर करना जाल हैं।’

‘लेकिन उस उलटफेर से एक सौ आदमियों की जीविका बनी रहे, तो इस दशा में भी वह जाल हैं? कम्पनी की असली हालत कुछ और हैं, कागजी हालत कुछ और; अगर यह तब्दीली न की गयी, तो तुरन्त कई हजार रुपये नफे के देने पड़ जायेगे और नतीजा यह होगा कि कम्पनी का दिवाला हो जायगा। और सारे आदमियों को घर बैठना पड़ेगा। मैं नहीं चाहता कि थोड़े से मालदार हिस्सेदारों के लिए इतने गरीबों का खून किया जाय। परोपकार के लिए कुछ जाल भी करना पड़े, तो वह आत्मा की हत्या नही हैं।’

दीनानाथ को कोई जवाब न सूझा। अगर सेठजी का कहना सच हैं और इस जाल से सौ आदमियों को रोजी बनी रहे तो वास्तव में वह जाल नहीं, कठोर कर्त्तव्य हैं; अगर आत्मा की हत्या होती भी हो, तो सौ आदमियों की रक्षा के लिए उसकी परवाह न करनी चाहिए, लेकिन नैतिक समाधान हो जाने पर अपनी रक्षा का विचार आया। बोला- लेकिन कहीं मुआमला खुल गया, तो मिट जाऊँगा । चौदह साल के लिए काले पानी भेज दिया जाऊँगा ।

सेठ ने जोर से कहकहा मारा – अगर मुआमला खुल गया, तो तुम न फँसोंगे, मैं फँसूगा। तुम साफ इनकार कर सकते हो।

‘लिखावट तो पकड़ी जायगी?‘

‘पता ही कैसे चलेगा कि कौन पृष्ठ बदला गया, लिखावट तो एक-सी हैं।’

दीनानाथ परास्त हो गया। उसी वक़्त उस पृष्ठ की नकल करने लगा।

फिर भी दीनानाथ के मन में चोर पैदा हुआ था। गौरी से इस विषय में वह एक शब्द भी न कह सका।

एक महीनें के बाद उसकी तरक्की हुई। सौ रुपये मिलने लगे। दो सौ बोनस के भी मिले।

यह सब कुछ था, घर में खुशहाली के चिह्न नजर आने लगे; लेकिन दीनानाथ का अपराधी मन एक बोझ से दबा रहता था। जिन दलीलों से सेठजी ने उसकी जबान बन्द कर दी, उस दलीलों से गौरी को सन्तुष्ट कर सकने का उसे विश्वास न था।

उसकी ईश्वर-निष्ठा उसे सदैव डराती रहती थी। इस अपराध का कोई भयंकर दंड अवश्य मिलेगा। किसी प्रायश्चित, किसी अनुष्ठान से उसे रोकना असम्भव हैं। अभी न मिले; साल-दो-साल में मिले, दस-पाँच साल न मिले; पर जितनी देर से मिलेगा, उतना ही भयंकर होगा, मूलधन ब्याज के साथ बढ़ता जायेगा। वह अक्सर फछताता, मैं क्यों सेठजी के प्रलोभन में आ गया। कार्यालय टूटता या रहता, मेरी बला से; आदमियों की रोजी जाती या रहती, मेरी बला से; मुझे तो यह प्राण-पीड़ा न होती, लेकिन अब तो जो कुछ होना था हो चुका और दंड अवश्य मिलेगा। इस शंका ने उसके जीवन का उत्साह, आनन्द और माधुर्य सब कुछ हर लिया।

मलेरिया फैला हुआ था। बच्चे को ज्वर आया। दीनानाथ के प्राण नहीं में समा गये। दंड का विधान आ पहुँचा। कहाँ जाय, क्या करे, जैसे बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। गौरी ने कहा- जाकर कोई दवा लाओ, या किसी डॉक्टर को दिखा दो, तीन दिन तो हो गये।

दीनानाथ ने चिन्तित मन से कहा- हाँ, जाता हूँ लेकिन मुझे बड़ा भय लग रहा हैं।

‘भय की कौन-सी बात हैं, बेबात की बात मुँह से निकालते हो। आजकल किसे ज्वर नहीं आती?’

‘ईश्वर इतना निर्दयी क्यों हैं?’

‘ईश्वर निर्दयी हैं पापियों के लिए। हमने किसका क्या हर लिया हैं?’

‘ईश्वर पापियों को कभी क्षमा नहीं करता।’

‘पापियों को दंड न मिले, तो संसार में अनर्थ हो जाय।’

‘लेकिन आदमी ऐसे काम भी तो करता हैं, तो एक दृष्टि से पाप हो सकते हैं, दूसरी दृष्टि से पुण्य।’

‘मैं नहीं समझी।’

‘मान लो, मेरे झूठ बोलने से किसी की जान बचती हो, तो क्या वह पाप हैं?’

‘मैं तो समझती हूँ, ऐसा झूठ पुण्य हैं।’

‘तो जिस पाप से मनुष्य का कल्याण हो, वह पुण्य हैं?’

‘और क्या’

दीनानाथ की अमंगल की शंका थोड़ी देर के लिए दूर हो गयी। डॉक्टर को बुला लाया, इलाज शुरू किया, बालक एक सप्ताह में चंगा हो गया।

