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भगवान शिव के 19 अवतार

भगवान शिव के 19 अवतार

आज से सावन का पवित्र महीना शुरू हो रहा है और आज ही सावन का पहला सोमवार भी है। सभी श्रद्धालुओं पर भगवान भोले नाथ अपनी कृपा दृष्टि सदा बनाये रखें। 

भगवान शिव के 19 अवतार

हिंदू धर्म में सावन का विशेष धार्मिक महत्व होता है। श्रावण मास को साल का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। भगवान शिव को समर्पित श्रावण का यह पवित्र महीना इस बार 22 जुलाई से शुरू होकर 19 अगस्त तक चलेगा। इस वर्ष की खास बात ये है कि श्रावण मास की शुरुआत सोमवार के दिन हो रही है। आइये जानते हैं भगवान शिव के 19 अवतारों के बारे में :-

  1. वीरभद्र अवतार (Veerabhadra Avatar)
  2. पिपलाद अवतार (Piplaad Avatar)
  3. नंदी अवतार (Nandi Avatar)
  4. भैरव अवतार (Bhairava Avatar)
  5. अश्वत्थामा (Ashwatthama)
  6. शरभ अवतार (Sharabha Avatar)
  7. गृहपति अवतार (Grihapati Avatar)
  8. दुर्वासा अवतार (Durvasa Avatar)
  9. भगवान हनुमान (lord Hanuman)
  10. वृषभ अवतार (Vrishabha Avatar)
  11. यतिनाथ अवतार (Yatinath Avatar)
  12. कृष्णदर्शन अवतार (Krishna Darshan avatar)
  13. अवधूत अवतार (Avadhut Avatar)
  14. भिक्षुवर्या अवतार (Bhikshuvarya Avatar)
  15. सुरेश्वर अवतार (Sureshwar Avatar)
  16. किरातेश्वर अवतार (Kirateshwar Avatar)
  17. सुनटनर्तक अवतार (Suntantarka Avatar)
  18. ब्रह्मचारी अवतार (Brahmachari Avatar)
  19. यक्षेश्वर अवतार (Yaksheshwar Avatar)

वीरभद्र अवतार

भगवान शिव के यह अवतार का जन्म दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती के देह त्यागने के बात हुआ था जब भगवान शिव को यह पता चला कि माता सती ने देह त्याग दिया है तो उन्होंने अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे एक पर्वत के ऊपर पटक दिया उस जटा के पूर्व भाग से महा भयंकर वीरभद्र पैदा हुआ शिवजी के इस अवतार ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और दक्ष का सिर काट कर उसे मृत्यु दंड दे दिया।

भगवान शिव के 19 अवतार

पीपलाद अवतार

भगवान शिव के पिप्पलाद अवतार का मानव जीवन में बड़ा महत्व है शनि पीड़ा का निवारण पिप्पलाद अवतार की कृपा से ही संभव हुआ पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा की क्या कारण है जो मेरे पिताजी दधीचि मुनि मेरे जन्म से पहले ही मुझे छोड़ कर चले गए तब देवता पिप्पलाद से कहते हैं तुम्हारे पिता का तुम्हारे जन्म से पहले ही छोड़ जाने का कारण शनिदेव की महादशा है पिप्पलाद यह सुनकर बहुत दुखी हुए।

भगवान शिव के 19 अवतार

और पिपलाज ने शनि देव को नक्षत्र मंडल से गिरने का श्राप दे दिया। श्राप के कारण शनिदेव उसी समय आसमान से नीचे गिरने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनिदेव को इस बात पर शमा किया की शनि जन्म से लेकर 16 साल की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे शिव पुराण के अनुसार स्वयं ब्रह्मा जी ने पीपलाद के इस अवतार का नामकरण किया था

नंदी अवतार

भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं शंकर जी का नंदी अवतार भी इसी बात का प्रतीक है नंदीबैल कर्म का प्रतीक है इसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है आइए जानते हैं शिव जी ने नंदी अवतार क्यों लिया था पौराणिक कथा के अनुसार शिलाद मुनि एक ब्रह्मचारी थे अपना वंश समाप्त होता हुआ देख उनके पितरों ने शिलाद को संतान उत्पन्न करने को कहा।

भगवान शिव के 19 अवतार

तब शिलाद मुनि ने भी मृत्युहीन पुत्र की कामना करते हुए शिव जी की तपस्या की, तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद मुनि के यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया कुछ समय बाद शिलाद मुनि को भूमि से उत्पन्न हुआ बालक मिला और शिलाद मुनि मैं उसका नाम नंदी रखा भगवान शिव ने नंदी को अपना गणाधीश बनाया इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए।

भैरव अवतार

शिव महापुराण में भैरव अवतार को शिव का पूर्ण अवतार बताया गया है एक बार शिवजी की माया से प्रभावित होकर ब्रह्मा और विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगे तब वहां तेज रोशनी के साथ एक पुरुष आकृति दिखाई दी उन्हें देखकर ब्रह्मा जी ने कहा चंद्रशेखर तुम मेरे पुत्र हो मेरी शरण में आओ ब्रह्मा जी की बातें सुनकर शिव जी को क्रोध आ गया उन्होंने उस पुरुष आकृति से कहा काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात्कार काल राज हैं। भीषण होने से भैरव है

भगवान शिव के 19 अवतार

शंकर भगवान के इन वरो को प्राप्त कर कालभैरव ने अपनी उंगली के नाखून से ही ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काट दिया और ब्रह्मा जी का पांचवा सिर कटने के कारण काल भैरव ब्रह्म हत्या के पाप से दोषी हो गए। और फिर काशी में काल भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली। काशी वासियों के लिए भैरव की भक्ति अनिवार्य बताई गई है।

अश्वत्थामा अवतार

महाभारत के अनुसार गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भगवान शंकर के अंशा अवतार थे गुरु द्रोणाचार्य ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की और फिर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया की वे उनके पुत्र रूप में उनके घर पर जन्म लेंगे। समय आने पर शिवजी ने अपने अंश से गुरु द्रोणाचार्य के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में जन्म लिया और शिव महापुराण के अनुसार अश्वत्थामा आज भी जीवित है। और वह आज भी धरती पर निवास करते हैं

भगवान शिव के 19 अवतार

शरभावतार

भगवान शिव का छठा अवतार है शरभावतार, इस अवतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग शेष शरब पक्षी का था। इस अवतार में भगवान शंकर ने नरसिंह भगवान की क्रोध अग्नि को शांत किया था। हिरण्यकश्यप के वध के पश्चात जब भगवान नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता भगवान शिव के पास गए तब भगवान शिव ने शरभावतार लिया और वह इसी रूप में भगवान नरसिंह के पास पहुंचे और उनकी स्तुति की लेकिन नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ यह देख शरभ रूपी भगवान शिव नरसिंह को अपनी पूंछ में बांधकर ले उड़े तब जाकर भगवान नरसिंह का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।

भगवान शिव के 19 अवतार

गृहपति अवतार

गृहपति अवतार शंकर जी का सातवां अवतार है पौराणिक कथा के अनुसार नर्मदा के तट पर धर्मपुर नामक एक नगर था वहां विश्वनार नामक एक मुनि तथा उनकी पत्नी सूचिस्मति रहती थी सूचिस्मती बहुत साल तक निसंतान रहने पर एक दिन अपने पति के सामने शिव के समान संतान प्राप्ति की इच्छा रखी, पत्नी की इस इच्छा को पूरा करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए वहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिवलिंग की आराधना की और एक दिन विश्वनार मुनि को शिवलिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया

भगवान शिव के 19 अवतार

मुनि ने बाल रूप धारी शिवलिंग की पूजा की और उनकी पूजा से प्रसन्न होकर शिवजी ने सूचिस्मती के गर्भ से अवतार लेने का वर दिया और कुछ समय बाद सूचिस्मती गर्भवती हुई और भगवान शिव सूचिस्मती के गर्भ से पुत्र रूप में प्रकट हुए पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने उस बालक का नाम गृहपति रखा।

ऋषि दुर्वासा अवतार

ऋषि दुर्वासा को शिवजी का ही अवतार माना गया है धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसुइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देश अनुसार पत्नी सहित पर्वत पर पुत्र कामना से घोर तप किया उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों उनके आश्रम पर आए और उन्होंने कहा हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे जो तीनों लोगों में विज्ञात एवं माता पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे कुछ समय बाद ब्रह्मा जी के अंश से चंद्रमा उत्पन्न हुआ, विष्णु जी के अंश से श्रेष्ठ सन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्तात्रेय उत्पन्न हुए और सूत्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया।

भगवान शिव के 19 अवतार

हनुमान अवतार

भगवान शिव का हनुमान अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना गया है इस अवतार में भगवान शिव ने एक वानर के रूप में जन्म लिया शिव महापुराण के अनुसार देवताओं और दानवों को अमृत बांटते समय विष्णु जी के मोहिनी रूप को देखकर शिवजी ने कामातुर होकर अपना वीरपात कर दिया था ऋषियों ने उस विरे को कुछ पत्तों में संग्रहित कर लिया और समय आने पर उन्होंने भगवान शिव के विरे को वनराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से गर्भ में स्थापित कर दिया था जिससे अत्यंत तेजस्वी और प्रबल पराक्रम श्री हनुमान जी पैदा हुए।

भगवान शिव के 19 अवतार

वृषभ अवतार

भगवान शिव ने श्री विष्णु के पुत्रों का सहार करने के लिए वृषभ अवतार लिया था धर्म ग्रंथों के अनुसार जब भगवान विष्णु दैत्यों को मारने के लिए पाताल लोक गए तब विष्णु ने उनके साथ रमन करके बहुत से पुत्र उत्पन्न किए विष्णु के इन पुत्रों ने पाताल से लेकर पृथ्वी तक बड़ा ही उवद्रव मचाया जिन से घबराकर ब्रह्मा जी सभी ऋषि-मुनियों को लेकर शिव भगवान के पास गए और रक्षा के लिए प्रार्थना की, तब भगवान शिव ने वृषभ अवतार धारण करके विष्णुजी के पुत्रों का सहार किया।

भगवान शिव के 19 अवतार

यतिनाथ अवतार

भगवान शिव ने यतिनाथ अवतार में भील दम्पत्ति की परीक्षा लेने के लिए अतिथि बनकर उनके घर गए थे जिस कारण भील दम्पत्ति को अपने प्राण गवाने पढ़े ग्रंथों के अनुसार पर्वतों के समीप शिवभक्त आहू और आहूका नामक भील दम्पत्ति रहते थे एक दिन भगवान शिव यतिनाथ के वेश में उनके घर गए और यतिनाथ ने भील दम्पत्ति के घर में रात व्यतीत करने की इच्छा जताई तब आहूका ने अपने पति को गृहस्थी की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुष बाण लेकर बाहर रात बिताने को कहा और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा इस तरह आहू धनुष बाण लेकर बाहर चला गया

जब प्रातः काल आहूका और यति ने बाहर देखा तो वन प्राणियों ने आहू को मार डाला था इस पर यतिनाथ बहुत दुखी हुए तब आहूका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक ना करें अतिथि सेवा में प्राण विसर्जित करना हमारा धर्म है और उसका पालन कर हम आज धन्य हो गए जब आहूका अपने पति की चिता अग्नि में जलने लगी तब शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में उन्हें अपने पति से मिलने का वरदान दिया।

