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उच्च रक्तचाप । High Blood Pressure

उच्च रक्तचाप

उच्च रक्तचाप ।  High Blood Pressure
                हाई ब्लड प्रेशर को हाइपरटेंशन भी कहा जाता है। हाई ब्लड प्रेशर आजकल आम समस्या बनती जा रही है। हिंदुस्तान टाइम्स नामक समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में 8 लोगों में से एक व्यक्ति उच्च रक्तचाप का शिकार है। इन लोगों को अपने रक्तचाप को सामान्य रखने (120/ 80) के लिए दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन फिर भी वे इससे निजात नहीं पा पाते। हर साल 17 मई को विश्व उच्च रक्तचाप दिवस (World High Blood Pressure Day) के रूप में मनाया जाता है, ताकि लोग इस बीमारी के प्रति जागरूक रहें, लेकिन इसके बावजूद यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोगों में इस बीमारी की आवश्यक जानकारी नहीं है और वह इसका कोई इलाज नहीं करते। अगर आप हाई ब्लड प्रेशर के बारे में जानना चाहते हैं तो आपको इस लेख को जरूर पढ़ना चाहिए। इसमें हमने हाई ब्लड प्रेशर के बारे में बताने की कोशिश की है। 

उच्च रक्तचाप होने का कारण :-(Causes Of  High Blood Pressure :-  

उच्च रक्तचाप ।  High Blood Pressure
उच्च रक्तचाप गुर्दे और रक्त संचालन प्रणाली की गड़बड़ी के कारण होता है।  यह रोग किसी को भी हो सकता है। यह शरीर में आता है और कई तरह की बीमारियों को साथ लाता है। कई वर्षों तक तो इसका पता ही नहीं चलता। लेकिन जब पूर्ण रूप से इसका प्रकोप होता है, तब पता चलता है। जो लोग क्रोध, भय, दुख, या अन्य भावनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, उन्हें यह अधिक होता है। जो लोग परिश्रम कम करते हैं तथा अधिक तनाव में रहते हैं, शराब या धूम्रपान का सेवन अधिक करते हैं, उन्हें भी होता है।

उच्च रक्तचाप होने के लक्षण(Symptoms of High Blood Pressure :-

 इसमें सिर में दर्द होता है, चक्कर आने लगते हैं, दिल की धड़कन तेज हो जाती है, आलस्य होना, जी घबराना, काम में मन न लगना, पाचन क्षमता कमजोर होना, आंखों के सामने अंधेरा आना, नींद ना आना आदि लक्षण होते हैं।

उच्च रक्तचाप से बचने के घरेलू उपचार (Home Remedies For control High Blood Pressure :- 

उच्च रक्तचाप ।  High Blood Pressure

इसके कुछ घरेलू उपाय निम्नलिखित है।
  • दालचीनी का पाउडर पत्थर पर पीसकर आधा चम्मच रोज सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ ले।
  • आधा चम्मच शहद और आधा चम्मच दालचीनी का पाउडर गुनगुने पानी के साथ लें।
  • मेथी दाना एक एक चम्मच एक गिलास गर्म पानी में शाम को भिगो दें और सुबह खाली पेट पानी पी लें तथा दाना चबा चबा कर खा लें।
  • आधा चम्मच अर्जुन की छाल का पाउडर आधा गिलास गर्म पानी के साथ सुबह खाली पेट लें, काढे की तरह। यह हाई बी.पी, कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, मोटापा, हार्ट ब्लॉकेज को ठीक करता है।
  • लौकी का रस आधा कप सुबह खाली पेट नाश्ता करने से 1 घंटे पहले लें, उसमें पांच धनिया पत्ता, पांच पुदीना पत्ता, 5 तुलसी पत्ता, 34 काली मिर्च मिलाकर लें।
  • 5 बेलपत्र के पत्तों को पत्थर को पीसकर चटनी बना लें और एक गिलास पानी में तब तक उबालें जब तक की आधा हो जाए और उसके बाद चाय की तरह पी लें। बेलपत्र शुगर को भी नॉर्मल करता है।
  • गोमूत्र आधा कप रोज सुबह खाली पेट लें।
  • कच्चे लहसुन की 1-2 कली पीस कर प्रातः काल चाटने से उच्च रक्तचाप सामान्य होता है।
  • शहद में नींबू का रस मिलाकर सुबह शाम चाटने से उच्च रक्तचाप कम होता है।
  • कोमल नीम की पत्ती चबाने से या उसका रस निकाल कर पीने से भी रक्तचाप कम होता है और ठीक भी होता है।
  • प्रतिदिन रात को गर्म पानी में त्रिफला चूर्ण लेने से यह बीमारी दूर होती है।
  • आंवले का रस सबसे अधिक लाभकारी है। आंवले का मुरब्बा भी ले सकते हैं।
  • खाने में मूली का नियमित सेवन करें।
  • गर्म पानी में नींबू निचोड़ कर और उसमें शहद मिलाकर लगातार पंद्रह दिन तक पानी पिएं।  उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाएगा।
उच्च रक्तचाप ।  High Blood Pressure
       उच्च रक्त दबाव रक्त की अम्लता बढ़ने के कारण होता है। अतः ऐसी स्थिति में क्षारीय चीजें अधिक खाएं जैसे - मेथी, गाजर, कोई भी ऐसा फल जिसमें रस नहीं है, जैसे सेब, केला, अमरूद, पालक, बैगन का उपयोग करें। आलू ना अम्लीय है ना क्षारीय।  हरे पत्ते की कोई भी सब्जी क्षारीय होती है। इससे उच्च रक्त दबाव कम होगा, ट्राइग्लिसराइड कम होगा, कोलेस्ट्रोल और मोटापा भी कम होगा। लौकी सब्जियों में सबसे ज्यादा क्षारीय है, अतः लौकी का रस पी सकते हैं।

