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वैदिक घड़ी

वैदिक घड़ी

क्या आप जानते है "वैदिक घड़ी" 12-प्राचीन वैदिक मूल सिद्धांतों को दर्शाती है, जिनके नाम इस तरह है....


ब्रह्म 1 है! 

अश्विनी कुमार 2 है!

गुण 3 है! 

वेद 4 है! 

प्राण 5 है! 

रस (स्वाद) 6 है! 

ऋषि 7 है! 

सिद्धि 8 है! 

द्रव्य (पदार्थ) 9 है! 

दिशाएँ 10 है! 

रूद्र 11 है! 

आदित्य 12 है!

वैदिक घड़ी

आइये अब इनको विस्तार से जानते है आज के ब्लॉग के माध्यम से ⤵️


1) ब्रह्म 1 है! 

2) अश्विनी कुमार (नासत्य और 'द्स्त्र') 2 है! 

 3) गुण (सत्व, रजस और तमस) 3 है! 

4) वेद (ऋग्, यजुर, साम और अथर्व) 4 है! 

5) प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) 5 है! 

6) रस (स्वाद) (मीठा, अम्ल, नमक, कड़वा, कठोर और कसैला) 6 है!

7) ऋषि (अगस्त्य, अत्रि, भारद्वाज, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ और विश्वामित्र) 7 हैं! 

8) सिद्धि (अनिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकामी, इशितव और वशित्व) 8 हैं! 

9) द्रव्य (पदार्थ) (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल (समय), अंतरिक्ष, आत्मा और मन) 9 है!

10) दिशा (कार्डिनल दिशाएं) (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व, उत्तर-पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम, जेनिथ और नादिर) 10 है

11) रुद्र (निरति, शंभू, अपराजिता, मृगव्यध, कपार्डी, दहन, खारा, अहिरब्राध्या, कपाली, पिंगला और सेनानी) 11 है!

12) आदित्य (विष्णु, आर्यमा, इंद्र, वरुण, त्वस्ता, धाता, भग, स्वित्र, विवस्वान, अंशुमन, मित्र और पूष) 12 हैं! 


अद्भुत वैदिक घड़ी, जो हमें बहुत कुछ सिखाती है! 

श्रीमद्भगवद्गीता ||अध्याय आठ - अक्षरब्रह्मयोग योग || अनुच्छेद 23 - 28 ||

श्रीमद्भगवद्गीता ||अध्याय आठ अक्षरब्रह्मयोग योग ||

अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग

अध्याय आठ के अनुच्छेद 23 - 28

अध्याय आठ के अनुच्छेद 23 - 28 में  शुक्ल और कृष्ण मार्ग का वर्णन है।   

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta ||

यत्र काले त्वनावत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ || 8.23 ||

भावार्थ : 

हे अर्जुन! जिस काल में (यहाँ काल शब्द से मार्ग समझना चाहिए, क्योंकि आगे के श्लोकों में भगवान ने इसका नाम 'सृति', 'गति' ऐसा कहा है।) शरीर त्याग कर गए हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को और जिस काल में गए हुए वापस लौटने वाली गति को ही प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात दोनों मार्गों को कहूँगा॥8.23॥

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः || 8.24 ||

भावार्थ : 

जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। ॥8.24॥

धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम्‌ ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते || 8.25 ||

भावार्थ : 

जिस मार्ग में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता है॥8.25॥

शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः || 8.26 ||

भावार्थ : 

क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के- शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ (अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 24 के अनुसार अर्चिमार्ग से गया हुआ योगी।)-- जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ ( अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 25 के अनुसार धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी।) फिर वापस आता है अर्थात्‌ जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है॥8.26॥

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ৷৷8.27৷৷

भावार्थ : 

हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इस कारण हे अर्जुन! तू सब काल में समबुद्धि रूप से योग से युक्त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो॥8.27॥

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्‌ ।
अत्येत तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्‌ || 8.28 ||

