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बसंत ऋतु की एक सुहानी सुबह

बसंत ऋतु की एक सुहानी सुबह

हमारा देश विविधताओं वाला देश है। यहां का प्रत्येक मौसम अपने आप में विशिष्ट होता है। यहां हर ऋतु में सुबह की सैर का अपना अलग आनंद होता है। ग्रीष्म ऋतु में जहां लोग सुबह की सैर का आनंद इसके कूलिंग इफ़ेक्ट के कारण लेते हैं, वहीं शीत ऋतु में सुबह के समय जब ओस की बूंदे बालों से टकराती हैं तो हृदय को एक असीम आनंद से भर देती हैं। वर्षा ऋतु में बारिश की रिमझिम फुहारें तन और मन को आह्लादित करती हैं।

Rupa Oos ki ek Boond

 ऋतुराज बसंत की प्रतीक्षा वर्ष भर लोग करते हैं। बसंत ऋतु में सुबह के समय कोयल के मधुर गीत से वतावरण गुंजायमान होता है। यह मधुर ध्वनि कानों से होते हुए सभी के दिलो दिमाग को तरोताजा कर देती हैं। इस मौसम में प्रकृति अपने पूर्ण प्रस्फुटन पर होती है। हर जगह फूल ही फूल खिले होते हैं। इन फूलों की सुषमा को देखकर सबका तन और मन प्रफुल्लित हो जाता है। 

कुछ सुगंधित फूल वहां की आबोहवा को महकाते रहते हैं और सुबह की सैर का मजा कई गुना कर देते हैं। कभी कभी पेड़ की सबसे ऊंची चोटी पर मोर को बैठे देखकर मेरा मन-मयूर भी नृत्य करने लगता है। उस मोर को अपनी चोंच से अपने पंखों को साफ करते देखना मन में एक सुखद अनुभूति जगाता है। कदाचित मोर को पेड़ की सबसे ऊंची चोटी बेहद पसंद है और इसलिए वह सबसे ऊँची छोटी पर बैठकर दुनिया-जहान को निहारता रहता है। पेड़ की सबसे ऊंची चोटी पर बैठे मोर को देखकर मेरी छोटी बेटी अति प्रसन्न होती है और उत्साह में उसके मुंह से निकलता है 

"मोर ऑन हिज अड्डा।"

अंत मे मैं सभी से यही कहना चाहूंगी कि प्रातः काल की सैर हमारे तन और मन दोनों को स्वस्थ रखने में बहुत सहायक है। प्रकृति के साहचर्य की अनुभूति जितनी प्रातः काल होती है, उतनी अन्य समय पर नहीं होती। इसलिए जो दिनचर्या "अर्ली टू बेड अर्ली टू राइज" से बदलकर लेट टू बेड लेट टू राइज हो गई है, इसको पुनः बदलकर अर्ली टू बेड अर्ली टू राइज करें और सुबह के सुहाने मौसम का लुत्फ़ उठाएं और साथ ही अपने तन और मन को चुस्त-दुरुस्त बनाए रखें। 

बसंत ऋतु की एक सुहानी सुबह

आज यहीं विराम देती हूं, फिर मिलते हैं एक नई ओस की बूंद से, फिर एक नई सुबह। 

भय का भूत : पंचतंत्र || Bhay ka Bhut : Panchtantra ||

भय का भूत

यः परैति स जीवति।

भय का भूत : पंचतंत्र || Bhay ka Bhut : Panchtantra ||

भागनेवाला ही जीवित रहता है।

एक नगर में भद्रसेन नाम का एक राजा रहता था। उसकी कन्या रत्नवती थी। उसे हर समय यही डर रहता था कि कोई राक्षस उसका अपहरण न कर ले। उसके महल के चारों ओर पहरा रहता था, फिर भी वह सदा डर से काँपती रहती थी। रात के समय उसका डर और भी बढ़ जाता था। एक रात एक राक्षस पहरेदारों की नजर बचाकर रत्नवती के घर में घुस गया। घर के एक अन्धेरे कोने में जब वह छिपा हुआ था तो उसने सुना कि रत्नवती अपनी एक सहेली से कह रही है-यह दुष्ट विकाल मुझे हर समय परेशान करता है, इसका कोई उपाय कर।