नियमित करें योग रहें निरोग

Sunday

इतवार 
Happy Sunday quotes motivate you for prosperity - BestInfoHub
चलो ग़मों में भी मुस्कुराते हैं 
     जिंदगी को थोड़ा चिढ़ाते हैं ❤❤

     औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता।
छुट्टी तो आती है पर कोई आराम नहीं आता।
क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता।।
देखो देखो सुबह हो गई फट फट फट भाग रही।
कहीं किसी को देरी ना हो जाय इसलिए वो नाच रही।।
फिर भी कोई भूल हुई तो सुनती के काम नहीं आता।
क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता।।
एक अकेली नार यहां न जाने क्या क्या काम करे।
मां बनकर बच्चों का ध्यान
बहू बनकर परिवार का ध्यान
पत्नी बनकर पति का ध्यान
भाभी बनकर रिश्तों का ध्यान
सुना है हर रिश्तों में एक विराम है आता।
क्या यह सहीसुना है ? क्युंकी कभी देखा ही नहीं।
क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता।।
सोती है वो आखिर में पर जागती है वो सबसे पहले।
होती है वो पीड़ा में पर फिर भी देखो हस्ती है।।
उसकी ही इच्छाओ का क्यों तुम्हें ध्यान नहीं आता।
क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता।।


🌼दुनिया का सबसे महँगा लिक्विड "आँसू "🌼

दो हंसों की कहानी (Story of two swans)

दो हंसों की कहानी 

             जैसा कि जातक कथाओं के बारे में हमें ज्ञात है कि यह बौद्ध ग्रंथ त्रिपिटक से लिए गए हैं। इन कथाओं में भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं हैं। मान्यता है कि यह कथाएं भगवान बुद्ध द्वारा कही गई हैं। कुछ विद्वानों मानना है की "जातक कथाएं "बुद्ध जी के निर्वाण के बाद उनके शिष्यों ने कही हैं। प्रत्येक कथा के माध्यम से समाज को कुछ संदेश दिया गया है। 
             तो इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज दो हंसो की कहानी शुरू करते हैं। इसे पढ़ कर अपनी राय इस विषय पर अवश्य दें। 
दो हंसों की कहानी (Story of two swans)

                  मानसरोवर,  जो वर्तमान में चीन में स्थित है,  कभी "ठमानस सरोवर " के नाम से विश्वविख्यात था।  इसमें रहने वाले हंसो की ख़ूबसूरती अप्रतिम थी। ऐसे हंस जो नीले आकाश में सफेद बादलों की छटा से भी अधिक मनोरम थे। उनके कलरव सुंदर नर्तकियों की नूपुर ध्वनियों से भी भी अधिक सुरीले थे। उन स्वेत हंसों के बीच दो दो स्वर्ण हंस भी थे। स्वर्ण हंस स्वेत हंसों से आकार में बड़े थे और बिल्कुल एक जैसे थे। दोनों समान रूप से गुणवान और शीलवान भी थे। उनमें से एक राजा था और दूसरा उसका वफादार सेनापति। राजा का नाम युधिष्ठिर और सेनापति  का नाम सुमुख था। दोनों हंसों की चर्चा चारों लोको में थी। कालान्तर में मनुष्य को भी उनके गुण सौंदर्य का पता होने लगा। वाराणसी नरेश ने जब इनके सौंदर्य की चर्चा सुनी तो उन्हें हंसों को पाने की प्रबल इच्छा हुई। 

