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सोंठ के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

सोंठ के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

अदरक को सुखाकर बना सोंठ सब्जियों का स्वाद बढ़ाने के साथ ही कई बीमारियों से भी छुटकारा दिलाने में मदद करता है। लंबे समय से सोंठ को एक कारगर औषधि के रूप में प्रयोग में लाया जाता रहा है। इसका इस्तेमाल अदरक की तरह ही किया जाता है। भोजन में एक मसाले की तरह इस्तेमाल किया जाने वाला सोंठ आंतरिक स्वास्थ्य से लेकर त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए भी फायदेमंद होता है। सोंठ को आम बोलचाल की भाषा में सोंठ या सुंठ भी कहा जाता और वहीं कुछ लोग इसे सीधे सूखी अदरक के नाम से ही जानते हैं। अदरक को सुखाकर इसकी सोंठ इसलिए बनाई जाती है, ताकि इसे लंबे समय तक स्टोर करके रखा जा सके। अंग्रेजी में इसे “ड्राइड जिंजर” (Dried ginger) के नाम से भी जाना जाता है।

सोंठ के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

सोंठ क्या है?

सोंठ अदरक का ही सूखा हुआ रूप होता है। सोंठ बनाने के लिए पहले अदरक को अच्छी तरह से सुखाया जाता है। इसके बाद इसका पाउडर बनाया जाता है। इसे ही सोंठ कहा जाता है। अदरक के पाउडर (Ginger Powder) को सोंठ के रूप में जाना जाता है।

जानते हैं सोंठ के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुणों के बारे में

सोंठ स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। सोंठ की तासीर काफी गर्म होती है। इसलिए अकसर ही इसका उपयोग सर्दी के समय पर किया जा सकता है। लेकिन कुछ लोग गर्मियों में भी सोंठ का उपयोग करते हैं. सौंठ को चाय या सब्जी आदि में डालकर किया जा सकता है।
सोंठ के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

अपच की समस्या 

आयुर्वेद के अनुसार सोंठ का सेवन करना अपच संबंधी समस्याओं को दूर कर सकता है। यदि खाना खाने से पहले सोंठ का सेवन किया जाए तो इससे पाचन क्रिया उत्तेजित हो जाती है, जिससे सीने में जलन, बार-बार डकार आना और कब्ज जैसी समस्याएं ठीक हो जाती हैं।

वजन कम करने के लिए

सोंठ का उपयोग शरीर के वजन को कम करने के लिए किया जा सकता है। शरीर का वजन कम करने में सोंठ को काफी प्रभावी माना जाता है। सोंठ पाचन प्रणाली को सक्रिय बनाता है, जिससे शरीर में जमा वसा को अवशोषित करने में मदद मिलती है। सोंठ में थर्मोजेनिक गुण भी होते हैं, जो कैलोरी को खर्च करने (कैलोरी बर्निंग) में मदद करता है।

पेट की जलन से राहत

पेट की जलन को दूर करने में अदरक कारगर भूमिका निभा सकता है। दरअसल, इस खाद्य पदार्थ का इस्तेमाल प्राचीन समय से पेट से जुड़ी हुई कई समस्याओं, जैसे कब्ज, दस्त, अपच, पेट फूलना, गैस, गैस्ट्रिक अल्सर, मतली और उल्टी का इलाज करने के लिए किया जा रहा है, जो पेट में जलन का कारण बन सकती हैं। अत्यधिक मात्रा में इसका उपयोग पेट में जलन पैदा भी करता है। 
सोंठ के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

ब्लड शुगर कम करने में 

सोंठ का उपयोग ब्लड शुगर कम करने के लिए भी काफी प्रभावी माना गया है। यदि खाली पेट सोंठ के पाउडर का सेवन किया जाए तो इससे भोजन करने के बाद बढ़ने वाली शुगर को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

सोंठ के सेवन से दूर करें अंदरूनी सूजन

सूखी अदरक में कई एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो शरीर के अंदर होने वाली सूजन व लालिमा को कम करने में मदद कर सकते हैं। जिन लोगों को गठिया या अन्य कोई स्वास्थ्य समस्या है, जिसके कारण उनके शरीर में सूजन व लालिमा विकसित हो रही है, तो उनके लिए सोंठ काफी लाभदायक हो सकती है।

इम्युनिटी सिस्टम के लिए

शरीर के इम्यून सिस्टम के कमजोर होने पर कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। यहां सोंठ एक अहम भूमिका निभा सकता है। अदरक और अदरक से बने खाद्य उत्पाद अपने एंटी इंफ्लेमेटरी गुण से इम्यून सिस्टम को बढ़ावा देने का काम कर सकते हैं। हालांकि, सोंठ पूर्ण रूप रोग प्रतिरोधक प्रणाली पर किस प्रकार काम करता है, इस पर अभी और शोध की आवश्यकता है।

सोंठ के पौष्टिक तत्व – Nutritional Value of Ginger Powder

सोंठ के पौष्टिक तत्व – Nutritional Value of Ginger Powder

सोंठ का उपयोग कैसे करें (How to use Dried ginger)

