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आदित्‍य एल-1 (Aditya-L1)

आदित्‍य एल-1 (Aditya-L1)


चाँद के बाद सूरज के पास चलते हैं। जी हाँ आदित्य एल1 सूर्य का अध्ययन करने वाला मिशन है। ISROने 2 सितंबर को देश का पहला सूर्य मिशन आदित्‍य एल-1 (Aditya-L1) लॉन्‍च किया। इसरो ने इसे पहला अंतरिक्ष आधारित वेधशाला श्रेणी का भारतीय सौर मिशन कहा है।
आदित्‍य एल-1 (Aditya-L1)
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक उतारकर इतिहास रच दिया। इसी उत्साह को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी ने शनिवार (2 सितंबर) को आदित्य-एल1 मिशन को लॉन्च किया। इस मिशन का उद्देश्य सूर्य का अध्ययन करना है। 11 बजकर 50 मिनट पर इस मिशन को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्‍पेस सेंटर से लॉन्‍च कियागया था। आदित्‍य यान को पीएसएलवी-सी57 रॉकेट के जरिए लॉन्‍च कियागया। इसके बाद ये 4 महीने का सफर पूरा करते हुए L1 पॉइंट तक पहुंचेगा। 
आदित्‍य एल-1 (Aditya-L1)
भारत का आदित्‍य L1 पूरी तरह से स्‍वदेशी है। इस मिशन को बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) ने तैयार किया है। इसरो के मुताबिक, आदित्य L-1 अपने साथ फोटोस्फीयर, क्रोमोस्फीयर और सूर्य की सबसे बाहरी परतों का निरीक्षण करने के लिए सात पेलोड ले गया, जिसमें से 4 पेलोड सूरज पर नज़र रखेंगे, बाकी 3 एल-1 पॉइंट के आसपास का अध्ययन करेंगे। 
आदित्‍य एल-1 (Aditya-L1)

आदित्य-एल1 क्या है?

आदित्य एल1 सूर्य का अध्ययन करने वाला मिशन है। इसके साथ ही इसरो ने इसे पहला अंतरिक्ष आधारित वेधशाला श्रेणी का भारतीय सौर मिशन कहा है। अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लैग्रेंजियन बिंदु 1 (एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में स्थापित करने की योजना है जो पृथ्वी से लगभग 15 लाख किमी दूर है। दरअसल, लैग्रेंजियन बिंदु वे हैं जहां दो वस्तुओं के बीच कार्य करने वाले सभी गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को निष्प्रभावी कर देते हैं। इस वजह से एल1 बिंदु का उपयोग अंतरिक्ष यान के उड़ने के लिए किया जा सकता है।

मिशन के उद्देश्य क्या हैं?

भारत का महत्वाकांक्षी सौर मिशन आदित्य एल-1 सौर कोरोना (सूर्य के वायुमंडल का सबसे बाहरी भाग) की बनावट और इसके तपने की प्रक्रिया, इसके तापमान, सौर विस्फोट और सौर तूफान के कारण और उत्पत्ति, कोरोना और कोरोनल लूप प्लाज्मा की बनावट, वेग और घनत्व, कोरोना के चुंबकीय क्षेत्र की माप, कोरोनल मास इजेक्शन (सूरज में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोट जो सीधे पृथ्वी की ओर आते हैं) की उत्पत्ति, विकास और गति, सौर हवाएं और अंतरिक्ष के मौसम को प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन करेगा।
आदित्‍य एल-1 (Aditya-L1)

सूर्य का अध्ययन जरूरी क्यों?

सूर्य निकटतम तारा है और इसलिए अन्य तारों की तुलना में इसका अधिक विस्तार से अध्ययन किया जा सकता है।  इसरो के मुताबिक, सूर्य का अध्ययन करके हम अपनी आकाशगंगा के तारों के साथ-साथ कई अन्य आकाशगंगाओं के तारों के बारे में भी बहुत कुछ जान सकते हैं। सूर्य एक अत्यंत गतिशील तारा है जो हम जो देखते हैं उससे कहीं अधिक फैला हुआ है। इसमें कई विस्फोटकारी घटनाएं होती हैं इसके साथ ही सौर मंडल में भारी मात्रा में ऊर्जा भी छोड़ता है।

क्या लिखूं...

 क्या लिखूं...

Rupa Oos ki ek Boond

 क्या लिखूं...

वो साथ गुजारे पल लिखूं या

मैं बीते साल लिखूं 

सदियों लंबी रात लिखूं..

मैं तुमको अपने पास लिखूं 

या दूरी का एहसास लिखूं..


दिल का दर्द लिखूं या

चेहरे की मुस्कान लिखूं 

वो बरसात के अमरूद लिखूं 

या जेठ के दोपहरी की चाय लिखूं..