              उन्होंने अपने राज्य में मानस-सदृश एक मनोरम-सरोवर का निर्माण करवाया, जिसमें हर प्रकार के आकर्षक जलीय पौधे और विभिन्न प्रकार के कमल जैसे पद्म, उत्पल, कुमुद, पुण्डरीक, सौगन्धिक, तमरस और कहलर विकसित करवाये। मत्स्य और जलीय पक्षियों की सुंदर प्रजातियाँ भी वहाँ बसायी गयीं। साथ ही राजा ने वहाँ बसने वाले सभी पक्षियों की पूर्ण सुरक्षा की भी घोषणा करवायी, जिससे दूर-दूर से आने वाले पंछी स्वच्छंद भाव से वहाँ विचरण करने लगे।
दो हंसों की कहानी (Story of two swans)

            एक बार, वर्षा काल के बाद जब हेमन्त ॠतु प्रारम्भ हुआ और आसमान का रंग बिल्कुल नीला होने लगा तब मानस के दो हंस वाराणसी के ऊपर से उड़ते हुए जा रहे थे। तभी उनकी दृष्टि राजा द्वारा निर्मित सरोवर पर पड़ी। सरोवर की सुन्दरता और उसमें तैरते रमणीक पक्षियों की स्वच्छंदता उन्हें सहज ही आकर्षित कर गयी। तत्काल वे नीचे उतर आये और महीनों तक वहाँ की सुरक्षा, सुंदरता और स्वच्छंदता का आनंद लेते रहे। फिर वर्षा ॠतु के प्रारंभ होने से पूर्व वे मानस को प्रस्थान कर गये। मानस पहुँच कर उन्होंने अपने साथियों के बीच वाराणसी के कृत्रिम सरोवर की इतनी प्रशंसा की कि सारे के सारे हंस वर्षा के बाद वाराणसी जाने को तत्पर हो उठे।

           हंसों के राजा युधिष्ठिर और उसके सेनापति सुमुख ने अन्य हंसों की इस योजना को समुचित नहीं माना। युधिष्ठिर ने उनके प्रस्ताव का अनुमोदन न करते हुए, यह कहा कि, पंछी और जानवरों की एक प्रवृत्ति होती है। वे अपनी संवेदनाओं को अपनी चीखों से प्रकट करते हैं। किन्तु "मानव" बड़ी चतुर होता है।  अपनी भंगिमाओं को वह जो प्रस्तुत करता है, उनके भावों के ठीक विपरीत कर्म करता है।

              फिर भी कुछ दिनों के बाद हंस-राज को हंसों की ज़िद के आगे झुकना पड़ा और वह वर्षा ॠतु के बाद मानस के समस्त हंसों के साथ वाराणसी को प्रस्थान कर गया। जब मानस के हंसों का आगमन वाराणसी के सरोवर में हुआ और राजा को इसकी सूचना मिली तो उसने अपने एक निषाद को उन दो विशिष्ट हंसों को पकड़ने के लिए नियुक्त किया।

            एक दिन युधिष्ठिर जब सरोवर की तट पर स्वच्छंद भ्रमण कर रहा था तभी उसके पैर निषाद द्वारा बिछाये गये जाल पर पड़े। अपने पकड़े जाने की चिंता छोड़ उसने अपनी तीव्र चीखों से अपने साथी-हंसों को तत्काल वहाँ से प्रस्थान करने को कहा, जिससे मानस के सारे हंस वहाँ से क्षण मात्र में अंतर्धान हो गये। रह गया तो  उसका एकमात्र वफादार हमशक्ल सेनापति-सुमुख। हंसराज ने अपने सेनापति को भी उड़ जाने की आज्ञा दी मगर वह दृढ़ता के साथ अपने राजा के पास ही जीना मरना उचित समझा। निषाद जब उन हंसों के करीब पहुँचा तो वह आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि पकड़ा तो उसने एक ही हंस था फिर भी दूसरा उसके सामने निर्भीक खड़ा था। निषाद ने जब दूसरे हंस से इसका कारण पूछा तो वह और भी चकित हो गया, क्योंकि दूसरे हंस ने उसे यह बताया कि उसके जीवन से बढ़कर उसकी वफादारी और स्वामि-भक्ति है। एक पक्षी के मुख से ऐसी बात सुनकर निषाद का हृदय परिवर्तन हो गया। वह एक मानव था; किन्तु मानव-धर्म के लिए वफादार नहीं था। उसने हिंसा का मार्ग अपनाया था और प्राणातिपात से अपना जीवन निर्वाह करता था। शीघ्र ही उस निषाद ने अपनी जागृत मानवता के प्रभाव में आकर दोनों ही हंसों को मुक्त कर दिया।