मगर थो़ड़े दिन बाद वह खुद बीमार पड़ा। वह अवश्य ही ईश्वरीय दंड हैं और वह बच नहीं सकता। साधारण मलेरिया ज्वर था; पर दीनानाथ की दंड-कल्पना ने उसे सन्निपात का रूप दे दिया। ज्वर में, नशे की हालत की तरह यों ही कल्पनाशक्ति तीव्र हो जाती हैं। पहले केवल मनोगत शंका थी, वह भीषण सत्य बन गयी। कल्पना ने यमदूत रच डाले, उनके भाले औऱ गदाएँ रच डाली। नरक का अग्निकुंड दहका दिया। डॉक्टर की एक घूँट दवा हजार मन की गदा के आवाज और आग के उबलते हुए समुद्र के दाह पर क्या असर करती? दीनानाथ मिथ्यावादी न था। पुराणों की रहस्यमय कल्पनाओं में उसे विश्वास न था। नहीं, वह बुद्धिवादी था और ईश्वर में भी तभी उसे विश्वास आया, जब उसकी तर्कबुद्धि कायल हो गयी। लेकिन ईश्वर के साथ उसकी दया उसकी दया भी आयी, उसका दंड भी आया। दया ने उसे रोजी दी, मान लिया। ईश्वर की दया न होती, तो शायद वह भूखों मर जाता, लेकिन भूखों मरना अग्निकुड में ढकेल दिये जाने से कहीं सरल था, खेल था। दंड-भावना जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार से ऐसी बद्धमूल हो गया थी, मानो उसकी बुद्धि का, उसकी आत्मा का, एक अंग हो गयी हो। उसका तर्कवाद और बुद्धिवाद इन मन्वन्तरों के जमे हुए संस्कार पर समुद्र की ऊँची लहरों की भाँति आता था, पर एक क्षण में उन्हें जल-मग्न करके फिर लौट जाता था और वह पर्वत ज्यों-का-त्यों खड़ा रह जाता था।

जिन्दगी बाकी थी, बच गया। ताकत आते ही दफ्तर जाने लगा। एक दिन गौरी बोली- जिन दिनों तुम बीमार थे औऱ एक दिन तुम्हारी हालत बहुत नाजुक हो गयी थी, तो मैने भगवान से कहा था कि वह अच्छे हो जायँगे, तो पचास ब्राह्मणों को भोजन कराऊँगी । दूसरे दिन से तुम्हारी हालत सुधरने लगी। ईश्वर ने मेरी विनती सुन ली। उसकी दया न हो जाती, तो मुझे कहीं माँगे भीख न मिलती। आज बाजार से सामान ले आओ, तो मनौती पूरी कर दूँ। पचास ब्राह्मण नेवेत जायँगे, तो सौ अवश्य आयेंगे। पचास कँगले समझ लो और मित्रों में बीस-पचीस निकल ही आयेंगे। दो सौ आदमियों का डौल हैं। मैं सामग्रियों की सूची लिखे देती हूँ।

दीनानाथ ने माथा सिकोड़कर कहा- तुम समझती हो, मैं भगवान की दया से अच्छा हुआ?

‘और कैसे अच्छे हुए?’

‘अच्छा हुआ इसलिए कि जिन्दगी बाकी थी।’

‘ऐसी बातें न करो। मनौती पूरी करनी होगी।’

‘कभी नहीं। मैं भगवान को दयालु नहीं समझता।’

‘और क्या भगवान निर्दयी हैं?’

‘उनसे बड़ा निर्दयी कोई संसार में न होगा। जो अपने रचे हुए खिलौनों को उनकी भूलों और बेवकूफियों की सजा अग्निकुंड में ढकेलकर दे, वह भगवान दयालु नहीं हो सकता। भगवान जितना दयालु हैं, उससे असंख्य गुना निर्दयी हैं। और ऐसे भगवान की कल्पना से मुझे घृणा होती हैं। प्रेम सबसे बड़ी शक्ति कही गयी हैं। विचारवानों ने प्रेम को ही जीवन की और संसार की सबसे बड़ी विभूति मानी हैं। व्यवहारों में न सही, आदर्श में प्रेम ही हमारे जीवन का सत्य हैं, मगर तुम्हारा ईश्वर दंड-भय से सृष्टि का संचालन करता हैं। फिर उसमें और मनुष्य मं क्या फर्क हुआ? ऐसे ईश्वर की उपासना मैं नही करना चाहता, नहीं कर सकता। जो मोटे हैं, उनके लिए ईश्वर दयालु होगा, क्योंकि वे दुनिया को लूटते हैं। हम जैसो को तो ईश्वर की दया कहीं नजर नहीं आती। हाँ, भय पग-पग पर खड़ा घूरा करता हैं। यह मत करो, ईश्वर दंड देना! वह मत करो, ईश्वर दंड देगा। प्रेम से शासन करना मानवता हैं, आतंक से शासन करना बर्बरता हैं। आतंकवादी ईश्वर से तो ईश्वर का न रहना ही अच्छा हैं। उसे हृदय से निकाल कर मैं उसकी दया और दंड दोनों से मुक्त हो जाना चाहता हूँ। एक कठोर दंड बरसों के प्रेम को मिट्टी में मिला देता हैं। मै तुम्हारे ऊपर बराबर जान देता रहता हूँ ; लेकिन किसी दिन डंडा लेकर पीट चलूँ, तो तुम मेरी सूरत न देखोगी। ऐसे आतंकमय, दंडमय जीवन के लिए मैं ईश्वर का एहसास नहीं लेना चाहता। बासी बात में खुदा के साझे के जरूरत नहीं हैं। अगर तुमने ओज-भोज पर जोर दिया, तो मैं जहर खा लूँगा।’

गौरी उसके मुँह की और भयातुर नेत्रों से ताकती रह गयी।

रानी सती मंदिर, झुंझुनू (राजस्थान ) || Shree Rani Satiji Mandir, Jhunjhunu (Rajasthan)

रानी सती मंदिर

श्री रानी सतीजी मंदिर (श्री राणी सतीजी मंदिर) राजस्थान के झुंझुनू जिले में स्थित भारत के प्रमुख मंदिरों में से एक है। मंदिर में नारायणी देवी द्वारा किए गए बलिदान से निकली शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाले त्रिशूल है।  साथ ही इस मंदिर में भगवान गणेश, शिव, हनुमान, सत्यनारायणजी, नवग्रह और षोडश मातृका के मंदिर भी हैं।

रानी सती मंदिर, झुंझुनू (राजस्थान ) || Shree Rani Satiji Mandir, Jhunjhunu (Rajasthan)