कृष्णदर्शन अवतार

इस अवतार में शिवजी ने धार्मिक कार्यों के महत्व को समझाया है इसीलिए कृष्णदर्शन अवतार को धर्म का प्रतीक भी माना गया है धर्म ग्रंथों के अनुसार इक्ष्वाकु वंशी श्राद्ध देव की नवमी पीढ़ी में राजा नभक का जन्म हुआ विद्या अध्ययन के लिए गुरुकुल गए नभक जब बहुत दिनों तक नहीं लौटे तब उनके भाइयों ने राज्य का विभाजन कर आपस में बांट लिया जब नभक को यह बात पता चली तब वह अपने पिता के पास पहुंचा उनके पिता ने उन्हें एक सुझाव दिया कि वह यज्ञ कर धन की प्राप्ति करें तब नभक यज्ञ भूमि पहुंचकर वैश्य देव सूक्ति के स्पर्श उच्चारण द्वारा यज्ञ संपन्न किया।

भगवान शिव के 19 अवतार

तब अंगारिक ब्राह्मण नभक को ढेर सारा सोना देकर स्वर्ग को चले गए और उसी समय भगवान शिव कृष्णदर्शन अवतार में सामने प्रकट हुए और बोले यज्ञ के अवशिष्ट धन पर दो मेरा अधिकार है विवाद होने पर कृष्णदर्शन अवतार धारी शिव ने उनसे उनके पिता को ही निर्णय कराने को कहा और जब नभक ने अपने पिताजी श्राद्धदेव से पूछा तो उन्होंने कहा कि वे भगवान शिव है यज्ञ में अवशिष्ट वस्तु उनकी ही है तब पिता की बात को मानकर नभक ने भगवान शिव की स्तुति की और उससे अपना राज्य वापस मिल गया।

अवधूत अवतार

शिवजी ने अवधूत अवतार लेकर इंद्र के अहंकार को चूर किया था एक दिन बृहस्पति और अन्य देवताओं को साथ लेकर इंद्र शिवजी के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत गए इंद्र की परीक्षा लेने के लिए शिव भगवान ने अवधूत रूप धारण कर लिया और उनका मार्ग रोक लिया तब इंद्र ने बार-बार अनादर पूर्वक उनसे उनका परिचय पूछा तब भी वह मौन रहे इस बात पर क्रोधित होकर जैसे ही इंद्र ने अवधूत पर प्रहार करने के लिए वज्र छोड़ना चाहा वैसे ही उनका हाथ स्थिर हो गया यह देख कर बृहस्पति ने शिवजी को पहचान लिया और अवधूत की विधिवत स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने इंद्र को क्षमा कर दिया।

भगवान शिव के 19 अवतार

भिक्षुवर्या अवतार

भगवान शिव का यह अवतार इस बात का संदेश देता है कि वही इस सृष्टि के रक्षक है धर्म ग्रंथों के अनुसार विदर्भ नरेशसत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला और उसकी गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छुपकर अपनी जान बचाई कुछ समय बाद उसी पुत्र को जन्म दिया जब वह जल पीने के लिए नदी किनारे गई तब एक घड़ियाल ने उसे अपना भोजन बना लिया और वह बालक भूख प्यास से तड़पने लगा भगवान शिव की प्रेरणा से एक भिकारन वहां पहुंची।

भगवान शिव के 19 अवतार

तब शिवजी ने भिक्षुवर्या का रूप धारण कर उस भिकारन को बच्चे का परिचय दिया और कहां यह बालक विदर्भ नरेशसत्यरथ का पुत्र है और उसे बच्चे का पालन पोषण करने को कहा यह कहने के बाद भिक्षुवर्या ने उसे अपना वास्तविक रूप दिखाया और फिर बालक ने बड़े होकर शिव जी की कृपा से अपने दुश्मनों को हराकर अपना राज्य हासिल कर लिया।

सुरेश्वर अवतार

शिव भगवान का सुरेश्वर अवतार भक्तों के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है इस अवतार में शिव जी ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया धर्म ग्रंथों के अनुसार व्याग्रपात का पुत्र उपमन्यु हमेशा दूध पीने की इच्छा से व्याकुल रहता था उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए भगवान शिव की शरण में जाने को कहा उसके बाद उपमन्यु वन में जाकर “ॐ नमः शिवाय” का जाप करने लगा।

भगवान शिव के 19 अवतार

जब भगवान शिव ने यह देखा तो सुरेश्वर का रूप धारण कर उसे दर्शन दिए और शिवजी की अनेक प्रकार से निंदा करने लगे इस बात पर उपमन्यु क्रोधित हो गया और सुरेश्वर को मारने के लिए खड़ा हो गया उपमन्यु की दृढ़ शक्ति और अटल वि श्वास को देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन दिए तथा शिवसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया उपमन्यु की प्रार्थना पर शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।

किरातेश्वर अवतार

किरातेश्वर अवतार में शिवजी ने अर्जुन की वीरता की परीक्षा ली थी महाभारत के अनुसार वनवास में जब अर्जुन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे तभी दुर्योधन द्वारा भेजा गया दैत्य अर्जुन को मारने के लिए सूअर का रूप धारण कर वहां पर पहुंचा अर्जुन ने सूअर पर अपने बाण से प्रहार किया भगवान शिव ने भी किरातेश्वर रूप में उपस्थित होकर उसे सूअर पर बाण चलाया।

भगवान शिव के 19 अवतार

शिव की माया के कारण अर्जुन उन्हें पहचान नहीं पाए और सूअर का वध उनके बाण से हुआ है यह कहने लगे इस बात पर दोनों में विवाद हो गया और अर्जुन ने किरातेश्वर रूपी शिव भगवान से युद्ध किया और अर्जुन की वीरता देख शिव भगवान अर्जुन से प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक रूप में आकर अर्जुन को कौरवो पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया।

सुनटनर्तक अवतार

पार्वती के पिता राजा हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मांगने के लिए भगवान शिव ने सुनटनर्तक अवतार धारण किया हाथों में डमरू लेकर भगवान शिव नट के रूप में राजा हिमाचल के घर पहुंचे और नृत्य करने लगे सुनटनर्तक शिव जी का सुंदर और मनोहर नृत्य देखकर सभी प्रसन्न हो गए और राजा हिमाचल ने नटराज को भिक्षा मांगने को कहा तो नटराज ने भिक्षा में उनकी पुत्री पार्वती का हाथ मांग लिया।

भगवान शिव के 19 अवतार

इस बात पर राजा हिमाचल बहुत क्रोधित हुए और कुछ देर बाद नटराज रूपी शिवजी पार्वती को अपना असली रूप दिखा कर वहां से चले जाते हैं उनके जाने पर मैना (पार्वती की माता) और हिमाचल को दिव्यज्ञान हुआ और उन्होंने पार्वती का हाथ शिव जी के हाथ में देने का फैसला कर लिया।

ब्रह्मचारी अवतार

सतयुग में माता सती ने दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद दोबारा जन्म लिया तो शिव जी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिव भगवान ब्रह्मचारी के रूप में पार्वती के पास पहुंचे और पार्वती ने भी ब्रह्मचारी की विधि विधान से पूजा की, ब्रह्मचारी ने पार्वती से उनके तप का उद्देश्य पूछा और उद्देश्य जानने के बाद वह शिव की निंदा करने लगे शिवजी की निंदा सुन पार्वती को क्रोध आ गया और फिर पार्वती की भक्ति और प्रेम को देखकर ब्रह्मचारी अपने शिव रूप में आ गए और यह देख माता पार्वती अति प्रसन्न हुई।

भगवान शिव के 19 अवतार

यक्षेश्वर अवतार

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान जब भयंकर विष निकला था तब शिव भगवान ने उस विष को ग्रहण करके अपने कंठ में रोक लिया था उसके बाद उसमें से अमृत कलश निकला अमृत पान करने से सभी देवता अमृत हो गए और साथ ही उनमें इस बात का अभिमान भी आ गया कि वह सबसे बलशाली है फिर शिव जी ने सभी देवताओं के अभिमान तोड़ने के लिए यक्षेश्वर का रूप धारण किया

भगवान शिव के 19 अवतार

यक्षेश्वर भगवन देवताओं के आगे एक तिनका रखकर उसे काटने को कहा सभी देवताओं ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी पर फिर भी वह उस तिनके को नहीं काट पाए तभी वहां पर आकाशवाणी हुई की यक्षेश्वर सभी ग्रहों के विनाशक शिव स्वयं ही है तब सभी देवताओं ने भगवान शिव की स्तुति की और उनसे शमा मांगी और इसी कारण देवताओं का अभिमान तोड़ने के लिए उन्हें उन्नीसवा अवतार लेना पड़ा।

इस लेख में भगवान शिव के 19 अवतारों के नाम और उन्होंने अवतार क्यों धारण किए थे उसके पीछे क्या कारण था, की चर्चा की गई है

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) 2024

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima)

गुरु पूर्णिमा का खास पर्व इस साल 21 जुलाई यानी आज मनाया जा रहा है।  हिंदू धर्म में आषाढ़ पूर्णिमा का विशेष महत्व है, ऐसा इसलिए क्योंकि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही वेदों के रचयिता वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। आषाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।शास्त्रों में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दिया गया है, इसलिए इस दिन गुरू पूजन का विशेष महत्व बताया गया है।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) 2024

गुरु पूर्णिमा का महत्व

गुरु पूर्णिमा, जिसे "व्यास पूर्णिमा" कहा जाता है, महाभारत के महान लेखक वेद व्यास की जयंती के अवसर पर मनाई जाती है।

जून-जुलाई के महीने में पूर्णिमा का दिन गुरु पूर्णिमा मनाने का गवाह है।

हिंदू, बौद्ध और जैन इस दिन को विभिन्न रूपों में मनाते हैं।

हमारी संस्कृति के हिस्से के रूप में, हिंदू उस दिन वेद व्यास का सम्मान करते हैं।

शिष्य अपने शिक्षकों के प्रति अपने प्रेम, कृतज्ञता और समर्पण का इजहार करते हैं।

बौद्ध धर्म में, शिष्य गुरु पूर्णिमा के दिन "भगवान बुद्ध" की पूजा अर्चना करते हैं।

जैन धर्म की परंपरा के अनुसार लोग गुरु पूर्णिमा को गणधारा के "तीनोक गुहा" बनने के नाम पर त्रेणोक गुहा पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं।

सबसे पुरानी हिंदू पौराणिक कथाओं की मूल बातों के अनुसार, "भगवान शिव को पहले गुरु के रूप में दर्शाया गया है" और उनके दो शिष्य शनि और परशुराम थे।

उन्होंने पृथ्वी पर सभ्यता और धर्म का परिचय दिया। "भगवान शिव के आदिदेव और आदिगुरु" के नाम के पीछे यही कहानी है।

भगवान् शिव ने शनिदेव और भगवान् परशुराम के साथ सात लोगों को शिक्षा प्रदान किया और उसके बाद, वे "सप्तऋषियों" के रूप में जाने जाने लगे और उन्होंने पूरी दुनिया में शिव का ज्ञान वितरित किया।

पूर्णिमा अनुष्ठान की शुरुआत सुबह जल्दी उठकर स्नान करके की जाती है।

सफेद या पीले वस्त्र धारण करना आवश्यक है।

उसके बाद अपने गुरु सहित भगवान विष्णु, भगवान शिव, गुरु बृहस्पति, संत वेद व्यास से प्रार्थना करते हैं।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) 2024

इस अवसर पर छात्र सफेद कपड़े पर इन देवताओं के चित्र की पूजा करते हैं।

लोग गुरु के सम्मान के लिए फूल, दीपक, नैवेद्य, चंदन आदि का उपयोग करते हैं।

गुरु के चरणों को मंत्र जाप करके और उनके सम्मान को दिखाने के लिए फूल चढ़ाते हैं।

गुरु पूर्णिमा को उस व्यक्ति के लिए शुभ माना जाता है, जो संत बनना चाहता है और गुरु को अपना जीवन देना चाहता है, वह गुरु आश्रम में शामिल हो सकता है।

