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संसार पूजता जिन्हें तिलक

संसार पूजता जिन्हें तिलक

Rupa Oos ki ek Boond

"छोटी सोच शंकाओ को जन्म देती है, 
जबकि बड़ी सोच समाधान को..❤"

संसार पूजता जिन्हें तिलक,

रोली, फूलों के हारों से ,

मैं उन्हें पूजता आया हूँ

बापू ! अब तक अंगारों से


अंगार,विभूषण यह उनका

विद्युत पीकर जो आते हैं

ऊँघती शिखाओं की लौ में

चेतना नई भर जाते हैं .


उनका किरीट जो भंग हुआ

करते प्रचंड हुंकारों से

रोशनी छिटकती है जग में

जिनके शोणित के धारों से .


झेलते वह्नि के वारों को

जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर

सहते हीं नहीं दिया करते

विष का प्रचंड विष से उत्तर .


अंगार हार उनका, जिनकी

सुन हाँक समय रुक जाता है

आदेश जिधर, का देते हैं

इतिहास उधर झुक जाता है


अंगार हार उनका की मृत्यु ही

जिनकी आग उगलती है

सदियों तक जिनकी सही

हवा के वक्षस्थल पर जलती है .


पर तू इन सबसे परे ; देख

तुझको अंगार लजाते हैं,

मेरे उद्वेलित-जलित गीत

सामने नहीं हों पाते हैं .

-रामधारी सिंह "दिनकर"

Rupa Oos ki ek Boond
"ज़िद्दी बनना सीखो, 
क्योकि कोई भी इंसान एक रात में सफल नहीं होता..❤"

बोलने वाली गुफा : पंचतंत्र || Bolne Wali Gufa : Panchtantra ||

बोलने वाली गुफा

अनागतं यः कुरुते स शोभते 

आनेवाले संकट को देखकर अपना भावी कार्यक्रम निश्चित करने वाला सुखी रहता है।

बोलने वाली गुफा : पंचतंत्र || Bolne Wali Gufa : Panchtantra ||

एक जंगल में खरनखर नाम का शेर रहता था। एक बार इधर-उधर बहुत दौड़-धूप करने के बाद उसके हाथ कोई शिकार नहीं आया। भूख-प्यास से उसका गला सूख रहा था। शाम होने पर उसे एक गुफा दिखाई दी। वह उस गुफा के अन्दर घुस गया और सोचने लगा, रात के समय रहने के लिए इस गुफा में कोई जानवर अवश्य आएगा, उसे मारकर भूख मिटाऊँगा। तब तक इस गुफा में ही छिपकर बैठता हूँ।

इस बीच उस गुफा का अधिवासी दक्षिपुच्छ नाम का एक गीदड़ वहीं आ गया। उसने देखा, गुफा के बाहर शेर के पदचिन्हों की पंक्ति है। पदचिन्ह गुफा के अन्दर तो गए थे, लेकिन बाहर नहीं आए थे। गीदड़ ने सोचा, मेरी गुफा में कोई शेर गया अवश्य है; लेकिन वह बाहर आया या नहीं, इसका पता कैसे लगाया जाए। अन्त में उसे एक उपाय सूझ गया। गुफा के द्वार पर बैठकर वह किसी को सम्बोधन कर पुकारने लगा - मित्र! मैं आ गया। तूने मुझे वचन दिया था कि मैं आऊँगा तो तू मुझसे बात करेगा। अब चुप क्यों है? गीदड़ की पुकार सुनकर शेर ने सोचा, शायद वह गुफा गीदड़ के आने पर खुद बोलती है और गीदड़ से बात करती है, जो आज मेरे डर से चुप है। इसकी चुप्पी से गीदड़ को मेरे यहाँ होने का सन्देह हो जाएगा। इसलिए मैं स्वयं बोलकर गीदड़ को जवाब देता हूँ। यह सोचकर शेर स्वयं गरज उठा।

शेर की गर्जना सुनकर गुफा भयंकर आवाज़ से गूँजी उठी। गुफा से दूर के जानवर भी डर से इधर-उधर भागने लगे। गीदड़ भी गुफा के अन्दर से आती शेर की आवाज़ सुनकर वहाँ से भाग गया। अपनी मूर्खता से शेर ने स्वयं ही उस गीदड़ को भगा दिया जिसे पास लाकर वह खाना चाहता था। उसने यह न सोचा कि गुफा कभी नहीं बोल सकती; और गुफा का बोल सुनकर गीदड़ का सन्देह पक्का हो जाएगा।

रक्ताक्ष ने उक्त कहानी कहने के बाद अपने साथियों से कहा कि ऐसे मूर्ख समुदाय में रहना विपत्ति को पास बुलाना है। उसी दिन परिवार समेत रक्ताक्ष वहाँ से दूर किसी पर्वत कन्दरा में चला गया।

रक्ताक्ष के विदा होने पर स्थिरजीवी बहुत प्रसन्न होकर सोचने लगा, यह अच्छा ही हुआ कि रक्ताक्ष चला गया। इन मूर्ख मन्त्रियों में अकेला वही चतुर और दूरदर्शी था।