राजकुमारी के मुख से यह सुनकर राक्षस ने सोचा कि अवश्य ही विकाल नाम का कोई दूसरा राक्षस होगा, जिससे राजकुमारी इतना डरती है। किसी तरह यह जानना चाहिए कि वह कैसा है? कितना बलशाली है? यह सोचकर वह घोड़े का रूप धारण करके अश्वशाला में जा छिपा।

उसी रात कुछ देर बाद एक चोर उस राजमहल में आया। वह वहाँ घोड़ों की चोरी के लिए ही आया था। अश्वशाला में जाकर उसने घोड़ों की देखभाल की और अश्वरूपी राक्षस ने समझा कि अवश्यमेव यह व्यक्ति ही बिकाल राक्षस है और मुझे पहचानकर मेरी हत्या के लिए ही यह मेरी पीठ पर चढ़ा है। किन्तु अब कोई चारा नहीं था। उसके मुँह में लगाम पड़ चुकी थी। चोर के हाथ में चाबुक थी। चाबुक लगते ही वह भाग खड़ा हुआ।

कुछ दूर जाकर चोर ने उसे ठहराने के लिए लगाम खींची, लेकिन घोड़ा भागता ही गया। उसका बेग कम होने के स्थान पर बढ़ता ही गया। तब, चोर के मन में शंका हुई, यह घोड़ा नहीं बल्कि घोड़े की सूरत में कोई राक्षस है, जो मुझे मारना चाहता है। किसी ऊबड़-खाबड़ जगह ले जाकर यह मुझे पटक देगा। मेरी हड्डी-पसली टूट जाएगी।

चोर यह सोच ही रहा था कि सामने वटवृक्ष की एक शाखा आई। घोड़ा उसके नीचे से गुज़रा। चोर ने घोड़े से बचने का उपाय देखकर शाखा को दोनों हाथों से पकड़ लिया। घोड़ा नीचे से गुज़र गया, चोर वृक्ष की शाखा से लटककर बच गया।

उसी वृक्ष पर अश्वरूपी राक्षस का मित्र बन्दर रहता था। उसने डरकर भागते हुए अश्वरूपी राक्षस को बुलाकर कहा  - "मित्र! डरते क्यों हो? यह कोई राक्षस नहीं, बल्कि मामूली मनुष्य है। तुम चाहो तो इसे क्षण में खाकर हजम कर लो।"

चोर को बन्दर पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। बन्दर दूर ऊँची शाखा पर बैठा हुआ था। किन्तु उसकी लम्बी पूँछ चोर के मुख के सामने ही लटक रही थी। चोर ने क्रोधवश उसकी पूँछ को अपने दाँतों में भींचकर चबाना शुरू कर दिया। बन्दर को पीड़ा तो बहुत हुई लेकिन मित्र राक्षस के सामने चोर की शक्ति को कम बताने के लिए वह वहाँ बैठा ही रहा। फिर भी, उसके चेहरे पर पीड़ा की छाया साफ नज़र आ रही थी, उसे देखकर राक्षस ने कहा

- "मित्र! चाहे तुम कुछ भी कहो, किन्तु तुम्हारा चेहरा कह रहा है कि तुम विकाल राक्षस के पंजे में आ गए हो।" यह कहकर वह भाग गया।

यह कहानी सुनाकर स्वर्णसिद्धि ने चक्रधर से फिर घर वापस जाने की आज्ञा मांगी और उसे लोभ-वृक्ष का फल खाने के लिए वहीं ठहरने का उलाहना दिया।

चक्रधर ने कहा- मित्र! उपालंभ देने से क्या लाभ? यह तो देव का संयोग है अन्धे, कुबड़े और विकृत शरीर व्यक्ति भी संयोग से जन्म लेते हैं, उसके साथ भी न्याय होता है। उसके उद्धार का भी समय आता है।

एक राजा के घर विकृत कन्या हुई थी। दरबारियों ने राजा से निवेदन किया - महाराज! ब्राह्मणों को बुलाकर इसके उद्धार का प्रयत्न कीजिए। मनुष्य को सदा जिज्ञासु रहना चाहिए और प्रश्न पूछते रहना चाहिए। एक बार राक्षसेन्द्र के पंजे में पड़ा हुआ ब्राह्मण केवल प्रश्न के बल पर छूट गया था। प्रश्न की बड़ी महिमा है।

राजा ने पूछा- यह कैसे?