स्कूटी पर साथ होने का एहसास लिखूं 

या ट्रेन की वो आखिरी मुलाकात लिखूँ

वो साथ गुजारे लम्हें लिखूं या

कभी न खत्म होने वाला 

इंतजार लिखूं..

भैंस की मौत

भैंस की मौत

एक दार्शनिक अपने एक शिष्य के साथ कहीं से गुजर रहे थे। चलते-चलते वे एक खेत के पास पहुंचे। खेत अच्छी जगह स्थित था, लेकिन उसकी हालत देखकर लगता था मानो उसका मालिक उस पर जरा भी ध्यान नहीं देता है।

भैंस की मौत

खैर, दोनों को प्यास लगी थी, सो वे खेत के बीचो-बीच बने एक टूटे-फूटे घर के सामने पहुंचे और दरवाज़ा खटखटाया। अन्दर से एक आदमी निकला, उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे। सभी फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे।

दार्शनिक बोला, “श्रीमान, क्या हमें पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है!”

“ज़रूर!”, आदमी उन्हें पानी का जग थमाते हुए बोला।

“मैं देख रहा हूँ कि आपका खेत इनता बड़ा है पर इसमें कोई फसल नहीं बोई गयी है और ना ही यहाँ फलों के वृक्ष दिखायी दे रहे हैं, तो आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”, दार्शनिक ने प्रश्न किया।

“जी, हमारे पास एक भैंस है, वो काफी दूध देती है। उसे पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध का सेवन कर के हमारा गुजारा चल जाता है।”, आदमी ने कहा।

दार्शनिक और शिष्य आगे बढ़ने को हुए तभी आदमी बोला, “शाम काफी हो गयी है, आप लोग चाहें तो आज रात यहीं रुक जाएं!” दोनों रुकने को तैयार हो गए।

आधी रात के करीब जब सभी गहरी नींद में सो रहे थे तभी दार्शनिक ने शिष्य को उठाया और बोला, “चलो हमें अभी यहाँ से चलना है और चलने से पहले हम उस आदमी की भैंस को चट्टान से गिराकर मार डालेंगे।”

शिष्य को अपने गुरु की बात पर यकीन नहीं हो रहा था पर वो उनकी बात काट भी नहीं सकता था। दोनों भैंस को मार कर रातों-रात गायब हो गए। 

यह घटना शिष्य के जेहन में बैठ गयी और करीब 10 साल बाद जब वो एक सफल उद्यमी बन गया तो उसने सोचा क्यों न अपनी गलती का पश्चाताप करने के लिए एक बार फिर उसी आदमी से मिला जाए और उसकी आर्थिक मदद की जाए।

अपनी चमचमाती कार से वह उस खेत के सामने पहुंचा। शिष्य को अपनी आँखों पे यकीन नहीं हो रहा था। वह उजाड़ खेत अब फलों के बागीचे में बदल चुका था। टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला खड़ा था और जहाँ अकेली भैंस बंधी रहती थी वहां अच्छी नस्ल की कई गाएं और भैंस अपना चारा चर रही थीं।

शिष्य ने सोचा कि शायद भैंस के मरने के बाद वो परिवार सब बेच-बाच कर कहीं चला गया होगा और वापस लौटने के लिए वो अपनी कार स्टार्ट करने लगा कि तभी उसे वो दस साल पहले वाला आदमी दिखा।

“शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए, सालों पहले मैं आपसे मिला था।” शिष्य उस आदमी की तरफ बढ़ते हुए बोला।

“नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे अच्छी तरह याद है, आप और आपके गुरु यहाँ आये थे। कैसे भूल सकता हूँ उस दिन को। उस दिन ने तो मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया। आप लोग तो बिना बताये चले गए पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी चट्टान से गिरकर मर गयी। कुछ दिन तो समझ ही नहीं आया कि क्या करें, पर जीने के लिए कुछ तो करना था, सो लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा, उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बोवाई कर दी। सौभाग्य से फसल अच्छी निकल गयी। बेचने पर जो पैसे मिले उससे फलों के बागीचे लगवा दिए और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आस-पास के हज़ार गाँव में सबसे बड़ा फल व्यापारी हूँ। सचमुच, ये सब कुछ ना होता अगर उस भैंस की मौत ना हुई होती। 

“लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।

आदमी बोला, “बिलकुल कर सकता था। पर तब ज़िन्दगी बिना उतनी मेहनत के आराम से चल रही थी, कभी लगा ही नहीं कि मेरे अन्दर इतना कुछ करने की क्षमता है, सो कभी कोशिश ही नहीं की। पर जब भैंस मर गयी तब हाथ-पाँव मारने पड़े और मुझ जैसा गरीब-बेहाल इंसान भी इस मुकाम तक पहुँच पाया।”

आज शिष्य अपने गुरु के उस निर्देश का असली मतलब समझ चुका था और बिना किसी पश्चाताप के वापस लौट पा रहा था।

