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हेन्नीगुया साल्मिनीकोला (henniguay salminicola) - बिना सांस लेने वाला रहस्यमई जीव

हेन्नीगुया साल्मिनीकोला (Henniguay Salminicola) 

बिना सांस लेने वाला रहस्यमई जीव

चलते हैं जीवों की अजब गजब दुनिया की तरफ।
हेन्नीगुया साल्मिनीकोला (henniguay salminicola) बिना सांस लेने वाला रहस्यमयी जीव है, जिनकी जिंदगी मछलियों पर अटकी होती है। ये एक तरह का परजीवी है। इस जीव की खोज इजारइल की अवीव यूनिवर्सिटी ने की है। 
हेन्नीगुया साल्मिनीकोला (henniguay salminicola) - बिना सांस लेने वाला रहस्यमई जीव
दुनिया में कई ऐसे रहस्यमयी जीव हैं, जिनकी कल्पना करना भी हमारे लिए मुमकिन नहीं है। ऐसा ही एक जीव वैज्ञानिकों ने खोजा है। जिसका नाम हेन्नीगुया साल्मिनीकोला है। ये एक परजीवी है। हैरानी की बात यह है कि इसके शरीर में श्वांस नली नहीं है। इसलिए ये बिना ऑक्सीजन के जिंदा (without oxygen) रह सकता है। हालांकि इसका जीवन मछलियों पर निर्भर करता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक इस परजीवी में माइट्रोकॉन्ड्रियल जीनोम नहीं होता है। ये वो भाग होता है जिसके जरिए जीव सांस लेते हैं। इस भाग की कमी के चलते ही यह परजीवी बिना सांस लिए भी जीवित रह सकता है। इस रहस्यमयी जीव की खोज इजरायल के अवीव यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की टीम ने की है। उनके मुताबिक यह जीव मछलियों से ऊर्जा प्राप्त करता है। ये परजीवी ज्यादातर साल्मन फिश में पाए जाते हैं। ये तब तक जिंदा रहते हैं, जब तक कि मछली सही सलामत रहती हैं।
हेन्नीगुया साल्मिनीकोला (henniguay salminicola) - बिना सांस लेने वाला रहस्यमई जीव
शोधकर्ता डयाना याहलोमी के मुताबिक यह परजीवी इंसानों या दूसरे जीवों के लिए बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं हैं। हालांकि यह विकसित कैसे हुआ और बिना ऑक्सीजन के ये जिंदा कैसे रहता है ये जांच का विषय है। यह जीव इतने छोटे होते हैं कि इन्हें केवल फ्लोरेसेंस माइक्रोस्कोप से देखा जा सकता है। इस जीव की तरह वैज्ञानिकों ने साल 2010 में भी एक रहस्यमयी जीव की खोज की थी। जो बिना सांस लिए जिंदा रह सकता था। इसकी खोज इटली के वैज्ञानिकों ने की थी।

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Henniguay salminicola (henniguay salminicola)

mysterious creature without breathing


Henniguay salminicola is a mysterious creature without breathing, whose life is stuck on fish. It is a kind of parasite. This creature has been discovered by Israel's Aviv University.
हेन्नीगुया साल्मिनीकोला (henniguay salminicola) - बिना सांस लेने वाला रहस्यमई जीव
There are many such mysterious creatures in the world, which are not even possible for us to imagine. One such creature has been discovered by scientists. Whose name is Henniguya salminicola. It is a parasite. Surprisingly, there is no windpipe in its body. That's why it can live without oxygen. Although its life depends on the fishes.