तब दरबारियों ने यह कथा सुनाई

जिज्ञासु बनो

To be Continued...

सतुआन: ग्रीष्म ऋतु के स्वागत का अनोखा लोकपर्व || Satuani: Unique festival to welcome summer ||

सतुआन: ग्रीष्म ऋतु के स्वागत का अनोखा लोकपर्व

टिकोला, चटनी, प्याज, अचार,
सतुआ खाईं पलथी मार।
सतुआन: ग्रीष्म ऋतु के स्वागत का अनोखा लोकपर्व || Satuani: Unique festival to welcome summer ||

ग्रीष्म ऋतु के स्वागत और प्रकृति से जुड़े लोकपर्व सतुआन की आप सभी को ढेरों शुभकामनाएं!

प्रतिवर्ष वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की नवमी को सतुआन (सतुवाई/सतुआनी) का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करते हैं। अतः इसे मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। वहीं, उत्तर भारत के लोग इसे सत्तू संक्रांति या सतुआ संक्रांति के नाम से जानते हैं। इस दिन भगवान सूर्य उत्तरायण की आधी परिक्रमा पूरी करते हैं। इसी के साथ खरमास समाप्त हो जाता है और सभी तरह के शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं।

सतुआन: ग्रीष्म ऋतु के स्वागत का अनोखा लोकपर्व || Satuani: Unique festival to welcome summer ||

सतुआन पर्व पर सभी लोग चना, जौ का सत्तू और गुड़ तथा टिकोरा (कच्चा आम) की चटनी खाते हैं। यह त्योहार पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है। पंजाब में इसे वैशाखी कहते हैं। पंजाबी समुदाय में बैसाखी पर्व को बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। असम में बोहाग बिहू, तमिलनाडु में पुथंडू, पणा संक्रांति, बिहार के मिथिलांचल में जुड़-शीतल मनाया जा रहा है, तो वहीं बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में आज सतुआन कहा जाता हैअसम में बोहाग बिहू, तमिलनाडु में पुथंडू, पणा संक्रांति, बिहार के मिथिलांचल में जुड़-शीतल मनाया जा रहा है, तो वहीं बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में आज सतुआन पर्व भी मनाया जा रहा है।

सतुआनी के पर्व में चने के सत्तू और छोटे आम के टिकोला का बहुत महत्व होता है। माना जाता है कि इस त्योहार के बाद से ही लोग नए फल आम टिकोला का सेवन करना शुरू करते हैं। ठीक लोहरी की तरह यहां भी नए फल और अनाज की पूजा की जाती है और फिर प्रसाद के रूप में उसे खाया जाता है।

सतुआन: ग्रीष्म ऋतु के स्वागत का अनोखा लोकपर्व || Satuani: Unique festival to welcome summer ||

भारत के बारे में कहा जाता है कोस कोस पर बदले पानी और चार कोस पर वाणी, जिसका मतलब देश में हर एक कोस की दूरी पर पानी का स्वाद बदल जाता है और 4 कोस पर भाषा यानि वाणी भी बदल जाती है। इसी तरह से हर एक हिस्से में अलग-अलग पर्व भी मनाए जाते हैं, ज्यादातर त्योहार फसलों की बुवाई-कटाई और किसी खास मौसम के स्वागत के लिए मनाए जाते हैं।

आज के दिन (14 अप्रैल) देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग उत्सव मनाए जाते हैं, कई राज्यों में आज का दिन नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। 

English Translate

Satuan: A unique folk festival to welcome summer

Tikola, Chutney, Onion, Pickle,
Satua ditched, turned around.
सतुआन: ग्रीष्म ऋतु के स्वागत का अनोखा लोकपर्व || Satuani: Unique festival to welcome summer ||

Best wishes to all of you on the occasion of welcoming the summer season and Satuan, a folk festival related to nature!

Every year on the Navami of the Krishna Paksha of the month of Vaishakh, the festival of Satuan (Satuwai / Satuani) is celebrated. On this day Sun God enters Aries from Pisces. Hence it is also known as Mesh Sankranti. Whereas, the people of North India know it by the name of Sattu Sankranti or Satua Sankranti. On this day Lord Surya completes half of the orbit of Uttarayan. With this the Kharmas ends and all kinds of auspicious works begin.