भावार्थ : 

योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है॥8.28॥

हिन्दी साहित्य का इतिहास

हिन्दी साहित्य का इतिहास

 हिन्दी साहित्य का इतिहास चार युग में बंटा है - आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल

हिन्दी साहित्य का इतिहास

हिंदी साहित्य के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया गया है-

1. आदिकाल (वीरगाथाकाल)- सन 993 से 1918 तक, संवत् 1050 से 1375 तक
2. पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल)- सन् 1318 से 1643 तक, संवत् 1375 से 1700 तक
3. उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल)- सन् 1643 से 1843, संवत् 1700 से 1900 तक
4. आधुनिक काल- सन् 1843 से आज तक, संवत् 1900 से आज तक

हिन्दी साहित्य का इतिहास

आदिकाल (वीरगाथाकाल)

आदिकाल- आदिकाल को वीरगाथाकाल के नाम से जाना जाता है।

आदिकाल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
  1. वीर रस की प्रधानता
  2. युद्ध का सजीव चित्रण
  3. ऐतिहासिक घटनाओं का चित्रण
  4. श्रृंगार एवं अन्य रसों का समावेश
  5. प्राकृत, अपभ्रंश, डिंगल एवं पिंगल भाषा का प्रयोग
  6. आश्रयदाताओं की प्रशंसा एवं उनका यशगान

आदिकाल के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्न लिखित हैं-
  1. चंदवरदायी- पृथ्वीराज रासो
  2. नरपति नाल्ह- वीसलदेव रासो
  3. जगनिक- परमाल रासो 'आल्हाखण्ड'
  4. शारंगधर- हम्मीर रासो
  5. दलपतिविजय- खुमान रासो

पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल)

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्णिम काल माना जाता है। भक्ति काल को दो भागों में बाँटा गया है-
  1. सगुण धारा
  2. निर्गुण धारा

सगुण धारा-

भक्तिकाल की इस काव्य धारा के कवियों ने ईश्वर के साकार रूप की लीलाओं का वर्णन किया है। इसे दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-
1. रामभक्ति शाखा- इस शाखा में राम के जीवन चरित्र को आधार बनाया गया तथा इनके माध्यम से समाज को आदर्श मूल्यों, स्वस्थ गुणों, सामाजिक, पारिवारिक मूल्यों की शिक्षा देने का प्रयत्न किया गया।
इस शाखा के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
तुलसीदास- रामचरित मानस
अग्रदास- अष्टयाम
नाभादास- भक्तमाल
केशवदास- रामचंद्रिका
2. कृष्णभक्ति शाखा- कृष्णभक्ति शाखा में कृष्ण के चरित्र को आधार बनाकर काव्य रचना की गई। इस शाखा के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
सूरदास- सूरसागर
मीराबाई- मीराबाई की पदावली
रसखान- प्रेम वाटिका
इस शाखा में अष्टछाप के कवि थे।

निर्गुण धारा- 

जिन कवियों ने ईश्वर को निराकार रूप में अपने काव्य में स्थान दिया, उन्हें निर्गुण धारा के कवि के रूप में जाना जाता है। इसे दो भागों में वर्गीकृत किया गया। 
1. ज्ञानमार्गी शाखा- ज्ञान को ही ईश्वर तक जाने का मार्ग मानकर जिन्होंने काव्य साधना की, वे ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि हैं इस शाखा के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएं निम्नलिखित हैं-
कबीर दास- बीजक
रैदास- गुरु ग्रंथ साहब
गुरुनानक
2. प्रेममार्गी शाखा- जिन्होंने प्रेम के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग खोलना चाहा, वे कभी प्रेमाश्रयी शाखा के अंतर्गत परिगणित होते हैं।
इस शाखा के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
मलिक मोहम्मद जायसी- पद्मावत
शेख रहीम
नसीर

भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1.  साकार एवं निराकार ब्रह्म की उपासना
  2.  रहस्यवादी कविता का प्रारंभ
  3.  आध्यात्मिकता और सदाचार प्रेरणा
  4.  लोक कल्याण के पद पर काव्य का चरमोत्कर्ष
  5.  समस्त काव्य शैलियों का प्रयोग
  6.  प्रकृति सापेक्ष वर्णन।

भक्तिकाल के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्न लिखित हैं-

  1. तुलसीदास- रामचरित मानस
  2. सूरदास- सूरसागर
  3. मीराबाई- मीराबाई की पदावली
  4. रसखान- प्रेम वाटिका
  5. कबीर दास- बीजक
  6. रैदास- गुरु ग्रंथ साहब
  7. मलिक मोहम्मद जायसी- पद्मावत
हिन्दी साहित्य का इतिहास

उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल)

रीतिकालीन काव्य को तीन धाराओं में विभाजित किया जा सकता है-

  1. रीतिबद्ध काव्य
  2. रीतिमुक्त काव्य
  3. रीतिसिद्ध काव्य

रीतिकाल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. प्रकृति का उद्दीपन रूप में चित्रण
2. ब्रज मिश्रित अवधी भाषा का प्रयोग
3. वीर एवं श्रंगार रस की प्रधानता
4. नीति और भक्ति संबंधी काव्य रचनाएँ
5. मुक्तक काव्य रचनाएँ         इस काल के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
1. घनानंद- सुजान सागर
2. केशवदास- कविप्रिया, रामचंद्रिका
3. पद्माकर- पद्माभरण
4. भूषण- शिवराज भूषण
5. बिहारी- बिहारी सतसई
6. रसनिधि- विष्णुपद कीर्तन

रीतिकाल के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
1. घनानंद- सुजान सागर
2. केशवदास- कविप्रिया, रामचंद्रिका
3. पद्माकर- पद्माभरण
4. भूषण- शिवराज भूषण
5. बिहारी- बिहारी सतसई
6. रसनिधि- विष्णुपद कीर्तन

आधुनिक काल

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल (विकासक्रम) को निम्नलिखित भागों में बाँटा गया है-
  1. भारतेंदु युग- सन् 1850 से 1900 तक
  2. द्विवेदी युग- सन् 1900 से 1920 तक
  3. छायावादी युग- सन् 1920 से 1936 तक
  4. प्रगतिवादी युग- सन् 1936 से 1943 तक
  5. प्रयोगवादी युग- 1943 से 1950 तक
  6. नई कविता- सन् 1950 से आज तक
भारतेंदु युगीन काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-     
  1. राष्ट्रीयता की भावना 
  2. सामाजिक चेतना का विकास 
  3. हास्य व्यंग्य 
  4. अंग्रेजी शिक्षा का विरोध 
  5. विभिन्न काव्य रूपों का प्रयोग
भारतेंदु युगीन प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
  1. भारतेंदु हरिश्चंद्र- प्रेम सरोवर, प्रेम फुलवारी
  2. प्रताप नारायण मिश्र- प्रेम पुष्पावली
  3. जगमोहन सिंह- देवयानी
  4. राधाचरण गोस्वामी- नवभक्त माल
  5. अंबिका दत्त व्यास- भारत धर्म
द्विवेदी युगीन काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- 
  1. देशभक्ति 
  2. अंधविश्वास तथा रूढ़ियों का विरोध 
  3. वर्णन प्रधान कविताएँ   
  4. मानव प्रेम
  5. प्रकृति-चित्रण
द्विवेदी युगीन प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
  1. मैथिलीशरण गुप्त- पंचवटी, जयद्रथ-वध, साकेत
  2. रामनरेश त्रिपाठी- स्वप्न, पथिक, मिलन
  3. माखनलाल चतुर्वेदी- समर्पण, युगचरण
  4. महावीर प्रसाद द्विवेदी- काव्य मंजूषा, सुमन
  5. अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'- प्रिय प्रवास, रसकलश
छायावादी काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
  1. व्यक्तिवाद की प्रधानता 
  2. श्रृंगार भावना 
  3. प्रकृति का मानवीकरण 
  4. अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम 
  5. नारी के प्रति नवीन भावना
छायावाद के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
  1. जयशंकर प्रसाद- कामायनी, आँसू, लहर
  2. महादेवी वर्मा- नीरजा, निहार, रश्मि, सांध्यगीत
  3. सुमित्रानंदन पंत- पल्लव, गुंजन, ग्रंथि, वीणा
  4. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'- अनामिका, गीतिका, परिमल
  5. रामकुमार वर्मा- आकाशगंगा, निशीथ, चित्ररेखा
रहस्यवादी काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
  1. अलौकिक सत्ता के प्रति प्रेम 
  2. परमात्मा से विरह-मिलन का भाव 
  3. जिज्ञासा की भावना 
  4. प्रतीकों का प्रयोग 