According to scientists, this parasite does not have a mitochondrial genome. This is the part through which the living beings breathe. Due to the lack of this part, this parasite can survive even without breathing. This mysterious creature has been discovered by a team of researchers from Israel's Aviv University. According to them, this creature gets energy from fishes. These parasites are mostly found in salmon fish. They remain alive as long as the fish remains intact.
हेन्नीगुया साल्मिनीकोला (henniguay salminicola) - बिना सांस लेने वाला रहस्यमई जीव
According to researcher Diana Yahlomi, these parasites are not at all harmful to humans or other organisms. However, how it evolved and how it survives without oxygen is a matter of investigation. These organisms are so small that they can only be seen with a fluorescence microscope. Like this creature, scientists had also discovered a mysterious creature in the year 2010. Who could live without breathing. It was discovered by Italian scientists.

अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर, मध्यप्रदेश || Annapurna Temple, Indore, Madhya Pradesh ||

अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर, मध्यप्रदेश (Annapurna Temple, Indore, Madhya Pradesh)

भोजन हिंदू धर्म में भगवान के रूप में पूजनीय है। हिन्दू धर्म में अन्नपूर्णा देवी को भोजन की देवी माना गया है। भारत में कई सारे अन्नपूर्णा मंदिर हैं। आज हम इंदौर के प्रसिद्ध मंदिर अन्नपूर्णा देवी मंदिर के बारे में जानेंगे। 

अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर, मध्यप्रदेश (Annapurna Temple, Indore, Madhya Pradesh)

इंदौर में स्थित मां अन्नपूर्णा मंदिर सबसे प्रसिद्ध और पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण 1959 में महामंडलेश्वर स्वामी प्रबानंदगिरिमाराज ने करवाया था। यह मंदिर भोजन की देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है, और इसमें शिव, हनुमान और कालभैरव की मूर्तियां हैं। इसमें कमल की स्थिति में भगवान शिव की 14.5 फीट ऊंची मूर्ति भी है।

अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर, मध्यप्रदेश (Annapurna Temple, Indore, Madhya Pradesh)

अन्नपूर्णा मंदिर 2 एकड़ में फैला है, यह आर्यन और द्रविड़ वास्तुकला के शानदार समायोजन का एक सुंदर उदाहरण है। अन्नपूर्णा मंदिर की ऊंचाई 100 फीट से भी ज्यादा है। भव्य प्रवेश द्वार जटिल नक्काशी के साथ हाथियों की चार आदमकद मूर्तियों से सुशोभित है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर रंगीन पौराणिक चित्रों को उकेरा गया है। मंदिर की दीवारों पर कृष्ण लीला का चित्रण है। अन्नपूर्णा मंदिर के अंदर मां काली और मां सरस्वती के साथ जगमगाती मां अन्नपूर्णा की मूर्ति है।

अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर, मध्यप्रदेश (Annapurna Temple, Indore, Madhya Pradesh)

मंदिर केवल धार्मिक आगंतुकों के लिए ही नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए भी है, जो प्राचीन भारतीय कला और हिंदू धर्म के वर्चस्व के बारे में जानना चाहते हैं।

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Annapurna Temple, Indore, Madhya Pradesh

Food is revered as a god in Hinduism. In Hindu religion, Annapurna Devi is considered the goddess of food. There are many Annapurna temples in India. Today we will learn about the famous temple Annapurna Devi Temple of Indore.

अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर, मध्यप्रदेश (Annapurna Temple, Indore, Madhya Pradesh)

Maa Annapurna Temple located in Indore is considered to be one of the most famous and old temples. This temple was built in 1959 by Mahamandaleshwar Swami Prabanandagirimaraj. The temple is dedicated to Annapurna, the goddess of food, and has idols of Shiva, Hanuman and Kalabhairava. It also houses a 14.5 ft high idol of Lord Shiva in the lotus position.

अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर, मध्यप्रदेश (Annapurna Temple, Indore, Madhya Pradesh)

The Annapurna Temple, spread over 2 acres, is a beautiful example of a fine amalgamation of Aryan and Dravidian architecture. The height of Annapurna temple is more than 100 feet. The grand entrance is adorned with four life-size statues of elephants with intricate carvings. Colorful mythological paintings are carved on the outer walls of the temple. Krishna Leela is depicted on the walls of the temple. Inside the Annapurna temple, you will see the idol of Maa Annapurna shining with Maa Kali and Maa Saraswati.