रक्ताक्ष के जाने के बाद स्थिरजीवी ने उल्लुओं के नाश की तैयारी पूरे जोर से शुरू कर दी। छोटी-छोटी लकड़ियाँ चुनकर वह पर्वत की गुफा के चारों ओर रखने लगा। जब पर्याप्त लकड़ियाँ एकत्र हो गई तो वह एक दिन सूर्य के प्रकाश में उल्लुओं के अन्धे होने के बाद अपने पहले मित्र राजा मेघवर्ण के पास गया और बोला- मित्र! मैंने शत्रु को जलाकर भस्म कर देने की पूरी योजना तैयार कर ली है। तुम सभी अपनी चोंचों में एक-एक जलती लकड़ी लेकर उलूकराज के दुर्ग के चारों ओर फैला दो। दुर्ग जलकर राख हो जाएगा। शत्रुदल अपने ही घर में जलकर नष्ट हो जाएगा।

यह बात सुनकर मेघवर्ण बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्थिरजीवी से कहा- महाराज, कुशल-क्षेम से तो रहे, बहुत दिनों के बाद आपके दर्शन हुए हैं।

स्थिरजीवी ने कहा- वत्स! यह समय बातें करने का नहीं, यदि किसी शत्रु ने वहाँ जाकर मेरे यहाँ आने की सूचना दी तो बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा। शत्रु कहीं दूसरी जगह भाग जाएगा। जो काम शीघ्रता से करने योग्य हो, उसमें विलम्ब नहीं करना चाहिए। शत्रुकुल का नाश करके फिर शान्ति से बैठकर बातें करेंगे।

मेघवर्ण ने भी यह बात मान ली। सभी कौवे अपनी चोंचों में एक-एक जलती हुई लकड़ी लेकर शत्रु-दुर्ग की ओर चल पड़े और वहाँ जाकर लकड़ियाँ दुर्ग के चारों ओर फैला दीं। उल्लुओं के घर जलकर राख हो गए और सारे उल्लू अन्दर की तड़पकर मर गए।

इस प्रकार उत्तुओं का वंशनाश करके मेघवर्ण वायसराय फिर अपने पुराने पीपल के वृक्ष पर आ गया। विजय के उपलक्ष्य में सभा बुलाई गई। स्थिरजीवी को बहुत सा पुरस्कार देकर मेघवर्ण ने उससे पूछा- महाराज ! आपने इतने दिन शत्रु के दुर्ग में किस प्रकार व्यतीत किए? शत्रु के बीच रहना तो बड़ा संकटापन्न है। हर समय प्राण गले में अटके रहते हैं।

स्थिरजीवी ने उत्तर दिया-आपकी बात ठीक है, किन्तु मैं तो आपका सेवक हैं। सेवक को अपनी तपश्चर्या के अन्तिम फल का इतना विश्वास होता है कि वह क्षणिक कष्टों की चिन्ता नहीं करता। इसके अतिरिक्त मैंने यह देखा कि आपके प्रतिपक्षी उलूकराज के मन्त्री महामूर्ख हैं। एक रक्ताक्ष ही बुद्धिमान् था, वह भी उन्हें छोड़ गया। मैंने सोचा, यही समय बदला लेने का है। शत्रु के बीच विचरने वाले गुप्तचर को मान-अपमान की चिन्ता छोड़नी ही पड़ती है। वह केवल अपने राजा का स्वार्थ सोचता है। मान-मर्यादा की चिन्ता का त्याग करके वह स्वार्थ साधन के लिए चिन्ताशील रहता है। अवसर देखकर उसे शत्रु को भी पीठ पर उठाकर चलना चाहिए, जैसे काले नाग ने मेढकों को पीठ पर उठाया था और सैर कराई थी।

मेघवर्ण ने पूछा- वह कैसे? स्थिरजीवी ने साँप और मेढकों की यह कहानी सुनाई:

स्वार्थ सिद्धि परम लक्ष्य

To be continued ...


दुर्गावती देवी या दुर्गा भाभी

दुर्गावती देवी या  दुर्गा भाभी

आज एक ऐसी विदुषी महिला के बारे में बात करेंगे, जिन्हें इतिहास के पन्नों में उचित स्थान ना मिल सका, जिन्होंने आजाद भारत के लिए सीखा था बम बनाना और जिनसे अंग्रेज भी खाते थे खौफ, यह दुर्गा भाभी हैं, वही दुर्गा भाभी जिन्होंने साण्डर्स वध के बाद राजगुरू और भगतसिंह को लाहौर से अंग्रेजों की नाक के नीचे से निकालकर कोलकत्ता ले गयीं। इनके पति क्रन्तिकारी भगवती चरण वोहरा थे। ये भी कहा जाता है कि चंद्रशेखर आजाद के पास आखिरी वक्त में जो माउजर था, वो भी दुर्गा भाभी ने ही उनको दिया था। 

क्रांतिकारी वीरांगना जो अंग्रेजों के लिए वाकई बन जाती थीं रणचंडी

कौन थीं दुर्गा भाभी

दुर्गा भाभी का असली नाम दुर्गावती देवी था। इनका जन्म 7 अक्टूबर 1907 को उत्तर प्रदेश के शहजादपुर गांव में हुआ था। दुर्गावती भारत की आजादी और ब्रिटिश सरकार को देश से बाहर खदेड़ने के लिए सशस्त्र क्रांति में सक्रिय भागीदार थीं। जब वह भगत सिंह और उनके दल में शामिल हुईं तो उन्हें आजादी के लिए लड़ने का मौका भी मिल गया।