हम अपनी जॉब से नफरत करते हैं पर फिर भी उसे पकड़े-पकड़े ज़िन्दगी बिता देते हैं, तो कई बार हम बस इसलिए नये बिजनेस के बारे में नहीं सोचते क्योंकि हमारा मौजूदा बिजनेस दाल-रोटी भर का खर्चा निकाल देता है! पर ऐसा करने में हम कभी भी अपने सामर्थ्य का प्रयोग नहीं कर पाते हैं और बहुत सी ऐसी चीजें करने से चूक जाते हैं जिन्हें करने की हमारे अन्दर क्षमता है और जो हमारे जीवन को कहीं बेहतर बना सकती हैं।

शिक्षा:- कई बार हम परिस्थितियों के इतने आदि हो जाते हैं कि बस उसी में जीना सीख लेते हैं, फिर चाहे वो परिस्थितियां बुरी ही क्यों न हों। 

सिर्फ रक्षाबंधन पर ही खुलते है इस मंदिर के द्वार || वंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड || Banshi Narayan Temple, Uttarakhand ||

सिर्फ रक्षाबंधन पर ही खुलते है इस मंदिर के द्वार

 वंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड || Banshi Narayan Temple, Uttarakhand ||

हमारे देश में ऐसे लाखों प्राचीन मंदिर हैं, जिन की कहानी बेहद दिलचस्प है। किसी मंदिर की स्थापित मूर्ति चकित कर देती है, तो कहीं मंदिर की बनावट। आज एक ऐसे अनोखे मंदिर की चर्चा करेंगे, (वंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड) जिसका द्वार सिर्फ एक दिन के लिए रक्षाबंधन के दिन ही खुलता है और बाकी 364 दिन बंद रहता है।

सिर्फ रक्षाबंधन पर ही खुलते है इस मंदिर के द्वार ||  वंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड || Banshi Narayan Temple, Uttarakhand ||

वंशीनारायण मंदिर: उत्तराखंड का एक ऐसा मंदिर जो साल में केवल एक दिन खुलता है

हम जिस मंदिर के बारे में बता रहे हैं वह उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। इस मंदिर का नाम वंशी नारायण मंदिर है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडव काल में हुआ था। यूं तो यह मंदिर पूरे वर्ष बंद रहता है, लेकिन रक्षाबंधन के दिन अर्थात सावन की पूर्णिमा को अवश्य खुलता है। हालांकि इस दिन भी केवल सूरज ढलने के पूर्व ही पूजा अर्चना करने का नियम है। मान्यता है कि इस मंदिर में 364 दिन महर्षि नारद नारायण जी की पूजा अर्चना करते हैं और यहां पर मनुष्य को पूजा करने का अधिकार सिर्फ 1 दिन का ही है।

वर्ष में एक दिन होते हैं भगवान वंशीनारायण के साथ शिव के भी दर्शन

कत्यूरी शैली में बने दस फीट ऊंचे इस मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है। यहां भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में विद्यमान हैं। मंदिर में स्थापित प्रतिमा में भगवान विष्णु और भगवान भोलेनाथ के साथ दर्शन होते हैं।मनुष्य को इस मंदिर में 1 दिन पूजा करने का अधिकार देने के पीछे एक बहुत महत्वपूर्ण कथा है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राजा बलि ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वह उनके द्वारपाल बने। भगवान विष्णु ने राजा बलि के इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और वह राजा बलि के साथ पाताल लोक चले गए।

सिर्फ रक्षाबंधन पर ही खुलते है इस मंदिर के द्वार ||  वंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड || Banshi Narayan Temple, Uttarakhand ||

भगवान विष्णु के कई दिन तक दर्शन ना होने के कारण माता लक्ष्मी परेशान हो गयीं और वह नारद मुनि के पास गयीं। नारद मुनि के पास पहुंचकर माता लक्ष्मी ने पूछा कि भगवान विष्णु कहां है। इस पर नारद मुनि ने कहा कि वह पाताल लोक में गए हैं और द्वारपाल बने हुए हैं। इस पर माता लक्ष्मी अत्यंत परेशान हो गई और नारद मुनि से भगवान विष्णु के वापस आने का उपाय पूछीं। माता लक्ष्मी के भगवान विष्णु को वापस लाने के उपाय के बारे में नारद मुनि ने कहा कि - "हे मां लक्ष्मी आप सावन मास की पूर्णिमा को पताल लोक में जाएं और राजा बली की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध दें और उपहार स्वरूप भगवान विष्णु की मुक्ति मांगें। इसके बाद राजा बलि से भगवान विष्णु को वापस मांग लें।"

