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Sunderkand -10

सुंदरकांड 
Hanuman Jayanti 2020: How To Worship Lord Hanuman At Home And Seek ...
हनुमानजी ने लंका जलाई
चौपाई (Chaupai – Sunderkand)
                                      देह बिसाल परम हरुआई।    
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला।
झपट लपट बहु कोटि कराला॥

यद्यपि हनुमानजीका शरीर बहुत बड़ा था परंतु शरीरमें बड़ी फुर्ती थी जिससे वह एक घरसे दूसरे घरपर चढ़ते चले जाते थे॥
जिससे तमाम नगर जल गया। लोग सब बेहाल हो गये और झपट कर बहुतसे विकराल कोटपर चढ़ गये॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
तात मातु हा सुनिअ पुकारा।
एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई।
बानर रूप धरें सुर कोई॥
और सबलोग पुकारने लगे कि हे तात! हे माता! अब इस समयमें हमें कौन बचाएगा॥
हमने जो कहा था कि यह वानर नहीं है, कोई देव वानरका रूप धरकर आया है। सो देख लीजिये यह बात ऐसी ही है॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
साधु अवग्या कर फलु ऐसा।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
और यह नगर जो अनाथके नगरके समान जला है सो तो साधुपुरुषोंका अपमान करनेंका फल ऐसाही हुआ करता है॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि हनुमानजीने एक क्षणभरमें तमाम नगरको जला दिया. केवल एक बिभीषणके घरको नहीं जलाया॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥
महादेवजी कहते है कि हे पार्वती! जिसने इस अग्रिको पैदा किया है उस परमेश्वरका बिभीषण भक्त था इस कारण से उसका घर नहीं जला॥ हनुमानजी ने उलट पलट कर (एक ओर से दूसरी ओर तक) तमाम लंकाको जला कर फिर समुद्रके अंदर कूद पडे॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
दोहा (Doha – Sunderkand)
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ॥26॥
अपनी पूछको बुझाकर, श्रमको मिटाकर (थकावट दूर करके), फिरसे छोटा स्वरूप धारण करके हनुमानजी हाथ जोड़कर सीताजीके आगे आ खडे हुए ॥26॥
जय सियाराम जय जय सियाराम
हनुमानजी लंकासे लौटने से पहले सीताजी से मिले
Ramayan : Sita Hanuman milan Story(katha) in hindi – Page 2 ...
चौपाई (Chaupai – Sunderkand)
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।
जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ।
हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
और बोले कि हे माता! जैसे रामचन्द्रजीने मुझको पहचानके लिये मुद्रिकाका निशान दिया था, वैसे ही आपभी मुझको कुछ चिन्ह दो॥
तब सीताजीने अपने सिरसे उतार कर चूडामणि दिया। हनुमानजीने बड़े आनंदके साथ वह ले लिया॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
कहेहु तात अस मोर प्रनामा।
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
हरहु नाथ सम संकट भारी॥
सीताजीने हनुमानजीसे कहा कि हे पुत्र! मेरा प्रणाम कह कर प्रभुसे ऐसे कहना कि हे प्रभु! यद्यपि आप सर्व प्रकारसे पूर्णकाम हो (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है)॥
हे नाथ! आप दीनदयाल हो, इसलिये अपने विरदको सँभाल कर (दीन दुःखियों पर दया करना आपका विरद है, सो उस विरद को याद करके) मेरे इस महासंकटको दूर करो॥जय सियाराम जय जय सियाराम
तात सक्रसुत कथा सनाएहु।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
हे पुत्र । फिर इन्द्रके पुत्र जयंतकी कथा सुनाकर प्रभुकों बाणोंका प्रताप समझाकर याद दिलाना॥
और कहना कि हे नाथ! जो आप एक महीनेके अन्दर नहीं पधारोगे तो फिर आप मुझको जीती नहीं पाएँगे॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना।
तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥
हे तात! कहना, अब मैं अपने प्राणोंको किस प्रकार रखूँ? क्योंकि तुमभी अब जाने को कह रहे हो॥
तुमको देखकर मेरी छाती ठंढी हुई थी परंतु अब तो फिर मेरेलिए वही दिन हैं और वही रातें हैं॥जय सियाराम जय जय सियाराम
दोहा (Doha – Sunderkand)
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥27॥
हनुमानजीने सीताजीको (जानकी को) अनेक प्रकारसे समझाकर कई तरहसे धीरज दिया और फिर उनके चरणकमलोंमें सिर नमाकर वहांसे रामचन्द्रजीके पास रवाना हुए ॥27॥
हनुमानजीका लंका से वापिस लौटना
हनुमान जी लंका तैरकर गए थे या कि ...
चौपाई (Chaupai – Sunderkand)
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी।
गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा।
सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥
जाते समय हनुमानजीने ऐसी भारी गर्जना की, कि जिसको सुनकर राक्षसियोंके गर्भ गिर गये॥
सपुद्रको लांघकर हनुमानजी समुद्रके इस पार आए। और उस समय उन्होंने किलकिला शब्द (हर्षध्वनि) सब बन्दरोंको सुनाया॥जय सियाराम जय जय सियाराम
(राका दिन पहूँचेउ हनुमन्ता। धाय धाय कापी मिले तुरन्ता॥
हनुमानजीने लंकासे लौटकर कार्तिककी पूर्णिमाके दिन वहां पहुंचे। उस समय दौड़ दौड़ कर वानर बडी त्वराके साथ हनुमानजीसे मिले॥) जय सियाराम जय जय सियाराम
हरषे सब बिलोकि हनुमाना।
नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा।
कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥
हनुमानजीको देखकर सब वानर बहुत प्रसन्न हुए और उस समय वानरोंने अपना नया जन्म समझा॥
हुनमानजीका मुख अति प्रसन्न और शरीर तेजसे अत्यंत दैदीप्यमान देखकर वानरोंने जान लिया कि हनुमानजी रामचन्द्रजीका कार्य करके आए है॥जय सियाराम जय जय सियाराम
मिले सकल अति भए सुखारी।
तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा।
पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
और इसीसे सब वानर परम प्रेमके साथ हनुमानजीसे मिले और अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे कैसे प्रसन्न हुए सो कहते हैं कि मानो तड़पती हुई मछलीको पानी मिल गया॥
फिर वे सब सुन्दर इतिहास पूंछते हुए आर कहते हुए आनंदके साथ रामचन्द्रजीके पास चले॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
तब मधुबन भीतर सब आए।
अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे।
मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥
फिर उन सबोंने मधुवनके अन्दर आकर युवराज अंगदके साथ वहां मीठे फल खाये॥
जब वहांके पहरेदार बरजने लगे तब उनको मुक्कोसे ऐसा मारा कि वे सब वहांसे भाग गये॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
दोहा (Doha – Sunderkand)
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ॥28॥
वहांसे जो वानर भाग कर बचे थे उन सबोंने जाकर राजा सुग्रीवसे कहा कि हे राजा! युवराज अंगदने वनका सत्यानाश कर दिया है। यह समाचार सुनकर सुग्रीवको बड़ा आनंद आया कि वे लोग प्रभुका काम करके आए हैं ॥28॥ जय सियाराम जय जय सियाराम
Benefits of sundar kand | How to do Hanuman worship on Tuesday ...