दुर्गावती देवी का विवाह 11 साल की उम्र में ही हो गया था। उनके पति का नाम भगवती चरण वोहरा था, जो कि हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे। इस एसोसिएशन के अन्य सदस्य उन्हें दुर्गा भाभी कहते थे। इसीलिए वह इसी नाम से प्रसिद्ध हो गईं। 16 नंवबर 1926 को लाहौर में करतार सिंह सराभी की शहादत की 11वीं वर्षगांठ मनाने को लेकर दुर्गा भाभी चर्चा में आईं थीं।
भारत की आयरन लेडी 'दुर्गा भाभी', जिनका नाम सुनते ही अंग्रेजों के निकल जाते थे पसीने

दुर्गा भाभी का आजादी की लड़ाई में योगदान

दुर्गा भाभी को भारत की 'आयरन लेडी' भी कहा जाता है। बहुत ही कम लोगों को ये बात पता होगी कि जिस पिस्तौल से चंद्र शेखर आजाद ने खुद को गोली मारकर बलिदान दिया था, वह पिस्तौल दुर्गा भाभी ने ही आजाद को दी थी। इतना ही नहीं दुर्गा भाभी एक बार भगत सिंह के साथ उनकी पत्नी बन कर अंग्रेजो से बचाने के लिए उनके प्लान का हिस्सा बनी थीं। लाला लाजपत राय की मौत के बाद भगत सिंह ने साॅन्डर्स की हत्या की योजना बनाई थी। तब साॅन्डर्स और स्काॅर्ट से बदला लेने के लिए आतुर दुर्गा भाभी ने ही भगत सिंह और उनके साथियों को टीका लगाकर रवाना किया था। इस हत्या के बाद अंग्रेज उनके पीछे पड़ गए थे। दुर्गा भाभी ने उन्हें बचाने के लिए भगत सिंह के साथ भेष बदलकर शहर छोड़ दिया था। इतना ही नहीं सन् 1929 में जब भगत सिंह ने विधानसभा में बम फेंकने के बाद आत्मसमर्पण किया था उसके बाद दुर्गा भाभी ने लॉर्ड हैली की हत्या करने का प्रयास किया था। हालांकि वह बच गया था। दुर्गा भाभी ने भगत सिंह और उनके साथियों की जमानत के लिए एक बार अपने गहने तक बेच दिए थे।
जंग-ए-आजादी में कूदकर अंग्रेजों को थर्राने वाली क्रांतिकारी महिला, भगत सिंह की नकली पत्नी बन अंग्रेजों से बचाया

दुर्गा भाभी भारत की आजादी के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजो से लड़ने वालों में महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का भी विशेष महत्व है। झांसी की रानी, अहिल्या बाई और कई दमदार व्यक्तित्व की महिलाओं की जाबांजी का भारतीय इतिहास गवाह है। इन महिलाओं में एक नाम और भी शामिल हैं, वह हैं दुर्गावती देवी का।

दुर्गा भाभी भले ही भगत सिंह, सुख देव और राजगुरू की तरह फांसी पर न चढ़ी हों लेकिन कंधें से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ती रहीं। स्वतंत्रता सेनानियों के हर आक्रमक योजना का हिस्सा बनी। दुर्गा भाभी बम बनाती थीं तो अंग्रेजो से लोहा लेने जा रहे देश के सपूतों को टीका लगाकर विजय पथ पर भी भेजती थीं। 
दुर्गा भाभी, जिन्होंने आजाद भारत के लिए सीखा था बम बनाना, अंग्रेज भी खाते थे खौफ

दुर्गा भाभी का व्यक्तिगत जीवन (source Wikipedia)

दुर्गा भाभी का जन्म सात अक्टूबर 1907 को शहजादपुर ग्राम अब कौशाम्बी जिला में पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ। इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाजिर थे और इनके बाबा महेश प्रसाद भट्ट जालौन जिला में थानेदार के पद पर तैनात थे। इनके दादा पं॰ शिवशंकर शहजादपुर में जमींदार थे जिन्होंने बचपन से ही दुर्गा भाभी के सभी बातों को पूर्ण करते थे।
दुर्गा भाभी : जिन्होंने भगत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेज़ो को चटाई थी धूल!
दस वर्ष की अल्प आयु में ही इनका विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊंचे पद पर तैनात थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें राय साहब का खिताब दिया था। भगवती चरण बोहरा राय साहब का पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे। वे क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे। वर्ष 1920 में पिता जी की मृत्यु के पश्चात भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्‍‌नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया। सन् 1923 में भगवती चरण वोहरा ने नेशनल कालेज बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की और दुर्गा भाभी ने प्रभाकर की डिग्री हासिल की। दुर्गा भाभी का मायका व ससुराल दोनों पक्ष संपन्न था। ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को 40 हजार व पिता बांके बिहारी ने पांच हजार रुपये संकट के दिनों में काम आने के लिए दिए थे लेकिन इस दंपती ने इन पैसों का उपयोग क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आजाद कराने में उपयोग किया। मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। सैकड़ों नौजवानों ने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों का बलिदान वेदी पर चढ़ाने की शपथ ली। भगत सिंह व भगवती चरण वोहरा सहित सदस्यों ने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद परीक्षण करते समय वोहरा जी शहीद हो गए। उनके शहीद होने के बावजूद दुर्गा भाभी साथी क्रांतिकारियों के साथ सक्रिय रहीं।
दुर्गा भाभी के बारे में जानिए जिन्होंने चंद्रशेखर आजाद तक पहुंचाई थी चर्चित बमतुल बुखारा पिस्तौल
9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चला दी थी जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली मारी थी जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेज पुलिस इनके पीछे पड़ गई। मुंबई के एक फ्लैट से दुर्गा भाभी व साथी यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी। उस समय भी दुर्गा भाभी उनके साथ ही थीं। उन्होंने पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर व कानपुर में ली थी।

भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त जब केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने जाने लगे तो दुर्गा भाभी व सुशीला मोहन ने अपनी बांहें काट कर अपने रक्त से दोनों लोगों को तिलक लगाकर विदा किया था। असेंबली में बम फेंकने के बाद इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा फांसी दे दी गई।

साथी क्रांतिकारियों के शहीद हो जाने के बाद दुर्गा भाभी एकदम अकेली पड़ गई। वह अपने पांच वर्षीय पुत्र शचींद्र को शिक्षा दिलाने की व्यवस्था करने के उद्देश्य से वह साहस कर दिल्ली चली गई। जहां पर पुलिस उन्हें बराबर परेशान करती रहीं। दुर्गा भाभी उसके बाद दिल्ली से लाहौर चली गई, जहां पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन वर्ष तक नजरबंद रखा। फरारी, गिरफ्तारी व रिहाई का यह सिलसिला 1931 से 1935 तक चलता रहा। अंत में लाहौर से जिलाबदर किए जाने के बाद 1935 में गाजियाबाद में प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी करने लगी और कुछ समय बाद पुन: दिल्ली चली गई और कांग्रेस में काम करने लगीं। कांग्रेस का जीवन रास न आने के कारण उन्होंने 1937 में छोड़ दिया। 1939 में इन्होंने मद्रास जाकर मारिया मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया तथा 1940 में लखनऊ में कैंट रोड के (नजीराबाद) एक निजी मकान में सिर्फ पांच बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला। आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है।

आज आज़ादी के इतने सालों के बाद भी न तो इस विरांगना को इतिहास के पन्नों में वो जगह ही मिली जिसकी वो हकदार थीं और न ही वो किसी को याद रहीं। 14अक्टूबर 1999 में वो इस दुनिया से गुमनाम ही विदा हो गयीं। एक स्मारक का नाम तक उनके नाम पर नहीं है ना ही कहीं कोई मूर्ति है। 

ऐसी वीरांगना को शत शत नमन

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta ||अध्याय तीन ~ कर्मयोग || अनुच्छेद 17 - 24 ||

 श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय तीन ~ कर्मयोग ||

अथ तृतीयोऽध्यायः ~ कर्मयोग

अध्यायतीन के अनुच्छेद 17- 24

सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

अध्याय तीन के अनुच्छेद 17- 24 में ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता का वर्णन

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते || 3.17 ||

भावार्थ : परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है॥17॥

संजय उवाच:

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः  || 3.18 ||

भावार्थ : 

उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता॥18॥

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः  || 3.19 ||

भावार्थ :  

इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है॥19॥

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि  || 3.20 ||

भावार्थ : 

जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है॥20॥

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते  || 3.21 ||

भावार्थ : 

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु 'लोक' शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।)॥21॥

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि  || 3.22 ||

भावार्थ : 

हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ॥22॥

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः  || 3.23 ||

भावार्थ : 

क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं॥23॥

यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌ ।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः  || 3.24 ||

भावार्थ : 

इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ॥24॥

कठफोड़वा || woodpecker ||

कठफोड़वा (woodpecker)

कठफोड़वा (woodpecker) छोटे आकार का रंग बिरंगा और सुंदर पक्षी है, जो पिकिडे (picidae) परिवार का सदस्य है। इस परिवार के सदस्य ऑस्ट्रेलिया, न्यू गिनी, न्यूजीलैंड, मेडागास्कर और चरम ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर लगभग संसार में हर जगह पाए जाते हैं। कई लोग इसे हुदहुद पक्षी समझने की भूल करते हैं, लेकिन ये हुदहुद नहीं है। यह अपनी नुकीली चोंच से पेड़ों पर प्रहार करने के लिए जाना जाता है, ताकि पेड़ की छाल के पीछे छुपे कीड़े मकोड़े बाहर आ जाए और उसे अपना आहार बना सके। कठफोड़वा 1 सेकंड में 20 बार चोंच मार सकता है। तो आइए कठफोड़वा के बारे में विस्तृत जानकारी साझा करते हैं- 