सिर्फ रक्षाबंधन पर ही खुलते है इस मंदिर के द्वार

माता लक्ष्मी रक्षाबंधन के दिन राजा बलि के पास गई और राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर भगवान विष्णु को मुक्त कराया। वंशी नारायण मंदिर के संबंध में मान्यता है कि पाताल लोक के बाद भगवान विष्णु सबसे पहले यही प्रकट हुए थे।

सिर्फ रक्षाबंधन पर ही खुलते है इस मंदिर के द्वार ||  वंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड || Banshi Narayan Temple, Uttarakhand ||

यह 8वीं शताब्दी में बना एकल संरचना मंदिर है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। उरगाम घाटी के अंतिम गाँव बांशा से 10 किमी आगे स्थित श्री वंशीनारायण मंदिर (Bansinarayan Temple) की यह यात्रा खड़ी चडाई वाली है। मंदिर तक पहुचने के लिए बांसा से दो पहाड़ की चोटियों को पार कर तीसरे पहाड़ की चोटी तक पहुँचना होता है। इस मार्ग में स्थान स्थान पर कुछ विशिष्ट प्रकार के पक्षियों का कलरव इस शांत वातावरण में सुमधुर संगीत सुनाता हुआ प्रतीत होता है। मंदिर के आसपास ना तो कोई मानव बस्तियाँ हैं और ना ही कोई मानव गतिविधयां। बंशा गांव से बंशी नारायण मंदिर के बीच ना तो कोई बस्ती है ना इंसान। बस नंदादेवी पर्वत श्रृंखला और उसके आसपास के घने जंगल अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे होते हैं। 

वंशीनारायण मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं है

चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित वंशीनारायण (Bansinarayan, Vanshinarayan) मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं है। जिला मुख्यालय गोपेश्वर से उर्गम घाटी तक वाहन से पहुंचने के बाद आगे 12 किलोमीटर का सफर पैदल ही करना है। पांच किलोमीटर दूर तक फैले मखमली घास के मैदानों को पार करने के बाद सामने नजर आता है 1200 वर्ष प्राचीन वंशीनारायण मंदिर।

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Banshi Narayan Temple, Uttarakhand

There are lakhs of such ancient temples in our country, whose story is very interesting. The established idol of a temple surprises, then the structure of the temple somewhere. One such unique temple is Vanshi Narayan Mandir, Uttarakhand, whose gate opens only on the day of Rakshabandhan and remains closed for the remaining 364 days.

Vanshinarayan Temple: One such temple of Uttarakhand which opens only one day in a year

The temple we are talking about is located in Chamoli district of Uttarakhand. The name of this temple is Vanshi Narayan Mandir. According to mythological beliefs, this temple was built during the Pandava period. Although this temple remains closed throughout the year, but it definitely opens on the day of Rakshabandhan i.e. on the full moon of Sawan. However, on this day also, there is a rule to worship only before the sun sets. It is believed that Maharishi Narad Narayan ji is worshiped for 364 days in this temple and here man has the right to worship only for one day.

सिर्फ रक्षाबंधन पर ही खुलते है इस मंदिर के द्वार ||  वंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड || Banshi Narayan Temple, Uttarakhand ||

There are one day in the year, along with Lord Vanshinarayan, Shiva also has darshan.

The sanctum sanctorum of this temple, ten feet high, built in the Katyuri style, is square. Here Lord Vishnu is present in the form of a quadrilateral. There is a darshan with Lord Vishnu and Lord Bholenath in the idol installed in the temple. There is a very important story behind granting the human right to worship for 1 day in this temple. According to the legend, once King Bali requested Lord Vishnu to become his gatekeeper. Lord Vishnu accepted this request of King Bali and he went to Hades with King Bali.

Due to lack of darshan of Lord Vishnu for several days, Goddess Lakshmi got upset and went to Narada Muni. On reaching Narad Muni, Mata Lakshmi asked where is Lord Vishnu. On this Narada Muni said that he has gone to Hades and remains the gatekeeper. On this Mata Lakshmi became very upset and asked Narada Muni the way to return Lord Vishnu. Regarding the way to bring back Lord Vishnu of Mata Lakshmi, Narad Muni said that - "O Mother Lakshmi, you go to Patal Lok on the full moon of Sawan month and tie a protective thread on the wrist of King Bali and as a gift Lord Vishnu's salvation. Ask for it. Then ask King Bali to get Lord Vishnu back."

The gates of this temple open only on Rakshabandhan

Mata Lakshmi went to King Bali on the day of Rakshabandhan and freed Lord Vishnu by tying a protective thread to King Bali. In relation to the Vanshi Narayan temple, it is believed that Lord Vishnu first appeared after Patal Lok.

