Cricket News: Latest Cricket News, Live Scores, Results, Upcoming match Schedules | Times of India

Sportstar - IPL

तेनालीराम की चुटिया || Tenaliram ki chutiya ||

तेनालीराम की चुटिया  

राजा कृष्ण देव राय और तेनालीरमन में किसी किसी बात पर चर्चा होती रहती थी। एक दिन बातों-बातों में राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीरमन से पूछा - "अच्छा, यह बताओ कि किस प्रकार के लोग सबसे अधिक मूर्ख होते हैं और किस प्रकार के सबसे अधिक सयाने? 

तेनालीराम की चुटिया || Tenaliram ki chutiya ||

तेनालीरमन ने तुरंत उत्तर दिया - "महाराज! ब्राह्मण सबसे अधिक मूर्ख और व्यापारी सबसे अधिक सयाने होते हैं। 

राजा ने कहा - "ऐसा कैसे हो सकता है?"

तेनालीराम ने कहा - "मैं यह बात साबित कर सकता हूं।

राजा कृष्ण देव राय ने पूछा - कैसे?

तेनालीराम ने कहा - "अभी जान जाएंगे आप। पहले जरा राजगुरु को बुलवाइए। 

राजगुरु को बुलवाया गया।

तेनालीराम ने कहा - "महाराज, अब मैं अपनी बात साबित करूंगा, लेकिन इस काम में आप दखल नहीं देंगे। आप यह वचन दें, तभी मैं काम आरंभ करूंगा।" 

राजा ने तेनालीराम की बात मान ली।

तेनालीराम ने आदरपूर्वक राजगुरु से कहा - "राजगुरु! महाराज को आपकी चोटी की आवश्यकता है। इसके बदले आपको मुंहमांगा इनाम दिया जाएगा। 

राजगुरु को काटो तो खून नहीं। वर्षों से पाली गई प्यारी चोटी को कैसे कटवा दें? लेकिन राजा की आज्ञा कैसे टाली जा सकती थी?

राजगुरु ने कहा - "तेनालीराम, मैं इसे कैसे दे सकता हूं?

तेनालीराम ने कहा - "राजगुरु! आपने जीवनभर महाराज का नमक खाया है। चोटी कोई ऐसी वस्तु तो है नहीं, जो फिर न आ सके। फिर महाराज मुंहमांगा इनाम भी दे रहे हैं। "

राजगुरु मन ही मन समझ गए कि यह तेनालीराम की जरूर कोई चाल है।

तेनालीराम ने पूछा - "राजगुरु, आपको चोटी के बदले क्या इनाम चाहिए? 

राजगुरु ने कहा - पांच स्वर्ण मुद्राएं बहुत होंगी। 

पांच स्वर्ण मुद्राएं राजगुरु को दे दी गईं और नाई को बुलवाकर राजगुरु की चोटी कटवा दी गई। 

अब तेनालीरमन ने नगर के सबसे प्रसिद्ध व्यापारी को बुलवाया। 

तेनालीराम ने व्यापारी से कहा - महाराज को तुम्हारी चोटी की आवश्यकता है। 

व्यापारी ने कहा - "सब कुछ महाराज का ही तो है, जब चाहें ले लें। लेकिन बस इतना ध्यान रखें कि मैं एक गरीब आदमी हूं। 

तेनालीराम ने कहा - "तुम्हें तुम्हारी चोटी का मुंहमांगा दाम दिया जाएगा।"

व्यापारी ने कहा - "सब आपकी कृपा है लेकिन। लेकिन कहकर व्यापारी चुप हो गया। 

तेनालीराम ने पूछा - "क्या कहना चाहते हो?"

व्यापारी ने कहा - "जी बात यह है कि जब मैंने अपनी बेटी का विवाह किया था, तो अपनी चोटी की लाज रखने के लिए पूरी पांच हजार स्वर्ण मुद्राएं खर्च की थीं। पिछले साल मेरे पिता की मौत हुई, तब भी इसी कारण पांच हजार स्वर्ण मुद्राओं का खर्च हुआ और अपनी इसी प्यारी-दुलारी चोटी के कारण बाजार से कम से कम पांच हजार स्वर्ण मुद्राओं का उधार मिल जाता है।

 तेनालीराम ने कहा - अच्छा तो इस तरह तुम्हारी चोटी का मूल्य पंद्रह हजार स्वर्ण मुद्राएं हुआ। तुम यही कहना चाहते हो ना। ठीक है, यह मूल्य तुम्हें दे दिया जाएगा।"

पंद्रह हजार स्वर्ण मुद्राएं व्यापारी को दे दी गईं। व्यापारी चोटी मुंडवाने बैठा। जैसे ही नाई ने चोटी पर उस्तरा रखा, व्यापारी कड़ककर बोला - "संभलकर, नाई के बच्चे। जानता नहीं, यह महाराज कृष्णदेव राय की चोटी है। 

राजा ने यह बात सुना तो आग-बबूला हो गए। इस व्यापारी की यह मजाल कि हमारा अपमान करे? 

उन्होंने कहा - "धक्के मारकर निकाल दो इस सिरफिरे को।"

व्यापारी पंद्रह हजार स्वर्ण मुद्राओं की थैली को लेकर वहां से भाग निकला। कुछ देर बाद तेनालीराम ने कहा - "आपने देखा महाराज, राजगुरु ने तो पांच स्वर्ण मुद्राएं लेकर अपनी चोटी मुंड़वा ली। व्यापारी पंद्रह हजार स्वर्ण मुद्राएं भी ले गया और चोटी भी बचा ली। आप ही कहिए, ब्राह्मण सयाना हुआ कि व्यापारी?"

राजा ने कहा - "सचमुच तुम्हारी बात ठीक निकली।"

English Translate 

tenaliram ki chutiya

King Krishna Deva Raya and Tenaliraman used to discuss about something. One day, King Krishnadeva Raya asked Tenaliraman in conversation - "Well, tell me what kind of people are the most stupid and which type is the most grown up?

तेनालीराम की चुटिया || Tenaliram ki chutiya ||


Tenaliraman immediately replied - "Your Majesty! Brahmins are the most foolish and traders are the most grown ups.

The king said - "How can this happen?"

Tenaliram said - "I can prove this.

King Krishna Deva Raya asked - How?

Tenaliram said - "You will know now. First just call Rajguru.

Rajguru was summoned.

Tenaliram said - "Sir, now I will prove my point, but you will not interfere in this work. If you give this promise, then I will start the work."

The king obeyed Tenaliram.

Tenaliram respectfully said to the Rajguru - "Rajguru! Maharaj needs your peak. In return you will be given a handsome reward.

If you cut Rajguru, there is no blood. How to cut off a lovely braid that has been cultivated over the years? But how could the king's order be avoided?

Rajaguru said - "Tenaliram, how can I give it?

Tenaliram said - "Rajguru! You have eaten Maharaj's salt throughout your life. There is no such thing as a peak which cannot come again. Then Maharaj is also giving a handsome reward."