यह मंदिर सदियों पुराना है। मंदिर में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। राजस्थान और देश के अन्य भागों के मारवाड़ी समाज रानी सती दादी की पूजा करते हैं और उनका मानना ​​है कि रानी सती दादी माँ दुर्गा हैं। मंदिर में प्रसाद की सुविधा के साथ ही दर्शन के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए कैंटीन भी है। मंदिर परिसर में एक गौशाला, एक बालिका विद्यालय, गरीबों और जरूरतमंदों के लिए एक विवाह भवन, पार्क, पुस्तकालय और संगीतमय फव्वारा है।

मंदिर का इतिहास 

झुंझुनू श्री रानीसती मंदिर का इतिहास 400 साल से भी ज़्यादा पुराना है और यह नारी वीरता और मातृत्व का एक शानदार प्रमाण है। मंदिर का इतिहास और रानी सती दादी का संबंध महाभारत काल से जुड़ा है। रानी सती अभिमन्यु की पत्नी उतेरा थीं। महाभारत के युद्ध में जब अभिमन्यु की मृत्यु हो गई थी, तब उतेरा अभिमन्यु की अग्नि में जलकर सती होना चाहती थीं। तब श्री कृष्ण उनके पास आए और उन्हें ऐसा करने से रोक लिए । उन्होंने उतेरा को कहा कि यह केवल अगले जन्म में ही संभव होगा और उनकी सती होने की इच्छा पूरी होगी।

रानी सती मंदिर, झुंझुनू (राजस्थान ) || Shree Rani Satiji Mandir, Jhunjhunu (Rajasthan)

अगले जन्म में उनका नाम नारायणी था, जो राजस्थान के ठुकाय गांव में गुरसमल की बेटी थीं। अभिमन्यु अपने दूसरे जन्म में हिसार में जालीराम के पुत्र थंधन बने। थंधन के पास एक सुंदर घोड़ा था और वह अपने उद्देश्य के लिए उसका उपयोग करता था। थंधन और नारायणी का विवाह। हिसार के एक राजा के बेटे ने थंधन का सुंदर घोड़ा लेना चाहा, लेकिन थंधन ने घोड़ा देने से इनकार कर दिया। तब राजा के बेटे ने जबरन घोड़ा लेने का फैसला किया और थंधन से युद्ध किया, जिसमें राजा का बेटा मारा गया। अपने बेटे की मौत की खबर पाकर राजा ने थंधन को मारने का फैसला किया। राजा से लड़ते हुए नारायणी के सामने थंधन की मृत्यु हो गई। फिर नारायणी ने राजा से युद्ध किया और राजा को मार डाला और खुद थंधन की अग्नि में जलकर सती हो गयीं। यह स्थान अब स्मारक मंदिर के साथ चिह्नित है। वह अब शहर के अग्रवाल मारवाड़ियों (तुलस्यान, जालान और झुनझुनवाला) की कुल देवी हैं।

रानी सती का मंदिर झुंझुनू की पहाड़ियों पर मौजूद एक प्राचीन और भव्य मंदिर है, जो अपनी वास्तुकला के लिए भी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। सफ़ेद संगमरमर से बनी पूरी इमारत आकर्षक है। मंदिर के कई भागों को कांच के द्वारा सजाया गया है वो आज भी देखा जा सकता है। 

अमावस्या के अवसर पर झुंझुनू में एक पवित्र पूजनोत्सव मनाया जाता है। हर साल इस शुभ दिन पर लाखों श्रद्धालु मंदिर परिसर में इकट्ठा होते हैं और राजसी श्री रानी सतीजी की एक झलक पाने के लिए कतार में खड़े होते हैं। झुंझुनू श्री रानी सती मंदिर की सबसे खास विशेषता यह है कि इसमें किसी भी महिला या पुरुष देवता की मूर्ति या छवि नहीं है। शक्ति और बल के रूप में एक त्रिशूल की पूजा की जाती है, जो हिंदू धर्म के अनुसार सर्वोच्च शक्ति है। रानी सतीजी का एक शानदार चित्र परधान मंड में भव्य शिखर के साथ स्थित है। श्री रानी सतीजी का मुख्य मंदिर मुख्य गर्भगृह का स्थान है। मंदिर में रंगीन दीवार पेंटिंग भी हैं। मंदिर में सुंदर भित्ति चित्र हैं, जो समय के साथ धंधली पड़ चुकी हैं। 

रानी सती मंदिर, झुंझुनू (राजस्थान ) || Shree Rani Satiji Mandir, Jhunjhunu (Rajasthan)

यह मंदिर प्रतिदिन सुबह 5 बजे से लेकर दोपहर 1 बजे और फिर दोपहर 3 बजे से रात को 10 बजे के तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। रानी सती मंदिर में प्रवेश और दर्शन के लिए कोई भी शुल्क नहीं है।

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Rani Sati Temple

Shri Rani Satiji Temple (Shri Rani Satiji Mandir) is one of the major temples of India located in Jhunjhunu district of Rajasthan. The temple has a trident representing the power that emerged from the sacrifice made by Narayani Devi. Also, this temple has temples of Lord Ganesha, Shiva, Hanuman, Satyanarayanji, Navgrah and Shodash Matrika.

रानी सती मंदिर, झुंझुनू (राजस्थान ) || Shree Rani Satiji Mandir, Jhunjhunu (Rajasthan)

This temple is centuries old. Lakhs of devotees visit the temple every year. Marwari community of Rajasthan and other parts of the country worship Rani Sati Dadi and believe that Rani Sati Dadi is Maa Durga. The temple has a canteen for pilgrims coming for darshan along with the facility of Prasad. The temple complex has a cowshed, a girl's school, a marriage hall for the poor and needy, park, library and musical fountain.

History of the temple

The history of Jhunjhunu Shri Ranisati Temple is more than 400 years old and it is a great proof of female valor and motherhood. The history of the temple and Rani Sati Dadi is related to the Mahabharata period. Rani Sati was Utrera, the wife of Abhimanyu. When Abhimanyu died in the Mahabharata war, Utrera wanted to become a Sati by burning herself in Abhimanyu's fire. Then Shri Krishna came to her and stopped her from doing so. He told Utrera that this would be possible only in the next birth and her wish to become a Sati would be fulfilled.