सिर्फ रक्षाबंधन पर ही खुलते है इस मंदिर के द्वार ||  वंशी नारायण मंदिर, उत्तराखंड || Banshi Narayan Temple, Uttarakhand ||

It is a single structure temple built in the 8th century, dedicated to Lord Vishnu. This journey to the Shri Vansinarayan Temple, situated 10 km ahead of the last village of the Urgam valley, Bansha, is a steep climb. To reach the temple, one has to cross two mountain peaks from Bansa and reach the third mountain top. On this route, the tweet of some specific types of birds seems to be playing melodious music in this peaceful environment. There are neither any human settlements nor any human activities around the temple. There is neither any settlement nor human being between Bansha village to Banshi Narayan temple. Just the Nanda Devi mountain range and its surrounding dense forests offer amazing views.

Reaching Vanshinarayan Temple is not easy.

It is not easy to reach the Vanshinarayan Temple located in the high Himalayan region of Chamoli district. After reaching the district headquarters from Gopeshwar to Urgam Ghati by vehicle, the further 12 km journey has to be done on foot. After crossing the velvety meadows spread up to five kilometers away, 1200 years old Vanshinarayan temple is seen in front.

रक्षाबंधन 2023 || Rakshabandhan 2023

रक्षाबंधन || Rakshabandhan 

 रक्षाबंधन का त्यौहार हिंदू धर्म का ऐसा त्योहार है जिसे भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक माना जाता है । उस दिन भाई अपनी बहन की जीवन भर रक्षा करने का वचन देता है। इस दिन बहने अपने भाई की कलाई पर एक रक्षा सूत्र बांधती हैं,उसे मिठाई खिलाती हैं और भाई की आरती उतारती हैं । इसके बादअपनी बहन को कुछ तोहफा देकर जिन्दगी भर रक्षा करने का वचन देता है । यह त्योहार हर साल बहुत ही पवित्र दिन यानि श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। आम जन मानस में इस त्योहार को राखी के नाम से भी जाना जाता है । इस साल 2023 में राखी 30 और 31 अगस्त को मनाई जाएगी । भद्रा के कारण राखी 30 अगस्त की रात 9 बजे से31 अगस्त की सुबह 7.30 तक मनाई जायगी।

रक्षाबंधन 2023 || Rakshabandhan 2023

राखी का त्यौहार ढेर सारी खुशियां लेकर आता है। रक्षाबंधन शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है रक्षा + बंधन अथार्त् रक्षा का बंधन , यानी इस रक्षा सुत्र को बंध जाने के बाद एक भाई अपनी बहन की रक्षा करने को बाध्य हो जाता है । रक्षाबंधन त्योहार को मनाने की शुरुआत बहुत पौराणिक है । ऐसा कहा जाता है की इस त्योहार को देवी – देवताओं के समय से मनाई जा रहा है । आज अपने ब्लॉग के माध्यम से हम इस त्योहार के कुछ पौराणिक आख्यानों के बारे में बात करेंगे।

एक दिन भगवान श्री गणेश जी अपनी बहन मनसा देवी से रक्षा सूत्र बंधवा रहे थे तभी उनके दोनों पुत्र शुभ और लाभ ने देख लिया और इस रस्म के बारे में पूछा। तब भगवान श्री गणेश ने इसे एक सुरक्षा कवच बताया। उन्होंने बताया की यह रक्षा सूत्र आशीर्वाद और भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है । यह सुन कर शुभ और लाभ ने अपने पिता से ज़िद की कि उन्हें एक बहन चाहिए और अपने बच्चों की जिद के आगे हार कर भगवान गणेश ने अपनी शक्तियों से एक ज्योति उत्पन्न की और अपनी दोनों पत्नियों रिद्धि-सिद्धि की आत्मशक्ति के साथ इसे सम्मिलित किया। उस ज्योति से एक कन्या (संतोषी) का जन्म हुआ और दोनों भाइयों को रक्षाबंधन के मौके पर एक बहन मिली।

रक्षाबंधन 2023 || Rakshabandhan 2023

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार

एक बार की बात है जब असुर राजा बलि के दान धर्म से खुश होकर भगवान विष्णु ने उससे वरदान मांगने को कहा तो राजा बलि ने विष्णु भगवान से अपने साथ पाताल लोक में चलने को कहा और उनके साथ वही रह जाने का वरदान मांगा। तब विष्णु भगवान उनके सात बैकुंठ धाम को छोड़ कर पाताल लोक चले गए। बैकुंठ में माता लक्ष्मी अकेली पड़ गईं और भगवान विष्णु को दोबारा वैकुंठ लाने के लिए अनेक प्रयास करने लगीं। फिर एक दिन मां लक्ष्मी राजा बलि के यहां एक गरीब महिला का रूप धरण कर के रहने लगीं। जब मां एक दिन रोने लगी तब राजा बलि ने उनसे रोने का करण पूछा। मां ने बताया कि उनका कोई भाई नहीं है इसलिए वे उदास हैं। ऐसे में राजा बलि ने उनका भाई बनकर उनकी इच्छा पूरी की और माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा। फिर राजा बलि ने उनसे इस पवित्र मौके पर कुछ मांगने को कहा तो मां लक्ष्मी ने विष्णु जी को अपने वर के रूप में मांग लिया और इस रह श्री विष्णु भगवान बैकुंठ धाम वापस आए।