सोंठ को प्राचीन समय से ही एक प्राकृतिक दवा के रूप में जाना जाता है और आयुर्वेद व सिद्ध चिकित्सा प्रणाली में कई रोगों का इलाज करने के लिए सोंठ का इस्तेमाल किया जाता है। यही नहीं भारतीय रसोई में भी सोंठ का इस्तेमाल काफी प्रचलित है और अनेक व्यंजनों को सुगंधित व स्वादिष्ट बनाने के लिए सोंठ का इस्तेमाल किया जाता है। सोंठ का सेवन कैसे करें -
  • दाल, सब्जी या अन्य खाद्य पदार्थों में( डालकर
  • गुनगुने पानी के साथ
  • उबले हुए दूध के साथ
  • हालांकि, सोंठ का सेवन कितनी मात्रा में आपके स्वास्थ्य के लिए उचित है यह जानने के लिए डॉक्टर से संपर्क कर लेना चाहिए।
सोंठ के फायदे, नुकसान, उपयोग और औषधीय गुण

सोंठ के नुकसान (Side effects of Dried ginger)

सोंठ का एक सही मात्रा में सेवन करना आमतौर पर स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित रहता है। हालांकि, सामान्य से अधिक मात्रा में सोंठ का सेवन करने से सीने में जलन, जी मिचलाना उल्टी और पेट संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा कुछ लोगों को सोंठ से एलर्जिक रिएक्शन भी हो सकता है। जब उनका शरीर सोंठ के संपर्क में आता है, तो उन्हें एलर्जी के लक्षण होने लगते हैं, जिनमें निम्न शामिल हैं -
  • सांस लेने में दिक्कत होना
  • त्वचा में चकत्ते होना
  • शरीर के किसी हिस्से में खुजली
  • गला बैठना या गले में दर्द

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

द्वादश ज्योतिर्लिंग - आप सभी जानते हैं भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग देश के अलग-अलग भागों में स्थित हैं। इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। इन ज्योतिर्लिंग के दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मातर के सारे पाप समाप्त हो जाते हैं।

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

हिंदू धर्म के अनुसार सावन का महीना सबसे पवित्र माना जाता है। इस महीने में भगवान शिव की पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार, शिवजी की आराधना से मनुष्य की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। शिवलिंग पर मात्र जल चढ़ाने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। इसलिए देश में भगवान शिव जी के 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है और इनके दर्शन करने वाला सबसे सौभाग्यशाली होता है। आज भगवान् शिव के बारहों ज्योतिर्लिंग चर्चा करते हैं। 

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग 

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। शिवपुराण के अनुसार जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने क्षय रोग होने का श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। 

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्री शैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग 

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग 

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग 

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग 

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग 

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग 

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मा गिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा। 

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग 

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखण्ड प्रान्त, पूर्व में बिहार प्रान्त के संथाल परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथ पुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है, कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।

धृष्णेश्वर मन्दिर ज्योतिर्लिंग

शिव के बारह ज्योतिर्लिंग की महिमा

घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के संभाजीनगर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे धृष्णेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

       🔱🔱 हर हर महादेव 🔱🔱 

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की विस्तृत जानकारी

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की विस्तृत जानकारी 

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की विस्तृत जानकारी 

वो नीली चिट्ठियां

वो नीली चिट्ठियां

Rupa Oos ki ek Boond
इरादे इतने 
कमज़ोर नहीं होने चाहिए,
कि लोगो की 
बातों से टूट जाएं…!❣️"

वो नीली चिट्ठियां कहां खो गई,

जिनमें लिखने के सलीके छुपे होते थे..


कुशलता की कामना से शुरू होते थे

बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थे


और बीच में लिखी होती थी जिंदगी

प्रियतमा का विछोह,

पत्नी की विवशताएं

नन्हें के आने की खबर,

मां की तबियत का दर्दं

और पैसे भेजने का अनुनय

फसलों के खराब होने की वजह


कितना कुछ सिमट जाता था

एक नीले से कागज में

जिसे नवयौवना भाग कर सीने से लगाती

और अकेले में आंखों से आंसू बहाती


मां की आस थी ये चिट्ठियां

पिता का संबल थी ये चिट्ठियां

बच्चों का भविष्य थी ये चिट्ठियां

और गांव का गौरव थी ये चिट्ठियां

अब तो स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता है

और अक्सर ही दिल तोड़ता है

मोबाइल का स्पेस भर जाए तो

सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता है

सब कुछ सिमट गया छै इंच में

जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में 

जज्बात सिमट गए मैसेजों में

चूल्हे सिमट गए गैसों में

और इंसान सिमट गए पैसों में..