Everyone eats gram, barley sattu and jaggery and tikora (raw mango) chutney on Satuan festival. This festival is celebrated all over India. In Punjab it is called Vaishakhi. Baisakhi festival is celebrated with great pomp in the Punjabi community. Bohag Bihu in Assam, Puthandu in Tamil Nadu, Pana Sankranti, Jud-Sheetal is being celebrated in Mithilanchal in Bihar, whereas in parts of Bihar, eastern Uttar Pradesh and Nepal today it is called SatuanBohag Bihu in Assam, Puthandu in Tamil Nadu, Pana Sankranti, Jud-Sheetal is being celebrated in Mithilanchal of Bihar, while Satuan festival is also being celebrated in some parts of Bihar, eastern Uttar Pradesh and Nepal today.
सतुआन: ग्रीष्म ऋतु के स्वागत का अनोखा लोकपर्व || Satuani: Unique festival to welcome summer ||

Gram sattu and small mango tikola are very important in the festival of Satuani. It is believed that only after this festival people start consuming new fruit mango tikola. Just like Lohri, here also new fruits and grains are worshiped and then eaten as prasad.

It is said about India that the water changes on every kos and the speech on four kos, which means the taste of water changes at a distance of every kos in the country and the language i.e. speech also changes at 4 kos. Similarly, different festivals are also celebrated in each part, most of the festivals are celebrated for the sowing and harvesting of crops and to welcome a particular season.

Today (April 14) different festivals are celebrated in different parts of the country, in many states today is celebrated as New Year.

जालियांवाला बाग हत्याकांड || Jallianwala Bagh massacre ||

जालियांवाला बाग हत्याकांड

भारतीय इतिहास में 13 अप्रैल 1919 की तारीख को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। यह वह दिन है जब जालियांवाला बाग में के भीषण नरसंहार हुआ था। भारतीय इतिहास में 13 अप्रैल 1919 की तारीख को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। यह वह दिन है जब जालियांवाला बाग में के भीषण नरसंहार में अपने प्राणों की आहुति देकर भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करने वाले सभी अमर बलिदानीयों को भावभीनी श्रद्धांजलि। 

जालियांवाला बाग हत्याकांड || Jallianwala Bagh massacre ||

जलियाँवाला बाग अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर ( GOLDEN TEMPLE) के पास का एक छोटा सा बगीचा है, जहाँ 13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे, शान्त बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को मार डाला था और हजारों लोगों को घायल कर दिया था। यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था।इसी घटना की याद में यहाँ पर स्मारक बना हुआ है।

जालियांवाला बाग हत्याकांड || Jallianwala Bagh massacre || 

अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था। अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1500 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए। 

यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था। माना जाता है कि यह घटना ही भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत बनी।

जालियांवाला बाग हत्याकांड || Jallianwala Bagh massacre ||

1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी। 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए थे। विजिटर्स बुक में उन्होंनें लिखा कि "ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी।"

जालियांवाला बाग हत्याकांड || Jallianwala Bagh massacre ||

एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम || Epiphyllum Oxypetalum ||

एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम

दुनिया के दुर्लभ फूल जो खुशबू और आकार के कारण बहुत ही लोकप्रिय हैं, जिनकी चर्चा पिछले कुछ पोस्ट में की गई है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए एक और फूल के बारे में जानते हैं जिसका नाम है - "एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम "

एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम || Epiphyllum Oxypetalum ||

एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम (Epiphyllum Oxypetalum) श्रीलंका के जंगलों में पाया जाता है और बौद्ध धर्म में इसका खासा महत्व है। इस फूल की खासियत यह है कि यह सिर्फ रात में खिलता है और सुबह होने से पहले ही मुरझा जाता है।

एपिफिलम ऑक्सीपेटालम को आमतौर पर "नाइट ब्लूमिंग सेरेस" कहा जाता है। एक समय में इसका वानस्पतिक नाम Cereus था। अब यह एक Epiphyllum है। यह एक पुराना हिरलूम पौधा है जिसमें बड़े सफेद फूल होते हैं, जो रात में खिलते हैं। प्रत्येक फूल केवल एक रात के लिए खुला रहता है। 

एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम || Epiphyllum Oxypetalum ||