The temple is not only for religious visitors but also for those who want to know about the ancient Indian art and supremacy of Hinduism.

सम्मान समारोह और मातृ दिवस

सम्मान समारोह और मातृ दिवस

"रूपा ओस की बूंद" पुस्तक का सम्मान समारोह

"रूपा ओस की बूंद" पुस्तक का सम्मान समारोह


सम्मान समारोह और मातृ दिवस

कल का दिन मेरे लिए दोहरी खुशियों वाला रहा और बहुत ज्यादा व्यस्त रहा। बहुत विशेष दिन था मेरे लिए, एक तरफ पुस्तक "रूपा ओस की एक बूंद" के लिए मुझे सम्मान मिला तो दूसरी तरफ सम्मान पाकर शाम घर पहुंची तो मातृ दिवस पर यानी मदर्स डे पर बच्चों द्वारा सरप्राइस भी मिला। वाकई में कल का दिन बहुत सुखद रहा।

सम्मान समारोह और मातृ दिवस

सम्मान समारोह और मातृ दिवस

कल मुझे लोकरंजन प्रकाशन द्वारा मेरी पुस्तक "रूपा ओस की एक बूंद" के लिए प्रयागराज में होटल ऑर्चर्ड वन में एक भव्य समारोह में सम्मानित किया गया। शाम को जब मैं प्रयागराज से वापस अपने आशियाने में लौटी तो सामने देवरिया से आई हुई मेरी माता श्री को देखकर मुझे सुखद आश्चर्य की अनुभूति हुई। फिर मैंने बच्चों के साथ और मां के साथ केक काटकर मातृ दिवस की खुशियां मनाईं।

सम्मान समारोह और मातृ दिवस

सम्मान समारोह और मातृ दिवस

प्रयागराज के जिस सम्मान समारोह में मुझे सम्मानित किया गया उसके मुख्य अतिथि प्रोफेसर एस एन सिंह थे जोकि ट्रिपल आईटी ग्वालियर के निदेशक हैं। उनके हाथों सम्मान पाकर मैं अभिभूत थी। लोकरंजन प्रकाशन का तहे दिल से शुक्रिया।

सम्मान समारोह और मातृ दिवस

पोस्ट डालने में देर हो गई क्यूंकि कल का दिन बहुत व्यस्त रहा। लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूं पर आज बस इतना ही।

सम्मान समारोह और मातृ दिवस

आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया

आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया

आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया

प्रस्तुत है हिंदी काव्य के समुद्र में से हरिवंश राय बच्चन जी की कविता 

"माँ पर कविता"

आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया।

माँ की ऊँगली पकड़कर घूमने जाने का मन किया॥


उंगलियाँ पकड़कर माँ ने मेरी मुझे चलना सिखाया है।

खुद गीले में सोकर माँ ने मुझे सूखे बिस्तर पे सुलाया है॥


माँ की गोद में सोने को फिर से जी चाहता है।

हाथो से माँ के खाना खाने का जी चाहता है॥


लगाकर सीने से माँ ने मेरी मुझको दूध पिलाया है।

रोने और चिल्लाने पर बड़े प्यार से चुप कराया है॥


मेरी तकलीफ में मुझ से ज्यादा मेरी माँ ही रोयी है।

खिला-पिला के मुझको माँ मेरी, कभी भूखे पेट भी सोयी है॥


कभी खिलौनों से खिलाया है, कभी आँचल में छुपाया है।

गलतियाँ करने पर भी माँ ने मुझे हमेशा प्यार से समझाया है॥


माँ के चरणो में मुझको जन्नत नजर आती है।

लेकिन माँ मेरी मुझको हमेशा अपने सीने से लगाती है॥

- हरिवंशराय बच्चन

आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया

लालच बुरी बला है || Greed is Evil ||

लालच बुरी बला है

एक शहर में एक आदमी रहता था। वह बहुत ही लालची था। उसने सुन रखा था की अगर संतो और साधुओं की सेवा करे तो बहुत ज्यादा धन प्राप्त होता है। यह सोच कर उसने साधू-संतो की सेवा करनी प्रारम्भ कर दी। एक बार उसके घर बड़े ही चमत्कारी संत आये।