Rajguru understood in his mind that this must be some trick of Tenaliram.

Tenaliram asked - "Rajguru, what reward do you want for the top?

Rajguru said - Five gold coins will be plenty.

The five gold coins were given to Rajguru and the hairdresser was called and Rajguru's top was cut off.

Now Tenaliraman called the most famous merchant of the city.

Tenaliram said to the merchant - Maharaj needs your peak.

The merchant said - "Everything belongs to the Maharaj, take it whenever you want. But just keep in mind that I am a poor man.

Tenaliram said - "You will be given a handsome price for your peak."

The merchant said - "All is your grace but. But saying that the merchant became silent.

Tenaliram asked - "What do you want to say?"

The merchant said - "The thing is, when I got my daughter married, I had spent the whole five thousand gold coins to keep my top honor. Last year my father died, even then five thousand rupees for this reason. Gold currencies are spent and due to this lovely peak, at least five thousand gold currencies are borrowed from the market.

 Tenaliram said - Well, in this way your peak was worth fifteen thousand gold coins. That's what you want to say, isn't it? Well, this price will be given to you."

Fifteen thousand gold coins were given to the merchant. The merchant sat down to shave the top. As soon as the barber placed the razor on the top, the merchant said sternly - "Be careful, children of the barber. I don't know, this is the peak of Maharaja Krishna Deva Raya.

When the king heard this, he was furious. It is the prank of this merchant to insult us?

He said - "Push out this madman."

The merchant fled from there with a bag of fifteen thousand gold coins. After sometime Tenaliram said - "You have seen, Maharaj, Rajguru has shaved his top with five gold coins. The merchant also took fifteen thousand gold coins and saved the top too. You can say that the brahmin is a grown-up or a merchant?"

The king said - "You are really right."

30 रोचक जानकारी चूहे के बारे में ( 30 Interesting facts about Rat)

चूहे के बारे में रोचक जानकारी (Interesting facts about Rat)

गणेश जी की सवारी चूहा से कौन अनभिज्ञ होगा? सभी लोग चूहा से परिचित हैं। बहुत लोग इससे परेशान भी हुए होंगे। घरों में जहाँ छोटे छोटे चूहे देखने को मिलते हैं, वहीं रेलवे स्टेशन पर बड़े-बड़े चूहे देखने को मिलते हैं। तो आज इसी चूहे के बारे में ऐसी बातें बताते हैं, जिससे आप अनजान होंगे।

30 रोचक जानकारी चूहे के बारे में ( 30 Interesting facts about Rat)

भारतवर्ष में चूहे को भगवान गणेश के वाहन के रूप में जाना जाता है। राजस्थान के बीकानेर में स्थित करणी माता मंदिर में इसकी पूजा होती है और चूहे का झूठा प्रसाद भक्तों में वितरित किया जाता है, परंतु आज तक यहां पर चूहों द्वारा कोई भी बीमारी फैलने का प्रमाण नहीं मिल पाया है।

30 रोचक जानकारी चूहे के बारे में ( 30 Interesting facts about Rat)

चूहे की उम्र कितनी होती है इस बात से आप अंदाजा लगा सकते है कि ये अपना दूसरा जन्मदिन भी कभी-कभी ही मना पाते हैं। नर चूहों को ‘bucks’, मादा को ‘does’ और चूहों ने बच्चों को ‘pups’ या ‘kittens’ कहा जाता है। चूहों के समूह को ‘mischief’ कहा जाता है। चूहे का वैज्ञानिक नाम है - Rattus (रैटस)। चीनी राशि चक्र के 12 जानवरों में चूहा पहले नंबर पर आता है। चीनी लोग चूहे को रचनात्मकता, बुद्धिमानी, उदारता, ईमानदारी का प्रतीक मानते हैं। प्राचीन रोम में सफेद चूहे का रास्ता काटना शुभ और काले चूहे का रास्ता काटना अशुभ माना जाता था।

जानते हैं चूहे के विषय में रोचक तथ्य

30 रोचक जानकारी चूहे के बारे में ( 30 Interesting facts about Rat)

