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मयूर पंख

मयूर पंख

वनवास के दौरान माता सीता जी को प्यास लगी। पानी के लिए श्रीरामजी ने चारों ओर देखा, तो उनको दूर-दूर तक जंगल ही जंगल दिख रहा था।

मयूर पंख

उन्होंने वन देव से प्रार्थना की - "हे वन देवता ! आसपास जहाँ कहीं पानी हो, वहाँ जाने का मार्ग कृपा कर सुझाईये।" 

तभी वहाँ एक मयूर ने आकर श्रीरामजी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर एक जलाशय है। चलिए मैं आपका मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ, किंतु मार्ग में हमारी भूल चूक होने की संभावना है।

श्रीरामजी ने पूछा - वह क्यों ?

तब मयूर ने उत्तर दिया कि - मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप चलते हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ जाऊंगा। उस के सहारे आप‌ जलाशय तक पहुँच ही जाओगे।

यहां पर एक बात ध्यान देने योग्य है कि - मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं। अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध पंखों को बिखेरेगा, तो उसकी मृत्यु हो जाती है और वही हुआ।

अंत में जब मयूर अपनी अंतिम सांस ले रहा होता है, तब उसने मन में ही कहा कि वह कितना भाग्यशाली है, कि जो जगत की प्यास बुझाते हैं, ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरा जीवन धन्य हो गया। अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नहीं रही।

तभी भगवान श्रीराम ने मयूर से कहा कि मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरकर, अपने जीवन का त्यागकर मुझ पर जो ऋणानुबंध चढ़ाया है, मैं उस ऋण को अगले जन्म में जरूर चुकाऊंगा, तुम्हारे पंख अपने सिर पर धारण करके। तत्पश्चात अगले जन्म में श्री कृष्ण अवतार में उन्होंने अपने माथे (मुकुट) पर मयूर पंख को धारण कर वचन अनुसार उस मयूर का ऋण उतारा था। तात्पर्य यही है कि अगर भगवान को ऋण उतारने के लिए पुनः जन्म लेना पड़ता है, तो हम तो मानव हैं। न जाने हम कितने ही " ऋणानुबंध " से बंधे हैं।

उसे उतारने के लिए हमें तो कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे।

अर्थात... 

जो भी भला हम कर सकते हैं, इसी जन्म में हमें करना है।

मयूर पंख

जय श्री कृष्ण 🙏

मैं रूठा, तुम भी रूठ गए फिर मनाएगा कौन ?

मैं रूठा, तुम भी रूठ गए फिर मनाएगा कौन ?

Rupa Oos ki ek Boond

मैं रूठा, तुम भी रूठ गए फिर मनाएगा कौन ?

आज दरार है, कल खाई होगी

फिर भरेगा कौन ?

मैं चुप, तुम भी चुप

इस चुप्पी को फिर तोडेगा कौन ?

बात छोटी सी लगा लोगे दिल से,

तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन ?

दुखी मैं भी और तुम भी बिछड़कर,

सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ?

न मैं राजी, न तुम राजी,

फिर माफ़ करने का बड़प्पन दिखाएगा कौन ?

डूब जाएगा यादों में दिल कभी,

तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन ?

एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी,

इस अहम् को फिर हराएगा कौन ?

ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए ?

फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन ?

मूंद ली दोनों में से गर किसी दिन एक ने आँखें….

तो कल इस बात पर फिर

पछतायेगा कौन ?

कुछ हँस के बोल दिया करो,

कुछ हँस के टाल दिया करो,

यूँ तो बहुत परेशानियां है तुमको भी मुझको भी,

मगर कुछ फैंसले वक्त पे डाल दिया करो,

न जाने कल कोई हंसाने वाला मिले न मिले..

इसलिये आज ही हसरत निकाल लिया करो !!

हमेशा समझौता करना सीखिए..

क्योंकि थोड़ा सा झुक जाना किसी रिश्ते को

हमेशा के लिए तोड़ देने से बहुत बेहतर है ।।।

किसी के साथ हँसते-हँसते उतने ही हक से रूठना भी

आना चाहिए !

अपनो की आँख का पानी धीरे से पोंछना आना

चाहिए !

रिश्तेदारी और दोस्ती में कैसा मान अपमान ?