एक अन्य प्रचलित कथा कहती है कि 

माहाभारत के दौरान एक बार राजसूय यज्ञ के लिए पांडवों ने भगवान कृष्ण को आमंत्रित किया। उस यज्ञ में श्री कृष्ण के चचेरे भाई शिशुपाल भी थे। उस दौरान शिशुपाल ने भगवान कृष्ण का बहुत अपमान किया। जब पानी सिर के ऊपर चला गया तो भगवान कृष्ण को क्रोध आ गया। क्रोध में भगवान श्री कृष्ण ने शिशुपाल पर अपना सुदर्शन चक्र छोड़ दिया लेकिन शिशुपाल का सिर काटने के बाद जब चक्र भगवान श्री कृष्ण के पास लौटा तो उनकी तर्जनी उंगली में गहरा घाव हो गया। यह देख कर द्रौपदी ने अपनी साड़ी से एक टुकड़ा फाड़कर भगवान कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के इस स्नेह को देखकर भगवान कृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और द्रौपदी को वचन दिया कि वे हर स्थिति में हमेशा उनके साथ रहेंगे और हमेशा उनकी रक्षा करेंगे

रक्षाबंधन 2023 || Rakshabandhan 2023

महारानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं की कहानी के अनुसार

जब चित्तौड़ पर सुल्तान बहादुर शाह आक्रमण कर रहे तब महारानी कर्णावती ने अपने राज्य की सुरक्षा के लिए सम्राट हूमायूं को राखी भेजी और उनसे अपनी रक्षा की गुहार लगाई। हुमायूं ने राखी स्वीकार किया और अपने सैनिकों के साथ उनकी रक्षा के लिए चित्तौड़ निकल पड़े मगर हुमायूं के चित्तौड़ पहुंचने से पहले ही रानी कर्णावती ने आत्महत्या कर ली थी।

यम और यमुना की कहानी के अनुसार मृत्यु के देवता यम अपनी बहन यमुना से 12 वर्ष तक मिलने नहीं गये। तब यमुना दुखी हो गई और अपनी मां गंगा से इस बारे में बात की। मां गंगा ने यम तक यह खबर पहुंचाई कि यमुना उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं और यह सुनते यम अपनी बहन युमना से मिलने आए। यम को देखकर यमुना बहुत खुश हुईं और उनके लिए बहुत सारे व्यंजन भी बनाए। यम यह प्रेम भाव देख कर बहुत ख़ुश हुए और उन्होंने यमुना को मनचाहा वरदान मांगने के लिए कहा। इस पर यमुना ने उनसे ये वरदान मांगा कि यम जल्द ही फिर से अपनी बहन के पास आए. यम अपनी बहन के स्नेह को देख कर बहुत खुश हुए।

रक्षाबंधन 2023 || Rakshabandhan 2023

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन काल से ही यह त्योहार भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है। 

आप सब को रक्षाबंधन पर्व की हार्दिक बधाई।

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ || Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ

लखनऊ के चारबाग स्टेशन से दिनांक 28 8 2023 को बड़े ही धूमधाम से रेल कोच रेस्टोरेंट का शुभारंभ हुआ।इस रेस्टोरेंट का उद्घाटन वहां पर आए एक यात्री ने किया। 

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ || Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow

जैसा कि हम सभी जानते हैं लखनऊ अपने नजाकत और लजीज व्यंजन के लिए जाना जाता है। और अब यहां लखनऊ का पहला रेल कोच रेस्टोरेंट खुल गया है। इस रेस्टोरेंट में खास बात यह है, कि यहां देशभर के सभी राज्यों के प्रसिद्ध और जायकेदार खान 24 * 7 उपलब्ध रहेगा। दुनिया भर के कोने-कोने के लोग यहां सातों दिन 24 घंटे जायकेदार खाने का लुत्फ उठा सकेंगे।

यह रेस्टोरेंट लगभग 1600 वर्ग फुट में फैला है और चारबाग मेट्रो और रेलवे स्टेशनों के ठीक बीच में बनाया गया है, इस रेस्‍टोरेंट को एक ट्रेन की बोगी में बनाया गया है, लोग रेस्‍टोरेंट पर सीढ़ियों से चढ़कर जाएंगे और ट्रेन के कोच फूड रेस्टोरेंट में बैठकर खिड़कियों से चारबाग रेलवे स्टेशन का नजारा देख सकेंगे। रेस्‍टोरेंट में एक वक्‍त में 50 लोग बैठकर खाना खा सकेंगे। वहीं 30 से ज्यादा लोग बाहर बैठकर खाना खा सकेंगे। नॉदर्न रेलवे ने इस रेस्‍टोरेंट के लिए अपने पुराने और कबाड़ कोच 5 साल के लिए लीज पर दिए हैं। साथ ही इन्‍हें री डिजाइन करने के लिए परमीशन भी दी है।

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ || Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow

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Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow 

Rail Coach Restaurant was inaugurated with great fanfare on 28 8 2023 from Charbagh station of Lucknow. This restaurant was inaugurated by a passenger who came there.