Rupa Oos ki ek Boond

खुशी एक फूल से सुगंध की तरह विकिरण करती है 
और सभी अच्छी चीजों को अपनी ओर खींचती है…!❣️"

सबसे बड़ी समस्या || The Biggest Problem ||

सबसे बड़ी समस्या

बहुत समय पहले की बात है। एक महा ज्ञानी पंडित हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहते थे। लोगों के बीच रह कर वह थक चुके थे और अब ईश्वर भक्ति करते हुए एक सादा जीवन व्यतीत करना चाहते थे। लेकिन उनकी प्रसिद्धि इतनी थी कि लोग दुर्गम पहाड़ियों, संकरे रास्तों, नदी-झरनों को पार करके भी उनसे मिलना चाहते थे। लोगों का मानना था कि यह विद्वान उनकी हर समस्या का समाधान कर सकते हैं।

सबसे बड़ी समस्या || The Biggest Problem ||

इस बार भी कुछ लोग उन्हें ढूंढते हुए उनकी कुटिया तक आ पहुंचे। पंडित जी ने उन्हें इंतज़ार करने के लिए कहा।तीन दिन बीत गए, अब और भी कई लोग वहां पहुँच गए। जब लोगों के लिए जगह कम पड़ने लगी तब पंडित जी बोले, "आज मैं आप सभी के प्रश्नों का उत्तर दूंगा, पर आपको वचन देना होगा कि यहाँ से जाने के बाद आप किसी और से इस स्थान के बारे में नहीं बताएँगे, ताकि आज के बाद मैं एकांत में रह कर अपनी साधना कर सकूँ। चलिए अपनी-अपनी समस्याएं बताइये।"

यह सुनते ही किसी ने अपनी परेशानी बतानी शुरू की, लेकिन वह अभी कुछ शब्द ही बोल पाया था कि बीच में किसी और ने अपनी बात कहनी शुरू कर दी। सभी जानते थे कि आज के बाद उन्हें कभी पंडित जी से बात करने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए वे सब जल्दी से जल्दी अपनी बात रखना चाहते थे। कुछ ही देर में वहां का दृश्य मछली-बाज़ार जैसा हो गया और अंततः पंडित जी को चीख कर बोलना पड़ा, "कृपया शांत हो जाइये! अपनी-अपनी समस्या एक पर्चे पे लिखकर मुझे दीजिये।"

सभी ने अपनी-अपनी समस्याएं लिखकर आगे बढ़ा दी। पंडित जी ने सारे पर्चे लिए और उन्हें एक टोकरी में डाल कर मिला दिया और बोले, "इस टोकरी को एक-दूसरे को पास कीजिये। हर व्यक्ति एक पर्ची उठाएगा और उसे पढ़ेगा। उसके बाद उसे निर्णय लेना होगा कि क्या वो अपनी समस्या को इस समस्या से बदलना चाहता है ?"

हर व्यक्ति एक पर्चा उठाता, उसे पढ़ता और सहम सा जाता। एक -एक कर के सभी ने पर्चियां देख ली पर कोई भी अपनी समस्या के बदले किसी और की समस्या लेने को तैयार नहीं हुआ। सबका यही सोचना था कि उनकी अपनी समस्या चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो बाकी लोगों की समस्या जितनी गंभीर नहीं है। दो घंटे बाद सभी अपनी-अपनी पर्ची हाथ में लिए लौटने लगे, वे खुश थे कि उनकी समस्या उतनी बड़ी भी नहीं है जितना कि वे सोचते थे।

शिक्षा:-

ऐसा कौन होगा जिसकी जिंदगी में एक भी समस्या न हो ? हम सभी के जीवन में समस्याएं हैं, हमें लगता है कि सबसे बड़ी समस्या हमारी ही है पर यकीन जानिए इस दुनिया में लोगों के पास इतनी बड़ी-बड़ी समस्यायें हैं कि हमारी तो उनके सामने कुछ भी नहीं। इसलिए ईश्वर ने जो भी दिया है उसके लिए उसके आभारी रहिये और एक खुशहाल जीवन जीने का प्रयास करिये।

सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है,
जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है..

The Biggest Problem

It occurred a long time ago. A great learned scholar lived somewhere in the hills of the Himalayas. He was tired of living among people and now wanted to lead a simple life doing devotion to God. But his fame was so much that people wanted to meet him even after crossing the inaccessible hills, narrow paths, rivers and streams. People believed that this scholar can solve all their problems.

सबसे बड़ी समस्या || The Biggest Problem ||

This time also some people reached his cottage looking for him. Pandit ji asked them to wait. Three days passed, now many more people reached there. When the space started getting less for the people, Pandit ji said, "Today I will answer all your questions, but you have to promise that after leaving here you will not tell about this place to anyone else, so that today's After that, I can do my spiritual practice by staying in solitude. Let us tell our problems.

On hearing this, someone started telling his problem, but he was able to speak only a few words that in the middle someone else started saying his point of view. Everyone knew that after today they would never get a chance to talk to Pandit ji. That's why they all wanted to keep their point as soon as possible. Within no time the scene there became like a fish market and finally Pandit ji had to shout, "Please calm down! Write your problems on a piece of paper and give it to me."

Everyone forwarded their problems in writing. Pandit ji took all the slips and put them in a basket and mixed them and said, "Pass this basket to each other. Everyone will pick up a slip and read it. Then he has to decide whether to solve his problem." Want to change from this problem?"

Everyone would pick up a piece of paper, read it and be horrified. One by one everyone saw the slips but no one was ready to take someone else's problem instead of their own. Everyone used to think that no matter how big their own problem is, it is not as serious as other people's problems. Two hours later everyone returned with their slips in hand, happy that their problem was not as big as they thought.

Education:-

Who would be the one who does not have a single problem in his life? We all have problems in life, we think that the biggest problem is ours, but believe me, people in this world have so many big problems that we are nothing in front of them. So be thankful to God for whatever he has given and try to live a happy life.

