Cricket News: Latest Cricket News, Live Scores, Results, Upcoming match Schedules | Times of India

Sportstar - IPL

माटी के पुतले

माटी के पुतले

Oos ki Boond
इस दुनिया में खुशी और मुस्कुराहट ही एकमात्र ऐसा खजाना है,
जिसे जितना बांटो वो और बढ़ता है..❣️

माटी के पुतले काहे करे अभिमान,

एक दिन मिल जाना है 

माटी में, फिर क्यूँ ये झूठी शान,

न दोस्त बाकी हैं आज, 

न कोई रिश्ता करीब है,

आयी थी एक काली घटा, 

अभी अभी पहले चंद साल,

न काम आया धन दौलत न काम आया अभिमान,

सुना था तेरे घर में कोई मरीज था 

जिसकी हाल ओ खबर पूछने वाला 

न कोई करीब था,

सोच जरा माटी के पुतले 

उस बुरे दौर में 

तेरी अभिमान भरी जिंदगी में भी तेरे साथ खड़ा कौन था,

कहा ले जाएगा अपने जाने के बाद 

दौलते-अभिमान -

धरा सब यहीं रह जान है 

न पूछेगे संग साथी न पूछेगी दुनिया 

तेरे जाने के बाद,

ये तेरा अहंकर, यूँ ही पड़ा रह जाना है 

मिट्टी का पुतला, मिट्टी में मिल जाना है 

अब भी वक्त है संभल जा 

ऐ मानुष थोड़ा कर दे गुरुर कम 

त्याग दे अपने अहम को 

ये जो दौर आया था 

जहाँ खो गयी  ज़िंदगी बहुत कुछ कर गयी वीरान

ऐ मिट्टी के पुतले काहे का अभिमान 

ये एक दौर आया, देने सबको ज्ञान 

काहे ये बेरुखी, काहे का अहंकार 

सब यहीं रह जाना है, धन - दौलत - अभिमान 

मिट्टी का पुतला, मिट्टी में मिल जाना है 

Oos ki Boond
इन छोटी-छोटी खुशियों से ही तो जिंदगी की गाड़ी चलती है,
वरना ख्वाहिशों का क्या है, वो तो वक्त के साथ बदलती रहती हैं..❣️

स्त्री- भक्त राजा : पंचतंत्र || Stri bhakt raja : Panchtantra ||

स्त्री- भक्त राजा

न किं दद्यान्न किं कुर्यात् स्त्री भिरभ्यर्वितो 

स्त्री की दासता मनुष्य को विचारांथ बना देती है, उसके आग्रह का पालन मत करो। 

शास्त्रों में कहा गया है , औरतों में हठ, अविवेक, छल, मूर्खता, लोभ, मालिन्य और क्रूरता सबसे बड़े दोष होते हैं  अग्नि, जल, महिलाएं, मूर्ख, सांप और शाही परिवार आपके लिए घातक साबित हो सकते हैं इसलिए उनसे हमेशा सतर्क रहना चाहिए। और इस कारण राजा नन्द को भी बहुत शर्मिन्दगी उठानी पड़ी  ।

स्त्री- भक्त राजा : पंचतंत्र || Stri bhakt raja : Panchtantra ||

एक राज्य में अतुलवल पराक्रमी राजा नन्द राज्य करता था। उसकी वीरता चारों दिशाओं में प्रसिद्ध थी। आस-पास के सब राजा उसकी बन्दना करते थे। उसका राज्य समुद्र-तट तक फैला हुआ था। उसका मन्त्री वररुचि भी बड़ा विद्वान् और सब शास्त्रों में पारंगत था। उसकी पत्नी का स्वभाव बड़ा तीखा था। एक दिन वह प्रणय-कलय में ही ऐसी रूठ गई कि अनेक प्रकार से मनाने पर भी न मानी। तब, वररुचि ने उससे पूछा-प्रिये! तेरी प्रसन्नता के लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ। जो तू आदेश करेगी, वही करूँगा। पत्नी ने कहा- अच्छी बात है। मेरा आदेश है कि तू अपना सिर मुण्डाकर मेरे पैरों पर गिरकर मुझे मना, तब मैं मानूँगी। वररुचि ने वैसा ही किया। तब वह प्रसन्न हो गई। 