 As we all know Lucknow is known for its exquisite and delicious food. And now Lucknow's first Rail Coach restaurant has opened here. The special thing in this restaurant is that famous and delicious food from all the states of the country will be available here 24 * 7. People from all corners of the world will be able to enjoy delicious food here 24 hours a day, seven days a week.

रेल कोच रेस्टोरेंट, चारबाग, लखनऊ || Rail Coach Restaurant, Charbagh, Lucknow

 This restaurant is spread over 1600 square feet and is built right in the middle of Charbagh metro and railway stations, this restaurant is built in a train bogie, people will climb the stairs to the restaurant and sit in the train coach food restaurant Will be able to see the view of Charbagh railway station from the windows. At one time 50 people will be able to sit and eat in the restaurant. At the same time, more than 30 people will be able to sit outside and eat food. Northern Railway has given its old and junk coaches on lease for 5 years for this restaurant. Along with this, permission has also been given to redesign them.

चौदह प्राचीन हिन्दू परम्पराएं और उनसे जुड़े लाभ

चौदह प्राचीन हिन्दू परम्पराएं और उनसे जुड़े लाभ

पुराने समय से बहुत सी परंपराएं प्रचलित हैं, जिनका पालन आज भी काफी लोग कर रहे हैं। ये परंपराएं धर्म से जुड़ी दिखाई देती हैं, लेकिन इनके वैज्ञानिक कारण भी हैं। जो लोग इन परंपराओं को अपने जीवन में उतारते हैं, वे स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियों से बचे रहते हैं। यहां जानिए ऐसी ही चौदह प्रमुख परंपराएं, जिनका पालन अधिकतर परिवारों में किया जाता है…

1. एक ही गोत्र में शादी नहीं करना : - कई शोधों में ये बात सामने आई है कि व्यक्ति को जेनेटिक बीमारी न हो इसके लिए एक इलाज है ‘सेपरेशन ऑफ़ जींस’, यानी अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नहीं करना चाहिए। रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नहीं हो पाते हैं और जींस से संबंधित बीमारियां जैसे कलर ब्लाईंडनेस आदि होने की संभावनाएं रहती हैं। संभवत: पुराने समय में ही जींस और डीएनए के बारे खोज कर ली गई थी और इसी कारण एक गोत्र में विवाह न करने की परंपरा बनाई गई।

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2. कान छिदवाने की परंपरा : - स्त्री और पुरुषों, दोनों के लिए पुराने समय से ही कान छिदवाने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि, आज पुरुष वर्ग में ये परंपरा मानने वालों की संख्या काफी कम हो गई है। इस परंपरा की वैज्ञानिक मानयता ये है कि इससे सोचने की शक्ति बढ़ती है, बोली अच्छी होती है। कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित और व्यवस्थित रहता है। कान छिदवाने से एक्यूपंक्चर से होने वाले स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे छोटे बच्चों को नजर भी नहीं लगती है।

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3. माथे पर तिलक लगाना : - स्त्री और पुरुष माथे पर कुमकुम, चंदन का तिलक लगाते हैं। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क यह है कि दोनों आंखों के बीच में आज्ञा चक्र होता है। इसी चक्र स्थान पर तिलक लगाया जाता है। इस चक्र पर तिलक लगाने से हमारी एकाग्रता बढ़ती है। मन बेकार की बातों में उलझता नहीं है। तिलक लगाते समय उंगली या अंगूठे का जो दबाव बनता है, उससे माथे तक जाने वाली नसों का रक्त संचार व्यवस्थित होता है। रक्त कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं।

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4. जमीन पर बैठकर भोजन करना : - जमीन पर बैठकर भोजन करना पाचन तंत्र और पेट के लिए बहुत फायदेमंद है। पालथी मारकर बैठना एक योग आसन है। इस अवस्था में बैठने से मस्तिष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। पालथी मारकर भोजन करते समय दिमाग से एक संकेत पेट तक जाता है कि पेट भोजन ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाए। इस आसन में बैठने से गैस, कब्ज, अपच जैसी समस्याएं दूर रहती हैं।

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5. हाथ जोड़कर नमस्ते करना : - हम जब भी किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते या नमस्कार करते हैं। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क यह है नमस्ते करते समय सभी उंगलियों के शीर्ष आपस में एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। हाथों की उंगलियों की नसों का संबंध शरीर के सभी प्रमुख अंगों से होता है। इस कारण उंगलियों पर दबाव पड़ता है तो इस एक्यूप्रेशर (दबाव) का सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है।