बस अपनों के दिल मे रहना आना चाहिए ।

मैं रूठा तुम भी रूठ गए फिर मनाएगा कौन


ओशो – मौन का महत्व

ओशो – मौन का महत्व

 मौन से संकल्प शक्ति की वृद्धि तथा वाणी के आवेगों पर नियंत्रण होता है। मौन आन्तरिक तप है इसलिए यह आन्तरिक गहराइयों तक ले जाता है। मौन के क्षणों में आन्तरिक जगत के नवीन रहस्य उद्घाटित होते है। वाणी का अपब्यय रोककर मानसिक संकल्प के द्वारा आन्तरिक शक्तियों के क्षय को रोकना परम् मौन को उपलब्ध होना है। मौन से सत्य की सुरक्षा एवं वाणी पर नियंत्रण होता है। मौन के क्षणों में प्रकृति के नवीन रहस्यों के साथ परमात्मा से प्रेरणा मिल सकती है।

मौन सबसे अच्छा उत्तर है, किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जो आपके शब्दों को महत्व नहीं देता - "भागवत गीता"

मौन सबसे अच्छा उत्तर है किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जो आपके शब्दों का महत्व नहीं देता  भागवत गीता

ओशो – कुछ मित्र जो तीनों दिन मौन रख सकें, बहुत अच्छा है, वे बिलकुल ही चुप हो जाएं। और कोई भी चुप होता हो, मौन रखता हो, तो दूसरे लोग उसे बाधा न दें, सहयोगी बनें। जितने लोग मौन रहें, उतना अच्छा। कोई तीन दिन पूरा मौन रखे, सबसे बेहतर। उससे बेहतर कुछ भी नहीं होगा। अगर इतना न कर सकते हों तो कम से कम बोलें—इतना कम, जितना जरूरी हो— टेलीग्रैफिक। जैसे तारघर में टेलीग्राम करने जाते हैं तो देख लेते हैं कि अब दस अक्षर से ज्यादा नहीं। अब तो आठ से भी ज्यादा नहीं। तो एक दो अक्षर और काट देते हैं, आठ पर बिठा देते हैं। तो टेलीग्रैफिक! खयाल रखें कि एक—एक शब्द की कीमत चुकानी पड़ रही है। इसलिए एक—एक शब्द बहुत महंगा है; सच में महंगा है। इसलिए कम से कम शब्द का उपयोग करें; जो बिलकुल मौन न रह सकें वे कम से कम शब्द का उपयोग करें।

साथ ही इंद्रियों का भी कम से कम उपयोग करें। जैसे आंख का कम उपयोग करें, नीचे देखें। सागर को देखें, आकाश को देखें, लोगों को कम देखें। क्योंकि हमारे मन में सारे संबंध, एसोसिएशस लोगों के चेहरों से होते हैं—वृक्षों, बादलों, समुद्रों से नहीं। वहां देखें, वहां से कोई विचार नहीं उठता। लोगों के चेहरे तत्काल विचार उठाना शुरू कर देते हैं। नीचे देखें, चार फीट पर नजर रखें— चलते, घूमते, फिरते। आधी आंख खुली रहे, नाक का अगला हिस्सा दिखाई पड़े, इतना देखें। और दूसरों को भी सहयोग दें कि लोग कम देखें, कम सुनें। रेडियो, ट्रांजिस्टर सब बंद करके रख दें, उनका कोई उपयोग न करें। अखबार बिलकुल कैंपस में मत आने दें।

जितना ज्यादा से ज्यादा इंद्रियों को विश्राम दें, उतना शुभ है, उतनी शक्ति इकट्ठी होगी; और उतनी शक्ति ध्यान में लगाई जा सकेगी। अन्यथा हम एग्झास्ट हो जाते हैं। हम करीब—करीब एग्झास्ट हुए लोग हैं, जो चुक गए हैं बिलकुल, चली हुई कारतूस जैसे हो गए हैं। कुछ बचता नहीं, चौबीस घंटे में सब खर्च कर डालते हैं। रात भर में सोकर थोड़ा—बहुत बचता है, तो सुबह उठकर ही अखबार पढना, रेडियो और शुरू हो गया उसे खर्च करना। कंजरवेशन ऑफ एनर्जी का हमें कोई खयाल ही नहीं है कि कितनी शक्ति बचाई जा सकती है। और ध्यान में बड़ी शक्ति लगानी पड़ेगी। अगर आप बचाएंगे नहीं तो आप थक जाएंगे।