उसी दिन राजा नन्द की स्त्री भी रूठ गई। नन्द ने भी कहा-प्रिये! तेरी अप्रसन्नता मेरी मृत्यु है। तेरी प्रसन्नता के लिए मैं सब कुछ करने के लिए तैयार हूँ। तू आदेश कर, मैं उसका पालन करूँगा। नन्द-पत्नी बोली- मैं चाहती हूँ कि तेरे मुख में लगाम डालकर तुझपर सवार हो जाऊँ और तू घोड़े की तरह हिनहिनाता हुआ दौड़े। अपनी इस इच्छा के पूरा होने पर ही मैं प्रसन्न होऊँगी। - राजा ने भी उसकी इच्छा पूरी कर दी । दूसरे दिन सुबह राजदरबार में जब वररुचि आया तो राजा ने पूछा- मन्त्री! किस पुण्यकाल में तूने अपना सिर मुंडाया है? 

वररुचि ने उत्तर दिया- राजन्! मैंने उस पुण्यकाल में सिर मुण्डाया है, जिस काल में पुरुष मुख में लगाम लगाकर हिनहिनाते हुए दौड़ते हैं। राजा यह सुनकर बड़ा लज्जित हुआ।

बन्दर ने यह कथा सुनाकर मगर से कहा- महाराज्! तुम भी स्त्री के दास बनकर वररुचि के समान अन्धे बन गए। उसके कहने पर मुझे मारने चले थे, लेकिन वाचाल होने से तुमने अपने मन की बात कह दी। वाचाल होने से सारस मारे जाते हैं। बगुला वाचाल नहीं हैं, मौन रहता है, इसलिए बच जाता है। मौन से सभी काल सिद्ध होते हैं। वाणी का असंयय जीवनमात्र के लिए घातक है। इसी कारण शेर की खाल पहनने के बाद भी गधा अपनी जान बचा सका, मारा गया।

मगर ने पूछा- किस तरह?

बन्दर ने तब वाचाल गधे की यह कहानी सुनाई: 

वाचाल गधा

कहानी में महिलाओं को नीचा नहीं दिखाया गया है, बल्कि उनके अवगुणों के नुकसान को दर्शाया गया है। 

रैफ्लेशिया (Rafflesia) || दुनिया का सबसे अनोखा फूल ||

रैफ्लेशिया (Rafflesia)

फूल हैं या कोई अजूबा

फूल हमारे लिए प्रकृति का अनमोल तोहफा है। खिले हुए फूलों को देखकर मानो मन भी प्रसन्नता से खिल उठता है। किसी भी अवसर पर फूलों का आदान-प्रदान चेहरे पर मुस्कान लाने के साथ ही माहौल को खुशनुमा बना देता है। पर आज हम यहां फूल की सुंदरता और मनमोहक खुशबू के विपरीत कुछ बात करेंगे। 

रैफ्लेशिया (Rafflesia) || दुनिया का सबसे अनोखा फूल ||

दुनिया विचित्र विचित्र पेड़ पौधों से भरी हुई है। इनमें से कुछ ऐसे अजीबोगरीब पौधे और फूल भी हैं, जिन्हें देखकर विश्वास नहीं होता कि यह वास्तविक है या किसी कलाकार की कल्पना। हर फूल गुलाब, गेंदा, बेला, चमेली की तरह सुंदर और खूबसूरत नहीं होते। कुछ फूल ऐसे भी हैं, जिनके बारे में सुनकर ही हैरानी होती है। तो आज जानते हैं, एक ऐसे ही अजीबोगरीब फूल के विषय में।

रैफ्लेशिया (Rafflesia) एक ऐसा फूल है, जो अपनी विशाल आकृति और बदबूदार महक के लिए विश्व प्रसिद्ध है।  यह फूल इंडोनेशिया तथा मलेशिया के अलावा फिलीपींस में भी उगते हैं। यह बिना पत्तियों और तने वाला यह एक परजीवी पौधा है, जो दुनिया में मौजूद लगभग सभी फूलों से अधिक बड़ा है। आश्चर्य की बात यह है कि इस फूल का व्यास 105 सेंटीमीटर तथा वजन लगभग 11 किलोग्राम है। यह फूल खिलने में 9 से 10 महीनों का वक्त लेता है, परंतु करीब 1 हफ्ते तक ही जीवित रह पाता है। यह फूल साल में कुछ महीने ही खिलता है। इसके खेलने की शुरुआत अक्टूबर महीने से होती है। इसके बाद मार्च तक यह पूरी तरह से खिलता है।