Always be happy - what is received is enough,
Whose mind is cool - he has everything..

हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी (State Bird of Himachal Pradesh) || जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan) ||

जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan)

भारत राज्य के राजकीय पक्षियों के क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज चर्चा करते हैं, हिमाचल प्रदेश के राजकीय पक्षी की। यह बहुत ही खूबसूरत चिड़िया है, जिसका नाम जुजुराना (WesternTragopan) है। पश्चिमी ट्रैगोपन (Western Tragopan), जेवर या (western horned tragopan, Tragopan melanocephalus) या जुजुराना, उत्तर-पश्चिम हिमालय में पाए जाने वाला एक चमकीले पंखों वाला पक्षी है, जिसकी अनुमानित वैश्विक आबादी 3,500 से भी कम है। इसे 2007 में हिमाचल प्रदेश के राज्य पक्षी का दर्जा दिया गया था।

हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी (State Bird of Himachal Pradesh) ||  जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan) ||

जुजुराना पक्षी के नर मादा में थोड़ा अंतर होता है। मादाओं के ऊपरी हिस्से हल्के भूरे-भूरे रंग के होते हैं, जो बारीकी से वर्मीकेटेड होते हैं और काले रंग के धब्बेदार होते हैं। अधिकांश पंखों पर काले धब्बे और केंद्रीय सफेद धारियाँ होती हैं। अपरिपक्व नर मादाओं से मिलते-जुलते हैं, लेकिन लंबे पैरों के साथ बड़े होते हैं और सिर पर अलग-अलग मात्रा में काला और गर्दन पर लाल रंग होता है।

नर बहुत गहरे, भूरे और काले रंग का होता है और उस पर कई सफेद धब्बे होते हैं, प्रत्येक धब्बे की सीमा गर्दन के किनारों और पीछे काले और गहरे लाल रंग के धब्बों से होती है। गला खुला है और त्वचा नीली है जबकि चेहरे की खुली त्वचा लाल है। उनके पास एक छोटी काली पश्चकपाल शिखा है। 

हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी (State Bird of Himachal Pradesh) ||  जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan) ||

नर का वजन 1.8-2.2 किलोग्राम (4.0-4.9 पाउंड) और मादाओं का वजन 1.25-1.4 किलोग्राम (2.8-3.1 पाउंड) होता है। नर की लंबाई 55-60 सेमी (22-24 इंच) होती है जबकि मादा की लंबाई 48-50 सेमी (19-20 इंच) होती है।

इन पक्षियों की पाकिस्तान में कोहिस्तान और काघन घाटी और भारत के किश्तवाड़, चंबा और कुल्लू जिलों के साथ-साथ भारत में सतलुज नदी के पूर्व के क्षेत्र से पांच आबादी ज्ञात है। वे 1,750 से 3,600 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं, जो गर्मियों में और अधिक ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं। उनका पसंदीदा निवास स्थान समशीतोष्ण, उप-अल्पाइन और चौड़ी पत्ती वाले जंगलों का घना मैदान है।

हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी (State Bird of Himachal Pradesh) ||  जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan) ||

यह गर्मियों में 2,400 और 3,600 मीटर के बीच ऊपरी समशीतोष्ण जंगलों में रहता है, और सर्दियों में, 2,000 और 2,800 मीटर की ऊंचाई के बीच घने शंकुधारी और चौड़ी पत्ती वाले जंगलों में रहता है। पश्चिमी ट्रैगोपैन अधिकतर वृक्षीय है लेकिन जमीन पर भोजन के लिए उतरता है। वे ज्यादातर पत्तियों, अंकुरों और बीजों पर भोजन करते हैं, लेकिन कीड़े और अन्य अकशेरुकी जीवों का भी सेवन करते हैं। अधिकांश तीतरों की तरह, वे घोंसला बनाने के समय को छोड़कर पेड़ों पर अकेले या जोड़े में निवास करते हैं। वे मानवजनित अशांति के प्रति संवेदनशील हैं और अशांत आवासों (उदाहरण के लिए, जल-विद्युत परियोजना विकास स्थल) से बचते हैं।

पश्चिमी ट्रैगोपैन को सभी जीवित तीतरों में सबसे दुर्लभ माना जाता है। इसका दायरा बहुत सीमित है। कश्मीर घाटी में इसे डांगीर, चंबा में फुल्गर और कुल्लू घाटी में जुजुराना ("पक्षियों का राजा") के नाम से जाना जाता है। हिमाचल प्रदेश में लोग वेस्टर्न ट्रैगोपन ((Western Tragopan) को ‘पक्षियों का राजा’ भी कहते हैं। कश्मीर में इसे दानगीर (Dangir) के नाम से जाना जाता है।

हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी (State Bird of Himachal Pradesh) ||  जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan) ||

पश्चिमी ट्रैगोपैन की आबादी को इसके पूरे क्षेत्र में कई मानवजनित कारकों से खतरा है। अनुमान है कि विश्व की आबादी 5,000 से कम है, जिसमें हिमाचल प्रदेश में बंदी प्रजनन आबादी भी शामिल है, जिसकी संख्या 2012 में दस जोड़े से भी कम थी। सीआईटीईएस ने इसके पंखों की बिक्री को हतोत्साहित करने के लिए इस प्रजाति को परिशिष्ट I में सूचीबद्ध किया है। 