  1. दुनिया में चूहों की 60 से ज्यादा प्रजातियां हैं।
  2. चूहा उन जानवरों में से है, जिन्हें सबसे पहले अंतरिक्ष में भेजा गया था। फ्रांस द्वारा 1961 में सबसे पहले अंतरिक्ष में चूहा को भेजा गया था।
  3. चूहे को अच्छे से दिखाई नहीं देता है, परंतु इनकी सुनने और चखने की शक्ति बहुत ज्यादा होती है।
  4. अंटार्कटिका को छोड़कर दुनिया के सभी महाद्वीपों में चूहा पाया जाता है, जबकि इसकी उत्पत्ति एशिया और ऑस्ट्रेलिया में हुई थी।
  5. छोटा सा दिखने वाला चूहा बहुत खतरनाक होता है। यह प्लेग सहित ऐसे कई खतरनाक रोगों का वाहक है, जो मनुष्य को मौत के मुंह तक ले जा सकतें हैं। 
  6. चूहों द्वारा 35 से भी अधिक रोग मनुष्यों में फैलते हैं।
  7. प्रतिवर्ष दुनिया के कृषि उत्पादों का 20% हिस्सा चूहों के द्वारा नष्ट कर दिया जाता है।
  8. चूहे के दांत स्टील, प्लैटिनम और कॉपर से भी अधिक कठोर तथा मजबूत होते हैं। इनके दांत इतने मजबूत होते हैं कि वे कांच, एलुमिनियम और शीशे तक को आसानी से चबा सकते हैं। इनके दांत जीवन भर बढ़ते रहते हैं। इनके सामने के दांत हर साल 5 से 6 इंच तक बढ़ जाते हैं।
  9. चूहों का गर्भधारण काल (gestation time) 21 से 24 दिनों तक होता है। भूरे चूहे (Brown Rat) वर्ष भर में लगभग 2000 बच्चे पैदा कर सकते हैं.
  10. चूहा बिना पानी के ऊंट से भी ज्यादा समय तक जीवित रह सकता है। 
  11. "कंगारू चूहा" इतने रेगिस्तानी होते हैं कि बिना पानी की एक बूंद पिए पूरा जीवन गुजार सकते हैं।
  12. चूहों को पसीना नहीं आता है। यह अपनी पूछ में मौजूद रक्त वाहिनी को फैलाकर और सिकोड़कर शरीर का तापमान नियंत्रित करते हैं।
  13. 50 फीट की ऊंचाई से कूदे जाने पर भी इसे चोट नहीं लगती है। यह दो पैरों पर खड़े होकर 2 फुट की ऊंचाई तक कूद सकते हैं।
  14. चूहे लगभग 1 पाउंड तक का वजन उठा सकते हैं, जो उनके शरीर के औसत वजन से अधिक है। चूहे सर्वभक्षी (omnivores) होते हैं. वे अनाज, कीड़े, जल जीव जैसे घोंघे, मछली छोटे पक्षी आदि को भी भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं। 
  15. चूहा एक सामाजिक और स्नेही जानवर है। घरेलू चूहे मनुष्य के साथ प्यार से रहते भी हैं। चूहे अपने समूह में घायल और बीमार चूहों की देखभाल भी करते हैं।
  16. चूहा लगातार तीन दिन तक पानी में तैर सकता है, 3 मिनट तक सांसे रोक सकता है और टॉयलेट फ्लश करने पर भी जिंदा रह सकता है तथा उसी रास्ते वापस भी आ सकता है, क्योंकि इनकी याददाश्त बहुत तेज होती है।
  17. चीन, इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार, फिलीपींस, घाना और वियतनाम के कुछ हिस्सों में चूहों का मांस बड़े चाव से खाया जाता है।
  18. सामान्यतः चूहे का आकार 5 इंच या उससे अधिक होता है।
  19. चूहों की सबसे बड़ी प्रजाति  "बोसावी वूली चूहा (Bosavi woolly rat)" है, जिसे 2009 में पापुआ न्यू गिनी के वर्षावन में खोजा गया था। चूहे की यह प्रजाति लगभग बिल्ली के आकार की होती है। इसकी नाक से पूछ तक की लंबाई 32.2 इंच होती है और वजन लगभग 3.3 पाउंड होता है। 
  20. सबसे छोटी प्रजाति वियतनाम के पास "ऑसगूड चूहा (Osgood’s Rat)" है। यह आमतौर पर 5 से 7 इंच तक लंबा होता है।
  21. चूहों मैं पित्ताशय की थैली नहीं पाई जाती है, परंतु इनमें नाभी पाया जाता है। चूहों में प्राकृतिक रूप से पाचन तंत्र बहुत अधिक विकसित नहीं होता। 
  22. बिना भोजन के चूहे 4 दिन से अधिक जीवित नहीं रह सकते हैं। 
  23. "फैंसी रैट (Fancy rat)" नामक चूहा पालतू चूहा के रूप में पाला जाने वाला सबसे आम चूहा है।
  24. अमेरिका की रिपोर्ट के अनुसार वहां पर साल भर में 15000 इंसानों पर चूहों द्वारा हमला होता है।
  25. चूहों को लुकाछिपी का खेल खेलना बहुत पसंद है। अपने साथी के बिना चूहे उदास भी हो जाते हैं। समूह में खुशी होने पर चूहे हंसी के समान आवाज निकालते हैं। 
  26. इंसानों की तरह चूहों को भी गुदगुदी महसूस होती है।
  27. अगर चूहों को सिखाया जाए तो वह अपना नाम याद रख सकते हैं और जमीन में दबी माइंस को सुनकर खोज सकते हैं। 
  28. 1 चूहे का दिल 1 मिनट में औसतन 632 बार धड़कता है, जबकि मनुष्यों का प्रति मिनट सिर्फ 60 से 100 बार।
  29. चूहे ध्वनि की गति से भी तेज अल्ट्रॉनिक तरंगें पैदा करते हैं, जिनकी तीव्रता 50 से 100 किलोहर्ट्ज के बीच होती है। इंसानों के कान इस तीव्रता की ध्वनि तरंगे नहीं सुन सकते।
  30. 2011 के प्रयोग में चूहे के सामने चॉकलेट, चिप्स और पिंजरे में बंद एक और चूहा पेश किया गया था।  परिणाम यह हुआ था कि चूहे ने पहले पिंजरे में बंद चूहे को आजाद कराया और फिर खाना भी साझा किया।

कभी आपने सोचा है कि अगर दुनिया से सभी चूहे मर जाएं तो क्या होगा?

30 रोचक जानकारी चूहे के बारे में ( 30 Interesting facts about Rat)

जब हम घरों में चूहों से परेशान हो जाते हैं, तो एक बार जरूर बोलते हैं कि भगवान ने चूहों को क्यों बना दिया और हम यह बात नहीं सोचते कि अगर चूहे दुनिया से खत्म हो जाए तो इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? चूहे खत्म होना संभव तो नहीं है, परंतु अगर संभव हो भी जाता है तो ऐसा करने से सबसे ज्यादा दिक्कत वैज्ञानिकों को नए प्रयोग करने में आएगी। खास करके ड्रग्स और दवाओं का प्रयोग, क्योंकि इन सब का प्रयोग पहले चूहों पर ही किया जाता है। ऐसे जानवर जिनका मुख्य भोजन चूहा ही हैं, वह धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएंगे और कई ऐसे कचरे जिनको चूहे खत्म करते हैं, वह नहीं हो पाएगा और इस तरह पर्यावरण का संतुलन बिगड़ सकता है।

क्या कभी सोचा है की चूहे जिन पदार्थ को नहीं खाते उनको भी दांत से क्यों कुतरते रहते हैं?

30 रोचक जानकारी चूहे के बारे में ( 30 Interesting facts about Rat)

इसकी वजह यह है कि चूहों की दाँत जीवन पर्यंत बढ़ती रहती है और हर साल 4 से 5 इंच बढ़ जाती है। इन्हीं को नियंत्रित करने के लिए चूहे अपने दांतो को घिसते रहते हैं और चीजों को कुतरते रहते हैं। यह तार, सीमेंट, लकड़ी, कपड़े, शीशे से लेकर एल्युमिनियम तक को कुतर सकते हैं। अगर वह ऐसा नहीं करेंगे, तो उनकी दांत उनके जबड़े से बाहर आ जाएगी और फिर यह ना अपना मुंह बंद कर पाएंगे और ना ही कुछ खा पाएंगे और इनका अंत हो जाएगा। 

वैज्ञानिक हमेशा चूहे पर ही अपना प्रयोग क्यों करते हैं?

30 रोचक जानकारी चूहे के बारे में ( 30 Interesting facts about Rat)

वैज्ञानिक रिसर्च में सबसे अधिक प्रयोग चूहों पर करने की यह वजह है कि चूहे किसी भी जगह के अनुसार खुद को बहुत जल्दी ढाल लेते हैं और इनके दिमाग की बनावट और काम करने का ढंग बिल्कुल इंसानों की तरह होता है। इसीलिए जब भी किसी ड्रग या दवा आदि का असर देखना होता है, तो इसका प्रयोग इंसानों से पहले चूहों पर देख लिया जाता है। पहली बार रिसर्च में चूहे का इस्तेमाल 200 से अधिक साल पहले भोजन और ऑक्सीजन की कमी के कारण मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन के लिए किया गया था। 30 नोबेल प्राइज विजेता भी लैब में चूहों का प्रयोग कर चुके हैं।