कबीर ने कहा है:-

कबीरा यह गत अटपटी, चटपट लखि न जाए। जब मन की खटपट मिटे, अधर भया ठहराय।

अर्थात, 

अधर मतलब होंठ। होंठ वास्तव में तभी ठहरेंगें, तभी शान्त होंगे, जब मन की खटपट मिट जायेगी। हमारे होंठ भी ज्यादा इसीलिए चलते हैं क्योंकि मन अशान्त है, और जब तक मन अशान्त है, तब तक होंठ चलें या न चलें कोई अन्तर नहीं क्योंकि मूल बात तो मन की अशान्ति है। वो बनी हुई है। 

जिस तरह घोंसला सोती हुई चिड़िया को आश्रय देता है उसी तरह मौन तुम्हारी वाणी को आश्रय देता है - रवींद्रनाथ टैगोर

चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता और वह मौन रहती है - फ्रैंकलीन

एकांत आत्मा का सर्वोत्तम मित्र हैं - बिनोवा भावे

मौन की भाषा वाणी की भाषा की अपेक्षा अधिक बलवती होती है - अथर्ववेद

मौन की भाषा वाणी की भाषा की अपेक्षा अधिक बलवती होती है  अथर्ववेद

पुदुच्चेरी का राज्य पक्षी (State Bird of Puducherry) || एशियाई कोयल (Eudynamys scolopaceus)/ Asian Koel

पुदुच्चेरी का राज्य पक्षी

शायद ही कोई ऐसा भी व्यक्ति होगा जिसे कोयल की आवाज लुभाती नहीं होगी। बच्चे तो कोयल की आवाज के पीछे कू कू की आवाज भी निकालते हैं। कोयल के बारे में इस ब्लॉग में पहले भी पोस्ट डाला जा चुका है। आज इस पक्षी को पुडुचेरी के राष्ट्रीय पक्षी के रूप में जानेंगे। तो चलिए आज चर्चा करते हैं, पुदुच्चेरी के राजकीय पक्षी के बारे में, जिसका नाम है- "एशियाई कोयल (Asian Koel)"

पुदुच्चेरी का राज्य पक्षी (State Bird of Puducherry) || एशियाई कोयल (Eudynamys scolopaceus)/ Asian Koel

कोयल (Cuckoo) का वैज्ञानिक नाम "यूडाइनेमिस स्कोलोपेकस (eudainemis scolopecus)" है। यह सर्वाहारी जीवों की श्रेणी वाला पक्षी है। बसंत ऋतू के समय कोयल कूकती है। इस कोयल की एक बहुत ही विचित्र विशेषता है कि यह अपना अंडा कौए के घोसले में देती है, और खुद का घोसला कभी नहीं बनाती।

  "कूक कूक कर बोले कोयल
                         मीठी मीठी इसकी तान,
  सबसे मीठा मीठा बोलो,
                 सदा मिलेगा यश, सम्मान "

कोयल इस बात का उदाहरण है कि कोई रूप से कैसा भी हो वाणी का मधुर है, तो किसी को भी आकर्षित कर सकता है। अपनी मधुर वाणी से किसी का भी मन मोह लेता है।

कोयल प्रकृति की बेटियां हैं। हर साल वसंत ऋतु में पूरी तन्मयता, ईमानदारी और समयबद्धता के साथ अपनी मीठी तान छेड़कर सम्पूर्ण वातावरण को और भी अधिक मोहक और हसीन बनाती हैं। हालांकि प्रकृति ने कोयल को सुरीली आवाज से नवाजा है, लेकिन इसके बावजूद यह पक्षी स्वभाव से बेहद चालाक पक्षी की श्रेणी में आने वाला जीव है। 

पुदुच्चेरी का राज्य पक्षी (State Bird of Puducherry) || एशियाई कोयल (Eudynamys scolopaceus)/ Asian Koel

कोयल की मधुर आवाज़ के कारण कोएल पक्षी को भारत में नाइटिंगेल भी कहा जाता है। एशियाई कोयल एक बड़ी-लंबी पूंछ वाली कोयल है, जिसकी लंबाई पैंतालीस सेंटीमीटर है। नर एक हरे हरे बिल, अमीर लाल आँखें और भूरे रंग के पैर और पैरों के साथ काले रंग का नीला है। 

मादा के शरीर का ऊपरी हिस्सा भूरे रंग का होता है और निचले हिस्से सफेद रंग के होते हैं। मादाओं में एक जैतून या हरी चोंच और लाल आँखें होती हैं। यह एक ब्रूड परजीवी है, जो विभिन्न प्रकार के पक्षियों के घोंसले में अपना एकल अंडा देता है।

एशियाई कोयल सर्वाहारी है, जो विभिन्न प्रकार के कीड़े, कैटरपिलर, अंडे और छोटे कशेरुक का सेवन करता है। वयस्क कोयल बड़े पैमाने पर फलों का सेवन करता है। यह कभी-कभी छोटे पक्षियों के अंडे का सेवन भी करता है।

English Translate

State Bird of Puducherry

There would hardly be any person who would not be attracted by the sound of the cuckoo. Children even make coo-coo sounds after the sound of the cuckoo. A post about Cuckoo has already been posted in this blog. Today this bird will be known as the national bird of Puducherry. So let us discuss today about the state bird of Puducherry, whose name is- "Asian Koel".