गुरु पूर्णिमा का पारंपरिक दृष्टिकोण आधुनिक दृष्टिकोण से बिल्कुल अलग है। पारंपरिक हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, शिष्य अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों के आधार पर अपने गुरु की पूजा करते हैं, लेकिन आज सभी शैक्षणिक संस्थानों के छात्र गुरु पूर्णिमा को शिक्षक दिवस के रूप में अपने शिक्षकों का धन्यवाद कर मनाते हैं।

भक्त कुछ तथ्यों के माध्यम से संत व्यास को याद करते हैं।

महर्षि व्यास को महाभारत और भगवद गीता के लेखक के रूप में जाना जाता है।

महर्षि व्यास अट्ठारह पुराणों के रचयिता थे।

व्यास को दत्तात्रेय के गुरु के रूप में दर्शाया गया है।

उन्हें सभी गुरुओं के गुरु के रूप में जाना जाता था।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima) 2024


बुजुर्गों का अनुभव

बुजुर्गों का अनुभव

एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार किसी राज्य में एक जवान व्यक्ति राजा बना। उसने मंत्रियों को आदेश दे दिया कि बूढ़े लोग हमारे किसी काम के नहीं हैं। ये हमेशा बीमार रहते हैं, कोई काम नहीं करते, इनकी वजह से राज्य का पैसा बर्बाद होता है। सभी बूढ़ों को मृत्यु दंड दे दो। 

बुजुर्गों का अनुभव

जैसे ही ये आदेश राज्य के बूढ़ों को मालूम हुआ तो वे रातों रात दूसरे राज्य में चले गए। एक गरीब लड़का अपने पिता से बहुत प्रेम करता था, उसके पास इतना धन भी नहीं था कि वह घर छोड़कर दूसरे राज्य में जा सके। इसीलिए उसने अपने पिता को घर में ही छिपा लिया।

कुछ ही दिनों के बाद उस राज्य में अकाल पड़ गया। राजा को समझ नहीं आ रहा था कि अब प्रजा के खाने की व्यवस्था कैसे की जाए? उन दिनों भीषण गर्मी भी पड़ रही थी। गरीब लड़के ने अपने बूढ़े पिता से अकाल से निपटने का उपाय पूछा। उसके पिता ने कहा कि राज्य से कुछ ही दूर ही हिमालय स्थित था। गर्मी से हिमालय की बर्फ पिघलने लगेगी और वह पानी उस राज्य की ओर बहता हुआ आएगा। वह पानी यहां आए इससे पहले तुम एक काम करो राज्य के मार्ग पर दोनों तरफ हल चला दो।  


लड़के ने राज्य के लोगों को ये उपाय बताया, लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं मानी। लड़के ने अकेले ही रास्ते पर दोनों तरफ हल चला दिया। जल्दी ही हिमालय का पानी राज्य के रास्ते पर आ गया। कुछ ही दिनों में राज्य की सड़कों पर अनाज के पौधे उग आए। जब ये बात राजा को मालूम हुई तो उस गरीब लड़के को दरबार में बुलवाया गया। राजा ने लड़के से पूछा कि ये अनाज उगाने का ये उपाय तुम्हें किसने बताया?


लड़के ने कहा कि महाराज ये उपाय मेरे पिता ने बताया था। आपने जब बूढ़ों को मारने का आदेश दिया था, तो मैंने उन्हें अपने घर में छिपा लिया था। ये सुनकर राजा ने उस बूढ़े व्यक्ति को भी दरबार में बुलवाया। बूढ़े व्यक्ति ने राजा से कहा कि महाराज हमारे राज्य से लोग अपने खेतों से अनाज अपने घर ले जाते थे और कुछ लोग दूसरे राज्य अनाज बेचने जाते थे तो अनाज के कुछ दाने रास्ते के दोनों और गिर जाते थे। जब मेरे बेटे ने रास्ते की दोनों तरफ हल चलाया और हिमालय का पिघला हुआ पानी वहां पहुंचा तो वो दाने अंकूरित हो गए और अनाज उग गया।  बूढ़े व्यक्ति की ये बात सुनकर राजा को अपने आदेश का बहुत पछतावा हुआ और राज्य से गए हुए सभी बूढ़े लोगों को वापस अपने राज्य में बुलवा लिया। 


                         

शिक्षा :- बड़े-बूढ़े लोग बेकार नहीं होते हैं। उनका अनुभव हमें बड़ी-बड़ी कठिनाइयों से बचा सकता है। इसीलिए सभी वृद्ध का सम्मान करना चाहिए।

गोपालदास "नीरज" (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018) || Gopaldas-"Neeraj"

गोपालदास "नीरज"

जन्म - 4 जनवरी 1925, उत्तर प्रदेश
मौत - 19 जुलाई 2018, दिल्ली

पद्मश्री और पद्म विभूषण से सम्मानित हिंदी के कवि गोपालदास "नीरज" जी को कौन नहीं जानता, ये हिंदी साहित्यकार, शिक्षक, कवि और फिल्मों के गीत के लेखक भी थे। गोपालदास नीरज जी कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक भी थे। वे पहले व्यक्ति थे, जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। 

गोपालदास "नीरज" (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018) || Gopaldas-"Neeraj"

गोपालदास सक्सेना इनका पूरा नाम था। लोग इन्हें प्यार से नीरज पुकारते थे। "नीरज" जी का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गाँव में बाबू ब्रजकिशोर सक्सेना जी के यहाँ हुआ था। मात्र 6 वर्ष की आयु में पिता गुजर गये थे। 1942 में एटा से हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 

गोपालदास "नीरज" (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018) || Gopaldas-"Neeraj"

शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की। लम्बी बेकारी के बाद दिल्ली जाकर सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहाँ से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डी०ए०वी कॉलेज में क्लर्की की। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी में पाँच वर्ष तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएँ देकर 1949 में इण्टरमीडिएट, 1951 में बी०ए० और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिन्दी साहित्य से एम०ए० किया।

गोपालदास "नीरज" (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018) || Gopaldas-"Neeraj"

मेरठ कॉलेज, मेरठ में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया, किन्तु कॉलेज प्रशासन द्वारा उन पर कक्षाएँ न लेने व रोमांस करने के आरोप लगाये गये, जिससे कुपित होकर नीरज ने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद वे अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हो गये और मैरिस रोड जनकपुरी अलीगढ़ में स्थायी आवास बनाकर रहने लगे।

गोपालदास "नीरज" (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018) || Gopaldas-"Neeraj"

कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को बम्बई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में नई उमर की नई फसल के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा।

किन्तु बम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका मन बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये।

गोपालदास "नीरज" (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018) || Gopaldas-"Neeraj"

कई दिनों की लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उन्होंने 19 जुलाई 2018 की शाम लगभग 8 बजे अंतिम सांस ली। वह फेफड़ों में संक्रमण से जूझ रहे थे। नीरज ने 93 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन उनके रचना संसार का फलक इतना बड़ा है कि अपने चाहने वालों के दिलों में वे आजीवन जिंदा रहेंगे।

गोपालदास "नीरज" (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018) || Gopaldas-"Neeraj"

अपने बारे में उनका यह शेर आज भी मुशायरों में फरमाइश के साथ सुना जाता है:

इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥

मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियाँ.. मानसरोवर-1 ..दिल की रानी

 मानसरोवर-1 ..दिल की रानी

दिल की रानी - मुंशी प्रेमचंद | Dil Ki Rani by Munshi Premchand

1

जिन वीर तुर्कों के प्रखर प्रताप से ईसाई-दुनिया काँप रही थी, उन्हीं का रक्त आज कुस्तुन्तुनिया की गलियों में बह रहा है। वही कुस्तुन्तुनिया जो सौ साल पहले तुर्कों के आतंक से आहत हो रहा था, आज उनके गर्म रक्त से अपना कलेजा ठंडा कर रहा है। और तुर्की सेनापति एक लाख सिपाहियों के साथ तैमूरी तेज के सामने अपनी किस्मत का फैसला सुनने के लिये खड़ा है।

दिल की रानी - मुंशी प्रेमचंद | Dil Ki Rani by Munshi Premchand

तैमूर ने विजय से भरी आँखें उठाई और सेनापति यजदानी की ओर देख कर सिंह के समान गरजा- क्या चाहते हो जिंदगी या मौत ?

यजदानी ने गर्व से सिर उठाकार कहा- इज्जत की जिंदगी मिले तो जिंदगी, वरना मौत।

तैमूर का क्रोध प्रचंड हो उठा। उसने बड़े-बड़े अभिमानियों का सिर नीचा कर दिया था। यह जबाब इस अवसर पर सुनने की उसे ताव न थी । इन एक लाख आदमियों की जान उसकी मुट्ठी में है। इन्हें वह एक क्षण में मसल सकता है। उस पर इतना अभिमान ! इज्जत की जिंदगी ! इसका यही तो अर्थ है कि गरीबों का जीवन अमीरों के भोग-विलास पर बलिदान किया जाय, वही शराब की मजलिसें, वही अरमीनिया और काफ की परियाँ। नहीं, तैमूर ने खलीफा बायजीद का घमंड इसलिये नहीं तोड़ा है कि तुर्कों को फिर उसी मदांध स्वाधीनता में इस्लाम का नाम डुबाने को छोड़ दे । तब उसे इतना रक्त बहाने की क्या जरूरत थी । मानव-रक्त का प्रवाह संगीत का प्रवाह नहीं, रस का प्रवाह नहीं- एक बीभत्स दृश्य है, जिसे देखकर आँखें मुँह फेर लेती हैं दृश्य सिर झुका लेता है। तैमूर हिंसक पशु नहीं है, जो यह दृश्य देखने के लिये अपने जीवन की बाजी लगा दे।

वह अपने शब्दों में धिक्कार भरकर बोला- जिसे तुम इज्जत की जिंदगी कहते हो, वह गुनाह और जहन्नुम की जिंदगी है।

यजदानी को तैमूर से दया या क्षमा की आशा न थी। उसकी या उसके योद्धाओं की जान किसी तरह नहीं बच सकती। फिर यह क्यों दबे और क्यों न जान पर खेलकर तैमूर के प्रति उसके मन में जो घृणा है, उसे प्रकट कर दे। उसने एक बार कातर नेत्रों से उस रूपवान युवक की ओर देखा, जो उसके पीछे खड़ा, जैसे अपनी जवानी की लगाम खींच रहा था। सान पर चढ़े हुए, इस्पात के समान उसके अंग-अंग से अतुल क्रोध की चिनगारियाँ निकल रही थीं। यजदानी ने उसकी सूरत देखी और जैसे अपनी खींची हुई तलवार म्यान में कर ली और खून के घूँट पीकर बोला- जहाँपनाह इस वक्त फतहमंद हैं लेकिन अपराध क्षमा हो तो कह दूँ कि अपने जीवन के विषय में तुर्कों को तातारियों से उपदेश लेने की जरूरत नहीं। दुनिया से अलग, तातार के ऊसर मैदानों में न त्याग और व्रत की उपासना की जा सकती है और न मयस्सर होने वाले पदार्थों का बहिष्कार किया जा सकता है; पर जहाँ खुदा ने नेमतों की वर्षा की हो, वहाँ उन नेमतों का भोग न करना नाशुक्री है। अगर तलवार ही सभ्यता की सनद होती, तो गाल कौम रोमनों से कहीं ज्यादा सभ्य होती।

तैमूर जोर से हँसा और उसके सिपाहियों ने तलवारों पर हाथ रख लिये। तैमूर का ठहाका मौत का ठहाका था या गिरनेवाले वज्र का तड़ाका ।

'तातारवाले पशु हैं क्यों ?'