कार्तिक स्वामी मंदिर || Kartik Swami Temple, Rudra Prayag ||

कार्तिक स्वामी मंदिर, रुद्र प्रयाग

भारत के कई बड़े तीर्थ स्थल उत्तराखंड की पहाड़ियों में बसे हैं, जिसमें केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और हेमकुंड शामिल हैं। देवभूमि उत्तराखंड धर्म- अध्यात्म के क्षेत्र में सबसे खास माना जाता है। विश्व भर के पर्यटकों का यहां आने का एक उद्देश्य आत्मिक व मानसिक शांति भी होती है। हरी-भरी वनस्पतियों से भरे पहाड़, घाटियां, हिमालय की बर्फीली चोटियां, नदी, झरने इस स्थल को एक अद्भुत स्वरुप प्रदान करते हैं। यहां के प्राचीन मंदिरों के दर्शन मात्र के लिए लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं का आगमन होता है। आज इस लेख के अंतर्गत आपको राज्य के प्रसिद्ध मंदिरों से अलग एक ऐसे धार्मिक स्थल के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका संबंध पौराणिक काल की बड़ी घटना से है।

कार्तिक स्वामी मंदिर || Kartik Swami Temple, Rudra Prayag ||

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले से 38 किलोमीटर की दूरी पर कनक चोरी गांव में स्थित है कार्तिक स्वामी मंदिर।कार्तिक स्वामी मंदिर समुद्र तल से 3048 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जहां से मौसम साफ होने पर हिमालय के तमाम चोटियों जैसे चौखंबा, मद्यमहेश्वर, केदार पर्वत, मेरु-सुमेरु पर्वत, त्रिशूल, पंचाचूली, नीलकंठ, नंदा देवी, कामेट, नंदाघुंटी, रुद्रनाथ, दूनागिरी, कौसानी आदि का चौतरफा खूबसूरत नजारा देखते ही बनता है. कहते हैं इस मंदिर से हिमालय की लगभग 80 प्रतिशत चोटियाँ साफ नजर आती हैं। भगवान शिव केजेष्ठ पुत्र कार्तिकेय को समर्पित यह मंदिर तक कनक चोरी गांव से 3 किलोमीटर पैदल एक सुंदर कच्चे ट्रैक से होते हुए पहुंचा जा सकता है। इस रास्ते के दोनों ओर खूबसूरत जंगल, बुरांश के पेड़ और पक्षियों का कलरव यात्रा में इतनी सुगमता और मनोरमता भर देते हैं कि पता ही नहीं चलता कब हिमालय की गोद में स्थित क्रौंच पर्वत पर बसे इस मंदिर के अहाते तक पहुंच गए।

कार्तिक स्वामी मंदिर || Kartik Swami Temple, Rudra Prayag ||

कार्तिक स्वामी मंदिर भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय को समर्पित है, जिन्होंने अपने माता-पिता के प्रति समर्पण के प्रमाण के रूप में अपने हड्डियों को समर्पित कर दिया।

माना जाता है कि यह घटना यहीं पर हुई थी। भगवान कार्तिक स्वामी को भारत के दक्षिणी भाग में कार्तिक मुरुगन स्वामी के रूप में भी जाना जाता है।

मंदिर में टंगी सैकड़ों घंटे का लगातार आवाज वहां से करीब 800 मीटर की दूरी पर भी सुनी जा सकती है। मुख्य सड़क से 80 सीढ़ियों की चढ़ाई करने के बाद मंदिर के गर्भ गृह तक पहुंचा जा सकता है जहां पर मूर्ति रखी गई है।

कार्तिक स्वामी मंदिर || Kartik Swami Temple, Rudra Prayag ||

पौराणिक कथा

हिंदी पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने अपने पुत्रों भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय को कहा कि जो कोई भी पहले ब्रह्मांड के सात चक्कर लगाएगा। उसे पहले पूजा करने का सम्मान मिलेगा।यह सुनकर भगवान कार्तिकेय अपने वाहन पर ब्रह्मांड का चक्कर लगाने के लिए निकल पड़े, जबकि, भगवान गणेश ने अपने माता पिता को ही ब्रह्मांड के रूप में भगवान शिव और देवी पार्वती के सात चक्कर लगाए। गणेश की इस बुद्धिमता से प्रभावित होकर भगवान शिव ने उन्हें सबसे पहले पूजा होने का सौभाग्य दिया। स्वयं को हारा हुआ देखकर भगवान कार्तिकेय क्रोधित हो गए और श्रद्धा के रूप में अपने शरीर का मांस अपने पिता के चरणों में समर्पित कर दिया और स्वयं हड्डियों का ढांचा लेकर क्रौंच पर्वत पर चले गए। कहते हैं भगवान कार्तिकेय की ये हड्डियां आज भी मंदिर में मौजूद हैं, जिनकी पूजा करने लाखों भक्त हर साल कार्तिक स्वामी आते हैं।

यह मंदिर 12 महीना अपने भक्तों के लिए खुला रहता है। अधिक ऊंचाई पर होने के कारण गर्मियों में यहां का मौसम सुहाना व सर्दियों में बर्फ लिए रहता है। मंदिर के पीछे एक जलकुंड है जिसे कार्तिक कुई कहते हैं। प्रत्येक वर्ष जून माह में हजारों श्रद्धालु इस कुई से जल भर कर मंदिर में जलाभिषेक करते हैं

इस कार्यक्रम को हर वर्ष एक पर्व की तरह मनाया जाता है। कार्तिक स्वामी आने वाले श्रद्धालुओं में सबसे बड़ी संख्या बंगालियों व दक्षिण भारतीयों की है। ऐसा माना जाता है कि बंगाली समुदाय की कार्तिक स्वामी पर असीम श्रद्धा है। कुछ विदेशी पर्यटकों ने भी इस गंतव्य तक आना शुरू किया है, जो कि इसके प्रचार-प्रसार के लिहाज से सुखद बात है।

कार्तिक स्वामी मंदिर || Kartik Swami Temple, Rudra Prayag ||

English Translate

Kartik Swami Temple, Rudra Prayag

Many major pilgrimage sites of India are situated in the hills of Uttarakhand, which include Kedarnath, Badrinath, Gangotri, Yamunotri and Hemkund. Devbhoomi Uttarakhand is considered to be the most special in the field of religion-spirituality. Spiritual and mental peace is also an objective of tourists from all over the world to come here. Mountains, valleys filled with lush green vegetation, snowy peaks of Himalayas, rivers, waterfalls give a wonderful look to this place. Lakhs of devotees come here just to have a glimpse of the ancient temples. Today, under this article, we are going to tell you about such a religious place apart from the famous temples of the state, which is related to a big event of the mythological period.