हल्दी (Turmeric ) के फायदे और गुण || Importances of Turmeric

हल्दी के फायदे 

हल्दी (Turmeric ) के फायदे और गुण || Importances of  Turmeric
                          हल्दी, जिसके बारे में हम सभी जानते हैं। हमारे रसोई घर में यह दाल और सब्जी बनाने में उपयोग होता है। कोरोना काल में ज्यादातर लोग दूध में हल्दी डालकर उपयोग कर रहें हैं। हम हल्दी के बहुत से लाभ पहले से जानते हैं। हल्दी में और भी बहुत मेडिशनल प्रॉपर्टी है, जिसकी चर्चा आज हम यहां करेंगे। 

हल्दी (Turmeric ) के फायदे और गुण || Importances of  Turmeric
#   सुबह के समय हल्दी का गुनगुना पानी पीने से दिमाग तेज और उर्जावान बनता है।

#   रोज यदि हम हल्दी का पानी पीते हैं तो इससे खून में होने वाली गंदगी साफ होती है और खून जमता भी नहीं है। यह खून साफ करता है और दिल को बीमारियों से भी बचाता है।

#   लीवर की समस्या से परेशान लोगों के लिए हल्दी का पानी किसी औषधि से कम नही है। हल्दी के पानी में टाॅक्सिस लीवर के सेल्स को फिर से ठीक करता है। हल्दी और पानी के मिले हुए गुण लीवर को संक्रमण से भी बचाते हैं।
हल्दी (Turmeric ) के फायदे और गुण || Importances of  Turmeric
#   हार्ट की समस्या से परेशान लोगों को हल्दी वाला पानी पीना चाहिए। हल्दी खून को गाढ़ा होने से बचाती है, जिससे हार्ट अटैक की संभावना कम हो जाती है।

#  जब हल्दी के पानी में शहद और नींबू मिलाया जाता है तब यह शरीर के अंदर जमे हुए विषैले पदार्थों को निकाल देता है, जिसे पीने से शरीर पर बढ़ती हुई उम्र का असर नहीं पड़ता है। हल्दी में फ्री रेडिकल्स होते हैं जो सेहत और सौंदर्य को बढ़ाते हैं।

#  शरीर में किसी भी तरह की सजून हो और वह किसी दवाई से ना ठीक हो रही हो तो आप हल्दी वाला पानी का सेवन करें। हल्दी में करक्यूमिन तत्व होता है जो सूजन और जोड़ों में होने वाले असाहय दर्द को ठीक कर देता है। सूजन की अचूक दवा है हल्दी का पानी।