पुदुच्चेरी का राज्य पक्षी (State Bird of Puducherry) || एशियाई कोयल (Eudynamys scolopaceus)/ Asian Koel

The scientific name of Cuckoo is "Eudainemis scolopecus". This is a bird belonging to the category of omnivores. The cuckoo croaks during the spring season. A very strange feature of this cuckoo is that it lays its egg in the crow's nest, and never makes its own nest.

  The cuckoo is an example of the fact that no matter what one's appearance is, if one's speech is sweet, one can attract anyone. He captivates anyone's heart with his sweet voice.

Cuckoos are daughters of nature. Every year in the spring season, she makes the entire atmosphere even more attractive and beautiful by playing her sweet tune with full devotion, honesty and punctuality. Although nature has blessed the cuckoo with a melodious voice, yet this bird is a very clever bird by nature.

पुदुच्चेरी का राज्य पक्षी (State Bird of Puducherry) || एशियाई कोयल (Eudynamys scolopaceus)/ Asian Koel

Due to the melodious voice of the cuckoo, the Koel bird is also called Nightingale in India. The Asian cuckoo is a large long-tailed cuckoo, reaching forty-five centimeters in length. The male is blackish blue with a pale green bill, rich red eyes and brown legs and feet.

The upper part of the female's body is brown and the lower parts are white. Females have an olive or green bill and red eyes. It is a brood parasite, laying its single egg in the nest of a variety of birds.

The Asian cuckoo is omnivorous, consuming a variety of insects, caterpillars, eggs, and small vertebrates. The adult cuckoo consumes fruits extensively. It also occasionally consumes eggs of small birds.

भारत के सभी राज्यों के राजकीय पक्षियों की सूची |(List of State Birds of India)

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta) अध्याय- 14 (05 - 18)

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

अथ चतुर्दशोऽध्यायः- गुणत्रयविभागयोग 

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

सत्‌, रज, तम- तीनों गुणों का विषय

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ || 14.05 ||

भावार्थ : 

हे महाबाहु अर्जुन! सात्विक गुण, राजसिक गुण और तामसिक गुण यह तीनों गुण भौतिक प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों के कारण ही अविनाशी जीवात्मा शरीर में बँध जाती हैं। 

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌ ।
सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ || 14.06 ||

भावार्थ : 

हे निष्पाप अर्जुन! सतोगुण अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होने के कारण पाप-कर्मों से जीव को मुक्त करके आत्मा को प्रकाशित करने वाला होता है, जिससे जीव सुख और ज्ञान के अहंकार में बँध जाता है। 

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌ ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌ || 14.07 ||

भावार्थ : 

हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को कामनाओं और लोभ के कारण उत्पन्न हुआ समझ, जिसके कारण शरीरधारी जीव सकाम-कर्मों (फल की आसक्ति) में बँध जाता है।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌ ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत || 14.08 ||

भावार्थ : 

हे भरतवंशी! तमोगुण को शरीर के प्रति मोह के कारण अज्ञान से उत्पन्न हुआ समझ, जिसके कारण जीव प्रमाद (पागलपन में व्यर्थ के कार्य करने की प्रवृत्ति), आलस्य (आज के कार्य को कल पर टालने की प्रवृत्ति) और निद्रा (अचेत अवस्था में न करने योग्य कार्य करने की प्रवृत्ति) द्वारा बँध जाता है।

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत || 14.09 ||

भावार्थ : 

हे अर्जुन! सतोगुण मनुष्य को सुख में बाँधता है, रजोगुण मनुष्य को सकाम कर्म में बाँधता है और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढँक कर प्रमाद में बाँधता है।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा || 14.10 ||

भावार्थ : 

हे भरतवंशी अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण के घटने पर सतोगुण बढ़ता है, सतोगुण और रजोगुण के घटने पर तमोगुण बढ़ता है, इसी प्रकार तमोगुण और सतोगुण के घटने पर तमोगुण बढ़ता है।