रैफ्लेशिया (Rafflesia) || दुनिया का सबसे अनोखा फूल ||

इसकी सबसे छोटी प्रजाति 20 सेंटीमीटर व्यास की पाई गई है। इस फूल की सभी प्रजातियों में इसकी त्वचा छूने से मांस की तरह प्रतीत होता है और इसके फूल से सड़े हुए मांस की बदबू आती है, जिससे कुछ विशेष कीट पतंग इसकी ओर आकृष्ट होते हैं। यही कारण है कि इसे "मृत पौधा" भी कहा जाता है। अब तक इसकी 28 प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं।

रैफ्लेशिया (Rafflesia) || दुनिया का सबसे अनोखा फूल ||

इस फूल का जन्म किसी संक्रमित पेड़ की जड़ से होता है पहले एक गांठ सी बनती है और फिर यह बड़ी होकर एक बंद गोभी के आकार की हो जाती है। फिर 4 दिनों के अंदर इसकी पंखुड़ियां खुल जाती हैं और पूरा फूल आकार लेता है।  पौधे में केवल फूल ही एक ऐसा भाग है, जो जमीन के ऊपर दिखाता है, शेष भाग कवक जाल की तरह पतले होते हैं और जमीन के अंदर ही धागों के रूप में हो फैले होते हैं। यह दुसरे पौधों की जड़ों से भोजन चूसते हैं।

रैफ्लेशिया (Rafflesia) || दुनिया का सबसे अनोखा फूल ||

English Translate

Rafflesia

A flower or a wonder

Flowers are the precious gift of nature to us. Seeing the flowers in bloom, as if the mind also blossoms with happiness. Exchange of flowers on any occasion brings smile on the face and makes the atmosphere pleasant. But today we will talk about something opposite to the beauty and lovely fragrance of the flower here.

रैफ्लेशिया (Rafflesia) || दुनिया का सबसे अनोखा फूल ||

The world is full of strange bizarre trees and plants. Some of these are such strange plants and flowers that one cannot believe whether it is real or an artist's imagination. Not every flower is beautiful and graceful like rose, marigold, bella, jasmine. There are some flowers too, about which one is surprised to hear about them. So today let's know about such a strange flower.

रैफ्लेशिया (Rafflesia) || दुनिया का सबसे अनोखा फूल ||

Rafflesia is such a flower, which is world famous for its huge shape and stinky smell. Apart from Indonesia and Malaysia, these flowers also grow in the Philippines. It is a parasitic plant without leaves and stems, which is larger than almost all flowers in the world. The surprising thing is that the diameter of this flower is 105 cm and its weight is about 11 kg. This flower takes 9 to 10 months to bloom, but can survive for only about 1 week. This flower blooms only for a few months in a year. Its playing starts from the month of October. Thereafter it is in full bloom till March.

रैफ्लेशिया (Rafflesia) || दुनिया का सबसे अनोखा फूल ||

Its smallest species has been found to be 20 cm in diameter. In all species of this flower, its skin appears like flesh to the touch and its flower smells of rotten flesh, which attracts certain insect moths. That is why it is also called "dead plant". So far its 28 species have been discovered.

This flower is born from the root of an infected tree, first a lump is formed and then it grows up and becomes the size of a closed cabbage. Then within 4 days its petals open and the whole flower takes shape. Flowers are the only part of the plant that shows above the ground, the rest of the parts are thin like a fungus net and are spread in the form of threads inside the ground. They suck food from the roots of other plants.

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta || अध्याय पाँच - अनुच्छेद 01 - 29 ||

 श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagwat Geeta)

इस ब्लॉग के माध्यम से हम सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता प्रकाशित करेंगे, इसके तहत हम सभी 18 अध्यायों और उनके सभी श्लोकों का सरल अनुवाद हिंदी में प्रकाशित करेंगे। 

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता के 18 अध्यायों में से अध्याय 1,2,3 और 4 के पूरे होने के बाद आज प्रस्तुत है अध्याय 5 के सभी अनुच्छेद। 