प्रमुख रहस्यवादी कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
  1. सुमित्रानंदन पंत- स्वर्णधूलि, वीणा
  2. महादेवी वर्मा- यामा
  3. जयशंकर प्रसाद- आँसू
  4. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'- परिमल, नए पत्ते, अणिमा
प्रगतिवादी काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
  1. शोषको के प्रति विद्रोह और शोषितों के प्रति सहानुभूति 
  2. आर्थिक व सामाजिक समानता पर बल 
  3. नारी शोषण के विरुद्ध मुक्ति का स्वर 
  4. ईश्वर के प्रति अनास्था 
  5. प्रतीकों का प्रयोग
प्रगतिवाद के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
  1. नागार्जुन- युगधारा
  2. केदारनाथ अग्रवाल- युग की गंगा
  3. त्रिलोचन- धरती
  4. रांगेय राघव- पांचाली
  5. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'- कुकुरमुत्ता
प्रयोगवादी युग काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
    1. शोषितों, दलितों तथा गरीबों की दशा का वास्तविक चित्रण 
    2. अनपढ़ शब्दावली, असम्बध्द उपमाओं तथा रूपकों का प्रयोग 
    3. बौद्धिकता की प्रधानता 
    4. वैयक्तिकता की प्रधानता
    नई कविता की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
    1. लघु मानववाद की प्रतिष्ठा
    2. प्रयोगों में नवीनता
    3. अनुभूतियों का वास्तविक चित्रण
    4. बिंब
    5. व्यंग्य की प्रधानता
    नई कविता के प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
    1. भवानी प्रसाद मिश्र- सन्नाट, गीत फरोश
    2. कुंवर नारायण- चक्रव्यूह, आमने-सामने
    3. जगदीश गुप्त- नाव के पाँव, बोधि वृक्ष
    4. दुष्यंत कुमार- सूर्य का स्वागत, साये में धूप
    5. श्रीकांत वर्मा- माया दर्पण, मगध

    उर्मिला का बलिदान

    उर्मिला का बलिदान 

    रामायण का नाम आते ही भगवान श्री राम और माता सीता का दृश्य हमारी नजरों के सामने घूम जाता है। इसके आगे हम सभी को रामायण के मुख्य किरदार के नाम याद आते हैं, जैसे- लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान, बाली, सुग्रीव, कौशल्या, सुमित्रा, कैकई, मंदोदरी, यहां तक कि सबरी परंतु शायद ही कोई उर्मिला के बारे में ज्यादा जानता होगा। उर्मिला ने जो बलिदान दिया शायद ही ऐसा कोई स्त्री कर पाए।

    उर्मिला का बलिदान

    उर्मिला माँ सीता की छोटी बहन और प्रभु राम के छोटे भाई लक्ष्मण की पत्नी थीं। उन्हें माँ सीता को समर्पित बताया गया है, क्योंकि लक्ष्मण राम को समर्पित थे। जब लक्ष्मण वनवास में भगवान्रा श्री राम और माता सीता के साथ जाने को तैयार हुए, तो उर्मिला भी उनके साथ जाने के लिए तैयार थी, लेकिन वह हिचकिचाए और उन्हें अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल के लिए अयोध्या में ही रहने के लिए कहा। 