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत || 14.11 ||

भावार्थ : 

जिस समय इस के शरीर सभी नौ द्वारों (दो आँखे, दो कान, दो नथुने, मुख, गुदा और उपस्थ) में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है, उस समय सतोगुण विशेष बृद्धि को प्राप्त होता है। 

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ || 14.12 ||

भावार्थ : 

हे भरतवंशीयों में श्रेष्ठ! जब रजोगुण विशेष बृद्धि को प्राप्त होता है तब लोभ के उत्पन्न होने कारण फल की इच्छा से कार्यों को करने की प्रवृत्ति और मन की चंचलता के कारण विषय-भोगों को भोगने की अनियन्त्रित इच्छा बढ़ने लगती है। 

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन || 14.13 ||

भावार्थ : 

हे कुरुवंशी अर्जुन! जब तमोगुण विशेष बृद्धि को प्राप्त होता है तब अज्ञान रूपी अन्धकार, कर्तव्य-कर्मों को न करने की प्रवृत्ति, पागलपन की अवस्था और मोह के कारण न करने योग्य कार्य करने की प्रवृत्ति बढने लगती हैं।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌ ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते || 14.14 ||

भावार्थ : 

जब कोई मनुष्य सतोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल स्वर्ग लोकों को प्राप्त होता है। 

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्‍गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते || 14.15 ||

भावार्थ : 

जब कोई मनुष्य रजोगुण की बृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होता है तब वह सकाम कर्म करने वाले मनुष्यों में जन्म लेता है और उसी प्रकार तमोगुण की बृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त मनुष्य पशु-पक्षियों आदि निम्न योनियों में जन्म लेता है। 

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌ || 14.16 ||

भावार्थ : 

सतोगुण में किये गये कर्म का फल सुख और ज्ञान युक्त निर्मल फल कहा गया है, रजोगुण में किये गये कर्म का फल दुःख कहा गया है और तमोगुण में किये गये कर्म का फल अज्ञान कहा गया है।

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च || 14.17 ||

भावार्थ : 

सतोगुण से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से निश्चित रूप से लोभ ही उत्पन्न होता है और तमोगुण से निश्चित रूप से प्रमाद, मोह, अज्ञान ही उत्पन्न होता हैं। 

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः || 14.18 ||

भावार्थ : सतोगुण में स्थित जीव स्वर्ग के उच्च लोकों को जाता हैं, रजोगुण में स्थित जीव मध्य में पृथ्वी-लोक में ही रह जाते हैं और तमोगुण में स्थित जीव पशु आदि नीच योनियों में नरक को जाते हैं। 

नेकेड मोल रैट (Naked Mole Rat)

नेकेड मोल रैट (Naked Mole Rat)

चूहे तो आप सभी ने बहुत देखे होंगे, परंतु आज यहां जिस चूहे की बात हो होने जा रही है, वह शायद ही किसी ने देखा होगा। तो चलिए अजब गजब जीव जंतुओं की इस दुनिया में चलते हैं नेकेड मोल रैट की तरफ और जानते हैं इस अजीब से दिखने वाले चूहे के बारे में। 

नेकेड मोल रैट (Naked Mole Rat)

नग्न तिल चूहा, (हेटरोसेफालस ग्लैबर), कृंतक परिवार बाथयार्चिडे का बिल खोदने वाला सदस्य, जिसका नाम इसकी झुर्रीदार गुलाबी त्वचा और बाल रहित शारीरिक संरचना को देखते हुए रखा गया है। उनके चौड़े सिर में मजबूत, मांसल जबड़े होते हैं जो खुदाई के लिए उपयोग किए जाने वाले चार कृंतक दांतों को सहारा देते हैं। वे अपने लंबे जीवन काल, कम कैंसर दर और औपनिवेशिक आदत के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके नाम से पता चलता है के विपरीत, नग्न तिल चूहों की त्वचा पर लगभग 100 बारीक बाल होते हैं जो मूंछ की तरह काम करते हैं और उन्हें अपने परिवेश को समझने में मदद करते हैं।

नग्न तिल-चूहा(Naked Mole Rat)( हेटेरोसेफालस ग्लैबर), जिसे रेत पिल्ला के रूप में भी जाना जाता है। नग्न तिल चूहे आमतौर पर 7.5 सेमी (3 इंच) लंबे होते हैं और साधारणतया उनका वजन लगभग 28-42 ग्राम (1-1.5 औंस) होता हैं। उनके शरीर ने कई अनुकूलन विकसित होते हैं जो उन्हें भूमिगत आवास में रहने के अनुकूल बनाते हैं। 