रानी सती मंदिर, झुंझुनू (राजस्थान ) || Shree Rani Satiji Mandir, Jhunjhunu (Rajasthan)

In the next birth, her name was Narayani, who was the daughter of Gursmal in Thukay village of Rajasthan. Abhimanyu in his second birth became Thandhan, the son of Jaliram in Hisar. Thandhan had a beautiful horse and he used it for his purpose. Marriage of Thandhan and Narayani. The son of a king of Hisar wanted to take Thandhan's beautiful horse, but Thandhan refused to give the horse. Then the king's son decided to take the horse forcibly and fought with Thandhan, in which the king's son was killed. On receiving the news of his son's death, the king decided to kill Thandhan. While fighting the king, Thandhan died in front of Narayani. Narayani then fought the king and killed the king and herself became a sati by burning in Thandhan's fire. This place is now marked with a memorial temple. She is now the Kul Devi of the Agrawal Marwaris (Tulsyan, Jalan and Jhunjhunwala) of the city.

Rani Sati Temple is an ancient and magnificent temple situated on the hills of Jhunjhunu, which is also famous all over India for its architecture. The entire building made of white marble is attractive. Many parts of the temple are decorated with glass which can still be seen today.

रानी सती मंदिर, झुंझुनू (राजस्थान ) || Shree Rani Satiji Mandir, Jhunjhunu (Rajasthan)

A holy puja festival is celebrated in Jhunjhunu on the occasion of Amavasya. Every year on this auspicious day, lakhs of devotees gather in the temple premises and stand in queue to get a glimpse of the majestic Sri Rani Satiji. The most special feature of Jhunjhunu Shri Rani Sati Mandir is that it does not have any idol or image of any female or male deity. A trident is worshipped as a symbol of power and strength, which is the supreme power according to Hinduism. A magnificent portrait of Rani Satiji is situated in the Pardhan Mand with a grand shikhara. The main shrine of Shri Rani Satiji is the main sanctum sanctorum. The temple also has colorful wall paintings. The temple has beautiful murals, which have faded with time.

This temple is open to devotees daily from 5 am to 1 pm and then from 3 pm to 10 pm. There is no fee for entry and darshan in Rani Sati Mandir.

अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)

अजीनोमोटो

अभी तक यहां उन चीजों की चर्चा हुई है जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। आज एक ऐसी खाद्य पदार्थ की बात करेंगे जो आजकल धड़ल्ले से उपयोग में लाया जा रहा और ये हमें सिर्फ नुकसान ही पहुंचाता है, यह खाद्य पदार्थ है अजीनोमोटो।

अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)

अजीनोमोटो क्या है,(What is Ajinomoto):- यह चमकीले छोटे क्रिस्टल के जैसे दिखता है। अजीनोमोटो में एमिनो एसिड पाया जाता है, जिसे जापानी कंपनी द्वारा बनाया गया है। अजीनोमोटो का दूसरा नाम मोनो सोडियम ग्लूटामेट( MSG) भी है। चीन की खाद्य पदार्थों में अजीनोमोटो का उपयोग होता है। इसके डालने से खाने का स्वाद दोगुना हो जाता है। यह सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक है।

इसको लगातार खाने से जीभ एक विशेष प्रकार का स्वाद ग्रहण करने लगती है, जिसे उमामी टेस्ट कहते हैं।यह न मीठा होता है न खट्टा न नमकीन न कसैला। यह एक अलग ही स्वाद है।यदि एक बार जीभ इसक अभ्यस्त हो जाय तो फिर जीभ को कुछ अच्छा नही लगता।
अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)
इसको ऐसे समझ सकते हैं, यह एक ऐसा रसायन है जिसके जीभ पर स्पर्श के बाद जीभ भ्रमित हो जाती है और मष्तिस्क को गलत संदेश भेजती है जिससे कोई भी बेस्वाद खाना अच्छा महसूस होता है। इस रसायन के प्रयोग से शरीर के अंगो उपांगो और मष्तिस्क के बीच संपर्क बाधित होता है, जिसके दूरगामी परिणाम बहुत खतरनाक है।

आज के दौर में हम घर के बजाय बाहर का खाना ज्यादा पसंद करते हैं।

अजीनोमोटो का उपयोग (Uses of Ajinomoto):-  मैगी, चाउमीन, मंचूरियन, स्प्रिंगरोल, आदि चाइनीस व्यंजन में इसका प्रयोग होता है।  इसके अलावा हम चिप्स, पिज्जा, जैसे खाने को पसंद करते हैं, जिनमें अजीनोमोटो का उपयोग होता है। टोमेटो सॉस, सोया सॉस, सभी फास्ट फूड में इसका उपयोग होता है।

अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto): -
अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)

पहले इसका उपयोग सिर्फ चीन के रसोई में होता था। अब यह धीरे धीरे हमारी भारतीय रसोई में भी घुस गया है। हम समय बचाने के चक्कर में नूडल्स, चाउमीन बनाते हैं, जिसे बच्चे हो या बड़े बहुत चाव से खाते हैं। पर इसके उपयोग से होने वाले नुक्सान की जानकारी हमें  नहीं होती। आइये जानते हैं इसके उपयोग से होने वाले नुकसान के बारे में। 

#  बच्चों की सेहत पर  आजकल बच्चे फ़ास्ट फ़ूड, जंक फ़ूड, प्रोसेस्ड फूड खाना पसंद करते हैं , जिससे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पैर बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे बच्चों में मोटापे की समस्या भी बढ़ रही है। 
#  माइग्रेन  माइग्रेन एक कॉमन समस्या हो गयी है। अजीनोमोटो के लगातार सेवन से भी यह बीमारी होती है। इसको आधे सिर का दर्द या अधकपारी भी बोलते हैं। 

#  ब्रेन को नुकसान  अजीनोमोटो के अधिक सेवन से अधिक पसीना आना, चक्कर आना जैसी बीमारी हो सकती है। 

#   इससे शरीर में झुंझुनि , गर्दन में अकड़न, अनिद्रा जैसे रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। 

#   सीने में दर्द   अजीनोमोटो का ज्यादा उपयोग करने से सीने में दर्द, धड़कन का बढ़ जाना, ह्रदय की मांसपेशियों में खिचाव जैसी समस्याएं भी उत्पन्न हो जाती हैं। 

#   ब्लड प्रेशर बढ़ना  यह शरीर में सोडियम की मात्रा को बढ़ा देता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। गर्भवती महिला को इसका सेवन बिलकुल नहीं करना चाहिए। 

तंत्रिका तंत्र पर असर  यह  आंखों और तंत्रिका तंत्र को डैमेज कर देता है

अतः इसके सेवन से खुद बचें और दूसरों को भी सलाह दें। 
अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)

सब कुछ वैसे ही चलता है...