         दोनों हंस कोई साधारण हंस तो थे नहीं। उन्होंने अपनी दूरदृष्टि से यह जान लिया था कि वह निषाद निस्सन्देह राजा के कोप का भागी बनेगा। अगर निषाद ने उनकी जान बख्सी थी तो उन्हें भी निषाद की जान बचानी थी। अत: तत्काल वे निषाद के कंधे पर सवार हो गये और उसे राजा के पास चलने को कहा। निषाद के कंधों पर सवार जब वे दोनों हंस राज-दरबार पहुँचे तो समस्त दरबारीगण चकित हो गये। जिन हंसों को पकड़ने के लिए राजा ने इतना प्रयत्न किया था वे स्वयं ही उसके पास आ गये थे। विस्मित राजा ने जब उनकी कहानी सुनी तो उसने तत्काल ही निषाद को राज-दण्ड से मुक्त कर पुरस्कृत किया। उसने फिर उन ज्ञानी हंसों को आतिथ्य प्रदान किया तथा उनकी देशनाओं को राजदरबार में सादर सुनता रहा।

इस प्रकार कुछ दिनों तक राजा का आतिथ्य स्वीकार कर दोनों ही हंस पुन: मानस को वापिस लौट गये।


Moral/शिक्षा:- 
 इंसान को सदैव सच्चाई की राह पर निर्भीकता से चलते हुए अपने कर्म, रिश्तों, और सामाजिक जीवन मे वफादार रहना चाहिए।
English Translate

Story of two swans

             As we know about the Jataka tales, these Buddhist texts are taken from Tripitaka. These stories contain stories of Lord Buddha's former birth. It is believed that these stories have been told by Lord Buddha. Some scholars believe that "Jataka tales" were said by Buddha's disciples after Nirvana. Through each narrative, some message has been given to the society.
             So moving this sequence, let's start the story of two laughs today. Please read and give your opinion on this subject.

                  Mansarovar, currently located in China, was once known globally as "Thamanas Sarovar". The beauty of the laughs living in it was unmatched. Such swans which were more captivating than the shade of white clouds in the blue sky. His tweet was even more melodious than the beautiful Nupur sounds of the dancers. There were two golden swans among those swans. Golden swans were larger in size than white swans and were exactly the same. Both were equally virtuous and Sheilawan. One of them was the king and the other was his loyal general. The name of the king was Yudhishthira and the name of the commander was Sumukha. Discussion of both the swans was in all four locos. Later, humans also came to know about their quality and beauty. When the King of Varanasi heard the discussion about their beauty, he had a strong desire to get swans.

              He got a Manas-like Manoran-Sarovar built in his kingdom, in which he developed all kinds of attractive aquatic plants and different types of lotuses like Padma, Utpal, Kumud, Pundarik, Saugandhik, Tamaras and Kahler. Beautiful species of fish and aquatic birds were also settled there. At the same time, the king also announced the complete protection of all the birds that settled there, due to which birds coming from far and wide began to roam there.


            Once, after the rainy season when Hemantu started and the color of the sky started to be completely blue, then two swans of Manas were flying over Varanasi. Then his eyes fell on the lake built by the king. The beauty of the lake and the beauty of the delightful birds floating in it attracted them easily. Immediately he came down and continued to enjoy the security, beauty and freedom of the place for months. Then before the onset of rain, he departed in the psyche. On reaching the psyche, he praised the artificial lake of Varanasi among his colleagues so much that all the swans were ready to go to Varanasi after the rain.
दो हंसों की कहानी (Story of two swans)

           Yudhishthira, the king of the swans and his commander Sumukha, did not consider this plan of the other swans to be proper. Yudhishthira, not approving his proposal, said that birds and animals have a tendency. They express their sensations with their screams. But "human" is very clever. What he presents to his ill-fated deeds works in stark contrast to his sentiments.

              Yet after a few days Hans-Raj had to bow to the stubbornness of the swans and after the rainy season, he departed to Varanasi with all the swans of the psyche. When the swans of Manas arrived in the lake of Varanasi and the king came to know of this, he appointed one of his Nishad to catch those two distinct swans.

            One day when Yudhishthira was taking a free trip on the banks of the lake, only then did his feet fall on the net laid by Nishad. Leaving the worry of being caught, he asked his fellow-swans to immediately depart from there, so that all the swans of the psyche got interrupted from there in a moment. If left, his only loyal armed commander-in-chief. Hansraj also ordered his commander to fly away, but he thought it right to die living with his king firmly. When Nishad got close to those swans, he was surprised because he caught one swan, yet the other was standing boldly in front of him. When Nishad asked the other Hans the reason for this, he was more surprised, because the second Hans told him that he had more loyalty and loyalty than his life. Hearing such a thing from the face of a bird, Nishad got a change of heart. He was a human; But he was not faithful to human religion. He took the path of violence and lived his life with death. Soon that Nishad came under the influence of his awakened humanity and freed both the swans.