लालच बुरी बला है || Greed is Evil ||

उन्होंने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसे चार दीये दिए और कहा - "इनमें से एक दीया जला लेना और पूरब दिशा की ओर चले जाना। जहाँ यह दीया बुझ जाये, वहाँ की जमीन को खोद लेना, वहाँ तुम्हें काफी धन मिल जायेगा। अगर फिर तुम्हें धन की आवश्यकता पड़े, तो दूसरा दीया जला लेना और पक्षिम दिशा की ओर चले जाना, जहाँ यह दीया बुझ जाये, वहाँ की जमीन खोद लेना तुम्हें मन चाही माया मिलेगी। फिर भी संतुष्टि ना हो तो तीसरा दीया जला लेना और दक्षिण दिशा की ओर चले जाना। उसी प्रकार दीया बुझने पर जब तुम वहाँ की जमीन खोदोगे तो तुम्हें बेअन्त धन मिलेगा। फिर तुम्हारे पास केवल एक दीया बच जायेगा और एक ही दिशा रह जायेगी। तुमने यह दीया ना ही जलाना है और ना ही इसे उत्तर दिशा की ओर ले जाना है।"

यह कह कर संत चले गए। लालची आदमी उसी वक्त पहला दीया जला कर पूरब दिशा की ओर चला गया। दूर जंगल में जाकर दीया बुझ गया। उस आदमी ने उस जगह को खोदा तो उसे पैसों से भरी एक गागर मिली। वह बहुत खुश हुआ। उसने सोचा की इस गागर को फिलहाल यही रहने देता हूँ, फिर कभी ले जाऊंगा। पहले मुझे जल्दी ही पक्षिम दिशा वाला धन देख लेना चाहिए। यह सोच कर उसने दुसरे दिन दूसरा दीया जलाया और पक्षिम दिशा की ओर चल पड़ा। दूर एक उजाड़ स्थान में जाकर दीया बुझ गया। वहाँ उस आदमी ने जब जमीन खोदी तो उसे सोने की मोहरों से भरा एक घड़ा मिला। उसने घड़े को भी यही सोचकर वहीं रहने दिया की पहले दक्षिण दिशा में जाकर देख लेना चाहिए। जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा धन प्राप्त करने के लिए वह बेचैन हो गया। अगले दिन वह दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ा। दीया एक मैदान में जाकर बुझ गया। उसने वहाँ की जमीन खोदी तो उसे हीरे-मोतियों से भरी दो पेटियाँ मिली। वह आदमी अब बहुत खुश था।

तब वह सोचने लगा अगर इन तीनो दिशाओ में इतना धन पड़ा है, तो चौथी दिशा में इनसे भी ज्यादा धन होगा। फिर उसके मन में ख्याल आया की संत ने उसे चौथी दिशा की ओर जाने के लिए मना किया है। दुसरे ही पल उसके मन ने कहा - "हो सकता है उत्तर दिशा की दौलत संत अपने लिए रखना चाहते हो। मुझे जल्दी से जल्दी उस पर भी कब्ज़ा कर लेना चाहिए।" ज्यादा से ज्यादा धन प्राप्त करने की लालच ने उसे संतो के वचनों को दुबारा सोंचने ही नहीं दिया।