कार्तिक स्वामी मंदिर || Kartik Swami Temple, Rudra Prayag ||

Karthik Swamy Temple is located in Kanak Chori village, 38 km from Rudraprayag district of Uttarakhand. Karthik Swamy Temple is situated at an altitude of 3048 meters above sea level, from where all the Himalayan peaks like Chaukhamba, Madymaheshwar, Kedar are situated at a height of 3048 meters above sea level. Mountains, Meru-Sumeru Mountains, Trishul, Panchachuli, Neelkanth, Nanda Devi, Kamet, Nandaghunti, Rudranath, Dunagiri, Kausani etc. have a beautiful view all round. It is said that about 80 percent of the Himalayan peaks are clearly visible from this temple. Dedicated to Lord Shiva's eldest son Kartikeya, this temple can be reached by walking 3 km from Kanak Chori village on a beautiful unpaved track. Both such beautiful and beautiful forests make the chirping of birds to the Buransh tree so easy and captivating in the journey that it is not known when they reached the premises of this temple situated on the Krauncha mountain in the lap of the Himalayas.

Kartikeya Temple is dedicated to Kartikeya, the eldest son of Lord Shiva who surrendered his bones as a proof of his devotion to his parents.

It is believed that this incident took place here. Lord Kartika Swamy is also known as Kartik Murugan Swamy in the southern part of India.

The continuous sound of the tank in the temple for hundreds of hours can be heard at a distance of about 800 meters from there. After climbing 80 steps from the main road, one can reach the sanctum sanctorum of the temple where the idol is kept.

कार्तिक स्वामी मंदिर || Kartik Swami Temple, Rudra Prayag ||

mythology

According to Hindi mythology, Lord Shiva told his sons Lord Ganesha and Lord Kartikeya that whoever first circumambulates with the universe will have the honor of worshiping first. Hearing this Lord Kartikeya set out to circumnavigate the universe in his vehicle. While lying, Lord Ganesha made seven rounds of Lord Shiva and Goddess Parvati to his parents as the universe itself. Impressed by this wisdom of Ganesha, Lord Shiva gave him the privilege of being the first to be worshipped. Seeing himself defeated, Lord Kartikeya became enraged and as a form of reverence offered the flesh of his body at the feet of his father and

Taking the structure of bones himself, he went to Krauncha mountain. It is said that these bones of Lord Kartikeya are still present in the temple, for whom lakhs of devotees visit Kartik Swami every year.

This temple remains open for its devotees for 12 months. Due to its high altitude, the weather here is pleasant in summer and snowy in winter. There is a water tank behind the temple which is called Kartik Kui. Every year in the month of June, thousands of devotees fill water from this Hui and perform Jalabhishek in the temple.

This program is celebrated every year like a festival. The largest number of devotees visiting Kartik Swami are from Bengalis and South Indians. It is believed that the Bengali community has immense reverence for Kartik Swami. Some foreign tourists have also started coming to this destination, which is a pleasant thing in terms of its promotion.

योग प्राणायाम - त्राटक ध्यान || YOGA - Tratak Dhyaan {Breathing Exercise} ||

 त्राटक ध्यान (Tratak Dhyaan)

 मेडिटेशन करने का बेहतरीन तरीका है, त्राटक मेडिटेशन। इसे नियमित तौर पर करने से आंखों की रोशनी भी तेज हो जाती है और लोगों का चश्मा भी उतर जाता है। यहाँ कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है जो लोग मुझे व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं, क्यूंकि मैं चश्मा लगाती हूँ। यहाँ मैं पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि मेरे चश्में का पावर कम तो हुआ है, पर शायद अनियमितता के कारण चश्मा उतर नहीं सका। यहाँ यह बात स्पष्ट है कि पोस्ट डालने से और पढ़ने से चश्मा नहीं उतरेगा अपितु इसके लिए नियमित योग और मैडिटेशन करना होगा।  

योग प्राणायाम - त्राटक ध्यान ||  YOGA - Tratak Dhyaan {Breathing Exercise} ||

वास्तव में मेडिटेशन दिमाग व मन को शांत करने के लिए किया जाता है। मेडिटेशन कई तरह से किया जाता है। मेडिटेशन की मदद से ऊर्जा और विचारों को नियंत्रण में रखने की कोशिश की जाती है। सुबह 3 बजे से 5 बजे के मध्य मेडिटेशन का विशेष फायदा मिलता है, क्योंकि उस समय ब्रह्माण्ड की समस्त सकारात्मक शक्तियां सक्रिय रहती हैं।

त्राटक मेडिटेशन भी ध्यान लगाने का एक तरीका है, जो हमारी आंखों की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है। अगर त्राटक के शाब्दिक अर्थ की बात करें, तो इसका मतलब किसी चीज को टकटकी लगाकर देखना होता है।

योग प्राणायाम - त्राटक ध्यान ||  YOGA - Tratak Dhyaan {Breathing Exercise} ||

त्राटक मेडिटेशन करने के लिए निम्नलिखित तरीके को अपनाया जाता है :-

  • सबसे पहले ध्यान लगाने की मुद्रा में बैठ जाएं।
  • अब अपने सामने एक हाथ की दूरी पर मोमबत्ती या तिल के तेल का दिया रखें और उसकी ऊंचाई इस तरह रखें कि बाती और आंखों का लेवल समान हो।
  • आंखों को बंद करके छाती, कंधे, भौहें, गर्दन सभी अंगों को तनावरहित करके आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं।
  • अब आंखे खोलें और मोमबत्ती की बाती पर बिना पलक झपकाए एकटक देखें। बाती में मौजूद तीनों रंगों पर ध्यान लगाएं।
  • कुछ सेकंड देखने के बाद आंखें बंद करें और फिर बाती की छवि को याद करें।
  • कुछ देर बाद फिर से आंखें खोलें और एकटक बाती देखें और फिर आंख बंद करके बाती की छवि का ध्यान करें।

इसी प्रक्रिया को 3 से 4 बार दोहराएं और नियमित अभ्यास से बाती को देखने और छवि बनाने की अवधि बढ़ाएं।

बाती की जगह किसी काले कागज, काली बिंदु आदि पर भी ध्यान लगा सकते हैं।

इस क्रिया को करते समय जब आंखों से आंसू निकलने लगे तो समझना चाहिए कि त्राटक ध्यान सही दिशा में हो रहा है। 

योग प्राणायाम - त्राटक ध्यान ||  YOGA - Tratak Dhyaan {Breathing Exercise} ||

चलिए जानते हैं त्राटक ध्यान से होने वाले फायदे के बारे में 

  1. इसे करने से आंखों और दिमाग के बीच संबंध स्थापित होता है।
  2. नियमित तौर पर इसके अभ्यास से आंखों की मसल्स मजबूत होती है और आंखों की रोशनी बढ़ती है।
  3. इसके अभ्यास से फोकस करने की क्षमता बढ़ती है।
  4. इस ध्यान का एक जबरदस्त लाभ यह है कि इससे इंसोम्निया व नींद न आने की समस्या दूर होती है।
#Rupa_Oos_ki_ek_Boond
#त्राटक ध्यान
#योग प्राणायाम#
#Breathing Exercise#
#मेडिटेशन
#Meditation

कोयल - रामधारी सिंह दिनकर

 इतवार (Sunday)

कोयल - रामधारी सिंह दिनकर
मंजिलें बड़ी ज़िद्दी होती हैं, हासिल बड़े नसीब से होती हैं.
 मगर, वहाँ तूफान भी हार जाते हैं, जहाँ कश्तियाँ ज़िद पर होती हैं..❤

कोयल

कैसा होगा वह नन्दन-वन?
सखि! जिसकी स्वर्ण-तटी से तू स्वर में भर-भर लाती मधुकण।
कैसा होग वह नन्दन-वन?