#  चोट लगने पर हल्दी को चूने में मिलाकर लगाने से आराम मिलता है।
हल्दी (Turmeric ) के फायदे और गुण || Importances of  Turmeric
#  गले का किसी भी तरह का रोग हो, जैसे बार- बार खांसी होना, बार -बार सर्दी होना, बच्चों को टॉन्सिलाइटिस हो गई हो तो हल्दी बहुत काम आती है।  हल्दी को गर्म पानी में डालकर ले सकते हैं या गर्म दूध में डालकर ले सकते हैं। हल्दी में शहद मिलाकर ले सकते हैं या देशी गाय का घी मिलाकर ले सकते हैं। गले के सभी रोगों में अद्भुत काम करती है। नियमित रूप से दूध में हल्दी डालकर पीने से रक्त में किसी भी तरह का दोष नहीं आएगा।

#  कहीं चोट लग गई है तो तुरंत हल्दी लगा दीजिए, खून बंद हो जाएगा। हल्दी एंटीवायरल, एंटीबायोटिक, एंटीपायरेटिक और  इन्फ्लेमैट्री  है। ऐसे कई गुण एक साथ हल्दी में है।
हल्दी (Turmeric ) के फायदे और गुण || Importances of  Turmeric
#   टॉन्सिल के लिए सूखी हल्दी आधा चम्मच बच्चे के मुंह के अंदर डाल दें और मुंह बंद कर दें ताकि हल्दी लार के साथ पेट में चली जाए। ऐसा हफ्ते में दो बार करने से टॉन्सिल ठीक हो जाता  है।

#   रंग साफ करने की पूरी दुनिया में हल्दी से अच्छी कोई दूसरी वस्तु नहीं है। नियमित रूप से दूध में डालकर या पानी में डालकर या शहद में मिलाकर लेने से रंग साफ होता है।

#   जिन्हें सूर्य की रोशनी में जाने से त्वचा संबंधी समस्याएं होती हैं, हल्दी लगाने से समस्याएं नहीं होंगी। सन बर्न, सनस्ट्रोक, त्वचा में जलन नहीं होगा।

#  ताजी हल्दी का रस जो हल्दी खेत में निकालने के बाद सीधे आती है, कैंसर के रोग में काम आती है।  इस हल्दी की चटनी बनाकर उसमें से रस निकालकर यही रस कैंसर की बीमारी में काम आता है। गले का कैंसर, पेट का कैंसर, आहार नली का कैंसर ऐसे किसी भी कैंसर के मरीज को हल्दी का रस और शहद मिलाकर देने से कैंसर में बहुत तेज काम करता है। हल्दी में गुड़ मिलाकर या काकवी  मिलाकर भी दे सकते हैं। हल्दी कैंसर से लड़ती है और उसे बढ़ने से भी रोक देती है। हल्दी एंटी कैंसर युक्त होती है। सप्ताह में तीन दिन हल्दी वाला पानी पीने से भविष्य में कैंसर से हमेशा बचे रहेगें। 

Sunday.. इतवार ..रविवार

इतवार (Sunday)

कुदरत ने तो आनंद दिया था 
दुःख हमारी खोज है ❤❤

  इतवार की छुट्टी

चलो आज फिर कुछ गुनगुनाते हैं
इतवार की छुट्टी मजे से मनाते हैं।                  
न ऑफिस की चिंता
               न बिज़नेस का झंझट
न जल्दी  है उठना,
              न नहाने का संकट
बस आज यूं ही आराम  फरमाते हैं 
इतवार की छुट्टी मजे से मनाते हैं।
रसीली जलेबी, तीखे पकौड़े,
           रसना करे इच्छा, छोले भटूरे
दमालू कचौड़ी, इडली और डोसे
          पनीर रोल,पोहे,नरम नरम ढोकले
सब बंदिशें भूल, हम आज उड़ाते हैं
इतवार की छुट्टी मजे से मनाते हैं।

🌼शब्द चाहे कैसा भी हो 
मन खुश करे तो अर्थ, वरना व्यर्थ 🌼


छद्दन्त हाथी की कहानी (Story of the elusive elephant)

छद्दन्त हाथी की कहानी

भारत में प्राचीन काल से ही कहानियां सुनाने का चलन रहा है। हिंदी साहित्य कहानियों से समृद्ध है। पर मोबाइल, कंप्यूटर के इस समय में ये चलन छूटता जा रहा। तो इस परम्परा को छूटने न दीजिये। यहां प्रेरणादायक कहानियों को पढ़कर घर में सुनाइए। 
         जातक कथाओं को आगे बढ़ाते हुए आज एक नई कहानी की चर्चा करते हैं, जिसका शीर्षक है छद्दन्त हाथी।
छद्दन्त हाथी की कहानी (Story of the elusive elephant)