अगले दिन उसने चौथा दीया जलाया और जल्दी-जल्दी उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा। दूर आगे एक महल के पास जाकर दीया बुझ गया। महल का दरवाज़ा बंद था। उसने दरवाज़े को धकेला तो दरवाज़ा खुल गया। वह बहुत खुश हुआ। उसने मन ही मन में सोचा की यह महल उसके लिए ही है। वह अब तीनो दिशाओ की दौलत को भी यहीं ले आकर रखेगा और ऐश करेगा। वह आदमी महल के एक-एक कमरे में गया। कोई कमरा हीरे मोतियों से भरा हुआ था। किसी कमरे में सोने के किमती से किमती आभूषण भरे पड़े थे। इसी प्रकार अन्य कमरे भी बेअन्त धन से भरे हुए थे। वह आदमी चकाचौंध होता जाता और अपने भाग्य को शाबासी देता। वह जरा और आगे बढ़ा तो उसे एक कमरे में चक्की चलने की आवाज़ सुनाई दी। वह उस कमरे में दाखिल हुआ तो उसने देखा की एक बूढ़ा आदमी चक्की चला रहा है। लालची आदमी ने बूढ़े से कहा की तू यहाँ कैसे पंहुचा? बूढ़े ने कहा - "ऐसा कर यह जरा चक्की चला, मैं सांस लेकर तुझे बताता हूँ।"

लालची आदमी ने चक्की चलानी प्रारम्भ कर दी। बूढ़ा चक्की से हट जाने पर ऊँची-ऊँची हँसने लगा। लालची आदमी उसकी ओर हैरानी से देखने लगा। वह चक्की बंद ही करने लगा था की बूढ़े ने खबरदार करते हुए कहा - "ना ना चक्की चलानी बंद ना कर।" फिर बूढ़े ने कहा - "यह महल अब तेरा है। परन्तु यह उतनी देर तक खड़ा रहेगा जितनी देर तक तू चक्की चलाता रहेगा। अगर चक्की चलनी बंद हो गयी तो महल गिर जायेगा और तू भी इसके निचे दब कर मर जायेगा।"

कुछ समय रुक कर बूढ़ा फिर कहने लगा - "मैंने भी तेरी ही तरह लालच करके संतो की बात नहीं मानी थी और मेरी सारी जवानी इस चक्की को चलाते हुए बीत गयी।"

वह लालची आदमी बूढ़े की बात सुन कर रोने लग पड़ा। फिर कहने लगा -"अब मेरा इस चक्की से छुटकारा कैसे होगा?"

बूढ़े ने कहा - "जब तक मेरे और तेरे जैसा कोई आदमी लालच में अंधा होकर यहाँ नहीं आयेगा, तब तक तू इस चक्की से छुटकारा नहीं पा सकेगा।" तब उस लालची आदमी ने बूढ़े से आखरी सवाल पूछा - "तू अब बाहर जाकर क्या करेगा?"

बूढ़े ने कहा - "मैं सब लोगो से ऊँची-ऊँची चिल्ला चिल्ला कर कहूँगा, लालच बुरी बला है।"

Greed is Evil

A man lived in a city. He was very greedy. He had heard that if he serves saints and sages, he will get a lot of money. Thinking this, he started serving the sages and saints. Once a very miraculous saint came to his house.

लालच बुरी बला है || Greed is Evil ||

Pleased with his service, he gave him four lamps and said - "Light one of these lamps and go towards the east. Where this lamp goes out, dig the ground there, you will get a lot of money. If then If you need money, then light another lamp and go towards west direction, dig the ground where this lamp is extinguished, you will get desired illusion. Go away. In the same way, when the lamp is extinguished, when you dig the land there, you will get infinite money. Then only one lamp will be left with you and only one direction will be left. You should neither light this lamp nor keep it in the north direction. To be taken away."

Saying this the saint went away. The greedy man lit the first lamp at the same time and went towards the east. The lamp got extinguished after going far away in the forest. When the man dug that place, he found a jug full of money. He was very happy. He thought that he will let this Gagar stay here for the time being, will take him some other time. First I should see the west direction money soon. Thinking of this, he lit another lamp the next day and went towards the west. The lamp got extinguished after going to a desolate place far away. There, when the man dug the ground, he found a pot full of gold coins. He also left the pitcher there thinking that first he should go to the south and see. He became restless to get more and more money as soon as possible. The next day he started towards the south. The lamp got extinguished after going to a field. When he dug the land there, he found two boxes full of diamonds and pearls. The man was very happy now.