    किवदंतियों के अनुसार वनवास के इन चौदह वर्षों के दौरान लक्ष्मण, राम और सीता माता की रक्षा करने के लिए कभी नहीं सोए। वनवास की पहली रात में, जब राम और सीता सो रहे थे, तब लक्ष्मण ने निंद्रा देवी से अनुरोध किया कि वे उन्हें नींद की आवश्यकता न होने का वरदान दें। देवी ने उससे कहा कि वह उसकी इच्छा पूरी कर सकती हैं, लेकिन कोई और उनकी जगह सो जाना होगा। लक्ष्मण को आश्चर्य हुआ कि क्या उनकी जगह उनकी पत्नी सो सकती है। यह सुनकर निद्रा ने उर्मिला से इस सम्बन्ध में पूछा, तो उर्मिला ने सहर्ष यह कार्य स्वीकार कर लिया। उर्मिला इस अद्वितीय त्याग के लिए उल्लेखनीय हैं, जिसे उर्मिला निद्रा कहा जाता है।

    एक अन्य कथा के अनुसार, यह कहा जाता है कि जब लक्ष्मण उर्मिला को अपने वनवास में राम के साथ जाने के अपने फैसले की सूचना देने आए थे, तो उन्होंने रानी के रूप में कपड़े पहने थे। लक्ष्मण उससे क्रोधित हो गए और उसकी तुलना कैकेयी से की। लक्ष्मण ने कहा तुम माता कैकई से भी बदतर हो, तुम्हें अपने पति के साथ से ज्यादा महल का ऐशो-आराम पसंद है। मैं तुम्हें अब अपनी पत्नी स्वीकार नहीं करता और हमारा ये पवित्र बंधन टूट गया है। उर्मिला नहीं चाहती थी कि भाई-भाभी की सेवा करते हुए कभी भी लक्ष्मण को उनकी याद आए। इसलिए उर्मिला ने ये सब किया ताकि लक्ष्मण को उनसे नफरत हो जाए और वो अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर सकें। 

    देवी उर्मिला त्याग और समर्पण की अतुलनीय प्रतिमूर्ति थीं। 

    छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

    छत्रपति शिवाजी महाराज

    जब भारत के वीर सपूतों की गाथा सुनाई जाती है, तो उसमें एक नाम श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का होता है। बहुत से लोग इन्हें हिंदू हृदय सम्राट भी कहते हैं, तो कुछ लोग इन्हें मराठा का गौरव कहते हैं। शिवाजी को हिंदुओं का नायक भी माना जाता है शिवाजी महाराज एक बहादुर बुद्धिमान और निडर शासक थे। वर्ष 1674 में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और उन्हें छत्रपति का खिताब मिला।

    छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

    छत्रपति शिवाजी भारत के एक महान राजा और कुशल रणनीतिकार तथा मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे, जिनका जन्म 19 फरवरी 1630 में मराठा परिवार में हुआ। उनका पूरा नाम शिवाजी भोंसले था। शिवाजी के पिता जी का नाम शाहजी और माता जीजाबाई थीं। उनका जन्म पुणे के पास स्थित शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। 

    उनका बचपन उनकी माता जीजाबाई के मार्गदर्शन में बीता। माता जीजाबाई धार्मिक स्वभाव वाली होते हुए भी गुण-स्वभाव और व्यवहार में वीरांगना नारी थीं। इसी कारण उन्होंने बालक शिवा का पालन-पोषण रामायण, महाभारत तथा अन्य भारतीय वीरात्माओं की उज्ज्वल कहानियां सुना और शिक्षा देकर किया था। दादा कोणदेव के संरक्षण में उन्हें सभी तरह की सामयिक युद्ध आदि विधाओं में भी निपुण बनाया था। धर्म, संस्कृति और राजनीति की भी उचित शिक्षा दिलवाई थी। उस युग में परम संत रामदेव के संपर्क में आने से शिवाजी पूर्णतया राष्ट्रप्रेमी, कर्त्तव्यपरायण एवं कर्मठ योद्धा बन गए। 

    छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

    छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन 14 मई 1640 में सइबाई निंबालकर के साथ पुना के लाल महल में हुआ था। शिवाजी ने कुल 8 विवाह किए थे। वैवाहिक राजनीति के जरिए उन्होंने सभी मराठा सरदारों को एक छत्र के नीचे लाने में सफलता प्राप्त की।

    शिवाजी की पत्नियाँ:

    सईबाई निंबालकर – (सम्भाजी, रानूबाई, सखूबाई, अंबिकाबाई)
    सोयराबाई मोहिते– (राजाराम, दीपाबाई )
    सकवरबाई गायकवाड – (कमलाबाई)
    सगुणाबाई शिर्के – (राजकुवरबाई)
    पुतलाबाई पालकर
    काशीबाई जाधव
    लक्ष्मीबाई विचारे
    गुंवांताबाई इंगले

    शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज की शिक्षा मिली थी। जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की तरह उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को छुड़वा लिया। इससे उनके चरित्र में एक उदार अवयव ऩजर आता है। उसेक बाद उन्होंने पिता की हत्या नहीं करवाई जैसा कि अन्य सम्राट किया करते थे। शाहजी राजे के मरने के बाद ही उन्होंने अपना राज्याभिषेक करवाया हालांकि वो उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे। उनके नेतृत्व को सब लोग स्वीकार करते थे यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी।

    वह एक अच्छे सेनानायक के साथ एक अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। कई जगहों पर उन्होंने सीधे युद्ध लड़ने की बजाय कूटनीति से काम लिया था। लेकिन यही उनकी कूटनीति थी, जो हर बार बड़े से बड़े शत्रु को मात देने में उनका साथ देती रही।

    शिवाजी महाराज की "गनिमी कावा" नामक कूटनीति, जिसमें शत्रु पर अचानक आक्रमण करके उसे हराया जाता है, विलोभनियता से और आदरसहित याद किया जाता है। एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। जिसे “शिवराई” कहते थे, और यह सिक्का संस्कृत भाषा में था।

    छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। 50 वर्ष की आयु में 3 अप्रैल 1680 को लंबी बीमारी के बाद रायगढ़ में शिवाजी का निधन हो गया था। कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि उनकी मृत्यु स्वाभाविक थी, लेकिन कई पुस्तकों में इतिहासकार लिखते हैं कि उन्हें एक साजिश के तहत जहर दिया गया था। 

    English Translate

    Chhatrapati Shivaji Maharaj

    When the saga of the brave sons of India is narrated, one of the names in it is that of Shrimant Chhatrapati Shivaji Maharaj. Many people also call him Hindu Hriday Samrat, while some people call him the pride of Maratha. Shivaji is also considered a hero of the Hindus. Shivaji Maharaj was a brave, intelligent and fearless ruler. Shivaji Maharaj was coronated in the year 1674 and he got the title of Chhatrapati.

    छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

    Chhatrapati Shivaji was a great king and skilled strategist of India and the founder of the Maratha Empire, who was born on 19 February 1630 in a Maratha family. His full name was Shivaji Bhonsle. Shivaji's father's name was Shahaji and mother's name was Jijabai. He was born in Shivneri fort near Pune.

    His childhood was spent under the guidance of his mother Jijau. Mata Jijabai, despite being religious in nature, was a brave woman in her qualities and behavior. For this reason, he brought up the child Shiva by listening to and teaching the bright stories of Ramayana, Mahabharata and other Indian heroes. Under the protection of Dada Kondev, he was also made proficient in all types of contemporary warfare etc. Proper education of religion, culture and politics was also given. Shivaji became a complete patriot, dutiful and diligent warrior after coming in contact with Param Sant Ramdev in that era.