इनकी आंखें छोटी होती हैं, जिससे वे व्यावहारिक रूप से अंधे हो जाते हैं। उनके पास बाहरी कान नहीं होते हैं, और उनके आंतरिक कानों में ऐसी संरचनाओं का अभाव होता है जो कर्णावत प्रवर्धन (एक प्रक्रिया जो मस्तिष्क तक पहुंचने से पहले ध्वनि को बढ़ाती है) की अनुमति देती है, जो खराब सुनवाई में योगदान करती है। अर्थात उनके देखने और सुनने की क्षमता बहुत कम होती है। अतः नग्न तिल चूहे सुरंगों में नेविगेट करने के लिए अपनी अन्य इंद्रियों, विशेष रूप से स्पर्श और गंध पर भरोसा करते हैं। उनके शरीर पर बारीक बाल चोंच में कंपन और वायु धाराओं को महसूस करने के लिए मूंछों के रूप में कार्य करते हैं और उनके छोटे पैर उन्हें सुरंगों में आसानी से नेविगेट करने में मदद करते हैं। 

नग्न तिल चूहे इथियोपिया, केन्या, सोमालिया और जिबूती सहित पूर्वी अफ्रीका के घास वाले और अर्धशुष्क क्षेत्रों में भूमिगत पाए जा सकते हैं। वे सुरंगों के एक व्यापक नेटवर्क द्वारा निर्मित भूमिगत बिलों में रहते हैं जो 2 मीटर (6.5 फीट) तक गहरे और 4 किमी (2.5 मील) लंबे हो सकते हैं। वे अपने बड़े दांतों से गंदगी कुतरकर और इसे असेंबली-लाइन फैशन में सतह पर फैलाकर, लगभग 4 सेमी (1.5 इंच) व्यास वाली ये सुरंगें बनाते हैं। सुरंगें घोंसला बनाने, देखभाल करने, भोजन भंडारण और अन्य कार्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले कक्षों को जोड़ती हैं। 

नेकेड मोल रैट (Naked Mole Rat)

नग्न तिल चूहे शाकाहारी होते हैं, और वे सतह के नीचे उगने वाले पौधों के हिस्सों जैसे जड़ों और कंदों को खाते हैं। यदि एक बड़ा कंद पाया जाता है, तो नग्न तिल चूहे आंतरिक भाग को खा सकते हैं और बाहरी हिस्से को ज्यादातर छोड़ देते हैं, जिससे यह वापस बढ़ सकता है और एक सुसंगत भोजन स्रोत बन सकता है। वे पीने के लिए पानी की तलाश में नहीं भटकते, क्योंकि उनका आहार पर्याप्त नमी प्रदान करता है। वे अपने भोजन से अवशोषित पोषक तत्वों की मात्रा को अधिकतम करने के लिए अपने स्वयं के मल को पुन: उत्पन्न करते हैं।

नग्न तिल चूहे वास्तव में एकमात्र यूकोसियल स्तनधारियों में से एक हैं - अर्थात, वे एक पदानुक्रमित सामाजिक संरचना द्वारा परिभाषित बड़ी कॉलोनियों में रहते हैं जिसमें लगभग सभीसदस्य अपेक्षाकृत कुछ सदस्यों को प्रजनन में मदद करने के लिए सहयोग करते हैं। कालोनियों का नेतृत्व एक मादा नग्न तिल चूहे द्वारा किया जाता है जिसे रानी कहा जाता है, जो प्रजनन करने वाली एकमात्र मादा है। रानी साल में चार या पांच बार संतान पैदा करती है। यह एक बार में लगभग 12 बच्चों को जन्म देती है। यह संख्या काफी परिवर्तनशील है और कभी कभी यह संख्या लगभग 30 तक पहुँच सकती है। 

कॉलोनी में अन्य नग्न चतुर चूहे या तो श्रमिकों या सैनिकों के रूप में कार्य करते हैं। श्रमिक लगभग 7.5 सेमी लंबे और वजन 35 ग्राम (1.25 औंस) होते हैं; वे सुरंग खोदते हैं, भोजन इकट्ठा करते हैं और पिल्लों की देखभाल करते हैं। इसके विपरीत, रानी और कॉलोनी को सांपों और अन्य शिकारियों से बचाने के लिए सैनिक अपने तुलनात्मक रूप से बड़े आकार का उपयोग करते हैं, जिसका वजन लगभग 55 ग्राम (2 औंस) होता है। 