एपिफिलम ऑक्सीपेटालम (रात की राजकुमारी या रात की रानी) कैक्टस की एक प्रजाति है। यह रात में खिलता है, और इसके फूल भोर से पहले मुरझा जाते हैं। हालांकि इसे कभी-कभी रात-खिलने वाले सेरेस के रूप में जाना जाता है, लेकिन यह जनजाति सेरेई में किसी भी प्रजाति से निकटता से संबंधित नहीं है, जैसे कि सेलेनिकेरियस, जिसे आमतौर पर रात-खिलने वाले सेरेस के रूप में जाना जाता है। सेरेस की सभी प्रजातियाँ रात में खिलती हैं और स्थलीय पौधे हैं। 

इसके तने सीधे, ऊपर की ओर उठे हुए, स्कैंडिनेट या फैले हुए और अत्यधिक शाखित होते हैं। प्राथमिक तने 6 मीटर (600 सेंटीमीटर) तक लंबे होते हैं। द्वितीयक तने समतल, अण्डाकार-नुकीले, 30 सेमी × 12 सेमी (12 इंच × 5 इंच) तक के होते हैं। तने के किनारे उथले रूप से गहराई से उत्तल और लहरदार होते हैं। तने मोमी प्रतीत होते हैं इसलिए क्यूटिन मौजूद हो सकते हैं। क्यूटिन तनों से पानी की कमी को कम करता है। तने के कटने से जेल जैसा पदार्थ निकलता है। तनों में बहुत अधिक पानी से भरे ऊतक होते हैं।
एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम || Epiphyllum Oxypetalum ||

फूल रात्रिचर होते हैं। वे चपटे तनों पर उगते हैं और 30 सेमी (12 इंच) लंबे और 17 सेमी (7 इंच) चौड़े, निशाचर और बहुत सुगंधित होते हैं। फल आयताकार होते हैं, 12 x 8 सेमी तक ऊपर, बैंगनी लाल और कोणीय होते हैं। 

इसको हिंदी में ब्रह्मकमल कहते हैं मुझे इसके औषधीय गुणों की चर्चा इस ब्लॉग में पहले की जा चुकी है।

English Translate

Epiphyllum Oxypetalum

Rare flowers of the world which are very popular because of their fragrance and shape, which have been discussed in the last few posts. Taking this sequence forward, we know about another flower whose name is - "Epiphyllum oxypetalum".
एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम || Epiphyllum Oxypetalum ||

Epiphyllum oxypetalum is found in the forests of Sri Lanka and has great importance in Buddhism. The specialty of this flower is that it blooms only at night and withers before dawn.

Epiphyllum oxypetalum is commonly called "night blooming cereus". At one time its botanical name was Cereus. Now it's an Epiphyllum. It is an old heirloom plant with large white flowers that bloom at night. Each flower remains open for only one night.

Epiphyllum oxypetalum (Princess of the Night or Queen of the Night) is a species of cactus. It blooms at night, and its flowers wither before dawn. Although it is sometimes referred to as night-blooming cereus, it is not closely related to any species in the tribe Cereus, such as Selenicereus, which is commonly known as night-blooming cereus. . All species of Cereus bloom at night and are terrestrial plants.
एपिफाइलम ऑक्सीपेटालम || Epiphyllum Oxypetalum ||

Its stems are erect, erect, scandent or spreading and highly branched. The primary stems are up to 6 m (600 cm) tall. The secondary stems are flat, elliptic-pointed, up to 30 cm × 12 cm (12 in × 5 in). The edge of the stem is shallowly deeply convex and wavy. Stems appear waxy so cutin may be present. Cutin reduces water loss from stems. A gel-like substance comes out when the stem is cut. Stems contain a lot of water-filled tissue.

Flowers are nocturnal. They grow on flattened stems and are up to 30 cm (12 in) tall and 17 cm (7 in) wide, nocturnal and very fragrant. The fruits are oblong, up to 12 x 8 cm, purplish red and angular.

It is called Brahmakamal in Hindi. I have already discussed its medicinal properties in this blog.