    Chhatrapati Shivaji Maharaj was married on 14 May 1640 with Saibai Nimbalkar at the Lal Mahal in Pune. Shivaji did a total of 8 marriages. Through matrimonial politics, he succeeded in bringing all the Maratha chieftains under one umbrella.

    Shivaji's Wives:

    Saibai Nimbalkar – (Sambhaji, Ranubai, Sakhubai, Ambikabai)
    Soyrabai Mohite – (Rajaram, Deepabai)
    Sakvarbai Gaikwad – (Kamalabai)
    Sagunabai Shirke – (Rajkuvarbai)
    Putlabai Palkar
    Kashibai Jadhav
    Laxmibai Vichare
    Gunwantabai Ingle

    Shivaji Maharaj got the education of Swaraj from his father. When the Sultan of Bijapur took Shahaji Raje prisoner, then like an ideal son, he made a treaty with the Shah of Bijapur and got Shahaji Raje released. This shows a liberal element in his character. After that he did not get his father killed as other emperors used to do. He got his coronation done only after the death of Shahaji Raje, although by that time he had become independent from his father and became the ruler of a large empire. Everyone accepted his leadership, that is why there was no major incident like internal rebellion during his reign.

    He was a good military leader as well as a good diplomat. In many places, instead of fighting a direct war, he used diplomacy. But it was his diplomacy, which helped him to defeat the biggest enemy every time.

    छत्रपति शिवाजी महाराज || Chhatrapati Shivaji Maharaj ||

    Shivaji Maharaj's diplomacy called "Ganimi Kava", in which the enemy is defeated by a sudden attack, is remembered fondly and with respect. Like an independent ruler, he got his name coined. Which was called "Shivrai", and this coin was in Sanskrit language.

    There is a difference of opinion among historians regarding the death of Chhatrapati Shivaji Maharaj. Shivaji died at Raigarh on 3 April 1680 at the age of 50 after a long illness. Some historians believe that his death was natural, but historians in many books write that he was poisoned as part of a conspiracy.

    जो बीत गई, सो बात गई || Jo Beet gyi so Baat gyi ||

    जो बीत गई, सो बात गई

    जो बीत गई, सो बात गई || Jo Beet gyi so Baat gyi ||
    "भलाई करते रहिए... बहते पानी की तरह,
    बुराई खुद ही किनारे लग जाएगी... कचरे की तरह ❣️"