 हिमालय के घने वनों में सफेद हाथियों की दो विशिष्ट प्रजातियां हुआ करती थीं- छद्दन्त और उपोसथ। छद्दन्त हाथियों का रंग सफेद होता था और उनके छ: दांत हुआ करते थे।(ऐसा पाली साहित्य में उल्लिखित है)। छद्दन्त हाथियों का राजा एक कंचन गुफा में निवास करता था। उसके मस्तक और पैर माणिक के समान लाल और चमकीले थे। उसकी दो रानियां थी - महासुभद्दा और चुल्लसुभद्दा।

 एक दिन हाथियों का राजा और उसकी रानियां अपने दास दासियों के साथ एक सरोवर में जल क्रीड़ा कर रहे थे। सरोवर के तट पर फूलों से लगा एक साल वृक्ष भी था। गजराज ने खेल खेल में ही साल वृक्ष की एक शाखा को अपनी सूंड से हिला डाला। संजोग बस वृक्ष के फूल और पराग महासुभद्दा को आच्छादित कर गए। किंतु वृक्ष की सूखी टहनियां और फूल चुल्लसुभद्दा के ऊपर गिरे। चुल्लसुभद्दा ने इस घटना को संयोग ना मानकर, स्वयं को अपमानित माना। नाराज चुल्लसुभद्दा ने उसी समय अपने पति और उनके निवास स्थान का त्याग कर कहीं चली गई। तत्पश्चात छद्दन्तराज के अथक प्रयास के बावजूद भी वह कहीं ढूंढे ना मिली।

 कालांतर में चुल्लसुभद्दा मर कर मद्य राज्य की राजकुमारी बनी और विवाह उपरांत वाराणसी की पटरानी। किंतु छद्दन्तराज के प्रति उसका विषाद और रोष इतना प्रबल था कि पुनर्जन्म के बाद भी वह प्रतिशोध की आग में जलती रही। अनुकूल अवसर मिलने पर उसने राजा के छद्दन्त के दंत प्राप्त करने को उकसाया। फलत: राजा ने उक्त उद्देश्य से कुशल निषादों की एक टोली बनाई। जिसका नेता सोनुत्तर को बनाया और उन्हें छद्दन्त के दांतो को प्राप्त करने के लिए टोली के साथ भेज दिया।
छद्दन्त हाथी की कहानी (Story of the elusive elephant)

7 वर्ष, 7 महीने और 7 दिनों के पश्चात सोनुत्तर छद्दन्तराज के निवास स्थान पर पहुंचा। वहां पहुंचकर वह चुपचाप पेड़ों के झुरमुट में छिप गया। छद्दन्तराज जब वहां आया तो सोनुत्तर ने उस पर विष- बुझा बाण चलाया। बाण से घायल छद्दन्तराज ने जब झुरमुट में छिपे सोनुत्तर को हाथ में धनुष लिए देखा, तो वह उसे मारने के लिए दौड़ा। किंतु सोनुत्तर ने संन्यासियों का गेरुआ वस्त्र पहन रखा था, जिसके कारण गजराज ने निषाद को जीवनदान दे दिया। अपने प्राणों की भीख पाकर सोनुत्तर का हृदय परिवर्तन हुआ। भाव विह्वल सोनुत्तर ने छद्दन्तराज को सारी बात बताई कि क्यों वह उसके दांतो को प्राप्त करने के उद्देश्य से वहां आया था।

 चूंकि छद्दन्तराज के मजबूत दांत सोनुत्तर नहीं काट सकता था इसलिए छद्दन्त मृत्यु पूर्व स्वयं ही अपनी सूंड से अपने दांत काट कर सोनुत्तर को दे दिए।

 वाराणसी लौटकर सोनुत्तर ने जब छद्दन्त के दांत रानी को दिखलाएं और वहां घटित सारी बातें रानी को कह सुनाई तो रानी छद्दन्त की मृत्यु के आघात को संभाल ना सकी और तत्काल मर गई।

Moral/ शिक्षा  : बदले की आग सिर्फ नुकसान ही पहुँचाती है। अतः क्षमाशील बनें। 

English Translate

Story of the elusive elephant

There has been a trend in India to tell stories since ancient times. Hindi literature is rich in stories. But in this time of mobile, computer, this trend is being left out. So do not let this tradition go unchallenged. Listen to inspiring stories read at home here.
        
 The Jatakas carry forward the stories and discuss a new story, titled Chaddhant Elephant. There were two distinct species of white elephants in the dense forests of the Himalayas - Chadant and Uposath. The elephant elephants were white in color and had six teeth (this is mentioned in Pali literature). The king of the elusive elephants resided in a Kanchan cave. His forehead and feet were red and shiny like rubies. She had two queens - Mahasubhadda and Chullasubhadda.