श्रीमद्भगवद्गीता || Shrimad Bhagwat Geeta || अध्याय पाँच अनुच्छेद 01 - 29 ||

अध्याय पाँच       - कर्मसंन्यासयोग

01-06 ज्ञानयोग और कर्मयोग की एकता, सांख्य पर का विवरण और कर्मयोगकी वरीयता
07-12 सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा
13-26 ज्ञानयोग का विषय
27-29 भक्ति सहित ध्यानयोग तथा भय, क्रोध, यज्ञ आदि का वर्णन

श्रीमद्भगवद्गीता ||अध्याय पाँच - कर्मसंन्यासयोग ||

अथ पञ्चम् अध्यायः  ~ कर्मसंन्यासयोग

अध्याय पाँच के अनुच्छेद 01 - 06 

अध्याय पाँच के अनुच्छेद 01-06  में ज्ञानयोग और कर्मयोग की एकता, सांख्य पर का विवरण और कर्मयोगकी वरीयता का वर्णन" है। 

अर्जुन उवाच

सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌ ॥

भावार्थ : 

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो एक मेरे लिए भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहिए॥1॥  

श्रीभगवानुवाच

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥

भावार्थ : 

श्री भगवान बोले- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है॥2॥

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥

भावार्थ : 

हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है॥3॥

साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌ ॥

भावार्थ : 

उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्‌-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक्‌ प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है॥4॥

यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥

भावार्थ : 

ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है॥5॥

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥

भावार्थ : 

परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात्‌ मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है॥6॥

अध्याय पाँच के अनुच्छेद 07 - 12 

अध्याय पाँच के अनुच्छेद 07-12 में सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा का वर्णन" है। 


सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥

भावार्थ : 

जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता॥7॥

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌ ॥

भावार्थ : 

तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ॥8-9॥

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

भावार्थ : 

जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता॥10॥

कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥

भावार्थ : 

कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं॥11॥

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्‌ ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥

भावार्थ : 

कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है॥12॥

अध्याय पाँच के अनुच्छेद 13 - 26 

अध्याय पाँच के अनुच्छेद 13 - 26 में ज्ञानयोग विषय का वर्णन" है। 

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌ ॥

भावार्थ : 

अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है॥13॥

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ।

भावार्थ :

परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है॥14॥

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥

भावार्थ : 

सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं॥15॥

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्‌ ॥

भावार्थ : 

परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है॥16॥

तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥

भावार्थ : 

जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं॥17॥

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥

भावार्थ : 

वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी (इसका विस्तार गीता अध्याय 6 श्लोक 32 की टिप्पणी में देखना चाहिए।) ही होते हैं॥18॥

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥

भावार्थ : 

जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं॥19॥

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्‌ ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥

भावार्थ : 

जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है॥20॥

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्‌ ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥

भावार्थ : 

बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनंद है, उसको प्राप्त होता है, तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है॥21॥

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥

भावार्थ : 

जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता॥22॥

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌ ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥

भावार्थ : 

जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है॥23॥

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥

भावार्थ : 

जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है॥24॥

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥

भावार्थ : 

जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं॥25॥

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्‌ ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्‌ ॥

भावार्थ : 

काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है॥26||

अध्याय पाँच के अनुच्छेद 27 - 29

अध्याय पाँच के अनुच्छेद 27-29 भक्ति सहित ध्यानयोग तथा भय, क्रोध, यज्ञ आदि का वर्णन है। 


भक्ति सहित ध्यानयोग तथा भय, क्रोध, यज्ञ आदि का वर्णन
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥

भावार्थ : 

बाहर के विषय-भोगों को न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके, जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि जीती हुई हैं, ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि (परमेश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला।) इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है॥27-28॥

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्‌ ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

भावार्थ : 

मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृद् अर्थात स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है॥29॥

4 पैरों वाली व्हेल का 4 करोड़ साल पुराना जीवाश्म

4 पैरों वाली व्हेल का 4 करोड़ साल पुराना जीवाश्म

विज्ञान दिन प्रतिदिन नई बुलंदियों को छूने का कीर्तिमान बनाए जा रहा है। नए आविष्कार, नई तकनीकें और नई खोज से इंसान हर दिन विकसित हो रहा है। कुछ समय पहले वैज्ञानिकों ने एक नई खोज की थी जिसके बारे में जानकर हर कोई हैरान रह गया था। मिस्र के इजिप्ट में वैज्ञानिकों को एक व्हेल का प्राचीन जीवाश्म मिला। यह कोई साधारण बात नहीं कि वैज्ञानिकों ने चार पैरों वाली व्हेल की एक नई प्रजाति की खोज की है, जो लगभग 43 मिलियन वर्ष अर्थात 4 करोड़ साल से भी अधिक पहले हमारे ग्रह पर रहती थी।