सब कुछ वैसे ही चलता है..

Rupa Oos ki ek Boond

"आधी धूप आधी छाँव सी है 
ज़िंदगी तो बस एक दाँव सी है..❣️"


सब कुछ वैसे ही चलता है 

जैसे चलता था 

जब तुम थे 

रात भी वैसे ही सर मूँदे आती है 

दिन वैसे ही आँखें मलता जागता है 

तारे सारी रात जमाईयाँ लेते हैं 

सब कुछ वैसे ही चलता है, 

जैसे चलता था जब तुम थे 


सूरज सुबह वैसे ही आता है 

शाम ढले चला जाता है 

तारे वैसे ही टिमटिमाते हैं 

रात होते चाँद भी वैसे ही आ जाता 

मेरी खिड़की पर 

जैसे आता था जब तुम थे 


काश तुम्हारे जाने पर, 

कुछ फ़र्क़ तो पड़ता जीने में 

प्यास न लगती पानी की या, 

इच्छा न होती खाने की 

नाखून बढ़ना बंद हो जाते 

बाल हवा में न उड़ते या 

धुआँ निकलता साँसों से 

सब कुछ वैसे ही चलता है

जैसे चलता था जब तुम थे 


बस इतना फ़र्क पड़ा है 

तुम्हारे जाने पर,

जब रातों में नींद नहीं आती 

तुम्हारे "सो जाओ" की जगह 

सोने के लिए 

सिर्फ इक नींद की गोली होती 

बाकी सब कुछ वैसे ही चलता है

जैसे चलता था जब तुम थे ...

Rupa Oos ki ek Boond

"इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के.. 
अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के..🌙"

पुस्तैनी घड़ी

पुस्तैनी घड़ी 

मरने से पहले, एक आदमी ने अपने बेटे से कहा, "यह वह घड़ी है जो तुम्हारे दादा ने मुझे दी थी। यह घड़ी 200 साल से अधिक की है। इससे पहले कि मैं इस घड़ी को तुम्हें दे दूँ , तुम इसे लेकर पहले बेहतर पानशॉप पर जाओ। पानशॉप वाले से कहना कि हम इसे बेचना चाहते हैं और पूछना कि वे इसके लिए कितना भुगतान कर सकता है।"

पुस्तैनी घड़ी

पिता की हिदायत पर बेटा घड़ी लेकर गया और थोड़ी देर बाद वापस आया और अपने पिता से कहा - "पानशॉप वाला इस घड़ी के 10$  देने की पेशकश कर रहा है, क्योंकि घड़ी बहुत पुरानी है और बुरी तरह से नष्ट हो गई है।"

"पिता ने अपने बेटे से कहा कि इस बार घड़ी लेकर चौकीदार के पास जा।"

बेटा घंटे बाद वापस आ गया और पिता से कहा, "चौकीदार ने इसकी 20 डॉलर की कीमत लगाई।"

इस बार पिता ने अपने बेटे को फिर कहा : "इस घड़ी को लो और सड़क पर मिलने वाले पहले व्यक्ति के पास जाओ और पूछो कि वह यह घड़ी तुमसे कितने में खरीदेगा।"

बेटा 10 मिनट बाद वापस आता है और कहता है, "पिताजी! इस घड़ी को कोई भी खरीदना नहीं चाहता था, मेरे बहुत कहने पर केवल एक व्यक्ति इसके लिए 5 $ देने को राजी हुआ।"

पिता ने कहा, "इस बार तुम संग्रहालय में जाओ और उन्हें यह घड़ी दिखाओ।"

पिता की आज्ञा से इस बार बेटा संग्रहालय गया और कुछ घंटों बाद बहुत उत्साह के साथ वापस आता है। 

पिताजी! उन्होंने इस घड़ी के लिए एक मिलियन डॉलर की पेशकश की। उन्होंने कहा कि यह एक वास्तविक कृति है। यह कैसे संभव है?"

पिता ने उत्तर दिया, "मैं चाहता था कि तुम यह जान लो कि सही जगह और सही लोग ही तुम्हारे वास्तविक मूल्य की सराहना करेंगे। यही कारण है कि गलत स्थानों पर मत दिखो और जहाँ तुम्हें समझने वाले नहीं हैं, तुमसे गलत व्यवहार किया जा रहा हो, वहाँ से चले जाओ उस जगह को छोड़ दो। जिन्हें तुम्हारी कीमत पता है वो तुम्हारी कदर करेंगे, इसलिए कभी ऐसी जगह और उन लोगों के आसपास मत रहना, जिन्हें तुम्हारी कीमत नहीं दिखती।"

पॉण्डिचेरी का राजकीय फूल - नागलिंगम || State Flower of Puducherry - NAGALINGAM / कैननबॉल ट्री (Cannonball Tree)

पॉण्डिचेरी का राजकीय फूल

सामान्य नाम:  तोप का गोला वृक्ष
स्थानीय नाम: नागलिंगम (तमिल, मलयालम), बिली (गुजराती), शिवलिंगी (हिन्दी)
वैज्ञानिक नाम: कौरौपिटा गुआनेंसिस ऑब्ल
पॉण्डिचेरी का राजकीय फूल -  नागलिंगम || State Flower of  Puducherry - NAGALINGAM / कैननबॉल ट्री (Cannonball Tree)