यह एक लुप्तप्राय पक्षी है और हिमालय पर्वतमाला के कारण भारत में हिमाचल प्रदेश के लिए थोड़ा विशिष्ट है। यह उत्तराखंड में भी पाया जाता है। अत्यधिक लुप्तप्राय प्रजातियों के कारण, हिमाचल प्रदेश ने जुजुराना (Jujurana) को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची I में रखा। जिससे इसकी रक्षा की जा सके।

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Jujurana (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan)

Taking forward the order of the state birds of the state of India, today we discuss about the state bird of Himachal Pradesh. This is a very beautiful bird, whose name is Jujurana (Western Tragopan). The Western Tragopan, Jewar or (western horned tragopan, Tragopan melanocephalus) or Jujurana, is a bright-winged bird found in the northwestern Himalayas, with an estimated global population of less than 3,500. It was given the status of the state bird of Himachal Pradesh in 2007.

There is little difference between male and female Jujurana bird. The upperparts of the females are pale greyish-brown, thinly vermiculated and speckled with black. There are dark spots and central white stripes on most of the wings. Immature males resemble females but are larger with longer legs and have varying amounts of black on the head and red on the neck.

हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी (State Bird of Himachal Pradesh) ||  जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan) ||

The male is very dark, brown and black in color and has several white spots, each spot bordered by black and dark red spots on the sides and back of the neck. The throat is exposed and the skin is blue while the exposed skin of the face is red. They have a small black occipital crest.

Males weigh 1.8–2.2 kg (4.0–4.9 lb) and females weigh 1.25–1.4 kg (2.8–3.1 lb). Males are 55–60 cm (22–24 in) in length while females are 48–50 cm (19–20 in) in length.

Five populations of these birds are known from the Kohistan and Kaghan Valley in Pakistan and the Kishtwar, Chamba and Kullu districts of India, as well as the area east of the Sutlej River in India. They are found at altitudes of 1,750 to 3,600 metres, reaching higher altitudes in summer. Their preferred habitat is thickets of temperate, sub-alpine and broad-leaf forests.

It lives in upper temperate forests between 2,400 and 3,600 m in summer, and in winter, in dense coniferous and broad-leaf forests between 2,000 and 2,800 m altitude. The western tragopan is mostly arboreal but descends to the ground to feed. They feed mostly on leaves, shoots and seeds, but also consume insects and other invertebrates. Like most pheasants, they roost alone or in pairs in trees except during nesting time. They are sensitive to anthropogenic disturbance and avoid disturbed habitats (for example, hydro-electric project development sites).

हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी (State Bird of Himachal Pradesh) ||  जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan) ||

The western tragopan is considered the rarest of all living pheasants. Its scope is very limited. It is known as Dangir in Kashmir Valley, Fulgar in Chamba and Jujurana ("King of Birds") in Kullu Valley. People in Himachal Pradesh also call Western Tragopan the 'King of Birds'. In Kashmir it is known as Dangir.

The western tragopan population is threatened by a number of anthropogenic factors throughout its range. The world population is estimated to be less than 5,000, including a captive breeding population in Himachal Pradesh, which numbered less than ten pairs in 2012. CITES has listed this species on Appendix I to discourage the sale of its fins.

हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी (State Bird of Himachal Pradesh) ||  जुजुराना (Tragopan melanocephalus)(WesternTragopan) ||

It is an endangered bird and is a bit specific to Himachal Pradesh in India due to the Himalayan ranges. It is also found in Uttarakhand. Due to the highly endangered species, Himachal Pradesh placed Jujurana in Schedule I of the Wildlife Protection Act. So that it can be protected.

भारत के सभी राज्यों के राजकीय पक्षियों की सूची |(List of State Birds of India)

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta) अध्याय- 13 (01-19)

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

इस ब्लॉग के माध्यम से हम सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता प्रकाशित कर रहे हैं, इसके तहत हम सभी 18 अध्यायों और उनके सभी श्लोकों का सरल अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करेंगे। 

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के 18 अध्यायों में से अध्याय 1,2,3,4,5, 6, 7, 8,9, 10,11 और 12 के पूरे होने के बाद आज प्रस्तुत है, अध्याय 13 के सभी अनुच्छेद। 

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta) अध्याय- 13 (01-19)

अथ त्रयोदशोsध्याय: श्रीभगवानुवाच

ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय

अर्जुन उवाच

प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव  || 13.1 ||

भावार्थ : 

अर्जुन ने पूछा - हे केशव! मैं आपसे प्रकृति एवं पुरुष, क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ और ज्ञान एवं ज्ञान के लक्ष्य के विषय में जानना चाहता हूँ॥13.1॥

श्रीभगवानुवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः || 13.2 ||

भावार्थ : 

श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है) इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं॥13.2॥

श्रीभगवानुवाच

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || 13.3 ||

भावार्थ : 

हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान (गीता अध्याय 15 श्लोक 7 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिए) और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से जानना है (गीता अध्याय 13 श्लोक 23 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिए) वह ज्ञान है- ऐसा मेरा मत है৷৷13.3৷৷

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्‌।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु || 13.4 ||

भावार्थ : 

वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है- वह सब संक्षेप में मुझसे सुन৷৷13.4৷৷

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌ ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः  || 13.5 ||

भावार्थ : 

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किए हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है৷৷13.5৷৷

महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ || 13.6 ||

भावार्थ : 

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध৷৷13.6৷৷

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌  || 13.7 ||

भावार्थ : 

तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना (शरीर और अन्तःकरण की एक प्रकार की चेतन-शक्ति।) और धृति (गीता अध्याय 18 श्लोक 34 व 35 तक देखना चाहिए।)-- इस प्रकार विकारों (पाँचवें श्लोक में कहा हुआ तो क्षेत्र का स्वरूप समझना चाहिए और इस श्लोक में कहे हुए इच्छादि क्षेत्र के विकार समझने चाहिए।) के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया৷৷13.7৷৷

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌ ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः  || 13.8 ||

भावार्थ : 

श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि (सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जल-मृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि को बाहर की शुद्धि कहते हैं तथा राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर की शुद्धि कही जाती है।) अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह৷৷13.8৷৷

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌  || 13.9 ||

भावार्थ : 

इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना৷৷13.9৷৷

असक्तिरनभिष्वङ्‍ग: पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु  || 13.10 ||

भावार्थ : 

पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना॥13.10॥

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || 13.11 ||

भावार्थ : 

मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना 'अव्यभिचारिणी' भक्ति है) तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना॥13.11॥

त्मज्ञाअध्याननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा || 13.12 ||

भावार्थ : 

अध्यात्म ज्ञान में (जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम 'अध्यात्म ज्ञान' है) नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है॥13.12॥

ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || 13.13 ||

भावार्थ : 

जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत्‌ ही कहा जाता है, न असत्‌ ही৷৷13.13৷৷

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌ ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || 13.14 ||

भावार्थ : 

वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) ॥13.14॥

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌ ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || 13.15 ||

भावार्थ : 

वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है॥13.15॥

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌ || 13.16 ||

भावार्थ : 

वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है॥13.16॥

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || 13.17 ||

भावार्थ : 

वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है (जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है॥13.17॥

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌ || 13.18 ||

भावार्थ : 

वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति (गीता अध्याय 15 श्लोक 12 में देखना चाहिए) एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है॥13.18॥

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते  || 13.19 ||

भावार्थ : 

इस प्रकार क्षेत्र (श्लोक 5-6 में विकार सहित क्षेत्र का स्वरूप कहा है) तथा ज्ञान (श्लोक 7 से 11 तक ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन कहा है।) और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप (श्लोक 12 से 17 तक ज्ञेय का स्वरूप कहा है) संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है॥13.19॥

सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)

सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)

कछुआ से तो सभी परिचित हैं। लगभग सभी लोगों ने कछुआ देखा भी होगा, परंतु आज जिस कछुए की बात करने जा रहे हैं वह कुछ लोगों ने ही देखा होगा। सॉफ्टशेल कछुओं में कठोर खोल या खोल की कमी होती है, जो अधिकांश कछुओं की प्रजातियों की विशेषता है। जहां कठोर कवच कछुए की पहचान होती है वहीं इसके विपरीत हम नर्म कवच (सॉफ्ट सेल) कछुए के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं। उनका खोल कठोर और हड्डीदार होने के बजाय चमड़े जैसा होता है। 
सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)

यह नदियों एवं तालाबों में पाए जाने वाली नरम खोल की एक प्रजाति है। यह प्रजाति लगभग 94 से.मी तक बड़ी होती है। यह प्रजाति सड़े गले मांस एवं पानी में पाए जाने वाले पौधों के साथ में जलीय वनस्पती, मछलियों, अन्य कछुओं की हैचलिंग एवं जल पक्षियों पर शिकार करते है। गंगा स्वछता अभियान के अंतर्गत इस प्रजाति को नदी साफ करने के लिए छोड़ा गया हैं। यह एक बार में 13-35 अंडे देते हैं और अपने अंडे अगस्त से दिसंबर मास तक देते हैं, जिनमें से बच्चे निकलने में तकरीबन 9 महीने लगते है। रणथंभोर टाइगर रिजर्व में कुछ साल पहले एक बाघ को इन्डियन सॉफ्टशेल टर्टल का शिकार करते हुए भी देखा गया था। इनके मांस और अंडो के लिए इनका इंसानों द्वारा अवैध तरीके से शिकार किया जाता है। 

आज, विश्व में कछुओं की 350 प्रजातियों में से लगभग आधी प्रजातियाँ लुप्तप्राय हैं। लगभग 220 मिलियन वर्ष पहले के सबसे पुराने जीवाश्मों के साथ - डायनासोर के काल तक - कछुए वर्तमान में मौजूद सबसे पुराने जीवित सरीसृप समूह हैं। ये सरीसृप प्राकृतिक दुनिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खाद्य जाल में, वे शिकारियों के रूप में कार्य करते हैं, लेकिन कछुए और उनके अंडे विभिन्न प्रकार के जानवरों के लिए भी महत्वपूर्ण शिकार हैं।
सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)
वे विभिन्न प्रकार के आवासों जैसे समुद्र (समुद्री कछुए), भूमि (स्थलीय कछुए), और झीलों, तालाबों और नदियों (मीठे पानी के कछुए) के आसपास पाए जा सकते हैं। मीठे पानी के टेस्टुडाइन शैवाल के खिलने और कुछ मृत पदार्थों को भी खाते हैं, जिससे हमारा पानी साफ रहता है। ये जानवर बीज फैलाव और अंकुरण में योगदान देने के लिए भी जाने जाते हैं। भारत मीठे पानी के कछुओं की 24 प्रजातियों का घर है। 