Then he started thinking that if there is so much money lying in these three directions, then there will be more money in the fourth direction. Then he thought that the saint had forbidden him to go towards the fourth direction. The next moment his mind said - "Maybe the saints want to keep the wealth of the north for themselves. I should take possession of that too as soon as possible." The greed of getting more and more money did not allow him to think twice about the words of saints.

The next day he lit the fourth lamp and hurriedly started towards the north. The lamp got extinguished after going to a palace far ahead. The palace door was closed. When he pushed the door, the door opened. He was very happy. He thought in his mind that this palace is for him only. Now he will bring the wealth of all the three directions and keep it here and enjoy it. The man went to each and every room of the palace. Some room was full of diamonds and pearls. In some room precious ornaments were lying full of gold. Similarly other rooms were also filled with infinite wealth. The man used to get dazzled and brag to his luck. When he went a little further, he heard the sound of a mill running in a room. When he entered that room, he saw an old man running a mill. The greedy man said to the old man how did you reach here? The old man said - "By doing this, let this mill run a little, I will tell you by taking a breath."

The greedy man started running the mill. The old man started laughing out loud when he left the mill. The greedy man looked at him with astonishment. He was about to close the mill when the old man cautioned and said - "No, don't stop running the mill." Then the old man said - "This palace is yours now. But it will stand as long as you keep running the mill. If the mill stops running, the palace will collapse and you too will die under it."

After stopping for some time, the old man again said - "Like you, I also did not listen to saints out of greed and spent my whole youth running this mill."

That greedy man started crying after listening to the old man. Then he said - "Now how will I get rid of this mill?"

The old man said - "Unless a man like me and you comes here blinded by greed, you will not be able to get rid of this mill." Then that greedy man asked the old man the last question - "What will you do after going out now?"

The old man said - "I will shout loudly to all the people that greed is a bad thing."

आंध्र प्रदेश का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Andhra Pradesh ||

आंध्र प्रदेश का राजकीय/राज्य पक्षी

आंध्र प्रदेश भारत के दक्षिणपूर्वी क्षेत्र में स्थित एक राज्य है। यह भारत गणराज्य का 7 वां सबसे बड़ा और 10 वां सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। इस ब्लॉग के पिछले कुछ अंकों में अलग अलग राज्य के राजकीय पक्षियों की चर्चा हुई है। आज हम आंध्र प्रदेश के राजकीय/राज्य पक्षी के बारे में जानेंगे।

आंध्र प्रदेश का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Andhra Pradesh ||

हर राज्यों की तरह आंध्र प्रदेश द्वारा भी राज्य का राजकीय पक्षी चुना गया है। "रोज रिंगड तोता (Rose Ringed Parrot)" आंध्र प्रदेश का एक राज्य पक्षी है। इसे "रिंग-नेक्ड पैराकेट (Ring-necked Parakeet)" के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय स्तर पर इसे "राम चिलुका (Ram Chiluka)" के नाम से जाना जाता है। तेलंगाना के अलग होने से पहले इंडियन रोलर (Indian Roller) आंध्र प्रदेश का राज्य पक्षी था। 

आंध्र प्रदेश का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Andhra Pradesh ||

तेलंगाना के साथ विभाजन के बाद, आंध्र प्रदेश ने भारतीय रोलर पक्षी  (Indian Roller) को छोड़ दिया और राम चिलुका (Ram Chiluka) को अपना राज्य पक्षी घोषित कर दिया। हालांकि, तेलंगाना ने इंडियन रोलर (Palpitta) को अपने राज्य पक्षी के रूप में बरकरार रखा है।

आंध्र प्रदेश का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Andhra Pradesh ||