कैननबॉल ट्री के फूल जायांग के ऊपर ऐसे फैलते हैं जैसे एक सांप ने शिवलिंग पर अपना फन फैला दिया हो। यही कारण है कि इस पेड़ को नागलिंग कहा जाता है। साथ ही इसके फल कैननबॉल की भांति दिखाई देते हैं। इसलिए इसे कैननबॉल ट्री के नाम से भी जाना जाता है।

कैनन-बॉल ट्री, जिसे कौरौपिटा गुआनेंसिस के नाम से भी जाना जाता है, पुडुचेरी का आधिकारिक राजकीय फूल है। कैनन-बॉल ट्री का वैज्ञानिक नाम कौरौपिटा गुआनेंसिस है। कौरौपिटा फ्रेंच गुयाना स्थानीय नाम, 'कोउरोपीटौमो' या 'कोउरोपीटो-उटोमो' का लैटिनकृत रूप है। गुआनेंसिस अपने मूल क्षेत्र, उत्तरी दक्षिण अमेरिका में गुयाना को संदर्भित करता है। कैनन-बॉल का पेड़ न केवल एक राज्य फूल है, बल्कि यह एक आकर्षक पेड़ भी है जिसका समृद्ध इतिहास और कई उपयोग हैं।

पॉण्डिचेरी का राजकीय फूल -  नागलिंगम || State Flower of  Puducherry - NAGALINGAM / कैननबॉल ट्री (Cannonball Tree)

पुडुचेरी के राजकीय प्रतीक

राज्य पशु – गिलहरी
राज्य पक्षी – एशियाई कोयल
राज्य वृक्ष – बेल फल वृक्ष 
राजकीय पुष्प – कैननबॉल ट्री (Cannonball Tree)
राजकीय भाषा  – तमिल, तेलुगु, मलयालम और फ्रेंच आधिकारिक भाषाएँ हैं
प्रमुख नदियां – जिंजी (शंकरपरणी), पेन्नार, कावेरी, गोदावरी और माहे नदी

कैनन-बॉल ट्री 15 मीटर तक लंबा होता है, जिसमें पत्तियां आयताकार, ओबोवेट, अण्डाकार या मोटे तौर पर लांसोलेट होती हैं जिसमें सुंदर और सुगंधित फूल होते हैं, जो 15 सेमी तक हो सकते हैं। आकर्षक, सुगंधित गुलाबी और गहरे लाल रंग के फूलों में 6 पंखुड़ियाँ होती हैं जो आकार में बड़ी होती हैं। रंगीन पंखुड़ियाँ, पुंकेसर के पीले रंग के शीर्ष और सफेद रंग का हुड परागणकों को आकर्षित करते हैं क्योंकि वे पराबैंगनी प्रकाश को परावर्तित करने के लिए जाने जाते हैं। पेड़ में गोलाकार फल आते हैं, जो बाहर से सख्त और अंदर से गूदेदार होते हैं और गूदे में कई बीज लगे होते हैं। हालांकि, पारिपक्व होने पर फलों से तेज दुर्गंध निकलने की वजह से लोगों द्वारा पसंद नहीं किया जाता है। 

पॉण्डिचेरी का राजकीय फूल -  नागलिंगम || State Flower of  Puducherry - NAGALINGAM / कैननबॉल ट्री (Cannonball Tree)

कैनन-बॉल का पेड़ दक्षिण अमेरिका के गुयाना का मूल निवासी है, लेकिन पूरे मध्य अमेरिका में पाया जा सकता है। इसे भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका सहित अन्य देशों में भी पाया गया है। कैनन-बॉल का पेड़ अपने बड़े गुलाबी-बैंगनी फूलों और बड़े गोलाकार फलों के कारण बगीचों में सजावटी पेड़ के रूप में उगाया जाता है। इसके लकड़ी का उपयोग ईंधन के रूप में भी किया जाता है। 

पौधे के लगभग सभी भागों में विभिन्न औषधीय गुण पाए जाते हैं। कैनन-बॉल के पेड़ के फलों का गूदा सिरदर्द को ठीक करता है, जबकि पत्तियों के रस को बालों के विकास के लिए बाहरी रूप से लगाया जाता है। 

English Translate

State flower of Pondicherry

Common name: Cannonball tree
Local name: Nagalingam (Tamil, Malayalam), Bili (Gujarati), Shivalingi (Hindi)
Scientific name: Couroupita guanensis Aubl

The flowers of the Cannonball tree spread over the gynoecium like a snake spreading its hood over the Shivalinga. This is why the tree is called Nagalinga. Also, its fruits look like cannonballs. Hence, it is also known as the Cannonball tree.

पॉण्डिचेरी का राजकीय फूल -  नागलिंगम || State Flower of  Puducherry - NAGALINGAM / कैननबॉल ट्री (Cannonball Tree)

The Cannon-ball tree, also known as Couroupita guanensis, is the official state flower of Puducherry. The scientific name of the Cannon-ball tree is Couroupita guanensis. Couroupita is the Latinised form of the French Guiana local name, 'Kouropitoumo' or 'Kouropito-utomo'. Couroupita refers to its native region, Guyana in northern South America. The cannon-ball tree is not only a state flower, but it is also an attractive tree that has a rich history and many uses.

State Symbols of Puducherry

State Animal – Squirrel
State Bird – Asian Koel
State Tree – Bael Fruit Tree
State Flower – Cannonball Tree
State Language – Tamil, Telugu, Malayalam and French are the official languages
Rivers – Gingee (Sankaraparini), Pennar, Cauvery, Godavari and Mahe River

The cannon-ball tree grows up to 15 m tall with leaves that are oblong, obovate, elliptical or broadly lanceolate with beautiful and fragrant flowers that can be up to 15 cm across. The attractive, fragrant pink and deep red flowers have 6 petals that are large in size. The colourful petals, yellow tops of the stamens and white hood attract pollinators as they are known to reflect ultraviolet light. The tree bears spherical fruits, which are hard from outside and pulpy from inside and contain many seeds embedded in the pulp. However, the fruits are not liked by people due to their strong odor when ripe.