4 पैरों वाली व्हेल का 4 करोड़ साल पुराना जीवाश्म

अगस्त 2021 में यह खोज चर्चा में थी। यह खोज मिस्र के वेस्ट डेजर्ट में खोजे गए प्राणी के आंशिक जीवाश्म पर आधारित थी। जीव का नाम "फियोमीसेटस औबिस" रखा गया था। औबिस को मिस्र में मौत का देवता माना जाता है।

प्राणियों की खोज शोधकर्ताओं को इस बात की बेहतर समझ देती है कि कैसे स्तनपायी जमीन पर अपने जीवन से समुद्री जीव बनने के लिए परिवर्तित हो गए। जीवाश्म वास्तव में अफ्रीका में पाया जाने वाला सबसे पहला व्हेल जीवाश्म है।


जीवाश्म प्रोटोसेटिडे प्रजाति कहां की है। यह व्हेल की वह प्रजाति है जब जानवर जमीन से समुंद्र में रहने के लिए आ रहे थे। तब उनके अंदर अलग-अलग बदलाव हो रहे थे। यह जीवाश्म इजिप्ट के पश्चिमी रेगिस्तान में खुदाई के दौरान मिला था जहां माना जाता रहा है कि कभी समुंद्र बहता था।

4 पैरों वाली व्हेल का 4 करोड़ साल पुराना जीवाश्म

शोधकर्ताओं के अनुसार, अपने जीवनकाल के दौरान, चार पैरों वाली व्हेल वास्तव में सबसे उच्च कोटि की शिकारी रही होगी। शोधकर्ता बताते हैं कि अब तक, इस अवधि के व्हेल काफी हद तक एक रहस्य बने हुए हैं, लेकिन जीवाश्म कुछ स्पष्टता प्रदान करता है।अनुमान है कि इसका वजन आधा टन से अधिक था और इसकी लंबाई लगभग 3 मीटर यानी 10 फीट थी तथा वैज्ञानिकों का दावा है कि इसका वजन 600 किलो रहा होगा। 

4 पैरों वाली व्हेल का 4 करोड़ साल पुराना जीवाश्म

यह पहली बार नहीं है कि किसी व्हेल के पैरों वाले जीवाश्म पाए गए हैं। लेकिन "फियोमीसेटस औबिस" को ब्लू व्हेल की सबसे पहली प्रजाति माना जा सकता है। माना जाता है कि पहली व्हेल साउथ एशिया में करीब 50 मिलियन साल पहले विकसित हुई थी। साल 2011 में वैज्ञानिकों ने पेरु में भी 43 मिलियन साल पुरानी चार पैरों वाली बेल के जीवाश्म हासिल किए थे।

4 पैरों वाली व्हेल का 4 करोड़ साल पुराना जीवाश्म

जर्नल प्रोसीडिंग्स में प्रकाशित खोज पर एक पेपर के प्रमुख लेखक अब्दुल्ला गोहर ने रॉयटर्स को दिए एक बयान में कहा, "फियोमीसेटस औबिस" एक प्रमुख नई व्हेल प्रजाति है, और मिस्र और अफ्रीकी जीवाश्म विज्ञान के लिए एक महत्वपूर्ण खोज है।"

English Translate

4 million year old fossil of 4 legged whale

Science is making records to touch new heights day by day. Human beings are developing every day with new inventions, new technologies and new discoveries. Some time ago scientists had made a new discovery about which everyone was surprised to know. Scientists found an ancient fossil of a whale in Egypt. It is no simple matter that scientists have discovered a new species of four-legged whale, which lived on our planet about 43 million years ago, that is, more than 40 million years ago.

This discovery was in discussion in August 2021. The discovery was based on a partial fossil of the creature discovered in the West Desert of Egypt. The organism was named "Phaeomycetus anubis". Aubis is considered the god of death in Egypt.

The discovery of the creatures gives researchers a better understanding of how mammals transitioned from their lives on land to becoming sea creatures. The fossil is actually the earliest whale fossil ever found in Africa.