छद्दन्त हाथी की कहानी (Story of the elusive elephant)

 One day the king of elephants and his queens along with their slave maids were playing water in a lake. There was also a year tree planted with flowers on the banks of the lake. Gajraj shook a branch of the Sal tree with his trunk while playing sports. Sanjog just covered the flowers of the tree and the pollen Mahasubhadda. But the dry twigs and flowers of the tree fell on the chullasubhadda. Chullasubhadda considered the incident to be a humiliation, not a coincidence. Angry Chullasubhadda left her husband and her place of residence at the same time and went somewhere. After that, despite the untiring efforts of Chaddantraj, she could not be found anywhere.

 Later, Chullasubhadda died and became the princess of the Madya kingdom and after marriage Varanasi's queen. But her sadness and anger towards Chaddantraj was so strong that even after rebirth she kept burning in the fire of vengeance. On getting a favorable opportunity, he encouraged the king to get the dental teeth. As a result, the king formed a team of skilled Nishad for the purpose. Whose leader made Sonusad and sent him with the team to get the teeth of Chaddant.

छद्दन्त हाथी की कहानी (Story of the elusive elephant)

After 7 years, 7 months and 7 days, Sonush reached the residence of Chaddantraj. On reaching there, he hid quietly in the clump of trees. When Chaddantraj came there, Sonusad fired a poison-fired arrow at him. When Chadantraj, who was wounded by the arrow, saw Sonushud hidden in the clump with a bow in his hand, he ran to kill him. But Sonusad was wearing ocher robes of ascetics, due to which Gajraj gave life to Nishad. Sonshud changed his heart after begging for his life. The emotionless son-in-law told Chaddantraj why he had come there for the purpose of getting his teeth.

 Since the strong teeth of Chaddantraj could not bite Sonusv, so before he died, Chadantraj himself cut his teeth with his trunk and gave it to Sonudev.

 On returning to Varanasi, when Sonush showed the teeth of Chaddant to the queen and narrated all the things that happened to the queen, the queen could not handle the trauma of Chaddant's death and died instantly.

Moral / Education:

 The fire of revenge only hurts. So be forgiving.

Ayurveda The Synthesis of Yoga and Natural Remedies-31-Importances of Lime (chuna)

चूने का महत्व



चूना 70 बीमारियां ठीक करता है।
पीलिया जॉन्डिस में गेहूं के दाने के बराबर चूना गन्ने के रस में मिलाकर पीने से फायदा होता है। चूना गन्ने के रस में पीने से साल डेढ़ साल में ही बीमारी ठीक हो जाती है। 



#  माताओं के लिए भी यह काम का है, लंबाई बढ़ाने के लिए चूना गेहूं के दाने के बराबर दाल में ले लें।

#  चुने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

#  कम बुद्धि वाले बच्चों के लिए भी चूना उपयोगी है।

#   नाटे बच्चों के लिए जो 21 साल से कम है, लंबाई बढ़ाने में मदद करता है।

#   मासिक चक्र की सबसे अच्छी दवा है जिन माताओं की उम्र 45- 50 वर्ष से अधिक हो गई है और उनका मासिक धर्म बंद हो गया हो तो उनकी सबसे अच्छी दवा है।

# चूना घुटने का दर्द भी ठीक करता है। कमर दर्द, कंधे का दर्द, रीढ़ की हड्डी की सभी बीमारियां चूना से ठीक होती है। टूटी हड्डी को जोड़ने की ताकत सबसे ज्यादा चूना में है। चूना हमेशा सबेरे खाली पेट ही लें।


# मुंह में ठंडा - गरम पानी लगता है तो चूना खाईऐ। मुंह में छाले है, चूना का पानी पीजिए तुरंत ठीक हो जाएंगे। खून कम होने पर चूना जरुर लेना चाहिए। एनीमिया बीमारी में अनार के रस में चूना खाना चाहिए।

# तंबाकू के साथ चूना नहीं खाना चाहिए। पान चूना का हो कत्था  सुपारी नहीं होनी चाहिए। कत्था केंसर करता है। पान के साथ चूना, सौंफ, इलायची, लौंग केसर मिला सर खाना चाहिए।

# सायटिका में चूना बहुत अच्छा काम करता है। घुटने के घिसाव आने पर भी चूना फायदा करता है। इसमें हार सिंगार के पत्तों का काढ़ा भी बहुत उपयोगी होता है। बाल मजबूत रखने हो तो चूना खाइए। आंखों की रोशनी बढ़ानी है तो चूना खाइए। चूना शरीर का रेजिस्टेंस बढ़ाता है। हड्डीयां मजबूत करता है व चूना खून बढ़ाता है।

# कैल्शियम के शरीर में होने से ही शरीर के दूसरे पोषक तत्व शरीर में काम कर पाते हैं। सबसे ज्यादा कैल्शियम दूध में है। इसके बाद घी और इसके बाद मठ्ठा मैं है। छाछ, मक्खन और घी इन सब में भरपूर कैल्शियम है। सभी खट्टे फलों में कैल्शियम होता है। केले मैं सभी फलों से ज्यादा कैल्शियम होता है। इन सब से मिलने वाला कैल्शियम 40 से 45 वर्ष तक शरीर की बायोकेमिस्ट्री के हिसाब से मिलता है। यानि जब तक शरीर के सभी संत रखी थी काम करते हैं।