कठफोड़वा से जुड़े रोचक तथ्य || Interesting facts about woodpeckers ||

कठफोड़वा से जुड़े रोचक तथ्य

  1. दुनिया में कठफोड़वा की लगभग 200 विभिन्न प्रजातियाँ हैं। 
  2. अधिकांश कठफोड़वा लगभग 7 सेंटीमीटर लंबे और 7 ग्राम वजन के होते हैं। हालांकि कुछ प्रजातियां 50 सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं।
  3. कठफोड़वा की चोंच काफी मजबूत होती है, जो पेड़ों पर प्रहार करने और उसकी छाल को छेदकर आहार प्राप्त करने में सहायक हैं।
  4. कठफोड़वा प्रति सेकंड 20 बार अपना सिर पेड़ पर ठोकता है। 
  5. यह प्रति दिन 8,000 से 12,000 बार अपना सिर पेड़ पर ठोकता है। कठफोड़वा से जुड़े रोचक तथ्य || Interesting facts about woodpeckers ||
  6. कठफोड़वा 24 किलोमीटर/घंटे की रफ़्तार से उड़ान भरता है। 
  7. कठफोड़वाओं के आहार में मुख्य रूप से सजीव और मृत वृक्षों में पाए जाने वाले कीट और कीटडिंभ हैं। इनके आहार में चींटी, दीमक, झींगुर और उनके लार्वा, मकड़ी, इल्ली, अन्य आर्थ्रोपोड्स, चिड़ियों के अंडे, छोटे रोडेंट, गिरगिट, फल, नट्स, पौधों का रस शामिल हैं। 
  8. बुढ़वा के पैरों की दो उंगलियां सामने की ओर होती हैं और दो पीछे की ओर, इसे जाइगोडैक्टल पैर (zygodactyl feet) कहते हैं। पैरों की ये संरचना उन्हें पेड़ पर चढ़ते समय और उस पर प्रहार कर छेद बनाते समय पकड़ और संतुलन बनाने में मदद करती है।
  9. कठफोड़वा सूखे पेड़ के तने को खोदकर अपना घोंसला बनाते हैं। इस प्रक्रिया में 10 से 28 दिन का समय लगता है। घोंसला बनाने का कार्य नर और मादा दोनों मिलकर करते हैं।
  10. कई कठफोड़वाओं के नाखून अन्य पक्षियों की तुलना में अधिक लंबे और मोटे होते हैं जो उन्हें पेड़ों पर बेहतर पकड़ देते हैं।
  11. कठफोड़वा अपने द्वारा पिछले वर्ष बनाये घोंसले का दोबारा इस्तेमाल नहीं करते/या बहुत ही कम करते हैं
  12. कठफोड़वा की जीभ 10 सेंटीमीटर लंबी होती है जो उसकी चोंच की तिगुनी है।इनकी जीभ लंबी संकरी और कांटेदार होती है, उनमें स्पाइन होते हैं, जिससे उन्हें पेड़ों की छाल से कीड़े निकालने में आसानी होती है।
  13. इनकी चिपचिपी लार भी कीटों को पकड़ने में सहायक होती है।
  14. कठफोड़वा की आवाज तेज और कर्कश है उड़ान भरते समय आती की आवाज करता है।
  15. प्रजाति के अनुसार कठफोड़वा के रंग में भिन्नता देखने को मिलती है। कई प्रजाति के कठफोड़वा के पंखों का रंग भूरा, जैतून के रंग का और चितकबरा होता है। 
  16. वहीं कई प्रजातियों में लाल और पीले रंग के पंख होते हैं। कठफोड़वा से जुड़े रोचक तथ्य || Interesting facts about woodpeckers ||
  17. कुछ प्रजातियों के पंखों का पैटर्न नारंगी, हरा, भूरा, मैरून और सुनहरे रंग का होता है।
  18. कठफोड़वा की अधिकांश प्रजातियाँ जंगलों या जंगली इलाकों में रहती हैं, हालांकि कुछ प्रजातियाँ जंगलों से दूर चट्टानी पहाड़ियों और रेगिस्तान जैसे इलाकों में रहने के लिए भी जानी जाती हैं। 
  19. वर्तमान में ज्ञात कठफोड़वा की सबसे बड़ी प्रजाति  ‘ग्रेट स्लैटी कठफोड़वा’ (The great slaty woodpecker) है, जिसका वैज्ञानिक नाम ‘मुलरिपिकस पुल्वरुलेंटस’ (Mulleripicus pulverulentus) है।
  20. वसंत ऋतु में भी कठफोड़वा काफ़ी तेज आवाज़ निकालते हैं, जो खोखले तने या कभी-कभी किसी धातुई सतह पर अपनी चोंच/सिर ठोकने से निकली आवाज़ से मिलकर और तेज सुनाई पड़ती है। 
  21. ग्रेट स्लैटी कठफोड़वा’ की लंबाई 48-58 सेंटीमीटर और वजन 360-563 ग्राम होता है।
  22. ग्रेट स्लैटी कठफोड़वा’ मुख्यतः भारतीय उप-महाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है।
  23. मादा कठफोड़वा एक बार में 2 से 5 अंडे देती हैं। अंडों को सेने की अवधि 11 से 14 दिनों तक की होती है। लगभग 18 से 35 दिन में कठफोड़वा के बच्चे घोंसला छोड़ने लायक हो जाते हैं। 
  24. कठफोड़वा पेड़ के तने पर लगातार अपनी चोंच ठोंकता और बजाता है, फिर भी इसके मस्तिष्क को कोई नुकसान नहीं पहुँचता, इसका कारण इसकी शारीरिक विशेषतायें हैं। कठफोड़वा से जुड़े रोचक तथ्य || Interesting facts about woodpeckers ||
  25. कठफोड़वा का मस्तिष्क छोटा और कोमल होता है, जिसके आसपास संकरा सबडूरल स्पेस (subdural space) होता है, जिसमें Cerebrospinl fluid भरा होता है, जिससे कठफोड़वा के पेड़ पर चोंच ठोकने के दौरान मस्तिष्क खोपड़ी में आगे-पीछे गति नहीं करता, बल्कि अपने स्थान पर रहता है। 
  26. खोपड़ी में मजबूत और स्पंज जैसी हड्डियाँ होती हैं। 
  27. पेड़ को ठोकने के दौरान उत्पन्न 99.7 प्रतिशत ऊर्जा strain energy के रूप में संग्रहित होती है, जो पूरे शरीर में वितरित होती है और बहुत कम भाग मस्तिष्क में जा पाता है और उसे वहां कम आघात पहुँचता है। 
  28. कठफोड़वा के पंख उसके नथुने को एक हेयर-ब्रश की तरह ढके रहते हैं। इस तरह वह पेड़ को ठोकते/कुरेदते समय लकड़ी ने महीन अंश साँस लेते समय उसके नथुने में नहीं जा पाते। 
  29. साल में एक बार कठफोड़वा अपने पंख झड़ा देते हैं।  
  30. कठफोड़वा एक ही साथी के साथ जीवन भर रहते हैं। 
English Ranslate