पॉण्डिचेरी का राजकीय फूल -  नागलिंगम || State Flower of  Puducherry - NAGALINGAM / कैननबॉल ट्री (Cannonball Tree)

The cannon-ball tree is native to Guyana in South America, but can be found throughout Central America. It has also been found in other countries including India, Pakistan and Sri Lanka. The cannon-ball tree is grown as an ornamental tree in gardens due to its large pinkish-purple flowers and large spherical fruits. Its wood is also used as fuel.

Almost all parts of the plant have various medicinal properties. The pulp of the fruit of the cannon-ball tree cures headaches, while the juice of the leaves is applied externally for hair growth.

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-2 ...कुत्सा (Kutsa)

मानसरोवर-2 ...कुत्सा (Kutsa)

कुत्सा - मुंशीप्रेमचंद | Kutsa by Munshi Premchand

अपने घर में आदमी बादशाह को भी गाली देता हैं। एक दिन मैं अपने दो-तीन मित्रों के साथ बैठा हुआ एक राष्ट्रीय संस्था के व्यक्तियों की आलोचना कर रहा था। हमारे विचार में राष्ट्रीय कार्यकर्त्ताओं को स्वार्थ और लोभ से ऊपर रहना चाहिए। ऊँचा और पवित्र आदर्श सामने रख कर ही राष्ट्र की सच्ची सेवा की जा सकती हैं। कई व्यक्तियों के आचरण ने हमें क्षुब्ध कर दिया था और हम इस समय बैठे अपने दिल का गुबार निकाल रहे थे! सम्भव था, उस परिस्थिति में पड़कर हम और भी गिर जाते; लेकिन उस वक़्त तो हम विचारक के स्थान पर बैठे हुए थे और विचारक उदार बनने लगे, तो न्याय कौन करे? विचारक को यह भूल जाने में विलम्ब नहीं होता कि उसमें भी कमजोरियाँ हैं। उसमें और अभियुक्त में केवल इतनी ही अन्तर हैं कि या तो विचारक महाशय उस परिस्थिति में पड़े नहीं, या पड़कर भी अपनी चतुराई से बेदाग निकल गये।

कुत्सा - मुंशीप्रेमचंद | Kutsa by Munshi Premchand

पद्मादेवी ने कहा- महाशय ‘क’ काम तो बड़े उत्साह से करते हैं; लेकिन अगर हिसाब देखा जाय, तो उनके जिम्मे एक हजार से कम न निकलेगा।

उर्मिलादेवी ने कहा- खैर ‘क’ को तो क्षमा किया जा सकता हैं। उसके बाल-बच्चे हैं, आखिर उनका पालन-पोषण कैसे से करे? जब वह चौबीसों घंटे सेवा-कार्य में लगा रहता हैं, तो उसे कुछ-न-कुछ तो मिलना ही चाहिए। उस योग्यता का आदमी 500/ वेतन पर भी न मिलता। अगर इस साल-भर में उसने एक हजार खर्च कर डाला, तो बहुत नहीं हैं। महाशय ‘ख’ तो बिल्कुल निहंग हैं। ‘जोरू न जाँता अल्लाह मियाँ से नाता’; पर उनके जिम्मे भी एक हजार से कम न होंगे। किसी को क्या अधिकार हैं कि वह गरीबों का धन मोटर की सवारी और यार-दोस्तों की दावत में उड़ा दे?

श्यामादेवी उद्दंड होकर बोली- महाशय ‘ग’ को इसका जवाब देना पड़ेगा, भाई साहब! यों बचकर नहीं निकल सकते। हम लोग भिक्षा माँग-माँग कर पैसे लाते हैं; इसीलिए कि यार-दोस्तों की दावतें हों. शराबे उडायी जायँ और मुजरे देखे जायँ? रोज सिनेमा की सैर होती हैं। गरीबों का धन यों उड़ाने के लिए नहीं हैं। यहाँ पाई-पाई का लेखा समझना पड़ेगी। मै भरी सभा में रगेंदूँगी। उन्हें जहाँ पाँच सौ वेतन मिलता हो, वहाँ चले जायँ। राष्ट्र के सेवक बहुतेरे निकल आवेंगे।

मैं भी एक बार इसी संस्था का मन्त्री रह चुका हूँ । मुझे गर्व हैं कि मेरे ऊपर कभी किसी ने इस तरह का आक्षेप नहीं किया; पर न-जाने क्यों लोग मेरे मन्त्रित्व से सन्तुष्ट नहीं थे। लोगो का ख्याल था कि मैं बहुत कम समय देता हूँ, और मेरे समय में संस्था ने कोई गौरव बढ़ानेवाला काम नहीं किया; इसलिए मैने रूठकर इस्तीफा दे दिया था। मै उसी पद से बेलौस रहकर भी निकाला गया। महाशय ‘ग’ हजारों हड़प करके भी उसी पद पर जमें हुए हैं। क्या यह मेंरे उनसे कुनह रखने की काफी वजह न थी? मैं चतुर खिलाड़ी की भाँति खुद को कुछ न कहना चाहता था, किन्तु परदे की आड़ से रस्सी खींचता रहता था।

मैने रद्दा जमाया- देवीजी, आप अन्याय कर रही हैं। महाशय ‘ग’ से ज्यादा दिलेर और …

उर्मिला ने मेरी बात को काटकर कहा- मैं ऐसे आदमी की दिलेरी नहीं कहती जो छिपकर जनता के रुपये से शराब पियें। जिन शराब की दूकानों पर हम धरना देने जाते थे, उन्हीं दूकानों से उनके लिए शराब आती थी। इससे बढ़कर बेवफाई और क्या हो सकती हैं? ऐसे आदमी को देशद्रोही कहती हूँ ।

मैने और खींची- लेकिन यह तो तुम भी मानती हो कि क्या महाशय ‘ग’ केवल अपने प्रभाव से हजारों रुपयें चन्दा वसूल कर लाते हैं। विलायती कपड़े को रोकने का उन्हें जिनता श्रेय दिया जाय, थोड़ा हैं।