'मैं यह नहीं कहता।'

तुम कहते हो, खुदा ने तुम्हें ऐश करने के लिये पैदा किया है। मैं कहता हूँ, यह कुफ्र है। खुदा ने इन्सान को बंदगी के लिये पैदा किया है और इसके खिलाफ जो कोई कुछ करता है, वह काफिर है, जहन्नुमी है। रसूलेपाक हमारी जिंदगी को पाक करने के लिये, हमें सच्चा इन्सान बनाने के लिये आये थे, हमें हराम की तालीम देने नहीं। तैमूर दुनिया को इस कुफ्र से पाक कर देने का बीड़ा उठा चुका है। रसूलेपाक के कदमों की कसम, मैं बेरहम नहीं हूँ जालिम नहीं हूँ, खूँख्वार नहीं हूँ, लेकिन कुफ्र की सजा मेरे ईमान में मौत के सिवा कुछ नहीं है।

उसने तातारी सिपहसालार की तरफ कातिल नजरों से देखा और तत्क्षण एक देव-सा आदमी तलवार सौंतकर यजदानी के सिर पर आ पहुँचा। तातारी सेना भी तलवारें खींच-खींचकर तुर्की सेना पर टूट पड़ी और दम-के-दम में कितनी ही लाशें जमीन पर फड़कने लगीं।

2

सहसा वही रूपवान युवक, जो यजदानी के पीछे खड़ा था, आगे बढ़कर तैमूर के सामने आया और जैसे मौत को अपनी दोनों बँधी हुई मुट्ठियों में मसलता हुआ बोला- ऐ अपने को मुसलमान कहने वाले बादशाह! क्या यही वह इस्लाम है,जिसकी तबलीग का तूने बीड़ा उठाया है ? इस्लाम की यही तालीम है कि तू उन बहादुरों का इस बेदर्दी से खून बहाये, जिन्होंने इसके सिवा कोई गुनाह नहीं किया कि अपने खलीफा और मुल्क की हिमायत की।

चारों तरफ सन्नाटा छा गया। एक युवक, जिसकी अभी मसें भी न भीगी थीं; तैमूर जैसे तेजस्वी बादशाह का इतने खुले हुए शब्दों में तिरस्कार करे और उसकी जबान तालू से न खिंचवा ली जाय ! सभी स्तंभित हो रहे थे और तैमूर सम्मोहित-सा बैठा , उस युवक की ओर ताक रहा था।

युवक ने तातारी सिपाहियों की तरफ, जिनके चेहरों पर कुतूहलमय प्रोत्साहन झलक रहा था, देखा और बोला- तू इन मुसलमानों को काफिर कहता है और समझता है कि तू इन्हें कत्ल‍ करके खुदा और इस्लाम की खिदमत कर रहा है ? मैं तुमसे पूछता हूँ, अगर वह लोग जो खुदा के सिवा और किसी के सामने सिजदा नहीं करते, जो रसूलेपाक को अपना रहबर समझते हैं, मुसलमान नहीं हैं तो कौन मुसलमान है ? मैं कहता हूँ, हम काफिर सही लेकिन तेरे तो हैं क्या इस्लाम जंजीरों में बंधे हुए कैदियों के कत्ल की इजाजत देता है? खुदा ने अगर तुझे ताकत दी है, अख्तियार दिया है तो क्या इसीलिये कि तू खुदा के बंदों का खून बहाये ? क्या गुनाहगारों को कत्ल करके तू उन्हें सीधे रास्ते पर ले जायगा? तूने कितनी बेहरमी से सत्तर हजार बहादुर तुर्कों को धोखा देकर सुरंग से उड़वा दिया और उनके मासूम बच्चों और निरपराध स्त्रियों को अनाथ कर दिया, तूझे कुछ अनुमान है। क्या यही कारनामे हैं, जिन पर तू अपने मुसलमान होने का गर्व करता है। क्या इसी कत्ल, खून और बहते दरिया से तू दुनिया में अपना नाम रोशन करेगा ? तूने तुर्कों के खून बहते दरिया में अपने घोड़ों के सुम नहीं भिगाये हैं, बल्कि इस्लाम को जड़ से खोदकर फेंक दिया है। यह वीर तुर्कों का ही आत्मोत्सर्ग है, जिसने यूरोप में इस्लाम की तौहीद फैलाई। आज सोफिया के गिरजे में तूझे अल्लाहो अकबर की सदा सुनाई दे रही है, सारा यूरोप इस्लाम का स्वागत करने को तैयार है। क्या यह कारनामे इसी लायक हैं कि उनका यह इनाम मिले। इस खयाल को दिल से निकाल दे कि तू खूँरेजी से इस्लाम की खिदमत कर रहा है। एक दिन तुझे भी परवरदिगार के सामने अपने कर्मों का जवाब देना पड़ेगा और तेरा कोई उज्र न सुना जायगा; क्योंकि अगर तुझमें अब भी नेक और बद की तमीज बाकी है, तो अपने दिल से पूछ। तूने यह जिहाद खुदा की राह में किया या अपनी हविस के लिये और मैं जानता हूँ, तुझे जो जवाब मिलेगा, वह तेरी गर्दन शर्म से झुका देगा।

सम्पूर्ण मानसरोवर कहानियाँ मुंशी प्रेमचंद्र

खलीफा अभी सिर झुकाये ही था कि यजदानी ने काँपते हुए शब्दों में अर्ज की- जहाँपनाह, यह गुलाम का लड़का है। इसके दिमाग में कुछ फितूर है। हुजूर इसकी गुस्ताखियों को मुआफ करें । मैं उसकी सजा झेलने को तैयार हूँ।

तैमूर उस युवक के चेहरे की तरफ स्थिर नेत्रों से देख रहा था। आज जीवन में पहली बार उसे निर्भीक शब्दों को सुनने का अवसर मिला। उसके सामने बड़े-बड़े सेनापतियों, मंत्रियों और बादशाहों की जबान न खुलती थी। वह जो कुछ कहता था, वही कानून था, किसी को उसमें चूँ करने की ताकत न थी। उनकी खुशामदों ने उसकी अहमन्यता को आसमान पर चढ़ा दिया था। उसे विश्वास हो गया था कि खुदा ने इस्लाम को जगाने और सुधारने के लिये ही उसे दुनिया में भेजा है। उसने पैगंबरी का दावा तो नहीं किया, पर उसके मन में यह भावना दृढ़ हो गयी थी; इसलिये जब आज एक युवक ने प्राणों का मोह छोड़कर उसकी कीर्ति का परदा खोल दिया, तो उसकी चेतना जैसे जाग उठी। उसके मन में क्रोध और हिंसा की जगह श्रद्धा का उदय हुआ। उसकी आँखों का एक इशारा इस युवक की जिंदगी का चिराग गुल कर सकता था । उसकी संसार विजयिनी शक्ति के सामने यह दुधमुँहा बालक मानो अपने नन्हे-नन्हे हाथों से समुद्र के प्रवाह को रोकने के लिये खड़ा हो। कितना हास्यास्पद साहस था; पर उसके साथ ही कितना आत्म विश्वास से भरा हुआ। तैमूर को ऐसा जान पड़ा कि इस निहत्थे बालक के सामने वह कितना निर्बल है। मनुष्य मे ऐसे साहस का एक ही स्रोत हो सकता है और वह सत्य पर अटल विश्वास है। उसकी आत्मा दौड़कर उस युवक के दामन में चिमट जाने ‍के लिये अधीर हो गयी। वह दार्शनिक न था, जो सत्य में शंका करता है। वह सरल सैनिक था, जो असत्य‍ को भी विश्वास के साथ सत्य बना देता है।

यजदानी ने उसी स्वर में कहा- जहाँपनाह, इसकी बदजबानी का खयाल न फरमावें।

तैमूर ने तुरंत तख्त से उठकर यजदानी को गले से लगा लिया और बोला- काश, ऐसी गुस्ताखियों और बदजबानियों के सुनने का पहने इत्तफाक होता, तो आज इतने बेगुनाहों का खून मेरी गर्दन पर न होता। मुझे इस जवान में किसी फरिश्ते की रूह का जलवा नजर आता है, जो मुझ जैसे गुमराहों को सच्चा रास्ता दिखाने के लिये भेजी गयी है। मेरे दोस्त, तुम खुशनसीब हो कि ऐसे फरिश्ता-सिफत बेटे के बाप हो। क्या मैं उसका नाम पूछ सकता हूँ।

यजदानी पहले आतशपरस्त था, पीछे मुसलमान हो गया था; पर अभी तक कभी-कभी उसके मन में शंकाएँ उठती रहती थीं कि उसने क्यों इस्लाम कबूल किया। जो कैदी फाँसी के तख्ते पर खड़ा सूखा जा रहा था कि एक क्षण में रस्सी उसकी गर्दन में पड़ेगी और वह लटकता रह जायगा, उसे जैसे किसी फरिश्ते ने गोद में ले लिया। वह गद्‍गद्‍ कंठ से बोला- उसे हबीब कहते हैं।

तैमूर ने युवक के सामने जाकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे आँखों से लगाता हुआ बोला- मेरे जवान दोस्त, तुम सचमुच खुदा के हबीब हो, मैं वह गुनाहगार हूँ, जिसने अपनी जहालत में हमेशा अपने गुनाहों को सवाब समझा, इसलिये कि मुझसे कहा जाता था, तेरी जात बेऐब है। आज मूझे यह मालूम हुआ कि मेरे हाथों इस्लाम को कितना नुकसान पहुँचा। आज से मैं तुम्हारा ही दामन पकड़ता हूँ। तुम्हीं मेरे खिज्र, तुम्हीं मेरे रहनुमा हो। मुझे यकीन हो गया कि तुम्हारे ही वसीले से मैं खुदा की दरगाह तक पहुँच सकता हूँ।

यह कहते हुए उसने युवक के चेहरे पर नजर डाली, तो उस पर शर्म की लाली छायी हुई थी। उस कठोरता की जगह मधुर संकोच झलक रहा था।

युवक ने सिर झुकाकर कहा- यह हुजूर की कदरदानी है, वरना मेरी क्या हस्ती है।

तैमूर ने उसे खींचकर अपनी बगल के तख्त पर बिठा दिया और अपने सेनापति को हुक्म दिया, सारे तुर्क कैदी छोड़ दिये जायें उनके हथियार वापस कर दिये जायँ और जो माल लूटा गया है, वह सिपाहियों में बराबर बाँट दिया जाय।

वजीर तो इधर इस हुक्म की तामील करने लगा, उधर तैमूर हबीब का हाथ पकड़े हुए अपने खेमे में गया और दोनों मेहमानों की दावत का प्रबंध करने लगा। और जब भोजन समाप्त हो गया, तो उसने अपने जीवन की सारी कथा रो-रोकर कह सुनाई, जो आदि से अंत तक मिश्रित पशुता और बर्बरता के कृत्यों से भरी हुई थी। और उसने यह सब कुछ इस भ्रम में किया कि वह ईश्वरीय आदेश का पालन कर रहा है। वह खुदा को कौन मुँह दिखायेगा। रोते-रोते उसकी हिचकियाँ बंध गयीं।

अंत में उसने हबीब से कहा- मेरे जवान दोस्त अब मेरा बेड़ा आप ही पार लगा सकते हैं। आपने मुझे राह दिखाई है तो मंजिल पर पहुँचाइए। मेरी बादशाहत को अब आप ही संभाल सकते हैं। मुझे अब मालूम हो गया कि मैं उसे तबाही के रास्ते पर लिये जाता था । मेरी आपसे यही इल्तज़ा (प्रार्थना) है कि आप उसकी वजारत कबूल करें। देखिये , खुदा के लिये इंकार न कीजिएगा, वरना मैं कहीं का नहीं रहूँगा।

यजदानी ने अरज की- हुजूर इतनी कदरदानी फरमाते हैं, तो आपकी इनायत है, लेकिन अभी इस लड़के की उम्र ही क्या है। वजारत की खिदमत यह क्या अंजाम दे सकेगा । अभी तो इसकी तालीम के दिन हैं।