कुंकुम-रंजित परिधान किये,
अधरों पर मृदु मुसकान लिए,
गिरिजा निर्झरिणी को रँगने
कंचन-घट में सामान लिये।

नत नयन, लाल कुछ गाल किये,
पूजा-हित कंचन-थाल लिये,
ढोती यौवन का भार, अरुण
कौमार्य-विन्दु निज भाल दिये।

स्वर्णिम दुकूल फहराती-सी,
अलसित, सुरभित, मदमाती-सी,
दूबों से हरी-भरी भू पर
आती षोडशी उषा सुन्दर।

हँसता निर्झर का उपल-कूल
लख तृण-तरु पर नव छवि-दुकूल;
तलहटी चूमती चरण-रेणु,
उगते पद-पद पर अमित फूल।

तब तृण-झुर्मुट के बीच कहाँ देते हैं पंख भिगो हिमकन?
किस शान्त तपोवन में बैठी तू रचती गीत सरस, पावन?
यौवन का प्यार-भरा मधुवन,
खेलता जहाँ हँसमुख बचपन,
कैसा होगा वह नन्दन-वन?

गिरि के पदतल पर आस-पास
मखमली दूब करती विलास।
भावुक पर्वत के उर से झर
बह चली काव्यधारा (निर्झर)

हरियाली में उजियाली-सी
पहने दूर्वा का हरित चीर
नव चन्द्रमुखी मतवाली-सी;

पद-पद पर छितराती दुलार,
बन हरित भूमि का कंठ-हार।

तनता भू पर शोभा-वितान,
गाते खग द्रुम पर मधुर गान।
अकुला उठती गंभीर दिशा,
चुप हो सुनते गिरि लगा कान।

रोमन्थन करती मृगी कहीं,
कूदते अंग पर मृग-कुमार,
अवगाहन कर निर्झर-तट पर
लेटे हैं कुछ मृग पद पसार।

टीलों पर चरती गाय सरल,
गो-शिशु पीते माता का थन,
ऋषि-बालाएँ ले-ले लघु घट
हँस-हँस करतीं द्रुम का सिंचन।

तरु-तल सखियों से घिरी हुई, वल्कल से कस कुच का उभार,
विरहिणि शकुन्तला आँसु से लिखती मन की पीड़ा अपार,
ऊपर पत्तों में छिपी हुई तू उसका मृदु हृदयस्पन्दन,
अपने गीतों का कड़ियों में भर-भर करती कूजित कानन।
वह साम-गान-मुखरित उपवन।
जगती की बालस्मृति पावन!
वह तप-कनन! वह नन्दन-वन!

किन कलियों ने भर दी श्यामा,
तेरे सु-कंठ में यह मिठास?
किस इन्द्र-परी ने सिखा दिया
स्वर का कंपन, लय का विलास?

भावों का यह व्याकुल प्रवाह,
अन्तरतम की यह मधुर तान,
किस विजन वसन्त-भरे वन में
सखि! मिला तुझे स्वर्गीय गान?

थे नहा रहे चाँदनी-बीच जब गिरि, निर्झर, वन विजन, गहन,
तब वनदेवी के साथ बैठ कब किया कहाँ सखि! स्वर-साधन?
परियों का वह शृंगार-सदन!
कवितामय है जिसका कन-कन!
कैसा होगा वह नन्दन-वन!

- रामधारी सिंह दिनकर 
कोयल - रामधारी सिंह दिनकर
घायल तो यहां हर परिंदा है. 
मगर जो फिर से उड़ सका वहीं जिंदा है..❤

भाग्यहीन नर पावत नाहीं : पंचतंत्र

भाग्यहीन नर पावत नाहीं 

अर्थस्योपार्जनं कृत्वा नैवाभोगं समश्नुते ।
करतलगतमपि नश्यति तु भवितव्यता नास्ति ॥ 