उर्मिला देवी कब माननेवाली थी। बोली- उन्हें चन्दे इस संस्था के नाम पर मिलते हैं, व्यक्तिगत रूप से एक धेला भी लावें तो कहूँ । रहा विलायती कपड़ा। जनता नामों को पूजती हैं औऱ महाशय की तारीफें हो रही हैं; पर सच पूछिए तो यह श्रेय हमें मिलना चाहिए। वह तो कभी किसी दूकान पर गये ही नही। आज सारे शहर में इस बात की चर्चा हो रही हैं। जहाँ चन्दा माँगने जाओ, वहीं लोग यही आक्षेप करने लगते हैं। किस-किसका मुँह बन्द कीजिएगा? आप बनते तो है जाति के सेवक; मगर आचरण ऐसा कि शोहदों का भी न होगा। देश का उद्धार ऐसे विलासियों के हाथों नहीं हो सकता। उसके लिए त्याग होना चाहिए।

यहीं आलोचनाएँ हो रही थी कि एक दूसरी देवी आयीं, भगवती! बेचारी चन्दा माँगने आयी थी। थकी-माँदी चली आ रही थी। यहाँ जो पंचायत देवी, तो रम गयी। उनके साथ उनकी बालिका भी थी। कोई दस साल उम्र होगी, इन कामों में बराबर माँ के साथ रहती थी। उसे जोर की भूख लगी हुई थी। घर की कुंजी भगवती देवी के पास थी। पतिदेव दफ्तर से आ गये होगे। घर का खुलना भी जरूरी था, इसलिए मैंन बालिका को उसके घर पहुँचाने की सेवा स्वीकार की

कुछ दूर चलकर बालिका न कहा- आपको मालूम हैं, महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं?

मैं इस आक्षेप का समर्थन न कर सका। भोली-भाली बालिका के हृदय में कटुता, द्वेष और प्रपंच का विष बोना मेरी ईर्ष्यालु प्रक प्रकृति को भी रुचिकर न जान पड़ा। जहाँ कोमलता और सारल्य, विश्वास और माधुर्य का राज्य होना चाहिए, वहाँ कुत्सा और क्षुद्रता का मर्यादित होना कौन पसन्द करेगा? देवता के गले में काँटों की माला कौन पहनायेगा?

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र

मैने पूछा- तुमसे किसने कहा कि महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं?

‘वाह पीते ही हैं, आप क्या जानें?’

‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ?’

‘सारे शहर के लोग कह रहे हैं!’

‘शहर वाले झूठ बोल रहे हैं।’

बालिका ने मेरी ओर अविश्वास की आँखों से देखा, शायद वह समझी, मैं भी महाशय ‘ग’ के ही भाई-बन्दों में हूँ ।

‘आप कह सकते हैं, महाशय ‘ग’ शराब नहीं पीते?’

‘हाँ, वह कभी शराब नहीं पीते।’

‘और महाशय ‘क’ ने जनता के रुपये भी नहीं उड़ाये?’

‘यह भी असत्य हैं।’

‘और महाशय ‘ख’ मोटर पर हवा खाने नही जाते?’

‘मोटर पर हवा खाना अपराध नहीं हैं।’

‘अपराध नहीं हैं, राजाओं के लिए, रईसों के लिए, अफसरों के लिए, जो जनता का खून चूसते हैं, देश-भक्ति का दम भरनेवालों के लिए यह बहुत बड़ा अपराध हैं।’

‘लेकिन यह तो सोचो, इन लोगों को कितना दौड़ना पड़ता हैं। पैदल कहाँ तक दौड़े?’

‘पैरगाड़ी पर तो चल सकते हैं। यह कुछ बात नहीं हैं। ये लोग शान दिखाना चाहते हैं, जिससे लोग समझे कि यह भी बहुत बड़े आदमी हैं। हमारी संस्था गरीबों की संस्था हैं। यहाँ मोटर पर उसी वक़्त बैठना चाहिए, जब और किसी तरह काम ही न चल सके औऱ शराबियों के लिए तो यहाँ स्थान ही न होना हिए। आप तो चन्दे माँगने जाते नहीं। हमें कितना लज्जित होना पड़ता हैं, आपको क्या मालूम।’

मैने गम्भीर होकर कहा- तुम्हें लोगों से कह देना चाहिए, यह सरासर गलत हैं। हम और तुम इस संस्था के शुभचिन्तक हैं। हमें अपने कार्यकर्त्ताओं का अपमान करना उचित नहीं हैं। मैं यह नही कहता कि क, ख, ग में बुराईयाँ नहीं हैं। संसार में ऐसा कौन हैं, जिसमें बुराईयाँ न हो, लेकिन बुराईयों के मुकाबले में उनमें गुण कितने हैं, यह तो देखो। हम सभी स्वार्थ पर जान देते हैं- मकान बनाते हैं, जायदाद खरीदते हैं। और कुछ नही, तो आराम से घर में सोते हैं। ये बेचारे चौबीसों घंटे देश-हित की फिक्र में डूबे रहते हैं। तीनों ही साल-साल भर की सजा काटकर, कई महीने हुए, लौटे हैं। तीनों ही के उद्योग से अस्पताल और पुस्तकायल खुले खुले। इन्हीं वीरों ने आन्दोलन करके किसानों का लगान कम कराया। अगर इन्हें शराब पीना और धन कमाना होता, तो इस क्षेत्र में आते हीं क्यो?

बालिका ने विचारपूर्ण दृष्टि से मुझे देखा। फिर बोली- यह बतलाइए, महाशय ‘ग’ शराब पीते हैं या नहीं?

मैने निश्चयपूर्वक कहा- नहीं। जो यह कहता हैं, वह झूठ बोलता हैं।

भगवती देवी का मकान आ गया। बालिका चली गयी। मैं आज झूठ बोलकर जितना प्रसन्न था, उतना कभी सच बोलकर भी न हुआ था। मैने बालिका के निर्मल हृदय को कुत्सा के पंक में गिरने से बचा लिया था!