Where is the fossil Protocetidae species from? This is the species of whale when animals were coming from land to live in the sea. Then different changes were happening inside him. This fossil was found during excavations in the Western Desert of Egypt where it is believed that once the sea used to flow.

According to the researchers, during its lifetime, the tetrapod whale may have actually been the apex predator. Until now, whales from this period have remained largely a mystery, the researchers point out, but the fossil provides some clarity. It is estimated to have weighed more than half a ton and was about 10 feet (3 m) long, and scientists It is claimed that its weight would have been 600 kg.

This is not the first time that fossils of a whale's feet have been found. But "Phaeomycetus anubis" can be considered as the earliest species of blue whale. The first whales are believed to have evolved in South Asia about 50 million years ago. In 2011, scientists also found fossils of a 43-million-year-old four-legged vine in Peru.

"Phaeomycetus anubis is a major new whale species, and an important discovery for Egyptian and African paleontology," Abdullah Gohar, lead author of a paper on the discovery published in the journal Proceedings, said in a statement to Reuters.

महिमा खाटू श्याम की || Mahima Khatu Shyam ki ||

महिमा खाटू श्याम की

भगवान खाटू श्याम की महिमा से कौन भला अपरिचित है। उनकी महिमा उनकी कृपा अटूट है, अपने भक्तों पर। यूं हीं नहीं कहते "हारे का सहारा बाबा खाटू श्याम हमारा", ऐसे बने खाटू श्याम भगवान। 

महिमा खाटू श्याम की

खाटू श्याम के भगवान श्री कृष्ण के कलयुगी अवतार के रूप में जाना जाता है, ऐसा कहे जाने के पीछे एक पौराणिक किवदंती जुड़ी हुई है-

राजस्थान के सीकर जिले में इनका भव्य मंदिर स्थित है, जहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। लोगों का विश्वास है कि बाबा श्याम सभी की मुरादें पूर करते हैं और रंक को भी राजा बना सकते हैं, बाबा खाटू श्याम का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। यह पांडुपुत्र भीम के पौत्र थे। 

महिमा खाटू श्याम की

खाटू श्याम की अपार शक्ति और क्षमता से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने इन्हें कलियुग में अपने नाम से पूजे जाने का वरदान दिया। जब महाभारत के युद्ध की घोषणा हुई, तब बर्बरीक जी अपनी माँ से बोले माँ युद्ध में जिसका पलड़ा कमजोर होगा, मैं उसका साथ दूंगा। यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि बर्बरीक कौन थे? ( लाक्षागृह की घटना में प्राण बचाकर वन-वन भटकते पांडवों की मुलाकात हिडिंबा नाम की राक्षसी से हुआ। यह भीम को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थी। माता कुंती की आज्ञा से भीम और हिडिंबा का विवाह हुआ जिससे घटोत्कच का जन्म हुआ। घटोत्कच का पुत्र हुआ बर्बरीक, जो अपने पिता से भी शक्तिशाली और मायावी था। बर्बरीक देवी के उपासक थे। देवी के वरदान से उसे तीन दिव्य बाण प्राप्त हुए थे, जो अपने लक्ष्य को भेदकर वापस लौट आते थे। इनकी वजह से बर्बरीक अजेय हो गया था।)

जगत के रचयिता श्री वासुदेव जब ये सुने तो गहन चिंतित हुए, क्योंकि सभी को ज्ञात है कि जहाँ स्वयं नर नारायण हैं, वहाँ भला हार कैसी? भगवान वाशुदेव इस बात से भी भली भांति बाकिफ थे कि अगर बर्बरीक हार जाने वाले के पक्ष में गए, तो पासा पलट जाएगा। क्योंकि उनको अभयवरदान प्राप्त था। वो एक तीर से सारा युद्ध समाप्त कर सकते थे। भगवान वाशुदेव श्री कृष्ण ने अपनी महिमा रची। 

महिमा खाटू श्याम की

महाभारत के युद्ध के दौरान बर्बरीक युद्ध देखने के इरादे से कुरुक्षेत्र आ रहा था।श्रीकृष्ण जानते थे कि अगर बर्बरीक युद्ध में शामिल हुआ तो परिणाम पाण्डवों के विरुद्ध होगा। बर्बरीक को रोकने के लिए श्री कृष्ण गरीब ब्राह्मण बनकर बर्बरीक के सामने आए। अनजान बनते हुए श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से पूछ कि तुम कौन हो और कुरुक्षेत्र क्यों जा रहे हो? जवाब में बर्बरीक ने बताया कि वह एक दानी योद्धा है जो अपने एक बाण से ही महाभारत युद्ध का निर्णय कर सकता है। 