भारतीय सॉफ्टशेल कछुआ (निल्सोनिया गैंगेटिका), जिसे गंगा सॉफ्टशेल कछुए के रूप में भी जाना जाता है, मीठे पानी के आवासों में पाया जाने वाला एक सरीसृप है और इसका वितरण उत्तरी और पूर्वी भारत में गंगा, सिंधु और महानदी नदियों तक ही सीमित है। जिन राज्यों में वे पाए जाते हैं उनमें असम, बिहार, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।

इस कछुए को इसके उभरे हुए, ट्यूब जैसे थूथन और चपटे खोल से आसानी से पहचाना जा सकता है। उनकी लंबी गर्दन और ट्यूब जैसे थूथन उन्हें सांस लेने के लिए अपनी नाक को पानी से बाहर निकालने में मदद करते हैं। दूसरी ओर, संपीड़ित खोल उन्हें सुव्यवस्थित करता है, जिससे वे शानदार और तेज़ तैराक बन जाते हैं।
सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)
इसका प्रमुख, ट्यूब जैसा थूथन जंगलों में सरीसृप की पहचान करने में मदद करता है। एक अन्य विशेषता जिससे उन्हें पहचाना जा सकता है वह है उनका कवच (ऊपरी खोल), जो गोल से अंडाकार आकार का होता है, और पीले बॉर्डर के साथ हरे रंग का होता है। नदियों के अलावा, यह बड़ा कछुआ नदियों, बड़ी नहरों, झीलों और मिट्टी और रेत के तल वाले तालाबों में भी पाया जा सकता है; ऐसा प्रतीत होता है कि इन सरीसृपों को गंदे पानी से लगाव है। सॉफ़्टशेल्स सर्वाहारी होते हैं जो न केवल मोलस्क, कीड़े, मछली, उभयचर, जलपक्षी और मांस खाते हैं, बल्कि जलीय पौधों का भी सेवन करते हैं।

2011 में कछुआ संरक्षण गठबंधन द्वारा संकलित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के 25 सबसे खतरनाक कछुओं में से लगभग 7.4% भारत में पाए जाते हैं। यह कहना कि भारतीय सॉफ्टशेल कछुआ खतरे में है, अतिशयोक्ति होगी, और ऐसे कई मानव निर्मित कारक हैं जो आज इन लुप्तप्राय सरीसृपों के लिए खतरा हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) द्वारा सॉफ्टशेल कछुओं की आधी से अधिक प्रजातियों को लुप्तप्राय के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

अवैध वन्यजीव व्यापार के लिए अवैध शिकार, मांस के लिए अत्यधिक खपत, निवास स्थान की हानि, जल प्रदूषण, नहरों को बंद करना, बांधों की शुरूआत, ज्वारीय बैराज, बाढ़ के मैदानों की जल निकासी और कुछ हद तक कृषि का विस्तार इस प्रजाति के जीवन को खतरे में डालने के लिए जिम्मेदार कारक हैं। बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश राज्यों में, कछुए का मांस स्थानीय बाजारों में व्यापक रूप से बेचा जाता है और वे अत्यधिक खपत की समस्या से ग्रस्त हैं।

कछुओं की प्रकृति में एक महत्वपूर्ण भूमिका है और वे विभिन्न बायोम के स्वास्थ्य को नियंत्रित करते हैं। कुछ प्रजातियों का भोजन और औषधि के रूप में उपयोग के लिए भी शिकार किया जाता है। पारंपरिक दवाओं में उपयोग के लिए कछुओं और कछुए के अंडों की भारी मांग है। यह मानना एक आम गलती है कि कछुए के खोल में औषधीय और उपचार गुण होते हैं और उनका सेवन करने से तपेदिक और विभिन्न त्वचा रोग ठीक हो सकते हैं। हालाँकि, ऐसे दावों का समर्थन करने के लिए कोई वैज्ञानिक या चिकित्सीय प्रमाण नहीं है।

भारतीय सॉफ्टशेल कछुआ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत आता है। किसी भी संरक्षित वन्यजीव प्रजाति का अवैध शिकार या कब्ज़ा और उनके शरीर के अंगों का अवैध व्यापार एक अपराध है जिसके लिए तीन से सात साल तक की कैद हो सकती है। इसके अतिरिक्त वन्य वनस्पतियों और जीवों की लुप्तप्राय प्रजातियों (CITES) में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन के परिशिष्ट I के तहत इस प्रजाति का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार निषिद्ध है।
सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)

सॉफ़्टशेल कछुए की कुछ दिलचस्प जानकारियां!