इधर से इंकार होता रहा और उधर तैमूर आग्रह करता रहा। यजदानी इंकार तो कर रहे थे, पर छाती फूली जाती थी । मूसा आग लेने गये थे, पैगंबरी मिल गयी। कहाँ मौत के मुँह में जा रहे थे, वजारत मिल गयी, लेकिन यह शंका भी थी कि ऐसे अस्थिर-चित्त आदमी का क्या ठिकाना ? आज खुश हुए, वजारत देने को तैयार हैं, कल नाराज हो गये तो जान की खैरियत नहीं। उन्हें हबीब की लियाकत पर भरोसा था, फिर भी जी डरता था कि बिराने देश में न जाने कैसी पड़े, कैसी न पड़े। दरबारवालों में षड्‍यंत्र होते ही रहते हैं। हबीब नेक है, समझदार है, अवसर पहचानता है; लेकिन वह तजरबा कहाँ से लायेगा, जो उम्र ही से आता है।

उन्होंने इस प्रश्न पर विचार करने के लिये एक दिन की मुहलत माँगी और रूखसत हुए।

3

हबीब यजदानी का लड़का नहीं लड़की थी। उसका नाम उम्म तुल हबीब था। जिस वक्त यजदानी और उसकी पत्नी मुसलमान हुए, तो लड़की की उम्र कुल बारह साल की थी, पर प्रकृति ने उसे बुद्धि और प्रतिभा के साथ विचार-स्वातंत्र्य भी प्रदान किया था। वह जब तक सत्यासत्य की परीक्षा न कर लेती, कोई बात स्वीकार न करती। माँ-बाप के धर्म-परिवर्तन से उसे अशांति तो हुई, पर जब तक इस्लाम का अच्छी तरह अध्ययन न कर ले, वह केवल माँ-बाप को खुश करने के लिये इस्लाम की दीक्षा नहीं ले सकती थी। माँ-बाप भी उस पर किसी तरह का दबाब न डालना चाहते थे। जैसे उन्हें अपने धर्म को बदल देने का अधिकार है, वैसे ही उसे अपने धर्म पर आरूढ़ रहने का भी अधिकार है। लड़की को संतोष हुआ; लेकिन उसने इस्लाम और जरथुश्ते धर्म- दोनों ही का तुलनात्मक अध्ययन आरंभ किया और पूरे दो साल के अन्वेषण और परीक्षण के बाद उसने भी इस्लाम की दीक्षा ले ली। माता-पिता फूले न समाये। लड़की उनके दबाव से मुसलमान नहीं हुई है, बल्कि स्वेच्छा से, स्वाध्याय से और ईमान से। दो साल तक उन्हें जो शंका घेरे रहती थी , वह मिट गयी।

यजदानी के कोई पुत्र न था और उस युग में जब कि आदमी की तलवार ही सबसे बड़ी अदालत थी, पुत्र का न रहना संसार का सबसे बड़ा दुर्भाग्य था। यजदानी बेटे का अरमान बेटी से पूरा करने लगा। लड़कों ही की भाँति उसकी शिक्षा-दीक्षा होने लगी। वह बालकों के से कपड़े पहनती, घोड़े पर सवार होती, शस्त्र -विद्या सीखती और अपने बाप के साथ अक्सर खलीफा बायजीद के महलों में जाती और राजकुमारी के साथ शिकार खेलने जाती। इसके साथ ही वह दर्शन, काव्य, विज्ञान और अध्यात्म का भी अभ्यास करती थी। यहाँ तक कि सोलहवें वर्ष में वह फौजी विद्यालय में दाखिल हो गयी और दो साल के अंदर वहाँ की सबसे ऊँची परीक्षा पास करके फौज में नौकर हो गयी। शस्त्र -विद्या और सेना-संचालन कला में इतनी निपुण थी और खलीफा बायजीद उसके चरित्र से इतना प्रसन्न था कि पहले ही पहल उसे एक हजारी मनसब मिल गया ।

ऐसी युवती के चाहनेवालों की क्या कमी। उसके साथ के कितने ही अफसर, राज परिवार के कितने ही युवक उस पर प्राण देते थे , पर कोई उसकी नजरों में न जँचता था । नित्य ही निकाह के पैगाम आते थे , पर वह हमेशा इंकार कर देती थी। वैवाहिक जीवन ही से उसे अरूचि थी- कि युवतियाँ कितने अरमानों से ब्याह कर लायी जाती हैं और फिर कितने निरादर से महलों में बंद कर दी जाती है। उनका भाग्य पुरूषों की दया के अधीन है। अक्सर ऊँचे घरानों की महिलाओं से उसको मिलने-जुलने का अवसर मिलता था। उनके मुख से उनकी करूण कथा सुनकर वह वैवाहिक पराधीनता से और भी घृणा करने लगती थी। और यजदानी उसकी स्वाधीनता में बिलकुल बाधा न देता था। लड़की स्वाधीन है, उसकी इच्छा हो, विवाह करे या क्‍वाँरी रहे, वह अपनी आप मुखतार है। उसके पास पैगाम आते, तो वह साफ जवाब दे देता- मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता, इसका फैसला वही करेगी। यद्यपि एक युवती का पुरूष वेष में रहना, युवकों से मिलना-जुलना , समाज में आलोचना का विषय था, पर यजदानी और उसकी स्त्री दोनों ही को उसके सतीत्व पर विश्वास था, हबी‍ब के व्यवहार और आचार में उन्हें कोई ऐसी बात नजर न आती थी, जिससे उन्हें किसी तरह की शंका होती। यौवन की आँधी और लालसाओं के तूफान में वह चौबीस वर्षों की वीरबाला अपने हृदय की संपति लिये अटल और अजेय खड़ी थी , मानों सभी युवक उसके सगे भाई हैं।

4

कुस्तुन्तुनिया में कितनी खुशियाँ मनायी गयीं, हबीब का कितना सम्मान और स्वागत हुआ, उसे कितनी बधाइयाँ मिली, यह सब लिखने की बात नहीं। शहर तबाह हुआ जाता था। संभव था आज उसके महलों और बाजारों से आग की लपटें निकलती होतीं। राज्य और नगर को उस कल्पनातीत विपत्ति से बचानेवाला आदमी कितने आदर, प्रेम श्रद्धा और उल्लस का पात्र होगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती । उस पर कितने फूलों और कितने लाल-जवाहरों की वर्षा हुई, इसका अनुमान तो कोई ‍कवि ही कर सकता है। और नगर की महिलाएँ हृदय के अक्षय भंडार से असीसें निकाल- निकालकर उस पर लुटाती थी और गर्व से फूली हुई उसका मुँह निहारकर अपने को धन्य मानती थीं । उसने देवियों का मस्तक ऊँचा कर दिया था।

रात को तैमूर के प्रस्‍ताव पर विचार होने लगा। सामने गद्देदार कुर्सी पर यजदानी था- सौम्य, विशाल और तेजस्वी। उसकी दाहिनी तरफ उसकी पत्नी थी, ईरानी लिबास में, आँखों में दया और विश्वास की ज्योति भरे हुए। बायीं तरफ उम्मुतुल हबीब थी, जो इस समय रमणी-वेष में मोहिनी बनी हुई थी, ब्रह्मचर्य के तेज से दीप्त।

यजदानी ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा- मैं अपनी तरफ से कुछ नहीं कहना चाहता , लेकिन यदि मुझे सलाह देने का अधिकार है, तो मैं स्पष्ट कहता हूँ कि तुम्हें इस प्रस्ताव को कभी स्वीकार न करना चाहिए , तैमूर से यह बात बहुत दिन तक छिपी नहीं रह सकती कि तुम क्या हो। उस वक्त क्या परिस्थिति होगी , मैं नहीं कह सकता। और यहाँ इस विषय में जो कुछ टीकाएँ होंगी, वह तुम मुझसे ज्यादा जानती हो। यहाँ मै मौजूद था और कुत्सा को मुँह न खोलने देता था पर वहाँ तुम अकेली रहोगी और कुत्सा को मनमाने, आरोप करने का अवसर मिलता रहेगा।

उसकी पत्नी स्वेच्छा को इतना महत्व न देना चाहती थी । बोली- मैंने सुना है, तैमूर निगाहों का अच्छा आदमी नहीं है। मैं किसी तरह तुझे न जाने दूगीं। कोई बात हो जाय तो सारी दुनिया हँसे। यों ही हँसनेवाले क्या कम हैं ?

इसी तरह स्त्री-पुरूष बड़ी देर तक ऊँच-नीच सुझाते और तरह-तरह की शंकाएँ करते रहे लेकिन हबीब मौन साधे बैठी हुई थी। यजदानी ने समझा, हबीब भी उनसे सहमत है। इंकार की सूचना देने के लिये ही था कि ‍हबीब ने पूछा- आप तैमूर से क्या़ कहेंगे ?

'यही जो यहाँ तय हुआ।'

'मैंने तो अभी कुछ नहीं कहा।'

'मैंने तो समझा , तुम भी हमसे सहमत हो।'

'जी नहीं। आप उनसे जाकर कह दें मै स्वीकार करती हूँ।'

माता ने छाती पर हाथ रखकर कहा- यह क्या गजब करती है बेटी। सोच तो दुनिया क्या कहेगी।

यजदानी भी सिर थामकर बैठ गये , मानो हृदय में गोली लग गयी हो। मुँह से एक शब्द भी न निकला।

हबीब त्योरियों पर बल डालकर बोली- अम्मीजान , मैं आपके हुक्म से जौ-भर भी मुँह नहीं फेरना चाहती। आपको पूरा अख्तियार है, मुझे जाने दें या न दें लेकिन मुल्क की खिदमत का ऐसा मौका शायद मुझे जिंदगी में फिर न मिले। इस मौके को हाथ से खो देने का अफसोस मुझे उम्र-भर रहेगा । मुझे यकीन है कि अमीर तैमूर को मैं अपनी दियानत, बेगरजी और सच्ची वफादारी से इन्सान बना सकती हूँ और शायद उसके हाथों खुदा के बंदो का खून इतनी कसरत से न बहे। वह दिलेर है, मगर बेरहम नहीं । कोई दिलेर आदमी बेरहम नहीं हो सकता । उसने अब तक जो कुछ किया है, मजहब के अंधे जोश में किया है। आज खुदा ने मुझे वह मौका दिया है कि मैं उसे दिखा दूँ कि मजहब खिदमत का नाम है, लूट और कत्ल का नहीं। अपने बारे में मुझे मुतलक अंदेशा नहीं है। मै अपनी हिफाजत आप कर सकती हूँ । मुझे दावा है कि अपने फर्ज को नेकनीयती से अदा करके मैं दुश्मनों की जुबान भी बंद कर सकती हूँ, और मान लीजिए मुझे नाकामी भी हो, तो क्या सचाई और हक के लिये कुर्बान हो जाना जिंदगीं की सबसे शानदार फतह नहीं है। अब तक मैंने जिस उसूल पर जिंदगी बसर की है, उसने मुझे धोखा नहीं दिया और उसी के फैज से आज मुझे यह दर्जा हासिल हुआ है, जो बड़े-बड़ो के लिये जिंदगी का ख्वाब है। मेरे आजमाये हुए दोस्त मुझे कभी धोखा नहीं दे सकते । तैमूर पर मेरी हकीकत खुल भी जाय, तो क्या खौफ । मेरी तलवार मेरी हिफाजत कर सकती है। शादी पर मेरे खयाल आपको मालूम हैं। अगर मुझे कोई ऐसा आदमी मिलेगा, जिसे मेरी रूह कबूल करती हो, जिसकी जात अपनी हस्तीक को खोकर मैं अपनी रूह को ऊँचा उठा सकूँ, तो मैं उसके कदमों पर गिरकर अपने को उसकी नजर कर दूगीं।