तब श्री कृष्ण ने उसे अपना युद्ध कौशल दिखाने को कहा। तब बर्बरीक ने एक बाण चलाया जिससे पीपल के पेड़ के सारे पत्तों में छेद हो गया। एक पत्ता श्रीकृष्ण के पैर के नीचे था इसलिए बाण पैर के ऊपर ठहर गया श्री। कृष्ण बर्बरीक की क्षमता से हैरान थे और किसी भी तरह से उसे युद्ध में भाग लेने से रोकना चाहते थे। 

महिमा खाटू श्याम की

भगवान श्रीकृष्ण युद्ध का परिणाम जानते हुए बर्बरीक को रोकने के लिए बर्बरीक से कहा कि तुम तो बड़े पराक्रमी हो। मुझ गरीब को कुछ दान नहीं दोगे? बर्बरीक ने जब दान मांगने के लिए कहा तो श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उसका शीश मांग लिया। बर्बरीक समझ गया कि यह ब्राह्मण नहीं कोई और है और वास्तविक परिचय देने के लिए कहा। श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया, तो बर्बरीक ने खुशी-खुशी शीश दान देना स्वीकर कर लिया।

दान की मांग की। दान में उन्होंने उनसे शीश मांग लिया, दान में बर्बरीक ने उनको शीश दे दिया। शीश दान से पहले बर्बरिक ने श्रीकृष्ण से युद्ध देखने की इच्छा जताई थी। इसलिए श्री कृष्ण ने बर्बरीक के कटे शीश को युद्ध अवलोकन के लिए, एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया।

युद्ध के बाद पांडव लड़ने लगे कि युद्ध की जीत का श्रेय किसे जाता है? तब बर्बरीक ने कहा कि उन्हें जीत भगवान श्रीकृष्ण की वजह से मिली है। भगवान श्रीकृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न हुए और कलियुग में श्याम के नाम से पूजे जाने का वरदान दे दिया। तुम्हारे स्मरण मात्र से ही भक्तों का कल्याण होगा और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होगी।

महिमा खाटू श्याम की

श्री कृष्ण विराट शालिग्राम रूप में सम्वत् 1777 से खाटू श्याम जी के मंदिर में स्थित होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण कर कर रहे हैं। प्रत्येक वर्ष होली के दौरान खाटू श्यामजी का मेला लगता है। इस मेले में देश-विदेश से भक्तजन बाबा खाटू श्याम जी के दर्शन के लिए आते हैं। 

चिरायता (Chirayata)

चिरायता (Chirayata)

चिरायता का नाम आप सभी ने सुना होगा। यह अपने कड़वेपन के लिए जाना जाता है, परंतु चिरायता जितना कड़वा होता है, उतना ही रोगों से लड़ने में फायदेमंद भी होता है। यह एक लोकप्रिय आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है, जो मुख्य रूप से भारत के हिमालय के क्षेत्रों में पाया जाता है।

चिरायता के फायदे, नुकसान, उपयोग औषधिय गुण

चिरायता क्या है?

चिरायता हिमालय में पाई जाने वाली एक आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है, जो अपने विशिष्ट कड़वे स्वाद के लिए जाना जाता है। इसमें बैगनी रंग के फूल होते हैं। इसके पौधों में अनेक शाखाएं होती हैं। इसके तने नारंगी श्यामले या जामुनी रंग के होते हैं। इसके पत्ते सीधे 5 से 10 सेंटीमीटर लंबे तथा एक से डेढ़ सेंटीमटर चौड़े होते हैं। चिरायता के पौधे में फूल और फल आने का समय अगस्त से नवंबर तक का होता है। इसकी कई प्रजातियां होती हैं, जिसका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। 