भाग्य में न हो तो हाथ में आए धन का भी उपभोग नहीं होता।
एक नगर में सोमिलक नाम का एक जुलाहा रहता था। विविध प्रकार के रंगीन और सुन्दर वस्त्र बनाने के बाद भी उसे भोजन-वस्त्र मात्र से अधिक धन कभी प्राप्त नहीं होता था। अन्य जुलाहे मोटा-सादा कपड़ा बुनते हुए धनी हो गए थे। उन्हें देखकर एक दिन सोमिलक ने अपनी पत्नी से कहा-प्रिये! देखो मामूली कपड़ा बुनने वाले जुलाहों ने भी कितना धन-वैभव संचित कर लिया है। और मैं इतने सुन्दर, उत्कृष्ट वस्त्र बनाते हुए भी आज तक निर्धन ही हूँ। प्रतीत होता है, यह स्थान मेरे लिए भाग्यशाली नहीं है; अतः विदेश जाकर धनोपार्जन करूंगा।
भाग्यहीन नर पावत नाहीं  : पंचतंत्र
सोमिलनक-पत्नी ने कहा-प्रियतम! विदेश में धनोपार्जन की कल्पना मिथ्या स्वप्न से अधिक नहीं। धन की प्राप्ति होनी हो तो स्वदेश में ही हो जाती है। न होनी हो तो हथेली में आया धन भी नष्ट हो जाता है। अतः यहीं रहकर व्यवसाय करते रहो, भाग्य में लिखा होगा तो यहीं धन की वर्षा हो जाएगी।
सोमिलक-भाग्य-अभाग्य की बात तो कायर लोग करते हैं। लक्ष्मी उद्योगी और पुरुषार्थी सिंह-नर को प्राप्त होती है। सिंह को भी अपने भोजन के लिए उद्यम करना पड़ता है। मैं भी उद्यम करूंगा; विदेश जाकर धन संचय काम करूँगा।
यह कहकर सोमितक वर्धमानपुर चला गया। वहाँ तीन वर्षों में अपने कौशल से 300 सोने की मुहरे नेकर वह घर की ओर चल दिया। रास्ता लम्बा था। आधे रास्ते में ही दिन ढल गया, शाम हो गई। आसपास कोई घर नहीं था। एक मोटे वृक्ष की शाखा के ऊपर चढ़कर रात बिताई। सोते-साते स्वप्न में आया कि दो भयंकर आकृति के पुरुष आपस में बात कर रहे हैं। एक ने कहा- हे पौरूष, तुझे क्या मालूम नहीं है कि सोमिलक के पास भोजन-वस्त्र से अधिक घन नहीं रह सकता; तब तूने इसे 300 मोहरें क्यों दीं?- दूसरा बोता-हे भाग्य! में तो प्रत्येक पुरुषार्थी को एक बार उसका फल दूँगा। उसे उसके पास रहने देना या नहीं रहने देना तेरे अधीन है।
स्वप्न के बाद सोमिलक की नींद खुली तो देखा मुहरों का पात्र खाली था। इतने कष्टों से संचित धन के इस तरह लुप्त हो जाने से सोमिलक बड़ा दुःखी हुआ और सोचने लगा, अपनी पत्नी को कौन-सा मुख दिखाऊँगा, मित्र क्या कहेंगे? यह सोचकर वह फिर वर्धमान को ही वापस आ गया। वहाँ दिन-रात घोर परिश्रम करके उसने वर्ष भर में ही 500 महरें जमा कर लीं। उन्हें लेकर वह घर की ओर आ रहा था कि आधे रास्ते रात पड़ गई। इस बार वह सोने के लिए ठहरा नहीं, चलता ही गया। किन्तु चलते-चलते ही उसने फिर दोनों-पौरुष और भाग्य-को पहले की तरह बातचीत करते सुना। भाग्य ने फिर वही बात कही-हे पौरुष! क्या तुझे मालूम नहीं कि सोमिलक के पास भोजन-वस्त्र से अधिक धन नहीं रह सकता; तब तूने 500 मुहरे क्यों दीं? - पौरुप ने वहीं उत्तर दिया- हे भाग्य! में तो प्रत्येक व्यवसायी को एक बार उसका फल दूँगा ही, इससे आगे तेरे अधीन है; उसके पास रहने दें या छीन ले। इस बातचीत के बाद सोमिलक ने जब अपनी मुहरों वाली गठरी देखी तो वह मुहरों से खाली थी।
इस तरह दो बार खाली हाथ होकर सोमिलक का मन बहुत दुःखी हुआ। उसने सोचा- इस धनहीन जीवन से तो मृत्यु ही अच्छी है। आज इस वृक्ष की टहनी से रस्सी बाँधकर उस पर लटक जाता हूँ और यहीं प्राण दे देता हूँ।
गले में फंदा लगा, उसे टहनी से बाँधकर जब वह लटकने वाला ही था कि आकाशवाणी हुई-सोमिलक! ऐसा दुःसाहस मत कर। मैंने ही तेरे धन चुराया है। तेरे भाग्य में भोजन-वस्त्र मात्र से अधिक धन का उपयोग नहीं लिखा है। व्यर्थ के धन संचय में अपनी शक्तियाँ नष्ट मत कर। घर जाकर सुख से रह । तेरे साहस से तो मैं प्रसन्न हूँ; तू चाहे तो एक वरदान माँग ले। मैं तेरी इच्छा पूरी करूँगा।
सोमिलक ने कहा- मुझे वरदान में प्रचुर धन दे दो।
अदृष्ट देवता ने उत्तर दिया-धन का क्या उपयोग? तेरे भाग्य में उसका उपभोग नहीं है। भोगरहित धन को लेकर क्या करेगा?
सोमिलक तो धन का भूखा था, बोला- भोग हो या न हो, मुझे धन ही चाहिए। बिना उपयोग या उपभोग के भी धन की बड़ी महिमा है। संसार में वही पूज्य माना जाता है, जिसके पास धन का संचय हो। कृपण और अकुलीन भी समाज में आदर पाते हैं। संसार उनकी ओर आशा लगाए बैठा रहता है; जिस तरह वह गीदड़ बैल से आशा रखकर उसके पीछे पन्द्रह दिन तक घूमता रहा।
भाग्य ने पूछा- किस तरह?
सोमिलक ने फिर बैल और गीदड़ की यह कहानी सुनाई।

उड़ते के पीछे भागना

To be continued ...

अशोक का पेड़ || Ashok Tree ||

अशोक (Ashok)

अशोक के पेड़ से तो सभी लोग परिचित हैं। यह पेड़ सड़क के किनारे आसानी से देखा जा सकता है। शास्त्रों में पीपल और बरगद के बाद अशोक के पेड़ को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। घरों में अशोक के पेड़ का होना बहुत शुभ माना गया है। अशोक शब्द से तात्पर्य 'किसी प्रकार का शोक ना होना' कहा जाता है। जिस घर में यह पेड़ लगा होता है, वहां किसी भी प्रकार का शोक नहीं होता है। यह पेड़ लगाने से घर में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है।

अशोक का पेड़ || Ashok Tree ||

अशोक वृक्ष क्या होता है?

सनातनी वैदिक लोग इस पेड़ को पवित्र एवं आदरणीय मानते हैं, किंतु बौद्ध भी इसे विशेष आदर की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि कहा जाता है कि भगवान बुद्ध का जन्म अशोक वृक्ष के नीचे हुआ था। यह पेड़ आम के पेड़ के समान 25 से 30 फुट तक ऊंचा, बहुशाकीय, घना व छायादार होता है। इसका तना कुछ लालिमा लिए हुए भूरे रंग का होता है। यह वृक्ष सारे भारतवर्ष में पाया जाता है। इसके पल्लव 9 इंच लंबे, गोल,व नोकदार होते हैं। यह साधारण डंठल के व दोनों ओर से 5 से 6 जोड़ों में लगे होते हैं। इसकी पत्तियां 8 से 10 इंच लम्बी तथा 1 से 2 इंच चौड़ी होती हैं। 

अशोक का पेड़ || Ashok Tree ||

जानते हैं अशोक वृक्ष के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

अशोक की मुख्यतः 2 प्रजातियां होती हैं, जिनका प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। यह प्रकृति लघु, रुखा, चरपरा, कड़वा और शीतल होता है। यह दर्द निवारक, रंग गोरा करने वाला, हड्डी जोड़ने वाला, सुगंधित, तीन दोषों को हरने वाला, प्यास, जलन, कृमि, सूजन आदि में फायदेमंद होता है।

रक्त अतिसार की समस्या

बहुत ज्यादा मसालेदार भोजन, पैकेट वाले भोजन, बाहरी खाना, फास्ट फूड या जंक फूड खाने के कारण दस्त लग जाता है। ऐसे में अशोक के 3 से 4 ग्राम फूलों को जल में पीसकर पिलाने से रक्त अतिसार में फायदा होता है।

सांस संबंधी समस्या

अगर किसी कारणवश सांस लेने में समस्या हो रही है, तो तुरंत आराम पाने के लिए 65 मिलीग्राम अशोक के बीज के चूर्ण को पान के बीड़े में रखकर खिलाने से सांस संबंधी रोग में लाभ होता है।