यजदानी ने खुश होकर बेटी को गले लगा लिया । उसकी स्त्री इतनी जल्द आश्वस्त न हो सकी। वह किसी तरह बेटी को अकेली न छोड़ेगी । उसके साथ वह भी जायगी।

5

कई महीने गुजर गये। युवक हबीब तैमूर का वजीर है, लेकिन वास्तव में वही बादशाह है। तैमूर उसी की आँखों से देखता है, उसी के कानों से सुनता है और उसी की अक्ल से सोचता है। वह चाहता है, हबीब आठों पहर उसके पास रहे। उसके सामीप्य में उसे स्वर्ग का-सा सुख मिलता है। समरकंद में एक प्राणी भी ऐसा नहीं, जो उससे जलता हो। उसके बर्ताव ने सभी को मुग्ध‍ कर लिया है, क्योंकि वह इन्साफ से जौ-भर भी कदम नहीं हटाता। जो लोग उसके हाथों चलती हुई न्याय की चक्की में पिस जाते हैं, वे भी उससे सद्‍भाव ही रखते हैं, क्योंकि वह न्याय को जरूरत से ज्यादा कटु नहीं होने देता।

संध्या हो गयी थी। राज्य कर्मचारी जा चुके थे । शमादान में मोम की बत्तियाँ जल रही थीं। अगर की सुगंध से सारा दीवानखाना महक रहा था। हबीब उठने ही को था कि चोबदार ने खबर दी- हुजूर जहाँपनाह तशरीफ ला रहे हैं।

हबीब इस खबर से कुछ प्रसन्न नहीं हुआ। अन्य मंत्रियों की भाँति वह तैमूर की सोहबत का भूखा नहीं है। वह हमेशा तैमूर से दूर रहने की चेष्टा करता है। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि उसने शाही दस्तरखान पर भोजन किया हो। तैमूर की मजलिसों में भी वह कभी शरीक नहीं होता। उसे जब शांति मिलती है, तब एकांत में अपनी माता के पास बैठकर दिन-भर का माजरा उससे कहता है और वह उस पर अपनी पसंद की मुहर लगा देती है।

उसने द्वार पर जाकर तैमूर का स्वागत किया। तैमूर ने मसनद पर बैठते हुए कहा- मुझे ताज्जुब होता है कि तुम इस जवानी में जाहिदों की-सी जिंदगी कैसे बसर करते हो ‍हबीब । खुदा ने तुम्हें वह हुस्न दिया है कि हसीन-से-हसीन नाजनीन भी तुम्हारी माशूक बनकर अपने को खुशनसीब समझेगी। मालूम नहीं तुम्हें खबर है या नहीं, जब तुम अपने मुश्की घोड़े पर सवार होकर निकलते हो तो समरकंद की खिड़कियों पर हजारों आँखें तुम्हारी एक झलक देखने के लिये मुंतजिर बैठी रहती हैं, पर तुम्हें किसी तरफ आँखें उठाते नहीं देखा । मेरा खुदा गवाह है, मै कितना चाहता हूँ कि तुम्हारे कदमों के नक्शे पर चलूँ; पर दुनिया मेरी गर्दन नहीं छोड़ती। मैं चाहता हूँ जैसे तुम दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग रहते हो , वैसे मैं भी रहूँ लेकिन मेरे पास न वह दिल है न वह दिमाग । मैं हमेशा अपने-आप पर, सारी दुनिया पर दाँत पीसता रहता हूँ। जैसे मुझे हरदम खून की प्यास लगी रहती है, जिसे तुम बुझने नहीं देते , और यह जानते हुए भी कि तुम जो कुछ करते हो, उससे बेहतर कोई दूसरा नहीं कर सकता , मैं अपने गुस्से को काबू में नहीं कर सकता । तुम जिधर से निकलते हो, मुहब्‍बत और रोशनी फैला देते हो। जिसको तुम्हारा दुश्मन होना चाहिए , वह तुम्हारा दोस्त है। मैं जिधर से निकलता हूँ नफरत और शुबहा फैलाता हुआ निकलता हूँ। जिसे मेरा दोस्त होना चाहिए वह भी मेरा दुश्मन है। दुनिया में बस एक ही जगह है, जहाँ मुझे आफियत मिलती है। अगर तुम मुझे समझते हो, यह ताज और तख्त मेरे रास्ते के रोड़े है, तो खुदा की कसम, मैं आज इन पर लात मार दूँ। मैं आज तुम्हारे पास यही दरख्वास्त लेकर आया हूँ कि तुम मुझे वह रास्ता दिखाओ , जिससे मै सच्ची खुशी पा सकूँ । मै चाहता हूँ , तुम इसी महल में रहो ताकि मैं तुमसे सच्ची जिंदगी का सबक सीखूँ।

हबीब का हृदय धक से हो उठा । कहीं अमीर पर नारीत्व का रहस्य खुल तो नहीं गया। उसकी समझ में न आया कि उसे क्या जवाब दे। उसका कोमल हृदय तैमूर की इस करूण आत्मग्लानि पर द्रवित हो गया । जिसके नाम से दुनिया काँपती है, वह उसके सामने एक दयनीय प्राणी बना हुआ उससे प्रकाश की भीक्षा माँग रहा है। तैमूर की उस कठोर विकृत शुष्क हिंसात्मक मुद्रा में उसे एक स्निग्ध मधुर ज्योति दिखाई दी, मानो उसका जाग्रत विवेक भीतर से झाँक रहा हो। उसे अपना स्थिर ‍जीवन, जिसमें ऊपर उठने की स्मृति ही न रही थी, इस विफल उद्योग के सामने तुच्छ जान पड़ा।

उसने मुग्ध कंठ से कहा- हजूर इस गुलाम की इतनी कद्र करते है, यह मेरी खुशनसीबी है, लेकिन मेरा शाही महल में रहना मुनासिब नहीं ।

तैमूर ने पूछा- क्यों

'इसलिये कि जहाँ दौलत ज्यादा होती है, वहाँ डाके पड़ते हैं और जहाँ कद्र ज्यादा होती है , वहाँ दुश्मन भी ज्यादा होते है।'

'तुम्हारा भी कोई दुश्मन हो सकता है।'

'मै खुद अपना दुश्मन हो जाऊँगा। आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन गरूर है।'

तैमूर को जैसे कोई रत्न मिल गया। उसे अपनी मनःतुष्टि का आभास हुआ। आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन गरूर है इस वाक्य को मन-ही-मन दोहरा कर उसने कहा- तुम मेरे काबू में कभी न आओगे हबीब। तुम वह परिंदा हो, जो आसमान में ही उड़ सकता है। उसे सोने के पिंजड़े में भी रखना चाहो तो फड़फड़ाता रहेगा। खैर, खुदा हाफिज।

वह तुरंत अपने महल की ओर चला, मानो उस रत्न को सुरक्षित स्थान में रख देना चाहता हो। यह वाक्य पहली बार उसने न सुना था पर आज इससे जो ज्ञान, जो आदेश जो सत्प्रेरणा उसे मिली, वह कभी न मिली थी।

6

इस्तखर के इलाके से बगावत की खबर आयी है। हबीब को शंका है कि तैमूर वहाँ पहुँचकर कहीं कत्लेआम न कर दे। वह शांतिमय उपायों से इस विद्रोह को ठंडा करके तैमूर को दिखाना चाहता है कि सद्‍भावना में कितनी शक्ति है। तैमूर उसे इस मुहिम पर नहीं भेजना चाहता लेकिन हबीब के आग्रह के सामने ‍बेबस है। हबीब को जब और कोई युक्ति न सूझी तो उसने कहा- गुलाम के रहते हुए हुजूर अपनी जान खतरे में डालें यह नहीं हो सकता ।

तैमूर मुस्कराया- मेरी जान की तुम्हारी जान के मुकाबले में कोई हकीकत नहीं है हबी‍ब ।फिर मैंने तो कभी जान की परवाह न की। मैंने दुनिया में कत्ल और लूट के सिवा और क्या यादगार छोड़ी। मेरे मर जाने पर दुनिया मेरे नाम को रोयेगी नहीं, यकीन मानो। मेरे जैसे लुटेरे हमेशा पैदा होते रहेंगे , लेकिन खुदा न करे, तुम्हारे दुश्मनों को कुछ हो गया, तो यह सल्तनत खाक में मिल जायगी, और तब मुझे भी सीने में खंजर चुभा लेने के सिवा और कोई रास्ता न रहेगा। मै नहीं कह सकता हबीब तुमसे मैंने कितना पाया। काश, दस-पाँच साल पहले तुम मुझे मिल जाते, तो तैमूर तारीख में इतना रूसियाह न होता। आज अगर जरूरत पड़े, तो मैं अपने जैसे सौ तैमूरों को तुम्हारे ऊपर निसार कर दूँ । यही समझ लो कि मेरी रूह‍ को अपने साथ लिये जा रहे हो। आज मै तुमसे कहता हूँ हबीब कि मुझे तुमसे इश्क है इसे मैं अब जान पाया हूँ । मगर इसमें क्या बुराई है कि मै भी तुम्हारे साथ चलूँ।

हबीब ने धड़कते हुए हृदय से कहा- अगर मैं आपकी जरूरत समझूँगा तो इत्तला दूंगा।

तैमूर ने दाढ़ी पर हाथ रखकर कहा- जैसी तुम्हारी मर्जी लेकिन रोजाना कासिद भेजते रहना, वरना शायद मैं बेचैन होकर चला आऊँ।

तैमूर ने कितनी मुहब्बत से हबीब के सफर की तैयारियाँ की। तरह-तरह के आराम और तकल्लुफ की चीजें उसके लिये जमा कीं। उस कोहिस्तान में यह चीजें कहाँ मिलेंगी। वह ऐसा संलग्न था, मानों माता अपनी लड़की को ससुराल भेज रही हो।

जिस वक्त हबीब फौज के साथ चला, तो सारा समरकंद उसके साथ था और तैमूर आँखों पर रूमाल रखे, अपने तख्त पर ऐसा सिर झुकाये बैठा था, मानो कोई पक्षी आहत हो गया हो।

7

इस्तखर अरमनी ईसाईयों का इलाका था, मुसलमानों ने उन्हें परास्त करके वहाँ अपना अधिकार जमा लिया था और ऐसे नियम बना दिये थे, जिससे ईसाइयों को पग-पग अपनी पराधीनता का स्मरण होता रहता था। पहला नियम जजिए का था, जो हरेक ईसाई को देना पड़ता ‍था, जिससे मुसलमान मुक्त थे। दूसरा नियम यह था कि गिरजों में घंटा न बजे। तीसरा नियम मदिरा का था, जिसे मुसलमान हराम समझते थे। ईसाईयों ने इन नियमों का क्रियात्मक विरोध किया और जब मुसलमान अधिकारियों ने शस्त्र-बल से काम लेना चाहा, तो ईसाइयों ने बगावत कर दी, मुसलमान सूबेदार को कैद कर लिया और किले पर सलीबी झंडा उड़ने लगा।

हबीब को यहाँ आज दूसरा दिन है; पर इस समस्या को कैसे हल करे। उसका उदार हृदय कहता था, ईसाइयों पर इन बंधनों का कोई अर्थ नहीं । हरेक धर्म का समान रूप से आदर होना चाहिए , लेकिन मुसलमान इन कैदों को हटा देने पर कभी राजी न होगें। और यह लोग मान भी जाएँ तो तैमूर क्यों मानने लगा। उसके धार्मिक विचारों में कुछ उदारता आई है, फिर भी वह इन कैदों को उठाना कभी मंजूर न करेगा, लेकिन क्या वह ईसाइयों को सजा दे कि वे अपनी धार्मिक स्वाधीनता के लिये लड़ रहे हैं। जिसे वह सत्य समझता है, उसकी हत्या कैसे करे। नहीं, उसे सत्य का पालन करना होगा, चाहे इसका नतीजा कुछ भी हो। अमीर समझेगें मैं जरूरत से ज्यादा बढ़ा जा रहा हूँ। कोई मुजायका नहीं।