नेकेड मोल रैट (Naked Mole Rat)

ये चूहे असाधारण रूप से लंबा जीवन जी सकते हैं, अनुमानित जीवनकाल 10-30 वर्ष, जो अन्य छोटे कृंतकों की तुलना में बहुत अधिक है। ब्रिटिश गणितज्ञ बेंजामिन गोम्पर्ट्ज़ द्वारा विकसित एक गणितीय समीकरण जिसमें कहा गया है कि उम्र के साथ मरने का जोखिम तेजी से बढ़ता है। जबकि मनुष्यों में मृत्यु का यह जोखिम 30 वर्ष की आयु के बाद हर आठ साल में दोगुना हो जाता है, एक नग्न तिल चूहे के मरने की संभावना जीवन भर स्थिर रहती है। प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने हेटेरोसेफालस ग्लैबर को कम से कम चिंता की प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया है।

English Translate 

Naked Mole Rat

All of you must have seen many rats, but hardly anyone would have seen the rat which is going to be talked about here today. So let's go into this world of amazing creatures towards the Naked Mole Rat and know about this strange looking rat.

नेकेड मोल रैट (Naked Mole Rat)

Naked mole rat, (Heterocephalus glaber), a burrowing member of the rodent family Bathyarchidae, named for its wrinkled pink skin and hairless body structure. Their broad heads have strong, muscular jaws that support four incisor teeth used for digging. They are renowned for their long life span, low cancer rates and colonial habit. Contrary to what their name suggests, naked mole rats have about 100 fine hairs on their skin that act like whiskers and help them sense their surroundings.

Naked Mole Rat (Heterocephalus glaber), also known as the sand pup. Naked mole rats are typically 7.5 cm (3 in) long and typically weigh about 28–42 g (1–1.5 oz). Their bodies have developed many adaptations that make them suitable for living in underground habitats.

Their eyes are small, making them practically blind. They do not have external ears, and their inner ears lack structures that allow cochlear amplification (a process that amplifies sound before it reaches the brain), which contributes to poor hearing. That means their ability to see and hear is very less. So naked mole rats rely on their other senses, especially touch and smell, to navigate tunnels. The fine hairs on their bodies act as whiskers to sense vibrations and air currents in the beak and their short legs help them navigate easily in tunnels.


Naked mole rats can be found underground in grassy and semiarid areas of East Africa, including Ethiopia, Kenya, Somalia and Djibouti. They live in underground burrows formed by an extensive network of tunnels that can be up to 2 m (6.5 ft) deep and 4 km (2.5 mi) long. They make these tunnels, about 4 cm (1.5 in) in diameter, by gnawing dirt with their large teeth and spreading it over the surface in assembly-line fashion. Tunnels connect chambers used for nesting, caregiving, food storage, and other functions.

नेकेड मोल रैट (Naked Mole Rat)

Naked mole rats are herbivores, and they eat plant parts growing below the surface, such as roots and tubers. If a large tuber is found, naked mole rats may eat the interior and leave most of the exterior, allowing it to grow back and become a consistent food source. They do not wander in search of water to drink, as their diet provides sufficient moisture. They regurgitate their own feces to maximize the amount of nutrients absorbed from their food.

Naked mole rats are actually one of the only eusocial mammals – that is, they live in large colonies defined by a hierarchical social structure in which nearly all members cooperate to help a relatively few members reproduce. Colonies are led by a female naked mole rat called a queen, who is the only female to reproduce. The queen produces offspring four or five times a year. She gives birth to about 12 babies at a time. This number is quite variable and can sometimes reach as high as 30.


Other naked shrew rats in the colony act as either workers or soldiers. Workers are about 7.5 cm long and weigh 35 g (1.25 oz); They dig tunnels, gather food, and care for the pups. In contrast, soldiers use their comparatively large size, weighing about 55 grams (2 ounces), to protect the queen and colony from snakes and other predators.

नेकेड मोल रैट (Naked Mole Rat)

These rats can live exceptionally long lives, with an estimated lifespan of 10–30 years, which is much longer than other small rodents. A mathematical equation developed by British mathematician Benjamin Gompertz that states that the risk of dying increases exponentially with age. Whereas in humans this risk of death doubles every eight years after age 30, a naked mole rat's chance of dying remains constant throughout its life. The International Union for Conservation of Nature and Natural Resources has classified Heterocephalus glaber as a species of least concern.