दो हंसों की कहानी (Story of two swans)

         Both the swans were not just ordinary swans. He had learned from his vision that he would be a part of the wrath of the Nishad king. If Nishad had lost his life, he too had to save Nishad's life. So immediately they rode on Nishad's shoulder and asked him to walk to the king. All the courtiers were amazed when both of them reached the court of Hans on the shoulders of Nishad. The swans that the king had tried so much to catch had come to him himself. When the surprised king heard his story, he immediately rewarded Nishad by freeing him from the punishment. He then provided hospitality to those knowledgeable swans and kept listening to their wishes in the court.

Thus, after accepting the hospitality of the king for a few days, both the swans again returned to the psyche.

Moral/Education:-

A person should always be faithful in his actions, relationships, and social life, walking boldly on the path of truth.

     

अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)

अजीनोमोटो 

        अभी तक यहां उन चीजों की चर्चा हुई है जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। आज एक ऐसी खाद्य पदार्थ की बात करेंगे जो आजकल धड़ल्ले से उपयोग में लाया जा रहा और ये हमें सिर्फ नुकसान ही पहुंचाता है, यह खाद्य पदार्थ है अजीनोमोटो।
अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)

अजीनोमोटो क्या है,(What is Ajinomoto):- यह चमकीले छोटे क्रिस्टल के जैसे दिखता है। अजीनोमोटो में एमिनो एसिड पाया जाता है, जिसे जापानी कंपनी द्वारा बनाया गया है। अजीनोमोटो का दूसरा नाम मोनो सोडियम ग्लूटामेट( MSG) भी है। चीन की खाद्य पदार्थों में अजीनोमोटो का उपयोग होता है। इसके डालने से खाने का स्वाद दोगुना हो जाता है। यह सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक है।

          इसको लगातार खाने से जीभ एक विशेष प्रकार का स्वाद ग्रहण करने लगती है, जिसे उमामी टेस्ट कहते हैं।यह न मीठा होता है न खट्टा न नमकीन न कसैला। यह एक अलग ही स्वाद है।यदि एक बार जीभ इसक अभ्यस्त हो जाय तो फिर जीभ को कुछ अच्छा नही लगता।
अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)
         इसको ऐसे समझ सकते हैं, यह एक ऐसा रसायन है जिसके जीभ पर स्पर्श के बाद जीभ भ्रमित हो जाती है और मष्तिस्क को गलत संदेश भेजती है जिससे कोई भी बेस्वाद खाना अच्छा महसूस होता है। इस रसायन के प्रयोग से शरीर के अंगो उपांगो और मष्तिस्क के बीच संपर्क बाधित होता है, जिसके दूरगामी परिणाम बहुत खतरनाक है।

        आज के दौर में हम घर के बजाय बाहर का खाना ज्यादा पसंद करते हैं।

अजीनोमोटो का उपयोग (Uses of Ajinomoto):-  मैगी, चाउमीन, मंचूरियन, स्प्रिंगरोल, आदि चाइनीस व्यंजन में इसका प्रयोग होता है।  इसके अलावा हम चिप्स, पिज्जा, जैसे खाने को पसंद करते हैं, जिनमें अजीनोमोटो का उपयोग होता है। टोमेटो सॉस, सोया सॉस, सभी फास्ट फूड में इसका उपयोग होता है।

अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto): -
अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)

                    पहले इसका उपयोग सिर्फ चीन के रसोई में होता था। अब यह धीरे धीरे हमारी भारतीय रसोई में भी घुस गया है। हम समय बचाने के चक्कर में नूडल्स, चाउमीन बनाते हैं, जिसे बच्चे हो या बड़े बहुत चाव से खाते हैं। पर इसके उपयोग से होने वाले नुक्सान की जानकारी हमें  नहीं होती। आइये जानते हैं इसके उपयोग से होने वाले नुकसान के बारे में। 

#  बच्चों की सेहत पर  आजकल बच्चे फ़ास्ट फ़ूड, जंक फ़ूड, प्रोसेस्ड फूड खाना पसंद करते हैं , जिससे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पैर बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे बच्चों में मोटापे की समस्या भी बढ़ रही है। 
#  माइग्रेन  माइग्रेन एक कॉमन समस्या हो गयी है। अजीनोमोटो के लगातार सेवन से भी यह बीमारी होती है। इसको आधे सिर का दर्द या अधकपारी भी बोलते हैं। 