दूसरे दिन हबीब ने प्रातःकाल डंके की चोट ऐलान कराया- जजिया माफ किया गया, शराब और घंटों पर कोई कैद नहीं है।

मुसलमानों में तहलका पड़ गया। यह कुफ्र है, हरामपरस्ती है। अमीर तैमूर ने जिस इस्लाम को अपने खून से सींचा, उसकी जड़ उन्हीं के वजीर हबीब पाशा के हाथों खुद रही है। पाँसा पलट गया। शाही फौज मुसलमानों से जा मिली। हबीब ने इस्तीखर के किले में पनाह ली। मुसलमानों की ताकत शाही फौज के मिल जाने से बहुत बढ़ गयी थी। उन्होंने किला घेर लिया और यह समझकर कि हबीब ने तैमूर से बगावत की है, तैमूर के पास इसकी सूचना देने और परिस्थिति समझाने के लिये कासिद भेजा।

8

आधी रात गुजर चुकी थी। तैमूर को दो दिनों से इस्तखर की कोई खबर न मिली थी। तरह-तरह की शंकाएँ हो रही थीं। मन में पछतावा हो रहा था कि उसने क्यों हबीब को अकेला जाने दिया । माना कि वह बड़ा नीतिकुशल है , ‍पर बगावत कहीं जोर पकड़ गयी तो मुट्ठी-भर आदमियों से वह क्या कर सकेगा । और बगावत यकीनन जोर पकड़ेगी । वहाँ के ईसाई बला के सरकश है। जब उन्हें मालूम होगा कि तैमूर की तलवार में जंग लग गया और उसे अब महलों की जिंदगी पसंद है, तो उनकी हिम्मत दूनी हो जायगी। हबीब कहीं दुश्मनों से घिर गया, तो बड़ा गजब हो जायगा।

उसने अपने जानू पर हाथ मारा और पहलू बदलकर अपने ऊपर झुँझलाया । वह इतना पस्तहिम्मात क्यों हो गया। क्या उसका तेज और शौर्य उससे विदा हो गया । जिसका नाम सुनकर दुश्मान में कंपन पड़ जाता था, वह आज अपना मुँह छिपाकर महलों में बैठा हुआ है। दुनिया की आँखों में इसका यही अर्थ हो सकता है कि तैमूर अब मैदान का शेर नहीं , कालीन का शेर हो गया । हबीब फरिश्ता है, जो इन्सा न की बुराइयों से वाकिफ नहीं। जो रहम और साफदिली और बेगरजी का देवता है, वह क्या जाने इन्सान कितना शैतान हो सकता है । अमन के दिनों में तो ये बातें कौम और मुल्क को तरक्की के रास्ते पर ले जाती हैं पर जंग में , जबकि शैतानी जोश का तू्फान उठता है इन खुशियों की गुंजाइश नहीं । उस वक्त तो उसी की जीत होती है , जो इन्सानी खून का रंग खेले, खेतों-खलिहानों को जलाये , जंगलों को बसाये और बस्तियों को वीरान करे। अमन का कानून जंग के कानून से जुदा है।

सहसा चोबदार ने इस्तखर से एक कासिद के आने की खबर दी। कासिद ने जमीन चूमी और एक किनारे अदब से खड़ा हो गया। तैमूर का रोब ऐसा छा गया कि जो कुछ कहने आया था, वह भूल गया।

तैमूर ने त्योरियाँ चढ़ाकर पूछा- क्या खबर लाया है। तीन दिन के बाद आया भी तो इतनी रात गये।

कासिद ने फिर जमीन चूमी और बोला- खुदाबंद वजीर साहब ने जजिया मुआफ कर दिया ।

तैमूर गरज उठा- क्या कहता है, जजिया माफ कर दिया।

'हाँ खुदाबंद।'

'किसने।'

'वजीर साहब ने।'

'किसके हुक्म से।'

'अपने हुक्म से हुजूर।'

'हूँ।'

'और हुजूर , शराब का भी हुक्म दे दिया।'

'हूँ।'

'गिरजों में घंटे बजाने का भी हुक्म हो गया है।'

'हूँ।'

'और खुदाबंद ईसाइयों से मिलकर मुसलमानों पर हमला कर दिया।'

'तो मै क्या करूँ ?'

'हुजूर हमारे मालिक हैं। अगर हमारी कुछ मदद न हुई तो वहाँ एक मुसलमान भी जिंदा न बचेगा।'

'हबीब पाशा इस वक्त कहाँ है।'

'इस्तखर के किले में हुजूर।'

'और मुसलमान क्या कर रहे हैं।'

'हमने ईसाइयों को किले में घेर लिया है।'

'उन्हींस के साथ हबीब को भी ?'

'हाँ हुजूर , वह हुजूर से बागी हो गये।'

और इसलिये मेरे वफादार इस्लाम के खादिमों ने उन्हें कैद कर रखा है। मुमकिन है, मेरे पहुँचते-पहुँचते उन्हें कत्ल भी कर दें। बदजात, दूर हो जा मेरे सामने से। मुसलमान समझते है, हबीब मेरा नौकर है और मै उसका आका हूँ। यह गलत है, झूठ है। इस सल्तनत का मालिक हबीब है, तैमूर उसका अदना गुलाम है। उसके फैसले में तैमूर दस्तंदाजी नहीं कर सकता । बेशक जजिया मुआफ होना चाहिए। मुझे मजाज नहीं कि दूसरे मजहब वालों से उनके ईमान का तावान लूँ। कोई मजाज नहीं है; अगर मस्जिद में अजान होती है, तो कलीसा में घंटा क्यों बजे। घंटे की आवाज में कुफ्र नहीं है। काफिर वह है, जा दूसरों का हक छीन ले जो गरीबों को सताये, दगाबाज हो, खुदगरज हो। काफिर वह नहीं, जो मिट्टी या पत्थर के एक टुकड़े में खुदा का नूर देखता हो, जो नदियों और पहाड़ों मे, दरख्तों और झाड़ियों में खुदा का जलवा पाता हो। वह हमसे और तुमसे ज्याकदा खुदापरस्त है, जो मस्जिद में खुदा को बंद समझते हैं। तू समझता है, मैं कुफ्र बक रहा हूँ ? किसी को काफिर समझना ही कुफ्र है। हम सब खुदा के बंदे हैं, सब । बस जा और उन बागी मुसलमानों से कह दे, अगर फौरन मुहासरा न उठा लिया गया, तो तैमूर कयामत की तरह आ पहुँचेगा।

कासिद हतबुद्धि-सा खड़ा ही था कि बाहर खतरे का बिगुल बज उठा और फौजें किसी समर-यात्रा की तैयारी करने लगीं।

9

तीसरे दिन तैमूर इस्तखर पहुँचा, तो किले का मुहासरा उठ चुका था। किले की तोपों ने उसका स्वागत किया। हबीब ने समझा, तैमूर ईसाइयों को सजा देने आ रहा है। ईसाइयों के हाथ-पाँव फूले हुए थे , मगर हबीब मुकाबले के लिये ‍तैयार था। ईसाइयों के स्वप्न की रक्षा में यदि जान भी जाय, तो कोई गम नहीं। इस मुआमले पर किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता। तैमूर अगर तलवार से काम लेना चाहता है, तो उसका जवाब तलवार से दिया जायगा।

मगर यह क्या बात है। शाही फौज सफेद झंडा दिखा रही है। तैमूर लड़ने नहीं सुलह करने आया है। उसका स्वागत दूसरी तरह का होगा। ईसाई सरदारों को साथ लिये हबीब किले के बाहर निकला। तैमूर अकेला घोड़े पर सवार चला आ रहा था। हबीब घोड़े से उतरकर आदाब बजा लाया। तैमूर घोड़े से उतर पड़ा और हबीब का माथा चूम लिया और बोला- मैं सब सुन चुका हूँ हबीब। तुमने बहुत अच्छा किया और वही किया जो तुम्हारे सिवा दूसरा नहीं कर सकता था। मुझे जजिया लेने का या ईसाइयों से मजहबी हक छीनने का कोई मजाज न था। मै आज दरबार करके इन बातों की तसदीक कर दूँगा और तब मैं एक ऐसी तजवीज बताऊँगा जो कई दिन से मेरे जेहन में आ रही है और मुझे उम्‍मीद है कि तुम उसे मंजूर कर लोगे। मंजूर करना पड़ेगा।

हबीब के चेहरे का रंग उड़ रहा था। कहीं हकीकत खुल तो नहीं गयी। वह क्या तजवीज है; उसके मन में खलबली पड़ गयी।

तैमूर ने मूस्कराकर पूछा- तुम मुझसे लड़ने को तैयार थे ?

हबीब ने शरमाते हुए कहा- हक के सामने अमीर तैमूर की भी कोई हकीकत नहीं।

बेशक-बेशक ! तुममें फरिश्तों का दिल है, तो शेरों की हिम्मत भी है, लेकिन अफसोस यही है कि तुमने यह गुमान ही क्यों किया कि तैमूर तुम्हारे फैसले को मंसूख कर सकता है। यह तुम्हारी जात है, जिसने मुझे बतलाया है कि सल्तनत किसी आदमी की जायदाद नहीं बल्कि एक ऐसा दरख्त है, जिसकी हरेक शाख और पत्ती एक-सी खुराक पाती है।

दोनों किले में दाखिल हुए। सूरज डूब चूका था । आन-की-आन में दरबार लग गया और उसमें तैमूर ने ईसाइयों के धार्मिक अधिकारों को स्वीकार किया।

चारों तरफ से आवाज आयी- खुदा हमारे शाहंशाह की उम्र दराज करे।

तैमूर ने उसी सिलसिले में कहा- दोस्तों , मैं इस दुआ का हकदार नहीं हूँ। जो चीज मैंने आपसे जबरन ली थी, उसे आपको वापस देकर मैं दुआ का काम नहीं कर रहा हूँ। इससे कही ज्यादा मुनासिब यह है कि आप मुझे लानत दें कि मैंने इतने दिनों तक आपके हकों से आपको महरूम रखा।

चारों तरफ से आवाज आयी- मरहबा ! मरहबा ! !