कैसे उत्पत्ति हुई नागों की

कैसे उत्पत्ति हुई नागों की

पुराणों के अनुसार सभी नागों की उत्पत्ति ऋषि कश्यप की पत्नि कद्रू की कोख से हुई है, कद्रू ने हजारों पुत्रों को जन्म दिया था जिसमें प्रमुख नाम अनंत(शेष), वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख, पिंगला और कुलिक थे।

कैसे उत्पत्ति हुई नागों की

कद्रू दक्ष प्रजापति की कन्या थीं,

अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कार्कोटक और पिंगला- उक्त पांच नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था, यह सभी कश्यप वंशी थे एवम इन्ही से नागवंश चला।

पुराणों के शोधानुसार नाग वंशावलियों में ‘शेष नाग’ को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेष नाग को ही ‘अनंत’ नाम से भी जाना जाता है इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए फिर तक्षक और पिंगला, वासुकी ने भगवान शिव की सेवा में नियुक्ति होना स्वीकार किया।

वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से ‘तक्षक’ कुल चलाया था।उक्त तीनों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं। शेषनाग (अनंत) को भगवान विष्णु की सेवा का अवसर मिला।

एक पुराणिक लेख अनुसार ये मूलत: कश्मीर के थे कश्मीर का ‘अनंतनाग’ इलाका इनका गढ़ माना जाता था, कांगड़ा,कुल्लू व कश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नाग ( सर्प ) ब्राह्मणों की एक जाति आज भी मौजूद है। महाभारत काल में पूरे भारत वर्ष में नागा जातियों के समूह फैले हुए थे विशेष तौर पर कैलाश पर्वत से सटे हुए इलाकों से असम, मणिपुर, नागालैंड तक इनका प्रभुत्व था, ये लोग सर्प पूजक होने के कारण नागवंशी कहलाए,कुछ विद्वान मानते हैं कि शक या नाग जाति हिमालय के उस पार की थी, अब तक तिब्बती भी अपनी भाषा को ‘नागभाषा’ कहते हैं।

उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादी नाम से नागों के वंश हुआ करते थे। भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था। अथर्ववेद में कुछ नागों के नामों का उल्लेख मिलता है ये नाग हैं श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित कोबरा (पृश्चि), काला फणियर (करैत), घास के रंग का (उपतृण्य), पीला (ब्रम), असिता रंगरहित (अलीक), दासी, दुहित,असति,तगात,अमोक और तवस्तु आदि।

‘नागा आदिवासी’ का संबंध भी नागों से ही माना गया है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी नल और नाग वंश तथा कवर्धा के फणि-नाग वंशियों का उल्लेख मिलता है। पुराणों में मध्यप्रदेश के विदिशा पर शासन करने वाले नाग वंशीय राजाओं में शेष, भोगिन,सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि आदि का उल्लेख मिलता है।

पुराणों अनुसार एक समय ऐसा था जबकि नागा समुदाय पूरे भारत (पाक-बांग्लादेश सहित) के शासक थे, उस दौरान उन्होंने भारत के बाहर भी कई स्थानों अपनी विजय पताकाएं फहराई थीं तक्षक, तनक और तुश्त नागाओं के राजवंशों की लम्बी परंपरा रही है, इन नाग वंशियों में ब्राह्मण,क्षत्रिय आदि सभी समुदाय और प्रांत के लोग थे।

नागवंशियों ने भारत के कई हिस्सों पर राज किया था इसी कारण भारत के कई शहर और गांव ‘नाग’ शब्द पर आधारित हैं मान्यता है कि महाराष्ट्र का नागपुर शहर सर्वप्रथम नागवंशियों ने ही बसाया था। वहां की नदी का नाम नाग नदी भी नागवंशियों के कारण ही पड़ा, नागपुर के पास ही प्राचीन नागरधन नामक एक महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक नगर है। महार जाति के आधार पर ही महाराष्ट्र से महाराष्ट्र हो गया महार जाति भी नागवंशियों की ही एक जाति थी। इसके अलावा हिंदीभाषी राज्यों में ‘नागदाह’ नामक कई शहर और गांव मिल जाएंगे उक्त स्थान से भी नागों के संबंध में कई किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं, नगा या नागालैंड को क्यों नहीं नागों या नागवंशियों की भूमि माना जा सकता है।

🚩हर हर महादेव🚩