woodpecker

The woodpecker is a small-sized, colorful and beautiful bird, which is a member of the Picidae family. Members of this family are found almost everywhere in the world except Australia, New Guinea, New Zealand, Madagascar and the extreme polar regions. Many people mistake it to be a Hudhud bird, but it is not Hudhud. It is known to strike trees with its sharp beak, so that insects hiding behind the bark of the tree can come out and make it their diet. The woodpecker can peck 20 times in 1 second. So let's share detailed information about Woodpecker-
कठफोड़वा से जुड़े रोचक तथ्य || Interesting facts about woodpeckers ||

Interesting facts about woodpeckers

  1. There are about 200 different species of woodpeckers in the world.
  2. Most woodpeckers are about 7 cm long and weigh 7 grams. Although some species grow up to 50 cm tall.
  3. Woodpeckers have very strong beaks, which are helpful in attacking trees and getting food by piercing its bark.
  4. The woodpecker bangs its head on the tree 20 times per second.
  5. It bangs its head on the tree 8,000 to 12,000 times per day.
  6. Woodpeckers fly at a speed of 24 km/h.
  7. The woodpecker's diet consists mainly of insects and larva found in living and dead trees. Their diet includes ants, termites, crickets and their larvae, spiders, caterpillars, other arthropods, bird eggs, small rodents, chameleons, fruits, nuts, plant sap.कठफोड़वा से जुड़े रोचक तथ्य || Interesting facts about woodpeckers ||
  8. Old age feet have two toes on the front and two on the back, this is called zygodactyl feet. This structure of the legs helps them to hold and balance while climbing the tree and making holes by striking it.
  9. Woodpeckers build their nests by digging dry tree trunks. This process takes 10 to 28 days. Nest building is done by both the male and the female.
  10. Many woodpeckers have longer and thicker nails than other birds which give them a better grip on trees.
  11. Woodpeckers do not/or rarely re-use nests they made last year
  12. The woodpecker's tongue is 10 cm long, which is three times that of its beak. Their tongues are long, narrow and spiny, they have spines, which makes it easy for them to extract insects from the bark of trees.
  13. Their sticky saliva also helps in catching insects.
  14. The sound of the woodpecker is loud and hoarse as does the sound of an onslaught while in flight.
  15. There is a variation in the color of the woodpecker according to the species. The wings of many species of woodpeckers are brown, olive colored and pied.
  16. At the same time, many species have red and yellow feathers.
  17. The plumage pattern of some species is orange, green, brown, maroon and golden.
  18. Most species of woodpeckers live in forests or wooded areas, although some species are also known to live in areas away from forests, such as rocky hills and deserts.
  19. The largest species of woodpecker currently known is the great slaty woodpecker, whose scientific name is Mulripicus pulverulentus.कठफोड़वा से जुड़े रोचक तथ्य || Interesting facts about woodpeckers ||
  20. Woodpeckers also make very loud noises in the spring, which are further accentuated by the sound of hollow stems or sometimes banging their beaks/heads on a metal surface.
  21. The 'Great slaty woodpecker' measures 48-58 cm in length and 360-563 grams in weight.
  22. The 'Great slaty woodpecker' is found mainly in the Indian sub-continent and Southeast Asia.
  23. Female woodpeckers lay 2 to 5 eggs at a time. The incubation period for eggs is from 11 to 14 days. Woodpecker young are able to leave the nest in about 18 to 35 days.
  24. The woodpecker constantly bangs and plays its beak on the trunk of the tree, yet its brain is not harmed, the reason for this is its physical characteristics.
  25. The woodpecker's brain is small and soft, surrounded by a narrow subdural space, filled with cerebrospinal fluid, which allows the brain not to move back and forth in the skull when pecking at the woodpecker tree, but instead of its location. lives on.
  26. The skull has strong and sponge-like bones.
  27. 99.7 percent of the energy generated during hitting a tree is stored in the form of strain energy, which is distributed throughout the body and very little goes to the brain and it gets less trauma there.
  28. Woodpecker's wings cover its nostrils like a hair-brush. In this way, he is not able to enter the nostrils while inhaling the fine part of the wood while hammering / scraping the tree.
  29. Woodpeckers shed their wings once a year.
  30. Woodpeckers stay with a single partner for life.