ज्योतिबा फुले || Jyotiba Phule ||

ज्योतिबा फुले (Jyotiba Phule )

"महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले" एक भारतीय समाज सुधारक, समाज प्रबोधक, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रांतिकारी व्यक्ति थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन महिलाओं और दलितों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। ज्योतिबा राव फुले नारी को गुलामी की जंजीरों से आजाद करवाने वाले तथा लड़कियों की शिक्षा व्यवस्था और विधवाओं की शादी, बाल विवाह पर रोक, औरतों की आजादी के लिए काम करने वाले भारत में सबसे पहले व्यक्ति थे। 
ज्योतिबा फुले || Jyotiba Phule ||

महिलाओं व पिछडे और अछूतो के उत्थान के लिय इन्होंने अनेक कार्य किए। समाज के सभी वर्गो को शिक्षा प्रदान करने के ये प्रबल समथर्क थे। वे भारतीय समाज में प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के विरुद्ध थे। इनका मूल उद्देश्य स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार प्रदान करना, बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन करना रहा है। 

ज्योतिबा फुले समाज की कुप्रथा, अंधश्रद्धा की जाल से समाज को मुक्त करना चाहते थे। अपना सम्पूर्ण जीवन उन्होंने स्त्रियों को शिक्षा प्रदान कराने में, स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने में व्यतीत किया। इन्होंने अपनी पत्नी आदरणीय सावित्रीबाई फुले जी को शिक्षित करके देश की प्रथम महिला शिक्षिका बनाकर नारी का गौरव बढ़ाया। 
ज्योतिबा फुले || Jyotiba Phule ||
ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के कटगुण में हुआ था। उनका पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव गोन्हे, ज्योतिराव गोविंदराव फुले था। उनके पिता का नाम गोविंदराव तथा उनकी माता का नाम चिमणा बाई था। जब वे 1 साल के हुए तो उनकी माता का देहांत हो गया। इसके बाद उनका पालन – पोषण सगुनाबाई नामक एक दाई ने किया। उनका विवाह 1840 में सावित्री बाई फुले से हुया था। ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले के कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने एक विधवा के बच्चे को गोद लिया था | यह बच्चा बड़ा होकर एक डॉक्टर बना और इसने भी अपने माता पिता के समाज सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाया।

निर्धन तथा निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 'सत्यशोधक समाज' 1873 मे स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हेंमहात्मा' की उपाधि दी। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरम्भ कराया और इसे मुंबई उच्च न्यायालय से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। अपने जीवन काल में उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं-गुलामगिरी, तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत. महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया। धर्म, समाज और परम्पराओं के सत्य को सामने लाने हेतु उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखी।

ब्रिटिश सरकार द्वारा उपाधि: 1883 में स्त्रियों को शिक्षा प्रदान कराने के महान कार्य के लिए उन्हें तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा "स्त्री शिक्षण के आद्यजनक" कहकर गौरव प्रदान किया।

English Translate

Jyotiba Phule


Mahatma Jyotirao Govindrao Phule was an Indian social reformer, social enlightener, thinker, social worker, writer, philosopher and revolutionary person, who dedicated his whole life for the upliftment of women and Dalits. Jyotiba Rao Phule was the first person in India to liberate women from the chains of slavery and work for the education system of girls and marriage of widows, ban on child marriage, freedom of women.
He did many works for the upliftment of women and backward and untouchables. He was a strong advocate of providing education to all sections of the society. He was against caste-based division and discrimination prevailing in the Indian society. Their basic objective has been to provide the right to education to women, oppose child marriage, support widow marriage.
ज्योतिबा फुले || Jyotiba Phule ||
Jyotiba Phule wanted to free the society from the evil practice and the trap of superstition. He spent his entire life in providing education to women, making women aware of their rights. He raised the pride of women by educating his wife respected Savitribai Phule ji and making her the country's first female teacher.

Jyotiba Phule was born on 11 April 1827 in Katgun, Satara district of Maharashtra. His full name was Jyotirao Govindrao Gonhe, Jyotirao Govindrao Phule. His father's name was Govindrao and his mother's name was Chimna Bai. When he turned 1 year old, his mother died. After this he was brought up by a midwife named Sagunabai. He was married to Savitri Bai Phule in 1840. Jyotiba Phule and Savitri Bai Phule had no children, so they adopted the child of a widow. This child grew up to become a doctor and also carried forward the social service work of his parents.