    जो बीत गई, सो बात गई

    जीवन में एक सितारा था

    माना वह बेहद प्यारा था

    वह डूब गया तो डूब गया

    अम्बर के आनन को देखो

    कितने इसके तारे टूटे

    कितने इसके प्यारे छूटे

    जो छूट गए फिर कहाँ मिले

    पर बोलो टूटे तारों पर

    कब अम्बर शोक मनाता है

    जो बीत गई सो बात गई


    जीवन में वह था एक कुसुम

    थे उसपर नित्य निछावर तुम

    वह सूख गया तो सूख गया

    मधुवन की छाती को देखो

    सूखी कितनी इसकी कलियाँ

    मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ

    जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली

    पर बोलो सूखे फूलों पर

    कब मधुवन शोर मचाता है

    जो बीत गई सो बात गई


    जीवन में मधु का प्याला था

    तुमने तन मन दे डाला था

    वह टूट गया तो टूट गया

    मदिरालय का आँगन देखो

    कितने प्याले हिल जाते हैं

    गिर मिट्टी में मिल जाते हैं

    जो गिरते हैं कब उठतें हैं

    पर बोलो टूटे प्यालों पर

    कब मदिरालय पछताता है

    जो बीत गई सो बात गई


    मृदु मिटटी के हैं बने हुए

    मधु घट फूटा ही करते हैं

    लघु जीवन लेकर आए हैं

    प्याले टूटा ही करते हैं

    फिर भी मदिरालय के अन्दर

    मधु के घट हैं मधु प्याले हैं

    जो मादकता के मारे हैं

    वे मधु लूटा ही करते हैं

    वह कच्चा पीने वाला है

    जिसकी ममता घट प्यालों पर

    जो सच्चे मधु से जला हुआ

    कब रोता है चिल्लाता है

    जो बीत गई सो बात गई

    - हरिवंशराय बच्चन

    Rupa Oos ki ek Boond

    "कमियां सब में होती हैं,

     लेकिन नजर सिर्फ दूसरों में आती हैं..❣️"

    शेखचिल्ली न बनो : पंचतंत्र || Shekhchilli na Bano : Panchtantra ||

    शेखचिल्ली न बनो

    अनागतवती चिन्तामभायां करोति क स एव पाण्डुरः शेते सोमशर्मपिता यथा।।

    हवाई किले मत बाँधो ।

    शेखचिल्ली न बनो : पंचतंत्र || Shekhchilli na Bano : Panchtantra ||

    एक नगर में कोई कंजूस व्यक्ति रहता था। उसने भिक्षा से प्राप्त सत्तुओं में से थोड़े-से खाकर शेष से एक घड़ा भर लिया था। उस घड़े को उसने रस्सी से बाँध खूँटी से सरका दिया और उसके नीचे पास ही खटिया उस पर लेटे-लेटे विचित्र सपने देखने लगा और कल्पना के हवाई घोड़े दौड़ाने लगा।

    उसने सोचा कि देश में अकाल पड़ेगा तो इन सत्तुओं का मूल्य सौ रुपये हो जाएगा। उन सौ रुपयों से मैं दो बकरियाँ लूँगा। छः महीने में उन दो बकरियों से कई बकरियाँ बन जाएँगी। उन्हें बेचकर एक गाय लूँगा। गायों के बाद भैंस लूँगा और फिर घोड़े ले लूँगा। घोड़े को महंगे दामों में बेचकर मेरे पास बहुत-सा सोना हो जाएगा। सोना बेचकर मैं बहुत बड़ा घर बनाऊँगा। मेरी सम्पत्ति को देखकर कोई भी धनी व्यक्ति अपनी सुरूपवती कन्या का विवाह मुझसे कर देगा। वह मेरी पत्नी बनेगी। उससे जो पुत्र होगा उसका नाम में सोमशर्मा रखूंगा। जब वह घुटनों के बल चलना सीख जाएगा, तो मैं पुस्तक लेकर घुड़शाल के पीछे की दीवार पर बैठा हुआ उसकी बाल लीलाएँ देखूंगा। उसके बाद सोमशर्मा मुझे देखकर माँ की गोद से उतरेगा और मेरी ओर आएगा, तो में उसकी माँ को क्रोध से कहूंगा। अपने बच्चे को संभाल।

    शेखचिल्ली न बनो : पंचतंत्र || Shekhchilli na Bano : Panchtantra ||

    वह गृहकार्य में व्यस्त होगी, इसलिए मेरा वचन न सुनी तब मैं उठकर उसे पैर की ठोकर से मारूँगा। यह सोचते ही उसका पैर ठोकर मारने के लिए ऊपर उठा। वह पैर सत्तू भरे घड़े पर लगा। घड़ा गिरकर चकनाचूर हो गया। कंजूस व्यक्ति के स्वप्न भी साथ ही चकनाचूर हो गए। 

    स्वर्ण-सिद्धि ने कहा-यह बात तो सच है, किन्तु उसका भी क्या दोष लोभ वश सभी अपने कर्मों का फल नहीं देख पाते और उनको वही फल मिलता है जो, चन्द्रभूपति को मिला था।

    चक्रधर ने पूछा- यह कैसे हुआ? स्वर्णसिद्धि ने तब यह कथा सुनाई

    लोभ बुद्धि पर पर्दा डाल देता है

    To be Continued...