अशोक का पेड़ || Ashok Tree ||

बवासीर की समस्या

  • अशोक पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर 15 से 25 मिलीलीटर मात्रा में पीने से बवासीर की समस्या में लाभ होता है। 
  • अशोक पेड़ की छाल और इसके फूलों को बराबर मात्रा में लेकर, 10 ग्राम मात्रा को रात्रि में एक गिलास पानी में भिगोकर रख दें। सुबह पानी छानकर पी लें। इसी प्रकार सुबह का भिगोया हुआ शाम को पी लें। इससे बवासीर में शीघ्र लाभ होता है।

पथरी का दर्द

असंतुलित भोज्य पदार्थों के कारण आजकल पथरी की समस्या भी बढ़ गई है। अशोक के 1 से 2 ग्राम बीज को पानी में पीसकर दो चम्मच की मात्रा में पीने से किडनी में पत्थर के कारण होने वाले दर्द में आराम मिलता है।

मधुमेह की समस्या

अशोक छाल में anti-diabetic गुण पाया जाता है, जो कि शर्करा की मात्रा को रक्त में बढ़ने से रोकता है।

टूटी हुई हड्डी को जोड़ने में

अशोक टूटी हड्डियों को जोड़ने और हड्डियों को मजबूत करने में फायदेमंद होता है। 6 ग्राम अशोक के छाल के चूर्ण को दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से तथा इसी का लेप लगाने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है और दर्द कम होता है।

त्वचा संबंधी समस्या

अशोक छाल के रस में सरसों को पीसकर छाया में सुखा लें। उसके बाद जब उसका उबटन लगाना हो तो सरसों को इसकी छाल के रस में पीसकर त्वचा पर लगाएं, त्वचा का रंग निखरता है।

त्वचा पर मुंहासे होने पर

अशोक की छाल से बने काढ़े को उबालकर गाढ़ा कर, ठंडा कर लें। इसमें बराबर की मात्रा में सरसों का तेल मिलाकर मुंहासों, फोड़े और फुंसियों पर लगाने से लाभ होता है।

याददाश्त बढ़ाने के लिए

बढ़ती उम्र के साथ यदि यादाश्त कमजोर हो रही है, तो अशोक की छाल तथा ब्राह्मी चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर एक-एक चम्मच सुबह शाम एक कप दूध से नियमित रूप से कुछ माह तक सेवन करने से लाभ होता है।

अशोक का पेड़ || Ashok Tree ||

विभिन्न भाषाओँ में अशोक का नाम

Sanskrit-    हेमपुष्प, वञ्जुल, अशोक, कङकेलि, ताम्रपल्लव, पिण्डपुष्प, गन्धपुष्प;
Hindi-        अशोक, सीता अशोक;
Odia-        ओशोको (Oshoko);
Kannada– अशोक (Ashoka), अशुगे (Ashuge);
Gujrati-    अशोक (Ashok), अशोपल्लव (Ashopalava);
Tamil-    अशोगम (Asogam), असोगु (Asogu);
Telegu-    असोकामु (Asokamu);
Bengali-    असोक (Asok);
Nepali-    अशऊ (Ashau), अशोक (Ashok);
Panjabi-    असोक (Asok);
Marathi-    अशोक (Ashoka), जसुन्दी (Jasundi);
Malayalam–अशोकामु (Asokamu)।
English-    सौरो-लैस ट्री (Sorrow-less tree);
Arbi-        अशोक (Ashok);
Persian-बर्ग अशोक (Bargh-e-ashok)

अशोक के पेड़ के नुकसान

एक निश्चित मात्रा में अशोक के पत्तों या छाल का सेवन करने से कोई परेशानी नहीं होती है, परंतु यदि अधिक मात्रा में इसका उपयोग किया जाए तो पेट में दर्द, सीने में जलन, उल्टी आदि की समस्या हो सकती है।

English Translate

Ashoka

Everyone is familiar with the Ashoka tree. This tree can be easily seen on the side of the road. In the scriptures, after Peepal and Banyan, Ashoka tree is considered to be very important. Having Ashok tree in the house is considered very auspicious. The meaning of the word Ashoka is said to be 'no sorrow of any kind'. There is no sorrow in the house where this tree is planted. Planting this tree brings happiness, peace and prosperity in the house.

What is Ashoka tree?

Sanatani Vedic people consider this tree to be sacred and revered, but Buddhists also see it with special respect, because it is said that Lord Buddha was born under the Ashoka tree. This tree is 25 to 30 feet high, multi-vegetarian, dense and shady like a mango tree. Its stem is brown in color with some redness. This tree is found all over India. Its Pallavas are 9 inches long, round, and notched. These are attached in 5 to 6 pairs on both sides of the simple stalk. Its leaves are 8 to 10 inches long and 1 to 2 inches wide.

अशोक का पेड़ || Ashok Tree ||

Know about the advantages, disadvantages, uses and medicinal properties of Ashoka tree.

There are mainly 2 species of Ashoka, which are used for medicine. It is short, dry, flaky, bitter and cold in nature. It is beneficial in pain reliever, complexion, bone additive, aromatic, remover of three doshas, ​​thirst, burning, worm, swelling etc.

blood diarrhoea

Diarrhea occurs due to eating too much spicy food, packaged food, outside food, fast food or junk food. In such a situation, grinding 3 to 4 grams flowers of Ashoka in water and giving it is beneficial in blood diarrhoea.

respiratory problems

If there is a problem in breathing due to any reason, then to get instant relief, feeding 65 mg of Ashoka seed powder in a betel wad is beneficial in respiratory diseases.

piles problem

  • Make a decoction of the bark of Ashoka tree and drink it in 15 to 25 ml quantity, it is beneficial in the problem of piles.
  • Take equal quantity of bark of Ashoka tree and its flowers, soak 10 grams of it in a glass of water at night. Strain the water in the morning and drink it. Similarly, drink the soaked morning drink in the evening. This gives quick relief in piles.

stone pain

Due to unbalanced diet, the problem of stones has also increased nowadays. Grind 1 to 2 grams seeds of Ashoka in water and drink it in the amount of two spoons, it provides relief in the pain caused by kidney stones.

diabetes problem

Ashoka bark has anti-diabetic properties, which prevents the increase in the amount of sugar in the blood.

अशोक का पेड़ || Ashok Tree ||

repairing a broken bone

Ashoka is beneficial in repairing broken bones and strengthening bones. Taking 6 grams powder of Ashoka's bark with milk in the morning and evening and applying its paste helps in joining of broken bones and reduces pain.

skin problem

Grind mustard in the juice of Ashoka bark and dry it in the shade. After that, when it is to be rubbed, grind mustard in the juice of its bark and apply it on the skin, the color of the skin improves.

acne on the skin

Boil the decoction made from the bark of Ashoka, thicken it and cool it. Mixing equal quantity of mustard oil in it and applying it on acne, boils and pimples is beneficial.

to increase memory

If the memory is deteriorating with increasing age, then mixing equal quantity of Ashoka bark and Brahmi powder, taking one spoon each in the morning and evening with a cup of milk regularly for a few months is beneficial.