#  ब्रेन को नुकसान  अजीनोमोटो के अधिक सेवन से अधिक पसीना आना, चक्कर आना जैसी बीमारी हो सकती है। 

#  तंत्रिका तंत्र पर असर  इससे शरीर में झुंझुनि , गर्दन में अकड़न, अनिद्रा जैसे रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। 

#   सीने में दर्द   अजीनोमोटो का ज्यादा उपयोग करने से सीने में दर्द, धड़कन का बढ़ जाना, ह्रदय की मांसपेशियों में खिचाव जैसी समस्याएं भी उत्पन्न हो जाती हैं। 

#   ब्लड प्रेशर बढ़ना  यह शरीर में सोडियम की मात्रा को बढ़ा देता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। गर्भवती महिला को इसका सेवन बिलकुल नहीं करना चाहिए। 

#   यह  आंखों और तंत्रिका तंत्र को डैमेज कर देता है

अतः इसके सेवन से खुद बचें और दूसरों को भी सलाह दें। 
अजीनोमोटो || Ajinomoto || अजीनोमोटो के नुकसान ( Side Effects of Ajinomoto)


पेड़ की गवाही - Ped ki Gavahi - Ped ki Gawahi

पेड़ की गवाही

पेड़ की गवाही (Ped ki Gavahi)

              रोशन जीवन के अंतिम पड़ाव में था इसलिए वह तीर्थयात्रा पर जाना चाहता था । उसने अपने जीवन भर की कमाई एक जगह एकत्रित कर रखी थी। जब उसके मन में तीर्थयात्रा पर जाने का ख्याल आया तो उसने उसमें से कुछ अशर्फियाँ निकाल ली और बाकी बची हुई एक हज़ार अशर्फियाँ एक थैली में भर ली और अपने मित्र दीनानाथ को देते हुए बोला, “ मित्र यह मेरे जीवन भर की कमाई हैं अब मैं तीर्थयात्रा पर जा रहा हूँ । अगर मैं एक साल के अंदर नहीं आ पाया तो तुम इन्हें किसी नेक काम में खर्च कर लेना ।” एक साल तक ये अशर्फियाँ तुम्हारे पास मेरी एक अमानत हैं । अगर मैं आ जाऊंगा तो मैं आकर वापस ले लूँगा । दीनानाथ ने कहा, “ आप चिंता ना करें मैं आपकी ये अमानत संभल कर रखूँगा।” आप बिना चिंता किए आराम से तीर्थयात्रा पर चले जाइए । दीनानाथ की बात पर यकिन कर रोशन चला गया। इतना सारा धन देखकर दीनानाथ का मन बदल गया और उसने उन सारी अशर्फियों को हज़म करने की ठान ली। एक वर्ष बाद जब रोशन तीर्थयात्रा से वापस आ गया और दीनानाथ के पास अपना धन लेने गया तो दीनानाथ ने धन देना तो दूर रोशन को पहचानने से भी इंकार कर दिया और उसे बेइज़्ज़त कर के घर से भगा दिया । बेचारा गरीब रोशन अपने दोस्त की इस हरकत पर यकीन ही नहीं कर पा रहा था लेकिन रोशन ने  भी हार नहीं मानी और अपना धन दीनानाथ से लेने के लिए उसने बादशाह अकबर के दरबार में न्याय के लिए गुहार लगाई।