# चूना हमेशा गेहूं के दाने (एक ग्राम) के बराबर ही ले। चूना दही, पानी,छाछ, दाल आदी चीजो के साथ ले सकते हैं लेकिन दूध को छोड़कर। पुरुषों के लिए भी 45 वर्ष के बाद कैल्शियम की पूर्ति नहीं हो पाती है। छूना पुरुषों को 45 वर्ष के बाद अवश्य लेता चाहिए।

# जिन्हें दिन भर नींद आती है वह छूना खाएं। हाथ पैर सुन्न हो जाते हैं तो चूना खाते रहे। कभी भी चूना अकेले ना ले यानी पानी या किसी वस्तु में मिलाकर लें दूध को छोड़।

# पान खाने की परंपरा पूरे भारत में विकसित है। अर्थात यह यहां की सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा है। पान हमेशा छूना लगा कर खाएं और खाना खाने के बाद खाएं। चूना सबसे अच्छी वात नाशक औषधि है। कैल्शियम की कम से कम से कम 50 बीमारीयां आपके शरीर में आ जाती है जैसे हड्डियों से जुड़ी हुई जितनी विकृतियां है सब आ सकती हैं। मांसपेशियों की जितनी भी विकृतियां हैं सब आ सकती हैं। रखते आकाश के बहुत सारे रो हो सकते हैं।

# बुद्धि विकसित करने के लिए, जोड़ों के दर्द के लिए, आंखों की रोशनी के लिए, हड्डियों की कमजोरी के लिए, बाल झड़ने से रोकने के लिए, चूना अच्छा होता है। जिनका उम्र की वजह से मानसिक चक्र बंद हो रहा हो, अत्यधिक आलस्य हो, दांत की सभी समस्याओं के लिए, हड्डियों में आवाज आती हो, इन सभी समस्याओं में चुनाव उपयोगी है।  चूना कनक (गेहूं) के बराबर से ज़्यादा नहीं खाना है। चूने के पानी से अच्छा है चूना लेना।


सावधानी:- पथरी के रोगी चूने का सेवन ना करें।

कुएं का पानी की कहानी - Water In The Well - Kuwe ke pani ki kahani

कुएं का पानी की कहानी 

कुएं का पानी की कहानी  (Water In The Well)

              एक किसान बहुत परेशान था। उसे अपने खेतों को सींचने के लिए पानी की जरूरत थी। इसलिए, वह कई दिनों से अपनी जमीन के आसपास किसी कुएं की तलाश कर रहा था। इसी तलाश में वह घूम ही रहा था कि अचानक उसे एक कुआं दिखा। यह कुआं उसके खेतों से बहुत नजदीक था। इसलिए, किसान बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि अब उसकी परेशानी खत्म हो गई। यह सोचकर वह खुशी-खुशी घर चला गया।

              अगले दिन वह पानी लेने कुएं पर पहुंचा। जैसे ही उसने कुएं के नजदीक रखी बाल्टी कुएं में डाली, वहां एक आदमी आ धमका। वह किसान से बोला, यह कुआं मेरा है। तुम इससे पानी नहीं ले सकते। अगर तुम इस कुएं से पानी लेना चाहते हो, तो तुम्हें इस कुएं को खरीदना होगा।

           यह बात सुनकर किसान कुछ देर रुका और फिर मन ही मन सोचने लगा कि अगर मैं इस कुएं को खरीद लूं, तो मुझे कभी पानी की कमी नहीं होगी और न ही मुझे पानी के लिए इधर-उधर भटकना पड़ेगा। फिर क्या था, दोनों के बीच एक रकम तय हुई। किसान के पास उतने पैसे तो थे नहीं, लेकिन वह यह मौका छोड़ना नहीं चाहता था। इसलिए, किसान ने उस आदमी को अगले दिन वह रकम देने का वादा किया और घर की ओर चल दिया।