कछुओं का यह परिवार अपने नरम, चपटे खोल और लंबे समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता के कारण अध्ययन के लिए आकर्षक है। ये कछुए कई अद्भुत जैविक अवधारणाओं का प्रदर्शन करते हैं जो उन्हें अपने जलीय जीवन के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित बनाते हैं। आइए उनमें से कुछ पर करीब से नज़र डालें

ग्रसनी श्वास
सॉफ्टशेल कछुए सर्दियों के लिए हाइबरनेट करते हैं, खुद को नदी, झील या तालाब के तल पर रेत और कीचड़ में दबा लेते हैं। कछुओं को हाइबरनेशन के दौरान खाने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन फिर भी उन्हें ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, भले ही कम दर पर।

इन कछुओं ने ग्रसनी श्वास नामक चीज़ का उपयोग करके हाइबरनेशन को अनुकूलित किया है । कछुए त्वचा और अपने गले या ग्रसनी की परत में ऑक्सीजन को अवशोषित कर सकते हैं, जहां से ग्रसनी श्वास नाम आता है।
सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)
सॉफ्टशेल कछुए अपनी त्वचा के माध्यम से आवश्यक ऑक्सीजन का 70% अवशोषित करते हैं। शेष 30% पशु ग्रसनी के अंदर और बाहर पानी पंप करके अवशोषित करते हैं। ग्रसनी के भीतर कई विल्ली, या ऊतक के छोटे प्रक्षेपण होते हैं, जिनमें रक्त वाहिकाओं की आपूर्ति होती है। ये विल्ली ऑक्सीजन अवशोषण के लिए एक बड़ा सतह क्षेत्र प्रदान करते हैं। पानी के भीतर सांस लेने की यह विधि अद्वितीय है और अन्य कछुओं की प्रजातियों द्वारा उपयोग की जाने वाली क्रियाविधि से भिन्न है।

अन्य कछुओं की प्रजातियाँ अपने क्लोअका के माध्यम से पानी के भीतर सांस लेती हैं। क्लोअका उनके शरीर के पीछे एक छिद्र है, जिसका उपयोग उत्सर्जन, पाचन और प्रजनन प्रणाली द्वारा किया जाता है। इन कछुओं में क्लोएकल बर्सा होता है, जो छोटे पॉकेट की एक जोड़ी होती है जिसमें प्रचुर मात्रा में रक्त की आपूर्ति होती है। यह कछुओं को उसी तरह से परिसंचारी पानी से ऑक्सीजन निकालने की अनुमति देता है जैसे सॉफ्टशेल कछुए अपने ग्रसनी में करते हैं।

तैराकी के लिए अनुकूलन
कठोर खोल की सुरक्षा के बिना, नरम खोल वाले कछुए को शिकार से बचने के लिए अपने पर्यावरण के अनुकूल होना पड़ता है। सॉफ्टशेल कछुए आश्चर्यजनक रूप से तेज़ तैराक होते हैं और शिकार को पकड़ने या शिकारियों से बचने के लिए अपनी गति का उपयोग करते हैं।

इन कछुओं के पैरों में मजबूती से जाल होते हैं, जो उन्हें आश्चर्यजनक गति से पानी में आगे बढ़ने में सक्षम बनाते हैं। विकास के माध्यम से, कछुओं ने अपना खोल खो दिया है, और इससे उन्हें पानी में अधिक गतिशील और तेज़ बनने की अनुमति मिली है। उनके शरीर का चपटा आकार भी आश्चर्यजनक रूप से हाइड्रोडायनामिक रूप से कुशल है, जो उन्हें तेज़ी से आगे बढ़ने में मदद करता है।
सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)
मुलायम कवच वाले कछुए के जाल वाले पैर
जाल वाले पैर कछुए को तेजी से तैरने में मदद करते हैं।
सीतनिद्रा
जबकि समशीतोष्ण क्षेत्रों में पाए जाने वाले सॉफ्टशेल कछुए पूरे वर्ष सक्रिय रह सकते हैं, जबकि अधिक उत्तरी क्षेत्रों में पाए जाने वाले कछुए सर्दियों के दौरान तापमान ठंडा होने पर शीतनिद्रा में चले जाते हैं।

कछुए ब्रूमेशन में चले जाते हैं, जो सुप्त अवधि है जिसे कुछ सरीसृप अनुभव करते हैं। यह स्तनधारियों द्वारा अनुभव की जाने वाली सच्ची शीतनिद्रा के समान है। कछुए एक्टोथर्मिक होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे ठंडे खून वाले होते हैं। पर्यावरण उनके शरीर के आंतरिक तापमान को प्रभावित करता है।
सॉफ्ट शेल कछुआ (Soft Shell Turtle)
जब पतझड़ में तापमान कम होने लगता है, तो कछुए शीतनिद्रा में जा सकते हैं। वे खुद को किसी नदी या झील के तल पर मिट्टी या रेत में दबा लेते हैं और सो जाते हैं। उनके शरीर का तापमान कम हो जाता है और उनका चयापचय कम हो जाता है। वे अपनी न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए पानी में संग्रहीत ऊर्जा और ऑक्सीजन पर निर्भर हो जाते हैं। जैसा कि हमने पहले बात की, श्वास उनकी त्वचा या ग्रसनी के माध्यम से होती है।
जब वसंत ऋतु में तापमान बढ़ता है, तो पानी गर्म हो जाता है और कछुए अपनी नींद से जाग जाते हैं।