अब दीनानाथ को भी दरबार में बुलाया गया लेकिन दीनानाथ अभी भी रोशन को पहचानने से इनकार कर रहा था । रोशन के पास अपनी बात को साबित करने के लिए ना तो कोई गवाह था और ना ही कोई सबूत । सच्चाई का पता करने के लिए बादशाह ने ये मामला बीरबल को सौंप दिया। बीरबल ने दोनों से दोबारा पूछताछ की लेकिन दीनानाथ अपनी बात पर अटल रहा । बीरबल ने रोशन से पूछा तुमने किस के सामने अपना धन दीनानाथ को दिया था । हुजुर बस एक आम के पेड़ के नीचे मैंने धन दिया था और कोई गवाह नहीं था । इसका मतलब तुम्हारा गवाह आम का पेड़ है। जाओ तो उस आम के पेड़ से कहो कि वो तुम्हारे पक्ष में गवाही दे । अगर वो ना माने तो उसकी मिन्नतें करना लेकिन पेड़ को गवाही के लिए लेकर आना । तभी तुम्हारा धन तुम्हें वापस मिल सकता हैं । बेचारा रोशन बड़बड़ाता हुआ चला गया । पेड़ भी भला गवाही दे सकता है। दीनानाथ और बीरबल महल में ही रोशन का इंतज़ार करने लगे । जब कुछ समय गुज़र गया तो बीरबल बोला, “ अब तक तो रोशन आम के पेड़ के पास पहुँच गया होगा और उससे मिन्नतें कर रहा होगा।” तभी दीनानाथ बोला, “ रोशन तो वृद्ध आदमी है वो इतनी जल्दी वहाँ नहीं पहुँच सकता अभी तो उसे काफी समय लग जाएगा क्योंकि वहाँ का रास्ता भी साफ नही हैं।” बीरबल शांत होकर रोशन का इंतज़ार करने लगे।
पेड़ की गवाही (Ped ki Gavahi)
बहुत देर बाद रोशन महल में आया और बोला, “ महाराज मैंने पेड़ से बहुत मिन्नतें की लेकिन वो वहीं का वहीं खड़ा रहा। अब आप ही बता दीजिए मैं क्या करूँ ?” बीरबल ने रोशन को अश्वासन देते हुए कहा , “तुम चिंता मत करो पेड़ तुम्हारे पक्ष में गवाही देकर चला गया है। दीनानाथ ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, “ पेड़ कब आया? मैं तो कब से यहीं बैठा हुआ हूँ।” बीरबल बोले, “दीनानाथ जब मैंने तुमसे पूछा था कि रोशन उस पेड़ के पास पहुँच गया होगा तो तुमने तुरंत इनकार कर दिया। इसका मतलब कि तुम उस जगह के बारे में अच्छी तरह जानते थे लेकिन तुम झूठ बोल रहे थे। अब तुम सीधे सीधे अशर्फियों के बारे में बताते हो या मैं अपने तरीके से पूँछु। बेचारे दीनानाथ ने डर के मारे सब कुबूल कर लिया। उसने रोशन से माफ़ी मांगकर उसका सारा धन वापस कर दिया।



English Translate

Witness Of Mango Tree

               Roshan was in his last stop of life so he wanted to go on a pilgrimage.  He had collected his entire lifetime income in one place.  When he thought of going on a pilgrimage, he took some of the ashfaris out of it and filled the remaining one thousand asharfis in a bag and gave it to his friend Dinanath and said, "Friends, this is the earnings of my life.  Going on pilgrimage  If I am not able to come within a year then you should spend them in some noble cause. ”  For a year, you have been one of my possessions.  If I come, I will come and take it back.  Dinanath said, "Don't worry, I will take care of you."  You go on a pilgrimage comfortably without worrying.  Roshan walked away believing Dinanath.  Seeing so much money, Dinanath changed his mind and decided to digest all those Ashrafis.  A year later, when Roshan returned from the pilgrimage and went to take his money to Dinanath, Dinanath refused to recognize the money, and even insulted Roshan away and drove him away from the house.  Poor poor Roshan could not believe his friend's actions but Roshan too did not give up and pleaded for justice in the court of Emperor Akbar to take his money from Dinanath.


 Now Dinanath was also summoned to the court, but Dinanath still refused to recognize Roshan.  Roshan had neither a witness nor any evidence to prove his point.  To find out the truth, the king handed over the case to Birbal.  Birbal interrogated both of them but Dinanath stood firm on his point.  Birbal asked Roshan to whom did you give your money to Dinanath.  I had given money under a mango tree and there was no witness.  This means your witness is a mango tree.  Go, tell the mango tree that it should testify in your favor.  If he does not agree, then pray for him but bring the tree for testimony.  Only then you can get your money back.  Poor Roshan went on mumbling.  The tree can also bear witness.  Dinanath and Birbal started waiting for the light in the palace itself.

  When some time passed, Birbal said, "By this time, Roshan must have reached the mango tree and begged for it."  Then Dinanath said, "Roshan is an old man, he cannot reach there so soon, it will take him a long time because the way there is not clear."  Birbal calmed down and started waiting for Roshan.
पेड़ की गवाही (Ped ki Gavahi)
 After a long time Roshan came to the palace and said, "Maharaj, I pleaded with the tree but he stood there.  Now you tell me what should I do? "  Birbal gave Roshan an assurance and said, "Don't you worry, the tree has gone by testifying in your favor.  Dinanath wondered, "When did the tree come?"  I have been sitting here since long. ”  Birbal said, "Dinanath, when I asked you that Roshan must have reached that tree, you immediately refused.  It means that you were well aware of that place but you were lying.  Now you tell me directly about Ashurfis or I ask in my own way.  Poor Dinanath accepted everything in fear.  He apologized to Roshan and returned all his money.