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 साथ ही, नमस्ते करने से सामने वाला व्यक्ति हम लंबे समय तक याद रह पाता है। इस संबंध में एक अन्य तर्क यह है कि जब हम हाथ मिलाकर अभिवादन करते है तो सामने वाले व्यक्ति के कीटाणु हम तक पहुंच सकते हैं। जबकि नमस्ते करने पर एक-दूसरे का शारीरिक रूप से संपर्क नहीं हो पाता है और बीमारी फैलाने वाले वायरस हम तक पहुंच नहीं पाते हैं।

6. भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से : -  धार्मिक कार्यक्रमों में भोजन की शुरुआत अक्सर मिर्च-मसाले वाले व्यंजन से होती है और भोजन का अंत मिठाई से होता है। इसका वैज्ञानिक तर्क यह है कि तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।

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7.पीपल की  पूजा : - आमतौर पर लोगों की मान्यता यह है कि पीपल की पूजा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसका एक तर्क यह है कि इसकी पूजा इसलिए की जाती है, ताकि हम वृक्षों की सुरक्षा और देखभाल करें और वृक्षों का सम्मान करें, उन्हें काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा वृक्ष है, जो रात में भी ऑक्सीजन छोड़ता है। इसीलिए अन्य वृक्षों की अपेक्षा इसका महत्व काफी अधिक बताया गया है।

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8. दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना : - 

दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोने पर बुरे सपने आते हैं। इसीलिए उत्तर दिशा की ओर पैर करके सोना चाहिए। इसका वैज्ञानिक तर्क ये है कि जब हम उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर प्रवाहित होने लगता है। इससे दिमाग से संबंधित कोई बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर भी असंतुतित हो सकता है। दक्षिण दिशा में सिर करके सोने से ये परेशानियां नहीं होती हैं।

चौदह प्राचीन हिन्दू परम्पराएं और उनसे जुड़े लाभ, दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना

9. सूर्य की पूजा करना : - सुबह सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही है। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क ये है कि जल चढ़ाते समय पानी से आने वाली सूर्य की किरणें, जब आंखों हमारी में पहुंचती हैं तो आंखों की रोशनी अच्छी होती है। साथ ही, सुबह-सुबह की धूप भी हमारी त्वचा के लिए फायदेमंद होती है। शास्त्रों की मान्यता है कि सूर्य को जल चढ़ाने से घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान मिलता है। कुंडली में सूर्य के अशुभ फल खत्म होते हैं।

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10. चोटी रखना : - पुराने समय में सभी ऋषि-मुनी सिर पर चोटी रखते थे। आज भी कई लोग रखते हैं। इस संबंध में मान्यता है कि जिस जगह पर चोटी रखी जाती है, उस जगह दिमाग की सारी नसों का केंद्र होता है। यहां चोटी रहती है तो दिमाग स्थिर रहता है। क्रोध नहीं आता है और सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है। मानसिक मजबूती मिलती है और एकाग्रता बढ़ती है।

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11. व्रत रखना : - पूजा-पाठ, त्योहार या एकादशियों पर लोग व्रत रखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार व्रत से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से पाचनतंत्र को आराम मिलता है। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी, मधुमेह आदि रोग होने की संभावनाएं भी कम रहती हैं।

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12. चरण स्पर्श करना : - किसी बड़े व्यक्ति से मिलते समय उसके चरण स्पर्श करने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। यही संस्कार बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे भी बड़ों का आदर करें। इस परंपरा के संबंध में मान्यता है कि मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा हमारे हाथों से सामने वाले पैरों तक पहुंचती है और बड़े व्यक्ति के पैरों से होते हुए उसके हाथों तक पहुंचती है। आशीर्वाद देते समय व्यक्ति चरण छूने वाले के सिर पर अपना हाथ रखता है, इससे हाथों से वह ऊर्जा पुन: हमारे मस्तिष्क तक पहुंचती है। इससे ऊर्जा का एक चक्र पूरा होता है।

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13. मांग में सिंदूर लगाना : - विवाहित महिलाओं के लिए मांग में सिंदूर लगाना अनिवार्य परंपरा है। इस संबंध में तर्क यह है कि सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी (पारा- तरल धातु) होता है। इन तीनों का मिश्रण शरीर के ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है। इससे मानसिक तनाव भी कम होता है।

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14. तुलसी की पूजा : - तुलसी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। शांति रहती है। इसका तर्क यह है कि तुलसी के संपर्क से हमारा इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। यदि घर में तुलसी होगी तो इसकी पत्तियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे कई बीमारियां दूर रहती हैं।

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