           किसान के लिए कुआं खरीदने का यह अच्छा मौका था। इसलिए, वह इस काम में जरा भी देर नहीं करना चाहता था। घर पहुंचते ही उसने अपने करीबियों और दोस्तों से इस बारे में बात की और कुएं के लिए तय हुई रकम का इंतजाम करने में जुट गया। थोड़ी भागदौड़ और कोशिश के बाद आखिरकार उसने वह रकम जमा कर ली। अब वह पूरी तरह से निश्चिंत हो चुका था कि उसे कुआं खरीदने से कोई नहीं रोक सकता।जमा हुए पैसों को लेकर वह फिर घर चल दिया। उसे बड़ी बेसब्री से इंतजार था कि कब रात खत्म होगी और वह कुआं खरीदने जाएगा। इसी सोच में वह पूरी रात सो नहीं सका। अगले दिन सुबह होते ही वह कुआं खरीदने निकल पड़ा।
कुएं का पानी की कहानी  (Water In The Well)
            उस आदमी के घर पहुंच किसान ने उसके हाथ पर पैसे रखे और कुएं को खरीद लिया। अब तो कुआं किसान का हो गया था तो फिर उसने पानी निकालने में देर नहीं की। जैसे ही किसान ने कुएं से पानी निकालने के लिए बाल्टी उठाई, उस आदमी ने फिर बोला ठहरो, तुम इस कुएं से पानी नहीं निकाल सकते हो। मैंने तुम्हें कुआं बेचा है, कुएं का पानी अभी भी मेरा है। किसान मायूस हो गया और न्याय के लिए राजा के दरबार में शिकायत करने पहुंच गया।
             मालूम है उस राजा का नाम क्या था? राजा अकबर। राजा अकबर ने उस किसान की पूरी कहानी सुनी और फिर उस आदमी को दरबार में बुलाया, जिसने वह कुआं बेचा था। राजा का फरमान सुनते ही वह आदमी भागा-भागा दरबार में हाजिर हो गया। राजा ने उससे पूछा, जब तुमने इस किसान को अपना कुआं बेच दिया, तो फिर इसे पानी क्यों नहीं लेने दे रहे हो।

             आदमी बोला, महाराज मैंने इसे केवल कुआं बेचा था, पानी नहीं। यह बात सुनकर राजा भी सोच में पड़ गए। उन्होंने कहा कि बात तो यह पते की कह रहा है, कुआं बेचा है, पानी तो नहीं। काफी देर सोचने के बाद जब इस समस्या को सुलझाने में वह नाकाम हो गए, तो उन्होंने बीरबल को बुलाया।

            बीरबल बहुत ही बुद्धिमान था। इसलिए, राजा अकबर किसी भी मामले पर फैसला लेने से पहले उसकी राय जरूर लेते थे। बीरबल ने एक बार फिर दोनों से उनकी समस्या पूछी। पूरी बात जानने के बाद बीरबल ने उस आदमी से कहा ठीक है, तुमने कुआं बेचा पानी नहीं। फिर तुम्हारा पानी किसान के कुएं में क्या कर रहा है? कुआं तुम्हारा नहीं है, फौरन अपने पानी को कुएं से बाहर निकालो। बीरबल का इतना कहते ही, उस आदमी को समझ आ गया कि अब उसकी चालाकी किसी काम नहीं आने वाली। उसने राजा से फौरन माफी मांगी और माना कि कुएं के साथ उसके पानी पर भी किसान का पूरा अधिकार है।

       यह देखकर राजा अकबर ने बीरबल की बुद्धिमानी की तारीफ की और कुआं बेचने वाले आदमी पर धोखेबाजी के लिए जुर्माना लगाया।

Moral/शिक्षा:- 
किसी को भी अपने आपको दूसरे से अधिक चालाक नहीं समझना चाहिए। साथ ही धोखा देने की आदत से भी दूर रहना चाहिए।

English Translate

Story of well water


               One farmer was very upset.  He needed water to irrigate his fields.  Therefore, he had been searching for a well around his land for several days.  He was roaming around in search of this, suddenly he saw a well.  This well was very close to his fields.  Therefore, the farmer was very happy.  He thought that now his troubles were over.  Thinking that he went home happily.

               The next day he reached the well to get water.  As soon as he poured the bucket near the well into the well, a man came there.  He said to the farmer, this well is mine.  You cannot take water from it.  If you want to take water from this well, then you have to buy this well.

            Hearing this, the farmer stopped for some time and then started thinking that if I buy this well, I will never be short of water nor do I have to wander around for water.  What was there then, a sum was fixed between the two.  The farmer did not have that much money, but he did not want to miss this opportunity.  Therefore, the farmer promised the man the next day he would give the money and walked towards the house.

            This was a good opportunity for the farmer to buy a well.  Therefore, he did not want to delay this task at all.  As soon as he reached home, he talked to his close friends and friends about this and started arranging the amount fixed for the well.  After a bit of running and trying, he finally collected that amount.  Now he was completely sure that no one could stop him from buying a well. He again went home with the accumulated money.  He waited impatiently when the night would end and he would go to buy the well.  In the same thinking, he could not sleep the whole night.  The next day, as soon as dawn, he went out to buy a well.


कुएं का पानी की कहानी  (Water In The Well)

             The farmer reaching the man's house placed the money on his hand and bought the well.  Now the well had become the farmer, so he did not delay in extracting water.  As soon as the farmer lifted the bucket to draw water from the well, the man said again, you cannot remove water from this well.  I have sold you a well, the water of the well is still mine.  The farmer became disheartened and came to the king's court to complain for justice.

              Do you know what the name of that king was?  King Akbar.  King Akbar heard the whole story of that farmer and then called the man in the court, who had sold the well.  On hearing the king's decree, the man ran away to the court.  The king asked him, when you sold your well to this farmer, then why are you not letting it take water.