जानते हैं चिरायता के फायदे, नुकसान, उपयोग औषधिय गुणों के बारे में

चिरायता के फायदे, नुकसान, उपयोग औषधिय गुण

आयुर्वेद के अनुसार चिरायता एक बहुत ही उत्तम औषधि है और कई रोगों में फायदेमंद है।

भूख बढ़ाने में

चिरायता के 20 से 30 मिलीमीटर काढ़े को पीने से भूख बढ़ती है। इससे पाचन शक्ति भी मजबूत होती है।

खांसी होने पर 

चिरायता के 20 से 30 मिलीमीटर काढ़े को पीने से खांसी ठीक होती है तथा साथ ही आंतों में रहने वाले कीड़े खत्म हो जाते हैं। 

पेट में कृमि होने पर

सुबह भोजन के पहले 5 से 10 मिलीलीटर चिरायता के रस में मधु मिलाकर सेवन करने से आंत के कीड़े खत्म हो जाते हैं।

पेचिश रोग की समस्या

2 से 4 ग्राम चिरायता के चूर्ण में दोगुना मधु मिलाकर सेवन करने से पेचिश रोग ठीक होता है।

दस्त की समस्या

2 से 4 ग्राम बेलगिरी चूर्ण को खाकर ऊपर से चिरायता का काढ़ा पीने से दस्त में लाभ होता है।

पाचन तंत्र विकार में

प्रतिदिन सुबह खाली पेट 10 से 30 मिलीलीटर चिरायता के काढ़े का सेवन करने से पाचन क्रिया ठीक होती है।  इससे शरीर स्वस्थ रहता है।

चिरायता के फायदे, नुकसान, उपयोग औषधिय गुण

लीवर की समस्या

चिरायता के पौधे से बने चूर्ण, पेस्ट अथवा काढ़ा, किसी भी प्रकार से सेवन करने से लीवर की सूजन ठीक होती है। 

बुखार होने पर 

चिरायता तथा धनिया के हरे पत्ते से काढ़ा बना लें। इस काढ़े का 10 से 20 मिली लीटर की मात्रा में सेवन करने से बुखार में शीघ्र लाभ होता है।

विभिन्न भाषाओं में चिरायता के नाम

चिरायता के फायदे, नुकसान, उपयोग औषधिय गुण

Hindi (chirata or chirayta in hindi) – चिरायता, चिरेता, चिरैता, नेपालीनीम, चिराइता

Sanskrit – किराततिक्त, कैरात, कटुतिक्त, किरातक, काण्डतिक्त, अनार्यतिक्त, रामसेनक

English – ब्राउन चिरेता (Brown chireta), व्हाइट चिरेता (White chireta), Chiretta (चिरेता)

Urdu – चियारायता (Chiarayata)

Oriya – चिरायता (Chirayata), चिरायिता (Chirayita)

Kannada – नेलबेवु (Nelbaevu), किरायत (Kirayat)

Gujarati – करियातु (Kariyatu), चिरायता (Chirayata)

Tamil – निलावेम्बु (Nilavembu), शिरातकूच्ची (Shirattakucchi)

Telugu – नलवेम (Nalavem), नीलवेरू (Nilveru), नीलवेम्बू (Nilavembu)

Bengali – चिराता (Chirata), चिरेता (Chireta), महातिता (Mahatita)

Nepali – चिराइता (Ciraaitaa), तिडा (Tidaa)

Punjabi – चिरेता (Chireta), चिरायता (Chirayata)

Marathi – काडेचिराईत (Kadechirait), चिराइता (Chirayita)

Malayalam – नीलावेप्पा (Nilaveppa), उत्तरकिरियट्ट (Uttarkiriyatta)

Arabic – कस्बुझ्झारिरा (Qasabuzzarirah), कसबूल् रायरह (Kasbul rairah)

Persian – नोनिहाद (Nonihaad), नेनिल आवंदी (Nenilawandi)

चिरायता के नुकसान (Side Effects of Chirayata)

चिरायता का कोई भी गंभीर दुष्प्रभाव नहीं है, परंतु कुछ सावधानियां अवश्य रखनी चाहिए। सीमित मात्रा में उपयोग से कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता, परंतु जरूरत से ज्यादा किसी भी चीज का सेवन नुकसानदायक होता है।

उच्च या निम्न रक्तचाप वाले रोगी को जो नियमित रूप से दवा ले रहे हैं, उन्हें चिरायता के सेवन से बचना चाहिए। 

अल्सर की समस्या से पीड़ित व्यक्ति को चिरायता का सेवन नहीं करना चाहिए।