'दोस्तों, उन हकों के साथ-सा‍थ मैं आपकी सल्तनत भी आपको वापस करता हूँ क्योंकि खुदा की निगाह में सभी इन्सान बराबर है और किसी कौम या शख्स को दूसरी कौम पर हुकूमत करने का अख्तियार नहीं है। आज से आप अपने बादशाह है। मुझे उम्मीद है कि आप भी मुस्लिम आबादी को उसके जायज हकों से महरूम न करेंगे । मगर कभी ऐसा मौका आये कि कोई जाबिर कौम आपकी आजादी छीनने की कोशिश करे, तो तैमूर आपकी मदद करने को हमेशा तैयार रहेगा।

10

किले में जश्न खत्म हो चुका है। उमरा और हुक्काम रूखसत हो चुके हैं। दीवाने खास में सिर्फ तैमूर और हबीब रह गये हैं। हबीब के मुख पर आज स्मित हास्य की वह छटा है,जो सदैव गंभीरता के नीचे दबी रहती थी। आज उसके कपोलों पर जो लाली, आँखों में जो नशा, अंगों में जो चंचलता है, वह और कभी नजर न आयी थी। वह कई बार तैमूर से शोखियाँ कर चुका है, कई बार हँसी कर चुका है, उसकी युवती चेतना, पद और अधिकार को भूलकर चहकती फिरती है।

सहसा तैमूर ने कहा- हबीब, मैंने आज तक तुम्हारी हरेक बात मानी है। अब मै तुमसे यह तजवीज करता हूँ जिसका मैंने जिक्र किया था। उसे तुम्हें कबूल करना पड़ेगा।

हबीब ने धड़कते हुए हृदय से सिर झुकाकर कहा- फरमाइये।

'पहले वायदा करो कि तुम कबूल करोगे।'

'मैं तो आपका गुलाम हूँ।'

'नहीं, तुम मेरे मालिक हो, मेरी जिंदगी की रोशनी हो, तुमसे मैंने जितना फैज पाया है, उसका अंदाजा नहीं कर सकता । मैंने अब तक सल्तनत को अपनी जिंदगी की सबसे प्यारी चीज समझा था। इसके लिये मैंने वह सब कुछ किया जो मुझे न करना चाहिए था। अपनों के खून से भी इन हाथों को दागदार किया गैरों के खून से भी। मेरा काम अब खत्म हो चुका। मैंने बुनियाद जमा दी इस पर महल बनाना तुम्हारा काम है। मेरी यही इल्तजा है कि आज से तुम इस बादशाहत के अमीर हो जाओ, मेरी जिंदगी में भी और मरने के बाद भी।

हबीब ने आकाश में उड़ते हुए कहा- इतना बड़ा बोझ। मेरे कंधे इतने मजबूत नहीं हैं।

तैमूर ने दीन आग्रह के स्वर में कहा- नहीं मेरे प्यारे दोस्त , मेरी यह इल्तजा माननी पड़ेगी।

हबीब की आँखों में हँसी थी, अधरों पर संकोच । उसने आहिस्ता से कहा- मंजूर है।

तैमूर ने प्रफुल्लित स्वर में कहा- खुदा तुम्हें सलामत रखे।

'लेकिन अगर आपको मालूम हो जाय कि हबीब एक कच्ची- अक्ल की क्‍वाँरी बालिका है तो ?'

'तो वह मेरी बादशाहत के साथ मेरे दिल की भी रानी हो जायगी।'

'आपको बिल्कुल ताज्जुब नहीं हुआ?'

'मैं जानता था।'

'कब से ?'

'जब तुमने पहली बार अपनी जालिम आँखों से मुझे देखा।'

'मगर आपने छिपाया खूब !'

'तुम्हीं ने सिखाया। शायद मेरे सिवा यहाँ किसी को यह बात मालूम नहीं।'

'आपने कैसे पहचान लिया !'

तैमूर ने मतवाली आँखों से देखकर कहा- यह न बताऊँगा।

यही हबीब तैमूर की 'बेगम हमीदा' के नाम से मशहूर है।

ब्लीडिंग हार्ट (Bleeding Heart)

ब्लीडिंग हार्ट

अफीम के पौधे की एक अलग प्रजाति है, लैंप्रोकैपनोस (Lamprocapnos), इसी प्रजाति में उगता है ये फूल, जिसे ब्लीडिंग हार्ट (Bleeding Heart) कहते हैं। इस पौधे की खासियत इसके दिल के आकार के फूल हैं। इसको देखने से ऐसे लगता है कि मानो किसी के दिल से खून टपक रहा है, इसलिए इसे यह नाम दिया गया है। इस फूल का बाहरी हिस्सा हल्का गुलाबी रंग का होता है, अंदर का हिस्सा गहरे गुलाबी रंग होता है। 

ब्लीडिंग हार्ट (Bleeding Heart)

कई बार इसे लोग 'लेडी इन बाथ' भी कहते हैं। यानी जैसे कोई महिला नहा रही है, लेकिन ये नजारा इसके पूरा खिलने पर दिखता है। ये फूल साइबेरिया, उत्तरी चीन, कोरिया और जापान में मिलता है। 

ब्लीडिंग हार्ट जैसा नाम है, वैसा ही इस पौधे का फूल भी दिखता है। गुलाबी रंग के दिल के आकार के फूल की खूबसूरती इसे प्रेम और करुणा से जोड़ती है। यह लगभग हर मौसम में खिलता है मतलब एक शानदार बारहमासी पौधा है, जो अपनी अनूठी मौजूदगी से सभी का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है। 

ब्लीडिंग हार्ट (Bleeding Heart)

यह फूल अपनी सुंदरता और अनोखेपन के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। ब्लीडिंग हार्ट को वैज्ञानिक रूप से लैम्प्रोकैप्नोस स्पेक्टेबिलिस के नाम से जाना जाता है। ब्लीडिंग हार्ट का आकार और रंगों का संयोजन दुनिया में सबसे अनोखा माना जाता है। इसके दिल के आकार के फूल धनुषाकार तनों से सुंदर ढंग से लटकते हैं, गुलाबी रंग के चमकीले शेड के होते हैं और नीचे की तरफ एक बूंद लटकती सी दिखती है, जिसे देख कर लगता है कि दिल से खून बह रहा है। 

ब्लीडिंग हार्ट (Bleeding Heart)

ब्लीडिंग हार्ट छायादार जगहों में पनप सकते हैं। वे कई तरह की जलवायु के अनुकूल ढल सकते है। यही कारण है कि गार्डनिंग का शौक रखने वाले लोगों के लिए ये पौधे खासा पसंदीदा होते हैं, लेकिन इसके साथ ही ये पौधे खाने के लिहाज से जहरीले माने जाते हैं। इसमें ऐसे पदार्थ होते हैं, जो खाने से पेट में तकलीफ पैदा कर सकते हैं। इसीलिए सलाह दी जाती है कि पालतू जानवरों और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इसे उनकी पहुंच से दूर रखा जाए।

English Translate

Bleeding Heart

The opium plant has a different species, Lamprocapnos, and this flower, called Bleeding Heart, grows in this species. The specialty of this plant is its heart-shaped flowers. Looking at it, it seems as if blood is dripping from someone's heart, so it has been given this name. The outer part of this flower is light pink, the inner part is dark pink.

ब्लीडिंग हार्ट (Bleeding Heart)

Sometimes people also call it 'Lady in Bath'. That is, as if a woman is taking a bath, but this scene is seen when it is fully bloomed. This flower is found in Siberia, North China, Korea and Japan.

The flower of this plant looks just like the name Bleeding Heart. The beauty of the pink heart-shaped flower connects it with love and compassion. It blooms in almost every season, meaning it is a wonderful perennial plant, which attracts everyone's attention with its unique presence.

These flowers are known all over the world for their beauty and uniqueness. Bleeding Heart is scientifically known as Lamprocapnos spectabilis. The shape and colour combination of Bleeding Heart is considered to be the most unique in the world. Its heart-shaped flowers hang gracefully from arched stems, are of a bright shade of pink and a drop appears to be hanging at the bottom, which makes it seem that the heart is bleeding.

ब्लीडिंग हार्ट (Bleeding Heart)

Bleeding Heart can grow in shady places. They can adapt to many types of climates. This is why these plants are a favorite for people who are fond of gardening, but at the same time these plants are considered poisonous in terms of eating. It contains substances that can cause stomach problems if eaten. That is why it is advisable to keep it away from the reach of pets and children to ensure their safety.

बेट द्वारका - दंडी हनुमान || Bet Dwarka - Dandi Hanuman

 बेट द्वारका - दंडी हनुमान 

बेट द्वारका द्वीप पर द्वारकाधीश मंदिर से करीब तीन किलोमीटर दूर भगवान हनुमान का एक भव्य और अनोखा मंदिर है, जिसे हनुमानदंडी के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर तीर्थयात्री अखरोट की पूजा करते हैं। हनुमानदंडी के बारे में प्राचीन मान्यता है कि यह वह स्थान है, जहां भगवान हनुमान ने भगवान राम और भगवान लक्ष्मण को रसातल में पहुंचाया था और ऐसी मान्यता है कि यह वही स्थान है जहां पहली बार हनुमानजी अपने पुत्र मकरध्वज से मिले थे।

बेट द्वारका - दंडी हनुमान || Bet Dwarka - Dandi Hanuman

यह मंदिर किस तरह अनोखा है, यह जानना अधिक दिलचस्प है। इस स्थान पर मकर ध्वज के साथ में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है। कहते हैं कि पहले मकरध्वज की मूर्ति छोटी थी परंतु अब दोनों मूर्तियां एक सी ऊंची हो गई हैं। 

मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही सामने हनुमान पुत्र मकरध्वज की प्रतिमा है, वहीं पास में हनुमानजी की प्रतिमा भी स्थापित है। इन दोनों प्रतिमाओं की विशेषता यह है कि इन दोनों के हाथों कोई भी शस्त्र नहीं है और ये आनंदित मुद्रा में हैं। यह मंदिर 500 वर्ष पुराना है। भारत में यह पहला मंदिर जहाँ हनुमानजी और मकरध्वज (पिता -पुत्र) का मिलन दिखाया गया है।

बेट द्वारका - दंडी हनुमान || Bet Dwarka - Dandi Hanuman

जब हनुमानजी श्रीराम-लक्ष्मण को लेने के लिए आए, तब उनका मकरध्वज के साथ घोर युद्ध हुआ। कुछ धर्म ग्रंथों में मकरध्वज को हनुमानजी का पुत्र बताया गया है, जिसका जन्म हनुमानजी के पसीने द्वारा एक मछली से हुआ था। कहते हैं कि पहले हिंदू धर्म को मानने वाले ये बात बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि भगवान श्रीराम के परमभक्त व भगवान शंकर के ग्यारवें रुद्र अवतार श्रीहनुमानजी बालब्रह्मचारी थे, लेकिन बहुत ही कम लोग ये बात जानते हैं कि धर्म शास्त्रों में हनुमानजी के एक पुत्र का वर्णन भी मिलता है। शास्त्रों में हनुमानजी के इस पुत्र का नाम मकरध्वज बताया गया है। भारत में दो ऐसे मंदिर भी है जहां हनुमानजी की पूजा उनके पुत्र मकरध्वज के साथ की जाती है। इन मंदिरों की कई विशेषताएं हैं जो इसे खास बनाती हैं।

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हनुमानजी के पुत्र मकरध्वज की उत्पत्ति की कथा-  

धर्म शास्त्रों के अनुसार जिस समय हनुमानजी सीता की खोज में लंका पहुंचे और मेघनाद द्वारा पकड़े जाने पर उन्हें रावण के दरबार में प्रस्तुत किया गया। तब रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवा दी और हनुमान ने जलती हुई पूंछ से पूरी लंका जला दी। जलती हुई पूंछ की वजह से हनुमानजी को तीव्र वेदना हो रही थी जिसे शांत करने के लिए वे समुद्र के जल से अपनी पूंछ की अग्नि को शांत करने पहुंचे। 

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उस समय उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी जिसे एक मछली ने पी लिया था। उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई और उससे उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पड़ा “मकरध्वज”। मकरध्वज भी हनुमानजी के समान ही महान पराक्रमी और तेजस्वी था। मकरध्वज को अहिरावण द्वारा पाताल लोक का द्वारपाल नियुक्त किया गया था। जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए अपनी माया के बल पर पाताल ले आया था तब श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए हनुमान पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट मकरध्वज से हुई। तत्पश्चात हनुमानजी और मकरध्वज के में घोर युद्ध हुआ। अंत में हनुमानजी ने उसे परास्त कर उसी की पूंछ से उसे बांध दिया। 

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मकरध्वज ने अपनी उत्पत्ति की कथा हनुमान को सुनाई। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और श्रीराम ने मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उनकी स्मृति में यह मूर्ति स्थापित है।मकरध्वज व हनुमानजी का यह पहला मंदिर गुजरात के भेंटद्वारिका में स्थित है। यह स्थान मुख्य द्वारिका से दो किलो मीटर अंदर की ओर है।