करीला धाम || Karila dham || माता जानकी मंदिर || karila mandir || करीला मंदिर

करीला धाम ( माता जानकी मंदिर)

आज हम चर्चा करते हैं, मध्यप्रदेश के एक और मंदिर "करीला धाम (माता जानकी मंदिर)" की 

मध्यप्रदेश में अशोकनगर जिले के मुंगावली तहसील में स्थित है माँ सीता का दरवार जो जनसमुदाय में करीला धाम के नाम से प्रसिद्ध है। करीला माता का मंदिर अशोकनगर से 35 km दूर स्थित है।

करीला धाम || Karila dham || माता जानकी मंदिर || karila mandir || करीला मंदिर
प्रसिद्ध जानकी माता का मंदिर को लव कुश के जन्म स्थान के रूप में भी जाना जाता है। यहां प्रतिवर्ष रंगपंचमी पर धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेले का आयोजन  होता है, जिसमें प्रसिद्ध राई नृत्य की प्रस्तुति दी जाती है। मान्यता है कि कोई भी जानकी मैया से सच्चे मन से जो मांगता है उसकी मुराद पूरी होती है। मान्यता है कि इस स्थान पर मन्नत मांगने से खाली खोद भर जाती है। अपनी मुराद पुरी होने के पश्चात लोग यहाँ राई का नृत्य करवाते हैं। 

रंगपंचमी के मौके पर लव कुश का जन्म हुआ था इसलिए रंगपंचमी के अवसर पर यहां मेले का आयोजन होता है। करीला में बाल्मीकि जी का आश्रम था जहाँ जानकी माता ने लव कुश जन्म दिया था। यहाँ रंगपंचमी पर एक अनोखा मेला लगता है, जिसमें शिरकत करने के लिए देशभर से 25 लाख से अधिक लोग पहुंचते हैं।

विश्व का एकमात्र मंदिर जहां होती है केवल माता सीता की पूजा

करीला गांव का जानकी मंदिर दुनियाभर में खास इसलिए है कि यहां जानकी माता की भगवान राम के साथ मूर्ति नहीं है। सभी जगह राम मंदिर में तो श्रीरामचंद्रजी के साथ सीतामाता की मूर्ति होती ही है, लेकिन इस मंदिर में खास बात यह है कि यहां सिर्फ और सिर्फ सीता माता की ही मूर्ति स्थापित है।

अनोखी है यहां की परंपरा

करीला धाम || Karila dham || माता जानकी मंदिर || karila mandir || करीला मंदिर

माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने लवकुश का जन्मोत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया था। उस समय बधाई गीत गाए गए थे और स्वर्ग से अप्सराएं तक उतर आई थीं। इस खुशी में बेड़िया जाति की हजारों नृत्यांगनाएं भी इस खुशी में जमकर नाची थीं। तभी से यह प्रथा आज तक निभाई जा रही है। इसी क्रम में राई नृत्य की प्रथा आज भी चलन में है। 

English Translate 

Karila Dham (Mata Janaki Temple)

Today we discuss, another temple of Madhya Pradesh "Karila Dham (Mata Janaki Temple)".

Located in Mungawali tehsil of Ashoknagar district in Madhya Pradesh, the temple of Mother Sita is famous by the name of Karila Dham. Karila Mata Temple is located 35 km away from Ashoknagar.

करीला धाम || Karila dham || माता जानकी मंदिर || karila mandir || करीला मंदिर

The famous Janaki Mata Ka Mandir is also known as the birth place of Luv Kush. A religious and cultural fair is organized here every year on Rangpanchami, in which the famous Rai dance is presented. It is believed that anyone who asks Janaki Maiya with a sincere heart, his wish gets fulfilled. It is believed that by asking for a vow at this place, an empty hole is filled. After the fulfillment of their wishes, people get the dance of mustard done here.

Luv Kush was born on the occasion of Rangpanchami, hence a fair is organized here on the occasion of Rangpanchami. There was an ashram of Valmiki ji in Karila where Janaki's mother gave birth to Luv Kush. A unique fair is held here on Rangpanchami, in which more than 25 lakh people reach from all over the country to participate.

The only temple in the world where only Mata Sita is worshipped

Janaki temple of Karila village is special in the world because there is no idol of Janaki Mata with Lord Rama here. There is an idol of Sitamata with Shri Ramchandraji everywhere in the Ram temple, but the special thing in this temple is that only and only Sita Mata's idol is installed here.

करीला धाम || Karila dham || माता जानकी मंदिर || karila mandir || करीला मंदिर

Unique tradition here

It is believed that Maharishi Valmiki celebrated the birth anniversary of Lavkush with great pomp. At that time congratulatory songs were sung and the Apsaras had descended from heaven. Thousands of dancers of Bedia caste also danced fiercely in this happiness. Since then this practice is being followed till date. In this sequence, the practice of Rai dance is still in practice.