गिलोय के फायदे (Benefits of Giloy)

Giloy(गिलोय )

आयुर्वेद में गिलोय को अमृता कहा गया है। शायद कम लोगों को ही पता होगा कि यह हमारी राष्र्टीय औषधि है।  


गिलोय के फायदे (Benefits of Giloy)

       पूरी दुनिया में कोरोनावायरस को लेकर भय का माहौल है।  चूँकि इसकी कोई दवा अबतक खोजी नहीं जा सकी है।  इसलिए सावधानी बरतने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सावधानी के तौर पर साफ़-सफाई का ख़ास ख्याल रखने के लिए कहा जा रहा है. साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढाने पर बल दिया जा रहा है। इस दृष्टि से गिलोय का उपयोग लाभदायक सिद्ध हो सकता है। क्योंकि इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने की अद्वितीय शक्ति होती है.
गिलोय के फायदे (Benefits of Giloy)
      औषधीय गुणों के आधार पर नीम के वृक्ष पर चढ़ी हुई गिलोय को सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि गिलोय की बेल जिस वृक्ष पर भी चढ़ती है वह उस वृक्ष के सारे गुण अपने अंदर समाहित कर लेती है। अतः नीमगिलोय सर्वोत्तम होती है।


गिलोय के फायदे (Benefits of  Giloy):-

#  बुखार में  जो लोग नियमित तौर पर गिलोय का सेवन करते हैं, उनको बुखार होने की संभावना कई गुना कम हो जाती है। बुखार हो जाने की स्थिति में गिलोय के काढ़े के सेवन से बुखार उतर जाता है।
   ख़राब से ख़राब बुखार इस अमृता के सेवन से ठीक होता है। इसके लिए इसके एक इंच मोटे तने को लेकर पीस कर पानी में उबाल लें, पानी आधा शेष रह जाने पर पीने से सभी तरह के बुखार ठीक होते हैं।

#  एंटी एजिंग गुणों से भरपूर   बढ़ती उम्र के प्रभाव को कम करने में सहायक है ये गिलोय क्यूंकि इसमें प्रचूर मात्रा में एंटी एजिंग गुण विद्यमान है। इसके नियमित सेवन से शरीर में बढ़ते उम्र के बढ़ते हुए प्रभाव को कम किया जा सकता है।

#  बोन फ्रेक्टर में    हड्डी में चोट लगने पर गिलोय  का जूस पीने पर और पत्तियों को हल्का गरम कर चोट वाली जगह पर लगाने से दर्द में आराम।

#  रक्त विकार    गिलोय से आमाशयगत अम्लता कम होती है। यह हृदय को बल देने वाली, रक्त विकार तथा पांडुरोग में गुणकारी है।

#  त्वचा रोग   खांसी, दौर्बल्यता, प्रमेह, मधुमेह में, त्वचा के रोगों में तथा कई प्रकार के ज्वर में उत्तम कार्य करती है।


          गिलोय को घृत के साथ सेवन करने से यह वात शामक, गुड़ के साथ सेवन करने से मलबद्धता नाशक, खांड के साथ सेवन करने से कफ शामक, सौंठ के साथ सेवन करने से आमवात शामक तथा एरण्ड तैल के साथ सेवन करने से वात शामक होती है।


Corona Medicine


स्वामी रामदेव ने किया ऐलान- पतंजलि ने बना ली कोरोना पर दवाई

      योगगुरु बाबा रामदेव की पतंजलि कंपनी का दावा है कि उन्होंने इसकी दवा तैयार कर ली है. प्रेस कॉन्फ्रेंस में रामदेव ने कहा कि दुनिया इसका इंतजार कर रही थी कि कोरोना वायरस की कोई दवाई निकले, आज हमें गर्व है कि कोरोना वायरस की पहली आयुर्वेदिक दवाई को हमने तैयार कर लिया है. इस आयुर्वेदिक दवाई का नाम कोरोनिल है.

रामदेव बोले कि आज ऐलोपैथिक सिस्टम मेडिसन को लीड कर रहा है, हमने कोरोनिल बनाई है. जिसमें हमने क्लीनिकल कंट्रोल स्टडी की, सौ लोगों पर इसका टेस्ट किया गया. तीन दिन के अंदर 65 फीसदी रोगी पॉजिटिव से नेगेटिव हो गए.

योगगुरु रामदेव ने कहा कि सात दिन में सौ फीसदी लोग ठीक हो गए, हमने पूरी रिसर्च के साथ इसे तैयार किया है. हमारी दवाई का सौ फीसदी रिकवरी रेट है और शून्य फीसदी डेथ रेट है.
What is coronil Patanjali medicine to cure coronavirus disease ...

https://youtu.be/D2m5QdFAgXw