Jyotiba established 'Satyashodhak Samaj' in 1873 to provide justice to the poor and weak. Seeing his social service, in 1888 he was given the title of 'Mahatma' in a huge meeting in Mumbai. Jyotiba started the marriage rituals without the Brahmin-priest and it was also recognized by the Bombay High Court. He was against child marriage and was a supporter of widow remarriage. During his lifetime, he also wrote many books – Gulamgiri, Tritiya Ratna, Chhatrapati Shivaji, Raja Bhosla Ka Pakhda, Kisan Ka Koda, Untouchables Ki Kaifiyat. Due to the struggle of Mahatma Jyotiba and his organization, the government passed the 'Agriculture Act'. He also wrote many books to bring out the truth of religion, society and traditions.
ज्योतिबा फुले || Jyotiba Phule ||
Title by the British Government: In 1883, for the great work of providing education to women, she was honored by the then British Government of India by calling her "the father of women's education".

"गाय का जूठा गुड़"

 "गाय का जूठा गुड़"

आज एक लेख पढ़ा, जो दिल को छू गई। लेख का शीर्षक पढ़कर ही मन में उत्सुकता जाग गई। यह तो सुना था कि गाय को गुड़ खिलाना बहुत अच्छा माना जाता है, परंतु शीर्षक कुछ भिन्न था जिससे उत्सुकता बढ़ी और पूरा लेख एक लगातार पढ़ती गई। शायद आप लोगों को भी यह लेख पसंद आए।

"गाय का जूठा गुड़"

एक शादी के निमंत्रण पर जाना था, पर मैं जाना नहीं चाहता था। वजह थी कि शादी गांव में थी। एक व्यस्त होने का बहाना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना, लेक‌िन घर परिवार का दबाव था सो जाना पड़ा।

शादी के घर में हर किसी को कोई न कोई काम सौंप दिया जा रहा था। उस दिन शादी की सुबह मैं काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर गांव को जाने बाली रोड़ पर बैठा हुआ था। हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था। शहर में देर से उठना और काम पर लग जाना, कहाँ इतना सुहाना मौसम मिल पाता। खैर, पास के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी कि तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी और उसमें से एक वृद्ध उतरे। अमीरी उसके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।

वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये। पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी। उसमें गुड़ भरा हुआ था। अब उन्होंने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायों को बुलाया। सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनों बाद बच्चे अपने मां - बाप को घेर लेते हैं। कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे, तो कुछ स्वयम् खा रही थी। वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।

कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गईं। इसके बाद जो हुआ वो वाक्या है, जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता। 

हुआ यूँ कि गायों के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था, वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे।मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।

मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला श्रीमानजी क्षमा चाहता हूँ, पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का झूठा गुड़ क्यों खा रहे थे। 

उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी। उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता। जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं, मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।

मैं अब भी नहीं समझा श्री मान जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ? मैंने बड़ी उत्सुकता से कहा। 

वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की है। उस वक़्त मैं 22 साल का था। घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था। भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।

तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए। यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था। मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था। मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई। मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्राय आत्मा में प्राण से आ गये।

मैं उसी पेड़ की जड़ों में रात भर पड़ा रहा। सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी। मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश में फिर सारा दिन भटकता रहा। पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था। एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।

शाम ढल रही थी। कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था। वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय। कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने। गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई। मुझे अज़ीब लगा, परन्तू मैं बेबस था, सो आज फिर गुड खा लिया और वहीं सो गया। 

सुबह काम तलासने निकल गया। आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी, सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।

इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई। मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया। इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था कि गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था। 

मेरा हृदय भर उठा, उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर। मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा और बहुत सोचता रहा। फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई। दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया। शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ। जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया। मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायों को गुड़ डालकर इनका झूँठा गुड़ खाता हूँ, जिससे मेरी आत्मा तृप्त हो जाती है। 

मैं लाखों रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ, परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यहीं आकर मिटती हैं बेटे। मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम। 

मैंने सिर हाँ में हिलाया। वे चल पड़े, गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई। मैं उठा उन्हीं टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला वापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ। सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था। उसमें कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।

घर आकर गाय के बारे में जानने के लिए कुछ किताबें पढ़नी शुरू की। पढ़ने के बाद जाना कि गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है, जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। गौएं विकार-रहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं।

सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं।

ऋग्वेद में गौ को ‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।