रोज रिंगड तोता (Rose Ringed Parrot) एक मध्यम आकार का तोता है। यह ज्यादातर भारतीय उपमहाद्वीप और अफ्रीका क्षेत्र में पाया जाता है। इसकी चोंच लाल होती है तथा गर्दन पर गहरा घेरा लिए काली लाइन होती है। इसका पूरा शरीर हरे रंग का होता है। पहले इनकी संख्या बहुत अधिक थी, लेकिन अब यह घटते जा रहे हैं। इसकी अधिकांश प्रजातियां द्वीपों पर पाई जाती हैं। यह तोते अपना घर मिट्टी की कच्ची दीवारों में बिल बनाकर बनाते हैं। 

आंध्र प्रदेश का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Andhra Pradesh ||

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State bird of Andhra Pradesh

Andhra Pradesh is a state located in the southeastern region of India. It is the 7th largest and 10th most populous state of the Republic of India. In the last few issues of this blog, the state birds of different states have been discussed. Today we will know about the official / state bird of Andhra Pradesh.

आंध्र प्रदेश का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Andhra Pradesh ||

Like every state, Andhra Pradesh has also chosen the state bird of the state. The "Rose Ringed Parrot" is the state bird of Andhra Pradesh. It is also known as the "Ring-necked Parakeet". It is locally known as "Ram Chiluka". Indian Roller was the state bird of Andhra Pradesh before the separation of Telangana. After bifurcation with Telangana, Andhra Pradesh abandoned the Indian Roller and declared the Ram Chiluka as its state bird. However, Telangana has retained the Indian Roller (Palpitta) as its state bird.

आंध्र प्रदेश का राजकीय/राज्य पक्षी || State Bird Of Andhra Pradesh ||

The Rose Ringed Parrot is a medium sized parrot. It is mostly found in the Indian subcontinent and Africa region. Its beak is red and there is a dark circle on the neck with a black line. Its whole body is green. Earlier their number was very high, but now it is decreasing. Most of its species are found on islands. These parrots build their houses by making burrows in mud walls.

भारत के सभी राज्यों के राजकीय पक्षियों की सूची |(List of State Birds of India)

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

 श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

इस ब्लॉग के माध्यम से हम सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता प्रकाशित कर रहे हैं, इसके तहत हम सभी 18 अध्यायों और उनके सभी श्लोकों का सरल अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करेंगे। 

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के 18 अध्यायों में से अध्याय 1,2,3,4,5, 6, 7, 8 और 9 के पूरे होने के बाद आज प्रस्तुत है, अध्याय 10 के सभी अनुच्छेद। 

श्रीमद्भगवद्गीता || अध्याय दसवाँ -  विभूतियोग ||

अथ दशमोऽध्याय:- विभूतियोग

अध्याय दस के अनुच्छेद 01 - 07

भगवान की विभूति और योगशक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल

श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

श्रीभगवानुवाच

भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ৷৷10.1৷৷

भावार्थ : 

श्री भगवान्‌ बोले- हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुझे अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूँगा॥10.1॥

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥10.2॥

भावार्थ : 

मेरी उत्पत्ति को अर्थात्‌ लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ॥10.2॥

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌ ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥10.3॥

भावार्थ : 

जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है॥10.3॥

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥10.4॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥10.5॥

भावार्थ : 

निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं॥10.4-10.5॥

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥10.6॥

भावार्थ : 

सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है॥10.6॥

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥10.7॥

भावार्थ : 

जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्व से जानना है), वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥10.7॥

अध्याय दस के अनुच्छेद 08  - 11

फल और प्रभाव सहित भक्तियोग का वर्णन

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥10.8॥

भावार्थ : 

मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान्‌ भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं॥10.8॥

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌ ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥10.9॥

भावार्थ : 

निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं॥10.9॥

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ ।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥10.10॥

भावार्थ : 

उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥10.10॥

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥10.11॥

भावार्थ : 

हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ॥10.11॥