              The man said, Maharaj, I had sold only a well, no water.  Hearing this, the king too got confused.  He said that this thing is saying about the address, well is sold, no water.  After thinking long enough when he failed to solve the problem, he called Birbal.

             Birbal was very intelligent.  Therefore, King Akbar used to take his opinion before deciding on any matter.  Birbal once again asked both of them their problems.  After knowing the whole thing, Birbal said to the man, OK, you sold a well, not water.  Then what is your water doing in the farmer's well?  The well is not yours, immediately take your water out of the well.  As soon as Birbal had said this, the man understood that his cunning would no longer be of any use.  He immediately apologized to the king and believed that along with the well, the farmer had full rights over his water too.

        Seeing this, King Akbar praised the wisdom of Birbal and fined him for cheating on the man selling the well.

कुएं का पानी की कहानी  (Water In The Well)

 Moral / Education: -

 No one should consider themselves smarter than others.  Also, you should stay away from the habit of cheating.

Ayurveda The Synthesis of Yoga and Natural Remedies-30-Paralysis

लकवा /पक्षाघात
Paralysis Or Lakwa Attack, Signs And Symptoms, Causes, Risk ...
          लकवा पक्षाघात होने पर रोगी का आधा शरीर संवेदनहीन हो जाता है ।इसमें स्नायु शिथिल हो जाते हैं शरीर का आधा भाग टेढ़ा हो जाता है।किसी किसी का पूरा शरीर पैरालिसिस का शिकार हो जाता है  तो किसी को एक अंग में होता है। उस भाग में सुन्नता रहती है तथा छूने पर कोई संवेदना नहीं होती।  दिमाग भी काम करना कम कर देता है।
लकवा होने का कारण :-(Causes Of  Paralysis):-
#  पेट में अधिक गैस बनने
#  मस्तिष्क पर वायु का दबाव पड़ने
#  हृदय पर वायु का दबाव  बढ़ने से शरीर पर वायु का झटका लगता है
#  इसी के परिणाम स्वरूप व्यक्ति लकवे का शिकार हो जाता है।
#  मस्तिष्क में चोट।
लकवा का घरेलू उपचार (Home Remedies For Paralysis):-
PARALYSIS पक्षाघात (लकवा) का इलाज़ ...
#   राई और अकरकरा को बराबर मात्रा लेकर पीस लें और चूर्ण बनाएं तथा उसे शहद में मिलाकर पेस्ट बनाएं और दिन में तीन बार जीभ पर मले, लकवे की शिकायत दूर होगी। 
#   250 मिलीलीटर गाय के दूध में 8 से 10 लहसुन की कलियां डालकर उबालें।  गाढ़ा होने पर रोगी को पिलाएं। बीमारी में आराम मिलेगा। 
#  सोंठ और उड़द उबालकर उसका पानी पीने से लकवे में काफी लाभ होता है। 
#  एक चम्मच कपास की जड़ का चूर्ण शहद में मिलाकर चाटने से लाभ मिलता है। 
#  लहसुन की कलियों को पीसकर शहद में मिलाकर चाटे।

#  उड़द, कौंच के बीज, एरंड की जड़, बला, हींग, सेंधा नमक और थोड़ा शहद सभी बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बनाएं और रोगी को पिलाएं। बीमारी में आराम मिलेगा। 
#   250 ग्राम सरसों के तेल में थोड़ी काली मिर्च पीसकर डालें और मालिश करें। 
#   सन के बीजों का चूर्ण शहद में मिलाकर रोगी को चटाने से आराम मिलेगा। 
#  तुलसी के 8 से 10 पत्ते सेंधा नमक और दही की चटनी बनाकर लकवे वाले स्थान पर लेप करें। 
#  हमेशा शाकाहारी भोजन दें। चाय कॉफी कभी मत दें। 
#  गाय का घी दो-दो बूंद रात में सोते समय थोड़ा गर्म करके डाल दें। मस्तिष्क में जमे हुए खून को निकालने की ताकत गाय के घी में है। 
#  आर एच यू एस टी ओ एक्स थर्टी 15:15 मिनट पर तीन बार दो-दो बूंद जीभ पर कम से कम 1 महीने तक सुबह दोपहर शाम। 
#  कॉस्टिकम 1:00 एम दूसरे दिन दो-दो बूंद तीन बार दें आधे घंटे या पौने घंटे के अंतर पर हफ्ते में एक दिन देनी चाहिए दो-तीन महीने में पूरी तरह लकवा ठीक हो सकता है। 
        यह जानकारी श्री राजीव दिक्षित द्वारा लिखित भारतीय चिकित्सा से ली गई है, जो कि महर्षि वाग्भट्ट जी द्वारा रचित अष्टांग हृदयम के सूत्रों पर आधारित है। चूँकि राजीव दीक्षित होम्योपैथ द्वारा भी इलाज करते थे तो यहां कुछ होम्योपैथिक दवाइयों की चर्चा भी की गई है .