कार्तिक का महीना और आयुर्वेद || कार्तिक के महीने में क्या खाएं क्या ना खाएं

 कार्तिक का महीना और आयुर्वेद || कार्तिक के महीने में क्या खाएं क्या ना खाएं

आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि के बाद कार्तिक मास आरंभ होता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, इस साल 2022 में कार्तिक मास 10 अक्टूबर से शुरू हो रहा है और 8 नवंबर 2022 को समाप्त हो रहा है।
कार्तिक का महीना और आयुर्वेद || कार्तिक के महीने में क्या खाएं क्या ना खाएं

कार्तिक महीने का महत्व

कार्तिक माह हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। कार्तिक भगवान विष्णु के प्रिय माह में से एक है।  इस पूरे महीने भगवान विष्णु नारायण रूप में जल में विराजमान रहते हैं। इस माह से देव तत्व मजबूत होता है। इस मास में भगवान विष्णु के साथ तुलसी पूजा करना फलदायी माना गया है। इसके अलावा इस माह गंगा स्नान, दीप दान, यज्ञ, दान आदि करने से हर कष्ट से छुटकारा मिल जाता है, ऐसी मान्यता है। इस पूरे महीने में दिवाली, छठ पूजा, धनतेरस, कार्तिक पूर्णिमा जैसे व्रत त्योहार पड़ते हैं।

आज मुख्य रूप से हम इस ब्लॉग में कार्तिक के महीने में किस भोज्य पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए, इसकी चर्चा करेंगे। कार्तिक के महीने में खान-पान और रहन-सहन को लेकर शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं और इन नियमों को पालन करके हम अपने स्वास्थ्य को अच्छा रख सकते हैं। जी हां कार्तिक माह में मौसम में बदलाव आने से कई तरह की समस्‍याएं परेशान करने लगती हैं, परन्तु कुछ नियमों का पालन करके हम खुद की अच्‍छे से देखभाल कर सकते हैं। इसके लिए इस महीने में हमें अपने भोजन में से कुछ चीजों का हटाना बेहद जरूरी होता है। 

तो चलिए जानते हैं  शास्त्रों के अनुसार कार्तिक के महीने में हमें अपने भोजन में क्या शामिल करना है और किन चीजों को हटाना है। 
कार्तिक का महीना और आयुर्वेद || कार्तिक के महीने में क्या खाएं क्या ना खाएं

मछली

मांस मछली खाना धार्मिक दृष्टि से वर्जित माना गया है। इन्हें तामसिक भोजन कहते हैं। खास तौर पर कार्तिक महीने में मछली खाना अच्छा नहीं कहा गया है। धार्मिक दृष्टि से इसकी वजह यह है कि इस महीने में भगवान विष्णु जल में अपने मत्स्य अवतार के रूप में रहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो आषाढ में बाढ और वर्षा की वजह से जल प्रदूषित रहता है। दूषित चीजों को खाने से इस समय मछली सेवन संक्रामक और रोगकारक हो सकता है। इसलिए कार्तिक मास में मछली खाने से बचना चाहिए।

बैंगन

वैसे तो बैंगन को सब्जियों का राजा माना गया है, पर कार्तिक के महीने में सब्जियों का राजा बैंगन भी नहीं खाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस माह में पित्त दोष संंबंधित बीमारी होने का खतरा रहता है और बैंगन पित्त दोष बढ़ाता है। इसलिए कार्तिक माह में बैंगन के सेवन से बचना चाहिए।

करेला 

कार्तिक महीने में करेले का सेवन भी वर्जित माना गया है। करेला वातकारक (यानि वायु बढ़ाने वाली) सब्जी मानी जाती है। साथ ही कभी-कभी इसमें कीड़े भी लग जाते हैं। इसलिए ऐसा माना गया है कि कार्तिक माह में करेला खाना हानिकारक हो सकता है। कार्तिक का महीना साधना का महीना है। साधना के दौरान अधिक तीखे, चटपटे, तिक्त और रुखी चीजों को खाने की धार्मिक दृष्टि से मनाही है। तिक्त होने की वजह से भी करेले का सेवन वर्जित कहा गया है।

दही 

कार्तिक माह में दही खाने से भी बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस माह में स्वास्थ्य की दृष्टि से दही खाना सही नहीं है। दही की जगह दूध का सेवन करना चाहिए। धार्मिक दृष्टिकोण से कार्तिक में दही खाना संतान के लिए शुभ नहीं माना जाता है।
कार्तिक का महीना और आयुर्वेद || कार्तिक के महीने में क्या खाएं क्या ना खाएं

जीरा 

वैसे तो जीरा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है, लेकिन कार्तिक के महीने में जीरा खाना नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए जीरे का सेवन कार्तिक के माह में वर्जित माना गया है।

मूली

उपरोक्त 5 चीजों के सेवन से परहेज के अलावा कार्तिक के माह में मूली का सेवन करना लाभदायक माना गया है। स्वास्थ्य की दृष्टि से इस माह में मूली खाना फायदेमंद है क्योंकि इस मौसम में कफदोष और पित्तदोष संबंधित बीमारियां होने की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं इसलिए इस माह में मूली खाना लाभकारी है।